सोमवार, 26 अगस्त 2013

नाकाम सरकार की नाकामियां

डॉ. महेश परिमल
डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार गिर रहा है। इसी के साथ ही गिर रही है संसद की गरिमा, नेताओं का चरित्र। अब तक कोई भी सरकार  इतनी लाचार कभी नजर नहीं आई कि सुप्रीमकोर्ट के आदेश को तोड़-मरोड़कर इस्तेमाल में लाएं। कहां तो यह तय होने वाला था कि अब दागी सांसद चुनाव नहीं लड़ पाएंगे, और अब यह तय हो रहा है कि दोषी करार दिए गए सांसद चुनाव लड़ने के लिए अपात्र नहीं माने जाएंगे, यही नहीं वे जेल से भी चुनाव लड़ सकेंगे। क्या कोई सरकार स्वयं को बचाए रखने के लिए इतने आगे तक जा सकती है? इस तरह के मामले में सभी दल एक हो भी जाते हैं। बाकी मामलों में भले ही संसद न चल पाए, इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
रुपए के मामले में इतना ही कहा जा सकता है कि हमारे नीति नियंताओं को यह सूझ ही नहीं रहा है कि रुपए को किस तरह से संभाला जाए। शायद वे इसके लिए तैयार ही नहीं थे। चिंता इस बात की है कि हमारे देश के प्रधानमंत्री विश्व के सबसे अधिक पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री हैं, बल्कि वे एक सिद्धहस्त अर्थशास्त्री भी हैं। वे रिजर्व बैंक के गवर्नर भी रह चुके हैं। पर इस समय वे इतने अधिक विवश हैं कि उन्हें पता ही नहीं कि रुपया की कीमत लगातार गिर रही है, इसे रोकना आवश्यक है। यदि रुपए की ेगिरती कीमत पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो हालात बहुत ही खराब हो जाएंगे। विदेशी निवेशकों का विश्वास टूटता जा रहा है। निश्चित रूप से कुछ दिनों बाद ही पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी होगी। महंगाई बढ़ेगी, सरकार के खिलाफ माहौल बनने लगेगा। इसका पूरा लाभ विपक्ष उठाएगा। यानी सरकार की सभी मोर्चो पर नाकामयाबी का ढिंढोरा पीटा जाएगा। नाकाम सरकार की नाकामयाबियों का जोरदार प्रचार-प्रसार होगा।
इस स्थिति से बचने के लिए सरकार यदि शीघ्र ही आम चुनाव की घोषणा कर दे, तो कुछ इज्जत बची रह सकती है। क्योंकि संसद का मानसून सत्र पूरा चल पाएगा, इसमें शक है। देश का समय और धन बेकार जाए, इससे अच्छा यही है कि चुनाव की घोषणा हो ही जाए। ताकि भविष्य की नाकामयाबियों से सरकार अपना पल्ला झाड़ सके। खाद्य सुरक्षा विधेयक पर सरकार की खोटी नीयत सामने आ ही गई। यदि सरकार को गरीबों की इतनी ही चिंता है, तो पूरे 9 साल तक क्यों सोती रही, ठीक चुनाव के पहले इसे लागू कराने का मतलब साफ है कि यह वोट की राजनीति के कारण किया जा रहा है। इसके अलावा यह बात है कि अब तक सरकारी राशन दुकानों के माध्यम से गरीबों को जो अनाज बांटा जा रहा है, उस पर 90 हजार करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं, इसके बाद भी पूरा राशन कालाबाजारी मे जा रहा है, इससे कोई इंकार नहीं कर सकता। यदि विधेयक लागू हो जाता है, तो इस पर सवा लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। अब तक कुपोषण पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका, तो इसकी क्या गारंटी है कि 35 हजार करोड़ रुपए और खर्च करकेगरीबों को भोजन दिला पाने में यह सरकार सक्षम हो पाएगी? सरकार यह समझ नहीं पा रही है कि सारी समस्याओं का समाधान खाद्य सुरक्षा विधेयक ही है। सरकार समझती है कि इससे ही देश की तमाम समस्याएं हल हो जाएंगी, बल्कि इससे समस्याएं और अधिक विकराल हो जाएंगी, यह सरकार समझ नहीं पा रही है।
सबसे बड़ी बात यह है कि देश के हालात के बारे में आज जो एक साधारण मानव जानता है, एक आम आदमी जानता है, उतना हमारे प्रधानमंत्री नहीं जानते। उन्हें शायद कुछ भी नहीं पता। या फिर पता न होने का बहाना कर रहे हैं। संभव है वे देश पर आसन्न संकट को समझ चुके हों, पर न समझ पाने की विवशता उनके साथ हो।
हर दिन सामने आ रही रुपये की रिकार्ड तोड़ गिरावट और कई उपायों के बावजूद उसे संभालने में मिल रही नाकामी से यही स्पष्ट हो रहा है कि हमारे नीति-नियंताओं को कुछ सूझ नहीं रहा है। चिंता की बात यह है कि वे अन्य आर्थिक समस्याओं के समाधान में भी नाकाम दिख रहे हैं। इसके कहीं कोई आसार नहीं दिख रहे कि केंद्र सरकार निवेशकों का भरोसा जीत पाने में सफल होगी। जिस तरह विदेशी के साथ देशी निवेशक भी सरकार पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं उसे देखते हुए तो यही लगता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की समस्याएं और गंभीर रूप लेने वाली हैं। इन स्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि सरकार अपना और साथ ही देश का समय बर्बाद करने के बजाय शीघ्र आम चुनाव कराने के बारे में सोचे। शीघ्र आम चुनाव कराने के बारे में इसलिए भी विचार किया जाना चाहिए, क्योंकि संसद के मोर्चे पर भी सरकार नाकामी का ही सामना कर रही है। संसद का मानसून सत्र जिस तरह आगे बढ़ रहा है उसे देखते हुए यह लगभग तय है कि एक और सत्र अनुत्पादक साबित होने जा रहा है। अब इस सत्र में सरकार किसी तरह खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित कराने में सफल भी हो जाती है तो इससे देश के भले की उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए नहीं की जा सकती, क्योंकि यह शुद्ध चुनावी पहल है और यह किसी से छिपा नहीं कि मौजूदा स्थिति में खाद्य सुरक्षा कानून अर्थव्यवस्था की समस्याओं को और बढ़ाएगा ही। नाकामयाबियों के बोझ तले दबी सरकार कुछ नहीं कर सकती। उसकी विश्वसनीयता लगातार घट रही है। रोज नए घोटालों ने सरकार की कलई खोल दी है। अब कोयला आवंटन से संबंधित फाइलों का मामला सामने आ गया है। वे फाइलें कहां गई, किसने उसे पार कर दिया, किसी को नहीं मालूम। प्रधानमंत्री कार्यालय को भी नहीं, क्योंकि फाइलें वहीं से गुम हो गई हैं। इस पर प्रधानमंत्री के बयान के बाद भी स्थिति स्पष्ट होगी, यह नहीं कहा जा सकता। सरकार लगातार अवश्विसनीय होते जा रही है। आम जनता के कई सवालों के जवाब उसके पास नहीं है। अब तो लोग प्रधानमंत्री को भी कई मामलों में दोषी मान रहे हैं। उनके ईमानदार होने के कितने भी दावे किए जाएं, पर लोगों को भरोसा ही नहीं हो पा रहा है कि वे पूर्णत: ईमानदार हैं।
इतनी विवश, लाचार और पंगु सरकार अब तक किसी ने देखी और न ही इस पर किसी ने सोचा। विशेषज्ञ कहते हैं कि महंगाई पर नियंत्रण नहीं रखा जा सकता। हालात अभी और भी बेकाबू होंगे। ऐसे में सरकार यदि हाथ पर हाथ धरे बैठी रहे, तो उस सरकार से क्या अपेक्षा की जाए? ऐसी सरकार का चले जाना ही बेहतर। अब सरकार के सामने आम चुनाव ही सबसे बेहतर विकल्प है। इसके सिवाय उसके पास कोई चारा ही नहीं है। सरकार की इस नीयत को बनाए रखने में हमारे सांसद में किसी से कम नहीं हैं। संसद की गरिमा को ताक पर रखकर वे भले ही आचार संहिता की बात करते रहे, पर एक सांसद का कर्तव्य किसी को याद नहीं है। हां अधिकार के लिए हर कोई लड़ता नजर आ रहा है। ऐसे में किसी से भी कुछ अपेक्षा नहीं की जा सकती। आज आम आदमी के साथ साथ मध्यम वर्ग भी बेबस नजर आ रहा है। ऐसे में सरकार यदि अपने लिए वोट मांगे, तो वह किस मुंह से वोट मांगेगी, क्या उपलब्धि बताकर वोट मांगेगी। विपक्ष के पास सरकार की नाकामयाबियों का खुला चिट्ठा है। आखिर सरकार सच से कब तक भागेगी?
  डॉ. महेश परिमल

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