सोमवार, 7 जुलाई 2014

बुलेट ट्रेन से उद‌्धार संभव हो पाएगा?

डॉ. महेश परिमल
दिल्ली से आगरा के बीच देश की सबसे तेज ट्रेन चली। अब हम गर्व कर सकते हैं कि विकास के पथ में हम तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। देश को एक तरफ बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया जा रहा है और दूसरी तरफ कुछ ट्रेनें अभी भी छुक-छुक कर चल रही हैं। 8 जुलाई को सरकार रेल बजट संसद में पेश करेगी। रेल किराया तो उसने पहले ही 14.2 प्रतिशत बढ़ा दिया है। इससे नाराज लोगों को वह बजट से लुभाने की कोशिश करेगी। लोग यह समझ रहे हैं कि चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से लोगों से अच्छे दिन का वादा किया था, उसे पूरा करने के लिए इस बार रेल बजट में बुलेट ट्रेन की घोषणा कर लोगों की नाराजगी को दूर करने का प्रयास किया जाएगा। दिल्ली से आगरा के बीच तेज गति की जो ट्रेन चलाई गई, यह उसी घोषणा का छोटा-सा रूप है। वैसे देखा जाए, तो दिल्ली में बनने वाली योजनाओं की गति भी इतनी होनी ही चाहिए, ताकि उसका लाभ सुदूर अंचलों में रहने वालों को जल्दी मिल सके।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बुलेट ट्रेन की व्याख्या कैसे की जाए। उसकी गति कितनी होनी चाहिए? इस संबंध में सरकार जो कह रही थी, वह कर नहीं कर पाई। ट्रायल रूप में चलाई गई तेज गति की ट्रेन ही 10 मिनट देर से आगरा पहुंच पाई। गणना यह की गई थी कि यह ट्रेन 194 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलेगी। तब यह 90 मिनट में दिल्ली से आगरा पहुंच पाएगी। पर ऐसा हो नहीं पाया। पर इसके लिए पटरियों पर करीब 15 करोड़ रुपए खर्च किए गए। यह तो तय है कि भारतीय रेल अभी तो 200 की स्पीड पर नहीं चल पाएंगी। जापान ने अभी कुछ समय पहले ही अपनी सबसे तेज गति से चलने वाली ट्रेन का ट्रायल किया। आप जानना चाहेंगे कि इसकी स्पीड कितनी थी? एक घंटे में 580 किलोमीटर! मेंगलेव के रूप में पहचानी जाने वाली यह ट्रेन मैग्नेटिक ट्रेक पर दौड़ती है। हमारे देश में जो पटरियां बिछी हैं, उसकी क्षमता इतनी नहीं है कि द्रुत गति से कोई ट्रेन उस पर दौड़ सके। जापान से पचास साल पहले 1964 में बुलेट ट्रेन शुरू कर दी थी। वहां 300-350 की गति तो सामान्य है। जापान, चीन, फ्रांस, जर्मनी के बीच तेज गति की ट्रेन चलाने की प्रतिस्पर्धा चलते ही रहती है। हमारे लिए उस स्तर तक पहुंचना अभी संभव नहीं है। इसकी वजह यही है कि हाईस्पीड ट्रेन से अधिक आवश्यकता है कि उसके लिए तरोताजा नेटवर्क तैयार करना। अभी तो जो ट्रेनें चल रही हैं, उसे ही व्यवस्थित तरीके से चलाना ही किसी चुनौती से कम नहीं है।
हमारे देश का रेल्वे नेटवर्क विश्व का सबसे बड़ा नेटवर्क है। हमारे यहां 64 हजार किलोमीटर में पटरियां फैली हुई हैं। अब इन पटरियों पर 150-170 की स्पीड से ट्रेनें दौड़ेंगी। हमारे यहां रेल्वे ट्रेक दोनों तरफ से खुले होते हैं। इसलिए पशु जब चाहे तब पटरियों पर आ जाते हैं और मौत का शिकार होते हैं। गुजरात के सासण और गिर जंगलों में रेल्वे ट्रेक पर ही वनराजा बैठ जाते हैं और मौत का शिकार होते हैं। इसके अलावा कईरेल्वे फाटक ऐसे हैं, जहांरेल्वे का कोई कर्मचारी नहीं है। फास्ट ट्रेन दौउ़ाने के पहले इन हालात पर गौर करना आवश्यक है। सरकार फास्ट ट्रेन चलाने के लिए निजी कंपनियों की सहायता लेगी। पर इन ट्रेनों से कितने आम आदमियों को फायदा होगा? जिनके लिए फास्ट ट्रेनें चलाई जा रही हैं, वे तो विमान से भी जा सकते हैं। ट्रेनों की बेहतर सेवाएं देनी हैं, तो ऐसे लोगों को दी जाए, तो सुदूर अंचलों में रहते हैं। जिनके लिए ट्रेन का समय पर आना ही बहुत बड़ी बात है। आज भी लोग ट्रेन में यात्रा करने के लिए डेढ़-दो महीने पहले से आरक्षण करवाते हैं, तो उन्हें आरक्षण नहीं मिल रहा है। दलाल लाबी पूरे रेल्वे तंत्र पर हावी है। कितनी कोशिशों के बाद भी रेल्वे दलालों से मुक्त नहीं हो पाया। आम आदमी को किस तरह से आरक्षण आसानी से मिले, यह एक बड़ी समस्या है। पहले इसे हल किया जाना आवश्यक है।
हमारे यहां की मेट्रो ट्रेनें कितनी भव्य होती हैं। इसका उदाहरण अभी मुम्बई में हुई मूसलधार बारिश के दौरान मेट्रो ट्रेनों के भीतर पानी घुस आया। मुम्बई में अभी तो मेट्रो ट्रेन केवल वर्सोवा से घाटकोपर के बीच ही चल रही है। इन दोनों उपनगरों के बीच की दूरी मात्र 11.4 किलोमीटर है। अभी इसकी स्पीड 80 किलोमीटर ही है। अब यदि यही हाल रहे, तो निजी कंपनियों की मदद से चलने वाली ट्रेनों का क्या हश्र होगा? यह सभी जानते हैं। मेट्रो और बुलेट ट्रेनों की बात छोड़ो, पहले यह देखा जाए कि अभी जा ेट्रेनें दौड़ रही हैं, उनकी हालत क्या है? हर सप्ताह एक ट्रेन दुर्घटना होती है, जिसमें कुछ लोग मरते हैं और बहुत से लोग घायल होते हैं। इस बार बजट में ऐसे लोगों के लिए शायद बड़ी राहत का प्रावधान है। कुछ और बातें भी हैं, जिसमें प्रमुख हैं कि राजधानी और शताब्दी ट्रेनों के दरवाजे मेट्रो की तरह होने वाले हैं। अभी सरकार का ध्यान केवल उच्च वर्ग को रिझाने पर ही है। आम आदमी के लिए कुछ सोचा जा रहा है, ऐसा नहीं दिखता। आज ट्रेनों पर चढ़ने के लिए बुजुर्गो की हालत खराब हो जाती है, वे आसानी से ट्रेनों पर नहीं चढ़ पाते हैं। बिना सहारे के कूपे के अंदर पहुंचना भी उनके लिए मुश्किल होता है। रेल्वे की बुकिंग भले ही ऑनलाइन हो गई हा, पर आज भी वहां दलालों का ही कब्जा है। आम आदमी किसी भी हालत में अपने बल पर आरक्षण करवा ही नहीं सकता।  इतनी घोषणाओं के बाद भी आज तक दलालों पर किसी तरह की कार्रवाई हो, ऐसा सुनने में नहीं आया। टीटीई आज भी रिश्वत लेकर सीट देने में कोताही नहीं करते। वेटिंग लिस्ट वाले पूरी राशि देने के बाद भी लाचार होकर यात्रा करते हैं। दूसरी ओर ट्रेनों के टायलेट इतने अधिक गंदे होते हैं कि स्टेशन पर दरुगध के बीच खड़े रहना भी मुश्किल होता है। आज भी ट्रेन जब स्टेशन पर खड़े रहती है, तब भी लोग टायलेट का इस्तेमाल करते हैं। इससे सारी गंदगी पटरियों के बीच आ जाती है। ऐसा नहीं हो सकता क्या कि जब ट्रेन स्टेशन पर खड़ी हो, तो टायलेट का दरवाजा खुले ही नहीं। वैसे हमारे देश के रेल्वे स्टेशन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं, यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है।
कुछ ऐसी ही हालत ट्रेनों में मिलने वाले खाद्य पदार्थो की है। इस खाद्य पदार्थ को एक बार देश के मंत्रियों को अवश्य खिलाना चाहिए। यात्री मजबूरी में ही यह खाना खाते हैं। देश के अधिकांश लोग गरीब और मध्यमवर्गीय हैं। ट्रेनों की स्पीड थोड़ी कम हो, तो चलेगा, पर यात्री आराम से एक स्थान से दूसरे स्थान जा सकें, ऐसी व्यवस्था पहले की जानी चाहिए। इसमें कोई शक नहीं कि बुलेट ट्रेन होनी चाहिए, पर इससे देश का उद्धार नहीं होगा, उद्धार होगा तो केवल उच्च वर्ग का। अभी भी देश में गाड़ी छुक-छुक करके चल रही है, इस ओर भी ध्यान दिया जाए, तो कम से कम गरीब और मध्यम वर्ग का भला हो। जनरल कोच की हालत कैसी होती है, यह हमारे देश के किसी नेता या मंत्री को नहीं पता। एक बार वे भी आम आदमी बनकर बिना आरक्षण के जनरल कोच में यात्रा करके देख लें, पता चल जाएगा कि इस देश के आम आदमी की हालत कैसी है? गरीब रथ के नाम से चलने वाली ट्रेनों का किराया बहुत ही महंगा है। उसे तो अमीर रथ का नाम दिया जाना चाहिए। यात्रा की पूरी राशि देकर भी धक्के खाकर यात्रा करने वाले बेबस यात्रियों के बारे में भी कुछ सोचा जाना चाहिए।
डॉ. महेश परिमल

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