शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

एक रन पर धोनी ने कमाए ढाई लाख रुपए

डॉ. महेश परिमल
क्या आपको पता है कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की वार्षिक आय कितनी है? शायद आप नहीं जानते, जानना भी नहीं चाहते। फिर भी आप जान ही लें, क्योंकि यही वे व्यक्ति हैं, जो एक तरफ अपना बल्ला घुमाते हैं, तो रन बटोरते हैं। दूसरी तरफ विज्ञापनों में काम करते हुए हर वर्ष 75 करोड़ रुपए कमाते हैं। पिछले साल यानी 2011 में उन्होंने जितने रन बनाए, उसका हिसाब किया जाए, तो प्रत्येक रन पर उन्हें 2.55 लाख रुपए मिले हैं। हमारे देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिनकी वार्षिक आय 2.55 लाख रुपए नहीं है। दूसरी ओर इतना धन तो धोनी एक रन बनाकर प्राप्त कर लेते हैं। यह राशि उन्हें क्रिकेट बोर्ड, आईपीएल और विज्ञापनों से प्राप्त होती है। टीवी पर जो विज्ञापन प्रसारित किए जाते हैं, उसे मध्यम वर्ग ही अधिक देखता है। इन विज्ञापनों के ामध्यम से अनावश्यक और कई बार स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाले प्रोडक्ट भी होते हैं। मध्यम वर्ग के खून-पसीने की कमाई से बड़ी-बड़ी कंपनियाँ जो कमाई कर रही हैं, उसका एक छोटा सा हिस्सा वे अपने ब्रांड एम्बेसेडर को देती हैं। इस तरह से हमारे क्रिकेटरों की जो बेशुमार कमाई होती है, उसका अधिकांश भाग मध्यम वर्ग के शोषण से ही प्राप्त होता है। मध्यम वर्ग अपने मनोरंजन के लिए क्रिकेट के मैच और टीवी धारावाहिक देखता है। इस दौरान अज्ञानतावश उसका ब्रेनवॉश हो जाता है, उसके हिस्से आती है अनावश्यक वस्तुएँ, जिसके बिना भी वह अपना जीवन गुजार सकता है।सच है कि अब क्रिकेट मैच एक खेल न होकर मार्केट का राक्षसी तंत्र बन गया है। मार्केटिंग करने वाली कंपनियाँ ग्राहकों को लुभाने के लिए येनकेनप्रकारेण अपना माल बेचना चाहती हैं। इसके लिए वह क्रिकेटरों का इस्तेमाल करती है। टीवी पर मैच का लाइव प्रसारण देखकर देश के करोड़ों मानव घंटों की बरबादी होती है, यही नहीं अरबों रुपए का उत्पादन प्रभावित होता है। यदि हमारे क्रिकेटरों पर विज्ञापनों में काम करने की पाबंदी लगा दी जाए, तो संभव है देश के क्रिकेट का उद्धार हो जाए।
ऑस्ट्रेलिया के ऐडिलेड शहर से ही भारत के लिए दो परस्पर विरोधी खबरें आयीं। Rिकेट में विश्व चैंपियन भारतीय टीम ने 4-0 से टेस्ट श्रंखला गंवाकर देश का सिर शर्म से झुका दिया तो ऑस्ट्रेलियाई ओपन टेनिस में लिएंडर पेस ने पुरुष डबल्स का खिताब जीत कर करियर ग्रैंड स्लैम पूरा कर अपने देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। हमारी टीम हार गई, इससे हम भले ही दु:खी हों, पर हमारे क्रिकेटरों को इस बात का जरा भी मलाल नहीं है। वे टीम जीते, इसलिए खेल ही नहीं रहे थे, इससे अधिक चिंता तो उन्हें विज्ञापनों के कांट्रेक्ट साइन करने, मीटिंग करने, एड फिल्मों की शूटिंग करने, कंपनियों के प्रमोशनल कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज कराने, अपनी कमाई को सही स्थान पर इस्तेमाल करने आदि को लेकर होती है। अपनी शक्ति का अधिकांश भाग वे इसी में खर्च कर देते है, बची-खुची शक्ति आईपीएल में खप जाती है। इसके बाद कहाँ से रह जाता है हौसला? सच में देखा जाए, तो हमारे क्रिकेटर एड फिल्मों में काम करके देश का तो भला नहीं ही करते, उससे हमारा भी भला नहीं होता। भला होता है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का और स्वयं उनका। ऐसे में क्यों न उन पर फिल्मों में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए? विज्ञापन फिल्मों में काम करके हमारे क्रिकेटर प्रजा की सेवा तो नहीं कर रहे हैं। बात करते हैं हमारे क्रिकेट टीम के कप्तान की। इस समय वे सबसे अधिक कमाई करने वाले क्रिकेटर हैं। हर वर्ष 75 करोड़ रुपए कमाते हैं। 22 ब्रांडों के एम्बेसेडर हैं। इसमें पेप्सीको, रिबोक, एयरसेल, रिवाइटल और गोदरेज जैसी ब्रांडों का समावेश होता है। कुछ समय पहले धोनीे ने तीन स्पोर्ट्स कंपनियों के साथ कांट्रेक्ट किया है। इनका विज्ञापन करके वे तीन वर्ष में 200 करोड़ रुपए कमाएँगे। हमारे मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने सन् 2006 में आईकोनिक्स कंपनी के साथ जब अनुबंध किया था, तब उन्हें 180 करोड़ रुपए मिले थे। धोन जिस रिवाइटल नामक टॉनिक के लिए विज्ञापन करते हैं, उसका उद्देश्य दरअसल भारत में मांसाहार का प्रचार करने का है। अब जब भारतीय क्रिकेट टीम को जीताने में वे विफल सिद्ध हुए हैं, तो कंपनी ने उनके स्थान पर अब सलमान खान को ले लिया है।
सन् 2009 की फोब्र्स मैगजीन ने विश्व के दस सबसे अधिक कमाने वाले क्रिकेटरों की सूची प्रकाशित की, उसमें एक करोड़ डॉलर के साथ धोनी सबसे आगे थे। 80 लाख डॉलर के साथ सचिन तेंदुलकर दूसरे नम्बर पर थे। अब लगता है कि सचिन भारत को विजयश्री दिलाने नहीं, बल्कि अपना सौवां शतक लगाने के लिए मैदान में उतरते हैं। वे अपना सौंवा शतक पूरा करें या न करें, उन्हें तो 61.4 करोड़ रुपए मिलने ही हैं। वे कभ रिटायर नहीं होंगे। जब तक उन्हें जबर्दस्ती रिटायर न कर दिया जाए। सचिन ने पेप्सी, कोका कोला, बूस्ट, रिनॉल्ड, कोलगेट, फिलिप्स, विसा, केस्ट्रॉल, एयरटेल, केनन आदि के ब्रांड रह चुके हैं। इसके अलावा नेशनल एग कॉर्डिनेशन कमिटी के प्रवक्ता की भूमिका निभाते हुए उन्होंने रोज अंडे खाओ का भी विज्ञापन किया था। हाल ही में उन्होंने बांद्रा में 9 हजार वर्गफीट के स्थान पर 39 करोड़ का जो बंगला बनवाया है, उसका वार्षिक प्रीमियम ही 40 लाख रुपए है। सचिन की अधिकांश कमाई विज्ञापन फिल्मों से ही हुई है।
हमारे क्रिकेटर जब भी धन के लालच में विज्ञापन फिल्मों का कांट्रेक्ट करते हैं,तो देश या प्रजा के बारे में सोचते ही नहीं हैं। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश में खुले आम शराब के विज्ञापनों पर प्रतिबंध है, उसके बाद भी शराब बनाने वाली कंपनियाँ उसी ब्रांड का सोडा बनाती हैं, जिसका विज्ञापन हमारे क्रिकेटर करते हैं। हाल ही में धोनी और हरभजन सिंह ने देश की प्रसिद्ध व्हिस्की के ब्रांड के लिए काम कर रहे हैं। शराब कंपनियाँ अपने उत्पाद के विज्ञापन के लिए सरोगेट एड का सहारा लेते हैं। इससे कानून का पालन भी हो जाता है और उत्पाद का विज्ञापन भी हो जाता है। विभिन्न कंपनियों की इस चाल को हमारे क्रिकेटर तो समझते हैं, पर देश की प्रजा अभी तक नहीं समझ पाई है। इन विज्ञापनों से युवा पीढ़ी गुमहरा हो रही है, पर क्रिकेटरों को इसकी चिंता कहाँ? भारतीय क्रिकेट बोर्ड द्वारा खिलाड़ियों को जो मोटी रकम दी जाती है, उस पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए। बोर्ड ने 9 खिलाड़ियों को ‘ए’ केटेगरी पर रखा गया है। इस केटेगरी के खिलाड़ियों को हर वर्ष एक करोड़ रुपए दिए जाते हैं, चाहे वे खेलें या न खेलें। इन नवरत्नों में महेंद्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड, वीवीएस लक्ष्मण, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, सुरेश रैना, हरभजन सिंह और जहीर खान का समावेश होता है। ‘बी’ केटेगरी में शामिल क्रिकेटरों को 50 लाख रुपए वार्षिक और ‘सी’ के खिलाड़ियों को 25 लाख रुपए वार्षिक आय होती है। इसके अलावा उनहें एक टेस्ट मैच पर सात लाख रुपए, वन डे इंटरनेशनल पर चार लाख और 20-20 पर दो लाख रुपए अतिरिक्त मिलते हैं। कोई खिलाड़ी टेस्ट की दोनों इनिंग में शून्य रन भी बनाता है, तो भी उसे सात लाख रुपए दिए जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया से हम भले ही बुरी तरह से हार गए हों, पर सभी खिलाड़ियों के खाते में 28 लाख रुपए तो जमा हो ही गए।
आईपीएल में मिलने वाली मोटी राशि के चलते कुछ खिलाड़ी जिस तरह टेस्ट और एक दिवसीय Rिकेट के लिए अपनी फिटनेस को दाँंव पर लगा रहे हैं, उसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों की बढ़ती उम्र को लेकर मचाया जा रहा शोर अतार्किक है। आखिर 39 साल की उम्र में ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग ने इसी श्रंखला में एक दोहरे शतक समेत दो शतक लगाए हैं। टेनिस में Rिकेट से कई गुना जयादा ऊर्जा और फिटनेस की जरूरत होती है। फिर भी 38 साल की उम्र में भारत के ही लिएंडर पेस ने ऐडिलेड में ऑस्ट्रेलियाई ओपन पुरुष डबल्स के रूप में अपने करिअर का 13 वां ग्रंैड स्लैम जीतकर साबित कर दिया है कि सबसे जरूरी है खेल के प्रति प्रतिबद्धता, जीत की दृढ़ इच्छाशक्ति और फिर उसे पूरा करने के लिए जरूरी फिटनेस और कोशिश। कहना नहीं होगा कि भारतीय Rिकेटरों को पेस से सबकसीखना चाहिए, वरना बोर्ड को चाहिए कि वह भी टीम के वरिष्ठ खिलाडिय़ों को प्रदर्शन करो या जाओ का अल्टीमेटम दे दे, जैसा कि ऑस्ट्रेलियाई बोर्ड ने पोंटिंग को दिया था। क्या देश का धन पर केवल खिलाड़ियों और नेताओं का ही वर्चस्व रहेगा, या आम आदमी के लिए उसका उपयोग होगा? यह एक गंभीर प्रश्न है, जिसे हमारे क्रिकेटर, नेता, क्रिकेट बोर्ड, चयन समिति समझे या न समझे, पर अब हमारे देश की प्रजा समझ रही है। यही प्रजा जिसने विश्वकप जीतने पर दीवाली मनाई थी, संभव है हमारे क्रिकेटरों के देश आगमन पर होली भी मना ले।
डॉ. महेश परिमल

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