मंगलवार, 27 सितंबर 2011

एक तीर से कई निशाने साधे हैं प्रणव दा ने




डॉ. महेश परिमल
कांग्रेस के भीतर दो शिविर हैं, एक में प्रणव मुखर्जी हैं, तो दूसरे में पी. चिदम्बरम। इनके बीच चलने वाले शीतयुद्ध की भनक पहले लगती तो थी, पर बात समय के साथ दब भी जाती थी। पर इस बार प्रणव दा ने जिस तरह से दाँव खेला है, उससे चिदम्बरम चारों खाने चित हो गए हैं। ए. राजा, कनिमोझी के बाद अब जेल जाने की उन्हीं की बारी है। चिदम्बरम कई मोर्चों पर विफल साबित हुए हैं। इसके पहले अन्ना हजारे को गिरफ्तार करने के मामले में उन्होंने कपिल सिब्बल के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उस समय सरकार की काफी फजीहत हुई थी। उधर जब ए. राजा बार-बार कह रहे हैं कि 2 जी घोटाले में वे अकेले दोषी नहीं हैं, चिदम्बरम भी पूरी तरह से दोषी हैं, उन्हें भी कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। अनजाने में एक ऊँगली तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भी उठ रही है। इसीलिए चिदम्बरम पर किसी तरह की कार्रवाई पर मामला एक सप्ताह के लिए टल गया है। सीबीआई भी इस बार बुरी तरह से फँस गई है। अब तक वह पूरी ताकत से चिदम्बरम को बचा रही थी, पर वह गोपनीय पत्र बाहर आ जाने से उसे भी जवाब नहीं सूझ रहा है। इस पत्र से यह स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस के भीतर जो शीतयुद्ध चल रहा था, वह अभी पूरी तरह से बाहर आ गया है। उधर जयललिता भी कठोर हो गई हैं। वे तो पहले से ही चिदम्बरम से इस्तीफे की माँग कर रहीं थीं, इसके बाद तो उन्हें अपनी बात रखने का सुनहरा अवसर मिल गया है।


अब यह भी स्पष्ट होने लगा है िक 2 जी घोटाले में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। कई बातें सामने आईं हें जिसमें प्रमुख हैं:-
- मारन के दबाव में प्रधानमंत्री ने मंत्री समूह की कार्यवाही के बिंदु कमजोर करने में सहमति जताई।
- कार्यवाही के बिंदुओं (टर्म्स ऑफ रिफरेंस) की जानकारी केवल तीनकिरदारों के पास थी। खुद टेलीकॉम मंत्री दयानिधि मारन, दूसरे प्रणब की अध्यक्षता वाले मंत्रियों के समूह और तीसरे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह। बिंदु या तो दयानिधि मारन ने बदले, लेकिन यह उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था, जो उनके लिए असंभव था। तो फिर मंत्रियों के समूह ने बदला होगा। किंतु वे ऐसा क्यों करेंगे? वे भला अपनी ही कार्यवाहियों को क्यों बदलने चले? उसके बाद मारन जब प्रधानमंत्री से मिले, तब कार्यवाही के बिंदु बदल गए।
- चूंकि केबिनेट सचिवालय न तो संचार मंत्री को रिपोर्ट करता है और न मंत्रियों के समूह को। वह सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है। प्रधानमंत्री की सहमति के बाद ही केबिनेट सचिवालय से नोटिफिकेशन जारी हो सकता है।
- आठ प्रभावशाली मंत्रियों वाले इस समूह ने कार्यवाही के बिंदु बदले जाने पर आपत्ति क्यों नहीं उठाई? इसके लिए तीन ही बातें हो सकती हैं:-
- या तो बिंदु बदलने से उनका कुछ लेना-देना नहीं था।
-या उन्हें जानकारी नहीं थी। ये दोनों ही बातें असंभव हैं।
- या यह प्रधानमंत्री का आदेश था, जिसकी वे अवहेलना नहीं कर सकते थे।
-सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इन सारी बातों से वित्तमंत्री को नजरअंदाज क्यों किया गया? सरकारी कामकाज के नियम 1961 के मुताबिक ऐसे किसी भी फैसले को लेने के पहले जिसमें पैसों का मामला हो, वित्त मंत्रालय से सलाह मशविरा आवश्यक है। लेकिन इस मामले में तत्कालीन वित्तमंत्री की पूरी तरह से अनदेखी की गई। यह तभी संभव था, जब प्रधानमंत्री ने खुद ही आदेश दिए हों।
इन सबका खुलासा तब हुआ, जब सामाजिक कार्यकर्ता विवेक गर्ग ने सूचना के अधिकार के तहत गोपनीय दस्तावेज हासिल किए। इस घोटाले से देश को 1.76 लाख करोड़ का जो नुकसान हुआ है, वह आज की भ्रष्ट राजनीति को सबसे बड़ा मामला है। यह तो तय था कि इतने बड़े घोटाले को अकेले ए.राज या फिर कनिमोझी तो अंजाम नहीं दे सकते थे। इनके बीच अवश्य ही कोई बड़ी शक्ति है। अब यह शक्ति हमारे सामने आ रही है। सीबीआई ने इस वर्ष के फरवरी में ए. राजा की जब धरपकड़ की, उसके दो महीने बाद वित्त मंत्रालय से एक 14 पन्नों का पत्र प्रधानमंत्री कार्यालय भेजा गया। इसमें यह स्पष्ट लिखा गया था कि तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम यदि चाहते, तब भी स्पेक्ट्रम का नीलाम करवा सकते थे। इस पत्र से यह भी स्पष्ट हो गया कि चिदम्बरम की भूमिका पर प्रणब मुखर्जी ने प्रधानमंत्री के सामने कई सवाल खड़े किए। इस पत्र में यह भी लिखा है कि जब टेलीकॉम के क्षेत्र में नए लायसेंस देने के मामले पर निर्णय करने का समय आया, तब 31 दिसम्बर 2008 तक के लायसेंस के लिए 2001 में प्रवर्तमान एंट्री फीस तय की गई थी। इसमें पी. चिदम्बरम की भी सहमति थी। वित्त मंत्रालय के इस पत्र का सार यही है कि उस समय यदि चिदम्बरम सहमत न हुए होते, तो ए. राजा की स्पेक्ट्रम की नीलामी करने की आवश्यकता पड़ी होती और देश की तिजोरी को नुकसान नहीं हुआ होता। अनजाने में प्रणब दा ने यह इशारा कर दिया कि यदि चिदम्बरम ए. राजा के साथ मिल नहीं गए होते, तो यह घोटाला हो ही नहीं पाता।
इस मामले में सीबीआई ने राजा के खिलाफ जो आरोप लगाए हैं, उसका मुख्य तत्व यही है कि राजा को स्पेक्ट्रम का नीलाम करने के बजाए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ का नुस्खा अपनाया, इससे सरकारी तिजोरी को अरबों रुपए का नुकसान हो गया। अपने बचाव पर राजा कहते हैं कि उन्होंने स्पेक्ट्रम का जो आवंटन किया, उसमें उनकी अकेले की ही भूमिका नहीं है। इसमें वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम और प्रधानमंत्री की पूरी मिलीभगत है। इस मामले पर यदि सुप्रीमकोर्ट सीबीआई को स्पेक्ट्रम घोटाले में चिदम्बरम की भूमिका की जाँच करने का आदेश दे, तो चिदम्बरम काफी मुश्किल में पड़ सकते हैं।
वित्त मंत्रालय का यह पत्र उस समय बाहर आया है, जब न तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, गृहमंत्री पी. चिदम्बरम और न ही वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी दिल्ली में थे। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री तब न्यूयार्क में थे। चिदम्बरम सिक्किम में राहत कार्यो का निरीक्षण करने गए हुए थे। न्यूयार्क में जब प्रणब दा से इस संबंध में पूछा गया, तो उन्होंने यह कहकर अपना पल्लू झाड़ लिया कि अभी मामला अदालत में है, इसलिए इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। यह उन्होंने अवश्य बताया कि सुब्रमण्यम स्वामी ने उक्त पत्र सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त किया है। उधर जब सिक्किम में चिदम्बरम से इस मामले पर पूछा गया, तो उन्होंने गुस्से से पत्रकारों को अस्पताल से बाहर जाने के लिए कह दिया। बाद में पत्रकार वार्ता में भी उन्होंने इस तरह के सवालों का जवाब देना मुनासिब नहीं समझा।
अब यदि सुप्रीमकोर्ट सीबीआई को 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले पर चिदम्बरम की भूमिका की जाँच का आदेश देती है, तो चिदम्बरम के साथ-साथ सीबीआई भी मुश्किल में पड़ सकती है। यदि सीबीआई को आदेश मिलता है कि चिदम्बरम से पूछताछ की जाए, तो सबसे पहले चिदम्बरम को इस्तीफा देना होगा। फिर उन्हें जेल भी जाना होगा। जब सीबीआई को यह पहले से ही पता था कि वित्त मंत्रालय की मंजूरी के बिना टेलीकॉम मंत्रालय स्पेक्ट्रम का आवंटन नहीं कर सकती, तो फिर सीबीआई ने अभी तक तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम से पूछताछ क्यों नहीं की? यह सवाल सुप्रीमकोर्ट निश्चित रूप से पूछ सकती है। स्पेक्ट्रम घोटाले में चिदम्बरम की भूमिका पर पहले भी आरोप लगाए जाते रहे हैं। पूर्व में भाजपाध्यक्ष नीतिन गडकरी भी आरोप लगा चुके हैं। इसके बाद कांग्रेस उनके बचाव में आ गई थी। कांग्रेस प्रवक्ताओं द्वारा चिदम्बरम का जोरदार बचाव किया गया। 18 जून को ही चिदम्बरम का बचाव करते हुए वर्तमान टेलीकॉम मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि भ्रष्टाचार के किसी भी खेल में चिदम्बरम का कोई हाथ नहीं है। इस मामले में ए. राजा के आरोप गलत हैं। विपक्ष हताशा में आकर इस प्रकार के आरोप लगा रहा है। अब जब प्रणब मुखर्जी ने चिदम्बरम पर इस प्रकार के आरोप लगाए हैं, तो उसका जवाब सिब्बल किस तरह देंगे, यह देखना है। अब तो यही लगता है कि चिदम्बरम पूरी तरह से घिर गए हैं।
इस पूरे मामले में प्रणब मुखर्जी की भूमिका को ध्यान में रखना होगा। वे इस मामले में सबके साथ चलते रहे, पर स्वयं को सबसे अलग भी रखा। अन्ना की गिरफ्तारी के बाद सरकार की जो फजीहत हुई, उससे उबारने में प्रणब दा की भूमिका महत्वपूर्ण रही। अपनी चाल पूरी तरह से चलते हुए इस बार उन्होंने जो दाँव खेला है, उससे सभी लपेटे में आ गए हैं। इस तरह से उन्होंने यही संकेत दिया है कि देश और पार्टी के साथ गद्दारी करने वाले कभी न कभी तो कानून के शिकंजे में आ ही जाते हैं।
डॉ. महेश परिमल

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