शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

चिंतित सरकार की दुविधा: बिल कैसे पास हों?


डॉ. महेश परिमल
सीमा पर पाक की नापाक हरकतें जारी हैं। ऐसे में हमारे रक्षा मंत्री ऐसा बयान दे रहे हैं, जिससे पाकिस्तान को शह मिलती है। जब संसद का मानसून सत्र चल रहा है, तब पाकिस्तान ने हमारी तमाम कमजोरियों को जानते-समझते हुए हमें यह चुनौती दी है कि जो कुछ करना चाहो, कर लो। हम हैं कि केवल बयानबाजी ही कर रहे हैं। एक तरह से यह कोशिश भी की जा रही है कि पाकिस्तान के साथ सचिव स्तर ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री स्तर की भी चर्चा होती रहनी चाहिए। अब हालात बदल गए हैं, जब से नवाज शरीफ ने सत्ता संभाली है, तब से सीमा पर गतिविधियां बढ़ गई है। सरकार की यही चिंता काफी नहीं है, मानसून सत्र 15 दिनों का है, 5 दिन गुजर चुके हैं, अब केवल दस दिन ही बचे हैं, ऐसे में बहुत से महत्वपूर्ण विधेयक हैं, जिन्हें पारित कराना है। पर यह हो नहीं पा रहा है। सरकार को इस बात की खुशी है कि सचिन तेंदुलकर ने पहली बार संसद की कार्यवाही में भाग लिया, पर इस बात की चिंता नहीं है कि देश की जनता के हित में जो महत्वपूर्ण बिल हैं, उसे किस तरह से पारित कराया जाए।
पाकिस्तान की हरकतों से एंटी इंकमबंसी में वृद्धि हुई है। यह सच है, पर यह भी सच है कि सरकार अब लोकसभा में अल्पसंख्यक हो गई है। सपा-बसपा की बैसाखी पर टिकी यह सरकार अब उसके ही निर्णयों पर ऊंगली उठा रही है। ये दोनों दल अब सरकार की नाक दबाने का ही काम कर रहे हैं। इन पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता। सरकार को समर्थन देने के कारण ये दोनों दल अपना ही उल्लू सीधा करने में लगे हैं। जनता के हितों से इनका कोई वास्ता नहीं रहा। मुलायम के जो कठोर तेवर इस बार देखने को मिले, उसके आगे सरकार झुकती ही नजर आ रही है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि किस तरह से 114 बिल इस सत्र में पारित कराएं जाएं? इतने कम दिनों में इतने बिल किसी भी स्थिति में पारित नहीं कराए जा सकते। जब मानसून सत्र शुरू हुआ था, उसके पहले संसदीय मंत्री ने विपक्ष के नेताओं के साथ बैठक की थी। मामला यह था कि संसद के सत्र को चलने देने के लिए शालीनतापूर्वक काम किया जाए। अनावश्यक बाधाएं खड़ी न की जाए। कुल मिलाकर संसद की गरिमा को बनाए रखने की कोशिश की जाए। पर विपक्ष द्वारा दागे गए कई सवालों का जवाब सरकार के पास नहीं है। जैसे खाद्य सुरक्षा बिल पर जो विवाद है, उसे खत्म करने के लिए सरकार को अध्यादेश लाना पड़ा था। अब सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले दोनों स्वार्थी दलो में से एक उसका विरोध कर रहा है। उधर तेलंगाना नाम भी उसके गले में फंस गया है। सरकार इसे न तो निगल पा रही है और न ही उगल पा रही है। इस पर सरकार की छटपटाहट साफ दिखाई दे रही है।
इस मानसून सत्र में सरकार कितने विधेयक पारित करवा सकती है, इस पर सबकी नजर है। इन विधेयकों को पारित कराने के लिए विपक्ष के समर्थन की आवश्यकता होगी। या फिर सरकार के पास पर्याप्त बहुमत होना चाहिए। अभी तो सरकार इन दोनों से ही वंचित है। उसे  न तो विपक्ष का सहयोग मिल रहा है, न ही समर्थन देने वाले दल से उसके संबंध अच्छे हैं। 2012 में सरकार ने 32 बिल पास कराए थे। 2013 में अब तक केवल 13 बिल ही पास हो पाए हैं। इसके मुकाबले 2005 में 56 और 2006 में 64 किल पास हुए थे। यूपीए केंद्र सरकार महत्वपूर्ण पेंडिंग बिल संसद में पास कराने में सक्षम नहीं है, क्योंकि सरकार के पास पर्याप्त बहुमत नहीं है। लोकसभा में सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले सपा-बसपा पूरी तरह से अविश्वसनीय हैं। ये दल समर्थन की कीमत भी वसूलते हैं। सरकार को इस बात का डर हमेशा सताता है कि यदि किसी विधेयक पर मतदान की नौबत आ जाए, तो सबसे पहले सपा ही इस अवसर का पूरा लाभ उठाएगी। जो महत्वपूर्ण पेंडिंग बिल हैं, उसमें से लैंड एक्जीविजनऔर रि-सेटलमेंट बिल का भी समावेश होता है। यदि यह बिल पारित हो जाता है, तो गांवों में किसानों को उनकी जमीन का अधिक मुआवजा मिलेगा। किसी भी सरकारी प्रोजेक्ट में लैड एक्जीविजन करने की बात आती है, तो किसानों को अधिक से अधिक मुआवजा मिले, ऐसी सुविधाएं देने वाला यह विधेयक है। पर सरकार इस बात का प्रचार नहीं कर पाई और न ही विपक्ष को यह समझा पाई कि इससे किसानों का ही भला होगा। पर विपक्ष भी यह बखूबी जानता है कि यह बिल अभी इसीलिए लाया गया है कि आगामी चुनावों में इसका लाभ उठाया जाए। यही हाल सरकार की महत्वाकांक्षी विधेयक खाद्य सुरक्षा बिल का है। सरकार की नीयत यही है कि इसका लाभ चुनावों में लिया जा सके। इस विधेयक पर विपक्ष को कई आपत्ति है, पर सरकार के पास उसका कोई जवाब नहीं है। इस विधेयक के पीछे यही उद्देश्य है कि देश के किसी भी भाग को अब कोई भी भूखा नहीं सोएगा। पर सरकार को इस बिल को अभी लाने की क्या आवश्यकता थी। यह तो सरकार बनते ही आ जाना था। पर सरकार की नीयत में खोट है, इसलिए विपक्ष इसका भरपूर फायदा उठा रहा है।
इस समय आईएसआई दुर्गा शक्ति का मामला सुर्खियों में है। इसमें माइनिंग सिस्टम जवाबदार है। उत्तर प्रदेश सरकार  द्वारा दुर्गा शक्ति को सस्पेंड करने के पीछे रेत की हेराफेरी ही है। रेत माफिया के आगे अखिलेश सरकार पूरी तरह से नतमस्तक है। इसलिए दुर्गा शक्ेित को आगे करके उसे सस्पेंड कर दिया गया। माइंस एंड मिनरल्स बिल-2011 को सरकार पारित करवाना चाहती है। यदि यह बिल पारित हो गया, तो कोलगेट जैसे घोटाले भविष्य में नहीं होंगे, ऐसा विश्वास किया जा सकता है। पेंशन फंड एंड रेग्युलेटरी एंड डेवलपमेंट अथारिटी बिल पेंशन पाने वाले कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण है। नई पेंशन प्रणाली के लिए यह उपयोगी है। नेशनल कंपनी लो ट्रिब्यूनल खड़े करने के लिए दरवाजा खोल देने वाले बिल की कापरेरेट कंपनियां आतुरता से राह देख रही हैं। 1956 में लॉ बिल बना था, आज 6 लाख 50 हजार कंपनियां पंजीकृत हैं। इन कंपनियों के लिए ये बिल महत्वपूर्ण है। इसके अलावा व्हीसल ब्लोअर प्रोटेक्शन बिल की आज विशेष रूप से आवश्यकता है। लोग यदि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते हैं,तो उनका संरक्षण होना चाहिए, यह बिल उन्हीं के संरक्षण के लिए है। भ्रष्टाचार का विरोध करने वाली सरकार और विपक्ष दोनों ही चाहते हैं कि यह बिल पारित हो जाए, पर यह पारित क्यों नहीं हो पा रहा है, यह एक विचारणीय प्रश्न है।
मानसून सत्र के अब कुछ ही दिन शेष हैं। सरकार के सामने यह सारे विधेयक एक चुनौती के समान हैं। सरकार इस सत्र में सप्लीमेंट्री ग्रांट्स पास करवाएगी। खाद्य सुरक्षा विधेयक पर जारी अध्यादेश पर सरकार मंजूरी प्राप्त कर लेगी, इसमें शक है। सरकार तो क्या, यह किसी के लिए भी संभव ही नहीं है। सरकार यदि यह समझ रही है कि सपा-बसपा उन्हें सही समय पर साथ देंगे, तो यह उसकी भूल है। उन्हें अपने समर्थन की कीमत वसूलना अच्छी तरह से आता है। इसलिए उन पर अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता। सरकार के फ्लोर मैनेजर 116 में से 63 विधेयक पारित कराने के लिए कृतसंकल्प है। इससे यूपीए सरकार की छवि सुधरेगी, ऐसा माना जा रहा है, ताकि 2014 के चुनाव में अपनी छवि के अनुकूल वोट हासिल कर सके। सरकार यदि यह मानती है कि यह विधेयक वास्तव में जनहितकारी हैं, तो इन पर पहले ही चर्चा करवा लेनी थी, विपक्ष का विश्वास प्राप्त कर लेना था, पर सरकार की नीयत में खोट है, इसलिए वह बार-बार विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दे पाती है और कमजोर साबित होती है। सरकार की इसी कमजोरी का लाभ सपा-बसपा और विपक्ष उठा रहा है। केंद्र की चिंतित सरकार के सामने आज सबसे बड़ी दुविधा यही है कि ये बिल कैसे पास हों?
    डॉ. महेश परिमल

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