गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

दिग्गजों ने भी चखा है हार का स्वाद

डॉ. महेश परिमल
जहां सफलता है, वहां विफलता भी है। कोई भी हमेशा सफल नहीं हो सकता और न ही कोई हमेशा विफल रह सकता है। सफलता-विफलता यह जीवन के दो पहलू हैं। हर किसी को इसका सामना करना पड़ता है। राजनीति में तो यह बहुत ही आवश्यक है। क्योंकि जो जीतते हैं, वे जीतकर यह भूल जाते हैं कि उन्हें यह जीत किसकी बदौलत मिली है। इसलिए जनता ही उन्हें सबक सिखाकर आसमां से जमीन पर पटक देती है। आज चारों ओर अरविंद केजरीवाल की चर्चा है। कांग्रेस को दिल्ली की हार का उतना अफसोस नहीं है, जितना शीला दीक्षित की हार का। पिछले 15 वर्षो से मुख्यमंत्री के पद को सुशोभित करने वाली शीला दीक्षित 25 हजार 856 मतों से अरविंद केजरीवाल के हाथों हार गई। यह शीला दीक्षित के लिए निश्चित रूप से आघातजनक है। भारतीय राजनीति में ऐसे किंग किलर या फिर क्वीन किलर की अनेक घटनाएं हैं। जिनके सितारे खूब तेजी में हों, उन्हें एक सामान्य कार्यकर्ता ने हराया है। भारतीय राजनीति में हार का स्वाद चखने वालों में इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह, लालू यादव, रामविलास पासवान, प्रमोद महाजन,  सुंदरलाल बहुगुणा, हेमवती नंदन बहुगुणा, एन.टी. रामाराव, बुद्धदेव भट्टाचार्य, आचार्य जे.बी.कृपलानी, मृणाल गोरे प्रमुख हैं। हस्तियों को हराने वाले को किंग किलर कहा जाता है।
भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी को ‘मर्द’ की उपमा दी जाती है। लोहे जैसे मजबूत इरादों वाली इंदिरा गांधी की कार्यशैली का अनुकरण कई राजनेताओं ने किया है। 1977 के लोकसभा चुनाव में रायबरेली सीट से इंदिरा गांधी के खिलाफ जनता दल के नेता राजनारायण खड़े हुए। वे एक बहुत ही सामान्य प्रत्याशी थे। अपने पहनावे के कारण में हमेशा चर्चित रहे। उनकी कोई इमेज भी नहीं थे। किंतु इन्होंने एक इतिहास रचा। उन्होंने इंदिरा गांधी को 55 हजार 202 मतां से हराया। दूसरे ही दिन में अखबारों की सुखिर्यां बन गई। सभी अखबार उनकी प्रशंसा में खड़े हो गए। उन्हें क्विन किलर की उपाधि दी गई। इंदिरा गांधी को हराने किसी सपने से कम नहीं था। उनके सामने कोई खड़े रहने के लिए भी कोई तैयार नहीं था।  जनता दल में भी राजनारायण का मान-सम्मान बढ़ गया। इसी तरह भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी एक बार हार का स्वाद चखा है। उनकी प्रतिभा भी ऐसी थी कि उनके सामने कोई भी हार जाए। 1984 के लोकसभा चुनाव में ग्वालियर सीट से उनके खिलाफ माधवराव सिंधिया प्रत्याशी थे। अपनी मां विजयाराजे सिंधिया से नाराजगी के चलते माधवराव सिंधिया ने यह कदम उठाया था। वे कांग्रेस की तरफ से उम्मीदवार थे। माधवराव राज परिवार से थे, युवा थे। सभी को आश्चर्य उस समय हुआ, जब उन्होंने वाजपेयी को एक लाख 75 हजार 594 मतों से हरा दिया। आंध्र में तेलुगु देशम के संस्थापक और लोकप्रिय अभिनेता एनटी रामाराव को 1989 में कलवाकुर्पी सीट से कांग्रेस के चित्तरंजन दास ने तीन हजार 568 मतों से हरा दिया।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले ही दो कार्यकाल से देश के प्रधानमंत्री पद को सुशोभित कर रहे हों, उन्होंने एक बार भी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा। वे राज्यसभा के माध्यम से प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं। ¨क तु एक बार उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा था, तब भाजपा के प्रत्याशी से हार गए थे। दक्षिण दिल्ली की सीट पर उनके खिलाफ विजय कुमार मल्होत्रा खड़े थे। उनसे डॉ.मनमोहन सिंह 29 हजार 999 मतों से हार गए थे। हार-जीत सिक्के के दो पहलू हैं। जीतने वाले को हारना और हारने वाले को जीतना ही होता है। यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य से तृणमूल कांग्रेस ने सत्ता हथिया ली थी। तृणमूल ने वामपंथी सरकार को ही पलट कर रख दिया। उस समय बुद्धदेव भट्टाचार्य को तृणमूल के मनीष गुप्ता ने 16 हजार 684 मतों से हरा दिया। जिस तरह से अभी राजस्थान मं भाजपा ने गहलोत सरकार को उखाड़ फेंका है, ठीक उसी तरह पश्चिम बंगाल में भी ममता की आंधी के सामने वामपंथी सरकार उखड़ गई। 2009 के लोकसभा चुनाव में बिहार की लोकजन शक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान को हाजीपुर सीट से जनता दल यू के प्रत्याशी रामसुंदर दास ने 37 हजार 954 मतों से हराया था। कई बार दिग्गजों के सामने सेलिब्रिटी को मैदान में उतारा जाता है। इलाहाबाद के लोकप्रिय नेता और घर-घर में पहचाने जाने वाले नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा को हराने के लिए कांग्रेस ने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को खड़ा कर दिया। चुनाव के दौरान बहुगुणा ने घोषणा की थी कि यदि वे हार जाते हैं, तो राजनीति छोड़ देंगे, अंतत: वे हार गए। हारने के बाद उन्होंने अमिताभ को बधाई का जो तार भेजा, अमिताभ उसे अपनी उपलब्धि मानते रहे। मुम्बई में पानी वाली बाई के नाम से पहचान कायम करने वाली मृणाल गोरे को कांग्रेस के एक युवा नेता ने हराया था।
जिस तरह से आज शीला दीक्षित की सरकार की हालत है, ठीक वैसी ही हालत 14 वष्र पहले मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह सरकार की हुई थी। उमा भारती ने दिग्विजय सरकार का उलटकर रख दिया था। राजनीति में किसी को भी साधारण या सामान्य नहीं माना जा सकता । चुनावी जंग में अपने प्रतिस्पर्धी को अच्छी तरह से पहचान लेना चाहिए। प्रतिस्पर्धी की कमजोरी को ही हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। शीला दीक्षित आम आदमी से दूर हो गई थी। सत्ता का मद उन पर छा गया था। अपनी हार के बारे में वे सोच भी नहीं सकती थी। सच को स्वीकारने की हिम्मत उनमें नहीं थी। जनता ने उन्हें सबक सिखाया। अब उसे इस आघात से बाहर आकर अपने राजनैतिक जीवन के भूतकाल पर नजर डालनी चाहिए। ताकि अपनी कमजोरियों को जान सके। राजनीति में हार-जीत तो चलती रहती है, पर जब कोई सामान्य व्यक्ति लोकप्रिय नेता को हरा देता है, तो वह खबर बनती है।
    डॉ. महेश परिमल

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