शनिवार, 8 जुलाई 2017

रंग बदलने में गिरगिट को भी पीछे छोड़ देते हैं नीतिश कुमार

डॉ. महेश परिमल
राजनीति में रंग बदलना बहुत ही आसान है, पर इतना आसान भी नहीं कि गिरगिट भी शरमा जाए। राजनीति में सफल होने के लिए नेता रंग बदलते ही रहते हैं। पर कब कहां किस तरह से गुलाटी मारनी है या रंग बदलना है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसमें जरा-सी भी चूक राजनीति से बाहर कर सकती है। पर बिहार की राजनीति करते हुए मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने एक गुलाटी से कई निशाने साधे हैं। राष्ट्रपति पद के लिए भाजपा ने जब रामनाथ कोविंद को समर्थन देने की घोषणा करते हुए नीतिश कुमार ने एक पत्थर से कई निशाने साधे हैं। इससे विपक्ष जो अब तक मौन साधे हुए अपनी एकता की शान बघार रहा था, अब बिखरता नजर आ रहा है। नीतिश ने कोविंद को समर्थन की घोषणा करते हुए जो निशाने साधे हैं, उससे विपक्ष का समीकरण बिगड़ता दिखाई दे रहा है।
भाजपा के प्रत्याशी को समर्थन देने की घोषणा कर नीतिश ने तीन संकेत दिए हैं। पहला संदेश लालू प्रसाद यादव को जाता है कि उसका परिवार भ्रष्टाचार से बाज आए। इसी कारण से वे जब चाहें, उनसे नाता तोड़ सकते हैं। दूसरी तरफ उन्होंने भाजपा की नेतागिरी का संकेत दिया है कि बिहार में वे भाजपा से गठबंधन कर सरकार बना सकते हैं। तीसरी तरफ उन्होंने विपक्ष को यह संकेत दिया है कि यदि उन्हें 2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं बताया, तो वे भाजपा का पल्लू पकड़ सकते हैं। अपनी 5 दशक की राजनीतिक यात्रा में नीतिश कुमार ने कई बार सोच-समझकर गुलाटी मारी है। इससे उन्हें काफी राजनीतिक लाभ भी मिला है। विचारधारा की दृष्टि से वे समाजवादी हैं। लालू यादव की तरह वे भी राम मनोहर लोहिया के शिष्य हैं। ‘70 के दशक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के भ्रष्ट शासन के खिलाफ नवनिर्माण का आंदोलन शुरू किया था, उसमें नीतिश कुमार और लालू यादव कंधे से कंधा मिलाकर साथ-साथ थे। 1989 में वी.पी.सिंह के जनता दल ने राजीव गांधी को हराया, उसमें भी नीतिश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जनता दल का विभाजन हुआ, तब वे लालू यादव, शरद यादव और रामविलास पासवान के साथ थे। उस समय नीतिश कुमार का राजनीतिक भविष्य डांवाडोल हो रहा था। तब उन्होंने जार्ज फर्नाण्डीस के साथ मिलकर समता पार्टी बनाई। 1998 में जब केंद्र में भाजपा के मोर्चे की सरकार आई, तब उन्होंने वामपंथी विचारधारा को दरकिनार करते हुए एनडीए सरकार में शामिल हो गए। पहले तो वे रेल मंत्री बने, फिर कृषि मंत्री बने, उसके बाद 2001 से लेकर 2004 तक वे एक बार फिर रेल मंत्री पद को सुशोभित करने लगे।
सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में एनडीए की हार से नीतिश कुमार का राजनीतिक भविष्य एक बार फिर हिचकोले खाने लगा। 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव होने वाले थे। उस समय लोग लालू यादव और राबड़ी देवी के जंगलराज से त्रस्त हो चुके थे। इस जंगलराज से मुक्ति दिलाने के नारे के साथ उन्होंने भाजपा से नाता जोड़ लिया। उनका ये पैंतरा काम आया, भाजपा से गठबंधन कर वे मुख्यमंत्री बन गए। अपने 5 साल के कार्यकाल में नीतिश कुमार बिहार को विकास के रास्ते पर ले आए। भाजपा के साथ मिलकर नीतिश ने बिहार को भ्रष्टाचारमुक्त प्रदेश दिया। इसी कारण वे 2005 का चुनाव जीत गए।
2002 में जब गुजरात में दंग हुए थे, तब नीतिश कुमार केंद्र में भाजपा मोर्चे की सरकार के रेल मंत्री थे। उधर नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे। गुजरात दंगों के विरोध में होने के बाद भी नीतिश कुमार ने रेल मंत्री का पद नहीं छोड़ा था। पर जब 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया, तो वे उनके विरोध में उन्होंने बिहार में भाजपा से अपना गठबंधन तोड़ लिया। नीतिश कुमार की इस गुलाटी से उनकी सरकार खतरे में पड़ गई। तब 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में  बिहार में जेडी(यू) से उनके मतभेद हो गए। इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने इस्तीफा देकर एक बार फिर गुलाटी मारी। नीतिश कुमार के इस्तीफे से जीतेन राम मांझी बिहार के मुख्यमंत्री बन गए।
नीतिश कुमार यह अच्छी तरह से जानते थे कि बिहार में वे अपने दम पर अकेले चुनाव नहीं जीत सकते। हालत यह थी कि भाजपा से गठबंधन कर नहीं सकते थे। लालू से भी उनकी पटरी नहीं बैठ पा रही थी। 2014 में जब बिहार में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा, तो उन्हें भाजपा को दूर रखने का बहाना मिल गया। न चाहते हुए भी उन्होंने अपने कट्टर दुश्मन लालू यादव से हाथ मिला लिया। इन दिनों नीतिश कुमार को अचानक ही याद आया कि वे और लालू यादव दोनों एक ही गुरु यानी राम मनोहर लोहिया के शिष्य हैं। लालू के अलावा उन्होंने कांग्रेस के साथ भी सीटों का बंटवारा किया। भाजपा के विरोध में एक कथित रूप से महागठबंधन बना। इससे नरेंद्र मोदी की आंधी के बाद भी बिहार के विधानसभा चुनाव में भाजपा हार गई। नीतिश कुमार एक बार फिर अपनी पैंतरेबाजी से जीत गए।
बिहार में नीतिश कुमार का भाजपाविरोधी महागठबंधन सफल रहा। इसके बाद जब 2019 के लोकसभा चुनाव की बातें होने लगी, तो इस महागठबंधन में प्रधानमंत्री पद के लिए उनका नाम भी शामिल किया गया। इसके पीछे यही वजह मानी जाती है कि इतनी गुलाटी मारने के बाद भी विपक्ष में उनकी छवि स्वच्छ मानी जाती है। इस दौरान लालू यादव के परिवार का भ्रष्टाचार सामने आने लगा, तो नीतिश डर गए। अब यदि लालू यादव के परिवार पर किसी तरह की कार्रवाई होती है, तो उसके छींटे उन पर भी पड़ेंगे ही। इसलिए उन्होंने बड़ी चालाकी से भाजपा की तरफ सरकने की योजना बनाई। भाजपा के प्रत्याशी को अपना समर्थन देकर वे एक तीर से कई निशाने साध रहे हैं, पर वे शायद यह भूल रहे हैं कि भाजपा में अभी प्रधानमंत्री की कुर्सी खाली नहीं है।
डॉ. महेश परिमल


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