शुक्रवार, 12 जुलाई 2019

पेड़ों पर निर्भर मानव का अस्तित्व




आज दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित आलेख
लिंक https://epaper.jagran.com/epaper/12-jul-2019-262-national-edition-national-page-8.html

सोमवार, 17 जून 2019

दर्शकों को रिझाती टेक्नालॉजी





दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 15 जून 2019 को प्रकाशित

मंगलवार, 23 अप्रैल 2019

आहत है देश कड़वे बोलों से








नवभारत रायपुर के रविवारीय में 21 अप्रैल 2019 को प्रकाशित

गुरुवार, 18 अप्रैल 2019

गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

पिज्जा-बर्गर-पास्ता, छत्तीसगढ़ियों का इससे नहीं वास्ता

डॉ. महेश परिमल
पिछले 30 सालों से भोपाल में हूँ, साल में एक-दो बार छत्तीसगढ़ जाना हो ही जाता है। कई बार शादियों में भी जाना हुआ, पर यह देखकर आश्चर्य हुआ कि शादी में भी बफे सिस्टम पर आधुनिक भोजन सामग्री रखी हुई है। अपनी जन्मभूमि में आकर मैं तो छत्तीसगढ़ी व्यंजन की तलाश कर रहा था। पर यहां भी शहर संस्कृति हावी हो गई। अब कहाँ मिलेंगे, छत्तीसगढ़ के व्यंजन। जिनका नाम लेते ही मुँह में पानी भर आता है। फिर चाहे अरसा रोटी हो, अंगाकर हो, ठेठरी हो, खुर्मी हो और कुछ न भी मिले, तो कड़ी लाड़ू ही मिल जाए, वही बहुत है। पर कुछ नहीं मिलता, तो लगता है कि मैं अब छत्तीसगढ़ में नहीं हूँ शायद। अगर मैं किसी से कहूँ कि छत्तीसगढ़ में 30 प्रकार की भाजी मिलती है, तो किसी को विश्वास नहीं होगा, पर यह सच है। अभी उनके नाम लिखना संभव नहीं है, पर सच कहूं, वहां की भाजी में जो स्वाद है, वह आज के पिज्जा में कतई नहीं है। बर्गर में तो बिलकुल ही नहीं। 
छत्तीसगढ़ का मूल निवासी होने के कारण छत्तीसगढ़ी व्यंजनों की लज्जत से पूर्णत: वाकिफ हूं। तेज गर्मी में यदि सुबह बासी मिल जाए, तो दिन भर की तरावट का अहसास होता है, इसे वे ही जानते हैं, जिन्होंने कभी बासी का स्वाद लिया हो। ये तो खैर रोजमर्रा का भोजन है। इसके अलावा त्योहारों में बनने वाले व्यंजनों की लम्बी शृंखला है, जो गाहे-बगाहे खाने को मिल जाती है। मेरा मानना है कि यदि बाहर का कोई भी व्यक्ति छत्तीसगढ़ में किसी के घर यदि दाल-भात, रोटी के साथ मुनगा-आलू और बड़ी की सब्जी खा ले, तो उस स्वाद को वह जिंदगीभर नहीं भूल सकता। शादी के दौरान बनने वाले व्यंजनों में कई ऐसे हैं, जिनका स्वाद ता-उम्र बना रहता है। कड़ी लाड़ू के स्वाद का तो कहना ही क्या? इसके अलावा ठेठरी, खुरमी, अरसा रोटी, डूबकी कढ़ी, चीला, फरहा, चौसेला, गुलगुला, लाई-बरी, बिजौरी, तीखुर, सिंघाड़ा, करोली जैसे कई व्यंजन हैं, जिनके जायके को ग्रहण करने के लिए जीभ आज भी मचलती है। मेरा दावा है कि इन व्यंजनों के नाम पढ़ते हुए भी छत्तीसगढ़ियों के मुँह में पानी आ गया होगा।
खुशी इस बात का है कि छत्तीसगढ़ के इन व्यंजनों का स्वाद अन्य प्रांतों के लोगों को चखाने के लिए राज्य सरकार ने अब इसका विक्रय शुरू किया है। छत्तीसगढ़ पर केंद्रित मेलों जगार आदि में इन व्यंजनों का स्वाद चखने को मिल ही जाता है। अब शहर में भी कहीं-कहीं इस तरह के आइटम देखने को मिल रहे हैं। छत्तीसगढ़ की शालीन परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए सरकारी प्रयास नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं। इन व्यंजनों की उपलब्धता पर आज तक कोई ठोस प्रयास किए गए हों, ऐसा नहीं लगता। ऐसा भी नहीं है कि रायपुर-बिलासपुर में छत्तीसगढ़ व्यंजनों का स्वाद चखने के लिए कोई व्यवस्था ही नहीं की गई है। पर जो भी व्यवस्था की गई है, पर नाकाफी है। रायपुुर-बिलासपुर में इक्का-दुक्का दुकानों का पता चला। पर छत्तीसगढ़ में बाहर से आए लोगों के लिए यह नाकाफी है। सरकार को सोचना चाहिए कि जब यहां कोई परप्रांतीय आकर अपने साथ वहां के व्यंजनों की व्यवस्था कर लेता है, तो छत्तीसगढ़ में वहाँ के व्यंजनों की बिक्री के लिए कोई उपाय क्यों नहीं किए जा सकते?
यह सच है कि आज की पीढ़ी व्यंजनों की इस शालीन परंपराओं को सहेजकर रखना नहीं जानती। पर उन्हें इसके लिए प्रेरित तो करना ही होगा। आज वहां के कुछ मूल निवासी भी छत्तीसगढ़ी में बात करना अपनी तौहीन समझते हैं। अपनी इस भाषा का वे स्वयं ही आदर नहीं कर पा रहे हैं। वहाँ भी हिंदी मिश्रित अंग्रेजी हावी हो गई है। मीडिया भी इस परंपरा का निर्वाह कर रहा है। भाषा को सहेजने और उसे समझाने के कुछ प्रयास अखबारों में भी दिखाई देते हैं, पर व्यंजनों के संरक्षण के लिए क्या हो रहा है, यह बताने वाला कोई नहीं है। राजधानी रायपुर में रेल्वे स्टेशन से लेकर सुदूर मोतीनगर, शंकर नगर, मठपुरैना आदि स्थानों पर दिल्ली से आने वाले तमाम कथित भारतीय व्यंजनों का स्वाद चखाने वाले आइटम मिल जाएंगे, पर कहीं भी छत्तीसगढ़ी व्यंजन के दर्शन नहीं होते हैं। इसे आखिर क्या कहा जाए, विरासत का अंत या विरासत का पतन। आज की पीढ़ी छत्तीसगढ़ के व्यंजनों का नाम भी नहीं जानती होगी। क्योंकि इन्हें बचपन से ही इस तरह के व्यंजन मिले ही नहीं, वह भी फास्ट फूड खा-खाकर बड़ी हो रही है, तो फिर उसने यह अपेक्षा रखना बेकार है कि वह इन व्यंजनों का स्वाद सुदूर प्रांतों तक फैलाने के काम में अपना हाथ बँटाएगी।
आज सरकार छत्तीसगढ़ विकास के बारे में सोच रही है, यह अच्छी बात है। विकास हो भी रहा है। सरकार क्या ऐसा नहीं कर सकती कि सुबह के नाश्ते में बनने वाला व्यंजन चीला-चटनी का स्वाद हर किसी को मिल सके, इसके लिए चौराहों पर इसके स्टाल लगाने के लिए वहीं के लोगों को प्रेरित करे। ठेठरी-खुरमी जैसे व्यंजन तो सूखे होते हैं, इन्हें भी रखा ही जा सकता है। इसके अलावा कई आइटम ऐसे भी हैं, जो खराब भी नहीं होते और उनका स्वाद भी बना रहता है। मेरा यह लिखने का उद्देश्य केवल इतना ही है कि बाहरी लोग भी छत्तीसगढ़ के व्यंजनों का स्वाद लें और जब अपने घर जाएं, तो यहां के आइटम ले जाएं, ताकि उनके बच्चे भी इस तरह के व्यंजनों का स्वाद ले सकें। उन्हें छत्तीसगढ़ के व्यंजनों के नाम पर बच्चों से झूठ न बोलना पड़े। इसे लघु उद्योग की तरह भी व्यवस्थित किया जा सकता है। फाइव स्टार में ऐसी चीजें मिलने से रही, इसकी शुरुआत गुमटियों से ही होगी। इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
बचपन में इन व्यंजनों का स्वाद जो लगा है, उसे आज भी नहीं भुला हूं। वहां जाकर मेरी फरमाइश ही होती है कि छत्तीसगढ़ के कुछ व्यंजनों का स्वाद एक बार फिर ग्रहण कर सकूं। वहां के स्वाद की बात ही निराली है। दोपहर में नहाने के तुरंत बाद भोजन करना एक आल्हादकारी अनुभव है। तेज भूख होने पर वहां के मसालों एवं घर की मां-बहनों द्वारा आग्रह-पूर्वक परोसा जाना और फिर उस साधारण से भोजन का स्वाद ही न भूलने वाला होता है। आज गांव में यह परंपरा जारी होगी, पर शहर की भागम-भाग में वह शालीन परंपरा लुप्तप्राय है। अब तो शादी के दौरान भी इस तरह के व्यंजन लुप्त होने लगे हैं। छत्तीसगढ़ जाकर जब इन हालात का सामना करना होता है, तो दु:ख होना स्वाभाविक है। पर क्या किया जा सकता है? मेरा आग्रह यही है कि इसकी शुरुआत छत्तीसगढ़वासियों से ही होनी चाहिए। वे इस दिशा में एक कदम आगे बढ़ेंगे, तो सरकार आगे आकर दस कदम आगे खींच लेगी। आवश्यकता है केवल एक कदम बढ़ाने की…….।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 16 मार्च 2019

जब दु:ख का अंधेरा सघन हो जाए






जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 15 मार्च 2019 को प्रकाशित

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2018

ऐसे सुलझाएँ ‘की’ और ‘कि’ की उलझन

ऐसे सुलझाएँ ‘की’ और ‘कि’ की उलझन
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हाल के दिनों में बहुत-से मित्रों से सुना है कि उन्हें ‘की’ और ‘कि’ के बीच उलझन होती है। यह एक अच्छी बात है। समस्या होना अच्छी बात नहीं है, उसे स्वीकार करना अच्छी बात है। समस्या को स्वीकार करना समाधान का पहला चरण है। यानी आपको पता चल गया है कि समस्या है।

समाधान के लिए मैं कुछ जानकारियाँ दे रहा हूँ। यह पोस्ट किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य करके नहीं लिखी गई है, बल्कि सीखने के इच्छुक सभी मित्रों के लिए है। इन जानकारियों को ध्यान में रखेंगे, तो उलझन नहीं होगी। हो सकता है कि पहले ड्राफ़्ट में कि की जगह की हो जाए, पर जब आप अपने लिखे को दुबारा पढ़ेंगे, तो ख़ुद ही अपनी ग़लतियाँ पकड़ लेंगे।   

'कि' एक संयोजक शब्द है। इसका प्रयोग दो वाक्यों या वाक्यांशों को जोड़ने के लिए होता है। जैसे- मेरा कहना है कि यह सरल है। यहाँ दो वाक्यांश हैं- ‘मेरा कहना है’ और ‘यह सरल है’, जिन्हें कि के ज़रिए जोड़ा गया है। 'कि' का प्रयोग आमतौर पर क्रिया के बाद होता है। मसलन- कहना, मानना, सोचना आदि। आसानी के लिए आप यह मान सकते हैं कि पहले वाक्य को यदि प्रश्न में बदल दिया जाए, तो उत्तर के पहले ‘कि’ आएगा- मेरा मानना है (मेरा क्या मानना है?) कि यह सरल है।

'कि' का प्रयोग ‘या’ की जगह भी होता है। तुम रोटी खाओगे कि भात? आपको गणित पसंद है कि विज्ञान?

दूसरी तरफ़, 'की' का प्रयोग संज्ञा या सर्वनाम के बाद आने वाले शब्द से सम्बंध जोड़ने के लिए किया जाता है- राहुल ‘की’ पुस्तक, ज्ञान ‘की’ बात, रीना ‘की’ सहेली, उस ‘की’ क़लम। आसानी के लिए आप मान सकते हैं कि दो वाक्यों या वाक्यांशों को ‘कि’ जोड़ता है और दो शब्दों को ‘की’ जोड़ता है।

ध्यान रहे कि 'की' के बाद स्त्रीलिंग शब्द आता है। यदि बाद वाला शब्द पुलिंग है, तो 'का' का प्रयोग होगा- रमा का बस्ता

विवेक गुप्ता

सोमवार, 8 अक्तूबर 2018

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

सोमवार, 3 सितंबर 2018

शुक्रवार, 24 अगस्त 2018

सुधार की राह




जनसत्ता में 23 अगस्त 2018 को प्रकाशित



दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित



शनिवार, 11 अगस्त 2018

मिठास-खटास-तीखास का समन्वय है पानी-पूरी



 दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 10 अगस्त 2018 को प्रकाशित आलेख



दैनिक लोकोत्तर में 11 अगस्त 2018 को प्रकाशित आलेख

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