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http://epaper.jagran.com/epaper/12-sep-2014-262-National-Page-1.html
आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
पहली बार विचाराधीन कैदियों पर विचार
डॉ. महेश परिमल
हमारे देश का कानून कहता है कि हजार गुनाहगार भले ही छूट जाएं, पर एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। बरसों से ऐसा सुनते आ रहे है, पर सच्चई आज भी इससे कोसों दूर है। व्यक्ति निर्दोष है या दोषी, यही तय करने में बरसों बीत जाते हैं। देश में एक नहीं अनेक किस्से ऐसे हैं, जिसमें तय सजा से अधिक समय जेल में ही विचाराधीन कैदी के रूप गुजारने वाले कैदी आज भी जेल की शोभा बढ़ा रहे हैं। इससे एक तो सरकार पर उनके भोजनादि पर खर्च बढ़ रहा है, दूसरा जेलों में सीमा से अधिक कैदी आज भी नारकीय जीवन बिता रहे हैं। जेलों को लेकर कहा गया है कि यहां कैदियों को सुधारा जाता है। पर देश में जेलों की जो स्थिति है, उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि छोटा अपराधी यहां रहकर बड़ा अपराधी बनकर निकलता है। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय दिया है कि अपने जुर्म की आधी सजा काट चुके करीब ढाई लाख कैदी अब रिहा होंगे। यह वे कैदी होंगे, जिनके मामले कोर्ट में चल रहे हैं। और अब तक उन पर फैसला नहीं आया है। ऐसे कैदियों की पहचान के लिए न्यायिक अधिकारियों को एक अक्टूबर से दो महीने तक हर हफ्ते जेल का दौरा करना होगा। वहीं पर निजी मुचलका लेकर उन्हें रिहा करने के आदेश जारी करने होंगे। इस समय देश की जेलों में करीब 3.81 लाख कैदी हैं। इनमें से 2.54 लाख विचाराधीन हैं। कानून कहता है कि फैसले के इंतजार में संभावित सजा में से आधी काट चुके कैदियों को रिहा किया जाए। लेकिन इसका पालन कभी-कभार ही होता है। भारतीय जेलों में मौजूद हर तीसरा कैदी ही अपने अपराध की सजा काट रहा है। बाकी तो जेल में रहकर फैसले का इंतजार कर रहे हैं। धीमी न्याय प्रणाली और कई साल तक चलने वाले मुकदमों की वजह से उनकी सजा पर फैसला हो पा रहा है। कई तो अपने अपराध के लिए निर्धारित से ज्यादा सजा काट चुके हैं। कई कैदियों के पास जमानत के पैसे नहीं है, इसलिए मजबूरी में जेल में रह रहे हैं।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि किसी अपराध के लिए किसी की धरपकड़ होती है। उसके बाद उसे जेल में डाल दिया जाता है। एक साल से अधिक वह जेल में ही रहता है। अदालत में मामला चलता है, तो उसे निर्दोष बरी कर दिया जाता है। प्रश्न यह उठता है कि एक निर्दोष को जेल भेजना क्या अपराध नहीं है? यदि अपराध है, तो इसके अपराधी को सजा क्यों नहीं मिलती? इस मामले में हम अपराधी आज की व्यवस्था को मान सकते हैं। आज अदालतों में लाखों मामले पेंडिंग पड़े हैं, जिसका निराकरण नहीं हो पा रहा है। तारीख पे तारीख पड़ती रहती है, पर समस्या वहीं के वहीं होती है। इसलिए लोग यही कहते हैं कि कोर्ट-कचहरी से भगवान ही बचाए। लोग इस दिशा में स्वयं ही आगे आकर अपना नुकसान कर अदालत में न जाने की हरसंभव कोशिश करते हैं। सभी को यही चिंता सताती है कि यदि अदालत गए, तो फिर केस लंबा चलेगा, शायद हमारे नाती-पोतों को ही फैसला सुनने का सौभाग्य मिलेगा। सरकार हमेशा देश की न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने का वादा करती है, फास्ट ट्रेक कोर्ट की बातें करती हैं, पर उनका यह वादा पूरा नहीं हो पाता। हमारे यहां की अदालतें अभी तक हाईटेक नहीं हो पाई हैं। दूसरी तरफ अदालतों में केस लगातार बढ़ रहे हैं। सब कुछ अंग्रेजों के जमाने का चल रहा है। बरसों बाद भी इसमें कोई तब्दीली नहीं देखी गई है। हमारे देश की न्याय प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। इसके लिए चाहिए इच्छा शक्ति, जिसका सरकार में पूरी तरह से अभाव है। न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने का काम अदालत ही कर सकती है। ऐसे कई काम हैं, जिसके लिए अदालत ही सरकार को सूचना देती है, उसके बाद ही सरकार जागती है।
विचाराधीन कैदियों के मामले में दिए गए अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने असंतोष व्यक्त किया है। जेल पर खर्च का भार बढ़ता ही जा रहा है। जेल को जितनी राशि आवंटित की जाती है, उससे कैदियों को पूरी तरह से भोजन नहीं मिल पाता। देश में कई जेले ऐसी हैं, जहां क्षमता से अधिक कैदी भरे पड़े हैं। इसलिए वहां कैदियों को बिगड़ने की संभावना ही अधिक दिखाई देती है। यदि जेल में कोई अच्छा जेलर आ गया, तो हालात कुछ सुधरते हैं, पर उनके तबादले के बाद हालात फिर पुराने र्ढे पर आ जाते हैं। वैसे भी किसी अधिकारी की नियुक्ति यदि जेलर के रूप में होती है, तो इसे वे एक पनिशमेंट ही मानते हैं। इसके अलावा यह भी देखने में आता है कि अदालतों में भी छुट्टियों का दौर होता है। कभी किसी ने इस पर गंभीरता से विचार किया है कि अदालतों में अवकाश क्यों होना चाहिए। अन्य किसी सरकारी कार्यालय में तो इतना लम्बा अवकाश नहीं होता। अवकाश तो शालाओं-कॉलेजों में होता है। वह भी विद्यार्थियों का। शिक्षक-प्राध्यापक तो फिर भी काम पर लगे ही रहते हैं। इसलिए अदालतों में अवकाश खत्म कर उसे दो या तीन पारियों में होना चाहिए। ताकि मामलों का निपटारा जल्द से जल्द हो। जहां लाखों मामले लंबित हों, वहां अवकाश के मजे कैसे लिए जा सकते हैं? अदालतों को सुबह सात बजे से शाम सात बजे तक दो शिफ्टों में होना चाहिए। अधिक न्यायाधीशों एवं स्टाफ की भर्ती की जानी चाहिए। यदि सरकार की नीयत साफ हो, तो सब कुछ हो सकता है। यदि ऐसा हो, तो हमारे यहां विचाराधीन कैदियों की संख्या अपने आप ही कम हो ेजाएगी।
अभी हमारे देश में 3.81 लाख से अधिक कैदी हैं। इसमें से एक तिहाई यानी करीब 2.54 लाख कैदी विचाराधीन हैं। ये ऐसे कैदी हैं, जिसके खिलाफ मुकदमा चल रहा है। अब इन विचाराधीन कैदियों का भार बढ़ रहा है, इस पर कोई विचार नहीं कर रहा है। हमेशा जब भी उनकी पेशी होती है, तो पुलिस उन्हें वाहनों से अदालत ले जाती है, फिर शाम को ले आती है। ऐसा कई बार होता है। इस दौरान कैदी भी कुछ अलग अनुभव करते हैं। उन्हें अपने परिजनों से मिलने का मौका मिल जाता है। दूसरी ओर जिन कैदियों पर गंभीर अपराध के मुकदमे चल रहे होते हैं, उनकी पेशी अब वीडियो कांफ्रेंसिंग से होने लगी है। इससे उन्हें अदालत लाने-ले जाने का खर्च अवश्य कम हुआ है। फिर भी यह सुविधा अभी तक हर जेल तक नहीं पहुंच पाई है। इस दिशा में अभी तेजी नहीं आई है। देश की न्याय प्रक्रिया में तेजी से सुधार लाने के लिए बहुत से काम करने होंगे। अब देश में नई सरकार आई है, बहुमत वाली सरकार बहुत कुछ ऐसे कदम इस दिशा में उठा सकती है, जिससे न्याय प्रक्रिया में तेजी आए।
डॉ. महेश परिमल


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