गुरुवार, 3 नवंबर 2011

जनसंख्या विस्फोट से सांस्कृतिक संघर्ष की आशंका


डॉ. महेश परिमल

विश्व के सात अरबवें बच्चे का जन्म हो गया। इस अवसर पर खुशी मनाई जाए या दु:खी हुआ जाए। इस खबर से खुशी तो कम किंतु दु:ख अवश्य मनाया जा सकता है। आबादी अभी और बढ़नी ही है। लेकिन इसके साथ-साथ समाज में जो विषमताएँ आएँगी, वे बहुत ही भयावह होंगी। जनसंख्या विस्फोट से जिस सांस्कृतिक संघर्ष की शुरुआत होगी, वह त्रासदायी होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि देश में उत्तर और दक्षिण के बीच कटुता और वैमनस्यता में बढ़ोत्तरी होगी।
अब जब हम सात अरब हो चुके हैं, तो इसे भारतीय संदर्भ में देखें, तो स्पष्ट होगा कि देश के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों में वैमनस्यता बढ़ने के पूरे आसार हैं। दूसरी तरफ उत्तर से अकुशल कर्मचारियों का बहाव दक्षिण भारत की तरफ रहेगा। इससे सांस्कृतिक संर्घष बढ़ेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व की 17 प्रतिशत मानव आबादी में स्थान रखने वाला हमारा देश सदी के उत्तरार्ध के प्रारंभ में एक अरब 21 करोड़ से बढ़कर एक अरब 80 करोड़ की आबादी वाला देश बन जाएगा। इससे न केवल भौगोलिक विभाजन बल्कि सामाजिक, आर्थिक विभाजन की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इस प्रचंड जनसंख्या के साथ एक ओर भारत विश्व परिदृश्य में शहरीकरण की तरफ बढ़ेगा। शहरों की आबादी बेशुमार बढ़ेगी, इससे लोगों को हवा ओर पानी और पोषणयुक्त आहार के लिए भारी मशक्कत करनी होगी। यही वजह होगी, जब आर्थिक और सामाजिक स्तर पर लोग परस्पर झगड़ेंगे। तनाव बढ़ेंगे और अपराध को प्रश्रय मिलेगा।
बेंगलोर स्थित थिट टेंक इंस्टीटच्यूट फॉर सोशल एंड इकानॉमी चेंज (आईएसईसी) के जनसंख्या शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रोफेसर के.एस. जेम्स के अनुसार भारत के उत्तर क्षेत्र से अकुशल कर्मचारियों का प्रवाह दक्षिण की ओर होना शुरू हो गया है। अब शहरों में महिला कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ने लगी है। यह स्थिति कई विषमताओं को जन्म देगी। जैसे अपराध, सांस्कृतिक हमले, जातिगत तनाव आदि। पश्चिमी देशों का उल्लेख करते हुए प्रो. जेम्स कहते हैं कि वहाँ देर से शादी और बढ़ते तलाक के साथ-साथ बिना शादी के साथ-साथ रहने की जीवनशैली से पूरे समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। अंतरजातीय विवाह होने से परिवारों में विभिन्न जाति-धर्म के लोग परस्पर सांस्कृतिक विषमताएँ पैदा करेंगे। जिससे समाज में शांति का अभाव होगा।
आज जिस तरह से मायानगरी में उत्तर भारतीय या बिहारियों का विरोध हो रहा है, उससे कटुता बढ़ने के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। उक्त राज्योंे में बेरोजगारी के कारण लोगों को हुजूम अन्य राज्यों के शहरों की ओर बढ़ रहा है। इससे वहाँ के मूल लोगों का अधिकार धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। वहाँ के लोग काम में कुशल होने के कारण अधिक मजदूरी की माँग करते हैं, जबकि वही काम कम कुशल व्यक्ति करता है, तो सामाजिक कटुता बढ़ना स्वाभाविक है। कम कुशल व्यक्ति कम मजदूरी में काम तो कर लेता है, पर उसका वह काम लंबे समय तक नहीं टिक पाता। इसे उपभोक्ता बाद में समझ पाता है। जब एक राज्य के लोग दूसरे राज्य में बढ़ने लगते हैं, तो उनमें एक राज्यीय होने की भावना को बल मिलता है। इससे एक नए समाज का निर्माण होता है। यह समाज जाति से परे होता है। इसमें राज्य का होना ही महत्वपूर्ण होता है। ये लोग एक होकर अपनी माँगे मनवाने के लिए मिलकर काम करते हैं। इससे अन्य राज्य के लोग भी प्रेरित होते है। फलस्वरूप मूल निवासियों में असुरक्षा की भावना बढ़ने लगती है। यही से शुरू होता है राज्यीय संघर्ष। आज मायानगरी में जो कुछ हो रहा है, वही अब बड़े स्तर पर जनसंख्या विस्फोट के बाद अन्य शहरों में भी होगा।
किसी घर में नए बच्चे का आगमन खुशी की बात होती है, लेकिन इसके साथ नई जिम्मेदारियां और चुनौतियां भी आती हैं। ज्ञात इतिहास में पहली बार सिर्फ 13 साल में आबादी एक अरब बढ़ गई है, तो इसका कारण अनेक क्षेत्रों में इंसान की कामयाबियां हैं। स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल, बुनियादी चीजों की अधिक उपलब्धता एवं अप्राकृतिक मौतों में कमी के कारण आज मनुष्य का औसत जीवनकाल 68 साल है, जबकि 1950 में यह महज 48 साल था। इन्हीं वजहों से आबादी अभी और बढ़ेगी। अनुमान है कि 2080 के आसपास यह सवा नौ से लेकर दस अरब तक पहुंच सकती है। ज्यादा लोगों का मतलब खाद्यान्न, पानी और अन्य सुविधाओं की अधिक आवश्यकता के साथ-साथ धरती के तापमान में ज्यादा इजाफे का अंदेशा है, जिससे जलवायु परिवर्तन की चुनौती अधिक गंभीर हो सकती है। गौरतलब है कि दुनिया का हर छठा मनुष्य भारतवासी है। अगर दुनिया में अनाज या पानी की कमी गंभीर रूप लेती है तो उसकी सीधी मार भारत के जनजीवन एवं विकास की अपेक्षाओं पर पड़ेगी। इसलिए हमारे योजनाकारों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार होना होगा। वैसे भी यह चुनौती अनंत नहीं है। परिवार नियोजन संबंधी आविष्कारों तथा मानव समाज में बढ़ती जागरूकता ने जनसंख्या वृद्धि की दर घटा दी है। आज विश्व जनसंख्या प्रतिवर्ष एक प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जबकि 1960 के दशक के आखिर तक यह दर दो फीसदी थी। 1970 में दुनिया में प्रति महिला 4.45 बच्चे का जन्म होता था, जो दर अब 2.45 तक गिर चुकी है। यह आशा वास्तविक है कि प्रति महिला 2.1 बच्चे की जन्म दर का लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाएगा, जिससे आबादी स्थिर हो जाएगी। यानी अगर निकट एवं मध्यकालीन भविष्य तक स्थितियों को संभाल लिया गया, तो फिर मानवता के सुखद भविष्य की उम्मीदों को साकार किया जा सकता है।
यह सच है कि जागरुकता बढ़ने लगी है। एक निरक्षर दम्पति भी दो से अधिक संतानों की चाहत नहीं रखते। यह एक सुखद संकेत है, लेकिन दुश्वारियों के बढ़ने से जीवन मूल्यों में आ रहे परिवर्तन से कोई भी अछूता नहीं है। सामाजिक चेतना के अभाव में राज्यों के बजट भी प्रभावित होने लगे हैं। आबादी सारी योजनाओं को धता बता देती है। ऐसे में जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिये का दायरा बढ़े, तो कुछ बेहतर परिणामों की अपेक्षा की जा सकती है।
डॉ. महेश परिमल

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