शुक्रवार, 17 जून 2011

मौन का साथ छोड़कर बाबा ने गलत किया

डॉ. महेश परिमल
एक डरी हुई सरकार से इससे बेहतर की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती थी। सरकार यही चाहती थी कि बाबा रामदेव की छवि उनके समर्थकों के सामने ही धूमिल हो जाए। एक तरफ वार्ता का ढकोसला दूसरी तरफ एक साजिश के तहत उन्हें बेइज्जत करना, क्या एक लोकतांत्रिक सरकार का यही कर्तव्य है? जिस बाबा रामदेव के लिए सरकार ने लाल जाजम बिछाया, उसे ही रात के अंधेरे में गिरफ्तार कर उनके आश्रम में भेज दिया। क्या यह सरकार को शोभा देता है? निश्चित रूप से सरकार अपने तमाम हथकंडों से बाबा का आंदोलन सफल होने देना नहीं चाहती थी। वह इसमें पूरी तरह से सफल रही। रही सही कसर उनके दिल्ली में घुसने पर प्रतिबंध लगाकर कर दी।
अब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से सबके सामने है कि आखिर बाबा का यह आंदोलन क्यों विफल हुआ? इतना तो तय है कि सरकार जो चाहती थी, वह तो उसने कर लिया। पर बाबा जो चाहते थे, वह नहीं हो पाया। अपनी गलती को सरकार तो छिपा ले गई। अब सारा दोष वह निश्चित रूप से किसी और पर डाल देगी। लेकिन बाबा ने जिस तरह से मीडिया का उपयोग करते हुए लगातार अपना प्रलाप जारी रखा, वही उनके आंदोलन की विफलता का एक महत्वपूर्ण कारण है। जो ध्यान करते हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि मौन में जो शक्ति है, उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। अपनी घोषणा के बाद या फिर मंत्रियों के मनाने के बाद यदि वे मौन की घोषणा करते, तो शायद हालात दूसरे होते। वे मीडिया के सामने यही कहते रहे कि मेरी माँगों पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। उसका रुख सकारात्मक है। वार्ता में कोई अवरोध नहीं है। सरकार पर बाबा का यह भरोसा ही उन्हें ले डूबा। सहमति पत्र पर हस्ताक्षर के बाद सरकार ने अपना पासा फेंका।
एक और बात यह है कि बाबा के पास एक अच्छी सोच तो है, पर उसका पोषण करने वाले कहीं न कहीं राजनीति से ही जुड़े लोग हैं। अण्णा साहब के पास गैर राजनीतिज्ञों की पूरी एक टीम थी। सभी अपने-अपने क्षेत्र की प्रसिद्ध हस्तियाँ हैं। सरकार उनके आंदोलन में किसी प्रकार का अडंगा डालती, तो ये बुद्धिजीवी उसका विकल्प बता देते। एक सूझबूझ वाली टीम के साथ जिस तरह से अण्णा जुड़ें हैं, उस तरह से बाबा नहीं जुड़े। बाबा के साथ जो 5 लोग हैं, उनके तार कहीं न कहीं राजनीति से जुड़े हैं। फिर चाहे वे गोविंदाचार्य हों, या फिर महेश जेठमलानी। बाबा ने अपने आंदोलन की रूपरेखा रूपरेखा उन्होंने काफी पहले तैयार कर ली थी। इसमें 5 लोगों ने अहम भूमिका निभाई । पर्दे के पीछे रह कर इस आंदोलन को हकीकत बनाने वाले 5 पांच चेहरे हैं- गोविंदाचार्य, अजित डोभाल, एस गुरुमूर्ति, महेश जेठमलानी और वेद प्रताप वैदिक। ये पांचों इस वक्त बाबा की उस कोर टीम के हिस्सा हैं जिनसे राय-विचार कर बाबा लगातार सरकार को चुनौती दे रहे थे। अण्णा हजारे की टीम में स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी, शांति भूषण जैसी हस्तियाँ हैं, जो समाज में महत्वपूर्ण सम्मान रखती हैं।
बाबा और अण्णा हजारे में यही एक बड़ा अंतर है कि बाबा के साथ उनके अनुयायी हैं, जो उनके योग के माध्यम से अपनी पीड़ाओं से मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं। इनकी अपनी कोई सोच नहीं है, अपने कोई विचार नहीं हैं। अगर इन्हें नशक्ति के रूप में स्वीकार किया जाए, तो इनका सही इस्तेमाल करना बाबा नहीं जान पाए। तमाम योग में सिद्धहस्त बाबा राजयोग को नहीं समझ पाए। बाबा के हठयोग पर राजयोग भारी पड़ गया। केवल मौन को दूर रखकर वे सबसे दूर हो गए। मौन उनके करीब होता, तो उनका आंदोलन भी सफल हो जाता। न बाबा बात करते, न सरकार कुछ कह पाती। इस बीच सरकार पर दबाव भी बन जाता।
बाबा की माँगें साधारण ही हैं। सोचिए कि बाबा रामदेव क्यों आमरण अनशन पर बैठे थे? वे चाहते हैं कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस लाने के लिए सरकार अध्यादेश जारी करे। उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर भ्रष्टाचारियों को फाँसी अथवा आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान करे। सरकारी पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए समर्थ और स्वायत्त लोकपाल गठित करे। मेडिकल, विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाएं हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में भी ली जाएँ, ताकि गांवों के नौजवानों को समान अवसर मिल सके। वे व्यवस्था परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, जिसमें खासकर लोकसेवक डिलीवरी एक्ट बनाने की मांग शामिल है ताकि आम आदमी का काम समय से हो सके और फाइल को दबाकर अफसर भ्रष्टाचार नहीं कर सकें। इनमें कौन सी मांग देशहित के खिलाफ है?
तमाम हालात को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि आने वाले दिन सरकार के लिए मुश्किल भरे हो सकते हैं। समझ लो इस दिशा में सरकार ने पहला कदम उठा भी दिया है। यह सरकार भ्रष्टाचार के दलदल से जितना निकलने की कोशिश कर रही है, वह उसमें उतनी ही धँसती जा रही है। राष्ट्रमंडल खेलों से भ्रष्टाचार को जो सिलसिला शुरू हुआ, वह स्पेक्ट्रम कांड, हसन अली कांड से शुरू होकर बाबा पर अमानुषिक रूप से किया जाने वाला अत्याचार पर भी जाकर खत्म नहीं हुआ है। हालात यही रहे, तो सरकार इस तरह की कार्रवाई जारी रखेगी। क्योंकि एक डरी हुई सरकार वह सब कुछ कर सकती है, जो उसे नहीं करना चाहिए। भ्रष्टाचार से खुद को मुक्त करने के लिए सरकार ने कुछ प्रयास अवश्य किए हैं, जिसके कारण सुरेश कलमाड़ी, ए. राजा, कनिमोझी, हसन अली आदि कई बदनाम चेहरे सलाखों के पीछे हैं। पर इतने से कुछ नहीं होता। सरकार को इससे आगे बढ़कर कुछ करना होगा। अब सरकार उलझ गई है। खुद को बचाने के लिए वह जितने हाथ-पैर मारेगी, निश्चित रूप से यह प्रयास उसके खिलाफ ही होंगे।
डॉ. महेश परिमल

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

Post Labels