मंगलवार, 1 जुलाई 2014

देश में भी घूम रहा है कालाधन

दैनिक जागरण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख 
http://epaper.jagran.com/epaper/01-jul-2014-262-National-Page-1.html#

 
कालाधन:हवाला पर सख्ती जरुरी
डॉ. महेश परिमल
सरकार को आखिर कौन रोक रहा है, विदेशी बैंकों से देश का कालाधन लाने के लिए। उसके पहले यदि देश में ही जो कालाधन है, पहले उसे बाहर लाने की कोशिश होनी चाहिए। बेवजह शोर करने का कोई अर्थ नहीं। हम ऐसा करेंगे, हम वैसा करेंगे, कहने से बेहतर है कि हमने ऐसा किया, हमने वैसा किया। यह सच है कि दवा का कड़वा घूंट पीने के लिए इंसान को हमेशा तैयार रहना चाहिए। नीम का पत्ता कड़वा अवश्य होता है, पर खून साफ करता है। ठीक इसी तरह रेल किराया और मालभाड़े में वृद्धि कर सरकार ने जनता को दवा का कड़वा डोज दिया है। अब शकर और पेट्रोल की बारी है। धीरे-धीरे महंगाई अपना असर दिखाने लगी है। जनता ने यही सोचकर अपना कीमती वोट दिया था कि अब उन्हें महंगाई से राहत मिलेगी। पर एक महीने में ही पता चल गया कि हालात कितने बेकाबू होने वाले हैं। विदेशों से कालाधन जब आएगा, तब आएगा। पर यदि ऐसी कोशिशें हो कि देश का ही कालाधन बाहर आ जाए। यदि इस दिशा में अभी से काम शुरू हो, तो निश्चित ही इसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे।
भारत में कालाधन या दो नम्बर का धन पूरी तरह से सुरक्षित रखने के लिए स्विस बैंक विख्यात है। इस बंक में देश के नेताओं, कापरेरेटरों, दलालों, मैच फिक्सिंग में फंसे क्रिकेट खिलाड़ियों एवं भ्रष्टाचारियों का धन सुरक्षित है। स्वीस बैंक इन लोगों का खाता आसानी से खोल लेता है। आश्चर्य इस बात का है कि कालाधन सुरक्षित रखने के लिए वह मोटी रकम भी वसूलता है। लोग इस धन को बचाए रखने के लिए यह मोटी रकम भी देने को तैयार हैं। देश में ही छिपाए गए कालेधन पर सरकार बजट में अपना रुख साफ करेगी। कहा गया है कि इस बार इस दिशा में सरकार सख्त होगी। यदि ऐसा हो, तो बेहतर होगा। पर आखिर कालेधन को विदेशी बैंकों में जमा करने की स्थिति आती ही क्यों है? इस दिशा पर सरकार का ध्यान जाना आवश्यक है। विदेशी बैंकों में भारतीयों का जमा धन आखिर देश के मध्यम वर्ग का ही है। इस काले धन को जमा करने वाले समृद्ध और रसूखदार वर्ग है। इसमें नेता, सेलिब्रिटी, मैच फिक्सिंग से जुड़े खिलाड़ी आदि का समावेश होता है। सभी बड़ी कंपनियां जाने-अनजाने कालाधन तैयार करते हैं। उसके बाद विभिन्न तरीकों से उसे व्हाइट में बदलने की कोशिश करते हैं। इस कोशिश में वे सफल भी होते हैं और आयकर छिपाने में भी कामयाब हो जाते हैं।
वैसे तो स्विटजरलैंड में 283 बंक है, पर जानकारी के अनुसार स्विस बैंक में भारतीय अपना कालाधन जमा करते हैं। इस धन का तृतीयांश भारतीय यूपीएस और क्रेडिट सुइसी में धन निवेश करना पसंद करते हैं। जानकारी के अनुसार स्विस बैंकों में भारतीयों के 2.02 अरब स्विस फ्रेंक जमा हैं। इसे यदि भारतीय मुद्रा में बदला जाए, तो यह राशि 14000 करोड़ रुपए होती है। किपछले वर्ष इस राशि में 43 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। यह सुनकर सरकार चौंक उठी। तब कालाधन प्राप्त करने के लिए सरकार ने नए सिरे से कोशिशें शुरू की। चुनाव के पहले भाजपा ने विदेशी बैंकों में जमा कालेधन को वापस लाने के लिए ‘सीट’ की रचना करने की भी घोषणा की थी। चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने यह कहा था कि यदि विदेशी बंकों से कालाधन वापस लाया गया, तो इस धन को मध्यम वर्ग में बांट दिया जाएगा, आखिर यह धन मध्यम वर्गसे ही लूटा गया धन ही है। स्विस की यूबीएस और क्रेडिट सुईए में जो धन है, उसमें 68 प्रतिशत भारतीयों का ही है। स्विस बैंकों में 11 हजार करोड़ की राशि अन्य देशों की है। भारतीयों के अलावा स्विस बैंक ने अन्य बैंकों में जमा की गई कुल राशि 850 करोड़ है।
स्विस की दो बैंकों में भारतीयों के 43 प्रतिशत राशि बढ़ने के पीछे का कारण यह है कि भारत में कर प्रणाली को यह निवेशक आसानी से धोखा दे जाने में कामयाब हैं। भारत के कानून भी हवाला रेकेट को रोक नहीं सकते। इसलिए हवाला के माध्यम से स्विस बैंक में राशि पहुंच जाती है। हवाला के खिलाफ ठोस कार्रवाई करते हुए यदि सरकार कड़ा कानून बनाती है, तो स्विस बैंकों में धन जमा कराने वाले बेहाल हो सकते हैं। पर किसी सरकार ने अभी तक इस दिशा में गंभीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया है। यदि इस दिशा में कानून बना भी दिया जाए, तो उसका अमलीकरण बहुत मुश्किल है। प्रत्येक देशवासी इस समय रोज ही भ्रष्टाचार से दो-चार हो रहा है। वह अपना आयकर बचाने के लिए काफी जद्दोजहद करता है। सरकार भी विदेशी बैंकों में पहुंचने वाले धन को रोक नहीं पा रही है। वह इसका भी प्रयास नहीं कर पा रही है कि कोई भारतीय विदेशी बैंकों में अपना खाता ही न खोल पाए। यदि खाता खुलवाना आवश्यक ही है, तो उसे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की मंजूरी लेना आवश्यक होनी चाहिए। यदि किसी का विदेशी बैंक में खाता है, तो उसे एक महीने के अंदर आरबीआई को जानकारी देनी होगी। यदि ऐसा होता है, तो सरकार उसकी राशि के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकती है। जो लोग आरबीआई की जानकारी के बिना विदेशी बैंकों में अपना खाता खोलते हैं, तो उन्हें 25 से 50 साल की सजा होनी चाहिए। सरकार काफी समय से इस दिशा में कार्रवाई की बात कर रही है, इसलिए कई लोगों ने विदेशी बैंकों में अपना खाता बंद कर कहीं और खुलवा लिया है। वैसे अभी भी लोगों का स्विस बैंकों से मोहभंग नहीं हुआ है। यदि स्विस बैंक भारतीय खातेदारों का नाम और राशि बताती है, तो देश में एक तरह से भूचाल ही आ जाएगा। कई नेताओं और कई अधिकारियों के नाम सामने आएंगे। यदि स्विस बैंक से राशि मिल भी जाती है, तो इस राशि का किया क्या जाए, यह भी एक गंभीर प्रश्न है। इस राशि को मध्यम वर्ग के बीच बांट दी जाए, तो प्रधानमंत्री को अपना यह वचन पूरा करना ही होगा।
विख्यात अर्थशास्त्री स्वामीनारायण अय्यर का कहना है कि स्विस बैंकों में मात्र एक प्रतिशत की दर से ब्याज दिया जाता है। इस बैंकों में केवल बेवकूफ लोग ही अपना धन जमा कर अपनी मूर्खता जाहिर करते हैं। स्विस बैंकों का उपयोग लोग कामचलाऊ स्तर पर कालाधन स्वीकारने और संभालने के लिए करते हैं। फिर ये कालाधन भारत लाकर उसे शेयरों एवं रियल एस्टेट में निवेश कर दिया जाता है। कालाधन की सबसे अच्छी वापसी केवल भारत में ही होती है। सन् 2000 में न्यूयार्क का डाऊ-जोंस इंडेक्स जितना था, लगभग उतना ही आज भी है, जबकि भारत का सेंसेक्स में 6 गुना वृद्धि हो चुकी है। दस दौरान रियल एस्टेट के भावों में करीब 500 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। अमेरिकी सरकार अपने बांड पर 3 प्रतिशत ब्याज देती है, उसके मुकाबले भारत सरकार 8 प्रतिशत ब्याज देती है। इस दौरान भारत में सोने-चांदी के भावों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। एक अंदाज के मुताबिक भारत के बाजारों में 25 लाख करोड़ का कालाधन घूम रहा है। इस धन को मुख्य प्रवाह में लाना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।
डॉ. महेश परिमल

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