सोमवार, 18 नवंबर 2013

अलविदा :क्रिकेट के वामन अवतार

डॉ. महेश परिमल
सचिन क्रिकेट से आउट हो गए, पर भारतीयों के दिलों से कभी आउट नहीं हो सकते। वे नाबाद हैं, देश के लिए, पूरे विश्व के लिए। एक ऐसा शख्स, जो क्रिकेट से बेइंतहा प्यार करता है। अपने विदाई भाषण में एक एक करके अपने सभी अपनों को याद करता है। पिच को प्रणाम करता है, भीगी आंखों से उस स्थान से विदा लेता है। सभी प्रशंसकों का शुक्रिया अदा करता है। ऐसे महान व्यकित के लिए उपमाएं कम हो जाती हैं। शब्द साथ नहीं देते। आंखें बार-बार भीग जाती है। क्या कहें, इस इंसान को? जो न तो अपनी माटी को भूलता है, न ही अपनों को। इतना विनम्र, इतना सहज खिलाड़ी अभी तक नहीं देखा गया। इसकी लोकप्रियता की तुलना केवल महात्मा गांधी से ही की जा सकती है। जिसके एक इशारे पर लोग देश के लिए कुर्बान होने के लिए तैयार हो जाते थे। आज सचिन ने क्रिकेट को अलविदा कह दिया है, पर सच कहें, तो वे क्रिकेट से अलग हटकर कुछ सोच भी नहीं सकते। क्रिकेट उनकी रगों में बसा है। क्रिकेट के लिए वे अपनी कौन सी भूमिका चुनते हैं, यही देखना है।
सचिन तेंदुलकर के बारे में बात करनी हो, तो सभी सुपरलेटिव (श्रेष्ठतावाचक) शब्दोंे की कमी पड़ जाती है। मुम्बई के एयरपोर्ट पर सचिन को गुडबॉय कहते होर्डिग्स लगे हैं। सचिन को एक क्रिकेटर के रूप में विदाई को एक उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। पहले दिन जो कुछ टीवी पर देखा गया, वह सचिन के प्रशंसकों के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं था। एक-एक रन पर तालियों की गड़गड़ाहट से स्टेडियम गूंज रहा था। सचिन के बारे में शायद ही कोई बात ऐसी होगी, जो उनके प्रशंसकों से छिपी होगी। वे पहले बाएं पैर का मोजा पहनते हैं और सेंचुरी बनाने के बाद निश्चित रूप से बाएं पैर के पेड से बेट को टकराएंगे। सचिन की एक-एक गतिविधि भारतीयों को कंठस्थ हो चुकी है।
यही सचिन जब 24 वर्ष के अपने क्रिकेट कैरियर का समापन कर रहे हैं, तब किसी युवाओं में एक नया जोश हो, इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। सचिन सच्चे अर्थो में नेशनल हीरो हैं। कई लोगों ने उनकी तुलना महात्मा गांधी से की है। सचमुच महात्मा गांधी के बाद हमारे देश में ऐसा कोई नहीं हुआ, जिसकी लोकप्रियता ने आकाश की सीमाओं को भी पार कर दिया हो। पहले लोगों के प्रेरणास्रोत ही महान लोग हुआ करते थे। आजादी के आंदोलन में हर कोई गांधी, नेहरु, बोस, आजाद आदि के नाम पर लोग अंग्रेजों के सामने डट जाते थे। आजादी के बाद जीवन मूल्य में बदलाव आने लगा। सब कुछ पाकर भी पुरानी पीढ़ी ने अपना स्थान खाली नहीं किया, परिणामस्वरूप देश के युवाओं ने अपनी प्रेरणा खोजने के लिए अन्यत्र नजर दौड़ाई। तब फिल्म और क्रिकेट में ही उन्हें अपना आदर्श दिखाई देने लगा। युवाओं को उनके प्रेरणास्रोत मिल गए। एक जमाने में बिशनसिंह बेदी का नाम था, उसके पहले कर्नल सी.के.नायडू लोगों के दिलों में राज करते थे। फिर सुनील गावस्कर का जमाना आया। टीवी के आगमन के साथ ही गावस्कर नॉन फिल्मी मॉडल माने जाने लगे। 1983 के वर्ल्ड कप के बाद कपिलदेव सफल्ता का पर्याय बन गए। उनके नाम का जुनून युवाओं में काफी लम्बे समय तक रहा। इसके बाद की पीढ़ी तेज हा गई। क्रिकेट से आने वाले रोल मॉडल बदलने लगे। अजहरुद्दीन से लेकर सौरव गांगुली, राहुल द्रविड से लेकर लेटेस्ट विराट कोहली के बीच सचिन ने एक क्रिकेटर के रूप में सफलता की अनोखी मिसाल पेश की है। लगातार 24 साल तक वे अपने प्रदर्शन के बल पर क्रीज पर डटे रहे। इस दौरान वे मैदान न तो कभी चीखे, न कभी आऊट होने के बाद खड़े रहे। कई बार तो अंपायर के निर्णय के पहले ही वे स्वयं को आऊट बताकर पेवेलियन की ओर लौट जाते। कई बार उन्हें गलत तरीके से आऊट किया गया, पर अंपायर के निर्णय को सर्वोपरि मानते हुए वे चुपचाप पेवेलियन लौट जाते। कभी जिद नहीं की। सेंचुरी मारने पर वे बहुत ही ज्यादा खुश हुए, न आऊट होने पर दु:खी। चेहरे पर हमेशा एक छोटी सी मुस्कान तैरते रहती।
एक क्रिकेटर के रूप में सचिन के नाम पर कई उपलब्धियां हैं। उनके प्रशंसकों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं है। उनकी प्रशंसा में बहुूत कुछ कहा गया है। कुछ भी बाकी नहीं है। उनकी मां से लेकर उनके भाई और गुरु तक के बयान और साक्षात्कार पढ़ने को मिल गए हैं। दो पीढ़ियों ने उनके खेल को निहारा है। विराट कोहली सचिन के टीम मेट हैं। सचिन ने जब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना शुरू किया, तब विराट केवल दो वर्ष के थे। इन दोनों ने हाल ही में रणजी के आखिरी मैच में लंबी भागीदारी की। सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में सचिन के छोटे कद का मजाब उड़ाया गया, लेकिन उसका जवाब उन्होंने वहां के धुआंधार इमरान, अकरम, वकार और कादिर की बॉल पर चौके-छक्के लगाकर दिए। लोग दंग रह गए, इस वामन अवतार को देखकर। किसी भी क्षेत्र में सफलता को टिकाए रखने के लिए ढाई दशक का समय बहुत कहा जाता है। ऐसे ही क्रिकेट जैसे खेल में जहां हमेशा नई-नई प्रतिभाएं आती रहती हैं, उसमें पूरे ढाई दशक तक अपने अस्तित्व को टिकाए रखना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इस चमत्कार को सचिन ने पूरी तरह से सही सिद्ध कर दिखाया है। टेस्ट क्रिकेट, वन डे और टी-20 में उन्होंने अपनी काबिलियत दिखाई। उनकी उपलब्धियां रिकॉर्ड बनकर उनके प्रशंसकों की मस्तिष्क में कैद हो गई हैं। प्रशंसकों के बीच वे हमेशा आलटाइम ग्रेट.. ग्रेटर.. ग्रेटेस्ट साबित हुए हैं। इसके बाद भी खेल के मैदान से जब वे एक क्रिकेटर के रूप में अपनी केप उतार रहे हैं, पैर पर बंधे पेड खोल रहे हैं, तब यह बात याद रखने और अनुकरणीय है कि वे सदा विनम्र बने रहे। अपनी सौजन्यता को उन्होंने कभी दांव पर नहीं लगाया। थोड़ी गंभीरता से विचार किया जाए कि ये इंसान पिछले 24 सालों से कराड़ों देशवासियों के दिलों में राज कर रहा है, मीडिया की सुर्खियां बनता रहा है, इसके बाद भी कभी किसी विवाद में उनका नाम सामने नहीं आया। मध्यमवर्गीय परिवार में अचानक ही जब नाम और धन आने लगता है, तो वह परिवार पूरे शहर में विख्यात हो जाता है, पर सचिन का परिवार कभी सुर्खियों में नहीं आया। उनके चेहरे पर कभी भी किसी के लिए आक्रोश भी नहीं देखा गया। अपार धन-दौलत भी उन्हें नम्र बनाए रखी, यह बहुत बड़ी बात है।
जब उन्होंने क्रिकेट की शुरुआत की, तब उनकी आवाज में विनम्रता थी, वही आज भी कायम है। यही सचिन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इतनी प्रचंड सफलता मिलने से इंसान तो पगला जाता है, हवा में झूलने लगता है, मस्तिष्क से विवेक गायब हो जाता है। विनोद काम्बली से लेकर शिवरामकृष्णन सहित कई क्रिकेटरों का उदाहरण हमारे सामने है। सभी क्षेत्रों में ऐसे लोग तेजी से उभरे हैं और उतनी ही तेजी से लुप्त भी हो गए हैं, पर सचिन की नम्रता का सूरज हमेशा चमकता रहा। सचिन ने प्रसिद्धि पाई और उसे पचाया भी। अपने कैरियर के दौरान उसने अपनी जीभ पर सदा संयम रखा। चेहरे पर कभी गुमान नहीं आया। वे तो खामोश रहे, पर उनका बेट बोलता रहा। आज जब उनकी निवृत्ति के चर्चे हैं, तब भी उनकी जीभ संयमित है। मीडिया की भाषा में कहें, तो उन्होंने इस दौरान  ‘लूज मोमेंट’ को अपनी जीभ पर हावी नहीं होने दिया। फरारी कार की कस्टम ड्यूटी का मामला हो या फिर राज्यसभा में उनके चयन, सभी मामलों में उसने अपनी सौजन्यता का ही परिचय दिया। फरारी कार की कस्टम ड्यूटी माफ करने के नियम के मुताबिक अपील करने से ड्यूटी माफ हो जाती है। सरकार इसके लिए तैयार भी थी, पर सचिन ने करमाफी के आवेदन के बदले यह कह दिया कि जितना भी टैक्स होता है,उसका भुगतान करने के लिए वे तैयार हैं। इसी तरह राज्यसभा के लिए उनका चयन को भी विवादास्पद बनाने की कोशिश हुई। तब उन्होंने कहा कि भारत के राष्ट्रपति ने मुझे यह सम्मान दिया है, राष्ट्र के गौरव की खातिर मुझे इसे स्वीकारना ही होगा। ऐसे संजीदा जवाब ने सबकी बोलती बंद कर दी। इसके बाद सांसद के रूप में जब उन्हें राहुल गांधी के बाजू का बंगला दिया गया, तो लोगों में हलचल हो गई। इस बार उन्होंने यह कहकर सबकी बोलती बंद कर दी कि मैं जब भी दिल्ली आता हूं, तो मुझे होटल में ही रुकना अच्छा लगता है। मुझे इस शहर में स्थायी निवास की आवश्यकता ही नहीं है। ऐसा कहकर उन्होंने अपनी महानता का ही परिचय दिया।
क्रिकेट के लिए सचिन एक मिथक बन गए हैं। सचिन के रिकॉर्ड का आज उतना ही महत्व है, जितना उनकी विनम्रता का। क्रिकेट के लिए वे एक भूतकाल बन गए हैं। किंतु एक सफल, विनम्र, प्रचंड लोकप्रिय होने के बाद भी सुशील, बेशुमार दौलत होने के बाद भी सादगी पसंद और एक जवाबदार नागरिक के रूप में भी अपने प्रशंसकों के लिए प्रेरणास्रोत बने रहेंगे। क्रिकेट के इस भगवान को अलविदा कहने का साहस किसके पास होगा। हम तो अपनी सजल आंखों से केवल इतना ही कह सकते हैं कि जब भी किसी बॉलर के हाथ से बाल छूटेगी. बेट के साथ बाल टकराएगी, तब-तब हम यह सुनेंगे ‘वी विल मिस यू सचिन, आज कल और हमेशा।’
डॉ. महेश परिमल

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