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बुधवार, 15 फ़रवरी 2017
कुछ ग़ज़लें - 2 - विनोद कुमार दवे
ग़ज़ल का अंश....
तुम्हें न भूल पाते है
हम खामोश है मगर तुम्हें भूल न पाते हैं
दिल से सदा देकर तुम्हीं को तो बुलाते हैं।
और तो क्या करें दुनिया के रिवाजों का,
आओ मेरे यार इनकी होली जलाते है।
इन दीवारों को कभी तो गिरना है ही,
हम दोनों मिलकर ये दूरी मिटाते है।
नफ़रत के आगोश में जी लिए जिन्हें जीना था,
हम तो खुशबु-ए- इश्क़ की हवा चलाते है।
मत रहो उदास इन हसीन लम्हों के दरमियान
थोड़ा तुम मुस्करा दो थोड़ा हम मुस्कराते है।
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ई-मेल - davevinod14@gmail.com
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दिव्य दृष्टि
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
कुछ ग़ज़लें -1 - विनोद कुमार दवे
परिचय -
साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं यथा, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, अहा! जिंदगी, कादम्बिनी , बाल भास्कर आदि में रचनाएं प्रकाशित।
अध्यापन के क्षेत्र में कार्यरत।
ग़ज़ल का अंश...
• दिल में अश्कों का दरिया है....
इतनी कोशिशों के बाद भी तुम्हें कहाँ भूल पाते हैं,
दीवारों से बचते हैं तो दरवाजे टकराते हैं।
कौन रुलाए कौन हँसाए मुझको इस तन्हाई में,
ख़ुद के आंसू हाथों में ले ख़ुद को रोज हंसाते है।
जाने क्या लिख डाला है हाथों की तहरीरों में
अपनी किस्मत की रेखाएं उलझाते है, सुलझाते है।
तुझको किन ख़्वाबों में खोजूँ जागी-जागी रातों में
ख़ुद से इतनी दूरी है कि ख़ुद को ढूंढ़ न पाते है।
तेरी यादें दिल में इस हद तक गहरी बैठ गई है
तेरी यादों के दलदल में ख़ुद को भूल जाते है।
तुमने सोचा होगा बिन तेरे हम खुश कैसे है
दिल में अश्कों का दरिया है, बाहर हम मुस्काते है।
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मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016
ग़ज़ल – 2 – विमल कुमार शर्मा
ग़ज़ल का अंश…
रेत के ये ढेर मुझसे आज कुछ कहने लगे,
ये मरुस्थल आज क्यों अच्छा मुझे लगने लगा।
सर्द हवा ने रेत पर तस्वीर तेरी खींच दी,
देखकर चेहरा तेरा अच्छा मुझे लगने लगा।
रोशनाइयों में क्यों अब मन मेरा लगता नहीं,
अब अंधेरों का सिला अच्छा मुझे लगने लगा।
सादगी इस शख्सियत में आ गई है इस कदर,
जो भी हो जैसा भी हो अच्छा मुझे लगने लगा।
इन अंधेरे रास्तों का अब सफर थमता नहीं,
यादों का तेरी काफिला अच्छा मुझे लगने लगा।
याद तेरी आ रही है एक खिलौने की तरह,
मन मेरा क्यों आज फिर बच्चा मुझे लगने लगा।
टूटे स्वप्न पीठ पर लादे चला था मैं कही,
बातों का तेरी कारवाँ अच्छा मुझे लगने लगा।
इस कदर मशगूल रहता हूँ मैं खुद में आज कल,
अपना शक्लों मिजाज भी अच्छा मुझे लगने लगा।
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सोमवार, 26 सितंबर 2016
ग़ज़लें - 2 - अनिरुद्ध सिंह सेंगर
ग़ज़ल...
हम क्या बताएं कैसे गुज़रती है जिन्दगी....
हम क्या बताएॅं कैसे गुज़रती है ज़िन्दगी,
खा-खा के ठोकरों को सँवरती है ज़िन्दगी।
पहरे बिठा रखे हैं ये मौसम ने हर तरफ,
उसको पता कहाँ कि बहकती है ज़िन्दगी।
दिल में तेरे छुपा है जो उसकी तलाशकर,
क्यों दर-व-दर सुकूॅं को भटकती है ज़िन्दगी।
जब से चलन दहेज का दुनिया में हो गया,
पीड़ा,घुटन के साथ सुलगती है ज़िन्दगी।
वो एक तितली फूल की गोदी में सो गई,
तब जाना उसने कैसे महकती है ज़िन्दगी।
उड़ते हैं जो ‘अनिरुद्ध’ ये आज़ाद परिन्दे,
मस्ती में रोज इनकी गुजरती है ज़िन्दगी।
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सम्पर्क - aniruddhsengar03@gmail.com, sengar.anirudha@yahoo.com
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ग़ज़लें - 1 - अनिरुद्ध सिंह सेंगर
ग़ज़ल...
जीवन सुखी बनाने को सब ताने-बाने रखता हूँ...
जीवन सुखी बनाने को सब ताने-बाने रखता हूँ,
अपनी ऑंखां में सदैव मैं स्वप्न सुहाने रखता हूँ।
तुमको भाते हैं तो गाओ घिसे-पिटे सब गीतों को,
अपने होठों पर मैं लेकिन नये तराने रखता हूँ।
माता-पिता, बहन-भाई सब मेरे मन की दौलत हैं,
मैं तो अपनी इन ऑंखों में कई ख़जाने रखता हूँ।
हर संकट साहस को मेरे देख बहुत घबराता है,
सोता हूं टूटी खटिया पर लट्ठ सिरहाने रखता हूँ।
मेरे मन के रहस्यवाद को नहीं समझ पाएंगे आप,
तहख़ाने के अन्दर भी मैं कई तहख़ाने रखता हूँ।
मेरी काव्य कला पर कर दें जो निज प्राण निछावर तक,
ऐसे भी ‘अनिरुद्ध’ साथ में, मैं दीवाने रखता हूँ।
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बुधवार, 7 सितंबर 2016
ग़ज़ल – तुझसे क्या कहूँ – 2 – विमल कुमार शर्मा
दिव्य दृष्टि के श्रव्य संसार में मुलाकात करते हैं विमल कुमार शर्मा की ग़ज़लों से। उनकी ग़ज़ल की किताब ‘तुझसे क्या कहूँ’ में इस शीर्षक से कुल आठ ग़ज़लें हैं। जिसे हम दो-दो ग़ज़लों के साथ चार भाग में प्रस्तुत कर रहे हैं। विमल कुमार शर्मा को शायरी का माहौल विरासत में मिला। पिताजी के दिलो-दिमाग में रची-बसी शायरी, गीत, ग़ज़ल उनकी रग-रग में बचपन से ही बस गई। भले ही नादान बचपन उनके अर्थ से अनजान था मगर शायरी सुनना और गुनगुनाना अच्छा लगता था। धीरे-धीरे समय के साथ समझ बढ़ी और खुद की शायरी बनने लगी। स्कूल से लेकर कॉलेज तक का सफर आगरा में ही हुआ। ऐतिहासिक शहर में रहने का फायदा यह हुआ कि मुशायरों का लुत्फ भी उठाया गया और बचपन की शायरी वर्तमान की दहलीज पर आकर उन्हें एक नई पहचान दे गई। गीत, ग़ज़ल, शायरी, व्यंग्य, कविता, कहानी, मुक्तक सारी विधाओं में हस्तक्षेप रखने वाले विमल कुमार शर्मा पेशे से फोरेन्सिक विशेषज्ञ हैं, इस बात पर यकीन करने को मन नहीं करता। किंतु समय का हर क्षण साक्षी है कि पर्याय इंसान को जितनी पहचान देते हैं, उससे कहीं अधिक पहचान उसे विलोम देते हैँ अत: इस बात पर भी यकीन करना ही है कि अपनी कर्मभूमि में कँटीली राह के राही श्री विमल जी रचनात्मक माटी में सृजन संसार के कई कोमल अंकुर बोने में पूर्णत: समर्थ हैं। उनकी इस विशेषता की पहचान करने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए। विश्वास है, उनकी ग़ज़ल ‘तुझसे क्या कहूँ’ की ये ग़ज़लें आपको अवश्य पसंद आएगी।
कुछ पंक्तियाँ….
डरते हैं लोग मौत से, यह सबको है खबर,
मैं रोज कैसे मरता हूँ, मैं तुझसे क्या कहूँ।
क्यों चाहता है दिल तुझे, हमको नहीं खबर,
कुछ बात जुदा तुझमें है, मैं तुझसे क्या कहूँ।
पूरी ग़ज़ल का लुत्फ लेने के लिए ऑडियो की मदद लीजिए…
संपर्क - ई-मेल : vimalsharma31@gmail.com
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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016
शहरयार की कुछ ग़ज़लें...
उर्दू के जाने-माने ग़ज़लकार शहरयार का मूल नाम - अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान था। इनका जन्म 9 दिसंबर 1929, लखनऊ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। इनकी मुख्य कृतियाँ
इस्मे आज़म, सातवाँ दरे-हिज्र के मौसम, ख़्वाब का दर बंद है, शाम होने वाली है, मिलता रहूँगा ख़्वाब में, सैरे-जहाँ, कहीं कुछ कम है, नींद की किरचें, फ़िक्रो-नज़र, शेअरो-हिकमत आदि हैं। इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी पुरस्कार, दिल्ली उर्दू पुरस्कार, फ़िराक सम्मान, शरफ़ुद्दीन यहिया मुनीरी इनाम, इक़बाल सम्मान आदि प्राप्त हुए हैं। 13 फरवरी 2012, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) में इस फ़ानी दुनिया से रूख़सत होनेवाले शहरयार फिल्मी दुनिया में भी अपनी ग़ज़लों से एक अलग पहचान बना चुके हैं और उनकी कुछ ग़ज़लें हमारे अकेलेपन का हिस्सा बनती हैं।
यहाँ प्रस्तुत हैं उनकी कुछ ग़ज़लें...
ग़ज़ल का अंश... ऐसे हिज्र के मौसम अब कब आते हैं
तेरे अलावा याद हमें सब आते हैं
जज़्ब करे क्यों रेत हमारे अश्कों को
तेरा दामन तर करने अब आते हैं
अब वो सफ़र की ताब नहीं बाक़ी वरना
हमको बुलावे दश्त से जब-तब आते हैं
जागती आँखों से भी देखो दुनिया को
ख़्वाबों का क्या है वो हर शब आते हैं
काग़ज़ की कश्ती में दरिया पार किया
देखो हम को क्या-क्या करतब आते हैं। ऐसी ही अन्य ग़ज़लों का लुत्फ़ उठाइए, ऑडियो के माध्यम से...
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सोमवार, 20 जून 2016
ग़ज़ल - सैलाब था वो...
लेखिका देवी नागरानी ने ग़ज़ल - सैलाब था वो... हमें ई-मेल के माध्यम से भेजी हैं। देवी नागरानी का नाम कथा संसार में एक जाना-पहचाना नाम है। आप ब्लाॅग के माध्यम से इनकी कहानियाँ सुनते ही हैं। अब उनके द्वारा भेजी गई इस ग़ज़ल का लुत्फ उठाइए। उम्मीद है कि आपको ये ग़ज़ल जरूर पसंद आएगी।
रे ब्लॉग के माध्यम
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