मंगलवार, 22 जून 2010

गरीब देश के करोड़पति सांसद!

डॉ. महेश परिमल
राज्यसभा में पहुँचने वाले 49 नए सांसदों में 38 करोड़पति हैं। महिला आरक्षण की बात करने वाले तमाम दल की बातें बेमानी निकलीं, क्योंकि राज्यसभा में केवल तीन महिलाएँ ही पहुँच पाई हैं। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इन सांसदों में 28 प्रतिशत सांसद कई अपराधों में लिप्त हैं। इससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि यूबी इंडस्ट्रीज के मालिक विजय माल्या की संपत्ति 615 करोड़ रुपए है, किंतु अभी तक उनका अपना कोई मकान नहीं है और न ही कोई स्थायी संपत्ति। दूसरे क्रम में 189.6 करोड़ की संपत्ति वाले टीडीपी के वाय. सत्यनारायण चौधरी हैं, तीसरे स्थान पर हैं झारखंड के जेएमएम के कँवरदीप सिंह, इनके पास 82.6 करोड़ रुपए हैं। इन सांसदों में कांग्रेस के धीरज प्रसाद साहू और सपा के राशि मसूद करोड़पति होने के बाद भी उनके पास पेन नम्बर नहीं है। ये हाल हैं हमारे सांसदों के।
ऐसी बात नहीं है कि ये सांसद केवल करोड़पति ही हैं। एनजीओ नेशनल इलेक्शन वांच द्वारा इनके शपथपत्र का जो विश्लेषण किया गया, उसमें पता चला कि 54 सांसदों में से 15 सांसद यानी 28 प्रतिशत सांसदों के खिलाफ हत्या का प्रयास, अपहरण और ठगी के मामले अदालत में चल रहे हैं। इसमें कांग्रेस के 16 में से 3, भाजपा के 11 में से 2, बसपा के 7 में से 1 और एनसीपी के दो सांसदों का समावेश है।
एक रुपए में दो कप चाय या कॉफी, मसाला दोसा दो रुपए में, एक रुपए में मिल्क शेक, शाकाहारी भोजन मात्र 11 रुपए में और शाही मांसाहारी भोजन मात्र 36 रुपए में। आप सोच रहे होंगे, ये किस जमाने की बात हो रही है। पर सच मानो यह आज की बात है, हमारे सांसदों को यह सुविधा हमारी सरकार दे रही है। संसद में उनके लिए इतना सस्ता भोजन भी उन्हें वहाँ जाने के लिए विवश नहीं करता। एक गरीब देश के सांसद होने के क्या-क्या सुख हैं, ये शायद आम आदमी नहीं जानता। लेकिन यह सच है कि जनता के इस प्रतिनिधि को वे सारी सुविधाएँ प्राप्त हैं, जिसके लिए एक आम आदमी जीवन भर संघर्ष करता रहता है, लेकिन उस स्तर तक नहीं पहुँच पाता। हमारे सांसद इसे आसानी से सेवा भाव के नाम पर प्राप्त कर लेते हैं।
आज से चालीस साल पहले तक सांसद होना यानी सेवा भाव का दूसरा नाम था। पर आज ये एक फायदे का सौदा हो गया है। एक सांसद अपने जीवन में ही इतना कमा लेता है कि उसके परिवार के किसी भी सदस्य को काम की आवश्यकता नहीं पड़ती। सेवा के नाम पर होने वाले इस धंधे ने भारतीय अर्थव्यवस्था की चूलें हिलाकर रख दी हैं, पर हमारे सांसद दिनों-दिन करोड़पति होते जा रहे हैं और आम आदमी को रोटी जुटाने के लाले पड़ रहे हैं.
वत्र्तमान में सांसद होना एक बहुत बड़ फायदे का सौदा है, इसका भविष्य काफी उज्‍जवल है। भारतीय सांसदों पर श्रेष्ठ काम करने का दबाव नहीं होता, उनके काम का वार्षिक मूल्यांकन भी नहीं होता। केवल चुनाव के समय ही उनकी जवाबदारी बढ़ जाती है, उनका एक ही उद्देश्य होता है कि किसी तरह संसद तक पहुँच जाएँ, फिर तो उनके पौ-बारह हो जाते हैं। उनकी तमाम सुविधाओं पर किसी तरह का अंकुश नहीं है। उन्हें दी जाने वाली सुविधाएँ सुरसा के मुँह की तरह बढ़ रही हैं। टैक्स के नाम पर उनसे केवल मासिक वेतन पर ही कुछ कटौती होती है, शेष अन्य सुविधाओं और भत्तों को जोड़ा ही नहीं जा रहा है। इसके बाद भी इस गरीब देश के करोड़पति सांसदों को इतने से ही संतोष नहीं हुआ है, उनके वेतन एवं अन्य भत्तों पर लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही है।
हमारे देश की 36 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा के नीचे जी रही है। ये नागरिक अपने और देश के उद्धार के लिए जिन सांसदों को चुन कर संसद में भेजते हैं, वे वहाँ जनता की भलाई के नाम पर लड़ाई-झगड़ा, गाली-गलौच आदि करते हुए भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं, कई सांसदों को तो रिश्वत लेते हुए भी देश के लाखों नागरिकों ने भी देखा है। इतना सब कुछ होते हुए भी इस बार फिर उनके वेतन और भत्तों में वृद्धि करने वाला विधेयक चुपचाप पारित हो गया। इसका जरा-सा भी विरोध नहीं हुआ। अभी तक हमारे ये जनप्रतिनिधि 40 हजार रुपए वेतन एवं अन्य भत्ते प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन अब उनका वेतन बढ़कर 65 हजार के आसपास पहुँच जाएगा। इससे हमारे देश की जनता पर 62 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ बढ़ जाएगा।
अब समय आ गया है कि सरकार से यह पूछा जाए कि आखिर सांसदों को किसलिए इतनी सुविधाएँ मिलती हैं? आखिर ये काम क्या करते हैं? अगर इनसे यह कहा जाए कि इन्हें वेतन और सुविधाएं नहीं मिलेंगी, तो भी वे सांसद बने रहना पसंद करेंगे। वजह साफ है, आज सांसद होना सेवा भाव न होकर एक पेशा हो गया है। जिसमें जावक कुछ भी नहीं केवल आवक ही आवक है। ये जनता के प्रतिनिध चुनाव के पहले तक ही होते हैं, चुनाव जीतने के बाद ये केवल पार्टी और कुछ रसूखदारों के नुमाइंदे बनकर रह जाते हैं। आखिर हमारे पास वह ताकत कब आएगी, जिसके बल पर हमने उन्हें सांसद भेजा है, उसी बल पर हम उन्हें वापस बुला भी सकें। क्या राम मनोहर लोहिया का यह सपना कभी पूरा होगा?
डॉ. महेश परिमल

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