शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

चुनावों में काला धन असर दिखाएगा


डॉ. महेश परिमल
भ्रष्टाचार राजनीति का ईंधन है और काला धन इस वाहन के पहिए। यह इससे साबित होता है कि पांच राज्यों में चुनाव की मात्र घोषणा से ही काला धन बाहर आने लगा है। अब तक करोड़ों रुपए बरामद किए जा चुके हैं। सबसे ज्यादा खराब हालत उत्तर प्रदेश और पंजाब की है, जहाँ रोज ही करोड़ों रुपए बरामद किए जा रहे हैं। इन दो राज्यों में अब तक 30 करोड़ रुपए बरामद किए जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश में अब तक दस करोड़ रुपए बरामद किए गए हैं। इसमें लखीमपुर से ही दो करोड़,गेट्रर नोएडा में 12 लाख, मथुरा से दस लाख और कानपुर से चार लाख रुपए पकड़े गए हैं। इसी तरह पंजाब में पिछले 15 दिनों में 17 करोड़ रुपए बरामद किए गए। पंजाब में रकम के अलावा भारी मात्रा में ड्रग्स और शराब बरामद की गई है। पुजाब पुलिस ने 6 किलो हीरोइन और दो टन चरस-गांजा भी बरामद कर चुकी है। अभी तो यह केवल शुरुआत है। दो राज्यों की तस्वीर अभी सामने आई है। चुनाव आयोग सख्त हुआ है, इसमें कोई शक नहीं। पर जिस तरह से उत्तर प्रदेश में मायावती और हाथियों की मूर्ति को ढँकने के आदेश चुनाव आयोग ने दिए हैं, उससे लगता है कि गंभीर और दूरगामी निर्णय लेने में चुनाव आयोग कमजोर है। जो सख्ती आयोग में होनी चाहिए, वह दिखाई नहीं दे रही है। बल्कि उसके निर्णय हास्यास्पद होने लगे हैं। अब चुनाव आयोग उत्तर प्रदेश में मायावती और हाथियों की मूर्तियों को ढँकने में एक करोड़ रुपए खर्च कर रही है। इसी से पता चल जाता है कि उसके निर्णय कितने दूरगामी हैं? चुनाव में काले धन के इस्तेमाल पर आयोग अभी से सख्ती दिखाना शुरू कर दे, तो संभव है, इसके दूरगामी परिणाम दिखाई दें। इस दिशा में सरकार की नीयत भी साफ नहीं लग रही है। पिछले दो दशक से चुनाव सुधार विधेयक लटका हुआ है। यदि सरकार की नीयत साफ होती, तो इस पर विचार हो सकता था। पर लोकपाल विशेयक की तरह ही इस विधेयक का लटकना यह दर्शाता है कि चुनाव में काले धन का इस्तेमाल सभी दल कर रहे हैं।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान भी स्वीकारते हैं कि चुनाव के भारी भरकम खर्च के कारण काले धन और भ्रष्टाचार की समस्या होती है। इससे राजनीतिक दल परेशान भी होते हैं। वे इसके शुद्धिकरण के लिए चुनाव में सरकार द्वारा धन उपलब्ध कराने के हिमायती भी हैं। चुनाव सुधार की बातें देश के लिए नई नहीं हैं, लेकिन व्यावहारिक पक्ष यह है कि सारा मामला बातों या बयानों तक ही सीमित रहता है। कोई भी बड़ा राजनीतिक दल इसके लिए वास्तविक या गंभीर प्रयास नहीं करता। आज नगर निगम पार्षद का चुनाव लड़ने में लाखों खर्च होते हैं। निजी चर्चाओं में तो दस-पंद्रह लाख का हिसाब भी प्रत्याशी बता जाते हैं, जिसका कोई हिसाब कभी सरकारी खातों में नहीं मिलता। इसके चलते वार्ड का चुनाव भी कोई आम आदमी लड़ने का साहस नहीं जुटा पाता, जबकि वार्ड इतनी छोटी इकाई है कि इसका चुनाव व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और गैर राजनीतिक आधार पर भी लड़ा जा सकता है। चुनाव के इस भारी-भरकम खर्च पर रोक कैसे लगे? यह लाख टके का सवाल है। इसका उत्तर दो सिरों पर तलाशा जाना चाहिए। एक तो राज्य निर्वाचन आयोग की नजर भी उतनी ही पैनी हो जाए, जितनी भारत निर्वाचन आयोग की रहती है। ताकि कुछ तो शुद्धिकरण हो। दूसरा सिरा है जनता या मतदाता जो भारी-भरकम खर्च पर अपने प्रत्याशियों से सवाल करे।
चुनाव आयोग के अधिकार क्या हैं, इसे आम मतदाता पहले वाकिफ नहीं था। जब टी एन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद सँभाला, फिर उन्होंने जो आदेश दिए, तब लगा कि चुनाव आयोग इतना अधिक शक्तिशाली भी है। इसके पहले तो मतदान के एक दिन पहले तक तो सड़कें बनती थीं, बोरवेल किए जाते थे। जनता को कम्बल-धोती आदि बाँटे जाते थे। शेषन के आदेश के बाद ही समझ में आया कि आचार संहिता लागू होने के बाद जनता के हित में कोई सरकारी घोषणा नहीं की जा सकती। मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनकी नियुक्ति से पूर्व तो चुनाव आयोग केन्द्र सरकार का ही एक विभाग बन कर रह गया था जो कुछ भी करने से पूर्व सरकार की ओर ही निहारता था। पर जैसे ही श्री शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्य सम्भाला चुनाव प्रRिया में तो जैसे Rान्ति ही आ गई। उनके लिए कोई नया कानून नहीं बना और न सरकार ने उन्हें कोई नया अधिकार ही दिया। पर जो भी कानून व अधिकार आयोग के पास थे, उसका ही ईमानदारी और कड़ाई से पालन कर उन्होंने दिखा दिया कि यदि व्यक्ति में ईमानदार इच्छाशक्ति हो तो वह कुछ भी कर सकता है। यह भी वह तब कर पाए जब उनकी कार्यशैली पर सरकार की भौहें चढ़ने लगी थी और सरकार उनके पर तक काटने की सोचने लगी। तभी एक सदस्यीय चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया गया। एक आयुक्त जो उस समय बनाए गए वह थे श्री एम.एस. गिल जिन्होंने तब श्री शेषन के रास्ते में रोडे अटकाने का बहुत बडा काम किया। बाद में गिल मुख्य चुनाव आयुक्त भी बने। यह अलग बात है कि जो लीक श्री शेषन बना गये उससे पीछे हटना उनके उत्तराधिकारियों के लिए भी सम्भव न हो सका।
पिछले लोक सभा चुनाव प्रचार के दौरान विदेशी बैंको में भारतीयों के काले धन को भारत लाने और दोषियों को सजा देने की बात उठी थी। तब भी सरकार ने इसे विपक्ष का चुनावी शोशा बतला कर इसे नजर अंदाज करने की कोशिश की थी। पिछले 25 महीनों में सरकार ने इस बारे किया कुछ नहीं। केवल कुछ कोरे वादे करने की हामी अवश्य भरी थी। इसी बीच विदेशी बैंकों में भारतीयों का काला धन कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा ही है।
पिछले कुछ महीनों से इस बारे देश के उच्चतम न्यायालय ने भी कई बार सरकार को खरी खोटी युनाई। हैरानी की बात तो यह है कि यह सरकार उन महानुभावों के सम्मान और ‘स्वच्छ’ छवि की रक्षा करना चाहती है जिन्हें गैरकानूनी व आपराधिक ढंग से काला धन कमाने और उसे विदेशी बैंकों में जमा कर देश के साथ गददारी करने में शर्म नहीं आई। सरकार के पास अनेक नाम हैं जिन्होंने विदेशी बैकों में आपराधिक धन जमा करा रखा है पर ‘जनहित’ का ढकोसला लगा कर उनके नाम उजागर करने से डरती है। इसी बीच कांग्रेस सरकार व पार्टी की कई नामी हस्तियों के नाम चर्चा में हैं जिनके विदेशी बैंकों में खाते बताए जाते हैं। सरकार और सम्बन्धित व्यक्ति न इन आरोपों का खण्डन करते हैं और न ही इसे स्वीकारते हैं। सरकार यदि ईमानदार हो तो आज भी सरकार बहुत कुछ कर सकती है जिससे कि उन लोगों पर अंकुश लग सकता है जो काला धन अर्जित करने में लगे हुए हैं। केन्द्र में हमारे प्रधानमन्त्री व उनका मंत्रिमण्डल व प्रदेशों में हमारे मुख्यमंत्री व उनका मंत्रिमण्डल पहल करे और सभी एक शपथपत्र जारी करें कि उनका या उनके परिवार के व्यक्तियों का देश के बाहर किसी विदेशी बैंक में खाता नहीं है। यदि है तो इसका पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करें। इसी प्रकार हमारे सभी सांसद व विधायक भी ऐसा ही करें। सभी संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति तथा सरकारों द्वारा नियुक्त व्यक्ति व नौकरशाह भी ऐसा ही करें। हमारे यहां चुनावों में काले धन का उपयोग आम बात है। विधानसभा चुनाव में एक प्रत्याशी की खर्च-सीमा 16 लाख रुपए तक की गई है, लेकिन एक अनुमान के अनुसार प्रमुख दलों के ज्यादातर प्रभावशाली प्रत्याशी 25 करोड़ रुपए तक प्रचार में बहा देते हैं। निर्धारित सीमा से ज्यादा खर्च काले धन से ही होता है। कुछ समय से चुनाव आयोग ने इस काले धन पर शिकंजा कसना शुरू किया है। बिहार और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में करोड़ों रुपए का काला धन चुनाव आयोग के निर्देशों से ही पकड़ा गया था।
उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के इस विधानसभा चुनाव में भी काले धन को बरामद करऩे के लिए चुनाव आयोग ने अभियान चला रखा है। दिक्कत यह है कि चुनाव आयोग के पास अपना कोई अमला नहीं है। वह सारे काम जिला और पुलिस प्रशासन से पूरे करवाता है। चुनाव आयोग ने निर्देश दिए हैं कि अगर कोई एक लाख रुपए से ज्यादा की नकदी ले जा रहा है, तो उसके कागजात होने जरूरी हैं, वर्ना वह काला धन मान कर जब्त कर लिया जाएगा। काला धन पकड़ने की जिम्मेदारी पुलिस और आयकर विभाग की है। पुलिस वाले सभी जिलों में गाड़ियों की जाँच कर रहे हैं। सामान की तलाशी ली जा रही है। अब तक कई करोड़ रुपए जब्त भी किए जा चुके हैं। लेकिन पुलिस ज्यादती की शिकायतें बहुत आ रही हैं। चिंता का विषय होना चाहिए।
तमाम सतर्कता के बावजूद पुलिस और आयकर विभाग के लिए हर वाहन और व्यक्ति की तलाशी लेना संभव नहीं। धन की इस बरामदगी से इसकी पुष्टि हो जाती है कि अब ऐसे प्रत्याशियों की संख्या बढ़ती जा रही है जो रातों-रात पैसा खर्च कर चुनाव जीतने में यकीन करते हैं। धनी प्रत्याशी केवल प्रचार में ही निर्धारित सीमा से ज्यादा पैसा खर्च नहीं करते, बल्कि वे उसे मतदाताओं में बांटकर वोट खरीदने का भी काम करते हैं। यह लगभग तय है कि चुनाव आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद पैसे के बल पर वोट खरीदने की कोशिश पर विराम नहीं लग पा रहा है। अतीत में प्रत्याशियों की ओर से मतदान के एक-दो दिन पहले रातों रात पैसे बांटने के उदाहरण सामने आ चुके हैं।  इस धनबल के आगे लोकतंत्र की हार के अतिरिक्त और कुछ नहीं। राजनीतिक दलों से बेहतर और कोई यह नहीं जानता कि चुनावों में धन की भूमिका बढ़ती चली जा रही है और पैसे वाले प्रत्याशियों के लिए चुनाव जीतना आसान हो गया है, लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं कि चुनाव प्रRिया में पैसे की भूमिका कम हो। चुनावों के दौरान अनाप-शनाप खर्च होने वाला धन मूलत: काला धन होता है, लेकिन राजनीतिक दल उन स्रोतों को बंद करने के लिए तैयार नहीं जहां से काला धन उपजता है। क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि समाज का नेतृत्व करने और उसे दिशा देने वाली राजनीति काले धन से संचालित हंै? क्या यह हास्यास्पद नहीं कि राजनीतिक दल एक ओर साफ-सुथरी राजनीति की बात करते हैं और दूसरी ओर उसे काले धन से संचालित करने में जुटे हुए हैं? स्पष्ट है कि राजनीतिक दलों की भी नीयत साफ नहीं है।
संभवत: यही कारण है कि चुनाव सुधार पिछले दो दशकों से अटके पड़े हैं। अब तो चुनाव आयोग ने यह कह दिया कि सरकार की ओर से चुनाव सुधारों की अनदेखी की जा रही है। राजनीतिक दल जितना उदासीन काले धन की राजनीति पर हैं उतना ही बाहुबल की राजनीति पर भी और इसका ताजा प्रमाण यह है कि कोई भी दल बाहुबली छवि वाले नेताओं को अपना उम्मीदवार बनाने में संकोच नहीं कर रहा है। यदि टीएन शेषन के समय में चुनाव आयोग अपने अधिकारों को लेकर सजग और सRिय नहीं होता तो शायद मतदान केंद्रों पर कब्जा करने और विरोधी दलों के समर्थक माने जाने वाले मतदाताओं को डराने-धमकाने का सिलसिला भी कायम बना रहता। यदि राजनीतिक दल लोकतंत्र के प्रति आम आदमी की आस्था बनाए रखना चाहते हैं तो यह अपरिहार्य है कि संसद के अगले सत्र में लंबित पड़े चुनाव सुधारों को आगे बढ़ाया जाए। इसके लिए सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्ष के राजनीतिक दलों को भी पहल करनी होगी, क्योंकि निर्वाचन प्रणाली की विकृतियों से पूरी राजनीति ही बदनाम हो रही है।
सच तो यह भी है कि मतदाता आज के नेताओं से इतने अधिक निराश हो चुके हैं कि अब वे उनसे कोई अपेक्षा नहीं रखते। समाज में भी ‘नेता’ शब्द किसी अपशब्द से कम नहीं लगता। नेता बनते ही उनकी सम्पत्ति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती है। 5 वर्ष में वे इतना अधिक कमा लेते हैं कि अगला चुनाव आसानी से जीत जाते हैं। चुनाव भी बाहुबल बताने का एक जरिया बनकर रह गया है। एक ईमानदार शिक्षक चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता। मतदाताओं के पास कोई विकल्प ही नहीं है। उनके सामने कौन नेता कितना कम भ्रष्ट है, यही जानना बाकी रहता है। वे कम भ्रष्ट नेता को अपना मत देते हैं, पर बाद में वही कम भ्रष्ट अधिक भ्रष्ट नेता बन जाता है। मतदाता कए बार फिर ठगे जाते हैं। ठगने का यह सिलसिला काफी वर्षो से चल रहा है। चुनाव आयोग भी कहीं न कहीं सरकार पर निर्भर है, इसलिए इससे कोई बड़ी अपेक्षा रखना भूल होगी।
  डॉ. महेश परिमल

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