बुधवार, 18 दिसंबर 2013

कब होगी जस्टिस गांगुली पर कार्रवाई


दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख

गांगुली पर कार्रवाई क्यों नहीं?
डॉ. महेश परिमल
देश में इन दिनों एक अजीब सी परिपाटी शुरू हो गई है। अपराध सित्र होने के बाद भी अपराधी को सजा नहीं होगी, ऐसा कोर्ट का कहना है। अपराधी चूंकि एक न्यायाधीश है, केवल इसलिए उस पर किसी तरह की कार्रवाई नहीं होगी। ऐसा शायद देश में पहली बार हुआ है। समझ में नहीं आता कि ए.के. गांगुली के खिलाफ किसी भी तरह की कार्रवाई क्यों नहीं हो पा रही है। न्यायतंत्र में भी व्हाइट कॉलर का दबदबा इतना अधिक बढ़ गया है कि अपराध करने के बाद भी अपराधी न केवल मानव अधिकार आयोग में एक न्यायाधीश के रूप में ड्यूटी कर रहे हैं, बल्कि खुलेआम घूम भी रहे हैं। इस देश में जब तरुण तेजपाल के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है, तो फिर जज गांगुली पर क्यों नहीं? वैसे भी देश में न्यायाधीशों पर रिश्वत के आरोप लगते रहे हैं। पर सुप्रीमकोर्ट के सेवानिवृत्त जज ए.के. गांगुली पर जो यौन शोषण का आरोप लगा है, वह बहुत ही गंभीर है। अपनी इंटर्न से की गई छेड़छाड़ को वे आसी सहमति से होना बताते हैं, पर उनकी यह दलील काम नहीं आ रही है। अब यदि वे स्वयं ही आगे बढ़कर अपना इस्तीफा दे देते हैं, तो विवाद का अंत आ सकता है। गांगुली भले ही स्वयं पर लगे आरोपों को वाहियात कहते रहें, पर सच तो यह है कि कोर्ट कमेटी ने अपनी प्रारंभिक जांच में गांगुली को दोषी पाया है। मामला इसलिए विवादास्पद हो गया है। हाल ही में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज्य ने लोकसभा में कहा है कि या तो गांगुली को मानवधिकार आयोग से हटा दिया जाए, या फिर उनकी धरपकड़ की जाए।
सुप्रीमकोर्ट के किसी जज पर यौन शोषण का आरोप देश में पहली बार लगा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गांगुली को हटाने की सिफारिश कर चुकीं हैं। गांगुली के समर्थन में लोकसभा के भूतपूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी जैसी हस्ति है। कहा तो यही जाता है कि गांगुली को बहुत ही जल्द हटा दिया जाएगा। उनका हटना तय है। पर जब तक वे पद पर हैं, तब तक तो वे बदनाम होते ही रहेंगे, साथ ही उनका पद भी बदनाम होगा। गांगुली पर जिस 23 वर्षीय युवती पर छेड़छाड़ का आरोप है, उस युवती ने पहले अपने विचार अपने ब्लॉग में 5 नवम्बर को दिए।  अपने ब्लॉग में युवती ने लिखा है कि मेरे दादा की उम्र के सुप्रीम कोर्अ के एक जज ने मेरा यौन शोषण करने का प्रयास किया है। इस ब्लॉग के कारण चारों तरफ आपाधापी मच गई। इसमें कई महत्वपूर्ण फैसलों से प्रकाश में आए न्यायाधीश ए.के. गांगुली फंस गए। सुप्रीमकोर्ट के सेवानिवृत्त जज गांगुली व्हाइट कॉलर की सूची में सबसे ऊपर हैं। अपने इंटर्न को नशे में छेड़कर उन्होंने एक नए विवाद को ही जन्म दिया है। युवती ने गांगुली पर यह आरोप लगाया है कि जब वह सलाह-मशविरा करने उनके पास गई, तब उन्होंने मुझसे छेड़छाड़ की, मेरा यौन शोषण करने का प्रयास किया। आजकल ट्रेन के एसी क्लास में जिस तरह से छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ रहीं हैं, उससे यही लगता है कि व्हाइट कॉलर यात्रियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसके बजाए स्लीपर क्लास के व्यक्ति पर भरोसा किया जा सकता है। व्हाइट कॉलर के लोगों पर भरोसा करने का मतलब ही है कि उनके भीतर का शैतान अकेलेपन में जिंदा हो जाएगा। व्हाइट कॉलर का मतलब ही है कि ऊंचे पद को सुशोभित करने वाला रसूखदार व्यक्ति। ये जब भी किसी अकेली महिला को एकांत में देखते हैं, तो उनके भीतर का राक्षस बाहर आ जाता है। आसाराम-सांई को हम भले ही इस सूची में न रखें, पर तहलका डॉट कॉम के तरुण तेजपाल को इस सूची में रख ही सकते हैं। उन पर भी युवती के साथ यौन शोषण का आरोप है। इस समय वे पुलिस हिरासत में हैं। समझ में नहीं आता कि जब किसी मजदूर या ड्राइवर पर यौन शोषण का आरोप लगता है, तो इसे विकृत मानसिकता का दर्जा दिया जाता है। पर जब व्हाइट कॉलर के लोगों पर यह आरोप लगता है, तो इसे विकृत मानसिकता नहीं कहा जा सकता। आरोप लगने पर उनका यही कहना होता है कि जो कुछ हुआ, वह आपसी सहमति से हुआ। इस तरह वे थोथी दलीलों से वे अपना बचाव करते हैं।  तरुण तेजपाल ने गोवा में यह कहा था कि यह गोवा है, आप मुक्त हैं, ऐश करो। खुद तरुण तेजपाल ऐश करने लगे और पुलिस की पकड़ में आ गए। तरुण तेजपाल न्यायिक हिरासत में हैं, पर जज गांगुली अभी तक बाहर हैं, उनकी गिरफ्तारी की मांग बढ़ती जा रही है।
सुप्रीमकोर्ट के न्यायाधीश होने के दौरान ए.के.गांगुली ने कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। टू जी घोटाला, दिसम्बर 2010 में महाराष्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख की सरकार को दस लाख रुपए का दंड, जुलाई 2010 में उनके द्वारा दिया गया फैसला कि दुर्घटना में मृत गृहिणी को अधिक मुआवजा मिलना चाहिए आदि उनके महत्वपूर्ण फैसले रहे हैं। इसी तरह तहलका डॉट कॉम के तरुण तेजपाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अनेक स्टिंग ऑपरेशन किए हैं। ीाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण के खिलाफ स्टिंग ऑपरेशन कर उन्होंने तहलका मचाया था। कहा तो यही जा रहा है कि जब तरुण तेजपाल पर कार्रवाई हो सकती है, तो फिर जज गांगुली पर क्यों नहीं? दोनों ही मामलों में युवती के आरोप झूठे हैं, ऐसा कहकर बचने का प्रयास किया जा रहा है। दोनों ही मामलों में युवती को मुंह बंद रखने के लिए रसूख का इस्तेमाल किया गया है। कहा जाता है कि कानून अपना काम करेगा। पर गांगुली तो पश्चिम बंगाल के मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष हैं, जहां वे तमाम सुविधाएं प्राप्त कर रहे हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए संसद में भी मांग उठी है। इसके बाद भी उन पर किसी तरह की कार्रवाई न होना न्यायतंत्र को ही कठघरे खड़ा करता है। उनके खिलाफ कार्रवाई न होना उन युवतियों पर ही एक तरह का मानसिक अत्याचार ही है।
डॉ. महेश परिमल

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