मंगलवार, 3 जनवरी 2012

छत्तीसगढ़ में बढ़ रही है ‘छिछान’ प्रवृत्ति


डॉ. महेश परिमल


इस तस्‍वीर को देख रहे हैं आप? गौर से देखें, छत्तीसगढ़ में इस पक्षी को ‘छिछान’ कहते हैं। इस पक्षी की यह विशेषता होती है कि प्रशिक्षित होने के बाद यह अन्य पक्षियों को मारकर अपने मालिक को देता है। स्वयं तो यह कीड़े-मकोड़े खाता है, पर अपने मालिक के लिए अपनी ही जाति के पक्षियों को मारकर देता है। देखने में यह गिद्ध जैसा दिखाई देता है। अंग्रेजी में इस शिक्रा कहा जाता है। ‘छिछान’ की जो प्रवृत्ति है, वह इन दिनों छत्तीसगढ़ में विशेष रूप से देखने में आ रही है। मध्यप्रदेश से अलग होने के बाद पूरे छत्तीसगढ़ में जहाँ एक ओर विकास का रथ तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं रोजगार के लिए लोग अभी भी पलायन कर रहे हैं। खेती-किसानी के लिए लोगों को मजदूर नहीं मिल रहे हैं। दूसरी तरफ स्टेशन पर दूसरे राज्यों में रोजगार प्राप्त करने के लिए लोगों की भीड़ लगी है। बाहर से लोग आकर वहाँ खेती कर रहे हैं, तो वहीं के मूल निवासी दूसरे राज्यों में स्वयं को सुरक्षित समझते हैं। लोग कहते हैं कि छतीसगढ़ तेजी से विकास कर रहा है। बात सच है, पर यह विकास क्या आर्थिक है या सामाजिक? इसे जानने की फुरसत किसी को नहीं है। बाहर से आए हुए कुछ रसूखदारों के हाथों में ऐसे अधिकार आ गए हैं, जिससे वे वहीं के निवासियों से काम करवाते हैं। परदे के पीछे पूरा खेल उन्हीं का होता है। पर सामने निरीह छत्तीसगढ़ी ही दिखाई देते हैं। जिनका सर्वस्व लुट गया है, वे ही दूसरों को और अधिक अधिकार सम्मत बना रहे हैं। शायद इसे ही कहते हैं ‘छिछान’ प्रवृत्ति।पूरे छत्तीसगढ़ में बदलाव की बयार बह रही है। हर कोई विकास की बातें कर रहा है। इस विकास ने राज्य के सांस्कृतिक मूल्यों को किस तरह से प्रभावित किया है। यह कोई जानना नहीं चाहता। ‘मितान’ जैसी शुद्ध परंपरा अब मैली होने लगी है। पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव इतना जबर्दस्त है कि बबा, दाई, ददा, बहिनी, दीदी, भौजी जैसे शब्द बच्चों के मुँह से नहीं निकल पा रहे हैं, सभी रिश्ते अंकल-आंटी में ही सिमट गए हैं। बच्चे न जाने अपनी बला से, पर इन शब्दों का अर्थ बताने की जहमत भी कोई उठाना नहीं चाहता। न तो शालाओं में न ही किसी सामाजिक कार्यक्रमों में। छत्तीसगढ़ी भाषा केवल गाँवों में ही सुनने को मिल रही है।राजधानी की सड़कें चमक रहीं हैं, पर सुदूर जशपुर जिले में सड़कों के नाम पर जो कुछ है, उसे सड़क तो कदापि नहीं कहा जा सकता। गाँवों में आज भी पटवारी की तबीयत बढ़ती रकम के साथ अच्छी होने लगती है। अस्पतालों में डॉक्टर हों न हों, पर मरीज की कतारें अवश्य होती हैं। यह सच है कि विकास सदैव विध्वंस के रास्ते से आता है, पर इसका यह आशय तो कदापि नहीं कि विध्वंस ही इतना भयानक हो, जिससे विकास ही अवरुद्ध हो जाए। पूरे राज्य कमें कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला। लोगों का भोलापन न जाने कहाँ चला गया। सादगी के नजारे कहीं कहीं ही देखने को मिल रहे हैं। धीरे-धीरे शायद यह भी लुप्त हो जाए। न तो नगरी में दुबराज चावल की सुगंध ही मिल रही है और न ही आरंग के बड़े में वह स्वाद है। छत्तीसगढ़ के एक बड़े भू-भाग में घूमकर सब कुछ देखने को मिला, पर ‘छत्तीसगढ़पन’ के दर्शन कम ही हुए। बच्चों में वैसी चंचलता भी देखने को नहीं मिली। शालाओं में वे अब छत्तीसगढ़ी नहीं बोलते, बल्कि हिंदी में ही अधिक से अधिक अंग्रेजी के शब्दों को लाने का प्रयास करते दिखते हैं।संभवत: मेरी ही नजरों का धोखा होगा, जहाँ मैं छत्तीसगढ़पन खोज रहा हूंँ, वहाँ कभी मैं पला-बढ़ा था। मुझे तो आज भी वहाँ की माटी का सौंधापन खींच ले जाता है। बारब-बार जाता हूँ, पर हर बार निराश ही होता हूँ। क्या हो गया मेरे छत्तीसगढ़ को? किसकी नजर लग गई भला मेरे छत्तीसगढ़ को? मेरे इस प्रश्न का उत्तर कौन देगा? छिछान तो केवल एक पक्षी मात्र है, वह तो वही करेगा, जो उसे सिखाया जाएगा। पर यहाँ की मेहनतकश लोगों की कद्र यहीं नहीं है। आखिर उन्हें क्यों जाना पड़ रहा है अपनी माटी से दूर होकर। वह भी दूसरे राज्यों में, क्या उन्हें वह सम्मान मिलता होगा, जो उन्हें अपने छत्तीसगढ़ में मिलता है? आखिर वह कौन-सा कारण है कि मजदूर दूसरे राज्यों में जाकर जिल्लत सहते हैं, गाली खाते हैं, हर तरह से शोषित होते हैं, फिर भी वहीं काम करना चाहते हैं। कुछ तो ऐसा मिलता ही होगा उन्हें, जो यहाँ नहीं मिलता होगा।

डॉ. महेश परिमल

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