शनिवार, 9 जनवरी 2010

भारतीय संगीत को सात समुंदर पार ले जाने वाले रहमान


भारतीय सिनेमा जगत मे ए आर रहमान को सर्वाधिक प्रयोगवादी और प्रतिभाशाली संगीतकार में शुमार किया जाता है। उन्होंने भारतीय सिनेमा संगीत को अंतराष्ट्रीय स्तर पर विशेष पहचान दिलाई है। छह जनवरी १९६७ को तमिलनाडु में जन्में रहमान का रूझान बचपन के दिनो से हीं संगीत की ओर था। उनके पिता आर के शेखर मलयालम फिल्मों के लिए संगीत दिया करते थे। रहमान भी अपने पिता की तरह ही संगीतकार बनना ाहते थे। संगीत के प्रति रहमान के बढ़ते रूझान को देख उनके पिता ने उन्हे इस राह पर चलने के लिए प्रेरित किया और उन्हें संगीत की शिक्षा देने लगे । ङ्क्षसथेसाइजर और हारमोनियम पर संगीत का रियाज करने वाले रहमान की की बोर्ड पर उंगलियां ऐसा कमाल करती तो सुनने वाले मुग्ध रह जाते कि इतना छोटा बच्चा इतनी मधुर धुन कैसे बना सकता है। उस समय रहमान की उम्र महज छह वर्ष की थी। एक बार उनके घर में उनके पिता के एक मित्र आए और जब उन्होंने रहमान की बनाई धुन सुनी तो सहसा उन्हे विश्वास नही हुआ उनकी परीक्षा लेने के लिए उन्होंने हारमोनियम के ऊपर कपड़ा रख दिया और रहमान से धुन निकालने के लिए कहा। हारमोनियम पर रखे कपड़े के बावजूद रहमान की उंगलियां बोर्ड पर थिरक उठी और उस धुन को सुन वह चकित रह गए।कुछ दिनो के बाद रहमान ने एक बैंड की नींव रखी जिसका नाम था नेमेसीस एवेन्यू वह इस बैंड में ङ्क्षसथेनाइजर पियानो गिटार और हारमोनियम आदि बजाते थे। अपने संगीत के शुरूआती दौर से ही रहमान को ङ्क्षसथेनाइजर ज्यादा अच्छा लगता था । उनका मानना था कि वह एक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसमें संगीत और तकनीक का बेजोड़ मेल देखने को मिलता है। रहमान अभी संगीत सीख हीं रहे थे तो उनके सर से पिता का साया उठ गया लेकिन रहमान ने हिम्मत नही हारी और संगीत का रियाज जारी रखा। इस बीच रहमान ने मास्टर धनराज से संगीत की शिक्षा हासिल की और दक्षिण फिल्मों के प्रसिद्ध संगीतकार इलैय राजा के समूह के लिए की बोर्ड बजाना शुरू कर दिया उस समय रहमान की उम्र महज ।१ वर्ष थी। इस दौरान रहमान ने कई बड़े एवं नामी संगीतकारों के साथ काम किया इसके बाद रहमान को लंदन के ट्रिनिटी कालेज आफ म्यूजिक में कालरशिप का मौका मिला जहां से उन्होंने वेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक में स्नातक की डिग्री भी हासिल की। स्नातक की डिग्री लेने के बाद रहमान घर आ गए और उन्होंने अपने घर में हीं एक म्यूजिक स्टूडियों खोला और उसका नाम पंचाथम रिकार्ड इन रखा । इस दौरान रहमान लगभग एक साल तक फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करते रहे और टीवी के लिए संगीत देने और ङ्क्षजगल बनाने का काम करते रहे। वर्ष १९९२ रहमान के सिने कैरियर का महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ। अचानक उनकी मुलाकात फिल्म निर्देशक मणि रत्नम से हुई। मणि उन दिनो फिल्म रोजा के निर्माण में व्यस्त थे और अपनी फिल्म के लिए संगीतकार की तलाश में थे। उन्होंने रहमान को अपनी फिल्म में संगीत देने की पेशकश की । कश्मीर आतंकवाद के विषय पर आधारित इस फिल्म में रहमान ने अपने सुपरहिट संगीत से श्रोताओं का दिल जीत लिया और इसके साथ हीं वह सर्वŸोष्ठ संगीतकार के राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए। इसके बाद रहमान ने पीछे मुड़कर क भी नहीं देखा और फिल्मों में अपने एक से बढकर एक एवं बेमिसाल संगीत से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद रहमान ने तिरूड़ा तिरूड़ा बांबे जैंटलमेैन इंडियन और कादलन आदि फिल्मों में भी सुपरहिट संगीत दिया और संगीत जगत में अपनी अलग पहचान बना ली । रहमान ने कर्नाटक संगीत शाीय संगीत और आधुनिक संगीत का मिश्रणकर श्रोताओं को एक अलग संगीत देने का प्रयास किया। अपनी इन्हीं खूबियों के कारण वह श्रोताओं में बहुत लोकप्रिय हो गए। इसके बाद रहमान निर्माता निर्देशको की पहली पसंद बन गए और वे रहमान को अपनी फिल्म में संगीत देने के लिए पेशकश करने लगे। लेकिन रहमान ने केवल उन्हीं फिल्मों के लिए संगीत दिया जिनके लिए उन्हें महसूस हुआ कि हां इसमें कुछ बात है । वर्ष १९९७ में भारतीय स्वतंत्रता की ५० वीं वर्षगांठ पर उन्होंने स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर के साथ मिलकर वंदे मातरम यानी मां तुझे सलाम का निर्माण किया । इसके बाद वर्ष १९९९ में रहमान ने कॉरियोग्राफर शोभना प्रभुदेवा और उनके डांङ्क्षसग समूह के साथ मिलकर माइकल जैक्सन के माइकल जैक्सन एंड फ्रैंडस टूर के लिए म्युनिख जर्मनी में कार्यक्रम पेश किया। इसके बाद रहमान को म्यूजिक कान्सर्ट में भाग लेने के लिए विदेशो से भी प्रस्ताव आने लगे। उन्होंने पाश्चात्य संगीत के साथ साथ भारतीय शाीय संगीत के मिश्रण को लोगों के सामने रखना शुरू कर दिया था। ए आर रहमान को बतौर संगीतकार अब तक आठ बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है । वर्ष १९९५ में प्रदॢशत फिल्म रंगीला के लिए सबसे पहले उन्हें बतौर संगीतकार का फिल्म फेयर पुरस्कार दिया गया ।इसके बाद वर्ष १९९८ में फिल्म दिल से वर्ष १९९९ में फिल्म ताल वर्ष २००० में फिल्म लगान वर्ष २००२ में फिल्म साथिया वर्ष २००६ में रंग दे बसंती वर्ष २००७ में फिल्म गुरू और वर्ष २००८ में जाने तू या जाने ना के लिए भी सर्वŸोष्ठ संगीतकार के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। इन सबके साथ ही अपने उत्कृठ संगीत के लिए ए आर रहमान को चार बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उन्हें पद्यश्री से भी नवाजा जा चुका है। वर्ष १९९५ में उन्हें संगीत में योगदान के लिए मलेशियन अवार्ड भी मिल चुका है।इन सबके साथ ही विश्व संगीत में महत्वपूर्ण योगदान के लिए वर्ष २००६ में उन्हें स्टैनफोर्ड यूनिवॢसटी में सम्मानित किया गया । रहमान के सिने कैरियर में एक नया अध्याय उस समय जुड़ गया जब ए आर रहमान ने फिल्म स्लमडाग मिलिनेयर के लिए दो आस्कर पुरस्कार जीतकर नया इतिहास रच दिया। रहमान को ८१वें एकादमी अवार्ड समारोह में इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
रहमान के सुपरहिट संगीतबद्ध गीतों में कुछ है रोजा जाने मन, रोजा, १९९२ तन्हा तन्हा यहां जीना, रंगीला १९९५, चल छइयां छइयां, दिल से १९९८, ताल से ताल मिला, ताल १९९९, के सरा सरा, पुकार २०००, पिया हाजी अली, फिजा २०००, मेहदी है रचने वाली, जुबैदा २०००, सुन मितवा, राधा कैसे ना जले, लगान २००१, चलो चले मितवा, नायक २००१, ओ हम दम सुनियो रे, साथिया २००२, ये तारा वो तारा ्स्वदेश २००४, खलबली है खलबली, रंग दे बसंती २००६, बरसो रे मेघा मेघा, गुरू २००७, है गुजारिश, गजनी २००८, मसकली मसकली दिल्ली ६ २००९ आदि ।

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