राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।
हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना।
समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर।
हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी।
अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल।
राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। - अनंत गोपाल शेवड़े।
दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। - के.सी. सारंगमठ।
हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। - वी. कृष्णस्वामी अय्यर।
राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा नवीन।
विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग।
हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये। - बेरिस कल्यएव।
अंग्रेजी सर पर ढोना डूब मरने के बराबर है। - सम्पूर्णानंद।
एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित। - केशवचंद्र सेन।
देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है। - सेठ गोविंददास।
इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। - राहुल सांकृत्यायन।
समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है। -सर जार्ज ग्रियर्सन।
मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।
भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है। - नलिनविलोचन शर्मा।
जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।
प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है। - (राजा) कीर्त्यानंद सिंह।
अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।
साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।
जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है। - टी. माधवराव।
हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है। - र. रा. दिवाकर।
यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं। - राजेन्द्र प्रसाद।
उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है। - मुहम्मद हुसैन आजाद।
समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। - जनार्दनप्रसाद झा द्विज।
मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए। - राहुल सांकृत्यायन।
शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। - शिवप्रसाद सितारेहिंद।
हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है। - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।
वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके। - पीर मुहम्मद मूनिस।
भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहँुचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा। - शिवपूजन सहाय।
चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै। - बेनी कवि।
यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा। - ब्रजनंदन दास।
देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।
हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है। - छविनाथ पांडेय।
देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है। - रविशंकर शुक्ल।
हमारी नागरी दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है। - राहुल सांकृत्यायन।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।
साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।
अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती। - पं. कृ. पिल्लयार।
उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है। - जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है। - देवव्रत शास्त्री।
हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता। - गोविन्दवल्लभ पंत।
भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है। - रविशंकर शुक्ल।
किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय। - ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह।
भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है। - माधव शुक्ल।
संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है। - डॉ. फादर कामिल बुल्के।
भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जानसन।
रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है। - यशोदानंदन अखौरी।
साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं। - श्रीनारायण चतुर्वेदी।
हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।
देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है? - शिवपूजन सहाय।
जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप। - राधाचरण गोस्वामी।
हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है। - कमलापति त्रिपाठी।
मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता। - मनोरंजन प्रसाद।
हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है। - (प्रो.) तान युन् शान।
राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है। - कमलापति त्रिपाठी।
सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए। - श्रीधर पाठक।
भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। - धीरेन्द्र वर्मा।
जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। - शेली।
भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है। - लक्ष्मीनारायण सुधांशु।
भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है। - सम्पूर्णानन्द।
हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।
परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें। - हरगोविंद सिंह।
अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं। - अनंतशयनम् आयंगार।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।
दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है। - अज्ञात।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम। - बिस्मार्क।
हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है। - गोपाललाल खत्री।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है। - भूदेव मुखर्जी।
हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है। - नन्ददुलारे वाजपेयी।
अकबर की सभा में सूर के जसुदा बार-बार यह भाखै पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।- राधाचरण गोस्वामी।
देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी। - (डॉ.) भगवानदास।
हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है। - ठाकुरदत्त शर्मा।
निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है। - पंडित सुधाकर पांडेय।
अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है। - रविशंकर शुक्ल।
बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है। - भवानीदयाल संन्यासी।
यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है। - दरियाये लताफत।
भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता। - देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती। - संपूर्णानंद।
भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है। - बदरीनाथ शर्मा।
तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई। - शिवपूजन सहाय।
अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है। - महात्मा गाँधी।
हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन।
भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है। - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी।
हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।- मथुरा प्रसाद दीक्षित।
भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।- रवींद्रनाथ ठाकुर।
इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है। - केशवचंद्र सेन।
हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है। - गोविंदबल्लभ पंत।
हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था। - सेठ गोविंददास।
हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है। - (डॉ.) रामविलास शर्मा।
जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए। - सेठ गोविंददास।
साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है। - (म. म.) सत्यनारायण शर्मा।
जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं। - शिवनंदन सहाय।
उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दू दाँ तक तंग आ गए हैं। - राहुल सांकृत्यायन।
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती। - मैथिलीशरण गुप्त।
गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है। - ब्रजभूषण पांडेय।
लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है। - कंक।
मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता। - र. रा. दिवाकर।
देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है। - राहुल सांकृत्यायन।
किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है। - अंबाप्रसाद सुमन।
हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है। - पं. गिरिधर शर्मा।
हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। - वासुदेवशरण अग्रवाल।
भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था। - विष्णुदेव पौद्दार।
सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है। - वाल्टर चेनिंग।
हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है। - जहूरबख्श।
किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा। - सैयद इंशा अल्ला खाँ।
अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है - संपूर्णानंद।
हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए। - रविशंकर शुक्ल।
हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है। - छविनाथ पांडेय।
साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है। - पार्वती देवी।
विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं। - चंद्रबली पांडेय।
भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है। - राहुल सांकृत्यायन।
जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता - वासुदेवशरण अग्रवाल।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है। - अज्ञात।
समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती। - पं. सुधाकर पांडेय।
तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती। - मौलाना मुहम्मद अली।
भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है। - शांतानंद नाथ।
भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए। - नाथूराम शंकर शर्मा।
राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए। - राजकुमार वर्मा।
हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है। - सुनीति कुमार चाटुर्ज्या।
स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है। - निराला।
कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है। - सुमित्रानंदन पंत।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविंद शास्त्री दुगवेकर।
उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है। - रामरणविजय सिंह।
राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है। - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव।
बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी। - पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी।
जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि। - देवी प्रसाद गुप्त।
हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है। - शांतानंद नाथ।
आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है। - सूर्यनारायण व्यास।
कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली मीर।
हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है। - ब्रजनंदन सहाय।
कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है। - रामचंद्र शुक्ल।
हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है। - चंद्रबली पांडेय।
जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं। - माधवराव सप्रे।
कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है। - सू. च. धर।
मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे।
आज का आविष्कार कल का साहित्य है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं। - राहुल सांकृत्यायन।
जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती। - माधव राव सप्रे।
हिंदी विश्व की महान भाषा है। - राहुल सांकृत्यायन।
राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है। - ब्रजनंदन सहाय।
जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो। - संत रामदास।
पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती। - माखनलाल चतुर्वेदी।
मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा। - लीलावती मुंशी।
हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए। - देवी प्रसाद गुप्त।
साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है। - पं. वागीश्वर जी।
हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है। - डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्य कांत त्रिपाठी निराला।
भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।
पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है। - पं. वागीश्वर जी।
विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है। - बी. सी. जोशी।
हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे। - बृजनंदन सहाय।
भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है। - म. म. रामावतार शर्मा।
साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है। - रघुवरप्रसाद द्विवेदी।
यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें। - एक फ्रांसीसी बालिका।
निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है। - पंडित सुधाकर पांडेय।
हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो। - सैयद अमीर अली मीर।
इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है। - जयचंद्र विद्यालंकार।
सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है। - अमरनाथ झा।
हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं। - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी।
एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं। - अयोध्याप्रसाद वर्मा।
किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है। - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।
बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो। - सकलनारायण पांडेय।
संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी। - मौलवी महमूद अली।
संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है। - ताराचंद्र दूबे।
सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं। - राजा कृत्यानंद सिंह।
जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है। - नरोत्तम व्यास।
भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है। - बदरीनाथ भट्ट।
साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा। - बिहारीलाल चौबे।
देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है। - मन्नन द्विवेदी।
है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी। - मैथिलीशरण गुप्त।
संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है। - राहुल सांकृत्यायन।
कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।
हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें। - पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है। - गिरजाकुमार घोष।
यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का। - अज्ञात।
क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो। - डॉ. श्यामसुंदर दास।
बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है। - रमेशचंद्र दत्त।
वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है। - सैयद अमीर अली मीर।
दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है। - गिरींद्रमोहन मित्र।
समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है। - म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी।
नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है। - बाबू राव विष्णु पराड़कर।
अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है। - अनादिधन वंद्योपाध्याय।
व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता। - अनंतराम त्रिपाठी।
स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए। - रामजी लाल शर्मा।
गुणवान खानखाना सदृश प्रेमी हो गए रसखान और रसलीन से हिंदी प्रेमी हो गए। - राय देवीप्रसाद।
वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है। - गणपति जानकीराम दूबे।
हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता। - महात्मा गाँधी।
अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है। - अज्ञात।
कवि का हृदय कोमल होता है। - गिरिजाकुमार घोष।
श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं। - शैलजाकुमार घोष।
हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती। - चंद्रबली पाण्डेय।
भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है। - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे। - सत्यदेव परिव्राजक।
खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है। - बदरीनाथ भट्ट।
भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है। - विनयकुमार सरकार।
हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है। - बदरीनारायण चौधरी प्रेमधन।
हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है। - रामचंद्र शुक्ल।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। - भारतेंदू हरिश्चंद्र।
आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है। - वीम्स साहब।
क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे। - हरिऔध।
जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती। - विष्णु दिगंबर।
जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता। - गोपाललाल खत्री।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।
जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी। - शारदाचरण मित्र।
इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है। - महात्मा गांधी।
जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है। - डॉ. भगवानादास।
विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय। - भीमसेन शर्मा।
भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।
अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था। - छोटूलाल मिश्र।
नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है। - गोपालदास गहमरी।
किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।
जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है। - निराला।
देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है। - चकोर।
शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है। - पं. रामनारायण मिश्र।
भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए। - श्यामसुंदर दास।
विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो। - पं. गिरधर शर्मा।
विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो। - महात्मा गांधी।
यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।
हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं। - महात्मा गांधी।
सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते। - म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी।
किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं। - साहित्याचार्य रामावतार शर्मा।
जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती। - पांडेय रामवतार शर्मा।
नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है। - नाथूराम शंकर शर्मा।
जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है। - घनश्याम सिंह।
विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है। - माधवराव सप्रे।
मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। - माधवराव सप्रे।
मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती। - डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - महात्मा गांधी।
राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है। - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है। - मोहनलाल महतो वियोगी।
युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है। - सु. च. धर।
हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना। - नूर मुहम्मद।
आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है। - गिरधर शर्मा।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।
देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर। - माधव शुक्ल।
जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - गोविन्ददास।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।
देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो। - पं. गिरधर शर्मा।
राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है। - जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे। - चंद्रशेखर मिश्र।
सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है। - शरच्चंद।
सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी। - संतराम शर्मा।
हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है। - मौलाना हसरत मोहानी।
ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है। - मिश्रबंधु।
हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है। - चंद्रबली पांडेय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।
हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है। - महात्मा गांधी।
मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें। - विनोबा भावे।
साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला। - माखनलाल चतुर्वेदी।
एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है। - वी. सी. जोशी।
हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। - स्वामी दयानंद।
इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना। - जयशंकर प्रसाद।
विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है। - अरस्तु।
अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं। - डिजरायली।
जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी। - श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् ।
शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज। - कबीर।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है। - सुभाषचन्द्र बसु।
प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है। - एक जपानी सूक्ति।
संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं। - यशेदानंदन अखौरी।
राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है। - महात्मा गांधी।
शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -स्वत्व का रक्षण हो। - माधवराव सप्रे।
विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है। - जयशंकर प्रसाद।
जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती। - बाबूराव विष्णु पराड़कर।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।
हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है। - अज्ञात।
कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है। - मैक्सिम गोर्की।
कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है। - महादेवी वर्मा।
क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है। - माघ।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है। - पास्कल।
हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। - धीरेन्द्र वर्मा।
साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है। - अज्ञात।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है। - बागीश्वरजी।
श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है। - रामचंद्र शुक्ल।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। - शेली।
भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम। - बिस्मार्क।
रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है। - पंडितराज जगन्नाथ।
प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है। - रामचंद्र शुक्ल।
अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है। - भास्कर गोविन्द धाणेकर।
यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती। - माधवराव सप्रे।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी। - पं. नेहरू।
भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जोनसन।
हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है। - सेठ गोविन्ददास।
अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह सुधांशु।
आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे। - चन्द्रबली पांडेय।
जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है। - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है। - ग्रियर्सन।
मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया। - महात्मा गांधी।
मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन।
संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता। - डॉ. सम्पूर्णानन्द।
उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए। - मौलाना मुहम्मद अली।
राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है। - पास्कल।
विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य। - मन्नन द्विवेदी।
जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है। - राहुल सांकृत्यायन।
सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है। - रणवीर सिंह जी।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है। - ठाकुरदत्त शर्मा।
हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है। - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी।
हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान। - मिश्रबंधु।
साहित्य ही हमारा जीवन है। - डॉ. भगवानदास।
मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है। - मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है। - माधव शुक्ल।
हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है। - अंबिका प्रसाद वाजपेयी।
हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है। - शिवपूजन सहाय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।
राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये। - शारदाचरण मित्र (जस्टिस)।
समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिन्द भाषी जाति की एकता आवश्यक है। - रामविलास शर्मा।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ। - आचार्य क्षितिमोहन सेन।
हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं। - अनंत गोपाल शेवड़े।
अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं। - सैयदअली बिलग्रामी।
हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए। - शचींद्रनाथ बख्शी।
अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए। - र. रा. दिवाकर।
हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। - विनयमोहन शर्मा।
अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं। - अवनींद्र कुमार विद्यालंकार।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा। - अनंतशयनम् आयंगार।
संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी। - राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन।
(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया। - अमृतलाल नागर।
शुक्रवार, 10 सितंबर 2010
हिंदी पर महापुरुषों के विचार
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दृष्टिकोण
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
हिंदी पर महापुरुषों के विचार
राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।
हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना।
समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर।
हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी।
अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल।
राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। - अनंत गोपाल शेवड़े।
दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। - के.सी. सारंगमठ।
हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। - वी. कृष्णस्वामी अय्यर।
राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा नवीन।
विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग।
हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये। - बेरिस कल्यएव।
अंग्रेजी सर पर ढोना डूब मरने के बराबर है। - सम्पूर्णानंद।
एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित। - केशवचंद्र सेन।
देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है। - सेठ गोविंददास।
इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। - राहुल सांकृत्यायन।
समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है। -सर जार्ज ग्रियर्सन।
मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।
भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है। - नलिनविलोचन शर्मा।
जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।
प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है। - (राजा) कीर्त्यानंद सिंह।
अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।
साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।
जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है। - टी. माधवराव।
हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है। - र. रा. दिवाकर।
यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं। - राजेन्द्र प्रसाद।
उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है। - मुहम्मद हुसैन आजाद।
समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। - जनार्दनप्रसाद झा द्विज।
मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए। - राहुल सांकृत्यायन।
शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। - शिवप्रसाद सितारेहिंद।
हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है। - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।
वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके। - पीर मुहम्मद मूनिस।
भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहँुचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा। - शिवपूजन सहाय।
चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै। - बेनी कवि।
यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा। - ब्रजनंदन दास।
देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।
हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है। - छविनाथ पांडेय।
देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है। - रविशंकर शुक्ल।
हमारी नागरी दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है। - राहुल सांकृत्यायन।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।
साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।
अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती। - पं. कृ. पिल्लयार।
उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है। - जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है। - देवव्रत शास्त्री।
हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता। - गोविन्दवल्लभ पंत।
भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है। - रविशंकर शुक्ल।
किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय। - ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह।
भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है। - माधव शुक्ल।
संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है। - डॉ. फादर कामिल बुल्के।
भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जानसन।
रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है। - यशोदानंदन अखौरी।
साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं। - श्रीनारायण चतुर्वेदी।
हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।
देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है? - शिवपूजन सहाय।
जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप। - राधाचरण गोस्वामी।
हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है। - कमलापति त्रिपाठी।
मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता। - मनोरंजन प्रसाद।
हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है। - (प्रो.) तान युन् शान।
राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है। - कमलापति त्रिपाठी।
सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए। - श्रीधर पाठक।
भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। - धीरेन्द्र वर्मा।
जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। - शेली।
भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है। - लक्ष्मीनारायण सुधांशु।
भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है। - सम्पूर्णानन्द।
हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।
परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें। - हरगोविंद सिंह।
अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं। - अनंतशयनम् आयंगार।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।
दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है। - अज्ञात।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम। - बिस्मार्क।
हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है। - गोपाललाल खत्री।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है। - भूदेव मुखर्जी।
हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है। - नन्ददुलारे वाजपेयी।
अकबर की सभा में सूर के जसुदा बार-बार यह भाखै पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।- राधाचरण गोस्वामी।
देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी। - (डॉ.) भगवानदास।
हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है। - ठाकुरदत्त शर्मा।
निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है। - पंडित सुधाकर पांडेय।
अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है। - रविशंकर शुक्ल।
बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है। - भवानीदयाल संन्यासी।
यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है। - दरियाये लताफत।
भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता। - देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती। - संपूर्णानंद।
भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है। - बदरीनाथ शर्मा।
तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई। - शिवपूजन सहाय।
अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है। - महात्मा गाँधी।
हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन।
भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है। - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी।
हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।- मथुरा प्रसाद दीक्षित।
भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।- रवींद्रनाथ ठाकुर।
इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है। - केशवचंद्र सेन।
हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है। - गोविंदबल्लभ पंत।
हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था। - सेठ गोविंददास।
हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है। - (डॉ.) रामविलास शर्मा।
जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए। - सेठ गोविंददास।
साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है। - (म. म.) सत्यनारायण शर्मा।
जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं। - शिवनंदन सहाय।
उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दू दाँ तक तंग आ गए हैं। - राहुल सांकृत्यायन।
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती। - मैथिलीशरण गुप्त।
गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है। - ब्रजभूषण पांडेय।
लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है। - कंक।
मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता। - र. रा. दिवाकर।
देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है। - राहुल सांकृत्यायन।
किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है। - अंबाप्रसाद सुमन।
हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है। - पं. गिरिधर शर्मा।
हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। - वासुदेवशरण अग्रवाल।
भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था। - विष्णुदेव पौद्दार।
सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है। - वाल्टर चेनिंग।
हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है। - जहूरबख्श।
किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा। - सैयद इंशा अल्ला खाँ।
अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है - संपूर्णानंद।
हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए। - रविशंकर शुक्ल।
हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है। - छविनाथ पांडेय।
साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है। - पार्वती देवी।
विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं। - चंद्रबली पांडेय।
भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है। - राहुल सांकृत्यायन।
जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता - वासुदेवशरण अग्रवाल।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है। - अज्ञात।
समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती। - पं. सुधाकर पांडेय।
तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती। - मौलाना मुहम्मद अली।
भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है। - शांतानंद नाथ।
भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए। - नाथूराम शंकर शर्मा।
राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए। - राजकुमार वर्मा।
हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है। - सुनीति कुमार चाटुर्ज्या।
स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है। - निराला।
कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है। - सुमित्रानंदन पंत।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविंद शास्त्री दुगवेकर।
उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है। - रामरणविजय सिंह।
राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है। - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव।
बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी। - पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी।
जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि। - देवी प्रसाद गुप्त।
हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है। - शांतानंद नाथ।
आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है। - सूर्यनारायण व्यास।
कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली मीर।
हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है। - ब्रजनंदन सहाय।
कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है। - रामचंद्र शुक्ल।
हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है। - चंद्रबली पांडेय।
जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं। - माधवराव सप्रे।
कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है। - सू. च. धर।
मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे।
आज का आविष्कार कल का साहित्य है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं। - राहुल सांकृत्यायन।
जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती। - माधव राव सप्रे।
हिंदी विश्व की महान भाषा है। - राहुल सांकृत्यायन।
राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है। - ब्रजनंदन सहाय।
जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो। - संत रामदास।
पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती। - माखनलाल चतुर्वेदी।
मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा। - लीलावती मुंशी।
हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए। - देवी प्रसाद गुप्त।
साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है। - पं. वागीश्वर जी।
हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है। - डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्य कांत त्रिपाठी निराला।
भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।
पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है। - पं. वागीश्वर जी।
विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है। - बी. सी. जोशी।
हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे। - बृजनंदन सहाय।
भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है। - म. म. रामावतार शर्मा।
साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है। - रघुवरप्रसाद द्विवेदी।
यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें। - एक फ्रांसीसी बालिका।
निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है। - पंडित सुधाकर पांडेय।
हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो। - सैयद अमीर अली मीर।
इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है। - जयचंद्र विद्यालंकार।
सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है। - अमरनाथ झा।
हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं। - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी।
एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं। - अयोध्याप्रसाद वर्मा।
किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है। - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।
बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो। - सकलनारायण पांडेय।
संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी। - मौलवी महमूद अली।
संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है। - ताराचंद्र दूबे।
सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं। - राजा कृत्यानंद सिंह।
जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है। - नरोत्तम व्यास।
भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है। - बदरीनाथ भट्ट।
साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा। - बिहारीलाल चौबे।
देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है। - मन्नन द्विवेदी।
है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी। - मैथिलीशरण गुप्त।
संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है। - राहुल सांकृत्यायन।
कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।
हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें। - पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है। - गिरजाकुमार घोष।
यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का। - अज्ञात।
क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो। - डॉ. श्यामसुंदर दास।
बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है। - रमेशचंद्र दत्त।
वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है। - सैयद अमीर अली मीर।
दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है। - गिरींद्रमोहन मित्र।
समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है। - म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी।
नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है। - बाबू राव विष्णु पराड़कर।
अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है। - अनादिधन वंद्योपाध्याय।
व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता। - अनंतराम त्रिपाठी।
स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए। - रामजी लाल शर्मा।
गुणवान खानखाना सदृश प्रेमी हो गए रसखान और रसलीन से हिंदी प्रेमी हो गए। - राय देवीप्रसाद।
वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है। - गणपति जानकीराम दूबे।
हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता। - महात्मा गाँधी।
अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है। - अज्ञात।
कवि का हृदय कोमल होता है। - गिरिजाकुमार घोष।
श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं। - शैलजाकुमार घोष।
हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती। - चंद्रबली पाण्डेय।
भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है। - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे। - सत्यदेव परिव्राजक।
खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है। - बदरीनाथ भट्ट।
भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है। - विनयकुमार सरकार।
हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है। - बदरीनारायण चौधरी प्रेमधन।
हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है। - रामचंद्र शुक्ल।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। - भारतेंदू हरिश्चंद्र।
आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है। - वीम्स साहब।
क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे। - हरिऔध।
जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती। - विष्णु दिगंबर।
जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता। - गोपाललाल खत्री।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।
जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी। - शारदाचरण मित्र।
इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है। - महात्मा गांधी।
जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है। - डॉ. भगवानादास।
विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय। - भीमसेन शर्मा।
भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।
अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था। - छोटूलाल मिश्र।
नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है। - गोपालदास गहमरी।
किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।
जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है। - निराला।
देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है। - चकोर।
शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है। - पं. रामनारायण मिश्र।
भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए। - श्यामसुंदर दास।
विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो। - पं. गिरधर शर्मा।
विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो। - महात्मा गांधी।
यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।
हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं। - महात्मा गांधी।
सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते। - म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी।
किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं। - साहित्याचार्य रामावतार शर्मा।
जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती। - पांडेय रामवतार शर्मा।
नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है। - नाथूराम शंकर शर्मा।
जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है। - घनश्याम सिंह।
विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है। - माधवराव सप्रे।
मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। - माधवराव सप्रे।
मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती। - डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - महात्मा गांधी।
राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है। - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है। - मोहनलाल महतो वियोगी।
युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है। - सु. च. धर।
हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना। - नूर मुहम्मद।
आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है। - गिरधर शर्मा।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।
देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर। - माधव शुक्ल।
जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - गोविन्ददास।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।
देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो। - पं. गिरधर शर्मा।
राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है। - जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे। - चंद्रशेखर मिश्र।
सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है। - शरच्चंद।
सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी। - संतराम शर्मा।
हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है। - मौलाना हसरत मोहानी।
ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है। - मिश्रबंधु।
हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है। - चंद्रबली पांडेय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।
हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है। - महात्मा गांधी।
मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें। - विनोबा भावे।
साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला। - माखनलाल चतुर्वेदी।
एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है। - वी. सी. जोशी।
हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। - स्वामी दयानंद।
इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना। - जयशंकर प्रसाद।
विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है। - अरस्तु।
अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं। - डिजरायली।
जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी। - श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् ।
शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज। - कबीर।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है। - सुभाषचन्द्र बसु।
प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है। - एक जपानी सूक्ति।
संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं। - यशेदानंदन अखौरी।
राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है। - महात्मा गांधी।
शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -स्वत्व का रक्षण हो। - माधवराव सप्रे।
विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है। - जयशंकर प्रसाद।
जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती। - बाबूराव विष्णु पराड़कर।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।
हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है। - अज्ञात।
कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है। - मैक्सिम गोर्की।
कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है। - महादेवी वर्मा।
क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है। - माघ।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है। - पास्कल।
हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। - धीरेन्द्र वर्मा।
साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है। - अज्ञात।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है। - बागीश्वरजी।
श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है। - रामचंद्र शुक्ल।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। - शेली।
भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम। - बिस्मार्क।
रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है। - पंडितराज जगन्नाथ।
प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है। - रामचंद्र शुक्ल।
अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है। - भास्कर गोविन्द धाणेकर।
यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती। - माधवराव सप्रे।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी। - पं. नेहरू।
भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जोनसन।
हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है। - सेठ गोविन्ददास।
अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह सुधांशु।
आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे। - चन्द्रबली पांडेय।
जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है। - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है। - ग्रियर्सन।
मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया। - महात्मा गांधी।
मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन।
संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता। - डॉ. सम्पूर्णानन्द।
उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए। - मौलाना मुहम्मद अली।
राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है। - पास्कल।
विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य। - मन्नन द्विवेदी।
जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है। - राहुल सांकृत्यायन।
सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है। - रणवीर सिंह जी।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है। - ठाकुरदत्त शर्मा।
हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है। - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी।
हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान। - मिश्रबंधु।
साहित्य ही हमारा जीवन है। - डॉ. भगवानदास।
मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है। - मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है। - माधव शुक्ल।
हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है। - अंबिका प्रसाद वाजपेयी।
हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है। - शिवपूजन सहाय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।
राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये। - शारदाचरण मित्र (जस्टिस)।
समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिन्द भाषी जाति की एकता आवश्यक है। - रामविलास शर्मा।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ। - आचार्य क्षितिमोहन सेन।
हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं। - अनंत गोपाल शेवड़े।
अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं। - सैयदअली बिलग्रामी।
हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए। - शचींद्रनाथ बख्शी।
अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए। - र. रा. दिवाकर।
हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। - विनयमोहन शर्मा।
अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं। - अवनींद्र कुमार विद्यालंकार।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा। - अनंतशयनम् आयंगार।
संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी। - राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन।
(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया। - अमृतलाल नागर।
हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना।
समस्त भारतीय भाषाओं के लिए यदि कोई एक लिपि आवश्यक हो तो वह देवनागरी ही हो सकती है। - (जस्टिस) कृष्णस्वामी अय्यर।
हिंदी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। - शंकरराव कप्पीकेरी।
अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल।
राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। - अनंत गोपाल शेवड़े।
दक्षिण की हिंदी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। - के.सी. सारंगमठ।
हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। - वी. कृष्णस्वामी अय्यर।
राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा नवीन।
विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग।
हिंदी को तुरंत शिक्षा का माध्यम बनाइये। - बेरिस कल्यएव।
अंग्रेजी सर पर ढोना डूब मरने के बराबर है। - सम्पूर्णानंद।
एखन जतोगुलि भाषा भारते प्रचलित आछे ताहार मध्ये भाषा सर्वत्रइ प्रचलित। - केशवचंद्र सेन।
देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है। - सेठ गोविंददास।
इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। - राहुल सांकृत्यायन।
समस्त आर्यावर्त या ठेठ हिंदुस्तान की राष्ट्र तथा शिष्ट भाषा हिंदी या हिंदुस्तानी है। -सर जार्ज ग्रियर्सन।
मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।
भारत की परंपरागत राष्ट्रभाषा हिंदी है। - नलिनविलोचन शर्मा।
जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।
प्रत्येक नगर प्रत्येक मोहल्ले में और प्रत्येक गाँव में एक पुस्तकालय होने की आवश्यकता है। - (राजा) कीर्त्यानंद सिंह।
अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।
साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।
जो साहित्य केवल स्वप्नलोक की ओर ले जाये, वास्तविक जीवन को उपकृत करने में असमर्थ हो, वह नितांत महत्वहीन है। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
भारतीय एकता के लक्ष्य का साधन हिंदी भाषा का प्रचार है। - टी. माधवराव।
हिंदी हिंद की, हिंदियों की भाषा है। - र. रा. दिवाकर।
यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं। - राजेन्द्र प्रसाद।
उर्दू जबान ब्रजभाषा से निकली है। - मुहम्मद हुसैन आजाद।
समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। - जनार्दनप्रसाद झा द्विज।
मजहब को यह मौका न मिलना चाहिए कि वह हमारे साहित्यिक, सामाजिक, सभी क्षेत्रों में टाँग अड़ाए। - राहुल सांकृत्यायन।
शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। - शिवप्रसाद सितारेहिंद।
हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है। - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।
वही भाषा जीवित और जाग्रत रह सकती है जो जनता का ठीक-ठीक प्रतिनिधित्व कर सके। - पीर मुहम्मद मूनिस।
भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहँुचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा। - शिवपूजन सहाय।
चक्कवै दिली के अथक्क अकबर सोऊ, नरहर पालकी को आपने कँधा करै। - बेनी कवि।
यह निर्विवाद है कि हिंदुओं को उर्दू भाषा से कभी द्वेष नहीं रहा। - ब्रजनंदन दास।
देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।
हिंदी भाषा अपनी अनेक धाराओं के साथ प्रशस्त क्षेत्र में प्रखर गति से प्रकाशित हो रही है। - छविनाथ पांडेय।
देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है। - रविशंकर शुक्ल।
हमारी नागरी दुनिया की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि है। - राहुल सांकृत्यायन।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।
साहित्य का स्रोत जनता का जीवन है। - गणेशशंकर विद्यार्थी।
अंग्रेजी से भारत की रक्षा नहीं हो सकती। - पं. कृ. पिल्लयार।
उसी दिन मेरा जीवन सफल होगा जिस दिन मैं सारे भारतवासियों के साथ शुद्ध हिंदी में वार्तालाप करूँगा। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी के ऊपर आघात पहुँचाना हमारे प्राणधर्म पर आघात पहुँचाना है। - जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
हिंदी जाननेवाला व्यक्ति देश के किसी कोने में जाकर अपना काम चला लेता है। - देवव्रत शास्त्री।
हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता। - गोविन्दवल्लभ पंत।
भारत की सारी प्रांतीय भाषाओं का दर्जा समान है। - रविशंकर शुक्ल।
किसी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
हार सरोज हिए है लसै मम ऐसी गुनागरी नागरी होय। - ठाकुर त्रिभुवननाथ सिंह।
भाषा ही से हृदयभाव जाना जाता है। शून्य किंतु प्रत्यक्ष हुआ सा दिखलाता है। - माधव शुक्ल।
संस्कृत मां, हिंदी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है। - डॉ. फादर कामिल बुल्के।
भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जानसन।
रामचरित मानस हिंदी साहित्य का कोहनूर है। - यशोदानंदन अखौरी।
साहित्य के हर पथ पर हमारा कारवाँ तेजी से बढ़ता जा रहा है। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
कवि संमेलन हिंदी प्रचार के बहुत उपयोगी साधन हैं। - श्रीनारायण चतुर्वेदी।
हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।
देवनागरी अक्षरों का कलात्मक सौंदर्य नष्ट करना कहाँ की बुद्धिमानी है? - शिवपूजन सहाय।
जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।
कविता कामिनि भाल में हिंदी बिंदी रूप, प्रकट अग्रवन में भई ब्रज के निकट अनूप। - राधाचरण गोस्वामी।
हिंदी समस्त आर्यावर्त की भाषा है। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है। - कमलापति त्रिपाठी।
मैं उर्दू को हिंदी की एक शैली मात्र मानता। - मनोरंजन प्रसाद।
हिंदी भाषा को भारतीय जनता तथा संपूर्ण मानवता के लिये बहुत बड़ा उत्तरदायित्व सँभालना है। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
नागरीप्रचारिणी सभा, काशी की हीरकजयंती के पावन अवसर पर उपस्थित न हो सकने का मुझे बड़ा खेद है। - (प्रो.) तान युन् शान।
राष्ट्रभाषा हिंदी हो जाने पर भी हमारे व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन पर विदेशी भाषा का प्रभुत्व अत्यंत गर्हित बात है। - कमलापति त्रिपाठी।
सभ्य संसार के सारे विषय हमारे साहित्य में आ जाने की ओर हमारी सतत् चेष्टा रहनी चाहिए। - श्रीधर पाठक।
भारतवर्ष के लिए हिंदी भाषा ही सर्वसाधरण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। - धीरेन्द्र वर्मा।
जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। - शेली।
भाषा की समस्या का समाधान सांप्रदायिक दृष्टि से करना गलत है। - लक्ष्मीनारायण सुधांशु।
भारतीय साहित्य और संस्कृति को हिंदी की देन बड़ी महत्त्वपूर्ण है। - सम्पूर्णानन्द।
हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।
परमात्मा से प्रार्थना है कि हिंदी का मार्ग निष्कंटक करें। - हरगोविंद सिंह।
अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं। - अनंतशयनम् आयंगार।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।
दाहिनी हो पूर्ण करती है अभिलाषा पूज्य हिंदी भाषा हंसवाहिनी का अवतार है। - अज्ञात।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है- योजना में उदारता, उसे पूरा करने में मनुष्यता और सफलता में संयम। - बिस्मार्क।
हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है। - गोपाललाल खत्री।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी ही के द्वारा अखिल भारत का राष्ट्रनैतिक ऐक्य सुदृढ़ हो सकता है। - भूदेव मुखर्जी।
हिंदी का शिक्षण भारत में अनिवार्य ही होगा। - सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या।
हिंदी, नागरी और राष्ट्रीयता अन्योन्याश्रित है। - नन्ददुलारे वाजपेयी।
अकबर की सभा में सूर के जसुदा बार-बार यह भाखै पद पर बड़ा स्मरणीय विचार हुआ था।- राधाचरण गोस्वामी।
देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
हिंदी साहित्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष इस चतु:पुरुषार्थ का साधक अतएव जनोपयोगी। - (डॉ.) भगवानदास।
हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा धर्म यज्ञ है। - ठाकुरदत्त शर्मा।
निष्काम कर्म ही सर्वोत्तम कार्य है, जो तृप्ति प्रदाता है और व्यक्ति और समाज की शक्ति बढ़ाता है। - पंडित सुधाकर पांडेय।
अब हिंदी ही माँ भारती हो गई है- वह सबकी आराध्य है, सबकी संपत्ति है। - रविशंकर शुक्ल।
बच्चों को विदेशी लिपि की शिक्षा देना उनको राष्ट्र के सच्चे प्रेम से वंचित करना है। - भवानीदयाल संन्यासी।
यहाँ (दिल्ली) के खुशबयानों ने मताहिद (गिनी चुनी) जबानों से अच्छे अच्छे लफ्ज निकाले और बाजे इबारतों और अल्फाज में तसर्रूफ (परिवर्तन) करके एक नई जवान पैदा की जिसका नाम उर्दू रखा है। - दरियाये लताफत।
भाषा और राष्ट्र में बड़ा घनिष्ट संबंध है। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।
अगर उर्दूवालों की नीति हिंदी के बहिष्कार की न होती तो आज लिपि के सिवा दोनों में कोई भेद न पाया जाता। - देशरत्न डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी भाषा की उन्नति का अर्थ है राष्ट्र और जाति की उन्नति। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
बाजारवाली बोली विश्वविद्यालयों में काम नहीं दे सकती। - संपूर्णानंद।
भारतेंदु का साहित्य मातृमंदिर की अर्चना का साहित्य है। - बदरीनाथ शर्मा।
तलवार के बल से न कोई भाषा चलाई जा सकती है न मिटाई। - शिवपूजन सहाय।
अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिये ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता समझता है। - महात्मा गाँधी।
हिंदी को राजभाषा करने के बाद पूरे पंद्रह वर्ष तक अंग्रेजी का प्रयोग करना पीछे कदम हटाना है।- राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन।
भाषा राष्ट्रीय शरीर की आत्मा है। - स्वामी भवानीदयाल संन्यासी।
हिंदी के राष्ट्रभाषा होने से जहाँ हमें हर्षोल्लास है, वहीं हमारा उत्तरदायित्व भी बहुत बढ़ गया है।- मथुरा प्रसाद दीक्षित।
भारतवर्ष में सभी विद्याएँ सम्मिलित परिवार के समान पारस्परिक सद्भाव लेकर रहती आई हैं।- रवींद्रनाथ ठाकुर।
इतिहास को देखते हुए किसी को यह कहने का अधिकारी नहीं कि हिंदी का साहित्य जायसी के पहले का नहीं मिलता। - (डॉ.) काशीप्रसाद जायसवाल।
संप्रति जितनी भाषाएं भारत में प्रचलित हैं उनमें से हिंदी भाषा प्राय: सर्वत्र व्यवहृत होती है। - केशवचंद्र सेन।
हिंदी ने राष्ट्रभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है। - गोविंदबल्लभ पंत।
हिंदी जिस दिन राजभाषा स्वीकृत की गई उसी दिन से सारा राजकाज हिंदी में चल सकता था। - सेठ गोविंददास।
हिंदी भाषी प्रदेश की जनता से वोट लेना और उनकी भाषा तथा साहित्य को गालियाँ देना कुछ नेताओं का दैनिक व्यवसाय है। - (डॉ.) रामविलास शर्मा।
जब एक बार यह निश्चय कर लिया गया कि सन् १९६५ से सब काम हिंदी में होगा, तब उसे अवश्य कार्यान्वित करना चाहिए। - सेठ गोविंददास।
साहित्यसेवा और धर्मसाधना पर्यायवायी है। - (म. म.) सत्यनारायण शर्मा।
जिसका मन चाहे वह हिंदी भाषा से हमारा दूर का संबंध बताये, मगर हम बिहारी तो हिंदी को ही अपनी भाषा, मातृभाषा मानते आए हैं। - शिवनंदन सहाय।
उर्दू का ढाँचा हिंदी है, लेकिन सत्तर पचहत्तर फीसदी उधार के शब्दों से उर्दू दाँ तक तंग आ गए हैं। - राहुल सांकृत्यायन।
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती। भगवान भारतवर्ष में गूँजे हमारी भारती। - मैथिलीशरण गुप्त।
गद्य जीवनसंग्राम की भाषा है। इसमें बहुत कार्य करना है, समय थोड़ा है। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
अंग्रेजी हमें गूँगा और कूपमंडूक बना रही है। - ब्रजभूषण पांडेय।
लाखों की संख्या में छात्रों की उस पलटन से क्या लाभ जिनमें अंग्रेजी में एक प्रार्थनापत्र लिखने की भी क्षमता नहीं है। - कंक।
मैं राष्ट्र का प्रेम, राष्ट्र के भिन्न-भिन्न लोगों का प्रेम और राष्ट्रभाषा का प्रेम, इसमें कुछ भी फर्क नहीं देखता। - र. रा. दिवाकर।
देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता स्वयं सिद्ध है। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिमालय से सतपुड़ा और अंबाला से पूर्णिया तक फैला हुआ प्रदेश हिंदी का प्रकृत प्रांत है। - राहुल सांकृत्यायन।
किसी राष्ट्र की राजभाषा वही भाषा हो सकती है जिसे उसके अधिकाधिक निवासी समझ सके। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
साहित्य के इतिहास में काल विभाजन के लिए तत्कालीन प्रवृत्तियों को ही मानना न्यायसंगत है। - अंबाप्रसाद सुमन।
हिंदी भाषा हमारे लिये किसने बनाया? प्रकृति ने। हमारे लिये हिंदी प्रकृतिसिद्ध है। - पं. गिरिधर शर्मा।
हिंदी भाषा उस समुद्र जलराशि की तरह है जिसमें अनेक नदियाँ मिली हों। - वासुदेवशरण अग्रवाल।
भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।
क्रांतदर्शी होने के कारण ऋषि दयानंद ने देशोन्नति के लिये हिंदी भाषा को अपनाया था। - विष्णुदेव पौद्दार।
सच्चा राष्ट्रीय साहित्य राष्ट्रभाषा से उत्पन्न होता है। - वाल्टर चेनिंग।
हिंदी के पौधे को हिंदू मुसलमान दोनों ने सींचकर बड़ा किया है। - जहूरबख्श।
किसी लफ्ज के उर्दू न होने से मुराद है कि उर्दू में हुरूफ की कमी बेशी से वह खराद पर नहीं चढ़ा। - सैयद इंशा अल्ला खाँ।
अंग्रेजी का पद चिरस्थायी करना देश के लिये लज्जा की बात है - संपूर्णानंद।
हिंदी राष्ट्रभाषा है, इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को, प्रत्येक भारतवासी को इसे सीखना चाहिए। - रविशंकर शुक्ल।
हिंदी प्रांतीय भाषा नहीं बल्कि वह अंत:प्रांतीय राष्ट्रीय भाषा है। - छविनाथ पांडेय।
साहित्य को उच्च अवस्था पर ले जाना ही हमारा परम कर्तव्य है। - पार्वती देवी।
विश्व की कोई भी लिपि अपने वर्तमान रूप में नागरी लिपि के समान नहीं। - चंद्रबली पांडेय।
भाषा की एकता जाति की एकता को कायम रखती है। - राहुल सांकृत्यायन।
जिस राष्ट्र की जो भाषा है उसे हटाकर दूसरे देश की भाषा को सारी जनता पर नहीं थोपा जा सकता - वासुदेवशरण अग्रवाल।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्रगुना अच्छी है। - अज्ञात।
समाज के अभाव में आदमी की आदमियत की कल्पना नहीं की जा सकती। - पं. सुधाकर पांडेय।
तुलसी, कबीर, नानक ने जो लिखा है, उसे मैं पढ़ता हूँ तो कोई मुश्किल नहीं आती। - मौलाना मुहम्मद अली।
भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
हिंदी भाषी ही एक ऐसी भाषा है जो सभी प्रांतों की भाषा हो सकती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जब हम हिंदी की चर्चा करते हैं तो वह हिंदी संस्कृति का एक प्रतीक होती है। - शांतानंद नाथ।
भारतीय धर्म की है घोषणा घमंड भरी, हिंदी नहीं जाने उसे हिंदू नहीं जानिए। - नाथूराम शंकर शर्मा।
राजनीति के चिंतापूर्ण आवेग में साहित्य की प्रेरणा शिथिल नहीं होनी चाहिए। - राजकुमार वर्मा।
हिंदी में जो गुण है उनमें से एक यह है कि हिंदी मर्दानी जबान है। - सुनीति कुमार चाटुर्ज्या।
स्पर्धा ही जीवन है, उसमें पीछे रहना जीवन की प्रगति खोना है। - निराला।
कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है। - सुमित्रानंदन पंत।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविंद शास्त्री दुगवेकर।
उर्दू लिपि की अनुपयोगिता, भ्रामकता और कठोरता प्रमाणित हो चुकी है। - रामरणविजय सिंह।
राष्ट्रभाषा राष्ट्रीयता का मुख्य अंश है। - श्रीमती सौ. चि. रमणम्मा देव।
बानी हिंदी भाषन की महरानी, चंद्र, सूर, तुलसी से जामें भए सुकवि लासानी। - पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी।
जय जय राष्ट्रभाषा जननि। जयति जय जय गुण उजागर राष्ट्रमंगलकरनि। - देवी प्रसाद गुप्त।
हिंदी हमारी हिंदू संस्कृति की वाणी ही तो है। - शांतानंद नाथ।
आज का लेखक विचारों और भावों के इतिहास की वह कड़ी है जिसके पीछे शताब्दियों की कड़ियाँ जुड़ी है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
विज्ञान के बहुत से अंगों का मूल हमारे पुरातन साहित्य में निहित है। - सूर्यनारायण व्यास।
कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली मीर।
हिंदी और उर्दू में झगड़ने की बात ही नहीं है। - ब्रजनंदन सहाय।
कविता हृदय की मुक्त दशा का शाब्दिक विधान है। - रामचंद्र शुक्ल।
हमारी राष्ट्रभाषा का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीयता का दृढ़ निर्माण है। - चंद्रबली पांडेय।
जिस शिक्षा से स्वाभिमान की वृत्ति जाग्रत नहीं होती वह शिक्षा किसी काम की नहीं। - माधवराव सप्रे।
कालोपयोगी कार्य न कर सकने पर महापुरुष बन सकना संभव नहीं है। - सू. च. धर।
मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे।
आज का आविष्कार कल का साहित्य है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
भाषा के सवाल में मजहब को दखल देने का कोई हक नहीं। - राहुल सांकृत्यायन।
जब तक संघ शक्ति उत्पन्न न होगी तब तक प्रार्थना में कुछ जान नहीं हो सकती। - माधव राव सप्रे।
हिंदी विश्व की महान भाषा है। - राहुल सांकृत्यायन।
राष्ट्रीय एकता के लिये एक भाषा से कहीं बढ़कर आवश्यक एक लिपि का प्रचार होना है। - ब्रजनंदन सहाय।
जो ज्ञान तुमने संपादित किया है उसे वितरित करते रहो ओर सबको ज्ञानवान बनाकर छोड़ो। - संत रामदास।
पाँच मत उधर और पाँच मत इधर रहने से श्रेष्ठता नहीं आती। - माखनलाल चतुर्वेदी।
मैं मानती हूँ कि हिंदी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा। - लीलावती मुंशी।
हिंदी उर्दू के नाम को दूर कीजिए एक भाषा बनाइए। सबको इसके लिए तैयार कीजिए। - देवी प्रसाद गुप्त।
साहित्यकार विश्वकर्मा की अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यशाली है। - पं. वागीश्वर जी।
हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है। - डॉ. राजेंद्रप्रसाद।
हिंदी साहित्य की नकल पर कोई साहित्य तैयार नहीं होता। - सूर्य कांत त्रिपाठी निराला।
भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिये हिंदी सबकी साझा भाषा है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।
पिछली शताब्दियों में संसार में जो राजनीतिक क्रांतियाँ हुई, प्राय: उनका सूत्रसंचालन उस देश के साहित्यकारों ने किया है। - पं. वागीश्वर जी।
विजयी राष्ट्रवाद अपने आपको दूसरे देशों का शोषण कर जीवित रखना चाहता है। - बी. सी. जोशी।
हिंदी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
यदि लिपि का बखेड़ा हट जाये तो हिंदी उर्दू में कोई विवाद ही न रहे। - बृजनंदन सहाय।
भारत सरस्वती का मुख संस्कृत है। - म. म. रामावतार शर्मा।
साधारण कथा कहानियों तथा बालोपयोगी कविता में संस्कृत के सामासिक शब्द लाने से उनके मूल उद्देश्य की सफलता में बाधा पड़ती है। - रघुवरप्रसाद द्विवेदी।
यदि आप मुझे कुछ देना चाहती हों तो इस पाठशाला की शिक्षा का माध्यम हमारी मातृभाषा कर दें। - एक फ्रांसीसी बालिका।
निर्मल चरित्र ही मनुष्य का शृंगार है। - पंडित सुधाकर पांडेय।
हिंदुस्तान को छोड़कर दूसरे मध्य देशों में ऐसा कोई अन्य देश नहीं है, जहाँ कोई राष्ट्रभाषा नहीं हो। - सैयद अमीर अली मीर।
इतिहास में जो सत्य है वही अच्छा है और जो असत्य है वही बुरा है। - जयचंद्र विद्यालंकार।
सरलता, बोधगम्यता और शैली की दृष्टि से विश्व की भाषाओं में हिंदी महानतम स्थान रखती है। - अमरनाथ झा।
हिंदी सरल भाषा है। इसे अनायास सीखकर लोग अपना काम निकाल लेते हैं। - जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी।
एक भाषा का प्रचार रहने पर केवल इसी के सहारे, यदि लिपिगत भिन्नता न हो तो, अन्यान्य राष्ट्र गठन के उपकरण आ जाने संभव हो सकते हैं। - अयोध्याप्रसाद वर्मा।
किसी भाषा की उन्नति का पता उसमें प्रकाशित हुई पुस्तकों की संख्या तथा उनके विषय के महत्व से जाना जा सकता है। - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
जीवन के छोटे से छोटे क्षेत्र में हिंदी अपना दायित्व निभाने में समर्थ है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।
बिहार में ऐसा एक भी गाँव नहीं है जहाँ केवल रामायण पढ़ने के लिये दस-बीस मनुष्यों ने हिंदी न सीखी हो। - सकलनारायण पांडेय।
संस्कृत की इशाअत (प्रचार) का एक बड़ा फायदा यह होगा कि हमारी मुल्की जबान (देशभाषा) वसीअ (व्यापक) हो जायगी। - मौलवी महमूद अली।
संसार में देश के नाम से भाषा को नाम दिया जाता है और वही भाषा वहाँ की राष्ट्रभाषा कहलाती है। - ताराचंद्र दूबे।
सर्वसाधारण पर जितना पद्य का प्रभाव पड़ता है उतना गद्य का नहीं। - राजा कृत्यानंद सिंह।
जो गुण साहित्य की जीवनी शक्ति के प्रधान सहायक होते हैं उनमें लेखकों की विचारशीलता प्रधान है। - नरोत्तम व्यास।
भाषा और भाव का परिवर्तन समाज की अवस्था और आचार विचार से अधिक संबंध रखता है। - बदरीनाथ भट्ट।
साहित्य पढ़ने से मुख्य दो बातें तो अवश्य प्राप्त होती हैं, अर्थात् मन की शक्तियों को विकास और ज्ञान पाने की लालसा। - बिहारीलाल चौबे।
देवनागरी और बंगला लिपियों को साथ मिलाकर देखना है। - मन्नन द्विवेदी।
है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी। - मैथिलीशरण गुप्त।
संस्कृत की विरासत हिंदी को तो जन्म से ही मिली है। - राहुल सांकृत्यायन।
कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।
हिंदी में हम लिखें पढ़ें, हिंदी ही बोलें। - पं. जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
जिस वस्तु की उपज अधिक होती है उसमें से बहुत सा भाग फेंक भी दिया जाता है। ग्रंथों के लिये भी ऐसा ही हिसाब है। - गिरजाकुमार घोष।
यह जो है कुरबान खुदा का, हिंदी करे बयान सदा का। - अज्ञात।
क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो। - डॉ. श्यामसुंदर दास।
बँगला वर्णमाला की जाँच से मालूम होता है कि देवनागरी लिपि से निकली है और इसी का सीधा सादा रूप है। - रमेशचंद्र दत्त।
वास्तव में वेश, भाषा आदि के बदलने का परिणाम यह होता है कि आत्मगौरव नष्ट हो जाता है, जिससे देश का जातित्व गुण मिट जाता है। - सैयद अमीर अली मीर।
दूसरों की बोली की नकल करना भाषा के बदलने का एक कारण है। - गिरींद्रमोहन मित्र।
समालोचना ही साहित्य मार्ग की सुंदर सड़क है। - म. म. गिरधर शर्मा चतुर्वेदी।
नागरी वर्णमाला के समान सर्वांगपूर्ण और वैज्ञानिक कोई दूसरी वर्णमाला नहीं है। - बाबू राव विष्णु पराड़कर।
अन्य देश की भाषा ने हमारे देश के आचार व्यवहार पर कैसा बुरा प्रभाव डाला है। - अनादिधन वंद्योपाध्याय।
व्याकरण चाहे जितना विशाल बने परंतु भाषा का पूरा-पूरा समाधान उसमें नहीं हो सकता। - अनंतराम त्रिपाठी।
स्वदेशप्रेम, स्वधर्मभक्ति और स्वावलंबन आदि ऐसे गुण हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए। - रामजी लाल शर्मा।
गुणवान खानखाना सदृश प्रेमी हो गए रसखान और रसलीन से हिंदी प्रेमी हो गए। - राय देवीप्रसाद।
वैज्ञानिक विचारों के पारिभाषिक शब्दों के लिये, किसी विषय के उच्च भावों के लिये, संस्कृत साहित्य की सहायता लेना कोई शर्म की बात नहीं है। - गणपति जानकीराम दूबे।
हिंदुस्तान के लिये देवनागरी लिपि का ही व्यवहार होना चाहिए, रोमन लिपि का व्यवहार यहाँ हो ही नहीं सकता। - महात्मा गाँधी।
अभिमान सौंदर्य का कटाक्ष है। - अज्ञात।
कवि का हृदय कोमल होता है। - गिरिजाकुमार घोष।
श्री रामायण और महाभारत भारत के ही नहीं वरन् पृथ्वी भर के जैसे अमूल्य महाकाव्य हैं। - शैलजाकुमार घोष।
हिंदी किसी के मिटाने से मिट नहीं सकती। - चंद्रबली पाण्डेय।
भाषा की उन्नति का पता मुद्रणालयों से भी लग सकता है। - गंगाप्रसाद अग्निहोत्री।
पुस्तक की उपयोगिता को चिरस्थायी रखने के लिए उसे भावी संतानों के लिये पथप्रदर्शक बनाने के लिये यह आवश्यक है कि पुस्तक के असली लेखक का नाम उस पर रहे। - सत्यदेव परिव्राजक।
खड़ी बोली का एक रूपांतर उर्दू है। - बदरीनाथ भट्ट।
भारतवर्ष मनुष्य जाति का गुरु है। - विनयकुमार सरकार।
हमारी भारत भारती की शैशवावस्था का रूप ब्राह्मी या देववाणी है, उसकी किशोरावस्था वैदिक भाषा और संस्कृति उसकी यौवनावस्था की संुदर मनोहर छटा है। - बदरीनारायण चौधरी प्रेमधन।
हृतंत्री की तान पर नीरव गान गाने से न किसी के प्रति किसी की अनुकम्पा जगती है और न कोई किसी का उपकार करने पर ही उतारू होता है। - रामचंद्र शुक्ल।
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। - भारतेंदू हरिश्चंद्र।
आर्यों की सबसे प्राचीन भाषा हिंदी ही है और इसमें तद्भव शब्द सभी भाषाओं से अधिक है। - वीम्स साहब।
क्यों न वह फिर रास्ते पर ठीक चलने से डिगे , हैं बहुत से रोग जिसके एक ही दिल में लगे। - हरिऔध।
जब तक साहित्य की उन्नति न होगी, तब तक संगीत की उन्नति नहीं हो सकती। - विष्णु दिगंबर।
जो पढ़ा-लिखा नहीं है - जो शिक्षित नहीं है वह किसी भी काम को भली-भाँति नहीं कर सकता। - गोपाललाल खत्री।
राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।
जिस प्रकार बंगाल भाषा के द्वारा बंगाल में एकता का पौधा प्रफुल्लित हुआ है उसी प्रकार हिंदी भाषा के साधारण भाषा होने से समस्त भारतवासियों में एकता तरु की कलियाँ अवश्य ही खिलेंगी। - शारदाचरण मित्र।
इतिहास स्वदेशाभिमान सिखाने का साधन है। - महात्मा गांधी।
जो दिखा सके वही दर्शन शास्त्र है नहीं तो वह अंधशास्त्र है। - डॉ. भगवानादास।
विदेशी लोगों का अनुकरण न किया जाय। - भीमसेन शर्मा।
भारतवर्ष के लिये देवनागरी साधारण लिपि हो सकती है और हिंदी भाषा ही सर्वसाधारण की भाषा होने के उपयुक्त है। - शारदाचरण मित्र।
अकबर का शांत राज्य हमारी भाषा का मानो स्वर्णमय युग था। - छोटूलाल मिश्र।
नाटक का जितना ऊँचा दरजा है, उपन्यास उससे सूत भर भी नीचे नहीं है। - गोपालदास गहमरी।
किसी भी बृहत् कोश में साहित्य की सब शाखाओं के शब्द होने चाहिए। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।
जो कुछ भी नजर आता है वह जमीन और आसमान की गोद में उतना सुंदर नहीं जितना नजर में है। - निराला।
देव, जगदेव, देश जाति की सुखद प्यारी, जग में गुणगरी सुनागरी हमारी है। - चकोर।
शिक्षा का मुख्य तात्पर्य मानसिक उन्नति है। - पं. रामनारायण मिश्र।
भारत के एक सिरे से दूसरे सिरे तक हिंदी भाषा कुछ न कुछ सर्वत्र समझी जाती है। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
जापानियों ने जिस ढंग से विदेशी भाषाएँ सीखकर अपनी मातृभाषा को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया है उसी प्रकार हमें भी मातृभाषा का भक्त होना चाहिए। - श्यामसुंदर दास।
विचारों का परिपक्व होना भी उसी समय संभव होता है, जब शिक्षा का माध्यम प्रकृतिसिद्ध मातृभाषा हो। - पं. गिरधर शर्मा।
विज्ञान को विज्ञान तभी कह सकते हैं जब वह शरीर, मन और आत्मा की भूख मिटाने की पूरी ताकत रखता हो। - महात्मा गांधी।
यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिंदी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।
हिंदी भाषा के लिये मेरा प्रेम सब हिंदी प्रेमी जानते हैं। - महात्मा गांधी।
सब विषयों के गुण-दोष सबकी दृष्टि में झटपट तो नहीं आ जाते। - म. म. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी।
किसी देश में ग्रंथ बनने तक वैदेशिक भाषा में शिक्षा नहीं होती थी। देश भाषाओं में शिक्षा होने के कारण स्वयं ग्रंथ बनते गए हैं। - साहित्याचार्य रामावतार शर्मा।
जो भाषा सामयिक दूसरी भाषाओं से सहायता नहीं लेती वह बहुत काल तक जीवित नहीं रह सकती। - पांडेय रामवतार शर्मा।
नागरीप्रचारिणी सभा के गुण भारी जिन तेरों देवनागरी प्रचार करिदीनो है। - नाथूराम शंकर शर्मा।
जितना और जैसा ज्ञान विद्यार्थियों को उनकी जन्मभाषा में शिक्षा देने से अल्पकाल में हो सकता है; उतना और वैसा पराई भाषा में सुदीर्घ काल में भी होना संभव नहीं है। - घनश्याम सिंह।
विदेशी भाषा में शिक्षा होने के कारण हमारी बुद्धि भी विदेशी हो गई है। - माधवराव सप्रे।
मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। - माधवराव सप्रे।
मनुष्य सदा अपनी मातृभाषा में ही विचार करता है। इसलिये अपनी भाषा सीखने में जो सुगमता होती है दूसरी भाषा में हमको वह सुगमता नहीं हो सकती। - डॉ. मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
हिंदी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - महात्मा गांधी।
राष्ट्रीयता का भाषा और साहित्य के साथ बहुत ही घनिष्ट और गहरा संबंध है। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
यदि हम अंग्रेजी दूसरी भाषा के समान पढ़ें तो हमारे ज्ञान की अधिक वृद्धि हो सकती है। - जगन्नाथप्रसाद चतुर्वेदी।
स्वतंत्रता की कोख से ही आलोचना का जन्म है। - मोहनलाल महतो वियोगी।
युग के साथ न चल सकने पर महात्माओं का महत्त्व भी म्लान हो उठता है। - सु. च. धर।
हिंदी पर ना मारो ताना, सभा बतावे हिंदी माना। - नूर मुहम्मद।
आप जिस तरह बोलते हैं, बातचीत करते हैं, उसी तरह लिखा भी कीजिए। भाषा बनावटी न होनी चाहिए। - महावीर प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी भाषा की उन्नति के बिना हमारी उन्नति असम्भव है। - गिरधर शर्मा।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।
देह प्राण का ज्यों घनिष्ट संबंध अधिकतर। है तिससे भी अधिक देशभाषा का गुरुतर। - माधव शुक्ल।
जब हम अपना जीवन जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दें तब हम हिंदी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - गोविन्ददास।
नागरी प्रचार देश उन्नति का द्वार है। - गोपाललाल खत्री।
देश तथा जाति का उपकार उसके बालक तभी कर सकते हैं, जब उन्हें उनकी भाषा द्वारा शिक्षा मिली हो। - पं. गिरधर शर्मा।
राष्ट्रभाषा की साधना कोरी भावुकता नहीं है। - जगन्नाथप्रसाद मिश्र।
साहित्य को स्वैर संचा करने की इजाजत न किसी युग में रही होगी न वर्तमान युग में मिल सकती है। - माखनलाल चतुर्वेदी।
अंग्रेजी सीखकर जिन्होंने विशिष्टता प्राप्त की है, सर्वसाधारण के साथ उनके मत का मेल नहीं होता। हमारे देश में सबसे बढ़कर जातिभेद वही है, श्रेणियों में परस्पर अस्पृश्यता इसी का नाम है। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
साहित्य की सेवा भगवान का कार्य है, आप काम में लग जाइए आपको भगवान की सहायता प्राप्त होगी और आपके मनोरथ परिपूर्ण होंगे। - चंद्रशेखर मिश्र।
सब से जीवित रचना वह है जिसे पढ़ने से प्रतीत हो कि लेखक ने अंतर से सब कुछ फूल सा प्रस्फुटित किया है। - शरच्चंद।
सिक्ख गुरुओं ने आपातकाल में हिंदी की रक्षा के लिये ही गुरुमुखी रची थी। - संतराम शर्मा।
हिंदी जैसी सरल भाषा दूसरी नहीं है। - मौलाना हसरत मोहानी।
ऐसे आदमी आज भी हमारे देश में मौजूद हैं जो समझते हैं कि शिक्षा को मातृभाषा के आसन पर बिठा देने से उसकी कीमत ही घट जायेगी। - रवीन्द्रनाथ ठाकुर।
लोकोपकारी विषयों को आदर देने वाली नवीन प्रथा का स्थिर हो जाना ही एक बहुत बड़ा उत्साहप्रद कार्य है। - मिश्रबंधु।
हमारे साहित्य को कामधेनु बनाना है। - चंद्रबली पांडेय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिंदी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।
हृदय की कोई भाषा नहीं है, हृदय-हृदय से बातचीत करता है। - महात्मा गांधी।
मेरा आग्रहपूर्वक कथन है कि अपनी सारी मानसिक शक्ति हिन्दी के अध्ययन में लगावें। - विनोबा भावे।
साहित्यिक इस बात को कभी न भूले कि एक ख्याल ही क्रिया का स्वामी है, उसे बढ़ाने, घटाने या ठुकरा देनेवाला। - माखनलाल चतुर्वेदी।
एशिया के कितने ही राष्ट्र आज यूरोपीय राष्ट्रों के चंगुल से छूट गए हैं पर उनकी आर्थिक दासता आज भी टिकी हुई है। - वी. सी. जोशी।
हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। - स्वामी दयानंद।
इस पथ का उद्देश्य नहीं है, श्रांत भवन में टिक रहना। - जयशंकर प्रसाद।
विद्या अच्छे दिनों में आभूषण है, विपत्ति में सहायक और बुढ़ापे में संचित सामग्री है। - अरस्तु।
अधिक अनुभव, अधिक विपत्ति सहना, और अधिक अध्ययन, ये ही विद्वता के तीन स्तंभ हैं। - डिजरायली।
जैसे-जैसे हमारे देश में राष्ट्रीयता का भाव बढ़ता जायेगा वैसे ही वैसे हिंदी की राष्ट्रीय सत्ता भी बढ़ेगी। - श्रीमती लोकसुन्दरी रामन् ।
शब्दे मारिया मर गया शब्दे छोड़ा राज। जे नर शब्द पिछानिया ताका सरिया काज। - कबीर।
यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प-तड़पकर जान दे देती है। - सुभाषचन्द्र बसु।
प्रसिद्धि का भीतरी अर्थ यशविस्तार नहीं, विषय पर अच्छी सिद्धि पाना है। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
सरस्वती से श्रेष्ठ कोई वैद्य नहीं और उसकी साधना से बढ़कर कोई दवा नहीं है। - एक जपानी सूक्ति।
संस्कृत प्राकृत से संबंध विच्छेद कदापि श्रेयस्कर नहीं। - यशेदानंदन अखौरी।
राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिये आवश्यक है। - महात्मा गांधी।
शिक्षा का प्रचार और विद्या की उन्नति इसलिये अपेक्षित है कि जिससे हमारे -स्वत्व का रक्षण हो। - माधवराव सप्रे।
विधान भी स्याही का एक बिन्दु गिराकर भाग्यलिपि पर कालिमा चढ़ा देता है। - जयशंकर प्रसाद।
जीवित भाषा बहती नदी है जिसकी धारा नित्य एक ही मार्ग से प्रवाहित नहीं होती। - बाबूराव विष्णु पराड़कर।
वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।
हिन्दी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त।
पराधीनता की विजय से स्वाधीनता की पराजय सहस्त्र गुना अच्छी है। - अज्ञात।
कलाकार अपनी प्रवृत्तियों से भी विशाल हैं। उसकी भावराशि अथाह और अचिंत्य है। - मैक्सिम गोर्की।
कला का सत्य जीवन की परिधि में सौन्दर्य के माध्यम द्वारा व्यक्त अखंड सत्य है। - महादेवी वर्मा।
क्षण प्रति-क्षण जो नवीन दिखाई पड़े वही रमणीयता का उत्कृष्ट रूप है। - माघ।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है। - पास्कल।
हिन्दी भाषा और साहित्य ने तो जन्म से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा है। - धीरेन्द्र वर्मा।
साहित्यकार एक दीपक के समान है जो जलकर केवल दूसरों को ही प्रकाश देता है। - अज्ञात।
बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
विधाता कर्मानुसार संसार का निर्माण करता है किन्तु साहित्यकार इस प्रकार के बंधनों से ऊपर है। - बागीश्वरजी।
श्रद्धा महत्व की आनंदपूर्ण स्वीकृति के साथ-साथ पूज्य बुद्धि का संचार है। - रामचंद्र शुक्ल।
कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। - शेली।
भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।
वास्तविक महान् व्यक्ति तीन बातों द्वारा जाना जाता है-योजना में उदारता, उसे पूरी करने में मनुष्यता और सफलता में संयम। - बिस्मार्क।
रमणीय अर्थ का प्रतिपादन करने वाले शब्द का नाम काव्य है। - पंडितराज जगन्नाथ।
प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है। - रामचंद्र शुक्ल।
अंग्रेजी को भारतीय भाषा बनाने का यह अभिप्राय है कि हम अपने भारतीय अस्तित्व को बिल्कुल मिटा दें। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
अंग्रेजी का मुखापेक्षी रहना भारतीयों को किसी प्रकार से शोभा नहीं देता है। - भास्कर गोविन्द धाणेकर।
यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी शिक्षा विदेशी भाषा में होती है और मातृभाषा में नहीं होती। - माधवराव सप्रे।
भाषा ही राष्ट्र का जीवन है। - पुरुषोत्तमदास टंडन।
कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।
हिंदी स्वयं अपनी ताकत से बढ़ेगी। - पं. नेहरू।
भाषा विचार की पोशाक है। - डॉ. जोनसन।
हमारी देवनागरी इस देश की ही नहीं समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है। - सेठ गोविन्ददास।
अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह सुधांशु।
आइए हम आप एकमत हो कोई ऐसा उपाय करें जिससे राष्ट्रभाषा का प्रचार घर-घर हो जाये और राष्ट्र का कोई भी कोना अछूता न रहे। - चन्द्रबली पांडेय।
जैसे जन्मभूमि जगदम्बा का स्वरूप है वैसे ही मातृभाषा भी जगदम्बा का स्वरूप है। - गोविन्द शास्त्री दुगवेकर।
हिंदी और उर्दू की जड़ एक है, रूपरेखा एक है और दोनों को अगर हम चाहें तो एक बना सकते हैं। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
हिंदी आज साहित्य के विचार से रूढ़ियों से बहुत आगे है। विश्वसाहित्य में ही जानेवाली रचनाएँ उसमें हैं। - सूर्यकांत त्रिपाठी निराला।
भारत की रक्षा तभी हो सकती है जब इसके साहित्य, इसकी सभ्यता तथा इसके आदर्शों की रक्षा हो। - पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार।
हिंदी संस्कृत की बेटियों में सबसे अच्छी और शिरोमणि है। - ग्रियर्सन।
मैं नहीं समझता, सात समुन्दर पार की अंग्रेजी का इतना अधिकार यहाँ कैसे हो गया। - महात्मा गांधी।
मेरे लिये हिन्दी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। - राजर्षि पुरुषोत्तमदास टण्डन।
संस्कृत को छोड़कर आज भी किसी भी भारतीय भाषा का वाङ्मय विस्तार या मौलिकता में हिन्दी के आगे नहीं जाता। - डॉ. सम्पूर्णानन्द।
उर्दू और हिंदी दोनों को मिला दो। अलग-अलग नाम नहीं होना चाहिए। - मौलाना मुहम्मद अली।
राष्ट्रभाषा के विषय में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि यह राष्ट्र के सब प्रान्तों की समान और स्वाभाविक राष्ट्रभाषा है। - लक्ष्मण नारायण गर्दे।
प्रसन्नता न हमारे अंदर है न बाहर वरन् वह हमारा ईश्वर के साथ ऐक्य है। - पास्कल।
विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य। - मन्नन द्विवेदी।
जातीय भाव हमारी अपनी भाषा की ओर झुकता है। - शारदाचरण मित्र।
हिंदी अपनी भूमि की अधिष्ठात्री है। - राहुल सांकृत्यायन।
सारा शरीर अपना, रोम-रोम अपने, रंग और रक्त अपना, अंग प्रत्यंग अपने, किन्तु जुबान दूसरे की, यह कहाँ की सभ्यता और कहाँ की मनुष्यता है। - रणवीर सिंह जी।
वाणी, सभ्यता और देश की रक्षा करना सच्चा यज्ञ है। - ठाकुरदत्त शर्मा।
हिन्दी व्यापकता में अद्वितीय है। - अम्बिका प्रसाद वाजपेयी।
हमारी राष्ट्रभाषा की पावन गंगा में देशी और विदेशी सभी प्रकार के शब्द मिलजुलकर एक हो जायेंगे। - डॉ. राजेन्द्र प्रसाद।
नागरी की वर्णमाला है विशुद्ध महान, सरल सुन्दर सीखने में सुगम अति सुखदान। - मिश्रबंधु।
साहित्य ही हमारा जीवन है। - डॉ. भगवानदास।
मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है। - मुकुन्दस्वरूप वर्मा।
बिना भाषा की जाति नहीं शोभा पाती है। और देश की मार्यादा भी घट जाती है। - माधव शुक्ल।
हिंदी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं और दोनों रूपों में बहुत साहित्य है। - अंबिका प्रसाद वाजपेयी।
हम हिन्दी वालों के हृदय में किसी सम्प्रदाय या किसी भाषा से रंचमात्र भी ईर्ष्या, द्वेष या घृणा नहीं है। - शिवपूजन सहाय।
भारत के विभिन्न प्रदेशों के बीच हिन्दी प्रचार द्वारा एकता स्थापित करने वाले सच्चे भारत बंधु हैं। - अरविंद।
राष्ट्रीय एकता के लिये हमें प्रांतीयता की भावना त्यागकर सभी प्रांतीय भाषाओं के लिए एक लिपि देवनागरी अपना लेनी चाहिये। - शारदाचरण मित्र (जस्टिस)।
समूचे राष्ट्र को एकताबद्ध और दृढ़ करने के लिए हिन्द भाषी जाति की एकता आवश्यक है। - रामविलास शर्मा।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनने के हेतु हुए अनुष्ठान को मैं संस्कृति का राजसूय यज्ञ समझता हूँ। - आचार्य क्षितिमोहन सेन।
हिन्दी का भविष्य उज्ज्वल है, इसमें कोई संदेह नहीं। - अनंत गोपाल शेवड़े।
अरबी लिपि भारतीय लिपि होने योग्य नहीं। - सैयदअली बिलग्रामी।
हिन्दी को ही राजभाषा का आसन देना चाहिए। - शचींद्रनाथ बख्शी।
अंतरप्रांतीय व्यवहार में हमें हिन्दी का प्रयोग तुरंत शुरू कर देना चाहिए। - र. रा. दिवाकर।
हिन्दी का शासकीय प्रशासकीय क्षेत्रों से प्रचार न किया गया तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है। - विनयमोहन शर्मा।
अंग्रेजी इस देश के लिए अभिशाप है, यह हर साल हमारे सामने प्रकट होता है, फिर भी उसे हम पूतना न मानकर चामुण्डमर्दिनी दुर्गा मान रहे हैं। - अवनींद्र कुमार विद्यालंकार।
हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने में प्रांतीय भाषाओं को हानि नहीं वरन् लाभ होगा। - अनंतशयनम् आयंगार।
संस्कृत के अपरिमित कोश से हिन्दी शब्दों की सब कठिनाइयाँ सरलता से हल कर लेगी। - राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन।
(अंग्रेजी ने) हमारी परम्पराएँ छिन्न-भिन्न करके, हमें जंगली बना देने का भरसक प्रयत्न किया। - अमृतलाल नागर।
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दृष्टिकोण
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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सोमवार, 6 सितंबर 2010
कश्मीरी जिहादियों का असली चेहरा!

डॉ. महेश परिमल
पर उपदेश कुशल बहुतेरे, यह उक्ति आज सारे समाज में प्रचलित है। पर इसका एक दूसरा ही रूप हम इन दिनों कश्मीर घाटी में देख रहे हैं। जहाँ लोगों को भड़काने वाले भाषण सुना-सुनाकर यह कहा जा रहा है कि आप अपने बच्चों की पढ़ाई की चिंता न करें, उन्हें आजादी की जंग में झोंक दें। बच्चे ही नहीं, बल्कि अपना बलिदान देने के लिए भी तैयार रहें। पर सच्चई इससे बिलकुल अलग है। आजादी के नाम पर भड़काऊ भाष्ण करने वालों की ही संतान शिक्षा के लिए विदेश जा रही है। अपने संतानों को विदेश भेजकर दूसरों की संतानों को आजादी की जंग में शामिल होने की अपील करने वाले जिहादियों ने अपना असली चेहरा दिखा दिया है।
शर्म आनी चाहिए, आप सब को, हम यहाँ हमारी सरजमीं की आजादी के लिए लड़ रहे है, तब आप अपने बच्चों की तालीम की फिक्र कर रहे हैं। क्या आपके बच्चों की तालीम आजादी से बढ़कर है..? अभी पिछले महीने ही जम्मू-कशमीर के अलगाववादी गुटों की एक महिला नेता आसिया इंद्राबी ने एक सभा को संबोधित करते हुए यह ऐलान किया था। ये महिला दुख्तरन-ए- मिल्लत यानी देश की बेटियों के लिए काम करती हैं। आसिया ने अपने ऐलान में कहा कि ये जमीं बलिदान माँग रही है, यदि थोड़े से टीन एजर इस लड़ाई के लिए तैयार हो जाएँ, रोज कमाने खाने वाले मजदूर इस लड़ाई में शामिल हो जाएँ, तो हम यह लड़ाई अवश्य जीतेंगे। इसके लिए भले ही हमें भूखे रहना पड़े, हमारी संपत्ति का नुकसान हो, इसकी चिंता न करें। आजादी के लिए कोई समझौता न करें। तभी हम अपनी आजादी को पा लेंगे। जंग-ए-आजादी के लिए हमें अपना सब-कुछ छोड़ना पड़े, तो भी हमें मंजूर है।
यह संवाद किसी हिंदी फिल्म के लगते होंगे, पर सच तो यही है कि कश्मीर में आसिया के यह उद्गार सुनकर लोगों ने तालियाँ बजाईं। इन तालियों से भला किसना सीना चौड़ा नहीं होगा। पर सच्चई इससे बिलकुल अलग है। अपने सम्प्रदाय के लोगों को वे आह्वान कर रहे हैं कि अपने बच्चों को आजादी की जंग में झोंक दें। अपने परिवार के एक-एक सदस्य को आजादी की जंग के लिए तैयार करें। अपने इस तरह के उत्तेजक भाषणों से आसिया बी भले ही क्रांतिकारी तेवर अपनाए हुए हो, पर सच तो यह है कि उनके सगे बेटे ने ही उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की तैयारी कर रखी है। उसने पासपोर्ट के लिए आवेदन कर रखा है।
इस वर्ष अप्रैल में आसिया के पुत्र मुहम्मद बिन कासिमवती कासिम के मामा यानी आसिया के भाई ने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में आवेदन किया है कि कासिम को इंफ्रो टेक्नालॉजी और कानून की उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने की अनुमति दी जाए। उन्होंने विदेश की यूनिवर्सिटी में आवेदन कर रखा है। यानी अब पासपोर्ट मिलने की देर है। अभी पिछले वर्ष ही हायर सेकंडरी बोर्ड की परीक्षा में कासिम ने 750 में 553 अंक हासिल किए। उसके बाद से वह विदेश जाने के लिए उतावले हैं। विदेश जाने की पहली शर्त पासपोर्ट है। लेकिन कासिम की माँ आसिया की जेहादी प्रवृत्ति को देखते हुए सरकार ने कासिम के पासपोर्ट पर अडंगा डाल दिया। आसिया को यह डर था कि कासिम अब 18 वर्ष का हो चुका है। कश्मीर में आजकल टीन एजरों पर आतंकवादी संगठन पैनी नजर रखे हुए है। ऐसे में उनकी नजर कहीं कासिम पर न पड़ जाए, इसलिए उसे जल्द से जल्द विदेश भेज दिया जाए। सोचो एक तरफ लोगों से अपने बच्चों के बलिदान का आह्वान करने वाली महिला अपने ही बच्चे को विदेश भेजने की ताक पर है। यही है आतंकवाद का असली चेहरा।
कासिम के पिता आशिक हुसैन जमियत उल मुजाहिदीन नामक आतंकवादी संस्था के सक्रिय सदस्य थे। 1992 में मानव अधिकार आयोग के सदस्य एच.एन. वांछु की हत्या के आरोप में वे अभी उम्र कैद की सजा भुगत रहे हैं। कासिम के मामा इनायतुल्लाह अंद्राबी जमात ऐ इस्लामी की छात्र इकाई इस्लामी जमात एक तुलाबा के संस्थापक हैं। कासिम जब मात्र तीन वर्ष का था, तब वह अपने माता-पिता, मामा और चाचा के साथ 13 महीने तक जेल में रह चुका है। अब आसिया घाटी की सभाओं में उत्तेजक भाषण करती है, हाल ही उसने अपने भाषण में कहा है कि कश्मीर आजाद हो जाएगा, तब हमारी सरकार से हिंदू लोग अपनी सुरक्षा की माँग कर सकते हैं।
सोचो, कितनी खतरनाक सोच के साथ ये संगठन देश में आतंक फैला रहे हैं? अपने बच्चों को सुरक्षित विदेश भेजकर दूसरों के बच्चों को आजादी की लड़ाई में शामिल होने के लिए कह रहे हैं। पूरी तरह से फिरकापरस्त ऐसे लोग आज घाटी में बेखौफ घूम रहे हैं। इन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। आज कश्मीर जल रहा है। लोग रोजमर्रा की चीजों के लिए तरस रहे हैं। लोगों का रोजगार खत्म हो रहा है। पर्यटन के बल पर जिंदा रहने वाला यह राज्य आज बदहाली के दौर से गुजर रहा है। लेकिन पड़ोसी देश के उकसावे में आकर घाटी को इंसानी खून से रँगने वाले इन जेहादियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। ये अपना काम कर रहे हैं। इन पर सख्ती होनी ही चाहिए। इनके चेहरे का नकाब निकालना ही होगा। तभी लोग समझ पाएँगे कि इन जेहादियों की कथनी और करनी में कितना अंतर है?
डॉ. महेश परिमल
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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सोमवार, 30 अगस्त 2010
वेदांता के लिए लाल झंडी, पास्को के लिए लाल जाजम
डॉ. महेश परिमल
केंद्र सरकार ने जिस तरह से वेदांत के प्रोजेक्ट को लाल झंडी दिखाई है, उससे एक साथ कई संदेश प्रसारित हो रहे हैं। यदि वेदांत का प्रोजेक्ट पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है, तो फिर दक्षिण कोरिया की पास्को केपनी के लिए लाल जाजम क्यों बिछाई जा रही है? उड़ीसा में 550 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर बॉक्साइट की खदान को खोदने की अनुमति वेदांता को नहीं दी गई। इससेचेयरमेन अनिल अग्रवाल का वह सपना चकनाचूर हो गया, जिसमें वे भारत के बड़े उद्योगपति बनना चाहते थे। एक तरफ उड़ीसा में वेदांत का प्रोजेक्ट विवादास्पद बन गया है, तो दूसरी तरफ पास्को के लिए नरमी बरत रही है।
वेदांता के चेयरमेन अनिल अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि उसके प्रोजेक्ट को रिलायंस वाले मुकेश अंबानी की कंपनी को दिया जा रहा है। बात यह है कि मुकेश अंबानी को यह अच्छी तरह से पता है कि सरकार को कैसे पटाया जाए? वैसे यह गुण उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश वेदांत कंपनी के प्रोजेक्ट की जाँच के लिए एन.सी. सक्सेना समिति को जवाबदारी सौंपी थी। सक्सेना समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट में तीन बातों का विशेष रूप से उल्लेख किया है। उनका मुख्य मुद्दा यह है कि नियामगिरी पर्वत पर जहाँ वेदांत कंपनी का माइनिंग प्रोजेक्ट की योजना है, वह स्थान वहाँ बसने वाले डोगरिया कौध जाति के लिए वरदान है। नियामगिरी की पहाड़ियों में इन आदिवासियों का दिल धड़कता है। इन्हीं पहाड़ियों से उनका जीवन चलता है। इस पर्वत को वे साक्षात ईश्वर का दर्जा देते हैं। इसे वे ‘नियाम राजा’ के नाम से पुकारते हैं। इस पर्वत के साथ उनकी धार्मिक भावनाएँ भी जुड़ी हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उड़ीसा सरकार ने संयंत्र के लिए भू-अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा की मंजूरी लेने की आवश्यक औपचारिकता पूरी नहीं की। वेदांता रिसोर्सेस को उड़ीसा की नियामगिरि पहाड़ियों में बॉक्साइट की खुदाई के लिए पहले पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी गई थी. लेकिन जांच की रिपोर्ट के अनुसार वेदांता द्वारा किए जाने वाले खनन से लगभग 70 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल बर्बाद हो जाएंगे. रिपोर्ट के अनुसार इस तबाही से स्थानीय डोंगरिया कौंध जनजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। समिति के अनुसार यदि इस जंगल में बाक्साइट के खनन की अनुमति दी जाती है, तो करीब 125 लाख पेड़ों को काटना होगा। इतने वृक्षों का संहार करके वेदांता जितना खनिज निकालेगी, उसकी आयु मात्र 4 वर्ष ही होगी। जंगल अधिकार कानून के अनुसार यदि किसी जंगल की जमीन उद्योगों के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है, तो उस जमीन पर रहने वालों की अनुमति लेना आवश्यक है। कौंध जाति के लोग अपनी जमीन वेदांता को देने के लिए तैयार ही नहीं थे। कंपनी ने खनन के लिए आदिवासियों की अनुमति मिल गई है, इसके झूठे दस्तावेज तैयार किए गए। यह बात सक्सेना समिति की जाँच में सामने आई।
वेदांता कंपनी उड़ीसा में जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, उसमें कुल 17 अरब डॉलर यानी करीब 7650 करोड़ रुपए के जंगी निवेश की योजना थी। केवल पर्यावरण नियमों का पालन न करने के कारण प्रोजेक्ट को कैंसल कर देने का देश में यह पहला मामला है। केंद्रीय वन एव पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश भर के 64 प्रोजेक्ट को इसी तरह पर्यावरण विभाग की अनुमति देने से इंकार कर दिया है। इसमें मुम्बई में वैकल्पिक एयरपोर्ट का मामला भी शामिल है।
वेदांता से सात गुना अधिक निवेश करने वाली पॉस्को कंपनी द्वारा लोहे का कारखाना स्थापित करने का प्रोजेक्ट भी पर्यावरणीय विवाद का शिकार हुआ है। दक्षिण कोरिया की पास्को कंपनी उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में लोहे का कारखाना स्थापित करना चाहती है। इसके माध्यम से करीब 52 हजार करोड़ रुपए का विदेशी निवेश भारत आएगा। अब तक का यह सबसे बड़ा विदेश निवेश है। पास्को कंपनी के खिलाफ भी पर्यावरण और जंगल अधिकार मामलों में नियम कायदों का उल्लंधन करने की जानकारी केंद्र सरकार को है। इसके बाद भी वेदांता कंपनी को काम बंद करने का आदेश देने वाली केंद्र सरकार पास्को के खिलाफ सख्त नहीं हो पाई है। सरकार वेदांता के बजाए पास्को कंपनी को प्राथमिकता दे रही है। ऐसा माना जा रहा है कि पास्को का केंद्र और उड़ीसा सरकार के बीच समझौता हो चुका है। उड़ीसा सरकार ने 2005 में पास्को के साथ जगतसिंहपुर जिले के फुजंगा में 1.20 करोड टन स्टील के उत्पादन की क्षमता वाले कारखाना स्थापित करने का समझौता किया था। इस प्रोजेक्ट के लिए पास्का को 4000 एकड़ उपजाऊ जमीन देने का वचन उड़ीसा सरकार ने दिया था। इसमें से 3500 एकड़ जमीन पर सरकार का ही अधिकार है। शेष 500 एकड़ जमीन निजी है। जिनकी निजी जमीन है, वे अपनी जमीन पास्को को किसी भी कीमत पर बेचने के लिए तैयार नहीं है। जमीन हस्तगत करने के लिए सरकार ने जमीन मालिकों पर बल का प्रयोग किया, किसानों पर कई बार गोलियाँ भी चलाई गई। लाशें भी बिछ गई। पास्को को जो जमीन देनी है, उसमें 284 एकड़ जमीन धीकिया नामक गाँव की है। इस गाँव की पंचायत ने बैठक में सर्वसम्मति से पास्को को अपनी जमीन न देने का प्रस्ताव पारित किया था। बाजू के गाँव गोविंदपुर में भी इस तरह का प्रस्ताव पारित किया गया था। ये गाँव पूरी तरह से पास्को के खिलाफ हैं। यहाँ तक कि पास्को के किसी भी अधिकारी के इन गाँवों में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है। उड़ीसा सरकार पास्को पर पूरी तरह से मेहरबान है। उस कंपनी के लिए सुंदरगढ़ की खान भी उसे समर्पित कर दी है। यही नहीं महानदी और ब्राrाणी नदी का पानी भी उसे देने का वचन सरकार दे चुकी है। उड़ीसा सरकार ने पारादीप बंदरगाह के बाजू में स्थित जटाधारी नामक निजी बंदरगाह भी पास्को को देने की अनुमति दे चुकी है। इस बंदरगाह का उपयोग पास्को उच्च गुणवत्ता का स्टील निर्यात करने और हल्की गुणवत्ता का खनिज आयात करने के लिए करेगा।
पास्को प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों पर सरकार बुरी तरह से पेश आई। पास्को के सामने उड़ीसा सरकार पूरी तरह से नतमस्तक है। लेकिन वेदांता के लिए कठोर। आखिर ऐसा क्यों? यह समझ से परे है। पास्को ने भी वही सब किया है, जिसके आधार पर वेदांता को उड़ीसा से खारिज कर दिया गया है। वहाँ की जनता भी वेदांता के उतनी ही खिलाफ है, जितनी पास्को के। लेकिन सरकार पास्को की तरफदारी कर रही है। पास्को के खिलाफ पर्यावरण मंत्री न तो कुछ सुनना चाहते हैं और न ही कुछ बोलना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को इस बात के लिए आश्वस्त किया है कि पास्को कंपनी के प्रोजेक्ट को अमल में लाने के लिए रास्ते की सारी बाधाओं को दूर करेंगे। यदि पास्को से भी पर्यावरण की हानि हो रही है, तो फिर उस पर सरकार कठोर क्यों नहीं हो रही है? आखिर पास्को से ऐसा क्या मिला, जो वेदांता से नहीं मिल पाया?
डॉ. महेश परिमल
केंद्र सरकार ने जिस तरह से वेदांत के प्रोजेक्ट को लाल झंडी दिखाई है, उससे एक साथ कई संदेश प्रसारित हो रहे हैं। यदि वेदांत का प्रोजेक्ट पर्यावरण को नुकसान पहुँचा सकता है, तो फिर दक्षिण कोरिया की पास्को केपनी के लिए लाल जाजम क्यों बिछाई जा रही है? उड़ीसा में 550 हेक्टेयर जंगल की जमीन पर बॉक्साइट की खदान को खोदने की अनुमति वेदांता को नहीं दी गई। इससेचेयरमेन अनिल अग्रवाल का वह सपना चकनाचूर हो गया, जिसमें वे भारत के बड़े उद्योगपति बनना चाहते थे। एक तरफ उड़ीसा में वेदांत का प्रोजेक्ट विवादास्पद बन गया है, तो दूसरी तरफ पास्को के लिए नरमी बरत रही है।
वेदांता के चेयरमेन अनिल अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि उसके प्रोजेक्ट को रिलायंस वाले मुकेश अंबानी की कंपनी को दिया जा रहा है। बात यह है कि मुकेश अंबानी को यह अच्छी तरह से पता है कि सरकार को कैसे पटाया जाए? वैसे यह गुण उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश वेदांत कंपनी के प्रोजेक्ट की जाँच के लिए एन.सी. सक्सेना समिति को जवाबदारी सौंपी थी। सक्सेना समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट में तीन बातों का विशेष रूप से उल्लेख किया है। उनका मुख्य मुद्दा यह है कि नियामगिरी पर्वत पर जहाँ वेदांत कंपनी का माइनिंग प्रोजेक्ट की योजना है, वह स्थान वहाँ बसने वाले डोगरिया कौध जाति के लिए वरदान है। नियामगिरी की पहाड़ियों में इन आदिवासियों का दिल धड़कता है। इन्हीं पहाड़ियों से उनका जीवन चलता है। इस पर्वत को वे साक्षात ईश्वर का दर्जा देते हैं। इसे वे ‘नियाम राजा’ के नाम से पुकारते हैं। इस पर्वत के साथ उनकी धार्मिक भावनाएँ भी जुड़ी हैं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि उड़ीसा सरकार ने संयंत्र के लिए भू-अधिग्रहण से पहले ग्राम सभा की मंजूरी लेने की आवश्यक औपचारिकता पूरी नहीं की। वेदांता रिसोर्सेस को उड़ीसा की नियामगिरि पहाड़ियों में बॉक्साइट की खुदाई के लिए पहले पर्यावरणीय स्वीकृति दे दी गई थी. लेकिन जांच की रिपोर्ट के अनुसार वेदांता द्वारा किए जाने वाले खनन से लगभग 70 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले जंगल बर्बाद हो जाएंगे. रिपोर्ट के अनुसार इस तबाही से स्थानीय डोंगरिया कौंध जनजाति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। समिति के अनुसार यदि इस जंगल में बाक्साइट के खनन की अनुमति दी जाती है, तो करीब 125 लाख पेड़ों को काटना होगा। इतने वृक्षों का संहार करके वेदांता जितना खनिज निकालेगी, उसकी आयु मात्र 4 वर्ष ही होगी। जंगल अधिकार कानून के अनुसार यदि किसी जंगल की जमीन उद्योगों के लिए इस्तेमाल में लाई जाती है, तो उस जमीन पर रहने वालों की अनुमति लेना आवश्यक है। कौंध जाति के लोग अपनी जमीन वेदांता को देने के लिए तैयार ही नहीं थे। कंपनी ने खनन के लिए आदिवासियों की अनुमति मिल गई है, इसके झूठे दस्तावेज तैयार किए गए। यह बात सक्सेना समिति की जाँच में सामने आई।
वेदांता कंपनी उड़ीसा में जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, उसमें कुल 17 अरब डॉलर यानी करीब 7650 करोड़ रुपए के जंगी निवेश की योजना थी। केवल पर्यावरण नियमों का पालन न करने के कारण प्रोजेक्ट को कैंसल कर देने का देश में यह पहला मामला है। केंद्रीय वन एव पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने देश भर के 64 प्रोजेक्ट को इसी तरह पर्यावरण विभाग की अनुमति देने से इंकार कर दिया है। इसमें मुम्बई में वैकल्पिक एयरपोर्ट का मामला भी शामिल है।
वेदांता से सात गुना अधिक निवेश करने वाली पॉस्को कंपनी द्वारा लोहे का कारखाना स्थापित करने का प्रोजेक्ट भी पर्यावरणीय विवाद का शिकार हुआ है। दक्षिण कोरिया की पास्को कंपनी उड़ीसा के जगतसिंहपुर जिले में लोहे का कारखाना स्थापित करना चाहती है। इसके माध्यम से करीब 52 हजार करोड़ रुपए का विदेशी निवेश भारत आएगा। अब तक का यह सबसे बड़ा विदेश निवेश है। पास्को कंपनी के खिलाफ भी पर्यावरण और जंगल अधिकार मामलों में नियम कायदों का उल्लंधन करने की जानकारी केंद्र सरकार को है। इसके बाद भी वेदांता कंपनी को काम बंद करने का आदेश देने वाली केंद्र सरकार पास्को के खिलाफ सख्त नहीं हो पाई है। सरकार वेदांता के बजाए पास्को कंपनी को प्राथमिकता दे रही है। ऐसा माना जा रहा है कि पास्को का केंद्र और उड़ीसा सरकार के बीच समझौता हो चुका है। उड़ीसा सरकार ने 2005 में पास्को के साथ जगतसिंहपुर जिले के फुजंगा में 1.20 करोड टन स्टील के उत्पादन की क्षमता वाले कारखाना स्थापित करने का समझौता किया था। इस प्रोजेक्ट के लिए पास्का को 4000 एकड़ उपजाऊ जमीन देने का वचन उड़ीसा सरकार ने दिया था। इसमें से 3500 एकड़ जमीन पर सरकार का ही अधिकार है। शेष 500 एकड़ जमीन निजी है। जिनकी निजी जमीन है, वे अपनी जमीन पास्को को किसी भी कीमत पर बेचने के लिए तैयार नहीं है। जमीन हस्तगत करने के लिए सरकार ने जमीन मालिकों पर बल का प्रयोग किया, किसानों पर कई बार गोलियाँ भी चलाई गई। लाशें भी बिछ गई। पास्को को जो जमीन देनी है, उसमें 284 एकड़ जमीन धीकिया नामक गाँव की है। इस गाँव की पंचायत ने बैठक में सर्वसम्मति से पास्को को अपनी जमीन न देने का प्रस्ताव पारित किया था। बाजू के गाँव गोविंदपुर में भी इस तरह का प्रस्ताव पारित किया गया था। ये गाँव पूरी तरह से पास्को के खिलाफ हैं। यहाँ तक कि पास्को के किसी भी अधिकारी के इन गाँवों में प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है। उड़ीसा सरकार पास्को पर पूरी तरह से मेहरबान है। उस कंपनी के लिए सुंदरगढ़ की खान भी उसे समर्पित कर दी है। यही नहीं महानदी और ब्राrाणी नदी का पानी भी उसे देने का वचन सरकार दे चुकी है। उड़ीसा सरकार ने पारादीप बंदरगाह के बाजू में स्थित जटाधारी नामक निजी बंदरगाह भी पास्को को देने की अनुमति दे चुकी है। इस बंदरगाह का उपयोग पास्को उच्च गुणवत्ता का स्टील निर्यात करने और हल्की गुणवत्ता का खनिज आयात करने के लिए करेगा।
पास्को प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों पर सरकार बुरी तरह से पेश आई। पास्को के सामने उड़ीसा सरकार पूरी तरह से नतमस्तक है। लेकिन वेदांता के लिए कठोर। आखिर ऐसा क्यों? यह समझ से परे है। पास्को ने भी वही सब किया है, जिसके आधार पर वेदांता को उड़ीसा से खारिज कर दिया गया है। वहाँ की जनता भी वेदांता के उतनी ही खिलाफ है, जितनी पास्को के। लेकिन सरकार पास्को की तरफदारी कर रही है। पास्को के खिलाफ पर्यावरण मंत्री न तो कुछ सुनना चाहते हैं और न ही कुछ बोलना चाहते हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक को इस बात के लिए आश्वस्त किया है कि पास्को कंपनी के प्रोजेक्ट को अमल में लाने के लिए रास्ते की सारी बाधाओं को दूर करेंगे। यदि पास्को से भी पर्यावरण की हानि हो रही है, तो फिर उस पर सरकार कठोर क्यों नहीं हो रही है? आखिर पास्को से ऐसा क्या मिला, जो वेदांता से नहीं मिल पाया?
डॉ. महेश परिमल
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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शनिवार, 21 अगस्त 2010
हमें ऑस्ट्रेलिया से कुछ सीखना होगा

डॉ. महेश परिमल
भारत में जब भी चुनाव होते हैं, तब उसका मुख्य मुद्दा विकास या महँगाई ही होता है। देश में कई चुनाव हुए पर कभी जनसंख्या मुद्दा नहीं बना। आज २१ अगस्त को ऑस्ट्रेलिया में आम चुनाव हैं, जहाँ इस बार जनसंख्या को एक मुद्दे के रूप में सामने लाया गया है। इस मुद्दे पर भारतीय नेताओं के मुँह पर ताले लग जाते हैं। पर एक आम आस्ट्रेलियन इस बार इस विषय पर काफी गंभीरता से सोच रहा है। विभिन्न लोगों के मत लिए जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जनसंख्या को लोग पर्यावरण से जोड़कर देख रहे हैं।
हमारी देश में आबादी कभी भी नेताओं के लिए मुद्दा नहीं बनी। पर ऑस्ट्रेलिया में इस बार आम चुनाव में यह मुद्दा जोर-शोर के साथ उभरा है। इस मुद्दे को जो भी अच्छी तरह से पेश कर गया, समझ लो जीत उसी की। शायद आपको यह नहीं पता होगा कि ऑस्ट्रेलिया आकार में भारत से कई गुना बड़ा है, पर आबादी के मामले में वहाँ की आबादी हमारे त्रिपुरा राज्य के बराबर है। इतना विशाल क्षेत्र होने के बाद भी लोगों की बसाहट आखिर इतनी कम क्यों है? दरअसल बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया एक सूखा महाद्वीप है। जहाँ पानी की कमी हमेशा बनी रहती है। इस दृष्टि से वहाँ जनसंख्या पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है।
अभी वहाँ की हालत यह है कि वहाँ के पूर्व प्रधानमंत्री केविन रड बढ़ती जनसंख्या को बेहतर मानते हैं, लेकिन उनकी ही पार्टी से उनका पत्ता साफ करने वाली वर्तमान प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड जनसंख्या नियंत्रण की बात कर रही हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया की आबादी वहाँ के मूल नागरिकों की वजह से नहीं, बल्कि अप्रवासियों के कारण बढ़ रही है। प्रश्न यह है कि यदि आबादी वहाँ के मूल लोगों के कारण बढ़ती, तो क्या यह मुद्दा बनती। ऐसा नहीं है, मुद्दा तो तब भी बनती, क्योंकि वहाँ का हर नागरिक यह चाहता है कि देश का पर्यावरण सुरक्षित रहे। पर्यावरण की कीमत पर आबादी बढ़ाने के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। यानी ऐसा ऑस्ट्रेलिया जहाँ जनसंख्या उतनी ही रहे कि पर्यावरण, मूलभूत सुविधाओं और संसाधनों के अनुपात में देश की विकसित जीवन शैली बनी रहे। अर्थशास्त्री भले ही चाहें कि आबादी बढ़े, क्योंकि इससे आर्थिक सम्पन्नता बढ़ेगी। अर्थशास्त्री हमेशा यही चाहेंगे कि जनसंख्या बढ़ती जाए, क्योंकि वो इसे एक संसाधन के रूप में देखते हैं. जितने Êयादा लोग उतना Êयादा सफल घरेलू उत्पाद। लेकिन बात केवल पैसे की नहीं होती, लोगों के जीवनस्तर क्या है, ये भी मायने रखता है.
पर्यावरणविद मानते हैं कि दूसरे जीवजंतु भी हमारे साथ जिंदा रह सकें, ऑस्ट्रेलिया में पानी की कमी है और दुनिया में जहाँ भी रेगिस्तान होता है वहां कम लोग होते हैं. ऑस्ट्रेलिया एक सूखा महाद्वीप है इसलिए ये धारणा गलत है कि यहाँ का क्षेत्रफल बड़ा है तो जनसंख्या भी बड़ी होनी चाहिए। इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में यह मुद्दा छाया हुआ है। हर क्षेत्र के लोग इसमें अपनी राय दे रहे हैं। सभी यही चाहते हैं कि आबादी इतनी रहे कि पर्यावरण को नुकसान न हो। लोग अपनी जीवनशैली में बिना बदलाव किए सुरक्षित रह सकें। हमारे देश के नेताओं और नागरिकों को इससे सबक लेना चाहिए कि जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है। इस सरकार को नहीं, बल्कि हमें ही निपटना है। हमारे देश के नेता इसे भले ही न मानें, इसे मुद्दा न बनाएँ, पर सच तो यह है कि हम इस गंभीर समस्या को अनदेखा नहीं कर सकते। वर्तमान प्रधानमंत्री जुलिया गिलार्ड के मुख्य प्रतिद्वंद्वी और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार टोनी एबट ने हाल ही में कहा कि अगर वे चुने जाते हैं, तो ऑस्ट्रेलिया आने वाले अप्रवासियों की संख्या में एक लाख तीस हजार की कटौती करेंगे। यह एक चुनौतीपूर्ण घोषणा है। आखिर उन्होंने कुछ सोच-समझकर ही यह कहा है। अब तो यह तय है कि जिसने भी इस मुद्दे को अच्छी तरह से पेश कर दिया, उसकी जीत सुनिश्चित है।
समझ में नहीं आता कि हमारे देश में नेता ऐसा कब सोचेंगे? आज भले ही वे इस गंभीर समस्या पर अपना मुँह न खोलें, पर जब इस दिशा में नागरिकों की जागरुकता बढ़ जाएगी, तब उन्हें इस बात पर सोचने के लिए विवश होना ही होगा। बहुत ही छोटा सा देश है ऑस्ट्रेलिया, पर उसकी सोच हमसे काफी आगे है। हम आबादी में भले ही विशाल माने जाते हों, पर सच तो यह है कि हमारे देश के नेताओं की सोच संकीर्ण है, जहाँ वे अपने वेतन भत्तों के लिए कुछ भी कर सकते हैं। दुश्मन से हाथ मिला सकते हैं। इसी देश के नेता ऐसे भी हैं, जो खुले आम सुप्रीमकोर्ट के आदेश की अवहेलना करते हैं। शरद पवार का आज का बयान यही सिद्ध करता है कि वे सुप्रीमकोर्ट के आदेश को भी नहीं मानते। ऐसे लोगों से भला क्या अपेक्षा की जा सकती है। हमें ऑस्ट्रेलिया से कुछ सीखना ही होगा। सोच की यह बुनियाद देश के नागरिकों में है, पर इसका पता हमें ही नहीं है।
डॉ. महेश परिमल
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दृष्टिकोण
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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शुक्रवार, 20 अगस्त 2010
भारत के लिए चीन पाकिस्तान से अधिक खतरनाक

डॉ. महेश परिमल
चीन भारत के लिए पाकिस्तान से भी अधिक खतरनाक है। यह बात शायद हमें देर से समझ में आ रही है। चीन ने जिस तेजी से अपना वर्चस्व कायम किया है, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि वह भारत के लिए और भी अधिक अवरोध खड़े करेगा। जिस तरह से उसने अपने उत्पाद हमारे देश में निर्यात किए हैं, उससे ही स्पष्ट होता है कि उसकी तैयारी कैसी है। नकली दूध और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक खिलौने से हम सब वाकिफ हैं। अब वह अपनी फौजी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है।
दक्षिण एशिया में व्यूहात्मक डेटरंस के लिए चीन ने भारतीय सीमा पर मिसाइल तैनात की है। सीएसएस फाइव उर्फ दोंग फेंग 21-ए नामक इस मिसाइल से देश के मुम्बई जैसे शहरों पर खतरा बढ़ गया है। चीन अपनी आर्थिक ताकत ही नहीं बढ़ा रहा है, वह तो अपने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ताकत भी बढ़ा रहा है। भारत से लगी 4057 किलोमीटर सीमा पर चीन अरुणाचल प्रदेश और अक्सई चीन कश्मीर के पूर्व में आने वाले क्षेत्र हैं। जिस तरह से पक्के रास्तों को चीन ले लांघा है, उससे उसकी नीयत साफ पता चलती है। उसके लिए अब दिल्ली दूर नहीं है। भारत की सीमा पर उसकी बार-बार की जाने वाली घुसपैठ यह बताती है कि उसके इरादे नेक नहीं हैं। अब तक उसने 250 बार सीमा का उल्लंघन किया है।
भारत-चीन संबंधों को सुधारने की बात बार-बार की जाती है। इसके जवाब में चीन सदैव ही सीमा पर अपनी सेनाएँ भेजता है। भारत के पास चीन के महानगर बीजिग तक प्रहार करने वाली मिसाइलें हैं, साथ ही अणुबम भी हैं, इसके बाद भी हमारा देश चीन की किसी भी क्षेत्र में बराबरी नहीं कर सकता। इसके बाद भी चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। चीन की सैन्य ताकत और उसकी दगाखोरी नीति के आगे भारत कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। 1961 के युद्ध में भारत ने चीन से हार मान ली थी। इसकी वजह भले ही स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ही क्यों न रहें हों। कहा जाता है कि उनकी संकीर्ण दृष्टि ही इसका मुख्य कारण रही। नेहरु ने बीजिंग की यात्रा कर चीनी-हिंदी भाई-भाई का नारा लगा रहे थे, उधर चीन भारतीय सीमा पर घुस आया था। भारत आकर नेहरु ने बिना किसी तैयारी के सेनाओं को चीनी सैनिको से मुकाबला करने के लिए हिमालय बर्फीली चोटियों पर भेज दिया था।
वर्तमान में वैश्विक स्थिति को देखते हुए चीन-भारत में युद्ध हो, इसकी संभावना काफी कम है। फिर भी भारत को चीन से सचेत रहना ही होगा। वह कभी भी कुछ भी कर सकता है। भारत उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। भारत को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए चीन ने क्या-क्या नहीं किया। अपने यहाँ नकली दवाएँ बनाकर उसने भारत की सील लगाकर विश्व बाजार में बेचा, ताकि भारत की साख गिर जाए। अपने उत्पादों से उसने भारतीय बाजार पर कब्जा कर रखा है। हमारी कमजोर नीतियाँ उसे इस तरह के काम करने के लिए उकसाती हैं। हमने कभी भी चीन उत्पादों का खुलकर विरोध नहीं किया। चीनी उत्पादों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया जाता, तो शायद इस दिशा में यह एक ठोस कदम होता। पर हम ऐसा नहीं कर पाए। चीन ने अपनी पूरी तैयारी के साथ भारत पर आíथक रूप से प्रहार किया है। जिसका जवाब हमें देना ही होगा। कैसे देना है यह हमारे नेता और मंत्री बहुत ही अच्छी तरह से जानते हैं।
उधर चीन की सैन्य तैयारियों के बारे में अमेरिकी प्रतिरक्षा-मुख्यालय पेंटागन की ताजा रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह कहा जा सके कि चीन की ताकत को देखते हुए अमेरिका सचमुच चिंतित है। चीन ने भारत से जुड़ी सीमाओं पर तैनात पुरानी मिसाइलों को ज्यादा उन्नत मिसाइलों से बदल दिया है। उसने भारतीय सीमाओं पर सैनिकों को जमा करने की आकस्मिक योजना तैयार की हो। अब उसके निशाने की जद में सिर्फ अपना पास पड़ोस ही नहीं, पूरी दुनिया है। वह अपनी सैन्य तैयारियों को-लेकर भारी गोपनीयता बरत रहा है। सवाल यह है कि आखिर कौन-सा देश है जो यही सब नहीं करेगा या करना चाहेगा। रिपोर्ट के अनुसार चीन दुनिया भर में अपने पैर पसारने में जुटा है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने अपनी सैन्य क्षमता के जो आंकड़े दिये हैं, उनमें पारदर्शिता नहीं है। रिपोर्ट अमेरिका के निचले सदन कांग्रेस में पेश की गयी है।
रिपोर्ट में कहा गया है भारत और चीन के बीच राजनैतिक और ओर्थक संबंधों में सुधार के बाद भी दोनों देशों की सीमा पर तनाव बरकरार है। चीन की सेना अक्सर सीमा का उल्लंघन और आRामक बॉर्डर पेट्रोलिंग करती है। इससे तनाव और बढ़ जाता है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर सबसे अधिक तनाव है। चीन इसे तिब्बत का हिस्सा मानता है। इसके अलावा तिब्बत के पठार के पश्चिमी छोर पर मौजूद अक्साई चिन पर भी चीन दावा करता है। भारत के लोन रुकवाने की कोशिश की रिपोर्ट में कहा गया है अरुणाचल प्रदेश को लेकर भारत और चीन ने अपने-अपने दावों को मजबूती देने के लिए कई कदम उठाये थे।
रिपोर्ट के अनुसार 2009 में ऐशयन डेवलपमेंट बैंक से भारत को करीब 13 हजार अरब रुपये के लोन को रुकवाने की पूरी कोशिश की। चीन का तर्क था कि इस लोन का एक हिस्सा अरुणाचल प्रदेश में पानी की योजना में लगाया जाएगा। भारत में हमें यह रिपोर्ट पढ़ते हुए भूलना नहीं चाहिए कि यह अमेरिकी रिपोर्ट है। चीन के बढ़ते प्रतिरक्षा खर्च के बारे में-हमें वह देश आगाह कर रहा है, जिसका अपना प्रतिरक्षा बजट-चीन से काफी अधिक और दुनिया में सबसे ज्यादा है। फिर-स्थापित महाशक्ति अमेरिका और उभरती महाशक्ति चीन के बीच कटुता जानी-पहचानी है। इस किस्म की रिपोर्ट से एशिया में चीन की बढ़ती ताकत के प्रति चिंता पैदा करके हथियारों की होड़ को बढ़ावा देना उसका मकसद हो सकता है। इसमें उसका-दोहरा फायदा है। वह चीन के खिलाफ उसके ही पड़ोस में चुनौती खड़ी करेगा और हथियार बेचकर मुनाफा भी कमाएगा। पहला सबक तो यह है कि किसी अमेरिकी रिपोर्ट के आधार-पर दहशतजदा होने या अपनी रणनीति बनाने के बजाय हम खुद अपनी रिपोर्ट तैयार करें।
क्या है रिपोर्ट में ..
- चीन ने भारत से सटी सीमा पर आधुनिक मिसाइल सीएसएस 5 को तैनात किया है
- सीमा पर बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती पर भी विचार कर रहा है
- कम समय में वायुसेना को सीमा के पास पहुंचाने की योजना बनाई
- 2009 में 150 अरब डॉलर सेना पर खर्च किए
- चीन द्वारा बॉर्डर पर रोड और रेल इंफा्रस्ट्रक्चर के विकास पर जोर दे रहा
- सीमा पर रोड और रेल इंफा्रस्ट्रक्चर के विकास पर जोर दे रहा है।
-भारत-चीन की 4057 किलोमीटर लंबी सीमा पर हालात सामान्य नहीं
- अरुणाचल प्रदेश को लेकर सबसे अधिक तनाव
- अक्सई चिन पर भी करता है दावा
-चीन की बढ़ती ताकत- चीन का पहला मानवरहित अंतरिक्ष यान तियानगोंग-1 तैयार
-8.5 टन वजन वाले इस यान को 2011 में कक्षा में छोड़ा जाएगा
-चीन इस समय दो महिलाओं समेत चीनी अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने का प्रशिक्षण दे रहा है।
- 2003 में शेनझाव में पहली बार अंतरिक्ष में मानव भेजा था।
डॉ. महेश परिमल
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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मंगलवार, 17 अगस्त 2010
देश के दुश्मन : मौत के सौदागर
स्वराज्य करुण
कहते हैं कि शिक्षा मानव को मानवता सिखाती है , वह मनुष्य को सत्य, अहिंसा, सदाचार और शांति से जीवन जीने और प्रत्येक मानव के जीवन को अपने जीवन की तरह अनमोल समझने की सीख देती है. हमारे इस महान देश में भगवान गौतम बुद्ध ,महावीर ,गुरु नानक ,कबीर और महात्मा गांधी सहित अनेक महान विभूतियों ने अपने सदविचारों से पूरी दुनिया को जियो और जीने दो का प्रेरणादायक सन्देश दिया है. लेकिन आज की दुनिया में हो क्या रहा है ? दुनिया को रहने दें और यह देखें कि अपने ही देश में क्या हो रहा है ? कहीं नक़ली दवाईयों के काले कारोबार के जरिये मरीजों के जीवन से खुले आम खिलवाड़ चल रहा है ,तो कहीं मिलावटी दूध ,मिलावटी खोवा , मिलावटी तेल के घिनौने व्यापार से पूरे मानव समाज को बीमार बनाया जा रहा है .जनता की सेहत से खिलवाड़ करने वालों ने अब तो सब्जियों को घातक रासायनिक रंगों से रंग कर बेचना शुरू कर दिया है . छतीसगढ़ के पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय की रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला में बाज़ार से खरीदी गयी परवल और खेक्सी को जब पानी में डाल कर जाँच की गयी तो विशेषज्ञ यह देख कर चौंक गए कि पानी का रंग हरा हो गया कारण यह था कि स्वाद और विटामिनों का भण्डार समझी जाने वाली इन हरी सब्जियों को मेल्काईट ग्रीन नामक जहरीले रसायन से रंगा गया था . प्रायोगिक जाँच में यह भी पाया गया कि बाज़ारों में बिक रही इस प्रकार की सब्जियों में कापर सल्फेट ,ब्रिलियंट ग्रीन और आक्सीटोसिन नामक इजेक्शन से भी ऐसे जहरीले रसायन डाल कर उन्हें ग्राहकों को थमाया जा रहा है,कच्चे टमाटर को पकाने के लिए एथेफोन और एक अन्य रसायन का इस्तेमाल हो रहा है. केले और आम के कच्चे फलों को जल्दी पकाने के लिए मौत के सौदागरों ने कार्बाइड नामक जानलेवा रसायन का उपयोग शुरू कर दिया है . यह किसी एक शहर की बात नहीं है. देश के अनेक शहरों की सब्जी मंडियों से ऐसी ख़बरें लगभग हर हफ्ते -दस दिन में अखबारों और छोटे परदे के समाचारों में पढ़ते -पढ़ते और देखते -देखते हम थक गए हैं .डॉक्टर सचेत करते हैं कि ऐसी जहर बुझी सब्जियों के जरिये शरीर में घातक रसायनों के पहुँचने पर किडनी ,दिल और लीवर की प्राण घातक बीमारियाँ हो सकती हैं ,लेकिन ग्राहक बेचारा करे भी तो क्या ? रोजी -रोटी के लिए शहरी जीवन में रहने की मजबूरी ,छोटे -छोटे घरों में रहने की मजबूरी भाग -दौड़ से भरी ज़िंदगी में असली सब्जियों के धोखे में लोग इन मिलावटी,नकली और जहरीली सब्जियों को खरीद कर और खाकर खुद बीमार हो रहें है और अनजाने में उनके परिवारों के सदस्य और घर आने वाले मेहमान भी अनजाने में ऐसी बीमारियों को शरीर में डाल रहें है , जिनका नतीज़ा उन्हें निर्दोष होने के बावजूद आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ेगा. भोले -भाले इंसानों को नकली दवा,मिलावटी दूध ,मिलावटी घी , नकली खोवा और जहरीली सब्जियां बेच कर उनकी जेबों से लाखो -करोड़ों रुपयों की लूट-पाट करने और उन्हें मौत के मुंह में धकेलने वाले लोग मानव के वेश में दानव नहीं तो और क्या हैं ? ऐसे लोग मानवता के शत्रु और देश और दुनिया के दुश्मन नहीं तो और क्या हैं ? इनके साथ वही सलूक होना चाहिए जो हत्या के अपराधियों के साथ होता है. लेकिन सवाल यह है कि मौत के सौदागर , हमारे ये दुश्मन क्या ब्रम्हांड के किसी दूसरे ग्रह से आये हैं ,जिन्हें हम पृथ्वी ग्रह के निवासी अपनी खुली आँखों से नहीं देख पा रहे हैं और जो मौत का ऐसा घिनौना खेल हमारे बीच छुप कर खेल रहें हैं ? सब कुछ हमारे आस- पास, हमारे ही खिलाफ खुलकर हो रहा है , फिर भी हम अगर अपने इन दुश्मनों को नहीं पहचान पा रहे हैं, तो इसमें गलती आखिर किसकी है ?
स्वराज्य करुण
कहते हैं कि शिक्षा मानव को मानवता सिखाती है , वह मनुष्य को सत्य, अहिंसा, सदाचार और शांति से जीवन जीने और प्रत्येक मानव के जीवन को अपने जीवन की तरह अनमोल समझने की सीख देती है. हमारे इस महान देश में भगवान गौतम बुद्ध ,महावीर ,गुरु नानक ,कबीर और महात्मा गांधी सहित अनेक महान विभूतियों ने अपने सदविचारों से पूरी दुनिया को जियो और जीने दो का प्रेरणादायक सन्देश दिया है. लेकिन आज की दुनिया में हो क्या रहा है ? दुनिया को रहने दें और यह देखें कि अपने ही देश में क्या हो रहा है ? कहीं नक़ली दवाईयों के काले कारोबार के जरिये मरीजों के जीवन से खुले आम खिलवाड़ चल रहा है ,तो कहीं मिलावटी दूध ,मिलावटी खोवा , मिलावटी तेल के घिनौने व्यापार से पूरे मानव समाज को बीमार बनाया जा रहा है .जनता की सेहत से खिलवाड़ करने वालों ने अब तो सब्जियों को घातक रासायनिक रंगों से रंग कर बेचना शुरू कर दिया है . छतीसगढ़ के पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय की रसायन विज्ञान की प्रयोगशाला में बाज़ार से खरीदी गयी परवल और खेक्सी को जब पानी में डाल कर जाँच की गयी तो विशेषज्ञ यह देख कर चौंक गए कि पानी का रंग हरा हो गया कारण यह था कि स्वाद और विटामिनों का भण्डार समझी जाने वाली इन हरी सब्जियों को मेल्काईट ग्रीन नामक जहरीले रसायन से रंगा गया था . प्रायोगिक जाँच में यह भी पाया गया कि बाज़ारों में बिक रही इस प्रकार की सब्जियों में कापर सल्फेट ,ब्रिलियंट ग्रीन और आक्सीटोसिन नामक इजेक्शन से भी ऐसे जहरीले रसायन डाल कर उन्हें ग्राहकों को थमाया जा रहा है,कच्चे टमाटर को पकाने के लिए एथेफोन और एक अन्य रसायन का इस्तेमाल हो रहा है. केले और आम के कच्चे फलों को जल्दी पकाने के लिए मौत के सौदागरों ने कार्बाइड नामक जानलेवा रसायन का उपयोग शुरू कर दिया है . यह किसी एक शहर की बात नहीं है. देश के अनेक शहरों की सब्जी मंडियों से ऐसी ख़बरें लगभग हर हफ्ते -दस दिन में अखबारों और छोटे परदे के समाचारों में पढ़ते -पढ़ते और देखते -देखते हम थक गए हैं .डॉक्टर सचेत करते हैं कि ऐसी जहर बुझी सब्जियों के जरिये शरीर में घातक रसायनों के पहुँचने पर किडनी ,दिल और लीवर की प्राण घातक बीमारियाँ हो सकती हैं ,लेकिन ग्राहक बेचारा करे भी तो क्या ? रोजी -रोटी के लिए शहरी जीवन में रहने की मजबूरी ,छोटे -छोटे घरों में रहने की मजबूरी भाग -दौड़ से भरी ज़िंदगी में असली सब्जियों के धोखे में लोग इन मिलावटी,नकली और जहरीली सब्जियों को खरीद कर और खाकर खुद बीमार हो रहें है और अनजाने में उनके परिवारों के सदस्य और घर आने वाले मेहमान भी अनजाने में ऐसी बीमारियों को शरीर में डाल रहें है , जिनका नतीज़ा उन्हें निर्दोष होने के बावजूद आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ेगा. भोले -भाले इंसानों को नकली दवा,मिलावटी दूध ,मिलावटी घी , नकली खोवा और जहरीली सब्जियां बेच कर उनकी जेबों से लाखो -करोड़ों रुपयों की लूट-पाट करने और उन्हें मौत के मुंह में धकेलने वाले लोग मानव के वेश में दानव नहीं तो और क्या हैं ? ऐसे लोग मानवता के शत्रु और देश और दुनिया के दुश्मन नहीं तो और क्या हैं ? इनके साथ वही सलूक होना चाहिए जो हत्या के अपराधियों के साथ होता है. लेकिन सवाल यह है कि मौत के सौदागर , हमारे ये दुश्मन क्या ब्रम्हांड के किसी दूसरे ग्रह से आये हैं ,जिन्हें हम पृथ्वी ग्रह के निवासी अपनी खुली आँखों से नहीं देख पा रहे हैं और जो मौत का ऐसा घिनौना खेल हमारे बीच छुप कर खेल रहें हैं ? सब कुछ हमारे आस- पास, हमारे ही खिलाफ खुलकर हो रहा है , फिर भी हम अगर अपने इन दुश्मनों को नहीं पहचान पा रहे हैं, तो इसमें गलती आखिर किसकी है ?
स्वराज्य करुण
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आज का सच
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
सोमवार, 16 अगस्त 2010
मेरी 700 वीं पोस्ट
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दृष्टिकोण
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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शनिवार, 14 अगस्त 2010
क्या हम सचमुच आजाद हो गए हैं

डॉ. महेश परिमल
आंजादी.... आंजादी.... और आंजादी, पिछले 64 वर्षों से यह सुनते आ रहे हैं, पर आज भी हम यदि इस आंजादी को ढूँढ़ने निकल जाएँ, तो वह कुछ हाथों में छटपटाती नजर आएगी। आंजादी कैद हो गई है, कुछ मजबूत हाथों में, वे हाथ जो खून से रँगे हैं, वे हाथ जो कानून को अपने हाथ में लेते हैं, वे हाथ जो पाँच वर्ष में आम लोगों के सामने एक बार जुड़ते हैं,। इन हाथों में छटपटाती आंजादी की सिसकियाँ किसने सुनी?सन् 1857 के पहले भी आंजादी का शंखनाद हुआ था। उसमें था आंजादी पाने का जोश, भारत माँ को जंजीरों की जकड़न से दूर करने का उत्साह। बच्चा-बच्चा एक ंजुनून की गिरफ्त में था। सभी चाहते थे – आंजादी। वह आंजादी केवल विचारों की नहीं, बल्कि इंसान को इंसान से जोड़ने वाली आंजादी की कल्पना थी, जिसमें बिना भेदभाव, वैमनस्यता के एक-दूसरे के दिलों में बेखौफ रहने की कल्पना थी।अनवरत् संघर्षो, लाखों कुर्बानियों एवं असंख्य अनाम लोगों के सहयोग से हमें रक्तरंजित आंजादी मिली, भीतर कहीं फाँस अटक गई, विभाजन की। एक सपना टूट गया- साथ रहने का। वह सपना कालांतर में एक ऐसा नासूर बन गया, जो रिस रहा है। असह्य वेदना को साकार करता शरीर का वही भाग आज आक्रामक हो चला है।हमें आंजादी मिली तो सही, पर हम उसे संभाल नहीं पाए, आंजादी मिलने की खुशी में हम भूल गए कि यह धरोहर है, हमारे पूर्वजों के पराक्रम की, इसे संभालकर रखना हमारा कर्त्तव्य है। इसे सहेज कर रखने से ही प्रजातंत्र जिंदा रह पाएगा। आज प्रजातंत्र जिंदा तो है, पर उसकी हालत मरे से भी गई बीती है। हमें चाहिए था, एक ऐसा प्रजातंत्र जो साँस लेता हुआ हो, जिसकी धमनियों में शहीदों का खून दौड़ता हो, पर हमने अपने हाथों से अपनी आंजादी खो दी। वह भी आंजादी मिलने के तुरंत बाद ही।इस आंजादी को पाने के लिए कई अनाम शहीदों ने भगीरथ प्रयास किए। आज बदलते जीवन मूल्यों के साथ वही आंजादी की गंगा कुछ लोगों की सात पीढ़ियों को तारने का काम कर रही है। पीढ़ियों को उपकृत करने वाली आंजादी की कल्पना तो हमने नहीं की थी। पूरे 60 बरसों से आंजादी का भोंपू हम सुन रहे हैं, पर इन वर्षो में गरीब और गरीब हुआ है और अमीर और अमीर । हाँ विकास के नाम पर देश इतना आगे बढ़ गया है कि हर हाथ को काम मिलने लगा है। हर गाँव रोशनी से जगमगा रहा है, प्रत्येक गाँव में सड़कें हैं, कोई भी बेरोजगार नहीं है, एक-एक बच्चा शिक्षित हो रहा है, यह सब हो रहा है, सिर्फ ऑंकडाें के रूप में, मोटी-मोटी फाइलों में।सच्चाई के धरातल पर देखें तो ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जिसे उपलव्धि कहा जाए। रिक्शा चालक सुखरू या समारू के बेटे भी या तो रिक्शा चला रहे हैं या मंजदूरी कर रहे हैं। अलबत्ता उस वक्त एक ट्रक का मालिक आज कई ट्रकों के मालिक बनकर करोड़ों से खेल रहा है। महज एक रोटी का जीवंत प्रश्न सुलझाया नहीं जा सका है, पिछले 62 वर्षों में। रोटी की बात छोड़ भी दें, तो आज हम साफ पानी के भी मोहताज हैं।सामाजिक परिवेश में जीवनमूल्य बदल रहे हैं। भ्रष्टाचार शिष्टाचार का पर्याय बन गया है। बलात्कारी सम्मानित हो रहे हैं। घूसखोरों की हवेलियाँ बन रही है। बहुओं को जला कर वर्ष भर होली मनाने वाले नारी उत्पीड़न विरोधी समिति या नारी उत्थान संघ के संचालक बने बैठे हैं। कानून को हाथ में लेने वाले अपराधी सफेदपोशों के अनुचर हैं। इन सबके अलावा कलमकार के हाथों को खरीदने की भी प्रक्रिया शुरू हो गई है, इसलिए सच हमेशा झूठ का नकाब लगाकर सामने आ रहा है।आंजादी अब खेतों-खलिहानों में नहीं बल्कि कांक्रीट के जंगलों में सफेदपोशों के हाथों में या फिर ए। के। 56 या ए. के. 47 वाले हाथों में पहुँच गई है। आंजादी को इस कैद से हमें ही छुड़ाना है। इसके लिए हमेें आंजादी की सही पीड़ा को समझना पड़ेगा। त्रासदी भोगती इस आंजादी को खेतों, खलिहानों, खेल के मैदानों, शालाओं, महाविद्यालयों में पहुँचाने का संकल्प लेना होगा, ताकि सही हाथों में पहँचकर आंजादी ‘हाथों के दिन’ की उक्ति को चरितार्थ कर सके। ताकि हम सगर्व कह सकें, आ गए हाथों के दिन.... .... ।
डॉ. महेश परिमल
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जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
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डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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जुलिया का हिंदू प्रेम कहीं सतही तो नहीं..

डॉ. महेश परिमल
लोगों को यह जानकर बहुत ही खुशी हुई कि हॉलीवुड की प्रसिद्ध अभिनेत्री जुलिया राबर्ट्स ने हिंदू धर्म अंगीकार कर लिया। जुलिया के बयान पर नजर डालें, तो जब उसने नीम करोल बाबा की तस्वीर देखी, तो उसके मन में हिंदू धर्म के प्रति आस्था बढ़ गई। किसी बाबा की तस्वीर देखकर जब इतने प्रभावित हुई, तो फिर धर्म अंगीकार करके उसकी क्या हालत होगी? वास्तव में यह एक स्टंट है। बहुत ही जल्द भारत में भी जुलिया राबर्ट्स की फिल्म ‘इट, प्रे, लव’ रिलीज होने वाली है। उसी फिल्म को हिट करने के लिए यह चोंचला किया गया है।
आखिर कौन है ये जुलिया राबर्ट्स, पहले इसके बारे में जान लें। हॉलीवुड की नम्बर वन 42 वर्षीय हीरोइन जुलिया राबर्ट्स ने हाल ही में प्रेटी वुमन नामक फिल्म में अभिनय के लिए ऑस्कर पुस्स्कार प्राप्त किया है। इसका जन्म जार्जिया प्रांत में हुआ था। उसके माता-पिता बाप्टीस्ट और केथोलिक हैं। एल्ले नामक मैगजीन को दिए गए एक साक्षात्कार में वह कहती हैं कि केवल वे ही नहीं, बल्कि उनका पूरा परिवार ही हिंदू बन गया है। हम सब साथ-साथ मंदिरों में जाते हैं, वहाँ भजन-कीर्तन करते हैं। वह बताती हैं कि उसके पति ने भी हिंदू घर्म स्वीकार कर लिया है।
अब आते हैं इस करोल बाबा पर। इस बाबा का असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गाँव में हुआ था। ये बाबा महाराज के रूप में जाने जाते थे। भारत एवं विदेशों में उनके लाखों शिष्य हैं। आध्यात्मिक शिक्षक बाबा रामदास और योगी भगवान दास भी इनके शिष्य थे। जय उत्तल और कृष्णादास जैसे संगीतकार भी नीम करोल बाबा को अपना गुरु मानते हैं। एपल कंपनी के सीईओ स्टीव जोब्स इसी बाबा से मिलने 1973 में भारत आए। पर वे बाबा से मिल पाते, उसके पहले ही बाबा का स्वर्गवास हो गया। अमेरिका और जर्मनी में बाबा के आश्रम भी हैं। वे कई प्रकार के चमत्कार करते थे। इसलिए इनके भक्तों की संख्या लाखों में है।
भारत में इसके पहले भी कई विदेशी हस्तियाँ आईं और हिंदू धर्म अपनाया। 1960 के दशक में विख्यात बीटल्स स्टार जार्ज हेरिसन ने वैदिक धर्म अंगीकार किया था। वे इस्कॉन के अभियान से जुड़े थे। इसके पीछे वास्तविकता यह है कि अमेरिका में इस्कॉन के अभियान को बल देने के लिए यह चोंचलेबाजी की गई थी। बीटल्स का अनुसरण करते हुए लाखों अमेरिकियों ने हिंदू धर्म अंगीकार कर इस्कॉन से जुड़ गए। इससे हिंदू धर्म को किसी प्रकार का लाभ नहीं हुआ। इसका दूसरा पहलू यह है कि अमेरिका में इस्कॉन के अभियान को हत्या, ड्रग्स और अनेक मामलों के कारण काफी बदनामी हुई। इससे हिंदू संस्कृति पर भी छींटे पड़े। विख्यात पॉप गायिका मेडोना ने भी हिंदू धर्म अपनाने का नाटक किया था। क्रोजन नामक एलबम में मेडोना हाथ में मेंहदी देखने को मिलती है। लोगों ने जब हाथ को ध्यान से देखा, तो आश्चर्यचकित रह गए, क्योंकि उसके हाथ में ओम लिखा था। बाद में पता चला कि यह तो उसने अपने एलबम के प्रचार के लिए किया था।
जब भी विदेशी अभिनेत्री भारतभूमि पर अपने पाँव रखती हैं, तब वह यहाँ की संस्कृति से काफी प्रभावित होती हैं। लिज हर्ली को तो भारत इतना भाया कि उसने अपनी शादी पूरी तरह से हिंदू रीति-रिवाजों से करना तय किया। इसके लिए उसने जोधपुर का राजमहल ही किराए पर ले लिया। इस दौरान भजन संध्या जैसे धार्मिक कार्यक्रम भी हुए। कुछ समय पहले ही डेमी मूर को मेंहदी लगाकर घूमते लोगों ने देखा। रिचर्ड गेरे जैसी बड़ी हस्ती ने कुछ समय पहले बौद्ध धर्म स्वीकार किया। वे कई बार धर्मशाला आते हैं, वहाँ रहते हैं। वे दलाई लामा से भी कई बार मिल चुके हैं। तिब्बत की मुक्ति के लिए चलाए जा रहे दलाई लामा के अभियान से भी वे जुड़े हैं। इस अभियान में उनके जुड़ जाने से थोड़ा बल मिला है। पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि गेरे ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर इस धर्म को बहुत बड़ा सहारा दिया है।
बात फिर जुलिया की। अपनी फिल्म ‘इट, प्रे, लव’ की शूटिंग के लिए पिछले साल जुलिया भारत आई थी। तब वह हरियाणा के एक आश्रम में भी काफी समय तक रुकी थी। इस वर्ष जनवरी में वह अपने पति के साथ भारत आई थीं। जब वह ताजमहल देखने गई, तब उसके माथे पर ¨बदी देखकर लोगों को आश्चर्य हुआ था। इसके बाद भी उसने कहीं भी यह नहीं कहा कि वह हिंदू धर्म को स्वीकार कर रहीं हैं। अभी अमेरिका में जब उसकी फिल्म रिलीज होने वाली थी, उसकी पूर्व संध्या ही उसने यह घोषणा की कि वह ¨हदू धर्म स्वीकार कर रहीं हैं। आखिर घोषणा करने के लिए उसे फिल्म रिलीज होने के एक दिन पहले ही मिला। वैसे देखा जाए, तो इस फिल्म की स्टोरी भी जुलिया से मिलती-जुलती है। फिल्म की नायिका एलिजाबेथ गिल्बर्ट एक लेखिका है। जो अपने वैवाहिक जीवन से खुश नहीं है। इससे दु:खी होकर कई बार वह रात में बाथरुम के फ्लोर पर खूब रोती है। इन हालात में वह एक व्यक्ति के प्रेम में पड़ जाती है। इधर वह अपने पति से तलाक के लिए कोशिश करती है। उसका पति तलाक के लिए तैयार नहीं होता। इस बीच जिससे वह प्रेम करने लगी थी, वह व्यक्ति उसे धोखा दे देता है। इससे वह बुरी तरह से टूट जाती है। एक बार वह योग पर कुछ काम करती रहती है, उसी दौरान उसकी भेंट एक आध्यात्मिक व्यक्ति से होती है। वह उससे काफी प्रभावित होती है। तब गिल्बर्ट उस आध्यात्मिक व्यक्ति से कहती है कि एक दिन मैं आपके पास आकर रहूँगी। कुछ दिनों बाद ही उसे तलाक मिल जाता है। अब उसके पास काफी वक्त था, तो उसने एक वर्ष भ्रमण में बिताने का संकल्प लिया। इस विषय पर पुस्तक लिखने के लिए उसे एडवांस में धन मिला। इस धन से वह चार महीने तक इटली में रही। वहाँ खूब मौज-मस्ती की। यानी खाया-पीया। मतलब (इट), उसके बाद वह भार आ गई, जहाँ एक आश्रम में रही। यहाँ योग-साधना का अध्ययन किया। यानी (प्रे), इसके बाद के अंतिम चार महीने उसने इंडोनेशिया के एक टापू पर बिताए। यहाँ उसका प्यार ब्राजील के एक फैक्टरी मालिक से हो जाता है। फिर तो वह तय करती है कि अब वह अपना बाकी जीवन इसी टापू पर अपने प्रेमी के साथ बिताएगी। इस तरह से उसकी जिंदगी का तीसरा पड़ाव लव पर आकर समाप्त होता है।
पश्चिम के लोग जब भी भारत आते हैं और यहाँ की प्राचीन संस्कृति के दर्शन करते हैं, तो पहली नजर में वह उस संस्कृति से प्यार करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि वे वैदिक धर्म अपना सकते हैं। दूसरी ओर उनका लालन-पालन कुछ दूसरे ही तरीके से हुआ होता है, इसलिए वे इससे तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाते। भारत की संस्कृति में तप, त्याग, संयम और सहिष्णुता रग-रग में बसी है, इन विदेशियों के खून में यह सब नहीं होता। उनपका जीवन तो भोग प्रधान होता है। इसी भोग प्रधान जीवन से जब वे बोर हो जाते हैं, तब वे योग और त्याग की बातें करते हैं। इस जीवन में आकर कुछ समय बाद वे इससे भी बोर होने लगते हैं, तब वे फिर भोग की दुनिया में चले जाते हैं। जुलिया राबर्ट्स के लिए संभव है कि वह हिंदू धर्म को हृदय से स्वीकार न कर पाए और फिर उसी दुनिया में चली जाए, जहाँ से वह आई हैं। हिंदू धर्म के प्रति उनका प्रेम कुछ समय बाद पिघल जाए, तो इससे हमको आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
डॉ. महेश परिमल
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दृष्टिकोण
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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बुधवार, 4 अगस्त 2010
स्वागत कीजिए और सब भूल जाइए

ओबामा भी भारत यात्रा
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नीरज नैयर
इस्लामाबाद में हुई किरकिरी पर गौर फरमाने के बजाए भारतीय खेमा किसी दूसरे अभियान में व्यस्त है, ये अभियान है ओबामा की खुशामदगी का। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा नवंबर में भारत आएंगे, उनके दौरे से पहले अमेरिकी प्रशासन के नुमांइदे नई दिल्ली के चक्कर लगा चुके हैं। काबुल में विदेशमंत्री एसएम कृष्णा और उनकी अमेरिकी समकक्ष हिलेरी क्लिंटन ने भी ओबामा की यात्रा को लेकर करीब 30 मिनट गुफ्तगू की। भारत अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा को काफी अहम मानकर चल रहा है, वैसे भारत के लिए वाशिंगटन से आने वाला हर शख्स कुछ ज्यादा ही अहमियत रखता है। फिर ओबामा से तो भारतीयों के दिल के तार पहले से ही जुड़े हुए हैं। राष्ट्रपति चुनाव के वक्त वाशिंगटन से ज्यादा सरगर्मियां और उत्साह दिल्ली में नजर आ रहा था। कहीं से ओबामा के लिए हनुमानजी की मूर्ति भेजी थी तो कहीं उनकी जीत के लिए दुआएं की जा रही थीं। जिस दिन ओबामा ने हिलेरी क्लिंटन को पछाड़कर व्हाइट हाउस की दौड़ में फतह हासिल की, उस दिन देशभर का मीडिया ओबामामय हो गया था। जिस चैनल को देखो इस अश्वेत राष्ट्रपति और भारत के बीच के रिश्तों को रेखांकित करने में लगा था। ओबामा की पूरी बायोग्राफी पेश की जा रही थी। चैनलों के भरपूर डोस के दूसरे दिन अखबारात भी बराक हुसैन ओबामा की खबरों से सजे पड़े थे। एक बारगी तो ऐसा लग रहा था, जैसे या तो ओबामा भारत के राष्ट्रपति बने हैं या हिंदुस्तान अमेरिका का हिस्सा है। हालांकि ये बात अलग है कि जल्द ही ये खुशियां काफुर हो गईं। गद्दी संभालने के बाद ओबामा तेवर भी वैसे ही बदल गए, जैसे भारत के नेताओं के चुनाव जीतने के बाद बदल जाते हैं। चुनाव से पहले हाथ जोड़कर सुनहरे सपने दिखाने वाले नेता, जीत का स्वाद चखने के बाद सपनों को सपना ही बना छोड़ जाते हैं। ओबामा में भारतीयों को भारत की छाप दिखती है, शायद ऐसा उनके काले रंग को देखकर लगता होगा। क्योंकि अब तक उन्होंने जो कुछ भी किया है उससे ऐसा अहसास होना भी मुश्किल है। पाकिस्तान को लेकर चुनावी मंच से उनके दो-चार भाषणों का मतलब हमारे देश में ये लगाया गया कि अब वाशिंगटन भारत की पैराकारी पर ध्यान देगा। मगर हुआ इसके एकदम उलट। एक-दो बंदर घुड़की के अलावा ओबामा प्रशासन ने पाकिस्तान के कान एंेठने की कोई जहमत नहीं उठाई। जबकि मुंबई हमले के बाद हमे आश्वस्त किया गया था कि नए राष्ट्रपति को पदभार संभाल लेने दीजिए पाक को मिलकर सबक सिखाएंगे। जब-जब नई दिल्ली ने अमेरिका के आगे आतंकवाद की फैक्ट्री यानी पाकिस्तान का रोना रोया, पाक को फेंकी जाने वाली बोटियों की तादाद दुगनी कर दी गई। पाकिस्तान दौरे पर आईं हिलेरी भी विकास परियोजनाओं के नाम पर 50 करोड़ डॉलर की बोटियां फेंककर चली गईं। जिस देश का जन्म ही हिंसा और अलगाववाद की बुनियाद पर हुआ वहां विकास की गंगा बहाकर भी क्या हासिल होगा। पाकिस्तान को चलाने वाले हुक्मरानों ने अगर भारत को बर्बाद करने के ख्वाब देखने की जगह मुल्क की खुशहाली और तरक्की के बारे में सोचा होता तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। लेकिन अमेरिका इन बातों को समझना नहीं चाहता। उसे एशिया में पैर जमाए रखने के लिए एक ऐसे साथी की जरूरत है जो उसके कहने पर जमीन पर पड़ा थूक भी चाटने को तैयार हो जाए। और इसके लिए पाकिस्तान से बेहतर भला कौन हो सकता है। मगर इस सबका खामियाजा भारत को उठाना पड़ रहा है, पर खामियाजा उठाने वाला ही अगर ऐतराज न जताए तो फिर अमेरिका पर भी उंगली कैसे उठाई जा सकती है। उसे तो महज अपने सरोकारों से मतलब है। इस बात की पूरी संभावना है कि जब ओबामा नई दिल्ली से लौटते वक्त हाथ खिलाकर बाय-बाय का इशारा करेंगे, तो भारत की उम्मीदें भी बाय-बाय कह चुकी होंगी। हिलेरी के दौरे वक्त भी कुछ ऐसा ही हुआ था, बावजूद इसके भारतीय खेमा अमेरिकी विदेशमंत्री के स्वागत की खुमारियों में ही खोया रहा। हिलेरी ने जाते-जाते पाक की तारीफ करने के साथ परमाण अप्रसार संधि पर भारत को बांधने के शिगूफे छोड़ दिए थे। उस वक्त एंड यूजर समझौते पर नई दिल्ली अमेरिका का रुख परिवर्तित करने में सफल हुआ था, लेकिन वो सफलता भी इसलिए मिली क्योंकि उसके पीछे अमेरिका का बहुत बड़ा आर्थिक फायदा छुपा था। भारत चाहता था कि समझौते के तहत अमेरिकी एजेंसियों की निगरानी से उसे आजाद रखा जाए, इसके चलते डील अटकी पड़ी थी। डील के सील लगने के बाद अमेरिकी कंपनियों को भारी-भरकम कमाई होनी थी, सो हिलेरी ने झट से हामी भी दी। ओबामा की यात्रा को किस नजरीए से महत्वपूर्ण कहा जा रहा है, ये बात कम से कम मेरी समझ से तो बाहर है। क्या बराक ओबामा पाकिस्तान के हाथ बांधने वाला कोई एग्रीमेंट कर जाएंगे, या कश्मीर पर भारत के रुख की पैरवी करेंगे। या फिर वो अपनी भारत विरोधी को त्यागकर नए संबंधों का सूत्रपात करेंगे? हकीकत की दूरबीन से देखा जाए तो इस बात की रत्ती भर भी संभावना नहीं है। अगर अमेरिका को पाकिस्तान को कुछ समझाना होता तो हिलेरी ये काम कर गईं होती। क्योंकि इस्लामाबाद में भारत-पाक विदेशमंत्रियों की मुलाकात के बाद कुरैशी के तल्खजुबानी का चैप्टर अभी पुराना नहीं पड़ा था। काबुल में कृष्णा ने उन्हें इससे परिचित भी कराया, इसके बाद भी वो पाक को विकास की खैरात बांट कर चली गईं। अमेरिकी राष्ट्रपति का ये दौरा महज रस्मअदागी मात्र है, हमारे मनमोहन सिंह उन्हें भारत आने का निमंत्रण दे आए थे। इसलिए ओबामा तफरी करने का प्लान बना ही डाला। कहा तो जा रहा है कि भारतीय खेमा अपना पक्ष रखने के लिए दिन-रात तैयारी करने में लगा है, लेकिन ये सारी तैयारी सिर्फ स्वागत समारोह तक ही सीमित रह जाएगी। ओबामा का स्वागत सत्कार इस अंदाज में किया जाएगा कि उन्हें वाशिंगटन के मखमली गद्दी कठोर लगने लगेंगे। इसके अलावा कुछ और होने वाला नहीं है। जो लोग कुछ अच्छे की आस लगाए बैठे हैं उन्हें मायूसी ही हाथ लगने वाली है। खैर असली तस्वीर तो नवंबर में ही सामने आ पाएगी, तब तक भारत को उसकी तैयारियों में मशगूल रहने देते हैं और हम सोचते हैं कि आखिर पाकिस्तान से दोस्ती की खुजाल क्या किसी बी-टेक्स से मिट सकती है या नहीं।
नीरज नैयर
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दृष्टिकोण
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
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