शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

पूछो न कैसे मैंने रैन बिताई...चले गए मन्ना दा

डॉ. महेश परिमल
मन्ना दा नहीं रहे। यह हृदयविदारक समाचार था, उन संगीत प्रेमियों के लिए, जिनके कानों में मन्ना दा के गीतों ने पहली बार सुर के प्रति प्रेम और विश्वास जगाया। मन्ना दा, जिनके गीतों को बचपन से सुना, गुना और गाया। कठिन से कठिन और सहज से सहज गीत उनके ही कंठ से फूटे हैं। गीत कैसे भी हों, मन्ना दा के लिए कभी कठिन नहीं रहे। शास्त्रीय संगीत से लेकर रोमांटिक गीत तक का सफर बहुत लम्बा है। मन्ना दा की सबसे बड़ी यही विशेषता है कि वे इतने सहज होते थे कि पूछो ही मत। स्वयं को कभी बहुत महान गायक न मानने वाले मन्ना दा अपने आप में मस्त रहने वाले महान गायक थे। उनके जाने का मतलब है, संगीत के एक युग का दौर का खत्म होना। कम नहीं होती साढ़े 93 साल की उम्र। अभी एक मई को ही उन्होंने अपना 93 वां जन्म दिन मनाया। वे तो चले गए हैं, पर उनके गीत हम सबसे कभी जुदा नहीं होंगे। फिल्मों के लिए गाये जाने वाले गीतों की अपेक्षा उनके गैर फिल्मी गीत भी बहुत ही लोकप्रिय हुए। फिर चाहे वे गीत मयूरपंखी के हों, या फिर ताजमहल पर। आवाज में एक सोज, गंभीरता और महमूद जैसे कलाकारों के लिए अपनी आवाज में हास्य का पुट लाना मन्ना दा के ही बस की बात थी।
मन्ना दा कभी विवादास्पद नहीं रहे। न तो उन्होंने कभी ऐसा बयान दिया, न ही कभी किसी की आलोचना की, न कभी गुटबाजी की और न ही कभी कुछ ऐसा किया, जिस पर ऊंगली उठाई जाए।
मन्ना दा के बारे में बहुत से संस्मरण मिल जाएंगे, पर उन्होंने स्वयं के बारे में जो कहा, उनसे से एक यह है कि जब वे कॉलेज में पढ़ रहे थे, तब सभी संगीत की सभी स्पर्धाओं में भाग लेते थे, हर स्पर्धा में उन्हें पहला स्थान प्राप्त होता था। इससे अन्य प्रतिभावान छात्र-छात्राओं को अवसर नहीं मिल पाता था, आखिर में एक ऐसा निर्णय लिया गया, जिससे वे बाद में कभी किसी स्पर्धा में हिस्सा न ले सकें। एक बार एक स्पर्धा में हिस्स लेने के बाद जब वे अव्वल आए, तो उन्हें एक सितार देकर यह कहा गया कि अब आप किसी स्पर्धा में भाग नहीं लेंगे। कॉलेज प्रबंधन के इस निर्णय को उन्होंने बड़ी सहजता से स्वीकार किया और फिर कभी किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया। इतने सहज थे मन्ना दा। जब उन्हें एक दक्षिण भारतीय युवती सुलोचना से शादी करनी थी, तब वे बड़े पसोपेश में थे। घर में कैसे बताएं। घर के सभी बड़े परंपरावादी। अगर बुरा मान गए तो, इसलिए उन्होंने सुलोचना को सीधे अपने चाचा के सामने खड़ा कर दिया और कहा कि यह सुलोचना है, दक्षिण भारतीय, लेकिन रवींद्र संगीत जानती हैं, गाती भी हैं, मैं इससे शादी करना चाहता हूं। बस फिर क्या था, उन्हें शादी की अनुमति मिल गई।
एक बार शंकर साहब ने उन्हें  भीमसेन जोशी के साथ गाने के लिए कहा। गाने के साथ शर्त यह थी कि उन्हें जोशी जी को हराना भी था। उस समय संगीत की दुनिया में भीमसेन जोशी का बहुत नाम था। मन्ना दा स्वयं को बहुत ही छोटा गायक मानते थे। इसलिए अपना डर छिपाने के लिए उन्होंने पत्नी से कहा कि चलो कुछ दिन के लिए कहीं घूम आते हैं। पत्नी हैरान, आखिर इन्हें हो क्या गया? ऐसे तो कभी जाते नहीं हैं। आज अचानक ये क्या कह रहे हैं। तब पत्नी ने पूछा कि सच-सच बताओ, आखिर हुआ क्या है? तब मन्ना दा ने अपनी परेशानी बताई। पत्नी ने उनकी परेशानी को समझा और चलने के लिए राजी हो गई। वे करीब एक सप्ताह तक पूना में रहे। ताकि शंकर साहब किसी और से गवा लें। लेकिन नौशाद साहब भी कम न थे, उन्होंने सोच लिया सो सोच लिया। मन्ना दा जब पूना से लौटे, तो नौशाद साहब फिर हाजिर। आखिर उन्हें शंकर साहब का कहना मानना पड़ा। ये थी उनकी सहजता।
मन्ना दा के बचपन के दिनों का एक दिलचस्प वाकया है। उस्ताद बादल खान और मन्ना दा के चाचा एक बार साथ-साथ रियाज कर रहे थे। तभी बादल खान ने मन्ना दा की आवाज सुनी और उनके चाचा से पूछा यह कौन गा रहा है। जब मन्ना दा को बुलाया गया तो उन्होंने अपने उस्ताद से कहा,0 बस ऐसे ही गा लेता हूं। लेकिन बादल खान ने मन्ना दा की छिपी प्रतिभा को पहचान लिया। इसके बाद वह अपने चाचा से संगीत की शिक्षा लेने लगे। मन्ना दा 40 के दशक में अपने चाचा के साथ संगीत के क्षेत्र में अपने सपनों को साकार करने के लिए मुंबई आ गए। 1943 में फिल्म तमन्ना. में बतौर प्लेबैक सिंगर उन्हें सुरैया के साथ गाने का मौका मिला। हालांकि इससे पहले वह फिल्म रामराज्य में कोरस के रुप में गा चुके थे। दिलचस्प बात है कि यही एक एकमात्र फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने देखा था।
मन्ना दा के बारे में प्रसिद्ध संगीतकार अनिल विश्वास ने एक बार कहा था कि मन्ना दा हर वह गीत गा सकते हैं, जो मोहम्मद रफी, किशोर कुमार या मुकेश ने गाये हों, लेकिन इनमें से कोई भी मन्ना दा के हर गीत को नहीं गा सकता है। इसी तरह आवाज की दुनिया के बेताज बादशाह मोहम्मद रफी ने एक बार कहा था, आप लोग मेरे गीत को सुनते हैं, लेकिन अगर मुझसे पूछा जाए तो मैं कहूंगा कि मैं मन्ना दा के गीतों को ही सुनता हूं। मन्ना दा केवल शब्दो को ही नहीं गाते थे, अपने गायन से वह शब्द के पीछे छिपे भाव को भी खूबसूरती से सामने लाते थे। शायद यही कारण है कि प्रसिद्ध हिन्दी कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर कृति मधुशाला को स्वर देने के लिये मन्ना दा का चयन किया। साल 1961 मे संगीत निर्देशक सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में फिल्म काबुलीवाला की सफलता के बाद मन्ना दा शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे। फिल्म काबुलीवाला में मन्ना दा की आवाज में प्रेम धवन रचित यह गीत, ए मेरे प्यारे वतन ऐ मेरे बिछड़े चमन आज भी श्रोताओं की आंखों को नम कर देता है। प्राण के लिए उन्होंने फिल्म उपकार में कस्मे वादे प्यार वफा और जंजीर में यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी जैसे गीत गाए। उसी दौर में उन्होंने फिल्म पड़ोसन मे हास्य अभिनेता महमूद के लिए एक चतुर नार बड़ी होशियार गीत गाया तो उन्हें महमूद की आवाज समझा जाने लगा।
उन्होने ऐ मेरे प्यारे वतन, ओ मेरी जोहरा जबीं, ये रात भीगी-भीगी, ना तो कारवां की तलाश है और ए भाई जरा देख के चलो जैसे गीत गाकर अपने आलोचको का मुंह बंद कर दिया।
प्रसिद्ध गीतकार प्रेम धवन ने मन्ना दा के बारे में कहा था मन्ना दा हर रेंज में गीत गाने में सक्षम हैं। जब वह ऊंचा सुर लगाते हैं, तो ऐसा लगता है कि सारा आसमान उनके साथ गा रहा है। जब वह नीचा सुर लगाते हैं तो लगता है उसमे पाताल जितनी गहराई है। और अगर वह मध्यम सुर लगाते हैं तो लगता है उनके साथ सारी धरती झूम रही है। मन्ना दा को फिल्मों मे उल्लेखनीय योगदान के लिए 1971 में पदमश्री पुरस्कार और 2005 में पदमभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा वह 1969 में फिल्म मेरे हुजूर के लिए सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक, 1971 मे बंगला फिल्म निशि पदमा के लिये सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक और 1970 में प्रदर्शित फिल्म मेरा नाम जोकर के लिए फिल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ पाश्र्वगायक पुरस्कार से सम्मानित किए गए। मन्ना दा के संगीत के सुरीले सफर में एक नया अध्याय जुड़ गया जब फिल्मों में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए साल 2009 में उन्हें फिल्मों के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 
सभी संगीत प्रेमियों की ओर से उन्‍हें भावभीनी श्रद्धांजलि।
डॉ. महेश परिमल

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