सोमवार, 24 जुलाई 2017

मायावती का इस्तीफा यानी अस्तित्व बचाने की कवायद


डॉ. महेश परिमल
खुद को दलितों का नेता बताने वाली मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। हालांकि उनका इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है। इस्तीफे का कारण उसने यह बताया है कि उन्हें बोलने का अवसर नहीं दिया जा रहा है। भाषण के दौरान भाजपा नेताओं द्वारा खलल डालने का आरोप भी उन्होने लगाया है। वास्तव में ये तो साधारण बातें हैं। इसके पीछे की कहानी कुछ और ही है। मायावती अब समझ गई हैं कि अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कुछ तो ऐसा करना ही पड़ेगा, जिससे वह कुछ समय के लिए सुर्खियां बटोर सके, ताकि नेतागिरी कुछ समय के लिए चल पड़े।
मायावती का कार्यकाल आगामी अप्रैल में पूर्ण हो रहा है। अब उनके पास केवल 8 महीने का समय ही बाकी है। इस समय उत्तरप्रदेश विधानसभा में बसपा के 19 विधायक ही हैं, लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है। मायावती बहुजन समाज पार्टी की एक ऐसी अध्यक्ष हैं, जो अभी तीन महीने पहले तक उत्तर प्रदेश की राजनीति का पर्याय मानी जाती थीं। अपने आप को वह दलितों का मसीहा कहने से नहीं चूकती। एक समय ऐसा भी था, जब उनका नाम प्रधानमंत्री पद दावेदारों में था। आज उनकी हालत ऐसी हो गई है कि एक राजनीतिक बयान देने में भी उन्हें मशक्कत करनी पड़ रही है। यही उनके इस्तीफे का सही कारण है। वह अच्छी तरह से जानती हैं कि अब राज्यसभा के लिए वह चुनाव नहीं लड़ सकती, यह उनके जीवन का आखिरी कार्यकाल है। लोकसभा या विधानसभा के उपचुनाव में भी वह अपना बल नहीं दिखा पाएंगी। उसके दलित वोट इतने अधिक बिखर गए हैं कि उन्हें अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है। इसलिए इस्तीफा देना उनकी मजबूरी है। इससे वह अपने राजनीतिक भूतकाल के खिलाफ अपने वर्तमान की हास्यास्पद स्थिति को रेखांकित कर रहीं है।
जब भी भारतीय राजनीति का इतिहास लिखा जाएगा, तब मायावती का उदय एक चमत्कार के रूप में माना जाएगा। अत्यंत ही साधारण परिवार से आने वाली यह ‘दलित की बेटी’ ही है, परंतु सत्ता में आने के बाद अपने शाही ठाट-बाट, घमंड, अहंकार और अभिमान से भरे संवादों ने उन्हें ‘दौलत की बेटी’ बना दिया। 1993 में जब मायावती का उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रवेश हुआ और वे मुख्यमंत्री बनीं, तब पी.वी.नरसिंह राव ने इसे ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ निरुपित किया। राजनीति में खुद को उस्ताद मानने वाली मायावती की पहचान अपने कड़वे बयानों के कारण अधिक है। दलितों को सामने रखकर उसने कई बार ऐसे बयान दिए हैं, जिसे सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता। अपने विचारों पर दृढ़ रहने के कारण उनके समर्थक उसे अपना आदर्श मानते हैं। दूसरी ओर अपनी जिद के कारण विरोधी उनसे दूर ही रहते हैं।
दलित वोट बैंक को मजबूत पहचान देने के मामले में कांशीराम और मायावती के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। मुलायम के ओबीसी कार्ड के खिलाफ मायावती ने दलित मतों को अपनी ओर मिला लेने के सफल ध्रुवीकरण के चलते अपनी श्रेष्ठता सिद्ध कर दी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती और बसपा को अनदेखा नहीं किया जा सकता। दलित वोट बैंक को तोड़ने की कोशिश में नाकामयाब होने के बाद मुलायम ने मुस्लिम-यादव का नया समीकरण तैयार किया और कामयाब रहे। मुलायम के इस दांव को खारिज करने के लिए मायावती ने दलित और ब्राह्मण को अपने पाले में लाने में सफलता प्राप्त की। जो वर्ग सामाजिक रूप से एक पंगत में बैठता भी नहीं था, मायावती ने उस वर्ग को एक साथ मिला दिया। तब मायावती के सफल, अनोखे और करिश्माई सोशल इंजीनियरिंग की चर्चा हुई थी।
उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव में मुलायम के स्थापित वोट बैंक भाजपा की आंधी को रोकने के लिए उसने दलित-मुस्लिम वोटबैंक पर ध्यान केंद्रित किया। साधारण रूप से मुस्लिम वोट बैंक का झुकाव सपा की तरफ माना गया, पर यादव परिवार के बीच जो कलह सामने आया, तब मायावती ने मुस्लिम वोट बैंक पर घुसपैठ करनी शुरू कर दी। इसके लिए उसने 97 मुस्लिमों को टिकट दिया। चुनाव प्रचार के दौरान भी उसने मुस्लिमों की तरफ अधिक ध्यान दिया। दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम को भी अपने पक्ष में कर लिया। मुस्लिमों को रिझाने के लिए उनकी सभाओं में अधिक से अधिक मुस्लिम श्रोताओं को लाने का प्रयास किया गया। मुख्तार अंसारी जैसे कुख्यात अपराधी को भी बिना किसी हिचकिचाहट के उसने पार्टी में ले लिया। उनकी इस तरह की कोशिशों से उनके दलित वोट बैंक उससे दूर जाने लगे। दलित अब मायावती को बेवफा कहने लगे।
बसपा की हालत ऐसी है कि अब मायावती के अलावा दूसरी पंक्ति में कोई नेता नजर ही नहीं आता। स्वामी प्रसाद मौर्य से कुछ आशा थी, पर जब उसने भी मायावती का साथ छोड़कर भाजपा का पल्लू थाम लिया, तो तुनकमिजाज मायावती उन्हें मना नहीं पाई। उल्टे उनके खिलाफ अनाप-शनाप बयान देने लगी। उत्तर प्रदेश की दलित प्रभुत्व वाली 67 सीटों में से 53 सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमा लिया। इस दौरान बसपा की ऐसी फजीहत हुई कि 2012 में 80 सीटों के खिलाफ उस समय यह आंकड़ा केवल 19 तक ही सीमित हो गया। लोकसभा में भी 80 सीटों में से बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। इससे उसकी राजनीतिक हैसियत ही खो गई। अब उनके खिलाफ दलितों की नई नेतागिरी उभरने लगी। सहारनपुर के दंगों के बाद चंद्रशेखर नाम के युवा की चर्चा जोरों पर है। उसकी आक्रामकता से लोग प्रभावित हैं। राज्य के दलितों पर वे अपना प्रभाव जमा रहे हैं। पहले मायावती ने एक नारा दिया था-तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार। अब ऐसा ही कुछ चंद्रशेखर कर रहे हैं। सहारनपुर में दलितों की रक्षा करने में मायावती ने देर कर दी। ऐसा चंद्रशेखर बार-बार कह रहे हैं। इस तरह से वे स्वयं को दलितों के मसीहा के रूप में प्रतिस्थापित कर रहे हैं।
मायावती का इस्तीफा अलग बात है, आज तक मायावती ने कोई भी मौखिक भाषण नहीं दिया। जो भी कहा-लिखा हुआ पढ़ा। उनकी अनुपस्थिति से किसी प्रकार की कमी किसी को नहीं खलेगी। पर उत्तर प्रदेश की राजनीति से फिसले पैरों को वह किस तरह से दृढ़ करतीं है, यही देखना बाकी रह गया है।
डॉ. महेश परिमल 

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