शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

विश्व फलक पर चमकते भारतीय हीरे

  भारत के गौरव  सत्य और सुंदर
  डॉ. महेश परिमल
 विश्व की शक्तिशाली आईटी कंपनी में भारतीयों के दबदबे से आत्ममंथन का अवसर बनना चाहिए। जो हमेशा अपने वेतन पर ध्यान रखते हैं, वे सुंदर पिचाई से यह सबक ले सकते हैं कि वेतन ही सब-कुछ नहीं होता, इसके साथ यह भी आवश्यक है कि आप सतत अपडेट रहें और रोज कुछ नया करते रहें। आपके मस्तिष्क में हमेशा नए-नए विचार आते रहें, प्रतिभा को वेतन का मापदंड न मानें। सुंदर पिचाई ने यदि वेतन को ही आगे रखा होता, तो वे आज इस ऊंचाई पर नहीं होते। पिछले दिनों जैसे ही गूगल ने यह घाेषणा की कि सुंदर पिचाई अब कंपनी के सीईओ होंगे, तो पूरे भारत देश में खुशी की लहर दौड़ गई। इसी के साथ सोशल साइट पर यह चलने लगा कि दुनिया की किन-किन श्रेष्ठ कंपनिनयों में भारतीयों का दबदबा है। विश्व की सबसे बड़ी आईटी कंपनी के सीईओ सुंदर केवल 43 साल के हैं, इतनी छोटी उम्र में इतनी बड़ी उपलब्धि बहुत कम हो हासिल होती है। अाज सुंदर ने जो कुछ हासिल किया है, वह उन्हें ऐसे ही प्राप्त नहीं हुआ है, उसके लिए उन्होंने जो श्रम किया है, वह भी पूरी खामोशी और शिद्दत से, वही उनकी श्रेष्ठता है, जो उन्हें औरों से कुछ अलग करती है। संुदर पिचाई ने आईआईटी खडगपुर से मेटलर्जी इंजीनियर होने के बाद अमेरिका चले गए, वहीं उन्हें विश्वविख्यात व्हार्टन बिजनेस स्कूल से एमबीए किया। पिछले दस वर्षों से वे गूगल के साथ जुड़े हैं। जब सुंदर पिचाई ने गूगल में अपना काम शुरू किया, तब उन्हें न्यू जेनरेशन कंज्यूमर प्रोडक्स का काम सौंपा गया। यहां उन्होंने आगामी 20 वर्ष तक ग्राहकों की बदलती मानसिकता और आवश्यकताओं का गहन अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने एक ऐसा रोड मेप तैयार किया, जिसे आज तक गूगल उसका अनुशरण करता है। पिचाई द्वारा तैयार किया गया रोड मेप गूगल ने सबसे पहले जी मेल एप्लीकेशन पर काम किया। इसकी पूरी जिम्मेदारी पिचाई की टीम को दे दी। इसमें सफल होने के बाद मेप का एप्लीकेशन भी पिचाई ने सफलतापूर्वक तैयार किया। पिचाई ने जब गूगल के सभी प्रोडक्ट के लिए एंड्रोइड एप्लीकेशन से मोबाइल की पूरी दुनिया ही बदल दी, तब उनकी लगातार सफलता को पूरे विश्व ने सराहा। पिचाई की सफलता के क्रम में गूगल का वेब ब्राउजर क्रोम को भी शामिल किया जा सकता है। दस साल में पांच बड़ी सफलता की वजह से ही वे गूगल के सीईओ पद तक पहुंच पाए। आज आईटी के क्षेत्र में पूरे विश्व में गूगल के सर्जेई ब्रिन, लेरी पेज, एपल के टीम के कूक के बाद सुंदर पिचाई का नाम अपनी अनोखी सिद्धि के लिए लिया जा रहा है। सुंदर गूगल जैसी बड़ी कंपनी के सीईओ तो हैं ही, इसके अलावा ऐसी ही दूसरी आईटी ज्वाइंट माइक्रोसाप्ट के सीईओ के पद पर संुदर के ही राज्य तमिलनाड़ु के पड़ोसी कर्नाटक के सत्या नाडेला भी हैं। तमिलनाड़ु की इंदिरा नूई को कैसे भुला जा सकता है। आज वे पेप्सी की सीईओ हैं। सुंदर की सीईओ के पद पर नियुक्ति हुई, इसके पहले जिनके साथ उनकी प्रतिस्पर्धा थी, वे निकेश अरोरा भी भारतीय हैं। गूगल से लंबे समय तक जुड़ेे रहने के बाद पिछले साल ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। अब वे जापान की विख्यात साफ्टबैंक में वाइस चेयरमेन हैं। प्रसिद्ध सिटी बैंक के सीईओ रह चुके विक्रम पंडित भी एक जाना-पहचाना नाम है। भारतीय मूल के महानुभाव अपने तेजस्वी मस्तिष्क के कारण जब ऊंचे पद पर पहुंच जाते हैं, तो हमें गर्व होता है। यह स्वाभाविक भी है। अमेरिका प्रतिभा को अवसर देता है। हमारे यहां हालात एकदम ही अलग हैं। यहां प्रतिभा नहीं, बल्कि जुगाड़ और संबंध काम आते हैं। हमारे यहां की बहुत सी विभूतियां ऐसी हैं, जिन्हें हमने तो नकार दिया, पर उन्होंने अपनी बुद्धि का लोहा दूसरे देशों में मनवा लिया। इस पर ही एक शोध हो सकता है कि वे कौन सी परिस्थितियां थी, जिसने हमारे देश के महान लोगों को देश छोड़ने के लिए विवश किया। यदि उन्हें हमारे ही देश में अवसर मिले होते, तो हमारे देश का नाम बहुत ऊंचा होता। यह विचारणीय है कि जो देश छोड़कर चले गए, उनके साथ किस तरह का व्यवहार किया गया। आखिर क्यों उन्हें देश छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। आज भी हमारे देश में व्यापार और नौकरियों के बेहतर अवसर हैं, उसके बाद भी प्रतिभाएं देश से बाहर ही जा रही हैं। 90 के दशक में जींस की खोज करने वाले डॉ. हरगोविंद खुराना, के. एस. चंद्रशेखर को देश छोड़ने के बाद नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। आज भी हालात सामान्य नहीं हुए हैं। इसकी वजह हमारी झूठी खूनपरस्ती है। मूल रूप से हम अपने आराध्य में किसी हीरो, मॉडल, मूर्ति में देखते हैं। हम भूल जाते हैं कि असली हीरो तो खुराना, सत्या नाडेला, भरारा, या रामकृष्ण ही हैं। इन्हें गुमाने के बाद हम यह अहसास ही नहीं कर पाते कि अभी भी हमारे बीच बहुत से ऐसे लोग हैं, जो प्रतिभाशाली हैं, पर उनकी प्रतिभा हमें दिखाई नहीं दे रही है। हमारी स्थिति शुतुरमुर्ग की तरह हो गई है। प्रतिभा को नहीं देख पाते, साथ ही उन अवसरों को भी देख नहीं पाते, जो हमें हमारे देश से नहीं, बल्कि दूसरे देशों में मिलते हैं। हमारी व्यवस्था, काम करने की पद्धति, शिक्षा के अवसर, शिक्षा प्राप्ति के बाद काम के असवर, काम मिलने के बाद अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए पारदर्शिता आिद मामलों में हम काफी पीछे हैं। कल्पना करें कि यदि आज डॉ. खुराना, सत्या नाडेला, संुदर पिचाई, इंदिरा नूई, निकेश भारत में ही रहते, तो उनकी क्या स्थिति होती? अधिक से अधिक इंफोसिस, विप्रो, टीसीएस जैसी कंपनियों में ऊंचे वेतन प्राप्त करने वाले साफ्टवेयर डेवलवपर से विशेष कुछ बन सकते क्या? एनडीए सरकार एम्स, आईआईएम और आईआईटी जैसी उच्च कोटि की शिक्षण संस्थाओं को शुरू कर रही है, तब यह जानना आवश्यक हो जाता है कि सुंदर पिचाई आईआईटी खड़कपुर पहुंचे उसके पहले वे साधारण सरकारी स्कूल में ही पढ़ते थे और माइक्रोसाफ्ट के सत्या नाडेला तो मध्यम स्तर के निजी विश्वविद्यालय के छात्र थे। मानव संसाधन विकास के लिए हम वैश्विक नियमों को सीख रहे हैं, पर बरसों पुरानी मानसिकता को बदलना नहीं चाहते। अब भी समय है कि ऐसे प्रतिभाशाली लोगों को हम अपने ही देश में ऐसे अवसर दें, ताकि उनकी प्रतिभा से हमारा देश ही आलोकित हो। दूसरे देशों से यह सीखें कि वे किस तरह से बिना भेदभाव के प्रतिभाओं का न केवल सम्मान करते हैं, बल्कि उन्हें ऊंचा पद देने में भी पीछे नहीं रहते। देखा जाए तो सुंदर पिचाई और सत्या नाडेला हमारे लिए मंथन का विषय हैं। इन प्रतिभा को हमने नहीं, किसी दूसरे देश ने पहचाना। प्रतिभा पहचानने की हमारा चश्मा ही खराब है। हमें वही दिखता है, जो हमें दिखाया जाता है। यह दृश्य सच से काफी दूर होता है। हमें चाहिए सिफारिश वाला प्रतिभावान, जुगाड़ से बनाया गया प्रतिभाशाली या फिर किसी मंत्री का पुत्र या फिर उसका रिश्तेदार। आज भी देश के उच्च पदों पर बहुत से नाकारा लोग बैठे हैं, जिन्हें हम नहीं पहचान रहे हैं, यदि इन्हें ही पहचान लिया जाए, तो ही देश के प्रतिभावानों को सामने आने में देर नहीं लगेगी।
 डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 26 अगस्त 2015

मंगी की बाजार में वापसी

दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में 17 अगस्त को प्रकाशित आलेख http://epaper.jagran.com/epaper/17-aug-2015-262-National-Page-1.html

सोमवार, 10 अगस्त 2015

अमेरिका में प्रतिबंधित, भारत में खुले आम

डॉ. महेश परिमल अमेरिका जैसी पाश्चात्य देशों से हम बहुत कुछ सीखते हैं। कभी फैशन के नाम पर हम उनका अनुकरण करते हैं, तो कभी फिल्मों के नाम पर। वहां बहुत कुछ ऐसा भी होता है, जिससे हम काफी कुछ सीख सकते हैं। समय की पाबंदी के अलावा वहां बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जिसे हमें अपनाना चाहिए। हम फैशनपरस्त हो सकते हैं, पर समय के पाबंद नहीं। हममें जागरूकता का अभाव है, इसलिए हम यह नहीं जान पाए कि अमेरिका ने अपने देश की स्कूलों में कोक-पेप्सी के उत्पादों को बेचना बंद कर दिया है। अब वहां फलों के ताजा रस मिलेंगे। वहां अब जाकर यह मान लिया है कि उक्त उत्पाद बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदेह है। इसलिए फौरन यह आदेश दिया गया। इतनी चिंता करते हैं, वे अपने देश के बच्चों की। लेकिन हमारे देश में अभी मैगी को लेकर जो जागरूकता दिखाई दी, वैसी जागरूकता अन्य उत्पादों में भी देखी जाए, तो पूरे देश के बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाए। पर ऐसा संभव नहीं दिखता। विश्व के कई देश अभी तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों के चंगुल में फंसे हुए हैं, उनमें हमारा देश भी एक है। इसके लिए दोषी है हमारी संकुचित मानसिकता और काम न करने की प्रवृत्ति। इन दो कारणों से कई अच्छे कार्य नहीं हो पाते। आजकल बच्चे जिस तरह से जान हथेली पर रखकर स्कूल जा रहे हैं, यदि उस हालात का ही बारीकी से निरीक्षण कर लें, तो समझ में आ जाएगा कि इसके लिए पालक ही दोषी हैं। पालक ही बच्चों को फास्ट फूड के लिए प्रेरित करते हैं। आलसी मांओं के कारण ही मैगी इतनी लोकप्रिय हो पाई। इसके अलावा अन्य कई ऐसी चीजें हैं, जो देश के भविष्य को बरबाद कर रही हैं, लेकिन इसका असर अभी नहीं, बरसों बाद पता चलेगा। अमेरिका से यह खबर आई है कि वहां की स्‍कूलों में कोकाकोला और पेप्‍सी की बिक्री बंद कर दी गई है। उसे अब जाकर यह समझ में आया है कि इन पेय पदार्थों से बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य को खतरा पैदा हो गया है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों ने भी अमेरिका की हां में हां मिलाते हुए इसे बच्‍चों के स्‍वास्‍थ्‍य के लिए खतरा बताया है। इन पेयपदार्थों को लगातार पीने से वहां के बच्‍चों में मोटापा छाने लगा है। उनके शरीर में चर्बी की मात्रा बढ़ने लगी है। इसे पालकों ने भी समझा और इसका उग्र विरोध करने लगेा यह विरोध इतना अधिक तीव्र हुआ कि पेप्‍सी और कोला की कंपनियों को अपनी इज्‍जत बचाने के लिए उन्‍होंने निर्णय लिया कि अब स्‍कूलों में इन पेय पदार्थों की वेडिंग मशीन में फलों के ताजा रस होंगेा अमेरिकन बिवरेज एसोसिएशन की नई नीति के अनुसार अब स्‍कूलों में ऐसे पेय पदार्थ नहीं बिकेंगे, जिनमें अधिक से अधिक कैलोरी होंा कैलोरी वाले साफ्ट ड्रिंक, जिसमें केवल 5 प्रतिशत या उससे कम फलों का रस हो, ऐसे जूस की बिक्री नहीं की जाएगीा अब ऐसे पदार्थों की ही बिक्री होगी, जिससे बच्‍चों को अच्‍छा पोषण मिलेा इसमें 100 प्रतिशत फलों का रस ही होगा। एक अमेरिकी नागरिक एक वर्ष में करीब 600 बोतलें कोला ड्रिंक्‍स पी जाता है। इसमें बालकों की संख्‍या अधिक है। इसी ड्रिंक्‍स के कारण बच्‍चों में अनुपात से अधिक मोटापा देखा जा रहा है। इस मोटापे का दोष इन बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों पर लगे, इससे पहले उन्‍होंने यह निर्णय लेकर अपनी साख बचा ली है। लेकिन भारत में इस तरह का कोई कदम उठाया जाएगा, इसमें शक है। मल्‍टीनेशनल कंपनियों के खाने के और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं। उनके पास अमेरिकियों और भारतीयों के लिए अलग-अलग मापदंड हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अमेरिका की स्‍कूलों में भले ही कोकाकोला और पेप्‍सी पर प्रतिबंध लगा दिया गया हो, पर भारत में कहीं भी इसकी गूंज तक सुनाई नहीं दी। राजनीतिक गलियारों में भी इसकी चर्चा नहीं है। हमारे देश की स्‍कूलों के सामने कई प्रतिबंधित चीजों की बिक्री होती है। देश में गुटखे पर प्रतिबंध के बावजूद वह सभी स्‍थानों पर खुले आम बिक रहा है। इसीलिए बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां भारत के लिए अलग से कानून बनाती हैं। ये कंपनियां भारतीय स्‍कूलों से पेप्‍सी और कोला जैसी घातक चीजों की बिक्री पर रोक लगाने की दिशा में कोई कदम उठाने ही नहीं देंगीा उनके लिए भारत एक प्रयोगशाला है। जहां वे अपने उत्‍पादों का परीक्षण करते हैं। जब बहुराष्‍ट्रीय कंपनी के एक अधिकारी से पूछा गया कि क्‍या अमेरिका के बाद भारतीय स्‍कूलों से भी कोक एवं पेप्‍सी के उत्‍पाद वापस लिए जाएंगे, तो उसने बड़ी बेशर्मी से कहा कि कंपनी ने निर्णय लिया है, वह केवल अमेरिकी स्‍कूलों के लिए ही है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां मानती हैं कि भारत के लिए परिस्‍थितियां भिन्‍न हैं। आखिर भारत के लिए परिस्‍थितियां अलग कैसे हो सकती हैं, इस पर कोई ध्‍यान नहीं देताा कोला कंपनी के एक प्रवक्‍ता के अनुसार भारतीय बच्‍चों में अभी मोटापे की बीमारी इतनी अधिक नहीं फैली है कि इसे गंभीर माना जाएा इसका आशय यही है कि ये कंपनियां इस बात का इंतजार कर रही हैं कि भारतीय बच्‍चों को उनके द्रव्‍य पदार्थों का गंभीर असर हो, उसके बाद ही कोई कार्रवाई कर पाएंगेा यह तो सिद्ध हो चुका है कि कोला इतना अधिक खतरनाक है कि उससे टायलेट साफ किया जा सकता है। इसमें जो रसायन मिलाए गए हैं, उससे अभी तो नहीं, पर भविष्‍य में खतरनाक दुष्‍परिणाम सामने आएंगेा भारतीय बाजार इन बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के आगे नतमस्‍तक हैं। इनकी पहुंच राजनीतिक गलियारों तक है। यही कारण है कि अमेरिका में प्रतिबंधित चीजों का हमारे यहां धड़ल्‍ले से खुले आम व्‍यापार हो रहा है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनी कोला के एक प्रवक्‍ता के अनुसार भारत में कोला ड्रिंक्‍स की जितनी बिक्री होती है, उसमें से एक प्रतिशत की बिक्री शालाओं में हो पाती है। कोला ड्रिंक्‍स की बिक्री अरबों रुपए की है। भारतीय स्‍कूलों में अभी जो कोला बिक रहा है, उससे भी ये कंपनियां अरबों रुपए कमा रहीं हैं। आखिर वे क्‍यों चाहेंगी कि उनके उत्‍पादों की बिक्री कम हो, वे तो इसकी बिक्री अधिक से अधिक बढ़ाना ही चाहेंगेा अभी भारतीय बच्‍चों पर इसके प्रभाव पर किसी प्रकार का शोध नहीं हुआ है। यदि शोध से कुछ नया निकलता है, तो भारतीय जनमानस सचेत हो जाएगाा संभव है, पालक सड़कों पर उतर आएं, पर ऐसा संभव दिखाई नहीं देताा जिस तरह से मेगी नूडल्‍स के प्रति सरकार ने सचेत होकर सख्‍त कदम उठाए, उसे देखते हुए यदि पेप्‍सी और कोला के उत्‍पादों के खिलाफ भी कदम उठाए, कुछ संभव है। इसके लिए पहले तो पालकों को सचेत होना होगाा पालकों की सतर्कता के कारण ही मुम्‍बई और दिल्‍ली की कई स्‍कूलों में इस तरह से साफ्ट ड्रिंक्‍स पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। नई दिल्‍ली की प्रतिष्‍ठित स्‍प्रिंगडेल्‍स स्‍कूल की प्रिंसीपल ज्‍योति बोस कहती हैं कि हमने चार साल पहले ही इस तरह के प्रेय पदार्थों पर रोक लगा दी है। हमारी स्‍कूल की केंटीन में नीबू पानी और फलों का रस ही मिलता है। बच्‍चों में चर्बी बढ़ने के खतरे को देखते हुए ही हमने पेप्‍सी और कोला के उत्‍पादों पर प्रतिबंध लगा दिया है। नई मुम्‍बई के वाशी के फादर अग्‍नेल मल्‍टीपरपज स्‍कूल ने एक वर्ष पहले ही इस तरह के द्रव्‍य पदार्थों पर रोक लगाई है। स्‍कूल के प्राचार्य फादर अल्‍मिडा कहते हैं कि शहरों में बच्‍चों के बढ़ते वजन और उनका मोटापा हमारे लिए चिंता का कारण है। इसलिए स्‍कूलों पर इस तरह के द्रव्‍यों पर रोक लगानी ही चाहिएा अमेरिका में इस समय जिस तरह से पेप्‍सी और कोला के उत्‍पादों को लेकर आंदोलन चल रहे हैं, उससे हमें सीख लेनी चाहिएा बात कुछ भी हो, पर सच तो यह है कि आज हमारे देश में बहुत कुछ ऐसा भी हो रहा है, जिसे नहीं होना चाहिएा सुप्रीम कोर्ट का सख्‍त आदेश है कि सड़कों के किनारे लगने वाले ठेलों पर जो खाद्य सामग्री बेची जाती है, उस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगना चाहिएा पर ऐसा नहीं हो पाताा मिलावट करने वाले पर सख्‍त कार्रवाई होनी चाहिए,पर अभी तक किसी मिलावटखोर को सख्‍त सजा हुई हो, ऐसा सुनने में नहीं आयाा हर साल लाखों रुपए का नकली मावा पकड़ा जाता है, पर कभी किसी की धरपकड़ हुई हो, उस पर मुकदमा चला हो, ऐसे किस्‍से कम ही सुनने को मिलते हैं। आज हमारे देश में लोगों मे कानून का खौफ कम होता जा रहा है, इसलिए अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। मीडिया रोज ही इस तरह से मामलों को सामने ला रहा है, फिर भी अपराधों की संख्‍या में किसी प्रकार की कमी दिखाई नहीं देती। डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

छद्म आतंकवाद का खतरा


हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

महँगाई की मार


आज दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 3 अगस्त 2015

फाँसी देने के नियम

अजा हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख

शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

निर्दोष नहीं है याकूब


30 जुलाई को हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

गुनाहगार को फाँसी




आज हरिभूमि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 6 जुलाई 2015

फिर भटका मानसून




आज हरिभूमि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

शुक्रवार, 12 जून 2015

अमेरिका जैसा मैंने देखा-भाग 3

इस बार मैं अमेरिका की संस्कृति की चर्चा करुंगा। अमेरिकी खुशमिजाज हैं। अपने काम से काम रखते हैं। पर व्यावहारिक भी बहुत हैं। थैक्यू और सॉरी शब्द उनकी जबान में हमेशा रहता है। वे लोग काम के प्रति समर्पित हैं। दूसरों से कोई लेना-देना नहीं। कम से कम बातचीत और अधिक से अधिक काम में विश्वास रखते हैं। युवतियाँ कान में ईयर फोन लगाकर ही घर से बाहर निकलती हैं। जहाँ जगह मिली, वे नाचने-गाने में भी संकोच नहीं करते। पूरी मस्ती के साथ जीवन जीते हैं। वहाँ हर घर में कार है, सभी कार चलाते हैं। फिर भी युवक-युवतियाँ साइकिल पर कॉलेज जाने या फिर घूमने के लिए िनकलती हैं। शनिवार-रविवार को वहाँ बाइक और साइकिल किराए पर भी मिलती हैं। ताकि लोग छुट्‌टी के मजे ले सकें। कुछ और बातें बिंदुवार इस प्रकार हैं:-
सहेजने की प्रवृत्ति:-फिलाडेल्फिया में कई ऐसे संग्रहालय हैं, जहां अमूल्य निधि सँजोकर रखी हुई है। यहाँ एक ऐसा संग्रहालय है, जिसमें मेडिकल के क्षेत्र में होने वाले शोध के लिए एक फीट से लेकर साढ़े 6 फीट के कंकाल रखे हुए हैं। यही आइंस्टीन का मस्तिष्क भी रखा हुआ है। मेरे विचार से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों को एक बार यहां अवश्य आना चाहिए।
शिक्षा के प्रति समर्पित:-गुड फ्राइडे को मैंने वहां बच्चों को स्कूल जाते हुए देखा। उस दिन मैं कहीं भी किसी तरह का जलसा होते नहीं देखा। बारहवीं तक सभी की शिक्षा मुफ्त है। स्कूलों में हर तरह के खेलों के लिए बड़े-बड़े मैदान हैं। एक स्कूल करीब चार-पाँच एकड़ जमीन पर होता है। अंदर बच्चों के बैठने की पर्याप्त व्यवस्था होती है। एक क्लास में 20 से अधिक बच्चे नहीं होते। बच्चे की एक-एक हरकत पर कैमरे से निगरानी होती है। ताकि यह पता चल सके कि बच्चे का दिलचस्पी किस काम पर अधिक है। लोग कानून से बहुत डरते हैं। वहाँ व्यक्ति कानून से नीचे है। कानून को हाथ में लेने से हर कोई डरता है। सभी देश के नियम-कायदों की इज्जत करते हैं। हमारे यहां जिस तरह से यातायात के नियमों को तोड़ना अपनी शान समझते हैं, वहाँ ऐसा नहीं है। जो कानून तोड़ेगा, उसे सजा भुगतनी ही है। पूरे अमेरिका में व्यक्ति कहीं भी हो, अपनी पहचान नहीं छिपा सकता। आधार कार्ड की तरह एक कार्ड होता है, जो सभी सरकारी काम में उपयोग में लाया जाता है। आपके तमाम कागजात में उस नम्बर का जिक्र होता है। उस नम्बर के आधार पर कुछ ही सेंकेंड मं आपको ट्रेस किया जा सकता है।
खुशमिजाज- वहां के लोग खुशमिजाज हैं। अपने काम के प्रति पूरी तरह से समर्पित। अपरिचितों से न के बराबर बातचीत करते हैं। पर उन्हें सम्मान दो, तो वह मुस्करा धन्यवाद कहना नहीं भूलते। बच्चों को बहुत प्यार करते हैं। जहाँ कहीं भी छोटा-सा प्यारा बच्चा दिखा कि वे उसे अपनी गोद में लेने को आतुर दिेखते हैं।
सड़क किनारे मोबाइल पर तेज आवाज के साथ युवक-युवतियाँ डांस करते दिखाई दे जाते हैं। खुशी मनाने का कोई अवसर वे नही छोड़ते।
समय के पाबंद-यदि डॉक्टर से मरीज ने समय लिया होता है, तो मरीज की पूरी कोशिश होती है कि वह समय पर पहुँचे। इस बीच यदि उसका वाहन खराब हो जाए, तो वह किसी को भी यह कारण बताकर लिफ्ट ले लेता है। लोग खुशी से उसकी सहायता करते हैं। जहाँ कहीं भी जाना, तो वे समय से पहले पहुँचने की पूरी कोिशश करते हैं। हाँ भारतीय कहीं कोई कार्यक्रम आयोजित करते हैं, तो उसमें देर हो ही जाती है।
सैलानी प्रवृत्ति:- सड़क पर चलते हुए कई ऐसे लोग भी दिखाई दे जाते हैं, जो एक पटे पर खड़े होकर कारों के साथ-साथ चलते रहते हैं। लकड़ी के पटे पर बेयरिंग लगी होती है, जिस पर वे आड़ा खड़े होकर सड़क पर चलते हैं। जहाँ कहीं भीड़ हुई, वह उसे अपने कांधे पर रखकर पैदल चलना शुरू कर देते हैं। मनमौजी की तरह से कहीं भी दिखाई दे जाते हैं। इसमें युवक ही नहीं, युवतियाँ भी शामिल होती हैं।
भेदभाव नहीं:-वहाँ काले लोगों की संख्या बहुत है। यात्री बस, स्कूल बस को अक्सर महिलाएँ ही चलाती हैं। बड़े-बड़े ट्रेकर भी महिलाओं को चलाते देखा है मैंने। कुछ युगल ऐसे भी दिखाई दे जाते हैं, जिसमें महिला गोरी एवं पुरुष काला, दोनों पति-पत्नी के रूप में। दोनों की दो संतानें, बेटी काली और बेटा पूरा गोरा। लेकिन वे बिंदास होकर मॉल या स्टोर में सामान की खरीददारी करते हुए दिखते हैं। कालों की संख्या को देखते हुए स्टोर में उनके हिसाब से कपड़े आदि रखे होते हैं। तम्बू आकार के शर्ट-पेंट आदि देखकर ऐसा लगता है कि यह शो-पीस है। पर ऐसा नहीं, वहाँ ऐसी चीजों के खरीददार होते हैं।
शांत स्वभाव:-वहाँ किसी को कहीं भी जाने की हड़बड़ी नहीं होती। पूरे इत्मीनान से वे गाड़ी चलाते हुए चले चलते हैं। यदि किसी को जल्दी है, तो उसके वाहन की गति से सभी समझ जाते हैं और उसे रास्ता दे देते हैं। पर ऐसा कम ही होता है। सब एक-दूसरे का खयाल रखते हुए अपने वाहन चलाते हैं।
हिंदी का माहौल:-न्यू हेम्पशायर में मैं एक हिंदी के कार्यक्रम में शामिल हुआ। पूरे पाँच घंटे तक चलने वाले इस कार्यक्रम में शामिल होकर ऐसा लगा ही नहीं कि मैं भारत से बहुत दूर अमेिरका में हूं। सभी लोग हिंदी में बात करते हुए। दो नाटक भी हिंदी के। लोगों ने अपनी कविताएँ भी सुनाई, शायरी भी सुनाई। पूरा माहौल हिंदी का था। मुझे लगा मैं तो मानों अपने ही शहर के किसी कार्यक्रम में शामिल हुआ हूँ।
परस्पर सम्मान:- वहाँ लोग एक-दूसरे काे पूरा सम्मान देते हैं। रिसेप्शन में पहुँचते ही पहले  गुड मार्निंग, हाऊ आर यू से बातचीत की शुरुआत करते हैं। फिर भले काम की बातें शुरू हो जाए। इस दौरान कहीं किसी के चेहरे पर आलस या पराएपन का अहसास होता दिखाई नहीं दिया। पूरे सम्मान के साथ वे अभिवादन करते हैं। बातें करते हैं। िकसी मॉल या स्टोर में जाते हुए हम किसी के पीछे जा रहे है, तो वे दरवाजा खोलकर पहले हमें जाने देते हैं, फिर वे प्रवेश करते हैं। इस दौरान हमें उन्हें धन्यवाद अवश्य कहना चाहिए। यदि हम ऐसा करें, तो वे खुश होकर धन्यवाद अवश्य कहते हैं।
उत्सव  प्रेमी:-चूँकि अमेिरकी उत्सव प्रिय होते हैं, इसलिए किसी के घर पार्टी हो, तो शराब अपनी ही ले जाते हैं। ताकि सामने वाले को किसी तरह की परेशानी न हो। जन्म दिन, सालगिरह आदि समारोह सप्ताहांत में ही आयोजित किए जाते हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग आकर एंज्वाय कर सकें।
लकड़ी के घर:- अधिकांश घर लकड़ी के होते हैं, इसलिए घर की रसोई पर चूल्हे के आसपास काफी सतर्कता रखी जाती है। घर पर किसी तरह की भट्‌ठी नहीं होते। मांसाहर के लिए भुनने के लिए घर के बाहर बिजली से चलने वाला यंत्र होता है, जिस पर मांस लटकाकर नीचे ताप से उसे भुना जाता है। इस काम में सभी सहयोग करते हैं, फिर मिलकर सभी एंज्वाय करते हैं। सड़क के दोनों किनारे घर बने होते हैं। जिसमें तलघर में पानी गर्म करने के लिए बॉयलर, एसी आदि की व्यवस्था होती है। उसके ऊपर वाले पर रहना होता है। अधिकांश समय ठंड होती है, इसलिए दरवाजे तुरंत बंद होन वाले होते हैं। घर हमेशा गर्म होता है। बाथरूम में ठंडे और गर्म पानी की पूरी व्यवस्था होती है। लोग गर्म पानी से ही नहाते हैं। हाँ मकानों के नम्बर क्रमवार होते हैं। जैसे 111, 113,115,117 आदि एक साथ मिलेंगे। उसके सामने की ओर वाले मकानों के नम्बर 112, 114, 116 आदि होते हैं। यानी सम संख्या वाले एक ओर और विषम संख्या वाले दूसरी ओर होते हैं।
नो धोबी घाट:-वहाँ एक बात यह देखने में आई कि भारत की तरह वहाँ किसी घर या बाहर रस्सी पर कपड़े सूखते दिखाई नहीं देते। वहाँ सभी के घर वाशिंग मशीन और साथ में ड्रायर मशीन भी होती है। एक घंटे में कपड़े धुलकर और सूखकर आपके पास आ जाते हैं। जिनके घर वाशिंग मशीन नहीं होती, वे अपने घरों से कपड़ों का गट्‌ठर ले जाते हैं, एक ऐसी जगह, जहाँ सभी तरह के कपड़े धुलते हैं। वहाँ कई वाशिंग मशीनें रहती हैं। वहाँ पहले आपके कपड़ों को तौेला जाएगा, उसके बाद कपड़ों की धुलाई और उसे सूखाकर आपको सौंप दिया जाएगा। लोग सप्ताह भर के कपड़े ले जाते हैं, सुबह देकर दोपहर को ले आते हैं। खर्च आता है, कपड़ों के तौल से। फिर भी भारतीय मुद्रा में 400 रुपए लग ही जाते हैं।
वायु-ध्वनि प्रदूषण नहीं:- वहाँ कभी कहीं भी शोर सुनने को नहीं मिला। इसके अलावा वायु प्रदूषण को बढ़ावा देने के लिए कोई उपक्रम करता हुआ भी नहीं देखा। न कहीं धुआं, न कचरे का ढेर, न लाउडस्पीकर, न ही और ऐसा कुछ, जिससे ध्यान भटकता हो। लोग शांति से जीना चाहते हैं। लाउडस्पीकर पर वहां प्रतिबंध है। न मंदिरों में ध्वनि विस्तारक यंत्रों का इस्तेमाल हाेता है, न मस्जिदों में और न ही िगरजाघरों में। चारों ओर शांति और केवल शांति।

रविवार, 7 जून 2015

टाइगर पर ज्‍यादती



 आज दैनकि जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख



शनिवार, 6 जून 2015

एप से वेबसाइटों पर बढ़ता खतरा

आज हरिभूमि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 1 जून 2015

अस्थिर मानसून की आशंका

आज राष्ट्रीय जागरण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

मंगलवार, 26 मई 2015

सोने से कमाई की योजना

आज हरिभूूमि में प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 25 मई 2015

बच्चों के सेहत की चिंता





आज हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख


सोमवार, 18 मई 2015

अमेरिका जैसा मैंने देखा-भाग 2


डॉ. महेश परिमल
न्यूयार्क एयरपोर्ट पर उतरने के पहले पायलट की आवाज विमान में गूँजी। अबूधाबी एयरपोर्ट पर आप सभी का स्वागत है। यह सुनकर लोग हँसने लगे। इसके बाद पायलट ने तुरंत अपनी गलती सुधारते हुए माफी मांगी और कहा कि न्यूयार्क एयरपोर्ट पर आपका स्वागत है। मेरे लिए एकदम नया अनुभव। मेरा सामान कहाँ होगा? किस हालत में होगा? कहाँ मिलेगा? इसी चिंता में विमान से बाहर आया। सभी यात्रियों के साथ-साथ चलता हुआ मैं उस स्थान पर पहुँचा, जहाँ एक गोल घेरे में सबका सामान आ-जा रहा था। मैंने ध्यान से देखा कि एक स्थान पर हमारे ही विमान का अगला भाग है, जहाँ से सामान बाहर निकल रहा है और सीधे उस स्थान पर गिर रहा है, जो एक गोल घेरे में है। यात्री उसके चारों तरफ खड़े हैं, जिसका सामान है, वह अपने सामान को पहचान कर उठा लेता। अगर गलत सामान उठाया है, तो फिर उसी स्थान पर रख देता है। यदि किसी के दो बेग हैं, तो आवश्यक नहीं कि दोनों साथ-साथ आएँ। एक बेग मिलने के बाद दूसरा बेग कुछ देर बाद भी मिल सकता है। मेरा ध्यान अपने बेग की ओर था कि पीछे से किसी ने मेरी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा-आखिर आ गए डॉक्टर! मैंने पीछे देखा, तो मेरा मित्र भूपिंदर मेरे सामने था। उसने मुझे भींच लिया, कहो डॉक्टर कैसे हो? मैंने कहा-मैंनू तो चंगा है प्राजी, तुस्सी सुनाओ,  कैसे हो? मैंने भी उसे गले लगाते हुए कहा-प्राजी तुम्हारी जिद थी कि डॉक्टर को अमेरिका आने से कोई रोक नहीं सकता, देखो मैं तुम्हारे सामने हूँ। इसके बाद मैं उनकी पत्नी सुखविंदर से मिला। उनकी बेटी अर्पण को गोद में लिया। भूप्पी ने तुरंत कुछ तस्वीरें लीं। उसके बाद एक विदेशी यात्री से अनुरोध किया कि हम चारों की तस्वीर हमारे मोबाइल में कैद कर दे। उसके बाद मैं अपने बेग को तलाशने लगा, तब तक भूप्पी ने कुछ तस्वीरें फेसबुक में डाल दी। इस बीच मेरे बेग भी मुझे मिल गए। इसके बाद मैं पूरे न्यूयार्क एयरपोर्ट को जी भरकर निहारा। रोशनी से नहाया हुआ एयरपोर्ट, दूर-दूर तक विदेशी यात्री, कुछ भारतीय यात्री भी दिख जाते। मेरी गोद में अर्पण थी, मेरा सामान भूप्पी ने उठाया हुआ था। हम बाहर आए। सामान गाड़ी में रखा। भूप्पी ने कहा-सीट पर बैठो। मैं भारतीय परंपरा के अनुसार अगली सीट पर बैठने जा ही रहा था कि आवाज आई, ओए प्राजी, उत्थे नई, इत्थे। मैं भौचक! तब भूप्पी ने खुलासा किया-डॉक्टर इस देश में लेफ्ट हेंड ड्राइविंग है। तुम उधर बैठो, मैं इधर बैठकर गाड़ी चलाता हूँ। पहली बार मैं उस स्थान पर बैठा, जहाँ भारत में ड्राइवर बैठते हैं। बड़ा अजीब-सा लगा। हमारी गाड़ी चल पड़ी फिलाडेल्फिया की ओर।
रास्ते में भूप्पी ने अमेरिका के बारे में जो कुछ बताया, उसमें पहले तो यातायात के नियमों का जिक्र करना चाहूँगा:-
यहाँ हार्न बजाना प्रतिबंधित है। यदि किसी चालक ने कुछ ही देर में तीन बार गाड़ी का हार्न बजा दिया, तो उसे पुलिस तुरंत डॉक्टर के पास ले जाकर उसका मानसिक परीक्षण करवाती है।
दस वर्ष से कम उम्र्र के बच्चे वाहन की अगली सीट पर नहीं बैठ सकते।
बच्चे को गोद में लेकर कहीं बाहर नहीं निकले सकते। बच्चा हमेशा (स्ट्राॅलर) बच्चा गाड़ी में ही होना चाहिए। इस गाड़ी को चलाने के लिए मॉल या स्टोर्स में विशेष व्यवस्था होती है।
हाइ वे पर ट्रकों के लिए अलग से सड़क होती है। उस सड़क पर कार नहीं जा सकती।
वहाँ कार वाहनों की लाइट दिन में भी ऑन रखी जाती है। वाइपर चल रहा हो, तो लाइट का ऑन होना अनिवार्य है। ये वहाँ का नियम है।
यदि आपने यातायात नियमों का तीन बार से अधिक उल्लंघन किया है, तो आपका लायसेंस रद्द हो सकता है। फिर आपका लायसेंस पूरे अमेरिका में कहीं भी नहीं बन सकता।
पिछले माह ही टेक्सास में गति सीमा से तेज चलाने पर एक व्यक्ति को टिकट मिल गया, वह व्यक्ति थे, जार्ज बुश यानी अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति। यानी वहाँ कानून व्यक्ति से ऊपर है।
यातायात नियमों के उल्लंघन के बाद यदि आपने पुलिस वाले को रिश्वत देने की कोशिश की, तो उसे यह अधिकार है कि वह आपको तुरंत िगरफ्तार कर ले। इस संबंध में पुलिसवालों का कहना है कि हमें कानून का पालन करवाने के लिए ही वेतन दिया जाता है। हमें पर्याप्त वेतन मिलता है, फिर हम अपने काम में बेईमानी क्यों करें?
रात के दो बजे भी यदि रेड लाइट है, तो आपको रुकना होगा। भले ही कोई ट्रेफिक न हो।
हर चौराहे पर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, जिससे आपके वाहन के बारे में एक बार में पूरी जानकारी मिल जाती है।
आपके वाहन के आगे यदि कोई स्कूल बस हो और वह आगे जाकर बच्चों को उतारने लगी हो या फिर बच्चों को वाहन में लेने लगी हो, तो आप उस स्कूल बस को किसी भी तरह से क्रास नहीं कर सकते। भले ही ग्रीन सिगनल क्यों न मिल रहा हो। स्कूल बस के चलने पर आप उस वाहन को क्रास कर सकते हैं।
जहाँ जितनी स्पीड तय की गई है, वहाँ उतनी ही स्पीड आपके वाहन की होनी चाहिए। अन्यथा आपको जुर्माना हो सकता है। कई स्थानों पर ऐसी भी मशीन लगी होती है, जिसमें वहाँ की स्पीड लिमिट और आपके वाहन की स्पीड बताई जाती है। यानी आप वाहन स्पीड लिमिट से अधिक तेज चला रहे हैं। ये मशीन केवल आपको सूचित करती है कि आप वाहन की गति को नियंत्रित रखें।
टोल टैक्स देने के लिए वाहन को खड़े नहीं करना होता, वहाँ लगे कैमरे से कार के स्क्रीन पर लगे बिल्ले के नम्बर के मिलान से ही चालक के डेबिट कार्ड से राशि निकल जाती है।
हर 50 या 100 मीटर पर सिगनल होते हैं। इसलिए शहर से बाहर निकलने में ही आधा घंटा लग जाता है। इसके अलावा जिन चौराहों पर सिगनल नहीं लगे हैं, वहां आपको वाहन धीमा करना ही होगा। यातायात हो या न हो, यह नियम हमेशा लागू हाेता है।
चलते-चलते वाहन यदि खराब हो जाए, तो उसे सड़क के किनारे खड़े करने के लिए जगह होती है। वहां वाहन खड़े कर टो वाहन का इंतजार किया जाता है। इस वाहन को आने में अधिक समय नहीं लगता।
जाम की स्थिति बहुत ही कम आती है। बाइक दिखाई नहीं देती। यदि कहीं दिखी भी तो वह हार्ली डेविडसन पर भागते अंग्रेज ही दिखाई दिए।
पार्किंग के लिए अच्छी सुविधा है। जहाँ वाहन पार्क करना है, वहीं एक खंबे पर मशीन लगी है, जहाँ आप नियत समय तक अपना वाहन खड़ा कर सकते हैं, इसके लिए मशीन से ही भुगतान भी हो जाता है। तय समय से अधिक समय तक वाहन खड़ा मिला, तो िफर जुर्माना।
साइकिल के लिए अलग ट्रेक और उसे खड़े करने के लिए अलग से व्यवस्था होती है।
शनिवार-रविवार को साइकिल एवं बाइक किराए पर मिलते हैं। बाइक के लिए अलग से रास्ता होता है। लोग स्केटिंग करते हुए भी तेजी से निकल जाते हैं।
वहां के प्रत्येक पेट्रोल पंप पर एक रेस्टारेंट होता ही है। जहाँ यात्रियों की हर सुविधा का ध्यान रखा जाता है। आप वहां इत्मीनान से नाश्ता कर सकते हैं, फ्रेश हो सकते हैं। भारतीय लोगों के लिए विशेष रूप से शाकाहारी खाद्य सामग्री होती है। पेट्रोल अपने हाथ से ही लेना होता है। कहीं-कहीं वहाँ का कर्मचारी भी देता है। पेट्रोल को वहाँ गैस कहा जाता है। पेट्रोल का आशय वहां पुलिस की पेट्रोलिंग से लगाया जाता है। यह गैलन के हिसाब से मिलता है। वहां लीटर का प्रचलन नहीं है। एक गैलन में करीब तीन लीटर पेट्रोल आता है। पेट्रोल की कीमत में अधिक अंतर नहीं है।
गाड़ियाँ जीपीएस सिस्टम से चलती हैं, जहाँ जाना हो, वहाँ का डेस्टीनेशन फीड कर दिया जाता है, फिर तो जैसा जीपीएस का आदेश होगा, चालक अपना वाहन वहीं ले जाएगा। जीपीएस से यह भी पता चल जाता है कि कितने समय में डेस्टीनेशन तक पहुँचा जा सकता है। कहाँ रास्ता जाम है, कहाँ काम चल रहा है। कौन-सा मार्ग डायवर्सन पर है। ये सारी जानकारी जीपीएस से ही पहले ही मिल जाती है।
पूरे 19 दिनों में मैंने करीब तीन हजार किलोमीटर की यात्रा वाहन से की। पर रास्ते में कहीं भी न तो कोई जानवर देखा, न कोई ठेला वाला और न ही खराब वाहन। यदि वाहन स्टार्ट न हो, तो धक्का नहीं लगाया जाता, बल्कि वाहन में अलग से बैटरी हाेती है, जिसे वाहन की बैटरी से जोड़कर वाहन स्टार्ट किया जाता है। यदि बैटरी नहीं है, तो एक वायर होता है, जिसेे किसी दूसरे के वाहन की बैटरी से जोड़कर अपने वाहन की बैटरी को पावरफुल कर दिया जाता है, फिर अपना वाहन स्टार्ट किया जाता है।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 14 मई 2015

अमेरिका जैसा मैंने देखा-भाग 1

दिल्ली से अबूधाबी जाने वाले विमान में
 डॉ. महेश परिमल
अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी है, रटगर्स यूनिवर्सिटी। यहाँ हिंदी के लिए बहुत काम हो रहा है। वहाँ हर साल हिंदी सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। इस साल उसमें भाग लेने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया था। आयोजन केवल तीन दिन यानी 3, 4 और 5 अप्रेल तक ही था, पर मैं वहाँ पूरे 19 दिन रहा। इसमें से तीन दिन तो न्यू जर्सी, 5 दिन बोस्टन और शेष दिन फिलाडेल्फिया में बिताए। इस दौरान खूब घूमना हुआ। कई संग्रहालय देखे। कई लोगों से परिचय हुआ। सबसे बड़ी बात यह रही कि अमेरिका में मुझे केवल अंगरेजी ही नहीं, बल्कि गुजराती, बंगला, पंजाबी और छत्तीसगढ़ी काम आई। अपने अनुभवों को शब्दों का रूप दे रहा हूँ। कहीं-कहीं अतिशयोक्ति हो सकती है। इसके लिए पहले से ही क्षमा चाहता हूँ।
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मैंने कभी करीब से विमान नहीं देखा था। घरेलू उड़ान का भी मुझे अनुभव नहीं था। मेरे सामने इंटरनेशनल उड़ान का प्रस्ताव था। हतप्रभ था। भीतर से कहीं अंगरेजी न आने की पीड़ा भी थी। इसके बाद भी मैं निकल पड़ा, एक दूसरी ही दुनिया को करीब से देखने के लिए। भोपाल से निकलकर मेरा पहला पड़ाव था, िदल्ली के मित्र विनोद वर्मा का घर। निजामुद्दीन में उतरकर नोएडा स्थित सीधे उनके घर ही पहुँचा। विनाेद भाई को विदेश यात्राओं को अच्छा-खासा अनुभव है। इसलिए उनके विदेश और विशेषकर विमान यात्राओं के अनुभवों को जाना। उन्होंने बड़ी सादगी से अपने अनुभव मुझसे बाँटे। कुछ हिम्मत बँधी। वे घर पर अधिक समय तक नहीं रह पाए। आवश्यक मीटिंग होने के कारण वे जल्द ही नौकरी के लिए िनकल पड़े। इसके बाद मोर्चा सँभाला, उनके पुत्र तथागत ने। उसने भी विदेश में एक वर्ष तक रहने और विमान यात्राओं के अपने अनुभव मुझे बताए। इसके बाद तो मैं चल निकला। मेट्रो से मैं राजीव चौक तक पहुँच गया। उसके बाद वहाँ से सीधे एयरपोर्ट। बड़ा ही आल्हादकारी अनुभव। मेट्रो ने केवल 19 मिनट में ही मुझे एयरपोर्ट पहुँचा दिया। इस ट्रेन में आप चालक से लेकर गार्ड के डिब्बे तक आराम से पहँुच सकते हैं या अपनी सीट पर बैठकर दोनों दिशाओं की ओर देख सकते हैं। पूरी तरह से वातानुकूलित इस मेट्रो ट्रेन पर बैठना अच्छा लगा। एक तरह से यह विदेशी अनुभव का पहला पाठ ही था। जहाँ मुझे जाना था, उसके पहले ककहरे का ज्ञान मुझे मेट्रो में बैठकर ही हुआ। उसके बाद जब मेट्रो से उतरकर एयरपोर्ट पर पहुँचा, तो लगा कि क्या यही भारत है? चमचमाते फर्श पर 
फिसलती सामानों की ट्राली। जो अशक्त हैं, उनके लिए व्हीलचेयर या फिर छोटी-सी मोटरगाड़ी, जिसमें करीब 7 लोग एयरपोर्ट के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुँच सकते हैं। एयरपोर्ट पर पहुँचकर सबसे पहले बोर्डिंग पास बनवाना होता है। यह टिकट होता है, जिसके आधार पर आपको यात्रा करने की अनुमति मिलती है। यहाँ मैंने देखा कि यदि आप किसी ने कुछ न पूछें, बल्कि एयरपोर्ट के दिशा निर्देशों का पालन करेंगे, तो आप सही स्थान पर पहुँच सकते हैं। कहाँ क्या करना है, वहाँ क्या होता है, यह सब-कुछ लिखा होता है, वह भी अंगरेजी में।
अबूधाबी में इंतजार करते यात्री
आपको यह जानकारी होनी चाहिए कि आपका टिकट किस एयरलाइंस का है, बस आप उस एयरलाइंस के काउंटर पर चले जाएँ, सब कुछ पता चल जाएगा। यहाँ एक बात देखने में आई, वह है अनुशासन। कोई भी कितना भी बड़ा क्यों न हो, उसे लाइन पर लगना ही होगा। वोर्डिंग पास देने के पहले आपसे काफी पूछताछ होती है। वे अधिकारी यह जानना चाहते हैं कि आप विदेश केवल घूमने ही जाना चाहते हैं, उन्हें यह शक होता है कि लोग पर्यटन का पास बनवाकर वहीं बस जाते हैं। हालांकि ऐसे लोगों को खोज निकालना बड़ी बात नहीं होती। पर परेशानी इसी बात की होती है कि विदेश जाकर व्यक्ति अपना नाम-पता बदल देता है। यहाँ आपके बेग की पूरी तलाशी होती है। कहीं आप ऐसी कोई चीज तो नहीं ले जा रहे, तो विदेशों में प्रतिबंधित है। उनकी आपत्ति सबसे अधिक द्रव्य पदार्थ एवं अचार पर होती है। अचार को वे किसी भी तरह से खाने की चीज़ नहीं मानते। उनके लिए यह ज़हर से कम नहीं। बेग का वजन भी तौला जाता है।  एक बेग का वजन 23 किलो के भीतर ही होना चाहिए। आप 46 किलो से अधिक का सामान अपने साथ नहींं ले जा सकते। इससे अधिक वजन होने पर उसका अलग से चार्ज वसूला जाता है। इसके बाद एयरपोर्ट अधिकारी से यह जवाब मिलता है कि यह बेग आपको आपके लास्ट डेस्टिनेशन पर मिलेगा। यात्रा के अंतिम पड़ाव यानी आप जहाँ जाना चाहते हैं, उसके आखिरी स्टेशन पर। इसके साथ का बेग जो करीब 7 या 8 किलो का होता है, उसे आप अपने साथ विमान में भी रख सकते हैं। इस बेग को साथ रखकर हमें कई सुरक्षा संसाधनों से गुजरना होता है। आपके बेग की स्केनिंग तो होगी ही, आप की जेब में जो कुछ भी है, उसे भी बाहर निकालकर एक ट्रे में रखना होगा। उन चीजों का भी स्केन होता है। इन चीजों में शामिल है, पर्स, जूते, बेल्ट, डायरी आदि। अापके पूरे शरीर का भी स्केन होगा। ताकि यह पता चल सके कि आप अपने साथ कुछ भी आपत्तिजनक चीज नहीं ले जा रहे हैं। यह कार्य कई स्तरों पर होता है, इसलिए इसमें करीब डेढ़ घंटे का वक्त लग जाता है। इसके बाद आपको लाउंज पर बैठकर उस उद् घोषणा का इंतजार करना होता है, जो आपके विमान के बारे में होगी। इसके बाद सबके विमान में जाने की तैयारी होती है। यहाँ सभी के बोर्डिंग पास की बारीकी से जाँच की जाती है। काफी लंबी लाइन होती है। अपने बेग के साथ आप यहीं से सीधे विमान में प्रवेश कर सकते हैं।विमानतल में प्रवेश से लेकर विमान में प्रवेश करने तक जितनी भी जाँच होती है, वह न केवल एयरपोर्ट बल्कि देश की सुरक्षा से भी जुड़ी होती है। विमान में यात्रियों के लिए तीन श्रेणी होती ेहै। पहली बिजनेस, यह वह श्रेणी है, जिसमें यात्री को पूरा एक कमरा ही दे दिया जाता है। जहाँ पर आराम से सोया भी जा सकता है। कमरे में सारी सुविधाएँ होती हैं। इसके बाद होता है फर्स्ट क्लास। इसमें यात्री को थोड़ी ज्यादा जगह मिलती है। विमान में प्रवेश करते ही हमें फर्स्ट क्लास की सीटें दिखाई देने लगती हैं। उसके बाद की श्रेणी होती है, इकॉनामी। इसमें केवल बैठने की सीट होती है। जिसमें यात्री को 12 से 14 घंटे तक बैठना होता है। सीट कुछ पीछे हो सकती है, जिससे कुछ आराम मिलता है। विमान के अंदर होने वाली तमाम गतिविधियां और सामने की सीट पर लगे टीवी के कारण यात्री बोर नहीं होता। सीट पर लगे टीवी से हिंदी, अंग्रेेजी फिल्में, टीवी शो और फिल्मी गानों का आनंद लिया जा सकता है। इसके अलावा विमान की तमाम गतिविधियां जैसे वह कहाँ से होकर गुजर रहा है, भीतर का तापमान कितना है, बाहर का तापमान कितना है, विमान की गति कितनी है, विमान कितने मीटर की ऊँचाई पर है आदि जानकारी भी मिलती रहती है। यह बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी होती है। फिल्मों के बजाए हम अपना ध्यान इसी में लगाएँ, तो यात्रा सुखद और ज्ञानवर्धक बन सकती है।
मैं दिल्ली से अबूधाबी पहुँचा, वहाँ सघन जाँच से गुजरना पड़ा। इस दौरान मैंने पाया कि किसी को कोई हड़बड़ी नहीं है। सभी इत्मीनान से अपना सामान लेकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। जाँचकर्ता अधिकारी को पूरा सहयोग कर रहे हैं। कहीं किसी तरह की कोई बहस नहीं। सभी लोग प्रसन्नता पूर्वक अपने सामान की जाँच करवा रहे हैं। आगे जाने वाले यात्रियों के पास दूसरे विमान में जाने के लिए काफी वक्त था, इसलिए बिना हड़बड़ी के सारे काम संपादित होते रहे। थोड़ी-सी झुंझलाहट तब हुई, जब एक सघन जाँच के कुछ ही देर बाद दूसरी सघन जाँच से गुजरना पड़ा। पुन: वही प्रक्रिया। बेल्ट, जूते, मोजे, पर्स, मोबाइल, डायरी आदि सब कुछ ट्रे में रख दो,वह ट्रे स्केनर से होकर गुजरेगी। यदि कुछ गलत पाया गया, तो आपको रोक लिया जाएगा। इसके बाद भी एक और पूछताछ से गुजरना होता है। आप किस देश में जा रहे हैं और क्यों? वहाँ जाकर क्या करेंगे? वहाँ आपके रहने का पता-ठिकाना क्या होगा? आपको अंगरेजी नहीं आती, पूछने वाला यदि अंगरेज है, तो यहाँ भाषा नहीं, हमारा आत्मविश्वास काम आएगा। वह हमारी आँखों को ही पढ़कर हमारी ईमानदारी को पहचान जाता है। मेरे-उसके बीच थोड़ी-बहुत बातचीत हुई, जिससे वह समझ गया कि यह केवल हिंदी सम्मेलन में भाग लेने जा रहा है।
न्यूयार्क एयरपोर्ट में भूप्पी अपने परिवार के साथ लेने आए
वैसे उनके पास हमारी दी हुई सभी जानकारियाँ होती हैं। इसके बाद भी वे अवश्य पूछते हैं कि आपका लौटना कब होगा? वहाँ जाकर अाप क्या करेंगे? किस तरह से करेंगे? इस तमाम बातों से संतुष्ट होकर वह एक निश्चित ितथि तक आपको उस देश में रहने की अनुमति देते हैं। मुझे अक्टूबर तक यानी छह माह तक अमेरिका में रहने की अनुमति मिली थी। इसके बाद भी वहाँ काफी समय तक आराम करने का अवसर मिला। अबूधाबी से न्यूयाके के लिए विमान सुबह 5 बजे रवाना हुआ। कुछ देर बाद सुबह का नजारा विमान से देखा। बहुत ही अच्छा लगा। विमान दिन भर उड़ता रहा। इसी बीच करीब 13 घंटे की यात्रा पूरी होने के कुछ घंटे पहले एक सूर्योदय और देखा। उस समय विमान कहाँ से उड़ रहा था, यह समझ नहीं आया। पर एक ही दिन में दो सूर्योदय देखना अपने आप में एक सुखद अनुभव था। जब भारत में शाम के पौने 6 बज रहे थे, तब न्यूयार्क में सुबह के सवा नौ बज रहे थे। उसी समय विमान न्यूयार्क एयरपोर्ट पर उतरा। वहाँ मेरे साथी भूपिंदर, अपनी पत्नी और प्यारी-सी बिटिया अर्पण को लेकर मेेरा इंतजार कर रहे थे। मुझे देखते ही भूप्पी ने मुझे बुरी तरह से अपनी बाँहों में जकड़ लिया। बाँहों की जकड़न आज भी याद है। इस जकड़न में था, उनका प्यार, विश्वास और अपनापन। जिसका मैं पूरी अमेरिका यात्रा के दौरान कायल रहा।
अब अगले भाग में लिखूंगा, अमेरिका की यातायात व्यवस्था पर.....
डॉ. महेश परिमल



आम आदमी से बहुत दूर हैं ‘अच्छे दिन’

डॉ. महेश परिमल
अच्छे दिन आएंगे, के बुलंद नारे के साथ भाजपा ने केंद्र में सरकार तो बना ली। पर अब यह स्लोगन भाजपा वालों के लिए ही गले की हड्‌डी बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व फलक पर भले ही अपनी छवि को बहुत ही उज्जवल बना दिया हो, पर सच तो यह है कि देश के भीतर ही उनकी छवि लगातार बिगड़ती जा रही है। अब तो हालत यह है कि केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि आरएसएस के वरिष्ठ नेता भी सरकार की आलोचना करने में पीछे नहीं है। अब तो अच्छे दिन के स्लोगन पर लोग जोक्स तैयार करने लगे हैं। इस स्लोगन का गुणगान करने वाले ही अब इसका जवाब मांगने लगे हैं कि आखिर कब आएंगे अच्छे दिन? दिनों दिन नरेंद्र मोदी पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वे ही बताएं कि अच्छे दिनों की राह आखिर कब तक देखी जाए? कभी प्रधानमंत्री के समर्थक कहे जाने वाले राम जेठमलानी, सुब्रमण्यम स्वामी और अरुण शौरी जैसे लोगों के आक्रामक बयान आने लगे हैं। भू-अधिग्रहण विधेयक के मामले में समर्थक दलों का विश्वास प्राप्त करने में विफल रही सरकार ने कांग्रेस को बैठे-बिठाए एक मुद्दा दे दिया है।
चुनाव के पहले किए गए वादों को पूरा करने या उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया, ऐसी बातें सरकार के खिलाफ जमकर की जा रही हैं। हाल ही में पेट्रोेल-डीजल के दामों में की गई वृद्धि के बाद लोगों में यह बात घर कर गई है कि यह सरकार पूंजीपतियों की सरकार है। जिसे मात्र कुछ लोग ही चला रहे हैं। अच्छे दिनों के बारे में कोई मंत्री कुछ भी कहना नहीं चाहता। मोदी सरकार का यही कहना है कि हमारी सरकार अभी पिछली सरकार द्वारा किए गए कार्यों का खामियाजा भुगत रही है। खामियाजे की यह बात यदि एक वर्ष बाद की जाए, तो समझ में नहीं आता। अब तो लोग सीधे जवाब चाहते हैं। अब उनके सब्र का बांध टूटने लगा है। सरकार ने वृद्धि दर बढ़ाने के लिए मेक इन इंडिया, डीजिटल इंडिया आदि के माध्यम से रोजगारी बढ़ाने की बात कर रहीे है, पर रोजगारी की दिशा में किसी तरह का सुधार दिखाई नहीं दे रहा है। भाजपा के पास आरएसएस जैसा शक्तिशाली संगठन होने के बाद भी वह किसानों की समस्याओं को पूरी तरह से समझने में विफल साबित हुई। जब वरिष्ठ नेता अरुण शौरी ने कहा कि भाजपा सरकार को केवल तीन लोग ही चला रहे हैं, इससे सरकार को सचेत हो जाना चाहिए। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के आरोप पहले कांग्रेस सरकार पर नहीं लगे हैं। उस सरकार पर भी यही आरोप था कि पूरी सरकार को केवल तीन लोग ही चला रहे हैं, मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी और राहुल गांधी। पहले नरेंद्र मोदी इसी बात को लेकर कांग्रेस का मजाक उड़ाया करते थे, अब वही बात उनकी ही पार्टी के लोग कहने लगे हैं और उनका ही मजाक उड़ाने में लगे हैं।
शायद एनडीए सरकार को यह पता नहीं है कि पांच वर्ष तो कुछ समय बाद ही गुजर जाएगा। आखिर उन्हें जाना तो प्रजा के बीच ही है। स्पष्ट बहुमत मिलने के बाद भी यदि सरकार अपने मन-माफिक काम न कर पाए, तो यह प्रजा के लिए आघातजनक ही है। भू-अधिग्रहण का मामला सरकार के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। पर जब भी भाजपा सरकार ने अपने अभिमान का प्रदर्शन किया है, तब उसे मुँह की खानी पड़ी है। अब तो मीडिया 24 घंटे सरकार की तमाम हरकतों पर नजर रखने लगा है। हालत यह हो गई कि सरकार अपनी उपलब्धियों का बखान भी नहीं कर पा रही है। एक न एक एेसा मामला सामने आता जा रहा है, जिससे सरकार की फजीहत हो रही है। कभी अपने ही नेताओं की बदजुबानी ही सरकार को सवालों के घेरे में खड़े कर देती है। सरकार के पास दूरंदेशी योजनाएँ हैं। किंतु वर्तमान को सुधारने के लिए उसके पास ऐसी कोई योजना नहीं है, जिससे लोगों को थोड़ी-बहुत राहत मिले। प्रजा तमाशा देख रही है। किसानों का मामला सामने आते ही रातों-रात सभी किसान प्रेमी होने लगे हैं। प्रजा मानती है कि सरकार के सामने अरबों रुपए के घोटाले के मामले सामने आए हैं। फिर भी सरकार इस दिशा में सख्त कदम नहीं उठा पा रही है। यह सवाल हर सांसद को मुिश्कल में डाल सकता है। वह उद्योगों और निवेशकों से आगे देख ही नहीं पा रही है। प्रजा की तात्कालिक समस्याओं को ताक पर रखकर सरकार उसे देश के 100 स्मार्ट सिटी का सपना दिखा रही है। जनता अभी सुविधा चाहती है। भविष्य की बात नहीं करना चाहती, पता नहीं सरकार को यह बात कौन बताएगा? एक तरफ सरकार विदेशी निवेशकों के लिए लाल-जाजम बिछा रही है, तो दूसरी तरफ स्थानीय उद्योगों को किसी तरह का प्रोत्साहन देने को तैयार नहीं है।
प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी का जादू अब टूटने लगा है। कांग्रेस उनकी आलोचना करे, यह संभव है, पर जब उनकी आलोचना आरएसएस ही करने लगे, तो बात गंभीर हो जाती है। प्रधानमंत्री अपने पर लगे आरोपों का जवाब नहीं देते, इससे लगता है कि वे गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहे हैं। लोग उनके व्यवहार में तानाशाही का अंश देखने लगे हैं। आर्थिक मामलों में मोदी सरकार बुरी तरह से फंसी हुई है। ऐसे में वह फारेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट प्राप्त करने के लिए हाथ-पैर मार रही है। अभी तक सरकार ने निवेशकों का विश्वास नहीं जीता है। इसका निवारण करने के बजाए वह पिछली सरकार की खामियों को उजागर करने में लगी है। प्रजा की अपेक्षाएं लगातार बढ़ रही हैं। प्रधानमंत्री संगठन और राज्य स्तर की प्रशासनिक सेवाओं को बेहतर समझते हैं। लेकिन देश की सरकार चलाना जरा मुश्किल है। सभी देख रहे हैं कि रोज एक नई समस्या मुंह बाय खड़ी रहती है। सरकार इस समस्या का समाधान खोजने के बजाए यूपीए सरकार की गलती बताकर अपना पल्ला झाड़ रही है। मोदी सरकार यह मानकर चल रही है कि उनके मंत्री काम तो कर रहे हैं, पर वे काम दिखाई नहीं दे रहे हैं। या फिर सरकार के काम का प्रचार मंत्री कर नहीं पा रहे हैं। प्रजा तो एक ही रट लगा रही है कि बाकी सब कुछ छोड़ो, हमें अच्छे दिन दिखाओ। पर अब जनता के सब्र का बांध टूट रहा है। मोदी सरकार पर की गई अपेक्षाएं अब पूरी नहीं हो पा रही है। उनके वादों का गुब्बारा अब फूट चुका है। अब कुछ नहीं होने वाला। दुख इस बात का है कि जिस प्रधानमंत्री पर पूरा भरोसा कर उन्हें सत्ता सौंपी, उन पर ही विश्वास नहीं रहा।
‎डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 12 मार्च 2015

गुजराती पत्रकारिता में है 'खुशबू गुजरात' की

गुजराती पत्रकारिता में है 'खुशबू गुजरात' की गुजराती पत्रकारिता की विशेषता है कि वे अपने अतीत को बहुत उज्ज्वल बताते हैं। उसे अपने अतीत पर गौरव है। यही कारण है कि गुजराती पत्रकारिता लम्बे समय तक परम्परागत पत्रकारिता की लकीर पर ही चलती रही है। नई सोच के कुछ अखबारों ने जब गुजरात की धरती पर कदम रखा तो परम्परावादी समाचार-पत्र और पत्रिकाओं ने भी अंगड़ाई ली है। बहरहाल, समय के साथ आ रहे बदलावों के बीच गुजराती पत्रकारिता में आज भी सौंधी 'खुशबू गुजरात' की ही है।
गुजराती पत्रकारिता को लेकर वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक डॉ. महेश परिमल से लम्बी बातचीत का अवसर मिला। नवम्बर, 2013 में दो दिन गुजरात में उनके साथ गुजारने का अवसर भी मिला, तब जाना था कि गुजराती पत्रकारिता पर महेश जी की पैनी नजर है। गुजराती पत्रकारिता पर उनसे बात करना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वे भोपाल में रहकर नियमित तौर पर गुजराती अखबारों का अवलोकन करते हैं। सरल और सहज व्यक्तित्व के धनी महेश परिमल का गुजराती, हिन्दी, छत्तीसगढ़ी और अंग्रेजी भाषा पर पूरा अधिकार है। उनकी किताबें 'लिखो पाती प्यार भरी', 'अनदेखा सच' और 'अरपा की गोद में' काफी चर्चित हैं। श्री परिमल ने बताया कि गुजरात की पत्रकारिता परंपरावादी है। गुजराती पत्रकारों की खबर में न तो रोमांच होता है और न ही सस्पेंस। उनकी खबरों में नयेपन का पूरी तरह अभाव दिखता है। वे आदिकाल से चली आ रही परंपराओं के भीतर रहकर ही अपना काम करते हैं। गुजराती समुदाय पर पत्रकारिता का कितना गहरा असर है, इस संबंध में उन्होंने एक वाकया बताया। वे बताते हैं कि अमूमन गुजराती 'आतंकवादी' शब्द को 'आंतकवादी' कहते हैं। दरअसल, इसकी वजह यह है कि एक बार गुजरात के पुराने और प्रतिष्ठित अखबार ने आतंकवादी को आंतकवादी लिख दिया। फिर क्या था, गुजरातियों की जबान पर यही शब्द चढ़ गया। आज भी वहां कई लोग आतंकवादी को आंतकवादी बोलते हैं। भले ही वहां आतंकवादी लिखा हो, लेकिन वे उसे पढ़ेंगे, आंतकवादी ही।
गुजराती भाषा के प्रमुख अखबारों की सामग्री किस तरह की रहती है? इस सवाल के जवाब में भाषाविज्ञानी महेश परिमल कहते हैं कि परम्परागत लकीर पर चलने के कारण ज्यादातर गुजराती अखबार कंटेंट के साथ ज्यादा प्रयोग नहीं करते हैं। दिव्य भास्कर को छोड़कर दूसरे अखबार काफी पीछे हैं। हां, एकदम नये अखबार 'नव गुजरात समय' ने कुछ नया करने का साहस किया है। वह भी इसलिए, क्योंकि उसकी 90 प्रतिशत टीम दिव्य भास्कर की है। संपादक समेत सभी ने भास्कर से जो कुछ सीखा, उसे ही वे अब नई सोच के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। शेष अखबार कभी-कभी अपने होने का अहसास अवश्य कराते हैं। उन्होंने बताया कि पत्रिकाएं निश्चित रूप से कुछ नया करना चाहती हैं, लेकिन प्रबंधन के कारण उसमें लगातार नयापन नहीं रहता। वे आगे बताते हैं कि साहित्य की दृष्टि से देखें तो गुजराती समाचार पत्र-पत्रिकाएं काफी समृद्ध हैं। गुजराती साहित्य बहुत ही विपुल है। गुजरात की साहित्य सम्पदा पर गुजराती पत्रकारिता और जनमानस को गर्व भी है। अपने साहित्य को उन्होंने विरासत माना है। गुजराती पाठकों की रुचि भी खबरों में कम, आलेख या साहित्यिक सामग्री में अधिक रहती है। यही कारण है कि यहां नियमित अखबार से कहीं अधिक उसके साप्ताहिक विशेषांक की प्रतीक्षा पाठकों को रहती है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि बुधवार को आने वाले साप्ताहिक विशेषांक 16 से 20 पृष्ठ के होते हैं। इनमें करीब 40 स्तम्भकार विविध आलेख तैयार करते हैं। हर तरह के विषय के आलेख होते हैं। आधुनिक विज्ञान, अध्यात्म, धर्म, पुरातत्व, स्वास्थ्य, सेक्स आदि पर केंद्रित आलेखों को खूब स्थान दिया जाता है। शनिवार का विशेषांक फिल्मों पर केंद्रित होता है। इसके अलावा रोज के अखबार में भी दो-तीन कॉलम ऐसे होते ही हैं, जो पठनीय हों। उन्होंने बताया कि जिस तरह से कहा जाता था कि 'नईदुनिया' के पत्र कॉलम में जो नहीं छपा, वह मालवा का साहित्यकार या पत्रकार हो ही नहीं सकता। ठीक इसी तरह गुजरात का जो पाठक अखबार के साप्ताहिक विशेषांक को नहीं पढ़ता, वह सच्चे रूप में पाठक हो ही नहीं सकता। इसलिए पाठकों को अखबार से कहीं अधिक प्रतीक्षा उसके साप्ताहिक विशेषांक की होती है। इसे वे अपनी भाषा में 'पूर्ति' कहते हैं। इसीलिए वहां पत्रकारों से अधिक इज्जत स्तंभकारों की होती है। स्तंभकारों का जुड़ाव पाठकों से अधिक होता है। इसी परम्परा के कारण वहां साहित्यकारों और पत्रकारों में परस्पर सम्मान देखा जाता है।
गुजराती और हिन्दी पत्रकारिता के अंतर को समझाने के लिए महेश परिमल ने बताया कि गुजराती पत्रकार हिंदी पत्रकारों की तरह हमेशा जूझते हुए दिखाई नहीं देते। हिंदी के पत्रकार एक साथ कई खबरों पर काम करते हैं। एक-एक खबर पर काम करते हैं। वे प्रत्येक खबर को खास खबर बनाकर अपने पाठकों के सामने पेश करने के लिए अनथक परिश्रम करते हैं। लेकिन, गुजराती पत्रकार आम खबरों को खास बनाने के इस संघर्ष से नहीं गुजरता। ज्यादातर गुजराती पत्रकार एक ही खबर पर मेहनत करते हैं और उसी खबर पर उनका फोकस होता है। दूसरा अंतर उन्होंने यह बताया कि हिन्दी का पत्रकार अपने पाठकों से ज्यादा जुड़ा रहता है। पाठकों से हिन्दी के पत्रकारों का सीधा संवाद रहता है। इसके साथ ही हिन्दी के अखबार खबरों के टेस्ट से लेकर ले-आउट तक काम कर रहे हैं। पत्रकारिता में आए बदलाव और लोगों की रुचि को गुजराती पत्रकारिता की अपेक्षा हिन्दी पत्रकारिता ने पहले पकड़ लिया। इसी क्रम में उनसे अगला प्रश्न था। ग्लोबलाइजेशन के आने के बाद से हिन्दी पत्रकारिता में आमूलचूल परिवर्तन आया है। यह परिवर्तन कंटेंट से लेकर समाचार माध्यमों (समाचार पत्र, पत्रिका) के रूप-रंग में भी आया है। गुजराती पत्रकारिता पर भी ग्लोबलाइजेशन का प्रभाव दिख रहा है या नहीं? और परिवर्तन दिख रहा है तो आप उसे किस तरह देखते हैं? इसके जवाब में श्री परिमल कहते हैं कि खबरों पर कम किंतु विज्ञापन में अवश्य ग्लोबलाइजेशन का प्रभाव दिखाई देता है। अखबार विज्ञापनों को आकर्षक बनाने के लिए परिश्रम कर लेते हैं, पर खबरों के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। कुछ अखबारों के विदेशी संस्करण भी हैं, तो उनका ग्लोबलाइजेशन केवल विदेशी संस्करणों में ही दिखाई देता है। एक बात यह देखने में आई कि विदेशों में रहने वाले गुजरातियों पर अखबार वालों की विशेष दृष्टि होती है। कहीं भी, किसी भी गुजराती परिवार पर विपत्ति आई या गुजराती परिवार का कोई सदस्य किसी अपराध में शामिल हो गया, तो वहां के गुजराती ही अखबारों को इसकी जानकारी देते हैं। जिसे अखबार वाले विशेष रूप से परिश्रम कर उस खबर को हाइलाइट करते हैं।
गुजराती पत्रकारिता के भविष्य के संबंध में किए गए सवाल के जवाब में श्री महेश परिमल ने बताया कि अब बदलाव दिखाई देने लगा है। पत्रकार भी पाठकों के साथ-साथ जिज्ञासु होने लगे हैं। वे भी देश-दुनिया के बारे में अधिक से अधिक जानना चाहते हैं। पाठकों को अतीत से जोड़कर भी देखने लगे हैं। अतीत पर आज भी कई पत्रकारों के पास बेहतर कलेक्शन हैं। भले ही वह तस्वीरों के माध्यम से हो। पर जब कभी अखबार को गुजरात के अतीत के बारे में जानना हो, तो बुजुर्गों से या दिवंगत साहित्यकारों की किताबों से सामग्री लेने लगे हैं। यह तो गुजराती पत्रकारिता की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे अपने अतीत को बहुत ही अधिक उज्ज्वल बताते हैं। उनके लिए उनका अतीत गौरवशाली है। अब गुजरात के अखबारों में नई चेतना जाग्रत हुई है। 
(जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित साक्षात्कार)






बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

खामोश मतदाता का बुलंद फैसला

डॉ. महेश परिमल
चुनाव के समय जनता खामोश हो, तो उसे उसकी सरलता न समझा जाए, बल्कि यह समझा जाए कि वह कुछ नया करने का सोच रही है। उसके पास परिवर्तन के लिए केवल एक ही शस्त्र है, जिसे वह अपना अधिकार समझती है। पर अपना कीमती वोट देते ही वह ठगी जाती है। लेकिन इस बार जनता ने अपने वोट की कीमत समझी और बहुत ही होशियारी से अपनी बात भी कह दी। अच्छे-अच्छे तीसमारखां भी नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर ये हुआ क्या? किसी ने भी इस परिणाम की कल्पना भी नहीं की थी। स्वयं अरविंद केजरीवाल ने भी नहीं। इसलिए खामोश जनता भी कुछ कहना चाहती है, खामोश की इस भाषा को आज हर नेता को समझने की आवश्यकता है। अब सभी विश्लेषण सामने आ रहे हैं कि अहंकार ही भाजपा को ले डूबा। यह अहंकार इतना घना था कि भाजपा को समाज दलित, पीड़ित वर्ग की पीड़ा दिखाई नहीं दी। भाजपा को अमीरों की पार्टी मानने वाले अब आश्वस्त हो चुके हैं कि यह आरोप गलत नहीं है। आप की जीत ने भाजपा को कई सबक दिए हैं। इसे यदि भाजपा अभी समझ लेती है, तो उसे अगले विधानसभा चुनावों में जीत का डंका बजाने में आसानी होगी। पर नहीं समझी, तो समझ लो, इस बार भी भाजपा बुरी तरह से औंधे मुंह गिरेगी। इस चुनाव की सबसे बड़ी बात यह रही कि कांग्रेस के जिस घमंड ने भाजपा को जिताया, उसी घमंड ने भाजपा को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
केवल ढाई वर्ष पुरानी आम आदमी पार्टी ने बरसों पुरानी कांग्रेस-भाजपा को धूल चाटने को विवश कर दिया है। भाजपा ने 225 से अधिक रैलियां की, उसका उसे कोई फायदा नहीं हुआ। जो तीन सीटें भाजपा ने जीती हैं, वह केवल प्रत्याशियों ने अपने बल पर जीती है। इसमें पार्टी की कोई भूमिका नहीं है। आम आदमी पार्टी की जीत से अब दोनों प्रमुख दलों को किस तरह का बोधपाठ लेना चाहिए, यह सोचने की बात है। फिर भी कुछ बिंदुओं पर चर्चा की जा सकती है:-
कांग्रेस-भाजपा के लिए सबसे बड़ा बोधपाठ यही है कि राजनीति में किसी का अभिमान अधिक समय तक नहीं टिकता। कांग्रेस को 15 साल तक शासन करने के बाद अभिमान आ गया था, वह यह समझने लगी थी कि दिल्ली में उसका कोई विकल्प नहीं है। प्रजा ने दिसम्बर 2013 में ही कांग्रेस के इस घमंड को तोड़कर रख दिया। लोकसभा चुनाव में भाजपा को दिल्ली विधानसभा की 70 में से 60 सीटों में लीड मिली थी, इससे उसे यह अभिमान हो गया था कि उसे कोई हरा नहीं सकता। इस तरह से ऐतिहासिक जीत हासिल करने वाले अरविंद केजरीवाल को भी यदि घमंड आ गया, तो दिल्ली की जनता उसे भी नहीं बख्शेगी।
चुनाव में सबसे अधिक शर्मनाक हार का सामना करने वाली देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए यह सबक है कि नेहरू-गांधी परिवार अब पार्टी को तार नहीं सकते। सोनिया गांधी, राहुल और प्रियंका गांधी की परछाई से बाहर आकर उन्हें नए नेता की तलाश करनी होगी।
दिल्ली में भाजपा सरकार बनाने का दावा सीना ठोंककर करने वाले अमित शाह के लिए यह सबक है कि स्थानीय लोगों की उपेक्षा कर कभी भी कोई चुनाव जीता नहीं जा सकता।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए यह सबक है कि प्रजा केवल लच्छेदार भाषण से ही खुश नहीं होती। आप उन्हें जो वचन देते हैं, उससे वह एक बार तो निश्चित रूप से भले ही भ्रम में रहकर अपना वोट तो देती है, पर बाद में वह उसका परिणाम भी जानना चाहती है। अपने 9 महीने के शासनकाल में प्रधानमंत्री ने केवल बातें ही बनाई है, कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया, जिसका परिणाम तुरंत मिला हो। अपनी किस्मत की बदौलत चलने वाली सरकार अधिक समय तक टिक नहीं सकती।
देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए यह बोधपाठ है कि प्रजा से कभी ऐसे वादे न किए जाएं, जिस पूरा करने की क्षमता न हो। लोकसभा चुनाव के पहले प्रधानमंत्री ने 100 दिनों के अंदर काला धन वापस लाने का वादा किया था, पर वह पूरा नहीं हो पाया। गंगा नदी को शुद्ध करने का वचन दिया था, वह आज भी प्रदूषित ही है। देश से मांस का निर्यात बंद करने का वादा भी प्रधानमंत्री भूल गए। अरविंद केजरीवाल ने भी दिल्ली की जनता से कई ऐसे वादे किए हैं, जो पूरे नहीं किए जा सकते। प्रजा ठोस कार्य चाहती है, झूठे आश्वासन नहीं।
भाजपा-कांग्रेस के लिए बोधपाठ यह है कि गरीबों, दलितों, किसानों, मजदूरों, युवाओं, महिलाओं की उपेक्षा कर उसके हितों को नुकसान पहुंचे, ऐसे कदम उठाकर कोई अधिक समय तक सत्ता पर नहीं रह सकता। भाजपा की गरीबी विरोधी और उद्योग की तरफ झुकाव से गरीब और किसान नाराज हुए हैं। एनडीए सरकार ने जो उतावलापन जमीन संपादन के मामले में विधेयक लाकर किया है, उससे भी किसान भयभीत हैं। विश्व हिंदू परिषद और संघ परिवार के घर वापसी जैसे नारे से मुस्लिम नाराज हुए हैं। यदि केंद्र सरकार ने गरीब तबकों की खुशहाली के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो सत्ता में रहना मुश्किल है।
प्रधानमंत्री और भाजपाध्यक्ष के लिए यह बोधपाठ है कि पार्टी से बरसों से अपनी सेवाएं देने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं और नेताओं की उपेक्षा कर किरण बेदी जैसे लोगों को पैराशूट प्रत्याशी बनाकर जनता पर थोप देने से विजयश्री प्राप्त नहीं की जा सकती।
भारत के चुनाव केवल मेनपॉवर, मनीपॉवर, कीचड़ उछाल और चारित्र्यहनन के आधार पर नहीं जीते जाते। भाजपा ने दिल्ली की गद्दी पाने के लिए सभी तरह के उपायों को आजमाया। भाजपा के पास कार्यकर्ताओं और नेताओं की कमी नहीं थी, बेशुमार दौलत भी लुटाई, केजरीवाल पर कीचड़ उछालने में कोई कसर बाकी न रखी। दूसरी ओर केजरीवाल ने यह जानने की कोशिश की कि दिल्ली की जनता आखिर चाहती क्या है। इसे सामने रखते हुए उन्होंने प्रचार किया। सकारात्मक अभिगम अपनाया। इसलिए उनकी विजय हुई।
भाजपा के खिलाफ जब सारे दल एक हो जाते हैं, तब वह मुश्किल में पड़ जाती है। अगले कुछ महीनों में ही बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां सफलता के परचम गाड़ना आवश्यक है। यदि दिल्ली चुनाव से मिलने वाले बोधपाठ को ध्यान में रखा जाएगा, तो सफलता मिल सकती है।
उपरोक्त बोधपाठ के अलावा अब ऐसे कई विश्लेषण सामने आ गए हैं, जो प्रधानमंत्री और भाजपाध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। चुनाव के पहले सभी दलों द्वारा विषवमन किया गया है, उसके बाद उन्हीं दलों से अच्छे से व्यवहार करना बहुत मुश्किल है। इसलिए ऐसा भी न बोलो कि बाद में अपना वही व्यवहार उन्हें आपत्तिजनक लगे। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि राजनीतिक दल अपने व्यवहार में कुछ बदलाव करेंगे, पर यह तो करना ही होगा कि अपनी सारी नीतियां, अपने विचारों में आम आदमी और उनकी समस्याओं को भी रखें। इससे मुसीबत के समय वही आम आदमी ही काम आएगा। यदि आम आदमी को हाशिए पर लाया गया, तो वही आम आदमी जब भी अपनी ताकत दिखाएगा, तो वह एक बुलंद फैसला ही होगा।
‎   डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

सृष्टि का यौवन है वसंत

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

आओ, प्‍यार को अभिव्‍यक्ति दें

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

वायु प्रदूषण ने बढ़ाई चिंता

 

 आज हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्दों का प्रचलन हिंदी के लिए आशीर्वाद है या अभिशाप

डॉ. महेश परिमल
भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। इसके बिना एक समाज की कल्पना करना ही मुश्किल है। भाषा ही हमारे जीेवन को सँवारती है। भाषा हमें जीने का आधार देती है। हिंदी के बारे में यही कहा जा सकता है कि यह इतनी सरल और सहज भाषा है कि थोड़े से प्रयास से इसे कोई भी अहिंदीभाषी भी सीख सकता है। आज यह करोड़ों लोगों की भाषा बनी हुई है। इसके पीछे यही है कि यह अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण करने में संकोच नहीं करती। एक भाषा में यदि दूसरी भाषा के शब्दों का आगमन होता है, तो उससे भाषा समृद्ध होती है। जिन भाषाओं ने प्रगति की है, उन सभी भाषाओं ने दूसरी भाषा के शब्दों को ग्रहण करने में संकोच नहीं किया है। हम अँगरेजी की बात करें, तो आज उस भाषा में हिंदी के करीब 2500 शब्दों का समावेश किया गया है। इसी तरह हिंदी में भी अन्य भाषाओें के शब्दों को लिया गया है, इसलिए यह भाषा इतनी सहज और सरल बन पाई है।
हम बरसाें से हिंदी भाषा का प्रयोग बातचीत और लेखन में कर रहे हैं। अब तो यह भाषा हममें रच-बस गई है। इस भाषा में जब हम अपने विचारों की अभिव्यक्ति देते हैं, तो हमें पता ही नहीं चलता कि इसमें न जाने कितने ही शब्द हिंदी के न होकर किसी अन्य भाषा के हैं। हम एक इमारत बनाते हैं, तो यह आवश्यक नहीं कि उसके लिए प्रयुक्त सारी सामग्री हमें उसी शहर में मिल जाए। कई बार कई चीजें हमें दूसरे शहर से लानी होती है। ठीक इसी तरह एक भाषा तभी सुदृढ़ बनती है, जब उसमें अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश किया जाए। इसलिए हम दावे से यह कह सकते हैं कि हिंदी में अन्य भाषाओं के शब्दों का समावेश होने के कारण यह भाषा आज करोड़ों लोगों द्वारा व्यवहृत की जा रही है। हिंदी भाषा के लिए इसे आशीर्वाद ही माना जाएगा कि इसने बहुत ही सहजता के साथ अन्य भाषाओं के शब्दों को ग्रहण किया है।
अब हम चर्चा करें उन शब्दों की, जो हिंदी के नहीं हैं, पर एक निरक्षर ग्रामीण भी उसका अर्थ समझता है। हम ‘कफ़न’ को ही ले लें, इसका अर्थ आज हर कोई समझता है। पर यदि हम इसके बजाए हिंदी का शब्द ‘मृतचैल’ कहेंगे, तो ग्रामीण ही नहीं, एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी इसे नहीं समझ पाएगा। ‘पाव’ शब्द पुर्तगाली है, जो िहंदी में आसानी से घुल-मिल गया है। आज इससे पाव रोटी, पाव वड़ा, पाव भाजी जैसे शब्द बने। इसका प्रयोग हर कोई अपनी भाषा में कर रहा है। ‘चर्चा’ शब्द उर्दू का है, जिसे पुलिंग के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है, हिंदी ने इस शब्द को स्त्रीलिंग के रूप में शामिल किया। भाषा जितनी अधिक लचीली होगी, उतनी ही समृद्ध भी। पानी के तेज बहाव में वही वनस्पति या पेड़ अधिक समय तक बने रहते हैं, जो झुकना जानते हैं। अकड़ हर किसी के लिए खतरनाक होती है। इसलिए भाषा के संबंध में भी यही कहा जाता है कि लचीली भाषा अधिक समय तक जीवित रहती है। इस मामले में अँगरेज़ी की मिसाल दी जाती है, जिसने दुनियाभर की भाषाओं से शब्द अपनाए हैं। दर्शन, अध्यात्म के मामले में उसने कई भारतीय शब्द लिए हैं। जैसे- गुरु, पंडित, योग, आँचल, जंगल आदि। जो चीजें विदेशी परिवेश से आई हैं, उनके लिए विदेशी शब्द ले लेना एकबारगी ठीक भी है, लेकिन सरल, सहज और प्रचलित हिंदी शब्दों की जगह अँगरेज़ी का इस्तेमाल गलत है। हिंदी ने भी फ़ारसी, अरबी, फ्रेंच, पुर्तगाली, रूसी, न जाने कितनी ही भाषाओं से शब्द लिए हैं। लेकिन यह लेन-देन स्वाभाविक और आवश्यक रहा है। हिंदी फिल्मों के नाम आज अँगरेज़ी शब्दों में लिखे जा रहे हैं-जैसे 'वेकअप सिड', 'जब वी मैट', 'वेलकम टू सज्जनपुर', 'थ्री इडिएट्स', 'गॉड तुसी ग्रेट हो' आदि। ये फिल्में खूब चली हैं और हिंदीभाषी जनता ने उन्हें खूब देखा भी है, तो इसका मतलब क्या लगाया जाए? यही कि जनता ने इसे, अपने आप सहज ही या मजबूरी में स्वीकार कर लिया है।

आज चिकित्सक के स्थान पर वैद्य लिखने के आग्रही हम नहीं हैं, क्योंकि हिन्दी परिवेश में वैद्य शब्द के साथ एक अलग व्यंजना जुड़ गई है मसलन देशी पद्धति से इलाज करनेवाला। आधुनिक चिकित्सा पद्धति के संदर्भ में डॉक्टर शब्द सर्वमान्य हो चुका है। अब इसे हिन्दी कोशों में जगह दी जानी चाहिए। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी हर साल प्रचलन के आधार पर अँगरेज़ी में समाते जा रहे अन्य भाषाओं के शब्दों को अँगरेज़ी भाषा में स्वीकार्य शब्दों के तौर पर शामिल करती है। बैंक, सैलरी, फंड, टीवी, जींस, पेंट, टी-शर्ट, जैसे दर्जनों शब्दों को हिन्दी कोशों में स्वीकार्य शब्द के तौर पर स्थान दिया जाना चाहिए, तभी हम शुद्धतावादियों के दुराग्रह से भी बच पाएँगे। देश में संचार माध्यमों के बढ़ते प्रभाव के चलते संस्कृतियों के बीच अंतर्संबंध बढ़ने लगा है। आज मुंबइया शैली की हिन्दी भी सामने आई है। इस शैली के अनेक शब्दों की व्यंजना निराली है। फंटूश, बिंदास, फंडा, फंडू, भिड़ू, बीड़ू जैसे शब्द भी इसी कतार में आते हैं।
मेरा मानना है कि हिंदी की समृद्धि के लिए हमें अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द लेने में संकोच नहीं करना चाहिए। आखिर वे भी इसी मिट्टी की भाषाएँ हैं। इससे आपकी अभिव्यक्ति और अधिक निखरेगी। हम अपनी बात को पूरी शिद्दत के साथ रख पाएँगे। भाषाएँ जनता की सम्पत्ति है, उन्हें सुरक्षित रखना अनिवार्य है। हम अकेले व्यवस्था को नहीं बदल सकते, लेकिन हम अपने घर पर, दुकान पर, अपने समाज में, मित्रमंडली में अपनी भाषा और उसके अधिकाधिक शब्दों का प्रयोग तो कर ही सकते हैं। हम घर पर अपने बच्चों को मातृभाषा तो सिखा ही सकते हैं। हम स्वयं अपनी भाषा को सुरक्षित तो रख ही सकते हैं। आज हम ढोकला, खाखरा, थेपला आदि गुजराती व्यंजन दक्षिण भारत में भी खा सकते हैं। इडली-डोसा भी देश के कोने-कोने में मिल जाता है। पंजाब के छोले-भटूरे, छोले-कुलचे भी आज हर जगह मिल जाते हैं। जब हम व्यंजन के मामले में इतने दुराग्रही नहीं हैं, तो फिर भाषा के मामले में क्यों होना चाहिए?
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2015

धैर्य की सीमा

डॉ. महेश परिमल
लोग कहते हैं कि धैर्य की सीमा क्या होनी चाहिए? एक जिज्ञासु ने जब मुझसे यह प्रश्न किया, तो मैंने कहा-यदि धैर्य की सीमा जानना चाहते हो, तो पानी को बर्फ बनता देखो। पानी का बर्फ बनना यानी तापमान का लगातार गिरना। तापमान का गिरना यानी ठंड के थपेड़ों को सहना। अपनी आंखों के सामने एक-एक चीज का सिमटना। आँख का संकुचित होना। पानी काे एकटक देखना। निर्निमेष देखती आँखें और पानी का रूप परिवर्तन। ठीक वैसे ही, जैसे तेज हवाओं के आगे बुझते दीपक को जलाए रखने की मशक्कत करना। एक स्थिति ऐसी आती है, जब हमें स्वयं का भान नहीं होता। यही होती है ध्यान की अवस्था। इस दौरान जो कुछ होता है, वही है सच्चा ध्यान। इधर पानी बर्फ बनता है, उधर ध्यान पूरा होता है। एक नई चीज आपके सामने होती है। आपको लगता है कि आज मेरे सामने कुछ नया हुआ। यहां से शुरू होती है खुद को पहचानने की कला। इस कला को हर कोई नहीं समझ सकता। खुद को पहचानना यानी खुदा को पहचानना। इसलिए ईश्वर तक जाने का रास्ता खुद से निकलता है। ईश्वर को खोजने के लिए खुद को खोज लो, ईश्वर आपके सामने होंगे।
अब आप कहेंगे कि ये ईश्वर क्या होता है? जो हमें संबल दे, हमें चुनौतियों से लड़ना सिखाए, हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे, वह ईश्वर। यह काम यदि कोई इंसान भी करे, तो भी वह हमारे लिए ईश्वर ही है। ईश्वर स्वयं सभी जगह नहीं जा पाते, इसलिए वे अपना प्रतिनिधि भेजते हैं, जो उनकी तरह काम करते हैं। अब इस प्रतिनिधि को कौन पहचान पाता है? वही जिसे ईश्वर की तलाश है। इसलिए यदि हमारे आसपास कोई ऐसा इंसान है, जो ईश्वर की तरह काम करता है, तो उसे अपना आराध्य मान लो। यह किसी भी रूप में हो सकता है। कभी किसी बुजुर्ग के रूप में या फिर बच्चे के रूप में। प्रेयसी में यदि ईश्वर के दर्शन करना चाहते हैं, तो उसके लिए रामकृष्ण परमहंस बनना होगा। रामकृष्ण परमहंस यानी विवेकानंद के गुरु। इनकी सीमा तक पहुँचना हम साधारण इंसान के बस की बात नहीं है। हमें तो केवल पानी को बर्फ बनने की प्रक्रिया देखनी है। यही है धैर्य की सीमा।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

इस देश में चलती है कैंसर एक्सप्रेस

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

एक थे गाँधीजी

http://www.lokottar.com/Epaper.aspx?dt=1/30/2015%2012:00:00%20AM&Page=3816

एक थे गांधीजी
डॉ. महेश परिमल
गांधी यानी कौन? ऐसा सवाल आज भले ही कहीं नहीं पूछा जाए, पर ‘गांधी’ यानी कौन से गांधी? यह सवाल आजकल प्रासंगिक होता जा रहा है। गांधी यानी करेंसी नोट में जिनकी तस्वीर है, वो? या फिर उनकी समाधि पर फूल-मालाएं चढ़ाने की परंपरा, जिसमें विदेश से आए मेहमान का वहां जाना अनिवार्य है। गांधी यानी महात्मा मंदिर वाले गांधी? गांधी यानी ‘राष्ट्रवादी हिंदू’, इन्हीं पर ये आरोप है कि गांधीजी की हत्या के बाद इनके अनुयायियों द्वारा मिठाई बांटी गई थी। गांधी यानी मजबूरी नहीं, बल्कि दंभ का नाम। गांधी यानी देश-विदेश में उनकी प्रतिमा स्थापित करने की प्रथा। गांधी यानी उनके नाम पर चलने वाले राजनीति की कथित दुकानें और उनकी बेशुमार दौलत। गांधी यानी उनके चरित्र को हनन करने की प्रवृत्ति आज उनकी हत्या के 66 साल बाद भी लोगों को नशे की ‘किक’ देती है। गांधी यानी जिसे अंबेडकर ने अपना कट्‌टर विरोधी माना, वो। या फिर गांधी यानी वो, जिन्होंने दलित के मामले को मुख्य धारा में लाने के लिए तन-मन से प्रयास किया। या फिर उनके नाम से देश में चल रहा स्वच्छता अभियान?
आज गांधी को हर कोई अपनी तरह से परिभाषित करता है। अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है। कुछ माह पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी जी को एक बार हाशिए पर लाकर सरदार वल्लभ भाई पटेल को सामने लाने का प्रयास किया था, पर बाद में उन्हें लगा कि इस देश में बिना गांधी को साथ लिए कोई भी बड़ा काम नहीं किया जा सकता, इसलिए उन्होंने सफाई के नाम पर उनका नाम जोड़ दिया, ताकि उसके सहारे देश को गांधी के सपनों का भारत बनाया जा सके। इस तरह से गांधी जी हम सबके बीच व्यावहारिक हो गए। वे हमारे बीच आकर अपनी बातें कहने लगे। सफाई के नाम पर आज देश में हर कोई उन्हें याद कर रहा है। इस तरह से यह संदेश गया कि गांधी जी को भूलकर इस देश में राजनीति हो ही नहीं सकती। जिस तरह से पाकिस्तान में कश्मीर के बिना राजनीति की ही नहीं जा सकती, ठीक उसी तरह भारत में जो गांधी को भूला, लोग उसे भूलने में देर नही करते हैं। गुजरात में उनके नाम पर भव्य महात्मा मंदिर बनाया गया। इस मंदिर को वे स्वयं देखते, तो शर्मिंदा हो जाते। इस भव्य मंदिर का काम विदेशियों को भारत में पूंजी निवेश के लिए लुभाने का ही है। यानी विदेशियों को लुभाना है, तो भी गांधी जी का सहारा।
आज हर कोई गांधी का उपयोग करने में लगा है। इसमें कोई माहिर है, तो कोई फिसड्‌डी। गांधी जी को सामने रखकर किस तरह से अपनी बात को लोगों तक पहुंचाई जाए, यही मुख्य मुद्दा है। गांधी जी के तमाम अनुयायी अपने-अपने क्षेत्रों में सफल सिद्ध हुए हैं। सभी ने उनका इस्तेमाल कर स्वयं को ही विकसित किया है। इसे वे प्रगति का नाम देते हैं। गांधी जी के सच्चे अनुयायी आज भी सुदूर गांवों में कुछ न कुछ ऐसा कर रहे हैं, जो उनके नाम को जीवित रखे हुए हैं। कई विदेशी भी इसमें शामिल हैं, जिन्हें यह विश्वास ही नहीं है कि इस देश में कभी कोई ऐसा व्यक्ति भी था, जो हाड़-मांस का एक लोथड़ा ही था। जिसमें गजब की ताकत थी। वह हिंसा का जवाब अहिंसा से देता था। उसके विरोध करने का तरीका एकदम ही अलग था। वह लोगों को शांति का पाठ पढ़ाता था। जिसकी वाणी में वह ताकत थी कि लोग अपना सब कुछ छोड़कर उनके साथ हो लेते थे।
आज की पीढ़ी गांधीजी को रिचर्ड एटनबरो के माध्यम से जानती है। वह ‘गांधी’ फिल्म देखकर उन्हें समझने की कोशिश करती है। उन्हें तो यह सुनकर अजूबा लगता है कि एक विदेशी ने गांधी को किस तरह से समझा और उन्हें फिल्म में उतारा। क्या हमारे देश में कोई भी ऐसा नहीं है, जो गांधी को सच्चे स्वरूप में हमारे सामने लाए? किताबों वाले गांधी जी में काफी विकृति अा गई है। गांधी जी के नाम पर सबसे अधिक पाप तो किताबों के माध्यम से ही हुआ है। गांधी पर लिखी किताब हमारे देश में विवादास्पद न हो, ऐसा संभव ही नहीं। गांधी की सही तस्वीर तो उनकी जीवनी ‘सत्य के प्रयोग’ में ही मिलती है। पर वह भी उनके जीवन को पूरी तरह से नहीं दर्शाती। जीवनी में 1920 तक के जीवन का ही जिक्र है, उसके बाद उनका जीवन सार्वजनिक हो गया। ऐसे में उन्हें पूरी तरह से समझना आज की पीढ़ी के बस की बात नहीं। इस देश में गांधी के नाम पर जितने तमाशे हुए हैं, उतने किसी के नाम पर नहीं हुए। जिसने भी उनके नाम पर तमाशा खड़ा किया, कुछ समय बाद वह और अधिक चर्चित हो गया। गांधी जी स्वयं गरीब रहे, गरीबों के रहनुमा रहे, उनके अनुयायी भी गरीब ही बने रहे, पर जिसने उनके नाम की दुकानें चलाई, वह देखते ही देखते अमीरों की श्रेणी में आ गया।
गांधी जी ने देश को बहुत कुछ दिया। पर गांधी के नाम पर देश ने बहुत कुछ खोया भी। आज देश में ईमानदारी का स्थान भ्रष्टाचार ने ले लिया है। देश में भ्रष्टाचारियों की लंबी फेहरिस्त है। कोई विभाग ऐसा नहीं है, जो भ्रष्ट न हो। न्याय आज रईसजादों की जेब में रहता है। यह तो कई न्यायाधीशों के भ्रष्ट होने से ही पता चल जाता है। आज सत्ता भी कुबेरपतियों के हाथों की कठपुतली बन गई है। सत्ता का मद ऐसा छाया है कि वह सत्तासीन के हाथों से अलग ही नहीं होती।
गांधी जी आज भले ही न हों, पर वे आज भी जीवित हैं, तो केवल सत्य में, सादे जीवन में, दु:ख में, विलाप में, सद्भावना में ही हैं। निराशामय जीवन में एक ज्योति के रूप में हैं। सुदूर गांवों में कहीं कोई वीतरागी यदि सत्कार्य करता है, तो वह गांधी जी के करीब है। कहीं कोई अत्याचार से पीड़ित है और उसमें प्रतिकार की क्षमता नहीं है, तो वह बहुत दूर है गांधी जी से। गांधी हमारे कोमल हृदय में हैं। हमारी सादगी में हैं। हमारी सांसों में रचे-बसे हैं, बस वे कदापि वहां नहीं हैं, जहां उनके होने का दावा किया जा रहा है।
‎ डॉ. महेश परिमल

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