बुधवार, 3 दिसंबर 2014

सरकार नई पर आइडिए पुराने

डॉ. महेश परिमल
नई सरकार के शुरुआती हाव-भाव देखकर यही लग रहा था कि यह सरकार तेजी से काम करेगी, नई-नई योजनाएं लाएगी, सबको खुश करने का प्रयास करेगी। पर लगता है कि अब केंद्र की भाजपा सरकार के पास ऐसा कुछ भी नहीं बचा, जिसमें कुछ नयापन हो। अभी दस नवम्बर को सरकार ने जो उड्‌डयन नीित जाहिर की, उसमे कुछ भी नया नहीं है। सभी कुछ पुरानी कांग्रेस सरकार की नीतियां ही काम करती दिखाई दे रही है। यही हाल किसान विकास पत्र का भी है। पहले तो सरकार ने नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन की दुहाई दे रही थी। पर जब अपनी पर बन आई, तो पुरानी नीतियों को ही अपनाना शुरू कर दिया। सरकार ने भ्रष्टाचार हटाना चाहती है, इनोवेटिव आइडिया लाना चाहती है, परंतु पुरानी नीतियां ही यदि जारी रखेगी, तो फिर यूपीए सरकार ही क्या बुरी थी?
कालेधन पर सरकार फिसड्‌डी साबित हो ही रही है। जिन खातों का खुलासा किया गया था, उसके बाद उसमें से अधिकांश खातों में अब जीरो बेलेंस है। सरकार पुरानी बोतल में नई शराब बेचने की फिराक में है। KYC के बाद KYP आया।  KYC यानी ‘नो योर कस्टमर रिक्वायरमेंट’, और KYP यानी ‘किसान विकास पत्र’। केवायसी का सरकार काेई खास लाभ नहीं उठा पाई। दूसरी तरफ बैंकों द्वारा केवायसी के बहाने ग्राहकों को परेशान ही कर रहीं हैं। केवायसी के माध्यम से बैंक में धन जमा कराने वालों की सही जानकारी मिल जाने का अंदाजा था। अब सरकार का ध्यान केवीपी पर है। रिजर्व बैंक ने केवायसी के लिए जो नियम तैयार किए हैं, वे केवीपी पर भी लागू होंगे। सरकार का गणित यह है कि 2015-16 तक किसान विकास पत्र द्वारा 35 हजार करोड़ जमा किया जा सकता है। परंतु ये केवीपी के संबंध में जो सूचना घोषित की गई है, उससे यह स्पष्ट होता है कि जो व्यक्ति किसान विकास पत्र खरीदता है, वह केश या चेक से भी निवेश कर सकता है। यदि वह चेक से निवेश करता है, तो उसकी पहचान हो सकती है, पर यदि वह नगद राशि देकर निवेश करता है, तो उसकी पहचान मुश्किल हो जाएगी। कोई भी व्यक्ति सुरक्षित निवेश चाहता है, तो वह सरकार की राशि दोगुना करने वाली योजना को अधिक पसंद करता है। किसान विकास पत्र से राशि 8 साल में दोगुनी हो जाती है। दूसरी ओर सरकार की कुछ ऐसी ही योजनाएं उपलब्ध हैं। इसलिए वित्त मंत्री अरुण जेटली जिसे इनोवेटीव स्कीम बता रहे हैं, उसमें ऐसा कुछ भी इनावेटीव नहीं है।
हाल के डाटा अनुसार लोगों ने सोने में अधिक निवेश किया है। सरकार इसके विकल्प के रूप में किसान विकास पत्र की योजना सामने लाई है। अक्टूबर 2014 में सोने का आयात 4 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। पिछले वर्ष इस महीने में वह मात्र एक अरब डॉलर था। सोने के भाव टूटते होने के बाद भी इसका आयात बढ़ा है। अक्टूबर 13 में जिस सोने का आयात 24 टन था, वह इस अक्टूबर में 120 टन तक पहुंच गया। इस दिशा में सरकार ने अभी सोने के आयात में अस्थायी रूप से घटाने के लिए टैक्स लगाया है। परंतु इसके कारण सोने की तस्करी बढ़ गई है। सरकार निवेशकों से इसके नए विकल्प मांग रही है, पर लोग इसमें दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। लगता है सरकार के पास इस दिशा में कोई नया आइडिया नहीं है। जैसे निवेशकों के लिए नए आइडिए नहीं हैं, वैसे ही उड्‌डयन नीति के लिए हुआ है। यूपीए सरकार के दौरान उड्‌डयन नीति की हालत बहुत ही खराब थी। इस कारण एयर इंडिया ठप्प हो गई। उधर विदेशी एयरलाइंस सारा मुनाफा खींच ले जाती। नई एनडीए सरकार चाहती तो नए नियमों को लाकर नई उड्‌डयन नीति बनाकर उड्‌डयन क्षेत्र को रन वे पर ला सकती थी। पर ऐसा नहीं हो पाया, अब नई सरकार ने भी उसे बिना बदले पिछली नीतियों को ही लागू कर दिया है, तो उससे देश की एयरलाइंस को घाटा होगा और विदेशी एयरलाइंस मुनाफे में रहेंगी।
िकसान विकास पत्र 1988 में पहली बार सबके सामने आए थे। लोकप्रिय योजना होने के बाद भी नवम्बर 2011 में वापस ले ली गई थी। इसकी सिफारिश श्यामलाल गोपीनाथ कमेटी ने की थी। 2009-2010 में उस योजना के तहत 21 लाख, 631 हजार, 16 करोड़ रुपए इकट्‌ठा किए गए थे। बाद में पता चला कि यह योजना कालेधन को छिपाने का अड्‌डा बन गई है, तो इस बंद कर दिया गया। यह बात तीन साल पुरानी है। तब 2010-11 था, अब 2014-15 है। इन वर्षों के दौरान केवायसी ने सख्त कानून बनाया है। दूसरी तरफ मध्यमवर्ग निवेश के लिए विश्वसनीय और सुरक्षित योजनाओं की खोज में हैं, सरकार ब्याज नहीं बढ़ा रही है। इसलिए निवेशकों को अधिक ब्याज देने वाली योजनाओं के रूप में निवेशक शेयर बाजार और सोने की खरीदी की ओर प्रेरित हो रहे हैं। इसमें धन का भविष्य अनिश्चित होता है। दूसरी ओर किसान विकास पत्र से राशि दोगुनी हो ही जाती है। सरकार ने किसान विकास पत्र बाहर लाकर कोई तोप नहीं मारी है। किसान विकास पत्र से काला धन बाहर आएगा, यह सोच भी शेखचिल्ली की सोच है। कालाधन जमा करने वाले सोने और शेयर बाजार अधिक पसंद करते हैं। किसान विकास पत्र में तो फिक्स डिपाजिट से भी कम ब्याज मिल रहा है, अरुण जेटली जिसे इनोवेटीव आइडिया कह रहे हैं, वह वास्तव में महाबोगस योजना है।
इसलिए यह कहा जा सकता है कि सरकार शोर ही अधिक कर रही है, जमीनी हकीकत कुछ और ही है। उसके पास नई सोच नहीं है, जिसका प्रचार वह करती रही है। पुरानी सोच के सहारे देश तो पहले ही चल रहा था। लोगों ने भाजपा सरकार से जो उम्मीद जताई थी, उसे पूरा करने में वह विफल साबित हुई है। लोगों को एक बार तो भरमाया जा सकता है, पर बार-बार नहीं।
‎                डॉ. महेश परिमल

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