मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

उनकी आँखों में सपने से अधिक तनाव तैरते हैं......








डॉ. महेश परिमल




आज युवाओं की जिंदगी स्पीड से चलती मोटरबाइक जैसी हो गई है। जिसमें केवल गति है। इस गति को बनाए रखने के लिए युवा कुछ  करने को तैयार हैं। हर काम का शार्ट कट उन्हें पता है। ले ही बाद में उन्हं पछताना पड़े, पर सच तो यह है कि उनके पास  तो पछताने का  वक्त नहीं है। हर काम को तेजी के साथ कर लेने की प्रवृŸिा उन्हें कहाँ ले जा रही है, इसका अंदाजा उन्हें  नहीं है। प्रतिस्पर्धा का दौर बचपन से ही शुरू हो जाता है। प्ले ग्रुप में पढ़ते बालक को नए स्कूल में एडमिशन के लिए होने वाले इंटरव्यू की चिंता सताती है। जूनियर के.जी. में आते ही वह होमवर्क की चक्की पीसना शुरू कर देता है। कक्षाएँ बढ़ती जाती हैं और एकाम, कोचिंग, ट्यूशन का तनाव साथ-साथ दोगुनी गति से बढ़ता जाता है। विद्यार्थियों की आँखों में जितने सपने नहीं होते उससे कहीं अधिक तनाव के  सुलझने वाले जाल होते हैं। इन तनावों के जाल में उलझा किशोर मन 12 वर्ष का होते ही कॉलेज और कॅरियर की चिंता करने लगता है। चिंता केवल पढ़ाई से जुड़ी हो, ऐसा  नहीं है। पढ़ाई के अलावास्टेटस सि?बॉलके रूप में मोबाइल मु? ूमिका निाता है। मोबाईल का कौन सा मॉडल खरीदना और उसमें टॉकटाइम रवाने के लिए पैसों की व्यवस्था किस प्रकार की जाए, ये चिंता  आज के किशोर की मु? चिंताओं में से एक है। आज युवा मस्तिष्क में हर काम जल्द से जल्द पूरा करने का एक जुनून-सा छाया हुआ है। आज के युवा को डिग्री  जल्दी चाहिए और आकर्षक वेतन वाली नौकरी ?ाी। यहाँ तक कि वह किसी के प्रेम में ?ाी जल्दी गिर?तार होता है और विवाह बंधन में  जल्दी ही बँधता है। आठवीं में पहुँचते पहुँचते गर्लफेन्ड की तलाश शुरू हो जाती है। इस दौरान कई फ्रेंड बदलता है। कॉलेजं तक आते ही सीमाओं के पार की दुनिया में कदम रख देता है। कहीं सामाजिक मर्यादा का खयाल आता है, तो विवाह बंधन में बँध जाता है। आश्चर्य तो यह कि विवाह-बंधन से मुक्त  जल्दी ही हो जाता है। जल्दबाजी का यह सिलसिला यही खत्म नहीं होता, जिंदगी  जल्दी ही पूर्ण विराम पा जाती है। जल्दबाजी के दौर में युवा हर तरह का खतरा उठाने को तत्पर रहता है। इस खतरे का सीधा असर उससे जुड़े लोगों पर  होता है, लेकिन उससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह तो अपनी मर्जी से जिंदगी जीता है और रपूर जीता है। हाल ही की एक घटना है- दिल्ली में इंडिया गेट के नजदीक ही एक पेड़ से एक गाड़ी बुरी तरह से टकरा गई। जिसमें दो युवक-युवती की तो घटनास्थल पर ही मौत हो गई और दो युवक-युवती गंीर रूप से घायल हो गए। गाड़ी की हालत देखकर ही अंदाजा लगाया जा सकता था कि टक्कर कितनी तेज गति से हुई होगी। चालक एवं सवार ?ाी 20-25 वर्ष के ही थे। यानी किफास्ट लाईफजीने के क्रेजी युवाओं का अंत फास्ट डेथके रूप में हुआ। देहरादून में इस वर्ष तेजी से बाईक चलाने के कारण 28 युवक-युवती काल के ग्रास बने हैं। केवल दिल्ली या देहरादून की ही यह कहानी नहीं है, ?ाारत के हर शहर की यही कहानी है। युवाओं को बाईक स्पीड में चलानी है और जिंदगी ?ाी स्पीड में ही जीनी है। परिणाम सामने है, पर सावधान होने के लिए समय कहाँ है? युवाओं के इस टकन के लिए क्या वे स्वयं ही जि?मेदार हैं ? कहीं कहीं घर का वातावरण, आसपास की दुनिया, सामाजिक परिवेश  कुछ तो ऐसा है, जो उसे इस रास्ते पर जाने को बाध्य कर रहा है। यदि आज स्कूल का एक विद्यार्थी कार से स्कूल जाता है, हाथ में सेलफोन रखता है और एकांत मे अल्कोहल का पैग या धुएँ के कश में डूब जाता है, तो उसके लिए क्या केवल वही जि?मेदार है ? उसकी मित्र-मंडली, घर का वातावरण जि?मेदार नहीं! किसने थमाई उसके हाथ में कार की चाबी? किसने पकड़ाया उसके हाथ मंे सेलफोन? अल्कोहल और सिगरेट का नशा क्या यूँ ही उस पर हावी हो गया? कॉलेज में पहुँचते-पहुँचते ये रास्ते गहरी खाई का रूप ले लेते हैं और तब कहीं जाकर माता-पिता को अपनी गलती का अहसास होता है। लेकिन तब काफी देर हो चुकी होती है। वे अपनी संतान को खो बैठते हैं या फिर अपनी आँखों के सामने अपाहिज संतान को घर में बैठा देखते रहते हैं।आज के युवाओं के लिए मित्रता और मनोरंजन की व्या?या  बदल गई है। पहले तो वे पार्टियाँ करते थें, पिकनिक मनाते थे और खेल खेलते थे, लेकिन अब वे साइबर पार्टियाँ करते है, ये पार्टियाँ सोशल नेटवर्किंग की साइट पर आयोजित होती हैं। मित्रों से मिलने के लिए  वे साइट का ही सहारा लेते हैं। उनकी जिंदगी टीवी, कंप्यूटर और मोबाइल के आसपास ही घूमती रहती है। धूम जैसी फिल्मों और फास्ट मोबाइल का नशा उन पर बुरी तरह से सवार हो गया है। जो युवक कैफे में जाते हैं, उनमें से अधिकांशबर्नआउटनामक विडियो गेम खेलते हैं। इस खेल में आप जितने अधिक एक्सीडेंट करेंगेे, उतने अधिक पाइंट मिलेंगे। युवा इसमें अधिक से अधिक एक्सीडेंट कर आनंद प्राप्त करते हैं। इसीलिए वे अपनी रियल लाइफ में  एक खेल की तरह अधिक से अधिक दुर्घटनाएँ करना चाहते हैँ। मौका मिलने पर वे चूकते  नहीं। दूसरी ओर आज युवाओं पर अपेक्षाओं का ारी बोझ है। माता-पिता स्वयं तो उसे समय नहीं दे पाते, लेकिन अपेक्षाएँ बहुत सी रखते हैं। ये अपेक्षाएँ उन्हें तनाव में डाल देती हैं। आजकल बच्चे फर्स्ट क्लास लाते हैं, तो उसकी कोई कीमत नहीं है। 80 प्रतिशत अंक लाने वाला एवरेज विद्यार्थी माना जाता है। यदि 90 प्रतिशत अंक आते हैं, तो पालक खुश होते हैं।  पालक यही चाहते हैं कि उनका बच्चा सुपरकिड बन जाए। केवल स्कूल-कॉलेज ही नहीं, बल्कि शिक्षा से अलग जो ?ाी करे, उसमें उनका बच्चा सर्वश्रेष्ठ हो, बस इन्हीं चाहतों के बीच आज का मासूम  कुचलकर रह गया है। बच्चे को संगीत सिखना चाहिए, ड्राइंग सिखनी चाहिए। उसे कराटे में ब्लेकबेल्ट मिलना ही चाहिए। यदि वह स्केटिंग सीख रहा है, तो उसे स्टेट लेबल पर तो जाना ही चाहिए। यह तो तय है कि  बच्चे सुपरकिड नहीं बन सकते। कुछ बच्चे धीमे-धीमे सीखते हैं। ऐसे बच्चे सबसे अधिक अपमानित होते हैं। पालक के सामने  और समाज के सामने ी। इससे उनका तनाव बढ़ जाता है। इस तनाव को दूर करने के लिए वह तरह-तरह के उपाय करता है।  किसी व्यसन का शिकार होता है, तो  स्मोकिंग करने लगता है। कई तो ड्रग्स लेना शुरू कर देते हैं। कुछ शराब की शरण में चले जाते हैं। यदि कुछ बच जाते हैं, तो वे गुटखा-?बाखू का सहारा लेते हैं। अपने गुस्से को बताने के लिए उनके पास कोई सहारा नहीं होता, तो वे अपने वाहन पर अपनी खीझ निकालते है। फास्ट ड्राइविंग करते हुए वे कॉलेज में मारा-मारी पर उतारू हो जाते हैं।आज के युवाओं पर सतत सफल होने का दबाव बढ़ गया है। उन्हें संस्कारवान बनना है, यह कोई नहीं सिखाता। यही कारण है कि वे अपने से बड़ों से सीधे मुँह बात तक नहीं करते। बुजुर्गों की सेवा करना तो उन्हें आता ही नहीं। बडे़-बुजर्गों को तो वे बोझ समझने लगे हैं। गलत तरीके से धन नहीं कमाना चाहिए। किसी से धोखेबाजी नहीं करनी चाहिए। ये कोेई उन्हें सिखाता ही नहीं है। इस कारण वे मतलबी और स्वार्थी होने लगे हैं। किस्मत अच्छी होती है, तो वे धनपति बन जाते हैं, पर संस्कारी बन नहीं पाते। ऐसे लोगों के जीवन में जब विषमताएँ आती हैं, तो उन्हें डगमगाने में देर नहीं लगती। माता-पिता अपने बच्चों का मोबाइल दे सकते हैं कार दे सकते हैं, पर समय और सहानुूति नहीं दे सकते। बच्चे स्वयं को अनाथ समझने लगते हैं। वे यह अच्छी तरह से समझते हैं कि उनके माता-पिता  गलत तरीके से धन कमा रहे हैं, तो उन्हें उनके धन को खर्च करने में कोई शर्म महसूस नहीं होती। परिश्रम से कमाया हुआ धन कैसा होता है, यह वे तो जानते हैं और ही समझते हैं।बच्चों के आदर्श उनके माता-पिता ही होते हैं। कॉलेज में पढ़ने वाले अपने युवा बच्चे से एक पालक ने कह दिया कि वे कॉलेज के किसी  विद्यार्थी से मारपीट करने की छूट है। मैं सबसे निपट लूँगा, इतना खयाल रखना कि इस मारपीट में किसी की मौत हो जाए। जो पालक अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देते हो, उन्हें किसी दुश्मन की क्या आवश्यकता? आज बच्चे घर आए मेहमान का अपमान करते हैं, तो पालक उसे डॉटने के बजाए शाबासी देते हैं। जैसे बच्चे ने कोई पराक्रम किया है। ऐसे बच्चे अपने माता-पिता की इात कैसे कर सकते हैं ला? दूसरे ओर आज के युवाओं में बहुत ही जल्द बोर होने की प्रवृŸिा बढ़ने लगी है। मोबाइल फोन के मॉडल से बोर होने के कारण वे हर तीन-चार महीनों में अपना मोबाइल बदलते हैं। 6 महीने में ही अपनी बाइक से बोर होने लगते हैं। हर वर्ष वे अपनी कार बदलने लगे हैं। यही हाल नौकरियों का  है। उसमें  वे लगातार ? मारते रहते हैं। कूदने की प्रवृŸिा उनके जीवन का हिस्सा बन जाती है। शादी से पहले वे óों की तरह गर्लफ्रेंड बदलते हैं। शादी के बाद एक ही पत्नी से  बोर होने लगते हैं। स्थिति विवाहेŸार संबंधों तक पहुँच जाती है। इसके बाद होता है तलाक। गर्लफ्रेंड के साथ मित्रता कैसे की जाती है, यह तो उन्हें पता ही नहीं होता। इसकी  ंफुरसत उनके पास नहीं होती। इसलिए वे स्पीड डेटिंग करने लग जाते हैं।युवा आज जिन कॉलेजों में मैनेजमेंट की शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं, वहाँ  उन्हें ईमानदारी का धंधा करने के बजाए कोमोडिटी की बिक्री किस तरह बढ़ाई जाए, ग्राहकों से किस तरह से धोखेबाजी की जाए, यह सिखाया जाता है। कॉलेज से एमबीए की डिग्री लेकर जब वे मार्केटिंग मैनेजर बन जाते हैं, तब वे गलत तरीके से पैसा उगाहने वाली स्कीमें तैयार करते हैं। ग्राहकों की जेब से किस तरह से धन निकाला जाए, इसके कई रास्ते निकालते हैं। आज जिस तरह से मोबाइल कंपनियाँ बाजार में आकर ग्राहकों को ठग रही हैं, यह सब आज के युवाओं के दिमाग की ही उपज है।आज का युग तेजी से बदल रहा है। देश  तेजी से आर्थिक प्रगति कर रहा है। लोगों के पास धन  पर्याप्त रहा है। समाज के जीवन मूल्य  बदल रहे हैं। जो परिवर्तन पहले दस वर्ष में दिखते थे, वे अब दस माह में ही दिखने लगे हैं। शहर की गलियाँ  तेजी से बदलती जा रही है। लोगों के पास अब वन डे देखने का समय नहीं है, वे अब 20-20 में दिलचस्पी लेने लगे हैं। सामाजिक बदलाव उसी तेजी से दिखाई देने लगे हैं। पूरे समाज की ही कायापलट हो गई है, इससे समाज का क्या ला होगा, यह शोध का विषय हो सकता है।




डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

नैतिक मूल्यों के साथ-साथ बदलते पैमाने




डॉ. महेश परिमल


फिल्‍मी दुनिया में आने के बाद भी धर्मेद्र ने काफी संघर्ष किया। पहली फिल्म करने के बाद उन्हें मात्र 51 रुपए मिले। धीरे-धीरे हालात बदले। सितारा बनते ही उन्होंने जुहू में एक बंगला लिया और पूछे जाने पर कि कितना बड़ा बंगला है, उन्होंने कहा यही कोई चालीस-पचास मंजियां (खटियाएं) आ जाएंगी। ये था उनका ठेठ गँवईपन, जिसमें पंजाब की माटी का सौंधापन कूट-कूटकर भरा है। जीवन में इंसान अपने तरीके से मापदंड तय करता है। कई चीजें कुछ लोगों के लिए बड़ी सहज होती हैं। इसे वे उसी सहजता से बोल भी जाते हैं। हमारी प्रवृत्ति ही ऐसी है कि हम उसे पेचीदा बना देते हैं। उसे गुिफत करते रहते हैं। सहज और सरल को यथावत् रखा जाए, तो कई पेचीदे सवाल भी आसानी से सुलझ सकते हैं। अाी कुछ दिनों पहले ही छत्तीसगढ़ जाना हुआ। रास्ते में एक ग्रामीण से पूछा कि यहाँ से उदयपुर कितने किलोमीटर है। ग्रामीण ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया- बस वाला 30 रुपए लेता है। एकदम आसान जवाब। उसने दूरी को न तो कोस से नापा, न ही किलोमीटर से। उसके पास न तो फर्लाग का पैमाना था, न ही गज का। ग्रामीण ने जो बताया, वह दोनों को समझ में आने वाला था। अब यह बात अलग है कि आप अपडेट नहीं हैं। यदि आप अपडेट हैं, तो आपको आसानी से पता चल जाना चाहिए कि बस वाले 30 रुपए में कितने किलोमीटर ले जाते हैं। दूरी को रुपए से नापने का यह तरीका अपने आप में अनोखा है।जिस तरह से प्यार को सीमाओं से नहीं बाँधा जाता, ठीक उसी तरह जब कोई कहे कि मैं उसे उतना ही प्यार करता हूँ, जितना हनुमान जी श्री राम से करते थे। यहाँ आकर सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। इससे अधिक तो कोई किसी से प्यार कर ही नहीं सकता। हमारी आदत है कि हम इस प्यार को पेचीदगियों के साथ समझना शुरू कर देते हैं। सागर की अनंत गहराई, जमीं से सितारों की दूरी, जीवन की अंतिम साँसों तक आदि। ये सब सीमाएँ हैं। जीवन बहुत ही सरल और सहज है। इतना अधिक की उसे नापने के लिए हमारे पास कोई पैमाना नहीं है। भोथरे हो गए हैं हमारे पैमाने। हम केवल प्यार ही नहीं, बल्कि संवेदनाएँ और अनुभवों को भी मापने लगे हैं। एक कोशिश केवल एक कोशिश इंसानियत को मापने के लिए करो, तो समझ में आ जाएगा कि इसे मापने के लिए हमारा हर पैमाना काफी छोटा साबित होगा।

डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

डाऊ प्रायोजित ओलंपिक में क्‍यों लें हिस्‍सा ?


दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख
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गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

शहीद की विधवा के जज्बे को सलाम!

डॉ. महेश परिमल
हमें गर्व होना चाहिए शहीद नानक चंद की विधवा गंगा देवी के जज्बे पर। जिसने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर कहा है कि अफजल गुरु को उन्हें सौंप दे। ताकि सरकार में यदि हिम्मत नहीं है, तो वह उसे फाँसी दे देगी। गंगा देवी पर हमें इसलिए भी गर्व करना चाहिए कि उसने पति के मरणोपरांत मिलने वाला कीर्ति चक्र भी लौटा दिया। उनका कहना था कि अफजल को फांसी दिए जाने तक वे कोई सम्मान ग्रहण नहीं करेंगी। एक शहीद की विधवा को और क्या चाहिए। लोग न्याय की गुहार करते रहते हैं, उन्हें न्याय नहीं मिलता। पर एक शहीद की विधवा यदि प्रधानमंत्री से न्याय की गुहार करे, तो क्या उसे भी इस देश में न्याय नहीं मिलेगा? वर्ग भेद की राजनीति में उलझी देश की गठबंधन सरकार से किसी प्रकार की उम्मीद करना ही बेकार है। शहीद की विधवाओं की गुहार संसद तक पहुँचते-पहुँचते अनसुनी रह जाती है। जहाँ वोट की राजनीति होती हो, वहाँ कुछ बेहतर हो भी नहीं सकता।शहीद की विधवा ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है ‘मनमोहन सिंह जी अगर आपकी सरकार में अफजल गुरु को फांसी देने की हिम्मत नहीं है, यदि आपको जल्लाद नहीं मिल रहे तो आप यह काम मुझे सौंप दें। मैं शहीद की पत्नी हूं, देश के खिलाफ आँख उठाने वाले को क्या सजा दी जाए, मुझे और मेरे परिवार को मालूम है।’ ‘मैं संसद के 13 नंबर गेट पर जहां मेरे पति शहीद हुए थे वहीं अफजल को फांसी दूंगी।’ राठधाना गाँव में अपने घर पर शहीद पति की प्रतिमा के सामने बैठी गंगा देवी ने कहा कि हमले के दस साल बाद भी अफजल और उसके सभी साथी सुरक्षित हैं। देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है?’ देश के हर नागरिक को यह सोचना चाहिए कि आखिर देश के दुश्मनों को देश के भीतर ही कौन शह दे रहा हे? क्यों पनप रहा है आतंकवाद? हमारे ही आँगन में कौन बो रहा है आतंकवाद की फसल? देश के दुश्मनों से सीमा पर लड़ना आसान है, पर देश के भीतर ही छिपे दुश्मनों से लड़ना बहुत मुश्किल है। एक घोषित आतंकी हमारी ही सुरक्षा में कबाब खाता रहे, उस पर करोड़ों रुपए खर्च होते रहें, हम यह सब आखिर सहन कैसे कर लेते हैं। केवल वोट की राजनीति के कारण देश में ही आतंकवादी सुरक्षित रहें, सीमा पर हमारे जवान असुरक्षित होकर भी लड़ते रहें, आखिर ये कहाँ का न्याय है? गड़बड़ी आखिर कहाँ है? इसे समझना आज हर भारतीय का कर्तव्य है।भारत में पिछले 20 सालों में तीन दर्जन से अधिक आतंकी हमले और उनमें 1600 से अधिक लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार एक भी आतंकी को सजा नहीं मिली है। चाहे 1993 का मुंबई बम धमाका हो या फिर 2001 का संसद पर हमला, पाकिस्तान में बैठे साजिश रचने वालों तक भारतीय एजेंसियों के हाथ नहीं पहुंच सके। वहीं हमले के लिए जिम्मेदार जिन आतंकियों को गिरफ्तार भी किया गया, उनके खिलाफ अदालती कार्रवाई का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। सुरक्षा एजेंसी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आतंक के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दिए बिना इसके खिलाफ लड़ाई बेमानी है। 1993 में मुंबई बम धमाकों को 26/11 के बाद भारत में अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जाता है। 300 से अधिक लोगों की मौत और 700 से अधिक को घायल करने वाले एक के बाद एक 12 धमाकों ने देश की आर्थिक राजधानी को हिलाकर रख दिया था। लेकिन अभी तक इसके एक भी आरोपी को सजा नहीं हो पाई है। आतंकी हमले के 13 साल बाद 2006 में विशेष टाडा कोर्ट का फैसला आया भी, तो सजा पाने वाले दोषियों ने उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी, जहां अब तक सुनवाई चल रही है। वैसे हकीकत यह भी है कि हमले की जांच करने वाली सीबीआई अब तक मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम समेत 35 दूसरे आरोपियों को गिरफ्तार तक नहीं कर पाई है। वहीं 2001 में संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु की फाँसी की सजा पर 2005 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुहर लगने के छह साल बाद भी अमल नहीं हो पाया है। जबकि 2000 में दिल्ली के लालकिले में घुसकर सेना के तीन जवानों की हत्या और 11 को घायल करने वाले लश्कर-ए-तोयबा के आतंकी मोहम्मद आरिफ की फाँसी की सजा पर अब तक अदालती कार्रवाई जारी है। 2005 में छह अन्य आरोपियों समेत आरिफ को दोषी मानते हुए ट्रायल कोर्ट ने उसे फाँसी की सजा सुनाई। 2007 में हाईकोर्ट ने अन्य आरोपियों को बरी करते हुए आरिफ के खिलाफ फाँसी की सजा बरकरार रखी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है। इसी तरह 2002 में गुजरात स्थित अक्षरधाम मंदिर पर हमला कर 31 लोगों को मौत का घाट उतारने वाले लश्कर आतंकियों को फाँसी देने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। 2005 में दीवाली के ठीक पहले धनतेरस पर दिल्ली के बाजारों, 2006 में बनारस के संकटमोचन मंदिर और 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में बम विस्फोट करने वाले आतंकियों को सजा मिलने में अभी सालों लग सकते हैं। जबकि इन तीन आतंकी हमले में 300 से अधिक लोग मारे गए थे। खुफिया विभाग (आईबी) के पूर्व प्रमुख व विवेकानंद फाउंडेशन के निदेशक एके डोभाल का मानना है कि आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित होने के बावजूद भारत आतंकियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने में विफल रहा है।अजमल कसाब को जब फाँसी की सजा मुकर्रर हुई, उसके बाद संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फाँसी पर चढ़ाने के लिए दबाव बनने लगा। लेकिन इस बीच जो बयानबाजी हुई और फाइल इधर से उधर हुई, उससे यह स्पष्ट हो गया कि कई शक्तियाँ अफजल को बचाने में लगी हुई हैं। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि अफजल को बचाने में कौन-कौन लगे हुए हैं? अब तो यह भी सिद्ध हो गया है कि जिन अफसरों ने अफजल की फाइल को अनदेखा किया, उन सभी को पदोन्नति मिली। इसका आशय यही है कि कई शक्तियाँ अफजल को बचाने में लगी हैं। एक फाइल चार साल तक 200 मीटर का फासला तय न कर पाए, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? इसको समझते हुए उधर अफजल यह कहा रहा है कि मैं अकेलेपन से बुरी तरह टूट गया हूं। मुझे जल्द से जल्द फाँसी की सजा दो। निश्चित रूप से यह भी उसकी एक चाल हो। पर इतना तो तय है कि अफजल पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने मंे केंद्र सरकार के पसीने छूट रहे हैं। देश के हमारे संविधान पर भी ऊँगली उठ रही है, सो अलग। आखिर क्यों हैं इतने लचर नियम कायदे और क्यों है इतनी लाचार हमारी राष्ट्रपति?कहने को तो हमारे राष्ट्रपति अथाह अधिकारों के स्वामी हैं। यहाँ पर स्वामिनी कहना अधिक उचित होगा। उनके पास यदि किसी की दया याचिका आती हे, तो वे स्वतंत्र रूप से कोई निर्णय नहीं ले सकते। पहले उस आवेदन को गृह मंत्रालय भेजा जाता है। वहाँ से टिप्पणी आने के बाद उस पर राष्ट्रपति की मुहर लगती है। अभी हमारे राष्ट्रपति के पास 20 दया याचिकाएँ पेंडिंग हैं। इनमें से 7 गृह मंत्रालय के पास हैं। ये सभी याचिकाएँ भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की तरफ से उन्हें विरासत में मिली हैं। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने मात्र एक ही याचिका पर निर्णय लिया था। उन्होंने बलात्कारी धनंजय चटर्जी की दया याचिका को ठुकरा दिया था। जिसे बाद में फाँसी दी गई। इसके पूर्व के. आर. नारायण ने अपने कार्यकाल में एक भी दया याचिका पर निर्णय नहीं लिया था। अब इन सभी याचिकाओं पर निर्णय लेने की जवाबदारी प्रतिभा पाटिल पर आ पड़ी है। अब यदि हमारी राष्ट्रपति यह सोचें कि उनके पहले के राष्ट्रपतियों ने जब इस पर विचार नहीं किया, तो उनके अकेले करने से क्या होगा? वैसे भी दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकतीं। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जब राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने गृहमंत्रालय से प्राप्त एक दया याचिका को ठुकरा देने की सलाह देते हुए फाइल वापस भेज दी थी। वे चाहते थे कि इस अपराधी को फाँसी के बजाए उम्रकैद दी जाए। इसके बाद गृहमंत्रालय ने उस पर निर्णय लिया और उस पर राष्ट्रपति को अपनी मुहर लगानी पड़ी। इस तरह से देखा जाए, तो कई अधिकार प्राप्त हमारे राष्ट्रपति संविधान के मामले में स्वयं कुछ भी निर्णय लेने में अक्षम हैं।राष्ट्रपति की इसी अक्षमता का लाभ अफजल गुरु जैसे आतंकवादी उठा रहे हैं। अभी जो दया याचिकाएँ राष्ट्रपति के सामने हैं, उसमें से कई तो दो दशक पुरानी हैं। इन पर अभी तक फैसला नहीं हो पाया है। संविधान की इसी कमजोर नब्ज को पकड़ते हुए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर फारुख ने कह दिया कि पहले उन 20 दया याचिकाओं पर फैसला करो, फिर अफजल गुरु की याचिका पर फैसला करना। इसका मतलब साफ है कि न तो उन 20 याचिकाओं पर फैसला होगा न ही अफजल गुरु फाँसी होगी। यही बात स्पष्ट करती है कि अफजल गुरु पर किसका वरदहस्त है? उमर फारुख की इस टिप्पणी पर हमारे संविधान के विशेषज्ञों का कहना है कि फाँसी की सजा कोई होटल में रुम बुकिंग जैसी प्रक्रिया नहीं है, जिसमें जो पहले आएगा, वह पहले पाएगा।इसके अलावा इस मामले में सबसे बड़ी बाधा सरकार की वह सोच है, जिसके अनुसार यदि अफजल गुरु को फाँसी दे दी गई, तो जम्मू-कश्मीर में हिंसा भड़क उठेगी। क्योंकि अफजल कश्मीरी मुसलमान है। अफजल के कश्मीरी मुसलमान होने का लाभ कई लोग उठा रहे हैं। कई लोगों के लिए वह हीरो है। इसके पूर्व घाटी में मकबूल बट्ट को 1984 में फाँसी पर लटका दिया गया था। वह 1960 से ही कश्मीर की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था। उसे 1974 घाटी के एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या के आरोप में फाँसी की सजा सुनाई गई थी। अंतत: 11 फरवरी 1984 को उसे दिल्ली की तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी गई। उसके शव को उसके परिजनों को नहीं दिया गया और जेल में ही उसे दफना दिया गया। उसकी फाँसी के बाद कश्मीर में अलगाववाद का आंदोलन और तेज हो गया। कश्मीर की प्रजा आज भी मकबूल बट्ट को अपना हीरो मानती है। उसकी पहचान शहीदे आजम के रूप में होती है। हर साल 11 फरवरी को श्रीनगर बंद रहता है। उधर कश्मीर के अलगाववादी आज भी अफजल को अपना हीरो मानते हैं। इस स्थिति में यदि अफजल को फांसी दे दी जाती है, तो कश्मीर घाटी एक बार फिर हिंसा की चपेट में आ सकती है। यही कारण है कि सरकार अफजल की फाँसी के मामले को लगातार टाल रही है।अभी देश को सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसी सख्ती की आवश्यकता है, जो अपने बल पर ही कई कामों को अंजाम देने में सक्षम होते थे। वीर शिवाजी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, महाराजा रणजीत सिंह, महाराणा प्रताप, लोकमान्य तिलक, गोखले आदि ऐसे नाम हैं, जो अपनी दृढ़ता के कारण ही पहचाने जाते हैं। आज देश को ऐसी ही दृढ़ता की आवश्यकता है, जो देश को बचा सके। सुबूत इकट्ठा करना, उसे दुनिया को दिखाते रहना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तो वह है कि सुबूत इकट्ठा कर उसे किसी को न बताना और सीधे दुश्मन के घर में घुसकर उसे खत्म कर देना। जिस इच्छाशक्ति की देश को आज आवश्यकता है, उसे प्राप्त करने में काफी वक्त लगेगा। तब तक शायद हम सब्र के बॉंध ही बनाते रहेंगे।
डॉ महेश परिमल

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

इंटरनेट की सेंसरशिप आवश्‍यक पर असंभव




नवभारत रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

भोपाल का भूत लंदन में












दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज पेज 9 पर प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

ममता ने सरकार के पंख काटे









नवभारत रायपुर और बिलासपुर के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

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