शनिवार, 12 अक्तूबर 2013

कांग्रेस के हाथ से फिसलता आंध्र

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;

कांग्रेस के हाथ से फिसलता आंध्र
डॉ. महेश परिमल
सीमांध्र में अंधेरा छाया हुआ है। चारों तरफ अराजकता का माहौल है। हालात बेकाबू होते जा रहे हैं। गृहमंत्री भले ही कहें कि आंध्र में राष्ट्रपति शासन की कोई योजना नहीं है। पर सच यह है कि आंध्र में बहुत ही जल्द राष्ट्रपति शासन लग सकता है। हालात को बेकाबू बनाने में पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और जगन रेड्डी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके उपवास ने स्थिति को बिगाड़ा। इसकी पूरी आशंका है कि आंदोलन अभी और जोर पकड़ेगा। कई नए विवादों से जूझने की अपेक्षा सही यही होगा कि राष्ट्रपति शासन लगा दिया जाए,यही एकमात्र विकल्प भी है। वजह साफ है कि यह आंदोलन हिंसक दिशा में जा रहा है। लोग अंधेरे से वैसे ही त्रस्त हैं, उस पर स्थानीय नेताओं के भाषण यही दर्शा रहे हैं कि इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए हर कोई तत्पर है। हर दल वहां हीरो बनने में लगा है। उधर कांग्रेस अभी तक यही जताती रही है कि वह निर्णय लेने में दृढ़ है, इसलिए उसने तेलंगाना पर सही समय पर सही निर्णय लिया है। दूसरी ओर मुलायम का राग बदलते ही कांग्रेस उत्तर प्रदेश को विभाजित करने की योजना बना रही है। वह मायावती के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश को विभाजित करना चाहती है ताकि उसका राजनैतिक लाभ उठाया जा सके।
इस संबंध में चंद्रबाबू नायडू दो नावों पर सवार होकर अपना खेल खेल रहे हैं। एक तरफ वे भाजपा से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी तरफ जगमोहन रेड्डी भी कांग्रेस की टीका करते हैं और नरेंद्र मोदी की प्रशंसा। इन दोनों की नजर अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव पर है। कांग्रेस ने मामले को उलझा दिया है। यही आंध्र प्रदेश कभी कांग्रेस का गए़ था। आज वहां तेलुगु देशम, वायएसआर कांग्रेस, तेलंगाना राष्ट्रीय समिति और भाजपा ने अपना कब्जा जमा लिया है। शासन भले ही कांग्रेस का हो, मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी की भूमिका उतनी महत्वपूर्ण नहीं है। वहां केंद्र के कांग्रेसी नेताओं का दबदबा है, जो इस स्थिति में भी अपनी रोटी सेंकने से बाज नहीं आ रहे हैं। यह प्रदेश अब आंदोलनों का प्रदेश बन गया है। यहां के लोग आक्रामक हैं, इसलिए उन्होंने कांग्रेस की नींद हराम कर रखी है। तेलंगाना का मामला कांग्रेस के लिए बूमरेंग साबित हुआ है। कांग्रेस के लिए यह स्थिति आ बैल मुझे मार, जैसी है। हम सारे निर्णय समय पर लेते हैं, इस तरह का संदेश देने वाली कांग्रेस भी तेलंगाना मामले पर सही समय पर सही निर्णय लिया गया है, यह बताना चाहती है। पर सभी जानते हैं कि कांग्रेस के निर्णय सदैव राजनीति से प्रेरित रहे हैं। आंध्र की समस्याओं के निराकरण में कांग्रेस फिसड्डी साबित हुई है। यह स्पष्ट हो गया है। तेलंगाना के मुद्दे पर राजनैतिक रोटियां सेंकी जा रही है। इसकी गर्मी वहां की प्रजा महसूस कर रही है। अब यह मामला ऐसा भी नहीं रहा, जिसका दो चार दिनों में ही निकाल लिया जाए। एक तरफ केंद्र सरकार दृढ़ है, तो दूसरी तरफ आंदोलनकारी भी स्वयं को मजबूत बता रहे हैं। दोनों में से कोई हारना ही नहीं चाहता।
आंध्र में कांग्रेस के नेताओं का अहम काम कर रहा है, दूसरी ओर आंदोलन करने वाले प्रादेशिक नेताओं की नीयत खराब है। वाय एस आर कांग्रेस के जगमोहन रेड्डी और तेलुगुदेशम के चंद्रबाबू नायडू ने आमरण उपवास रखकर केंद्र सरकार को उलझन में डाल दिया है। ये दोनों ही अपने आप में कट्टर दुश्मन हैं, पर तेलंगाना के मुद्दे पर एक हो गए हैं। ऐसा लग रहा है। पर कांग्रेस की हालत बहुत ही खराब है। यह तय है। पहले यह माना जा रहा था कि आगामी लोकसभा चुनाव के पहले तेलंगाना पर निर्णय लिया जाएगा। पर अब उत्तर प्रदेश के विभाजन की सुगबुगाहट है। कांग्रेस की नजर उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर है।वह मायावती के साथ मिलकर अधिक से अधिक सीटों पर कब्जा करना चाहती है। इससे कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि सरकार सही समय पर सही निर्णय लेना जानती है। इस समय आंध्र की सारी बिजली इकाइयां ठप्प पड़ी हुई हैं। उत्पादन न के बराबर है। सीमावर्ती क्षेत्र अंधेरे में डूबे हैं। दक्षिण की इस ग्रिड पर उत्पादन प्रभावित होने से तमिलनाड़ु, केरल और कर्नाटक की बिजली आपूर्ति प्रभावित होगी।
आंध्र प्रदेश में लोकसभा की 42 सीटें हैं। तो उत्तर प्रदेश में 80। आंध्र को विभाजित करने के लिए विधेयक राज्य विधानसभा से कभी पारित नहीं हो पाया। पर उत्तर प्रदेश विधानसभा में सन् 2011 में मायावती के शासनकाल में सर्वसम्मति से पारित हो गया था। बाद में केंद्र को भी भेजा गया। इस समय कांग्रेस उत्तर प्रदेश को विभाजित करने की जुगत में दिखाई दे रही है। राजनैतिक समीक्षक मानते हैं कि ऐसा करके कांग्रेस मायावती को अपने करीब लाना चाहती है। जब से मुलायम सिंह ने तीसरा मोर्चा पर बयान देना शुरू कर दिया है, तब से कांग्रेस भी उत्तर प्रदेश के विभाजन की बात करने लगी है। कुछ भी हो पर सच तो यह है कि आंध्र का गुस्सा आसमान पर है। वहां के लोगों ने यह समझ लिया है कि हमें ठगा गया है। हमसे फरेब किया गया है। आंध्र समस्या का समाधान क्या होगा, यह सरकार का सोचने का काम है। पर हालात बता रहे हैं कि वहां राष्ट्रपति शासन ही अब एकमात्र विकल्प रह गया है।
डॉ. महेश परिमल

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Post Labels