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12:51 pm
कविता का अंश... न पूछो इस ठंड में, हम क्या-क्या किया करते थे, कड़े मीठे अमरूद , हम ठेले से छटा करते थे । सूरज जब कोहरा ओढ़ सोता था, हम सहेलियों संग, पिकनिक मनाया करते थे । छत पे लेट, गुनगुनी धूप लपेट, नमक संग मूँगफली खाया करते थे । धूप से रहती थी कुछ यों यारी, के जाती थी धूप जिधर, उधर ही चटाई खिसकाया करते थे । ठंडी रज़ाई का गरम कोना, ले ले बहन तो बस झगड़ा किया करते थे। ऐसे में माँ कह दे कोई काम, तो बस मुँह बनाया करते थे। गरम कुरकुरे से बैठे हों सब, ऐसे में दरवाज़े की दस्तक, कौन खोले उठ के, एक दुसरे का मुँह देखा करते थे। लद के कपड़ों से, जब घर से निकला करते थे, मुँह से बनते थे भाप के छल्ले, सिगरेट पीने का भी अभिनय किया करते थे। जल जाए अंगीठी कभी, तो घर के सारे काम मनो ठप पड़ जाते थे। सभी उसके आस पास जमा हो, गप लड़ाया करते थे। अपनी ओर की आँच बढ़े कैसे, ये जतन किया करते थे। न पूछो, इस कड़ाके की ठंड में, हम क्या-क्या किया करते थे। इस कविता का आनंद ऑडियो की मदद से लीजिए...

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