सोमवार, 26 सितंबर 2011

तीन चिंतन

निंदक नियरे राखिए
एक बहुत प्रसिद्ध दोहा है- निंदक नियरे राखिए आंगन कुटि छबाय। बिन पानी बिन साबुन निर्मल करे सुहाय।। इस दोहे में यही कहा गया है कि अपनी निंदा, आलोचना, बुराई करने वालों सदा अपने पास रखना चाहिए। अपनी आलोचना सुनकर उसे सुधारने से हमारा स्वभाव अच्छा होता है और हमारी कमियां दूर होती हैं। यह दोहा अति प्राचीन है और आज के युग में कोई अपनी बुराई कतई सुनना नहीं चाहता। भला मेरे काम में कमी कैसी? यही सोच है अधिकांश लोगों की। सभी चाहते हैं कि चारों ओर उनकी प्रशंसा हो, उनके कार्य में कमियां ना निकाले। परंतु जब उम्मीद के विपरित कोई बुराई या कमी निकाल देता है तो वहां उनका अहं जाग जाता है। लोगों को मजा भी बुराई निकालने में ही आता है। दूसरों की बुराई करने को आज भी भाषा में निंदारस कहा जाने लगा है। बुराई करना जैसे एक फैशन हो गया है। किसी के अच्छे कार्यों को कोई एक बार भले याद ना करें, परंतु यदि किसी से कोई चूक या गलती हो गई तो जैसे उसने गुनाह कर दिया। दरअसल व्यक्ति दूसरों की बुराई करके अपनी कमजोरियों को छुपाना चाहता है। वह यही दिखाना चाहता है कि कमियां सिर्फ मुझ ही में नहीं है। कुछ लोगों की सोच होती है जो कार्य मैं नहीं कर सकता या मुझसे नहीं हुआ तो उसे कोई और कैसे कर सकता है? परंतु जब कोई वह कार्य कर देता है तो उसे अपनी कमजोरी का अहसास होता है और वह उसके कार्य में बुराई या कमी तलाश करने में लग जाता है। इसी तरह की भावनाओं से ग्रस्त होकर दूसरों में बुराई ढूंढ़ी जाती है और फिर उसे प्रचारित करने में उन्हें एक अद्भूत आंनद की प्राप्ति होती है। यदि कोई आपकी बुराई करता है या कमियाँ निकालता है तो कोशिश करनी चाहिए उसे सकारात्मक रूप में लेने की और अपनी कमजोरी दूर करें। साथ ही दूसरों की बुराई करने से बचें। इससे होता कुछ नहीं है, उलटा आपकी छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रहीम से भी एक कदम आगे बढ़कर यह कहना चाहूंगा कि कमियॉं निकालने वाले व्यक्ति को अपने मकान के परिसर में ही उसके रहने के लिए एक कुटिया बना दो, जिससे वह उसमें रहकर हमारे दोष देखता रहे और हमें सदा सावधान करता रहे। भावना और कल्पना का यथार्थ से दूर का भी संबंध नहीं है। जिन दिनों कवि ने इस दोहे की रचना की थी, उन दिनों देश में न तो सघन जनसंख्या थी और न ही आवास समस्या।
यदि आपको स्वयं की क्षमता और उपलब्धियों का आकलन करने में मुश्किल हो रही है, तो यह काम किसी आलोचक से करवाएं। जो आपकी कमियों और खूबियों की भली-भांति व्याख्या कर सके। उसके द्वारा की गई आलोचना से ही आपको समझ आएगा कि आप कितने पानी में हैं। आप बहुत भाग्यशाली हैं, जो आपको ऐसा स्पष्ट बोलने वाला आलोचक बनाम शुभचिंतक मिला वरना यह सबके नसीब में नहीं होता। यदि आप स्वयं मंे बदलाव करना चाहते हैं, तो इसके लिए अतीत में आपने जो उपलब्धियाँ हासिल की हैं, उन्हें याद करें, इससे अपनी योग्यता को परख पाएँगे और आपके आत्मविश्वास में भी इजाफा होगा। नेपोलियन ने कहा था कि मैं सौ हितैषी अखबारों की अपेक्षा उस एक अखबार को महत्वपूर्ण मानता हूँ, जिसमें मेरे कार्यो की आलोचना होती है। मेरे लिए वह आईने का काम करता है। मुझे अपने आप में सुधार का रास्ता दिखाता है। जो आपकी बुराई करे, तो सबसे पहले आप यह देखें कि इसके पीछे उसकी नीयत कैसी है? यदि आपकी बुराई से उसे किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल रहा हे, तो उसके इस कार्य को महत्वपूर्ण मानना होगा। जब उसे कोई लाभ ही नहीं हो रहा है, तो भला वह आपकी बुराई क्यों करेगा? चूँकि वह आपका भला चाहता है, इसलिए वह आपको सचेत कर रहा है। ताकि आप अपनी गलती न दोहराएँ। ऐसे विरले ही होते हैं, जो अपनी आलोचना सुनना पसंद करते हैं। इस रास्ते पर चलते हुए बार-बार हमें एक चीज परेशान करती है, वह है अहंकार। यह एक ऐसी चीज है, जिसका कभी अंत नहीं होता। मानव स्वभाव में यह निश्चित रूप से अपना अलग स्थान रखता है। इसके सामने आँख का कोई काम नहीं, क्योंकि अहंकार के वश में जो भी काम होते हैं, वह मानव स्वभाव के विपरीत ही होते हैं। जो व्यक्ति इस पर जितनी अधिक विजय प्राप्त करता है, वह उतना सहनशील होता है और सर्वजयी होता है। जो व्यक्ति हमारी रुचि का नहीं, वह हमारा शत्रु है, यह मानना हमारी संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। हम उसे अपना आईना समझें। ऐसे लोगोंे से हमें अपने आप में सुधार का मौका मिलेगा। हितैषी तो वही कहेंगे, जो हम उनसे सुनना चाहते हैं। लेकिन विरोधी वही कहेगा, जो सच है। सच के सहारे चलने वाला इंसान संतोषी होता है। झूठ का सहारा लेने वाला सदैव दु:ख पाता है। तो क्यों न सच को अपना साथी मानकर विरोधियों को अपना ही मानें। मीठा झूठ भी इंसान के लिए खतरनाक होता है। इसका रूप-रंग बिलकुल सच की तरह होता है। कई बार धोखा भी खा सकते हैं। पर इसे वही पहचान सकता है, जो अनुभवी है। सच की तरह सीधी-सच्ची सादगी किसी में नहीं है। यह हमारे पास दु:ख का सागर पार करके आता है, इसलिए सच को सहजता से स्वीकारो और जीवन को एक नया आयाम दो।

दूसरों का सम्मान
अपने कर्तव्य की लता में श्रम का पानी दो और ईमानदारी की खाद डालो, फिर देखो आपके आंगन में शान्ति के सुगन्धित पुष्प खिलेंगे, जो गहरी डुबकी लगाता है, वही सागर के धरातल को छू पाता है। अमूल्य रत्न उसे ही प्राप्त होते हैं। जब आप दूसरों की बुराई छोड़ देंगे, आपकी भलाई अपने आप शुरू हो जाएगी। जब आप घृणा करना छोड़ देंगे तो प्रेम की सुगन्ध अपने आप फूटने लगेगी, जिनका जीवन अहंकार और कामनाओं से सना है, वह अपने चारों ओर अशान्ति की तरंगे ही फैलाते हैं। सम्मान केवल इच्छा कर लेने मात्र से प्राप्त नहीं होता, बल्कि दूसरों का सम्मान करने के लिए आपको स्वयं पहल करनी चाहिए, फिर देखो आपको भी उसी प्रकार सम्मान प्राप्त होना शुरू हो जाएगा, यह भी याद रखो कि सुपात्र को सम्मान न देकर कुपात्र पर कृपाएं लुटाने से बरबादियों का रास्ता खुलता है।
अपने को श्रेष्ठ मानने और दूसरों को सम्मान न देने के इस दौर में अपने जमाने के महान Rिकेट खिलाड़ी रहे सुनील गावसकर ने मुंबई के पाटिल स्टेडियम में जो बड़प्पन दिखाया, वह वाकई प्रशंसनीय है। मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर के सामने लिटिल मास्टर गावसकर का सार्वजनिक रूप से नतमस्तक होना ऐसा सुखद अहसास है, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। सचिन के एक दिवसीय Rिकेट मैच का पहला दोहरा शतक जमाने के बाद गावसकर ने उनके समक्ष नतमस्तक होने की इच्छा जताई थी और उन्होंने वास्तव में ऐसा कर दिखाया। खेल हो, राजनीति या व्यवसाय, एक-दूसरे से आगे निकलने की आपाधापी में ऐसे लम्हे शायद ही देखने को मिलते हों। जब सचिन ने Rिकेट मैदान पर कदम नहीं रखा था, तब दुनियाभर में सुनील मनोहर गावसकर की ही तूती बोलती थी। यह मानने में भी कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि अपने दौर में गावसकर ही Rिकेट के सचिन थे। ऐसे महान खिलाड़ी का महानतम खिलाड़ी को इस तरह सम्मान देना खिलाड़ियों के साथ-साथ उन सभी लोगों के लिए भी प्रेरणा का संदेश है, जो अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता के शिखर पर बैठे हैं।
इससे युवाओं को अवश्य प्रेरणा लेना चाहिए। जीवन में केवल सफलता ही सब कुछ नहीं है, सफलता के साथ-साथ सज्जनता और सहजता का भाव भी होना चाहिए, तभी व्यक्ति को सच्चा सम्मान हासिल होता है। वास्तव में हम दूसरों का सम्मान करते हुए ही अपना सम्मान बढ़ाते हैं। यह आवश्यक नहीं कि आज आपने जिसे सम्मान दिया हैा, वह तुरंत ही आपको सम्मान देगा। सम्मान देना उस धन की तरह है, जिसे आपने देकर बैंक में सुरक्षित रख दिया। अब वह धन जब भी लौटेगा, कुछ नया लेकर ही लौटेगा। आज आपने जिसे सम्मान दिया, संभवत: किसी दूसरे अनजाने शहर में वह आपको मिल जाए। तब देखो वह किस तरह से आपका सम्मान करता है। सम्मान देने से ही नहीं, बल्कि देते रहने से बढ़ता है। सम्मान की भावना हृदय की गहराइयौं से आती है। इसलिए जब भी किसी का सम्मान करो, दिल से करो। यह न सोचो कि इसके बदले में हमें क्या मिलेगा? सम्मान के बदले में मिलने वाली जो भी वस्तु होगी, वह हमें प्रसन्नता ही दिलाएगी, इसे कभी नहीं भूलना चाहिए।
जीवन की अच्छाई और बुराई रबर की गेंद की तरह है। जो लौटकर आएगी ही। जब बुरंे कार्य लौटकर आते हैं, तो उसका अंजाम भी बुरा ही होता है। तो क्यों न अच्छे कार्य ही किए जाएँ, ताकि जब वे लौटकर आएँ, तो सुपरिणाम लेकर आएँ। इन परिणामों से हम सम्बल मिलेगा और हम उससे भी अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित होंगे। इस तरह से सकारात्मक विचारों का एक ऐसा प्रवाह शुरू होगा, जिससे कई लोग लाभान्वित होंगे। सम्मान की एक डोर अपने आप से ही जुड़ी होती है। सम्मान देंगे, तो सम्मान के अधिकारी होंगे। किसी को अपमानित कर उससे सम्मान प्राप्त करने का सपना देखना अनुचित है। अहंकार में डूबकर कई बार लोग यह कहते नजर आते हैं कि उसके घर में हमें पानी भी नही मिला। संभव है उस घर में कुछ ऐसा हो गया हो, जिससे सदस्य मेहमानवाजी भूल गए हों, या फिर वे भी वही कर रहे हों, जैसा आपने उनके लिए किया था। जब ऐसी स्थिति आए, तो थोड़ा रुककर यह विचार करें कि कहीं हमसे तो कोई चूक नहीं हो गई? यह ध्यान रखें कि व्यक्ति कभी दोषी नहीं होता, हालात दोषी होते हैं। मानव परिस्थितियों के वश में होता है, तो कई बार कुछ ऐसा कर जाता है, जिसे उसे नहीं करना था। सम्मानित होने के लिए बरसों की तपस्या करनी पड़ती है और अपमानित करने के लिए कुछ पल ही काफी होते हैं। यदि हम एक बच्चे से भी कुछ प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं, तो वह हमारे लिए सम्माननीय है। हमें उसका आदर करना चाहिए। सम्मान का भाव भीतर से आता है। इसलिए इसे मस्तिष्क से नहीं जोड़ना चाहिए। हृदय की कोमल भावनाएँ सम्मान के भाव के साथ जुड़ी होती हैं। इसलिए सदैव स्मरण रखें कि सम्मान दोगे, तभी सम्मान पाओगे।

अपनी जड़ें
अक्सर देखा जाता है कि जिस पेड़ की जड़ें जितनी अधिक गहरी होंगी, वह पेड़ उतनी ही मजबूती के साथ टिका रहता है। तूफान भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते, जो अपनी जड़ों को मजबूत रखते हैं। जड़ों का मजबूत होना इस बात का परिचायक है कि उसके संस्कारों ने उसे सींचा है, तभी जड़ें इतनी मजबूत हैं। मानव की जड़ों को समझना हो, तो हमें उसके संस्कारों को देखना होगा। तभी हम उसके व्यक्तित्व को अच्छी तरह से समझ पाएँंगे। जड़ों का आशय अतीत से भी है। वर्तमान की कोख में अतीत का बीज होता है। भविष्य की नींव भी अतीत से ही तैयार होती है। जो अपना अतीत भूल जाता है, वह आगे चलकर सब कुछ भूल जाता है। अतीत की गलतियाँ ही मानव को तराशती हैं। इतिहास हमें इसीलिए ही पढ़ाया जाता है, ताकि हम उन गलतियों से सबक सीख सकें, जो हमारे पूर्वजों ने की थी। उन गलतियों को न दोहराना ही हमारा पहला कर्तव्य है। जो जड़ों से दूर होता है, वह अपने भविष्य की बुनियाद को ही तोड़ देता है। हमारे बीच ऐसे बहुत से महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने लम्बे संघर्ष के बाद सफलता प्राप्त की। इसके बाद भी वह अपने पुराने दिनों को नहीं भूल पाए।
एक घटना याद आती है। एक बहुत बड़ी प्रेस के मालिक ने अपनी बहुत बड़ी प्रिन्टर मशीन के पास एक पुरानी प्रिन्टर मशीन को रखा करते थे। लोगों ने कई बार इसका कारण पूछा, वे हमेशा टाल देते। एक बार उनकी संतानों ने उस मशीन को हटवा दिया। इससे वे काफी नाराज हुए। बच्चों को डॉंटते हुए उन्होंने कहा कि मैंने अपने इस व्यवसाय की शुरुआत इसी मशीन से की थी। इसी मशीन से ही मैं आज बड़ी प्रिंटिंग प्रेस का मालिक बन पाया हूँ। मैं अपने अतीत को याद रखते हुए ही सफलता के इस मुकाम पर पहुँचा हूँ। ये मशीन मुझे अपने संघर्ष के दिनों की याद दिलाती है। इससे मेरा लगाव तुम बच्चों से भी अधिक है। मेरी कोमल भावनाएँ इससे जुड़ी हुई हैं। आज इस व्यवसाय में मुझे बड़ा घाटा भी हो जाए, तो यह मशीन मुझे संबल देगी। मुझे विश्वास है कि मैं इसी मशीन से फिर वही मुकाम हासिल कर लूँगा। ये मशीन मुझे कभी दु:खी होने नहीं देगी। तब बच्चों ने समझा कि आखिर यह पुरानी मशीन इस नई मशीन के पास क्यों रखी है।
जीवन में भी यही होता है। अपनी जड़ों से दूर होने वाले दु:खी होते हैं। जिस वृक्ष की जड़ें सूख जाती हैं, वह कमजोर होकर एक दिन उखड़ जाता है। मजबूत जड़ों के वृक्ष कभी धराशायी नहीं होते। सुनहरे भविष्य की ओर तभी बढ़ा जा सकता है, जब हम अतीत को याद रखते हुए आगे बढ़ते हैं। ठीक उस नाविक की तरह जो वर्तमान यानी पानी में रहते हुए पतवार चलाता है, उसकी नजरें अतीत की ओर टिकी होती हैं, पर वह भविष्य की ओर बढ़ता रहता है। बरसों बाद यदि कोई अपनी मातृभूमि की ओर लौटता है, तो उस क्षेत्र की माटी का एक-एक कण उसे अपनी ओर बुलाता है। इंसान भावनाओं में बहकर उस माटी से जुड़ जाना चाहता है। उसे बार-बार चूमता है। वह उसी माटी में रम जाना चाहता है। इसे ही कहते हैं जड़ों से जुड़ाव
असल में अपनी धरती, अपनी माटी की खुशबू, अपनी बोली, अपना पहनावा ये सब तत्व मिलकर जड़ का निर्माण करते हैं। हर किसी के अंदर रचा-बसा होता है, और सारी दुनिया एक तरफ़ और अपनी जड़ से जुड़े होने का अहसास एक तरफ़। लेकिन जिस प्रकार अपनी जड़ों से जुड़े होने की खुशी अतुलनीय है, ठीक उसी प्रकार उनसे दूर होने का ग़म भी। हमारी जड़ें लगभग पेड़-पौधों की जड़ों जैसी ही होती हैं। जिस तरह पेड़-पौधों की जड़ें न दिखाई देते हुए भी उनका अभिन्न एवं महत्वपूर्ण अंग होती हैं, उसी तरह इंसान की जड़ें भी हमेशा उसके अंदर ही विद्यमान होती हैं। अंतर केवल इतना है कि पेड़-पौधे चाहे आसमान की बुलंदियों को क्यों न छू लें, वे सदैव अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं। इसे एक तरह से आप उनके लिए प्रकृृति का वरदान कह सकते हैं। लेकिन मनुष्य शायद प्रकृति के इस वरदान से वंचित रह गया। इस सिंसार में कभी पेट की खातिर तो कभी किन्हीं और कारणों से उसे अपनी जड़ों से दूर होना पड़ता है। और यकीन मानिये ऐसे बहुत कम लोग होते हैं, जो एकाएक अपनी जड़ों से दूर होने पर इस चीज़ का अहसास कर पाते हैं। अधिकतर या तो सुख-सुविधाओं की चकाचौंध में खो जाते हैं या फि़र कुछ इतने मजबूर होते हैं कि उनके पास ये सब सोचने का वक्त ही नहीं होता। लेकिन इस दुनिया की भागदौड़ में इंसान कितना भी क्यों न भाग ले, देर-सबेर उसे अपनी जड़ें ही याद आती हैं।
जब पशु-पक्षी भी अपनी जड़ों के प्रति इतना प्रेम रख सकते हैं तो फि़र बुद्धिजीवी कहलाने वाला मनुष्य क्यों नहीं? जो अपनी जड़ों के प्रति असंवेदनशील हैं उन्हें पाशु-पक्षियों से कुछ सीख अवश्य लेनी चाहिए।
इसी बात पर किसी कवि ने क्या खूब कहा है
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश (जड़) का प्यार नहीं॥

डॉ. महेश परिमल

3 टिप्‍पणियां:

  1. तीनो ही बहुत शिक्षाप्रद सुंदर लेख…

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  2. अमित कुमार2 मई 2016 को 1:09 pm

    दिल छूने वाली बातें, जिन्हें पढ़कर व्यक्ति आत्मविकास कर सकता है.इन बातो को अपने जीवन में उतारना बेहद जरुरी है.तभी पढ़ना सार्थक हो सकेगा. आपका बहुत बहुत आभार! ऐसे ही हमें अपने विचारों के माध्यम से दिशानिर्देशित करते रहिये. धन्यवाद.

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