शनिवार, 31 दिसंबर 2011

जिंदादिली का दूसरा नाम सुशील नाहर











डॉ. महेश परिमल

अभी नए वर्ष ने अपनी गठरी खोली भी न थी कि हमारे बीच से सुशील नाहर चुपचाप चल गए। जिसने भी सुना, यही कहा- असंभव, ऐसा हो ही नहीं सकता। अभी कल ही तो वे हमारे साथ थे। खूब हँसी-मजाक का दौर चला था हमारे बीच। वे ऐसे-कैसे जा सकते हैं। पर सच तो यही था कि सुशील नाहर के दिल ने अचानक उनका साथ छोड़ दिया। तो फिर वे भला हमारे साथ कैसे रहते? वास्तव में जिंदादिली का दूसरा नाम थे सुशील नाहर। उनका जाना हर किसी को सन्नाटे में ला सकता है। वे नहीं भी जाते, यदि उन्हें मधुमेह नहीं होता। काफी परेशानी में थे, पर हँसना-हँसाना उन्होंने नहीं छोड़ा।




इस बीच उनके घर चोरी हो गई, अक्टूबर में हुई एक दुर्घटना में अपना हाथ तुड़वा बैठे। फिर भी हमारे बीच आकर उस दुर्घटना का वर्णन हँसी-मजाक के बीच ही करते। उन्हें किसी ने गंभीर नहीं देखा। पर अपना काम सदैव वे गंभीरता से करते। मजाल है कोई कमी रह जाए। जन्म दिन पर मिठाई बाँटना कभी नहीं भूलते। इसके अलावा जानकारियों का खजाना हमेशा उनके पास रहता। कभी भी किसी भी विषय पर उनसे बात की जा सकती है। अपने कानूनी कामों को वे ऐसे अंजाम देते कि दोबारा किसी काम की आवश्यकता ही नहीं होती। हर कोई उनसे और उनके काम से खुश रहता। लेकिन वर्ष 2011 के अंतिम दिन उन्होंने अंतिम साँस ले ली। उनका जाना उनके परिचितों के लिए किसी सदमे से कम नहीं है। जाते-जाते बस एक ही संदेश दे गए कि चुनौतियाँ कितनी भी आएँ, उनका हँसकर मुकाबला करो। एक बिंदास शख्सियत के धनी से सुशील नाहर। विश्वास नहीं होता कि वे इस तरह से चुपचाप हमारे बीच से उठकर चले जाएँगे। लेकिन जिस तरह से सबका जाना तय है, उसी तरह उनका जाना भी संभवत: आज ही तय था। अब तो यही कहा जा सकता है कि ईश्वर उनके परिजनों को दु:ख के इस सागर से बाहर निकलने का रास्ता दे। उन्हें सम्बल दे। आमीन


डॉ. महेश परिमल




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