गुरुवार, 22 नवंबर 2012

उधर सरबजीत की फांसी तय, इधर अफजल को फांसी कब?

डॉ. महेश परिमल
अजमल कसाब को आखिर फांसी दे दी गई। इससे यह समझना भूल होगी कि आतंकवाद ही खत्म हो गया। कसाब खत्म हुआ है आतंकवाद नहीं। अभी अफजल गुरु जिंदा है। इसके अलावा ऐसे कई आतंकवादी भी जिंदा हैं, जो या तो जेल में हैं या फिर अपने घर में ही जयचंद बनकर रह रहे हैं। जो जेल में हैं, उनका अंजाम तय है, पर जो घर के भीतर हैं, ऐसे लोग अधिक खतरनाक हैं। इसे छद्म आतंकवाद की संज्ञा दी जा सकती है। बहुत ही खतरनाक होता है यह छद्म आतंकवाद। इसमें आतंकवादी अलग से दिखाई नहीं देता, वह हमारे ही बीच हमारी तरह रहकर आतंकवादी कार्य करता है। कसाब की फांसी के बाद यह तय है कि पाकिस्तान खामोश नहीं बैठेगा। उसके पास अभी सरबजीत की याचिका है, जिसे वह खारिज कर फांसी की सजा मुकर्रर कर सकता है। कसाब की प्रतिक्रिया में सरबजीत की फांसी तय है। पाकिस्तानी प्रेजिडेंट आसिफ अली जरदारी के कार्यालय की मानें तो कसाब की मौत का असर सरबजीत पर होने वाले फैसले पर पड़ सकता है। सूत्रों का मानना है कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान सरकार कसाब की मौत का बदला सरबजीत की क्षमा याचिका को खारिज कर के लेगी। आज सहायक पुलिस इंस्पेक्टर शहीद बाला साहब भोसले की आत्मा को शांति मिली होगी। उसके बेटे ने कहा है कि मुझे लगता है कि हमारी दिवाली आज शुरू हुई। मेरी मां अब चैन की नींद सो पाएंगी। जिसने मेरे बाबा को मुझसे छिन लिया, उसे सरेआम फांसी देनी चाहिए थी।
 कसाब को फांसी से भी बड़ी कोई सजा है, तो वह उसे दी जानी थी। वह एक दरिंदा था, जो लोगों को तड़पता और मरता देखकर खुश होता था। वह एहसानफरामोश था, जो भला करता है, उसी की हत्या करने में भी देर नहीं करता था। सवाल यह उठता है कि आखिर हम आतंकवादियों को क्यों पालते हैं? अफजल गुरु ही नहीं, ऐसे बीस आतंकी हमारे देश में हैं, जिनका गुनाह तो सिद्ध हो चुका है, सजा भी हो चुकी है, पर हम उन्हें सजा नहीं दे पा रहे हैं। फांसी से भी बड़ी कोई सजा हो सकती है क्या? आज हर तरफ 26/11 के आतंकी आमिर अजमल कसाब को दी दी गई फांसी की चर्चा है। इस सजा से कई सवाल और खड़े हो गए हैं। आज देश का बच्चा-बच्चा यही चाहता है कि फांसी से भी बड़ी कोई सजा है, तो वह कसाब को मिलनी चाहिए थी। क्योंकि कसाब के लिए फांसी तो बहुत ही छोटी सजा है। उसने जो अपराध किया है, वह दरिंदगी की सीमाओं को पार करता है। करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का यदि सम्मान किया जाए, तो कसाब को सजा देने के लिए जितना समय लगा, उससे भी कम समय में उसे फांसी हो जानी चाहिए थी। कसाब को फांसी की सजा से यह संदेश जाना चाहिए कि अब भविष्य में कोई भी आतंकी अपने काम को अंजाम देने के पहले सौ बार सोचे।
कसाब को लेकर जो सबसे अधिक चिंता की बात है, वह यह कि कसाब को फांसी देने में आखिर इतना वक्त कैसे लग गया? क्या हमारी न्याय व्यवस्था इतनी लचर है कि देश के दुश्मन को भी सजा देने में इतना समय लगाया जाए। सच्चा न्याय तो वही होता है, जो समय पर मिले। देर से मिलने वाले न्याय का कोई महत्व नहीं होता।  संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी की सजा सुनाने में बरसों बीत गए, इसके बाद भी वह जिंदा है। उसे फांसी पर लटकाने में केंद्र सरकार सांसत में है। वह इसके लिए हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। जब यह बात जोर-शोर से उठी कि अफजल को फांसी क्यों नहीं दी जा रही है, तो सरकार का कहना था कि अफजल गुरु के आगे फांसी की सजा पाने वाले करीब 20 लोग और भी हैं। जब अफजल की बारी आएगी, तो उसे फांसी दे दी जाएगी।
कसाब को फांसी की सजा होना यह अंत नहीं है। फिर कोई आतंकवादी ऐसी हिम्मत न कर पाए, यह कोशिश होनी चाहिए। ऐसे हमले निष्फल हो जाएं, इसकी मंशा भी सजा में होनी चाहिए। होना तो यह भी चाहिए कि अब अगर पड़ोसी देश से आतंकवादी हमारे देश में घुसते हैं, तो उन्हें इस बात का डर होना चाहिए कि यदि यहां पकड़े गए, तो वह जिंदगी मौत से भी बदतर होगी। लेकिन हमारे न्यायतंत्र की प्रRिया को देखकर ऐसा नहीं लगता कि आतंकवादी हमारी न्याय व्यवस्था से डरेंगे। अब आतंकवादी यह अच्छी तरह से समझने लगे हैं कि भारत में किसी भी प्रकार की आतंकी कार्रवाई की भी जाए, तो उसका फैसला देर से होता है और उस पर अमल होने में तो और भी देर होती है। तब तक जिंदगी के पूरे मजे ले लो।
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि इन आतंकवादियों पर हमारे देश का कितना धन बरबाद हो रहा है। 26/11 के दौरान जो आतंकवादी हमारे देश में घुस आए थे, कसाब को छोड़कर सभी मारे गए थे। इन आतंकवादी की लाशें कई महीनों तक सुरक्षित रखी गई थीं, जिस पर  करोड़ों रुपए खर्च हो हुए। कसाब के इलाज पर भी लाखों रुपए खर्च हुए। इन लोगों पर देश का जितना धन खर्च हुआ है, उतना तो 26/11 के दौरान मारे गए लोगों को मुआवजे के रूप में नहीं मिला है।  हमे शर्म आनी चाहिए कि इस देश में वीरों से अधिक सम्मान तो आतंकवादियों को मिलता है। आतंकवादियों को दी जाने वाली सुविधा के सामने सीमा पर तैनात हमारे जांबाजों को मिलने वाली सुविधा तो बहुत ही बौनी है। आखिर आतंकवादियों हमारे लिए इतने अधिक महत्वपूर्ण क्यों होने लगे? कसाब को मौत से पहले मिली वाली तमाम सुख-सुविधाओं को देखते हुए आम युवाओं में यही संदेश जाएगा कि देश का सैनिक बनने से तो बेहतर है, आतंकवादी बनना। मौत कितनी भी भयानक हो, पर जिंदगी तो बहुत ही खुशगवार होगी। युवाओं की इसी तरह की सोच के ही कारण आज देश के युवा भटक रहे हैं। देश के लिए सबसे शर्म की बात तो तब सामने आई, जब सेना में भर्ती के लिए सरकार ने विज्ञापन प्रकाशित किए। यह विज्ञापन नहीं, देश के युवाओं में जमे हुए रक्त का हस्ताक्षर है। आज कोई युवा सेना में जाना ही नहीं चाहता। यह देश का दुर्भाग्य है। एक सैनिक जितना अपनी पूरी जिंदगी में कमाता है, उससे कई गुना तो एक नेता एक महीने में ही कमा लेता है।
शहीद की विधवा के जज्बे को सलाम!
हमें गर्व होना चाहिए शहीद नानक चंद की विधवा गंगा देवी के जज्बे पर। जिसने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर कहा है कि अफजल गुरु को उन्हें सौंप दे। ताकि सरकार में यदि हिम्मत नहीं है, तो वह उसे फांसी दे देगी। गंगा देवी पर हमें इसलिए भी गर्व करना चाहिए कि उसने पति के मरणोपरांत मिलने वाला कीर्ति चR भी लौटा दिया। उनका कहना था कि अफजल को फांसी दिए जाने तक वे कोई सम्मान ग्रहण नहीं करेंगी। एक शहीद की विधवा को और क्या चाहिए। लोग न्याय की गुहार करते रहते हैं, उन्हें न्याय नहीं मिलता। पर एक शहीद की विधवा यदि प्रधानमंत्री से न्याय की गुहार करे, तो क्या उसे भी इस देश में न्याय नहीं मिलेगा? वर्ग भेद की राजनीति में उलझी देश की गठबंधन सरकार से किसी प्रकार की उम्मीद करना ही बेकार है। शहीद की विधवाओं की गुहार संसद तक पहुंचते-पहुंचते अनसुनी रह जाती है। जहां वोट की राजनीति होती हो, वहां कुछ बेहतर हो भी नहीं सकता।शहीद की विधवा ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है ‘मनमोहन सिंह जी अगर आपकी सरकार में अफजल गुरु को फांसी देने की हिम्मत नहीं है, यदि आपको जल्लाद नहीं मिल रहे तो आप यह काम मुझे सौंप दें। मैं शहीद की पत्नी हूं, देश के खिलाफ आंख उठाने वाले को क्या सजा दी जाए, मुझे और मेरे परिवार को मालूम है।’ ‘मैं संसद के 13 नंबर गेट पर जहां मेरे पति शहीद हुए थे वहीं अफजल को फांसी दूंगी।’ राठधाना गांव में अपने घर पर शहीद पति की प्रतिमा के सामने बैठी गंगा देवी ने कहा कि हमले के 11 साल बाद भी अफजल और उसके सभी साथी सुरक्षित हैं। देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है?’ देश के हर नागरिक को यह सोचना चाहिए कि आखिर देश के दुश्मनों को देश के भीतर ही कौन शह दे रहा हे? क्यों पनप रहा है आतंकवाद? हमारे ही आंगन में कौन बो रहा है आतंकवाद की फसल? देश के दुश्मनों से सीमा पर लड़ना आसान है, पर देश के भीतर ही छिपे दुश्मनों से लड़ना बहुत मुश्किल है।
अफजल की बारी कब?
2001 में संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु की फांसी की सजा पर 2005 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुहर लगने के 7 साल बाद भी अमल नहीं हो पाया है। जबकि 2000 में दिल्ली के लालकिले में घुसकर सेना के तीन जवानों की हत्या और 11 को घायल करने वाले लश्कर-ए-तोयबा के आतंकी मोहम्मद आरिफ की फांसी की सजा पर अब तक अदालती कार्रवाई जारी है। 2005 में छह अन्य आरोपियों समेत आरिफ को दोषी मानते हुए ट्रायल कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई। 2007 में हाईकोर्ट ने अन्य आरोपियों को बरी करते हुए आरिफ के खिलाफ फांसी की सजा बरकरार रखी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है। इसी तरह 2002 में गुजरात स्थित अक्षरधाम मंदिर पर हमला कर 31 लोगों को मौत का घाट उतारने वाले लश्कर आतंकियों को फांसी देने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। 2005 में दीवाली के ठीक पहले धनतेरस पर दिल्ली के बाजारों, 2006 में बनारस के संकटमोचन मंदिर और 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में बम विस्फोट करने वाले आतंकियों को सजा मिलने में अभी सालों लग सकते हैं। जबकि इन तीन आतंकी हमले में 300 से अधिक लोग मारे गए थे। खुफिया विभाग (आईबी) के पूर्व प्रमुख व विवेकानंद फाउंडेशन के निदेशक एके डोभाल का मानना है कि आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित होने के बावजूद भारत आतंकियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने में विफल रहा है।अजमल कसाब को जब फांसी की सजा मुकर्रर हुई, उसके बाद संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फांसी पर चढ़ाने के लिए दबाव बनने लगा। लेकिन इस बीच जो बयानबाजी हुई और फाइल इधर से उधर हुई, उससे यह स्पष्ट हो गया कि कई शक्तियां अफजल को बचाने में लगी हुई हैं। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि अफजल को बचाने में कौन-कौन लगे हुए हैं? अब तो यह भी सिद्ध हो गया है कि जिन अफसरों ने अफजल की फाइल को अनदेखा किया, उन सभी को पदोन्नति मिली। इसका आशय यही है कि कई शक्तियां अफजल को बचाने में लगी हैं। एक फाइल चार साल तक 200 मीटर का फासला तय न कर पाए, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? इसको समझते हुए उधर अफजल यह कहा रहा है कि मैं अकेलेपन से बुरी तरह टूट गया हूं। मुझे जल्द से जल्द फांसी की सजा दो। निश्चित रूप से यह भी उसकी एक चाल हो। पर इतना तो तय है कि अफजल पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने मंे केंद्र सरकार के पसीने छूट रहे हैं। देश के हमारे संविधान पर भी ऊंगली उठ रही है, सो अलग। आखिर क्यों हैं इतने लचर नियम कायदे और क्यों है इतने  लाचार हमारे राष्ट्रपति?
डॉ. महेश परिमल

रविवार, 18 नवंबर 2012

बाल ठाकरे को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि


 नवभारत और हरिभूमि में बाल ठाकरे पर केंद्रित मेरे आलेख का लिंक

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

किसानों की परवाह किसे है


किसानों की परवाह किसे है
डॉ. महेश परिमल 
महाराष्ट्र में किसानों का आंदोलन उग्र होता जा रहा है। पुलिस से टकराव में दो किसानों की मौत भी हो चुकी है। विवाद गन्ने के समर्थन मूल्य पर है। किसानों की मांग है कि यह 3000 रुपये प्रति क्विंटल हो, लेकिन कहा तो यह जा रहा है कि शरद पवार की शक्कर लॉबी ऐसा नहीं होने दे रही है। पुणे, सोलापुर और अहमदनगर के साथ-साथ पूरे प्रदेश में किसान सड़कों पर उतर आए हैं। यह अकेले महाराष्ट्र की बात नहीं है। ऐसे हालात पूरे देश में बन रहे हैं। उत्पादों का उचित मूल्य न मिलने के कारण किसान आंदोलन को बाध्य हैं। किसान अपनी लागत भी नहींनिकाल पाते और मुनाफाखोर भारी मुनाफा कमाते हैं। सरकारी नीतियों के कारण त्योहारी मौसम में बाजार में गेहूं का मूल्य 1650-1800 रुपये प्रति क्विंटल पहुंचना इसका ताजा उदाहरण है। एक तरफ तो सरकारी गोदामों में 1285 रुपये कीमत से खरीदा हुआ लाखों टन गेहूं पड़ा है और दूसरी तरफ आम आदमी की रोटी महंगी हो गई है। कहीं खाद और बीज ने समस्याएं खड़ी कर रखी हैं तो कहीं जमीन अधिग्रहण के नाम पर लूट है। उत्तर प्रदेश, हरियाणा सहित दिल्ली से सटे राज्यों में तो यह गंभीर संकट बन चुका है। उद्योग के नाम पर अधिगृहीत जमीनों पर ताबड़तोड़ इमारतें बन रही हैं। इन सबके बीच देश में हर महीने औसतन 70 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। 2008-2011 के बीच 3340 किसानों ने अपनी जान दी। इनमें सबसे अधिक 1862 किसान शरद पवार के गृह राज्य महाराष्ट्र के थे। आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, केरल और पंजाब में भी कर्ज से तंग किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आए हैं। अपने उत्पादों का उचित मूल्य हासिल करके ही किसान इस संकट से उबर सकते हैं, लेकिन सरकार की नीतियों ने किसानों को चौतरफा घेर लिया है। इसके लिए सार्थक पहल की जरूरत है। उपेक्षापूर्ण नीति वर्तमान केंद्र सरकार पर भारी पड़ सकती है। सरकार उद्योगपतियों को जिस तरह से सुविधाएं दे रही है, उससे यही लगता है कि इस देश को अनाज की नहीं, उद्योगों की ज्यादा जरूरत है। सरकार की अनदेखी के कारण ही आज तक कोई स्पष्ट कृषि नीति नहीं बन पाई। यदि बनाई भी गई है, तो उस पर सख्ती से अमल नहीं हो पा रहा है। किसानों की मौत सुर्खियां तो बनती हैं, लेकिन आज तक किसी उद्योगपति ने कर्ज में डूबकर आत्महत्या की हो, ऐसी जानकारी नहीं मिली है। उद्योगों के लिए सरकार ने लाल जाजम बिछा रखे हैं, पर किसानों के लिए समय पर न तो खाद की व्यवस्था हो पाती है और न बीज की। किसान हर हाल में कष्ट झेलता रहता है। इस सरकार को उद्योगपतियों की सरकार कहना गलत नहीं होगा। आज देश में खुद को किसान नेता कहने वाले ही किसानों के शोषण में आगे हैं। इसे किसान नेताओं की विफलता ही कहा जाएगा कि वे आज तक सरकार पर स्पष्ट कृषि नीति बनाने के लिए दबाव नहीं डाल पाए। ऐसे लोग खुद को किसानों का नेता बताकर किसानों को ही धोखा दे रहे हैं। पिछले साल जब हजारों टन अनाज सड़ गया था, तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को लताड़ लगाई थी अगर अनाज को सुरक्षित नहीं रख सकते, तो उसे गरीबों में मुफ्त में बांट दो। कोर्ट के इस रवैये से केंद्र सरकार इतनी अधिक नाखुश हुई कि उसने कोर्ट से ही कह दिया कि वह अपने सुझाव अपने तक ही सीमित रखे। आज पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में कमोबेश यही हालात हैं कि पिछले साल का ही अनाज इतना अधिक है कि इस साल के अनाज को रखने की जगह ही नहीं बची। अनाज का विपुल उत्पादन होने के बाद भी न तो किसानों को अनाज का सही दाम मिल रहा है और न ही नागरिकों को सस्ता अनाज मिल रहा है। क्या हमारे नेता अधिकारी इतने भी दूरंदेशी नहीं कि अनाज सड़े उसके पहले ही वह सही हाथों तक पहुंच जाए। हमारे पास अनाज का विपुल भंडार है, उसके बाद भी देश में भुखमरी है। तेल कंपनियों को होने वाले घाटे की चिंता सरकार को सबसे अधिक है। उनकी चिंता में शामिल होते ही सरकार पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ा देती है, पर कृषि प्रधान देश में सरकार किसानों के लिए कभी चिंतित होती है, ऐसा जान नहीं पड़ता। जब देश में गोदाम नहीं हैं, तो फिर गोदाम बनाना ही एकमात्र विकल्प है। शर्म आती है कि हम उस देश में रहते हैं, जहां अनाज तो खूब पैदा होता है, पर लोग भूख से भी तड़पते हुए अपनी जान दे देते हैं। यह सब सरकारी अव्यवस्था के कारण है। आखिर गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरियां होती हैं। करते रहें किसान आत्महत्या, इन मजबूरियों के आगे किसानों की जान बौनी है। बस तेल कंपनियों को कभी घाटा नहीं होना चाहिए। 
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

शनिवार, 10 नवंबर 2012

यह भाजपा की सबसे बड़ी भूल है

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-11-10&pageno=9#id=111754571932600790_49_2012-11-10http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-11-10&pageno=9#id=111754571932600790_49_2012-11-10


 यह भाजपा की सबसे बड़ी भूल है

डॉ. महेश परिमल
 भाजपा इस समय गहरे संकट से गुजर रही है। जिन नीतिन गडकरी को वह पार्टी के लिए भाग्यशाली मान रही थी, अब वही गडकरी पार्टी के लिए परेशानी पैदा कर रहे हैं। 2014 का लोकसभा चुनाव सामने है। ऐसे में गडकरी को बचाकर भाजपा भारी भूल कर रही है। यह भूल उसे महंगी पड़ेगी। संघ के उर्वर मस्तिष्क को भी शायद लकवा मार गया है, जो गडकरी को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अगर संघ और भाजपा गडकरी को बचाते हैं, तो फिर कांग्रेस भी रॉबर्ट वाड्रा और सलमान खुर्शीद को बचाकर कोई गलत नहीं कर रही है। दोनों में फिर फर्क ही क्या रहा। इसका असर चुनाव में भी दिखाई देगा। अपनी कंपनी के चलते पहले से ही विवाद में उलझे गडकरी ने दाऊद की तुलना स्वामी विवेकानंद से करते वक्त जरा भी नहीं सोचा कि लोगों पर इसका क्या असर होगा? यह बयान सामने आते ही लोगों को लग गया था कि अब गडकरी के दिन लद गए। उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा। खुद गडकरी भी इसके लिए मानसिक रूप से तैयार हो गए थे, पर ऐन मौके पर संघ ने उन्हें क्लीन चिट दे दी। पार्टी के कुछ लोगों को अच्छा लगा होगा, पर अधिकांश नाराज हैं। राम जेठमलानी और महेश जेठमलानी तो खुलकर सामने आ गए हैं। ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के विवादास्पद बयान देने वाले गडकरी अकेले ही हैं। इंदिरा गांधी को इंदिरा इज इंडिया कहने वाले भी इसी देश में हैं, लेकिन दाऊद जैसे मोस्ट वांटेड के साथ विवेकानंद की तुलना करके गडकरी ने अपना ही आईक्यू प्रजा के सामने प्रस्तुत किया है। पार्टी के नेता तो मौन हो गए हैं, पर भीतर ही भीतर कुछ पक भी रहा है। संदेश जा रहा है कि गडकरी का बचाव कर पार्टी ने गलत किया है। वैसे भी कई नेता गडकरी को दूसरा मौका नहीं देना चाहते थे। अनुशासन के नाम पर भाजपा में अनुशासनहीनता चल रही है। साधारण नेता पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ कुछ बोल नहीं पा रहे हैं। संघ शायद समझ रहा है कि लोग हमेशा की तरह गडकरी के इस बयान को भी भूल जाएंगे। इसका असर गुजरात के चुनाव में भी दिखाई देगा। यहां भाजपा विवेकानंद को अपना आदर्श मानकर चुनाव प्रचार कर रही है। चुनावी पोस्टरों में विवेकानंद दिखाई दे रहे हैं, पर अब भाजपा के चुनावी पोस्टर से गडकरी को हटाया जा रहा है। आखिर गडकरी कब तक भाजपा पर बोझ बने रहेंगे?
 (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

भारतीय बाजारों में कहां है महंगाई

डॉ. महेश परिमल
अब तक पूरे देश में महँगाई का बोलबाला था। इस समय जब हम बाजार की ओर देखते हैं, तो लगता है कि इस देश में महंगाई नाम की कोई चीज है ही नहीं। आज बाजार अटे पड़े हैं, विभिन्न प्रकार की वस्तुओं से। दिवाली को लेकर लोगों में उत्साह है। चीनी उत्पादों से बाजार पूरी तरह से सुसज्जित हो गए हैं। जैसे जैसे लोगों को बोनस मिल रहा है, बाजारों में भीड़ बढ़ती जा रही है। यह समझ से परे है कि लोग आखिर समय पर ही खरीददारी क्यों करते हैं? पुष्य नक्षत्र में सोने की जोरदार खरीदी हुई। अब धनतेरस को होगी। सभी क्षेत्रों के बाजार गुलजार हैं। सेल और डिस्काउंट के माध्यम से प्रलोभनों के स्लोगनों से मीडिया भी गुलजार है। इस समय कोई विदेशी यदि भारत आ जाए, तो वह देश को अन्य देशों की तुलना में बहुत ही ऐश्वर्यशाली मानेगा। इस समय देश में गरीबी नाम की किसी चीज के दर्शन ही दुर्लभ हो गए हैं।
इस समय बाजार में इलेक्ट्रानिक्स चीजों की खरीदी जोरों पर है। इलेक्ट्रानिक्स गेजेट का बाजार खूब जोरों पर है। इस समय घर में नई चीजों को लाकर उसे घर में सजाया जाता है। इसमें सेल और डिस्काउंट की खास भूमिका है। यह परंपरा हमें केवल दिवाली ही नहीं, बल्कि अन्य त्योहारों में भी नजर आती है। इन दिनों दुकानों पर सेल या डिस्काउंट का जो बोर्ड दिखाई दे रहा है, वह ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए ही नहीं, बल्कि उनकी जरुरतों को बढ़ाने वाला है। ग्राहक दुकान की सीढ़ियां ही चढ़ पाता है, बाकी काम तो सेल्समेन कर देते हैं। इनसे प्रभावित होकर ग्राहक उन चीजों को भी खरीद लेता है, जिसकी उसे कतई आवश्यकता नहीं होती। इस समय तो साधारण फेरी वाले के भी वारे-न्यारे हो जाते हैं। ग्राहक जो खरीदना चाहता है, उसे व्यापारी बेचना चाहता है। दोनों के बीच ये सेल या डिस्काउंट का बोर्ड सेतु का काम करता है। सभी दुकानों या फिर मॉल में इस तरह के आकर्षित करने वाले बोर्ड मिल ही जाएंगे।
चीनी उत्पाद से बाजार भर गए हैं। भारत की आवश्यकता को देखते हुए जिस तरह से चीन अपने उत्पादों को हमारे देश में खपा रहा है,उससे भारतीय बाजार निश्चित रूप से प्रभावित हो रहा है। चीन से भारत आकर में उसके उत्पाद भारतीय उत्पाद से सस्ते क्यों हैं, यह शोध का विषय हो सकता है। भारत के सभी त्योहारों पर चीनी उत्पाद दिखाई दे ही जाते हैं। फिर चाहे वह पतंग हो, धागे हों, इलेक्ट्रानिक्स आइटम हो,सजावटी सामान हो, सभी उत्पादों पर उसकी पकड़ मजबूत दिखाई देती है। इस समय वे सड़कें भी जनसैलाब से पूरम्पूर दिखाई देती हैं, जहां पहले इक्का-दुक्का लोग आते थे। पिछने दो-तीन दिनों से जिस बाजारों में जनसैलाब उमड़ रहा है, उससे यही लगता है कि लोगों के पास धन की कोई कमी नहीं है। बेकार का रोना रोते हैं लोग, महंगाई के नाम पर। लोगों का मानना यह है कि दिवाली के समय व्यापारी अपना स्टॉक खत्म करना चाहता है, इसलिए सेल या डिस्काउंट के नाम पर अपनी चीजें बेच रहा है। वास्तव में यहां व्यापारियों का सिंडीकेट काम कर रहा है। इसे ग्राहक नहीं समझता। तैयार कपड़े, मिठाई, बरतन, चप्पल-जूते आदि सामानों से लोगों को लुभाने का सिलसिला जारी है। कंप्यूटर या फिर ई कामर्स साइट पर भी इस समय सेल का नजारा देखने को मिल रहा है। अब तो कई कंपनियों बिना क्रेडिट कार्ड पर अपना उत्पाद बेचने को तैयार हैं। ऑर्डर देकर आप घर पहुंचे, तब तक माल आपके घर पहुंच चुका होता है। इटरनेट के माध्यम से लोग अपने परिचितों को गिफ्ट भेजने लगे हैं। फिर वह वस्तु शहर की कोई प्रसिद्ध मिठाई हो, या फिर अपने हाथों से बनाई गई कोई बानगी। इंटरनेट के माध्यम से वह दूसरे देशों तक पहुंचने लगी है। इसमें एक बात ध्यान देने की है, वह है इनकी सर्विस। हम सबने महसूस किया होगा कि आजकल उत्पाद से महत्वपूर्ण है, उसकी सर्विस। लोग सर्विस से ही अपनी पहचान कायम करने लगे हैं।
दिवाली के त्योहार के पहले यह माना जा रहा था कि इस बार इस त्योहार पर महंगाई का असर दिखाई देगा। व्यापारी भी चिंतित थे। पर पिछले दो-तीन दिनों की जबर्दस्त खरीदी ने इस धारणा को झुठला दिया। अभी दिवाली को कुछ दिन शेष हैं, पर इस शनिवार-रविवार को बाजारों में पाँव रखने की जगह भी नहीं मिलेगी, यह तय है। लोग अपने लिए अपनी संतानों के लिए अपने परिजनों के लिए कुछ न कुछ खरीदना ही चाहते हैं।
त्योहारी सेंटीमेंट का फायदा उठाने के लिए अधिकतर बैंक Rेडिट कार्ड पर कैश-बैक ऑफर करते हैं। इस तरह के ऑफर कुछ खास ब्रांड, डिपार्टमेंट स्टोर, अपैरल या रेस्तरां के साथ ही ऑफर किए जाते हैं। बैंक/Rेडिट कार्ड कंपनियां अपनी वेबसाइट पर विस्तृत सूची जारी करती हैं। ऐसे में, आप अपनी पसंद के मुताबिक किसी भी मचेर्ंडाइज पर Rेडिट कार्ड इस्तेमाल कर कैश-बैक ऑफर का मजा नहीं ले सकते हैं। फिर, इस ऑफर का आनंद उठाने के लिए आपको एक निश्चित सीमा तक खर्च करना पड़ता है। यह सीमा बैंक दर बैंक अलग-अलग हो सकती है। हालांकि, यह 1,000 रुपए से लेकर 3,000 रुपए के बीच हो सकती है। बैंक यह कह सकता है कि आपको सभी खचोर्ं पर 10 फीसदी का कैश-बैक मिलेगा, लेकिन इसकी अधिकतम सीमा 1,000 रुपए होगी। तब आप 30,000 रुपए खर्च करके भी सिर्फ 1,000 रुपए का कैश-बैक पाएंगे, न कि 3,000 रुपए। सभी बैंकों की कैश बैक पर सब-लिमिट होती है। ज्यादातर बैंकों के Rेडिट कार्ड पर कैश बैक की मंथली लिमिट होती है। मिसाल के तौर पर कोई बैंक प्रति कार्ड पर कैश बैक की सुविधा 2,500 रुपए तक तय कर सकता है। दूसरा बैंक, हर सेगमेंट के खर्च में 500 रुपए की सीमा तय कर सकता है। ऐसे में कार्ड लेने से पहले इसका पता लगाना जरूरी है। आपको यह भी चेक करना पड़ेगा कि कैश बैक के तहत बैंक डीटीएच या ब्रॉडबैंड सविर्सेज का बिल ऑफर करते हैं या नहीं। ये सेवाएं नई हैं, इसलिए मुमकिन है कि बैंकों ने इसे यूटिलिटी सविर्सेज के दायरे में न रखा हो।
दिवाली का त्योहार है ही खर्च करने के लिए। कहीं से कोई चीज उधार मिल रही है, तो जल्दबाजी कदापि न करें। आप यह समझ लें कि अभी देने वाला आप पर मेहरबान है, पर हमेशा नहीं रहेगा। उसे चीज बेचनी है, इसलिए वह नरम है, जब उसे चीज के दाम लेने होंगे, तो वह कठोर हो जाएगा। तब आप कहेंगे कि चीज देते समय जितने नरम थे, अब उतने नरम क्यों नहीं हैं? पर यह बात वह नहीं समझेगा, वह कठोरता से ही अपना धन लेना चाहेगा। इसलिए अपनी जरुरत और अपनी सीमा को ध्यान में रखकर ही खरीददारी करें। चीज ली है,तो उसका भुगतान करना ही होगा। कोई भी अपनी चीज मुफ्त में देने के लिए नहीं बैठा है। लेते समय हमें तकलीफ नहीं होती, पर देर से उसका भुगतान करने में बहुत ही पीड़ा होती है। इसलिए इसे समझकर ही अपनी समझदारी का परिचय चीजें खरीदते समय दें।
    डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 7 नवंबर 2012

ननद-भाभी की पदयात्रा से कांग्रेस की नींद हराम

डॉ. महेश परिमल
दो महिलाएं, रिश्ते में दोनों हैं ननद-भाभी। जब ये दोनों अपने ऐश्वर्यशाली जीवन को छोड़कर पदयात्रा पर निकलती हैं, तो जनसैलाब उमड़ पड़ता है, इन्हें देखने के लिए। इनमें से एक हैं, जगन रेड्डी की पत्नी और दूसरी महिला हैं जगन की बहन। जगन रेड्डी इस समय जेल में हैं। पति और भाई की छवि को चमकदार बनाने के लिए इन महिलाओं द्वारा की जा रही पदयात्रा कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी करने वाली है। पद यात्रा ने मिलने वाले जन समर्थन ने कांग्रेस की नींद उड़ा दी है। वैसे भी कर्नाटक और आंध्र में कांग्रेस की हालत पतली है। वह अपनी छवि को साफ बनाने के लिए प्रयास करती रहती है। हाल में एस.एम. कृष्णा को विदेश मंत्री पद से हटाकर उन्हें पार्टी के लिए काम करने का आदेश दिया गया है। इससे कांग्रेस की स्थिति में कहां तक सुधार आ पाएगा, कहना मुश्किल है।
आंध्र प्रदेश के चेहरों को नए मंत्रिमंडल में लेकर और पूर्व विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा को कर्नाटक में पार्टी को मजबूत बनाने के लिए कांग्रेस ने एक कोशिश की है। आंध्र में जगन रेड्डी की बगावत ने कांग्रेस को हिलाकर रख दिया है। उधर कर्नाटक में येद्दियुरप्पा की बगावत में कांग्रेस अपना हित खोज रही है। आंध्र में जगन के परिवार वालों ने ही कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी की हैं। जिस तरह से कांग्रेस ने आंध्र प्रदेश को महत्व दिया है, उससे यही लगता है कि आंध्र में डूबती नैया को बचाने के लिए कांग्रेस हाथ-पैर मार रही है। कर्नाटक में कांग्रेस बहुत कुछ खो चुकी है। इसीलिए कृष्णा को भेजकर वह उसकी क्षतिपूर्ति करना चाहती है। उत्तर प्रदेश में मिली करारी हार का कारण कमजोर संगठन माना गया है। इसे स्वयं राहुल गांधी ने भी स्वीकार किया है। इसीलिए अब वह अपना पूरा जोर कर्नाटक पर लगा रही है, ताकि साख बची रहे। जब से येद्दियुरप्पा ने भाजपा से नाता तोड़कर अपनी अलग पार्टी बनाने की घोषणा की है, तब से कांग्रेस वहाँ अपनी सक्रियता दिखाने लगी है। पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा भी  पुत्र कुमार स्वामी के साथ कांग्रेस को तोड़ने में पूरी ताकत लगा दी है।
एक वह समय भी था, जब राजशेखर रेड्डी मुख्यमंत्री थे, तब कांग्रेस के नेता उनकी इजाजत के बिना पानी भी नहीं पीते थे। रेड्डी की यह पूरी कोशिश होती कि केंद्रीय स्तर पर भी आंध्र के किसी चेहरे को प्राथमिकता न दी जाए। वे मानते थे कि आंध्र में उनसे बड़ा कोई नेता है ही नहीं। इस बार मंत्रिमंडल फेरबदल में जयपाल रेड्डी से पेट्रोलियम मंत्रालय छीन लिया गया। राजशेखर होते, तो ऐसा कदापि न होता। उनकी अनुपस्थिति में जयपाल रेड्डी को कांग्रेस ने फालतू मान लिया है। वैसे जयपाल रेड्डी को शायद दबाव के चलते हटाया गया है। उनकी ईमानदारी शायद कांग्रेस को खटक रही थी। कांग्रेस की इसी नीति के कारण राजशेखर रेड्डी के वफादार कांग्रेस के प्रति कम और जगन रेड्डी के लिए अधिक वफादार माने जा रहे हैं। जगन रेड्डी की बहन शर्मिष्ठा और पत्नी भारती ने इस समय अपने ऐश्वर्यशाली जीवन को छोड़कर पदयात्रा शुरू की है। जिसके पति और भाई जेल में हो, उन्हें देखने के लिए लोग उमड़ रहे हैं। कई बार जनसैलाब को संभालना मुश्किल हो रहा है। जगन के प्रशंसकों की भीड़ ने कांग्रेस की नींद हराम कर दी है। राजशेखर रेड्डी ने भी इसी तरह पदयात्रा कर सत्ता प्राप्त की थी। आज इतिहास दोहराया जा रहा है।
आंध्र की सुलगती समस्या तेलंगाना आंदोलन है। कांग्रेस इससे जितना दूर भागने की कोशिश करती है, यह समस्या और भी विकराल होती जा रही है। हालात यही रहे, तो यहां से कांग्रेस का पत्ता कभी भी कट सकता है। राजशेखर की मौत के बाद ही सत्यम कंप्यूटर घोटाला सामने आया। अरबों रुपए की हेराफेरी इस घोटाले में हुई। अभी दो सप्ताह पहले ही सत्यम के डायरेक्टरों की एफडी सील की गई है। कांग्रेस की कमजोरी को देखते हुए भाजपा ने कर्नाटक से अपनी एंट्री ली। वहां वह सत्ता पर भी काबिज हो गई। भाजपा को भी इससे आश्चर्य हुआ। किंतु येद्दियुरप्पा द्वारा किए गए भ्रष्टाचार से भाजपा की बड़ी बदनामी हुई। वैसे भाजपा ने पूरी कोशिश की, कि किसी भी तरह से येदि को बचा लिया जाए। पर पार्टी के लिए येदि काफी महंगे साबित हुए। अंतत: उन्हें भाजपा से निकाल दिया गया। अब भाजपा को कर्नाटक में अपना भविष्य साफ नजर नहीं आ रहा है। कृष्णा के आने के बाद हालात बदलेंगे, ऐसा कांग्रेस सोचती है। पर कृष्णा के मन में विदेश मंत्रालय छिन जाने का गम है, लेकिन गांधी परिवार से उनकी नजदीकियों के चलते वे इस गम को भुलाकर पार्टी के लिए बेहतर काम करेंगे, ऐसा माना जा सकता है। मंत्रिमंडल में फेरबदल कर कांग्रेस ने आंध्र और कर्नाटक पर ध्यान केंद्रित किया है। यह एक चुनौतीपूर्ण समय है। 2014 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस चाहती है कि वहां से अधिक से अधिक सीटें मिलें। आंध्र में लोकसभा की 42 और कर्नाटक में 28 सीटें हैं। दोनों मिलाकर 70 सीटें होती हैं। इसमें से कांग्रेस कितना हथिया सकती है, यही देखना है। एक समय ऐसा भी था, जब इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की पकड़ मजबूत थी। कांग्रेस ने कृष्णा को आंध्र और कर्नाटक में काम करने के लिए कहकर एक सराहनीय काम किया है। विदेश मंत्री रहने के दौरान उनके कार्य उतने सराहनीय नहीं रहे। परंतु गांधी परिवार के करीबी होने के कारण उनका बाल भी बांका नहीं हुआ। अब देखना है कि कृष्ण की बांसुरी बजती है या नहीं। बांसुरी के बजने से सीटें अधिक से अधिक मिल जाएं, तो कांग्रेस का भला ही होगा। कृष्णा भी अपनी स्थिति मजबूत कर लेंगे। इसके लिए चुनाव की प्रतीक्षा करनी होगी।
  डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

सेंडी के साए में होंगे अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव

डॉ. महेश परिमल
पूरे विश्व की नजरें इस समय अमेरिका पर लगी हैं। वहां राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव 6 नवम्बर को है। इस बीच समुद्री तूफान सेंडी ने पूरे अमेरिका में तबाही का मंजर बिछा दिया है। इस दौरान पूरा अमेरिका ही तहस-नहस हो गया। 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका जितना भयभीत नहीं हुआ था, उससे अधिक भयभीत तो वह सेंडी से हो गया। समुद्री किनारों में अब तक कहर बनकर टूटने वाला सेंडी सबसे भयानक था। उत्तर अटलांटिक महासागर में हर वर्ष जून से लेकर नवम्बर तक कई छोटे-मोटे समुद्री तूफान आते रहते हैं। 2005 में अमेरिका के पश्चिम किनारे जो कहर बरपाया था, उसने अमेरिका को बुरी तरह से हिलाकर रख दिया था। 2010 में कनाडा में भी समुद्री तूफान ने कहर बरपाया था। इसकी ताकत सेंडी से भी अधिक थी। राष्ट्रपति चुनाव में अभी पलड़ा भले ही ओबामा का भारी हो, पर रोमनी उन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं, इसमें कोई दो मत नहीं। दोनों में हुई बहस में कई बार तो रोमनी ओबामा पर भारी पड़ते दिखाई दिए। अब चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। हालांकि पूरा देश दु:ख के सागर में हिलोरें ले रहा है। पर यह भी तय है कि इस बार चुनाव में सेंडी का साया अवश्य मंडराएगा। इस बीच परिणाम भी चौंकाने वाले साबित हो सकते हैं।
अमेरिका के मौसम विज्ञानी प्रोफेसर केरी इमेंन्युअल लिखते हैं कि ग्लोबल वार्मिग के लिए मुख्य रूप से अमेरिका ही जिम्मेदार है, अब वह उसकी सजा भुगत रहा है। समुद्र में तूफान किस तरह से आते हैं, इसके लिए हमें थोड़ा-बहुत मौसम विज्ञान को समझना होगा। समुद्र की सतह का तापमान जब बढ़ता है, तब पानी के करीब रहने वाली हवा संतृप्त होकर ऊपर चढ़ने लगती है। यह संतृप्त हवा ऊपर की हवा में रहने वाले पानी की भाप को सघन बनाकर उसका पानी में रुपांतरण करती है। इसलिए बारिश होती है। जिस स्थान से संतृप्त हवा ऊपर जाती है, वहां हलके दबाव का घेरा बन जाने से आसपास की हवा आ जाती है। इसके कारण चक्रवात पैदा होता है। यह चक्रवात जब तक समुद्र में रहता है, तब तक कम विनाशक होता है। पर जैसे ही जमीन पर आता है, उसका रूप आक्रामक हो जाता है। किसी भी समुृद्र का चक्रवात कितना भयानक है, इसे हम उसके कद से पहचान सकते हैं। चक्रवात का कद मापने के लिए उसके केंद्र के सबसे बाहरी भाग के बीच का अंतर मापा जाता है। चक्रवात का कद यदि 222 किलोमीटर से कम है, तो उसे कम विनाशक माना जाता है। यदि चक्रवात का कद 333 से 666 के बीच है, तो उसे मध्यम विनाशक कहा जाएगा। यदि उसका कद 888 किलोमीटर से भी अधिक है, तो उसे महाविनाशनक माना जाएगा। हाल ही में अमेरिका में जो समुद्री तूफान आया था, उसका कद 6500 किलोमीटर था। आप समझ सकते हैं कि वह कितना महाविनाशक होगा। सचमुच उसने अमेरिका को जिस तरह से हिलाकर रख दिया है, उससे उबरने में उसे काफी समय लगेगा।
उत्तर अटलांटिक महासागर में आने वाले समुद्री तूफानों को मौसम वैज्ञानिक अलग-अलग नाम देते हैं। ये नाम पहले से ही तय कर लिए जाते हैं। एक नाम का उपयोग एक ही बार किया जाता है। जापान में समुद्री तूफानों को नाम के बदले नम्बर से जाना जाता है। सन् 2005 के अगस्त में अमेरिका के न्यू ओलियंस और लुइसियाना प्रांतों में समुद्री तूफान ने आतंक मचाया था। इस चक्रवात में 1833 लोगों की मौत हुई थी। यही नहीं 108 अरब डॉलर का नुकसान भी हुआ था। कई इलाकों में कई दिनों तक बिजली गुल हो गई थी। लोग लूटपाट पर उतारू हो गए थे। इस समुद्री तूफान ने अमेरिकी प्रशासन की सारी व्यवस्था को चौपट कर दिया था। अमेरिका की सुरक्षा की सारी पोल इस तूफान ने खोल कर रख दी। तब तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश बुरी तरह से बौखला गए थे।
अभी अमेरिका में जिस सेंडी ने कहर बरपाया, वह इस मौसम का दसवां हरिकेन था। उसका जन्म 22 अक्टूबर को केरेबियन समुद्र में हुआ था। उस समय उसे नाम नहीं दिया गया था। जन्म के 6 घंटे बाद ही उसने विकराल रूप धारण कर लिया था। 24 अक्टूबर को वह जमैका पर टूट पड़ा था। 28 अक्टूबर को उसके रूप को देखते हुए उसका नामकरण किया गया। 25 को वह क्यूबा पर कहर बनकर टूटा। उसके बाद 26 को वह बहामा पहुंचा, तब वह कमजोर हो गया था। लेकिन 27 अक्टूबर को उसने अपनी ताकत फिर बटोरी और उत्तर-पश्चिम होता हुआ अमेरिका की ओर बढ़ गया। उसकी गति देखकर अमेरिका का रक्तचाप बढ़ने लगा था। यह समुद्री तूफान अमेरिका पहुंचने के पहले ही 64 लोगों की जान ले चुका था। अमेरिका ने इससे बचने के तमाम उपाय कर रखे थे, फिर भी भी उसने सारी सुरक्षा व्यवस्थाओं को धता बताते हुए कहर बरपा ही दिया। जब समुद्री तूफान अमेरिका पहुंचा, तब बराक ओबामा राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी में लगे थे। पर जैसे ही सूचना मिली, उन्होंने अपने सारे कार्यक्रम स्थगित करते हुए समुद्री तूफान से बचने की व्यवस्थाओं में लग गए। इसमें उनका स्वार्थ भी था। उन्हें यह अच्छी तरह से पता है कि यदि चुनाव के समय उनका प्रशासन कमजोर साबित हुआ, तो वे जीती हुई बाजी हार सकते हैं। विश्व पर जिस तरह से अकाल, भूकंप, सुनामी, हरिकेन आदि प्राकृतिक आपदाएं बढ़ रहीं हैं, वह मानव जाति के लिए चुनौती है। एक तरह से इसे वेक-अप कॉल भी कह सकते हैं। यदि मानव अब भी इस चेतावनी को अनदेखा करता है और पर्यावरण को बिगाड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखता, तो पूरे मानव जाति खतरे में पड़ जाएगी, यह तय है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

मॉडलिंग की दुनिया का सच



हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख

शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2012

मलाला की मिसाल



http://epaper.jansatta.com/64650/Jansatta.com/26-October-2012#page/6/1
आज जनसत्‍ता के चौपाल के तहत प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

आओ चलें बचपन के गाँव में

भारती परिमल
आओ चलें बचपन के गाँव में, यादों की छाँव में.. कलकल करती लहरों से खेलें, कच्ची अमियाँ और बेर से रिश्ता जोड़े। रेत के घरोंदे बनाकर उसे अपनी कल्पनाओं से सजाएँ। कड़ी धूप में फिर चुपके से निकल जाएँ घर से बाहर और साथियों के  संग लुकाछिपी का खेल खेलें। सावन की पहली फुहार में भीगते हुए माटी की सौंधी महक साँसों में भर लें। ठंड की ठिठुरन, गरमी की चुभन और भादों का भीगापन सब कुछ फिर ले आएं चुराकर और जी लें हर उस बीते पल को, जो केवल हमारी यादों में समाया हुआ है। 
वो सुबह-सुबह मंदिर की घंटियों और अजान की आवाज के साथ खुलती नींद और दूसरे ही क्षण ठंडी बयार के संग आता आलस का झोंका, जो गठरी बन बिस्तर में दुबकने को विवश कर देता, वो झोंका अब भी याद आता है। माँ की आवाज के साथ. खिड़की के परदों के सरकने से झाँकती सूरज की पहली रश्मियों के साथ. दरवाजे के नीचे से आते अखबार की सरसराहट के साथ. चिड़ियों की चीं चीं के साथ. दादी के सुरीले भजन के साथ. दादा के हुक्के की गुड़गुड़ के साथ. सजग हुए कानों को दोनों हाथों से दबाए फिर से आँखे नींद से रिश्ता जोड़ लेती थीं। आँखों और नींद का यह रिश्ता आज भी भोर की बेला में गहरा हो जाता है। इसी गहराई में डूबने आओ एक बार फिर चलें बचपन के गाँव में।
बरगद की जटाओं को पकड़े हवाओं से बातें करना. कच्चे अमरुद के लिए पक्की दोस्ती को कट्टी में बदलना. टूटी हुई चूड़ियों को सहेज कर रखना. बागों में तितलियाँ और पतंगे पकड़ना. गुड्डे-गुड़िया के ब्याह करवाना. पल में रूठ कर क्षण में मान जाना. बारिश की बूँदों को पलकों पे सजाना. पेड़ों से झाँकती धूप को हथेलियों में भरने की ख्वाहिश करना. बादल के संग उड़कर परियों के देश जाने का मन करना. तारों में बैठ कर चाँद को छूने की चाहत रखना. बचपन कल्पना के इन्हीं इंद‎्रधनुषी रंगों से सजा होता है। सारी चिंताओं और प‎्रoAों से दूर ये केवल हँसना जानता है, खिलखिलाना जानता है, अठखेलियाँ करना और झूमना जानता है। तभी तो जीवन की आपाधापी में हारा और थका मन जब-जब उदास होता है, यही कहता है- कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन. बीते हुए दिन की कल्पना मात्र से ही आँखों के आगे बचपन के दृश्य सजीव होने लगते हैं। बचपन एक मीठी याद सा हमारे आसपास मंडराने लगता है। एकांत में हमारी आँखों की कोर में आँसू बनकर समा जाता है, तो कभी मुस्कान बन कर होठों पर छा जाता है। कभी ये बचपन चंचलता का लिबास पहने हमें वर्तमान में भी बालक सा चंचल बना देता है, तो कभी सागर की गहराइयों सा गंभीर ये जीवन क्षण भर के लिए इसकी एक बूँद में ही समा जाने को व्याकुल हो जाता है।
एक बार किसी विद्वान से किसी महापुरुष ने पूछा कि यदि तुम्हें ईश्वर वरदान माँगने के लिए कहे, तो तुम क्या माँगोगे? विद्वान ने तपाक से कहा- अपना बचपन। निश्चित ही ईश्वर सब-कुछ दे सकता है, लेकिन किसी का बचपन नहीं लौटा सकता। सच है, बचपन ऐसी सम्पत्ति है, जो एक बार ही मिलती है, लेकिन इंसान उसे जीवन भर खर्च करता रहता है। बड़ी से बड़ी बातें करते हुए अचानक वह अपने बचपन में लौट जाएगा और यही कहेगा कि हम बचपन में ऐसा करते थे। यहाँ हम का आशय उसके अहम् से कतई नहीं है, हम का आशय वे और उसके सारे दोस्त, जो हर कौम, हर वर्ग के थे। कोई भेदभाव नहीं था, उनके बीच। सब एक साथ एक होकर रहते और मस्ती करते। हम सभी का बचपन बिंदास होता है। बचपन की यादें इंसान का पीछा कभी नहीं छोड़ती। वह कितना भी बूढ़ा क्यों न हो जाए, बचपन सदैव उसके आगे-आगे चलता रहता है। बचपन की शिक्षा भी पूरे जीवन भर साथ रहती है। बचपन का प्यार हो या फिर नफरत, इंसान कभी नहीं भूलता। बचपन की गलियाँ तो उसे हमेशा याद रहती हैं, जब भी वक्त मिलता है, इंसान उन गलियों में विचरने से अपने को नहीं रोक सकता। बचपन में किसी के द्वारा किया गया अहसान एक न भूलने वाला अध्याय होता है। वक्त आने पर वह उसे चुकाने के लिए तत्पर रहता है। कई शहरों के भूगोल को अच्छी तरह से समझने वाला व्यक्ति उन शहरों में भी अपने बचपन की गलियों को अपने से अलग नहीं कर पाता।
बचपन, अमीरी और गरीबी की सीमाओं से परे मासूमियत से भरा होता है। बचपन के सुनहरे संसार में पैसों का मोल नहीं होता। रेशम का कोमल स्पर्श और टाट के पैबंद का खुरदुरापन दोनों को ही बचपन एक जैसा महसूस करता है। याद करें बचपन में कम से कम रुपयों में पिकनिक का मजा और वर्तमान में अधिक से अधिक खर्च करने के बाद भी कुछ न कर पाने का मलाल। हर किसी के बचपन में माँ, पिता, भाई, बहन, दोस्त एक खलनायक की तरह होता है, उस समय उनकी सारी हिदायतें दादागीरी की तरह लगती है। उसे अनसुना करना हम अपना कत्र्तव्य समझते। पर उम्र के साथ-साथ वे सारी हिदायतें गीता के किसी श्लोक से कम नहीं होती, जिसका पालन करना हम अपना कत्र्तव्य समझते हैं। आखिर ऐसा क्या है बचपन में, जो हमें बार-बार अपने पास बुलाता है? बचपन जीवन के वे निष्पाप क्षण होते हैं, जिसमें हमारे संस्कार पलते-बढ़ते हैं। बचपन कच्ची मिट्टी का वह पात्र होता है, जो धीरे-धीरे अपना आकार ग्रहण करता होता है। बचपन उस इबारत का नाम है, जो उस समय धुंधली होती है, पर समय के साथ-साथ वह स्पष्ट होती जाती है।
बचपन की यादों में, बचपन के वादों में, बचपन की लहरों में डूबना-उतराना हमारी खुशकिस्मती है। इसलिए जब भी अवसर मिले बचपन की यादों को वर्तमान की अँजुरी में भर लें और भिगो लंे अपनी पलकों को, क्योंकि ये भीगी पलकें एक मजबूत सहारा है, इस दौड़ती-भागती जिंदगी में खुद को पहचानने का. खुद से रिश्ता जोड़ने का। कभी साँझ की सुहानी बेला में एकांत के क्षणों में अपने आप से रिश्ता जोड़िए और देखिए कुछ देर बाद ही दुनियाभर की यादें हमसे मिलने आ जाएगी और हमारे आसपास यादों का मेला लग जाएगा। इन यादों में बचपन की यादों के झूले होंगे, रिमझिम फुहारों में भीगा मन होगा, कागज की नावें होंगी, तितलियाँ होंगी, माँ की लोरियाँ और पिता का दुलार होगा, मित्रों का स्नेहबंघन होगा और होगा ढेर सारा यादों की मीठी मुस्कानों का कारवाँ, जो ले चलेगा सौंधी माटी के आँचल में। तो आओ सारे रिश्तों से दूर. बचपन से रिश्ता जोड़े और चलें बचपन के एक प्यारे से गाँव में. यादों की छाँव में.।
भारती परिमल

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2012

इस बार मिठाई सबसे ज्यादा जेब काटेगी

डॉ. महेश परिमल
त्योहार का मौसम शुरू हो गया है। लोगों ने खरीदारी करनी शुरू कर दी है। लेकिन महंगाई का असर हर तरफ देखा जा रहा है। सरकार इस मोर्चे पर बुरी तरह से विफल हो चुकी है। वह न तो महंगाई पर अंकुश रख पाई है और न ही घोटालों पर। अब तो यह हालत है कि राबर्ट वाड्रा के मामले में कांग्रेस के सभी नेता दामाद को बचाने में लग गए। किसी ने यह मांग नहीं की कि यदि ऐसा है,तो इसकी जांच होनी चाहिए। यह मामला यदि किसी आम आदमी का होता, तो उस पर आय से अधिक सम्पत्ति रखने का मामला तो बन ही जाता। संभव है जांच के आदेश भी हो जाते। पर आम आदमी की क्या बिसात, जो इस महंगाई से बच पाए। सरकारी आंकड़ों पर जरा भी विश्वास नहीं किया जा सकता। जो बाजार जाते ही नहीं, उन्हें क्या पता कि कौन सी जरुरत की चीज कितनी महंगी हो गई है। आज बाजार में आवश्यक वस्तुओं की कीमत आसमान छू रही हैं।
दिवाली पर आपकी जेब सबसे ज्यादा मिठाई काटेगी, क्योंकि चीनी पिछले साल के मुकाबले 20 प्रतिशती महंगी है। चीनी विRेता कंपनी एसएनबी एंटरप्राइजेज के मालिक सुधीर भालोटिया ने बताया कि दिल्ली में त्योहारी मांग के कारण चार-पांच दिन में ही चीनी 100 रुपए चढ़कर 3,800 रुपए प्रति क्विंटल पर पहुंच गई है। दिवाली तक इसमें 50 रुपए प्रति क्विंटल की तेजी और आ सकती है।
मेवे भी डॉलर की मजबूती से उछल रहे हैं।  मेवों का आयात महंगा हो रहा है। इसलिए बादाम 40 रुपए महंगा होकर 470 से 550 रुपए और काजू भी इतना ही उछलकर 560 से 800 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है। थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई 10 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंचते हुए 7.81 प्रतिशत हो गई है। इस ऊंची महंगाई दर का कारण सितम्बर माह में गेहूं, मोटा अनाज, दलहन, तिलहन, शक्कर, सब्जी और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी होना बताया गया है। 24-27 सितम्बर के बीच ‘ग्लोबल रिसर्च इप्सोस’ द्वारा ‘मूड ऑफ द नेशन’ सर्वे किया गया था। उसके मुताबिक 78 प्रतिशत से अधिक लोगों ने यह माना कि इस बार त्योहारों पर बढ़ती महंगाई की वजह से वे बहुत संभलकर खर्च करेंगे। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने वर्ष 2012-13 की मैRो इकोनॉमिक एंड मानिटरी डेवलपमेंट रिपोर्ट में कहा है कि भारत में अन्य विकासशील देशों की तुलना में खाद्य महंगाई दर दोगुनी है और अर्थव्यवस्था में अभी महंगाई बढ़ने की प्रवृत्ति मौजूद है।
वस्तुत: इस समय देश में महंगाई आंतरिक कारणों के साथ-साथ वैश्विक कारणों से भी प्रभावित हो रही है। दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थ के बढ़ते हुए दाम भारत में भी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ा रहे हैं। दुनिया में खाद्यान्न उत्पादन में भारी कमी देश में भी खाद्य महंगाई को बढ़ाने का एक प्रमुख कारण है। अमेरिका में भयावह सूखे के कारण खाद्यान्न आयातक देशों के द्वारा अनाज की बड़े पैमाने पर अग्रिम खरीद की जा रही है। अमेरिका के 48 राज्यों के 60 प्रतिशत इलाकों में सूखा पड़ चुका है। वर्ष 1956 के बाद का यह अमेरिका का सबसे बड़ा सूखा है। चीन भी सूखे को लेकर चिंतित है क्योंकि चार वर्ष पहले उसे जिस खाद्यान्न आयात के कारण खाद्य महंगाई का सामना करना पड़ा था, उसी तरह उसे अब ज्यादा खाद्यान्न का आयात करना पड़ रहा है। रूस में भी खाद्यान्न उत्पादन की स्थिति ठीक नहीं है।
ऑस्ट्रेलिया और यूRेन भी कम बारिश के कारण खाद्यान्न संकट का सामना कर रहे हैं। हालांकि खाद्यान्न की बढ़ती कीमत में अमेरिका और अन्य विकसित देशों के बायो-फ्यूल का भी हाथ है। स्थिति यह है कि दुनिया में खाद्यान्न की महंगाई ठीक उसी तरह नजर आ रही है, जैसी 2008 के वैश्विक खाद्यान्न संकट के समय थी। वस्तुत: हमारे देश में पिछले दो-तीन वषरे में महंगाई धीरे-धीरे बढ़ती रही है। अब अर्थव्यवस्था की यह स्थिति है कि महंगाई दर ऊंची है, ब्याज दर भी ऊंची है; साथ ही विकास दर में भी गिरावट है। ऐसे में अब केवल आरबीआई के मौद्रिक कदमों से महंगाई का मामला सुलझने वाला नहीं है। महंगाई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। चूंकि अब देश में आर्थिक सुधारों का दूसरा दौर शुरू हो गया है और इसके कारण विभिन्न सब्सिडियां कम होने से लोगों को महंगाई का अहसास और अधिक होगा। ऐसे में जहां सरकार के द्वारा महंगाई नियंत्रण के सारे प्रयास जरूरी होंगे, वहीं लोगों को भी महंगाई से निबटने के लिए व्यक्तिगत प्रयास करने होंगे। हम खाद्यान्न की बढ़ती हुई महंगाई की चुनौती का मुकाबला करने के लिए दक्षिण कोरिया से सबक ले सकते हैं।  मौजूदा वर्ष में कुछ महीने पहले दक्षिण कोरिया भी कमोबेश महंगाई की भारत जैसी ही समस्या का सामना कर रहा था। वह बढ़ते मूल्यों के साथ ऊंची ब्याज दर और मंदी से जूझ रहा था। इस स्थिति से निपटने और महंगाई पर नियंत्रण के ठोस उपायों को बताने हेतु दक्षिण कोरिया के नॉलेज इकोनामी मंत्रालय ने एक कार्यबल गठित किया था। इस कार्यबल ने पाया कि कुछ बड़े कारोबारियों ने गैस स्टेशनों के साथ सौदे करके ईधन की खुदरा कीमतों को वास्तविक कीमत से कहीं ऊपर कर दिया था। इसी तरह कई और कारोबारियों ने जरूरत की वस्तुओं की आपूर्ति में गतिरोध डालकर उनकी कीमतें बढ़ा दी थी।
कार्यबल की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने कड़े नियमों और कठोर कार्रवाइयों से आपूर्ति क्षेत्र के गतिरोधों को तत्काल दूर कर दिया। परिणाम यह हुआ कि दक्षिण कोरिया में अब खाद्यान्न कीमतों पर नियंत्रण दिखाई दे रहा है। इतना ही नहीं, दक्षिण कोरिया में सितम्बर 2012 में महंगाई दर दो प्रतिशत के इर्द-गिर्द ही रही है। निश्चित रूप से इस समय भारत में खाद्यान्न के पर्याप्त उत्पादन के बाद भी महंगाई की जो स्थिति है उसके लिए काफी हद तक आपूर्ति क्षेत्र की समस्याएं जिम्मेदार हैं। खाद्यान्न की थोक व फुटकर कीमतों में अंतर पहले की तुलना में बढ़ा है, स्टॉकिस्ट व सटोरिए बाजार पर हावी हैं। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि खाद्यान्न उत्पादक और उपभोक्ताओं के बीच मध्यस्थ भारी मुनाफा लेते हुए मूल्य वृद्धि का कारण बने हुए हैं। सार्वजनिक वितरण पण्राली (पीडीएस) कारगर भूमिका नहीं निभा पा रही है। ऐसे में सरकार को खाद्यान्न की कीमतों को नियंत्रित करने, मध्यस्थों के मुनाफे को कम करने तथा आपूर्ति बढ़ाने के परिप्रेक्ष्य में दक्षिण कोरिया की तरह कड़े कदम उठाने चाहिए। सरकार को खुले बाजार में खाद्यान्न की सप्लाई बढ़ा देनी चाहिए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आवंटित किए जाने वाले अनाज का वितरण लाभार्थियों तक सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अब दाल, खाद्य तेल और चीनी की भंडारण सीमा तय की जानी चाहिए। चूंकि स्टॉक लिमिट का अधिकार राज्य सरकारों के पास है, इसलिए राज्यों को महंगाई थामने में केंद्र की मदद करनी चाहिए।
चूंकि कृषि जिंसों के वायदा बाजार में सटोरिए पूरी तरह सRिय हैं, इसलिए कृषि जिंसों के वायदा कारोबार पर प्रतिबंध जरूरी है। इस समय उड़द, अरहर व चावल के वायदा कारोबार पर प्रतिबंध है, लेकिन गेहूं, चीनी, सोया तेल, सरसों बीज, सोयाबीन आदि कृषि जिंसों का वायदा खुला हुआ है। अत: इन आवश्यक कृषि जिंसों के वायदा कारोबार पर रोक लगाई जानी चाहिए। कृषि जिंसों की कीमतें बढ़ने से संबंधित अधिकांश अध्ययन रिपोर्ट्स में यह निष्कर्ष उभरकर आ रहा है कि भारत में जबसे कृषि जिंसों का वायदा व्यापार शुरू किया गया है, तभी से खाद्यान्नों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है।
यह उल्लेखनीय है कि पेट्रोलियम पदार्थ की कीमतों से भारत ही नहीं अमेरिका व दुनिया के दूसरे विकसित देश भी प्रभावित हो रहे हैं। इन देशों के लोग पेट्रोल, डीजल व गैस की महंगाई से बचने के लिए साइकिलों का उपयोग बढ़ा रहे हैं। न्यूयॉर्क शहर में एक योजना बन रही है, जिसके तहत शहर में 15 हजार साइकिलें उपलब्ध कराई जाएंगी। जिन्हें कोई भी किराए पर लेकर इस्तेमाल कर सकेगा। यूरोप और चीन में भी पेट्रोल और डीजल की मूल्यवृद्धि से बचाव के लिए लोग खूब साइकिलिंग कर रहे हैं। हम भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों से राहत हेतु कम दूरी के लिए साइकिल के उपयोग को प्रोत्साहन दे सकते हैं। अधिक दूरी के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। इससे लोगों को परिवहन संबंधी खर्च में कमी का लाभ मिल सकेगा। गौरतलब है कि दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में सार्वजनिक परिवहन पण्राली से लोग बड़ी संख्या में लाभान्वित हो रहे हैं और अर्थव्यवस्था को भी लाभ हो रहा है। उदाहरण के लिए जापान की राजधानी टोकियो में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था प्रतिदिन 80 लाख लोगों को लाभान्वित करती है। इसी तरह दुनिया के कई चमकीले शहरों जैसे लंदन, सिंगापुर, सिडनी आदि में सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था इतनी अच्छी हो चुकी है कि लोग कार्यालय आने-जाने में सार्वजनिक परिवहन का ही उपयोग करते हैं। हमें देश के सभी शहरों में कारगर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की आवश्यकता है। देश में करीब पांच हजार शहरों में कारगर सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था लोगों के आवागमन खर्च को कम कर सकती है। नि:संदेह ऐसे कदमों से देश में करोड़ों लोगों को मूल्यवृद्धि की पीड़ा से राहत दिलाई जा सकेगी।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

फेलिक्‍स के पराक्रम की प्रासंगिकता




हरिभूमि के संपादकीय पेज पर  प्रक‍ाशित मेरा आलेख 
http://epaper.haribhoomi.com/epapermain.aspx

शनिवार, 20 अक्टूबर 2012

हमें हमारी रातें वापस कर दो, हम जीना चाहते हैं

डॉ. महेश परिमल
प्रकाश प्रदूषण, भला यह भी कोई बात हुई। अब तक तो हमने ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण आदि सुना था, अब यह प्रकाश प्रदूषण क्या बला है? आज जिस तेजी से हमारे बीच प्रकाश प्रदूषण फैल रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है। पर हमारा ध्यान इस दिशा में कभी गया ही नहीं। जिस तरह से पृथ्वी पर जीवसृष्टि और वनस्पति के लिए प्रकाश का महत्व है, उतना ही महत्व अंधेरे का है। पर अंधेरा है कहाँ? सोडियम, मर्करी आदि जैसी तेज लाइटों के कारण आज वन्य जीवों का जीना दूभर हो गया है। जहाँ जाओ, वहाँ तेज रोशनी का उजाला, आखिर कई काम ऐसे होते हैं, जिसे अंधेरे में ही होने चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है। इस प्रकाश प्रदूषण से आज पक्षी जगत, पशु जगत बुरी तरह से हलाकान है। वे सब चीख-चीखकर कह रहे हैं हमें हमारे अंधेर वापस दिला दो, हम जीना चाहते हैं। हमें हमारी रातें वापव कर दो, नहीं चाहिए हमें ये आँखें चौंधियाने वाली रोशनी। हम अंधेरे में ही भले।  
        पिछले साल जुलाई में कनाडा के एडमोंटन में सोसायटी फॉर कंजर्वेशन बायोलॉजी की एक बैठक प्रकाश प्रदूषण को लेकर हुई। इस बैठक में कई देशों के प्रतिनिधि शामिल थे। सभी ने एक राय से यह कहा कि अब समय आ गया है कि वन्यजीवों को उनकी रातें वापस की जाए। आजकल हो यह रहा है कि अमावस्या की काली रातें भी अब प्रकाशमय होने लगी हैं। शहरों, राजमार्गो, पर्यटन स्थलों, चौराहे आदि अब जगमगाने लगे हैं। जंगलों से होकर गुजरने वाली सड़कें भी भले सुनसान रहे, पर रोशनी से जगमगाती अवश्य हैं। इस दौरान इस हिस्सों में रहने वाले जीव-जंतु, वनस्पति आदि का जीवनचक्र प्रभावित होने लगा है। अब तो शहरों में भी तारों भरी अंधेरी रात दिखने को नहीं मिलती। हम तेज रोशनी के इतने अधिक आदी हो चुके हैं कि अंधेरी रातें हमें काट खाने को दौड़ती हैं। ऐसे में अमेरिका के उटार के ‘ओवाकोमब्रीज’को ‘डार्कस्काय पार्क’ नाम दिया गया है। यह नाम इंटरनेशनल डार्कस्काय ऐसोसिएशन ने दिया है। डार्कस्काय पार्क यानी अंधेरे आकाश का बगीचा। वहाँ अभी भी तारों भरी अंधेरी रात देखने को मिलती है। निशाचर प्राणियों के लिए यह एक वरदान है कि उनके हिस्से अंधेरी रातें हैं। इंसान अपना अधिकांश काम दिन में करता है, इसलिए उसे रोशनी पंसद है। पर वनस्पतियों और निशाचरों के लिए अंधेरे का काफी महत्व है। रात में उजाला होने से कई लाभ हो सकते हैं, पर हानियाँ भी कई हैं। इसे ही कहते हैं प्रकाश प्रदूषण। इससे इंसान तो ठीक, पर निशाचर अपनी कई क्रियाएँ जैसे प्रजनन, स्थानांतरण, बच्चों को खिलाना जैसे काम नहीं कर पा रहे हैं। तेज रोशनी हमारे भीतर इस तरह से बस गई है कि ये रोशनी दूसरे अन्य प्राणियों के लिए कितना विध्वंसक असर कर रही है, इसका अंदाजा शायद हमें नहीं है। संसार में कई जीव ऐसे हैं, जो अपने कई काम अंधेरे में ही करते हैं। आपको मालूम है कछुए की तरह चलने वाला एक दरियाई प्राणी है। उसके अंडों से निकलने वाले ताजा बच्चे चाँदनी में समुद्र तट पर जाने के बजाए तेज रोशनी वाले रिसोर्ट की तरफ आकर्षित होने लगे हैं। यही हाल पक्षियों का है, वे भी इस रोशनी से आकर्षित होते हैं, लेकिन बिजली के तारों में उलझकर अपने प्राण गँवाते हैं।
जंगलों का लगातार होता नाश, बढ़ता शहरीकरण, दूर-दूर आबादी ही आबादी, ऐसे में निशाचर प्राणियों की वंशवृद्धि, व्यवहार कैसे संयमित हो पाएगा? प्रकाश प्रदूषण ने उनके जीवन मंे खलल पैदा कर दिया है। कनाडा में हुई उक्त बैठक में यह तय किया गया कि अब जब भी रोशनी स्थापित करने की बात हो, तो वन्य जीवों की तरफ भी ध्यान दिया जाए, ताकि उनका जीवन सुचारू रूप से चलता रहे। इस बैठक की अध्यक्षता करने वाले ट्रेविस बोंगकोर ने आवेशपूर्ण शब्दों में कहा कि तेज रोशनी के कारण कई पक्षी अपना रास्ता बदलने लगे हैं। सोडियम लैप की पीली रोशनी में कई चमगादड़ अपना रास्ता भटक गए, बाद में पता चला कि इसमें से अधिकांश गर्भवती थीं। बोंगकोर इंग्लैंड यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ केलिफोर्निया में प्रोफेसर हैं। कई प्रजाति के पक्षी रात में भी प्रवास करते हैं, जगमगाते टॉवरों, इमारतों के कारण वे भ्रमित हो जाते हैं। उन्हें भ्रांति हो जाती है, वे उस जगमगाते टॉवरों, इमारतों के चारों ओर चक्कर लगाने लगते हैं। कई बार इससे टकराकर अपने प्राण गवाँ देते हैं। एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि अमेरिका के लोरिडा स्थित एक टीवी टॉवर के पिछले 25 वर्षो के सर्वेक्षण में यह बात सामने आई कि 189 जाति के 42 हजार से अधिक पक्षी मौत के घाट उतर गए।
अमेरिका के न्यूयार्कसिटी की फ्रोर्धान यूनिवर्सिटी की सूचना के अनुसार अब शहरी पर्यावरण पक्षियों के रास्तों की जानकारी लेने के लिए माइक्रोफोन और राडार का उपयोग किया जाता है। शोध से यह बात सामने आई कि अधिकांश पक्षी अपना रास्ता अधिक शांत और गहरी काली रात में ही तय करते हैं। लेकिन जगमगाती रोशनी के कारण ये भटकने लगे हैं, इन्हें दिशा ज्ञान नहीं रहता, तब ये विचित्र आवाजें करने लगते हैं, जिसका आशय यही होता है कि ये तेज रोशनी के कारण ये भटक गए हैं। शोध में यह बात भी सामने आई है कि एलआईडी लाइट को छोड़कर शेष सभी लाइटें वन्य प्राणियों के लिए हानिकारक होती हैं। हमने भी देखा होगा कि ऊँची-ऊँची इमारतों के आसपास पक्षियों के शव बिखरे पड़े होते हैं। जहाँ भी तेज लाइटें होती है, ऐसे स्थानों पर इस तरह के हादसे आम हैं। समुद्र किनारे आने वाले पक्षियों की स्थिति पर अध्ययन होने लगा है। कई रोशनी कुछ प्राणियों के लिए लाभदायक होती हैं, तो कुछ के लिए हानिकारक। इसलिए यदि रात की रोशनी को कुछ हल्का कर दिया जाए, तो निशाचरों के लिए आसानी होगी।
यह तो तय है कि तेज रोशनी इंसानों को भी विचलित कर देती है। फिर पशु-पक्षियों की क्या बिसात? लेकिन इसके बिना आज मानव जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इंसानों के लिए आजकल रात-दिन समान होने लगे हैं। कई लोग रात ड्यूटी ही पसंद करते हैं। बरसों से उन्हें दिन ड़्यूटी मिली ही नहीं, ऐसे मंे उनका जीवन चक्र गड़बड़ा जाता है। यही हाल पशु-पक्षियों का है, वन्य प्राणियों की हालत तो और भी खराब है। वन रहे नहीं, आबादी का दबाव चारों ओर से बढ़ रहा है। ऐसे में कहाँ जाएँ? अभयारण्यों में वह माहौल नहीं मिल पाता, वहाँ भी रोशनी का साम्राज्य है। इसलिए अब चारों तरफ से यही आवाजें आने लगीं हैं कि हमें हमारी रातें वापस कर दो, हमें अंधेरा चाहिए, हम जीना चाहते हैं, हमें इस तेज रोशनी से मुक्ति दो!
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

क्या हरियाणा रेप हब बनने जा रहा है?

डॉ. महेश परिमल
अब तक लोग पुणे को एजुकेशनल हब, बेंगलुरु को आई टी हब कहते नहीं अघाते थे, लेकिन अब हरियाणा को रेप हब कहा जाए, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। बलात्कार का मनोविज्ञान कहता है कि युवतियाँ जींस और टी शर्ट पहनतीं हैं, इसलिए बलात्कार की घटनाएं बढ़ रहीं हैं। यह दलील नारीवादियों को अस्वीकार्य है। सवाल यह उठता है कि देश में अगर ओम प्रकाश चौटाला जैसे नेता हों, जो यह कहते हों कि लड़कियों की शादी 15 वर्ष से पहले कर दी जानी चाहिए। तो ऐसे बयान देने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं होते। क्या भूतपूर्व मुख्यमंत्री को यह नहीं पता कि इस देश में बाल विवाह पर प्रतिबंध है। भड़काऊ बयान देने वालों पर सख्ती न होने के कारण ही इस तरह के बयान बार-बार सामने आ रहे हैं। फिर हरियाणा में दलित युवतियों के साथ ही अनाचार हो रहे हैं, तो फिर क्या वे इतनी सक्षम हैं कि जींस-टी शर्ट पहनें? एक ही महीने में 15 से अधिक अनाचार की खबरों से हरियाणा की कांग्रेस सरकार हड़बड़ा गई है। इसी सरकार को बचाने के लिए ही कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी ने अनाचार का भोग बनी दलित महिलाओं से भेंट की। वहां जाकर उन्होंने यही बयान दिया कि अनाचार केवल हरियाणा में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में हो रहे हैं।
इस गंभीर मामले पर केवल बयानबाजी ही हो रही है। समस्या की गहराई में जाने की फुरसत किसी के पास नहीं है। कोई इसे राजनीति का रंग दे रहा है, तो कोई इसे मानवीय समस्या बता रहा है। वास्तव में यह समस्या असमान आर्थिक विकास के कारण सामने आई है। दिल्ली से लगे हरियाणा सरकार एक तरफ तो उद्योगपतियों और बिल्डरों को तमाम सुविधाएं दे रही है। इसलिए समाज में धनाढ्य वर्ग उभरकर सामने आ रहा है। इसके अलावा कई किसानों ने अपनी जमीन उद्योगपतियों को बेचकर काफी सम्पत्ति अर्जित की है। इस वर्ग के युवाओं में निरंकुशता देखी जा रही है। यह वर्ग अपने रसूख का बेजा इस्तेमाल कर अपराधों में शामिल हो रहे हैं। दूसरी तरफ ऐसे गरीब किसान और भूमिहीन मजदूर भी हैं, जो इस समय पूरी तरह से कंगाल हो गए हैं। इन्हीं दलितों और गरीबों की कन्याओं और महिलाओं को उच्च वर्ग के युवाओं द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है। इनके पास धन-सम्पत्ति क अलावा ऊंची राजनीतिक पहुंच होने के कारण दलितों की फरियाद सुनने वाला कोई नहीं है। हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बारे में कहा जाता है कि वे दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर रोक लगाने की दिशा में गंभीर नहीं हैं। उनके साथियों को भी यही लग रहा है कि वे कानून अपने हाथ में लेने वाली खाप पंचायतों को लेकर एक अलग ही विचार रखते हैं। इसलिए सोनिया गांधी ने अपने भाषण में खाप पंचायतों को जमकर लताड़ा था। हरियाणा में स्थिति यह है कि खाप पंचायतों के सहयोग के बिना कोई भी दल सत्ता में नहीं आ सकता। इसे शायद कांग्रेसाध्यक्ष नहीं समझ पा रही हैं।
हमारे देश में खाप पंचायतों की स्थापना का इतिहास काफी पुराना है। ये ग्राम पंचायतें अपने आप में एक स्वतंत्र सत्ता थी। आजादी के बाद जब गांधीजी ने ग्राम सुराज की कल्पना की, तो उसके केंद्र में यही ग्राम पंचायतें ही थीं। पंचायती पद्धति के इस स्वराज्य के बदले में हमारे यहां अंग्रेज पद्धति का संसदीय शासन आया। इस प्रणाली में सत्ता के सारे अधिकार केंद्र और राज्य में होती है। हरियाणा की खाप पंचायतें उसी प्राचीन परंपरा की निशानी हैं। पर आधुनिक काल में ये पहले से अधिक निरंकुश हो गई हैं। इनके फैसले आजकल विवादास्पद होने लगे हैं। इस समय हरियाणा में जिस तरह से अनाचार के मामलों में वृद्धि हो रही है, उस पर खाप पंचायतों के अपने विचार हैं। वे इस पर अंकुश लगाने के लिए सुझाव देती हैं। उनका कहना है कि आजकल युवतियां जींस-टी शर्ट जैसे कामोत्तेजक कपड़े पहनती हैं, इसलिए पुरुषों का ध्यान उन पर जाता है। उनके अनुसार युवतियों के हाथ में मोबाइल आने से प्रेम प्रकरणों में भी काफी वृद्धि हुई है। इसके अलावा फिल्में एवं धारावाहिकों में जिस तरह से खुले सेक्स की बात की जाती है, उसके कारण भी अनाचार की घटनाएं हो रही हैं। अनाचार पर अंकुश लगाना है, तो बेटियों की शादी 15 साल की उम्र में ही कर दी जाए। खाप पंचायतें सरकार से मांग कर रही हैं कि लड़कियों की शादी की उम्र 18 से कम कर 15 कर दी जाए। खाप पंचायतों की इस मांग को मानने में सरकार किसी भी तरह से तैयार नहीं है। लेकिन अब सरकार के इस दिशा में गंभीरता से सोचना ही होगा। समाजशास्त्री ही नहीं, अब चिकित्सक भी मानने लगे हैं कि आज की कन्याएँ समय से पहले ही परिपक्व होने लगी है। एक तो फास्ट फूड दूसरे आकाशीय माध्यम से होने वाली ज्ञान वर्षा यानी टीवी और कंप्यूटर से लोगों के ज्ञान में तेजी से वृद्धि हो रही है। लड़कियां छोटी उम्र में ही बहुत कुछ समझने लगती हैं। इसके अलावा विजातीय आकर्षक भी उनमें समय से पहले आ रहा है। टीवी-कंप्यूटर के माध्यम से वे अपने शरीर के अवयवों के बारे में अच्छी तरह से समझने लगी हैं। इसके अलावा हम उम्र से बातचीत में भी वे काफी कुछ समझने लगी हैं। इसलिए ऐसा नहीं कहा जा सकता कि लड़की की उम्र कम है, इसलिए वह परिपक्व नहीं हुई है। छोटी उम्र में ही मासिक स्राव ही इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सबसे बड़ी बात यह है कि जब सरकार ही 16 वर्ष की कन्या से यौन संबंध बनाने के लिए हां कहती है, तो फिर उस उम्र में शादी के लिए इंकार क्यों कर रही है?
हाल ही में हरियाणा में 100 शक्तिशाली खाप पंचायतों की महापरिषद का आयोजन हुआ था। इसमें स्त्री भ्रूण हत्या के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया था। अब तक खाप पंचायतों की बुराई करने वाला मीडिया इस खबर से अनजान रहा। यदि जानकारी होगी भी तो इसे अधिक प्रचारित नहीं किया गया। सरकार पहले खाप पंचायतों की ताकत को समझे, उसकी बुराई करना छोड़ दे। उसकी ताकत का इस्तेमाल यदि सकारात्मक रूप से लिया जाए, तो संभव है हम सब इस खाप पंचायत को सम्मान की दृष्टि से देखें। खाप पंचायत द्वारा जो प्रस्ताव पारित किया गया है, उसका असर बहुत ही जल्द दिखाई भी देगा।
खाप पंचायतों का गलत स्वरूप ही समाज के सामने लाया गया है। हमें इसके फैसले पर गौर करना होगा। इसमें बुजुर्ग लोग ही मुखिया होते हैं। वे अपने अनुभव के आधार पर निर्णय लेते हैं। उनके नकारात्मक निर्णय तुरंत ही मीडिया में छा जाते हैं, लेकिन समाज को बदलने वाले, मान्यताओं को झुठलाने वाले, परंपरा से हटकर लिए गए फैसले मीडिया में नहीं आते। इसलिए अब समय है कि पहले हरियाणा को समझा जाए, उसकी बदलती तासीर को समझा जाए, फिर खाप पंचायतों को समझने की कोशिश की जाए। अनाचार से बड़ा अपराध है, अनाचार के लिए माहौल बनाना। ये माहौल इस समय हरियाणा में बन रहा है। अब सभी जगह बनेगा या बन रहा है। सरकार यह कोशिश करे कि ऐसा माहौल ही न बन पाए। नारी की अस्मिता को समझने की कोशिश की जाए। नारी विहीन समाज की कल्पना करके बताया जाए कि बिना नारी के समाज कैसा कुरूप होगा। इसके बाद कानून को खिलौना न बनने दिया जाए। आज रसूखदारों के लिए कानून खरीदना आम बात हो गई है। अनाचारियों को जो सजा होती है, उसे खूब प्रचारित किया जाए, तो लोगों में कानून का खौप हो। जब तक लोग कानून से डरना नहीं सीखेंगे, तब तक अनाचार ही क्यों अन्य बड़े अपराध भी होते ही रहेंगे।
   डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

जयराम रमेश ने कतई गलत नहीं कहा.

डॉ. महेश परिमल
जिस तरह से घर में मंदिर आवश्यक है, ठीक उसी तरह से घर में शौचालय का होना भी अतिआवश्यक है। हम अपनी तमाम उपलब्धियों पर भले ही गर्व कर लें, सीना ठोंक लें, पर जब तक देश की आधी आबादी मुक्ताकाशी शौच के लिए विवश है, तब तक हमारी सारी उपलब्धियाँ किसी काम की नहीं। घर की महिलाएं शौच के लिए बाहर जाएं, इससे बड़ा कलंक तो हो ही नहीं सकता? जयराम रमेश ने कतई गलत नहीं कहा। शौचालय में हमारे ही शरीर की गंदगी जाती है, इसलिए वह किसी मंदिर से कम नहीं। आखिर मंदिर में भी हम अपनी बुराई दूर करने की कामना ही तो करते हैं। शौचालय तो हमारे शरीर की गंदगी ग्रहण करता है। फिर भला वह कैसे अपवित्र हुआ? हमारे देश की आबादी अभी 121 करोड़ है। इस आंकड़े के अनुसार देश की 49.8 प्रतिशत लोगों के पास शौचालय नहीं है। यानी कि 60 करोड़ से अधिक लोग आज भी मुक्ताकाशी शौच करते हैं। इसमें महिलाएं भी शामिल हैं। इसके अलावा बीमार पड़े बुजुर्ग भी इसी हालत में हैं। जनगणना रजिस्ट्रार जनरल सी. चंद्रमौली कहत हैं कि यह एक अनोखा विरोधाभास है कि हमारे देश में 63.2 प्रतिशत लोगों के पास टेलीफोन कनेक्शन हैं, इसमें 53 प्रतिशत के पास मोबाइल कनेक्शन हैं। आंकड़े के अनुसार झारखंड में सबसे अधिक 77 प्रतिशत लोगों को शौचालय नसीब नहीं है।
इसे देश की विडम्बना ही कहा जाए कि जब हम चीन के साथ अपनी हार की पचासवीं बर्षगांठ (5 अक्टूबर 1962) मना रहे हैं, तब भी हमारे देश की महिलाएं खुले में शौच के लिए विवश हैं। हम देश में बढ़ रही मोबाइल फोन की संख्या को गर्व से गले पर लटका देश के विकास की बात कर रहे हैं। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश कतई गलत नहीं हैं। उन्होंने ऐसा क्या गलत कह दिया कि लोगों की धार्मिक भावनाएं बलवती हो उठीं? उनके बयान से मंदिरों का अपमान नहीं हुआ, बल्कि उनका हुआ है, जो इसी ताक पर बैठे रहते हैं कि किस तरह से लोगों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करें। यदि किसी की जरा सी बात पर लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं, तो फिर निश्चित रूप से वह धर्म कच्च है। हिंदू धर्म के बारे में तो ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह धर्म तो सदियों से चला आ रहा है। क्या आज वह इतना कमजारे हो गया है कि छोटी सी बात पर लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत होने लगी हैं। इसका मतलब साफ है कि धर्म कमजोर नहीं हुआ है, बल्कि लोग कमजोर हो गए हैं। हमारे ही घर के आसपास देखते ही देखते एक बड़ा मंदिर बन जाता है, पर किसी झुग्गबी बस्ती में एक शोचालय नहीं बन पाता। इसे क्या कहें कि मंदिर बनने से धर्म मजबूत बन गया। महिलाएं खुले में शौच कर रही हैं, तो कहां चला जाता है धर्म? क्यों मांगें जयराम रामेश लोगों से माफी? मोबाइल और मंदिर से आवश्यक है शौचालय, इसे समझने में और कितने साल लगेंगे हमको? यदि कहीं शौचालय मिल भी जाए, तो उसकी हालत देखी है आपने? लोग शौच करना भूल जाते हैं, वहाँ जाकर। मंदिर की सफाई का ध्यान है, पर शौचालय की सफाई की ओर किसी का ध्यान नही है। देश में मंदिरों की कमी नहीं है, पर शौचालयों की अवश्य कमी है। भारतवासी के लिए स समय गर्व का क्षण होगा, जब देश की हर महिला को शौचालय नसीब होगा।
जयराम रमेश ने कुछ भी गलत नहीं कहा। अब वे कुछ करने की सोच रहे हैं। उन्होंने संकलप लिया है कि आगामी दस वर्षो में हमारे देश में सभी के पास शौचालय उपलब्ध होगा। इस दिशा में अभी तक सरकार के 45 हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। आगामी पाँच वर्षो में एक लाख करोड़ खर्च करने की योजना है। माइक्रोसाफ्ट कंपनी के संस्थापक बिल गेट्स अरबों रुपए सामाजिक कार्यो के लिए दान में देते हैं। उनका एक मिशन भारत में शौचालयों की व्यवस्था करना भी है। वे कहते हैं कि मेरा सपना ऐसे शौचालय बनाने का है, जिसमें पानी कम लगे और गंदगी भी न हो। दरुगध कम हो और सस्ता भी पड़े। सेंटर फॉर सिविल लिबर्टी का 2009 का सर्वे कहता है कि दिल्ली में पुरुषों के 1534 शौचालयों की तुलना में महिलाओं के लिए मात्र 132 शौचालय ही है। मुंबई में लघुशंका के लिए धनराशि देनी पड़ती है।
यह सच है कि शौचालयों का निर्माण कराना सरकार का काम है। पर क्या सब कुछ सरकार पर ही छोड़ दिया जाए? हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है? आखिर हम भी तो एक सामाजिक प्राणी हैं। इस नाते हमें क्या करना है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए। मंदिर बनाने के लिए हमारी जेब से धनराशि कितनी आसानी से निकल जाती है, तो क्या शोचालय के लिए नहीं निकलनी चाहिए। इसके पीछे शायद यही सोच है कि मंदिरों के लिए दिया गया दान वापस पुण्य के रूप में आएगा। हमें स्वर्ग मिलेगा। हमारा भविष्य सुधरेगा। महिलाओं को खुले में शौच करता देखकर क्या वास्तव में आपका और हमारा भविष्य सुधरेगा? हमें तो शर्म से मर जाना चाहिए।  क्योंकि बिखरी हुई गंदगी से होकर गुजरना किसी नर्क यात्रा से कम नहीं है। दान देकर हमें भले ही स्वर्ग की प्राप्ति होती हो, पर जीते जी यह नर्क यात्रा भी हमें ही झेलनी है। कितनी धार्मिक संस्थाएं ऐसी हैं, जो मंदिर तो नहीं, पर पेशाब घर और शौचालय बनाती हैं। हर वर्ष गणोश जी, दुर्गाजी आदि के लिए हमारे पास लोग चंदा लेने के लिए आते हैं, कभी कोई व्यक्ति ऐसा भी आया, जिसने मोहल्ले में शौचालय के लिए चंदे की मांग की हो? नहीं, संभव ही नहीं है। जब तक हम शौचालय को गंदगी मानते रहेंगे, हमारी मानसिकता बदलने वाली नहीं है। शौचालय की सफाई उतनी ही आवश्यक है, जितनी शरीर की। आखिर शरीर भी एक मंदिर ही है। कहा जाता है कि जिन घर का शौचायल साफ होगा, वह घर संस्कारवान होगा। गंदे शौचालय हमारी गंदी सोच का ही परिणाम हैं। जो हमारी बुराई को ग्रहण कर ले, वह हमारी दृष्टि में महान हो सकता है, पर जो हमारी गंदगी को स्वीकार कर ले, वह महान क्यों नहीं हो सकता?
शौचालय पर हमारी सोच को बदलना होगा। शौचालय के बिना जीवन संभव ही नहीं है। यदि हम ऐसा मानते हैं, तो हमें यह भी मानना होगा कि शौचालय जीवन के लिए अतिआवश्यक है। मंदिर की तरह। मंदिर में पूजा के लिए जाने के पहले स्वयं को शौचालय जाकर स्वच्छ करने का काम आप ही करते हैं। कोई भी शुभ कार्य आप स्नान से पहले नहीं करते, स्नान से पहले शौचालय जाकर स्वयं को स्वच्छ करते ही हैं। सोचो कितना महत्वपूर्ण है, शौचालय हमारे जीवन के लिए। बस हमें यही करना है कि यदि देश का एक आदमी या महिला मुक्ताकाशी शौच के लिए विवश है, तो हमें किसी बात पर गर्व नहीं करना चाहिए।
  डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

अमिताभ बच्चन के जीवन के सत्तर यादगार लम्हे

1- जन्म पर पिता हरिवंश राय बच्चन की लिखी कविता

फुल्ल कमल,

गोद नवल,

मोद नवल,

गेहूं में विनोद नवल।

बाल नवल,

लाल नवल,

दीपक में ज्वाल नवल।

दूध नवल,

पूत नवल,

वंश में विभूति नवल।

नवल दृश्य,

नवल दृष्टि,

जीवन का नव भविष्य,

जीवन की नवल सृष्टि

2- ब्रीचकैंडी अस्पताल में अमिताभ बच्चन द्वारा लिखी अंग्रेजी कविता का हिंदी अनुवाद-

(अनुवाद उनके पिता द्वारा किया गया था)

बाहर-ऊपर, मंडराते डरपाते।

अंधियाला छाते-से बादल।

नीचे, काली, कठोर, भद्दी चट्टानों पर

उच्छल, मटमैली जलधि-तरंगो का क्रीड़ा।

भीतर- सब उज्‍जवल, शुद्ध साफ

चादर सफेद, कोमल तकिये,

धीमे-धीमे स्वर से सिंचित

ममतामय सारी देख-रेख

औ मेरी एकाकी पीड़ा।

3- अमिताभ से पहले उनका नाम इंकलाब राय पडने वाला था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर अमरनाथ झा का दिया यह नाम उनके पिता को बहुत पसंद भी था, लेकिन सुमित्रानंदन पंत के दिए नाम अमिताभ का असर लोगों पर अधिक हुआ और उनका नाम अमिताभ बच्चन पड़ गया।

4- अभिनेता बनने से पहले वह इंजीनियर बनना चाहते थे। यहा तक कि उन्होंने इंडियन एयरफोर्स च्वाइन करने की तैयारी भी कर ली थी।

5- बिग बी दोनों हाथों से लिख सकते हैं। वह विज्ञान के साथ ही कई भाषाओं के जानकार भी हैं।

6- उन्होंने अपनी पहली नौकरी शॉ एंड वॉलेस कंपनी के साथ शुरू की थी। उन्होंने एक शिपिंग कंपनी के साथ ब्रोकर के तौर पर भी काम किया था।

7- उनकी पहली तनख्वाह 500 रुपए थी। टैक्स कटने के बाद उनके हाथ में 480 रुपए आए थे।

8- आनंद फिल्म की भूमिका के बाद उन्होंने दस फ्लॉप फिल्में दी। इस दो साल के असफल कॅरियर के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और जंजीर से सफलता का सोलो स्वाद चखा।

9- पहली बार अमिताभ और जया भादुड़ी एफटीआईआई पुणे मे मिले थे, उसके बाद हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म गुड्डी के सेट पर मिले।

10- गुड्डी के लिए मेल एक्टर का किरदार अमिताभ को ही ऑफर हुआ था, लेकिन वह किन्हीं वजहों से कर नहीं सके।

11- करीबियों की मानें तो अमिताभ और जया ने कभी भी डेटिंग नहीं की। वे जब भी मिले दोस्तों के समूह में मिले।

12- कुली की शूटिंग के दौरान जब वह ब्रीचकैंडी अस्पताल में भर्ती थे, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाधी उन्हें देखने अस्पताल आई थीं। मुंबई पुलिस की आधा संख्या बल ब्रीचकैंडी के आसपास उस दिन तैनात किया गया था।

13- बीमारी के दौरान जया बच्चन ब्रीचकैंडी अस्पताल से सिद्धिविनायक मंदिर तक रोजाना पैदल जाया करती थीं। यह दूरी छह किमी की थी।

14- मुकद्दर का सिकंदर की शूटिंग के एक सीन में विनोद खन्ना के साथ स्टंट में अमिताभ ने उनके चेहरे पर काच फोड़ दिया था। जिसकी वजह से उनके चेहरे पर टाके लगे थे।

15- अमिताभ शाकाहारी हैं। उन्हें आलू-पूड़ी, पकौड़ा, ढोकला और पराठा बेहद पसंद है।

16- अमिताभ के हिसाब से वहीदा रहमान फिल्म इंडस्ट्री की सबसे खूबसूरत महिला हैं।

17- राजेश खन्ना के साथ की गई दोनों फिल्में नमक हराम और आनंद में उनके अभिनय के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

18- मुकुल आनंद की फिल्म खुदा गवाह की शूटिंग के दौरान तत्कालीन अफगानी राष्ट्रपति नजीबुल्लाह ने अमिताभ की सुरक्षा में मुल्क की आधे सुरक्षा तंत्र को तैनात कर दिया था। खुदा गवाह अफगानिस्तान में चलने वाली सबसे हिट फिल्म है।

19- हृषिकेश मुखर्जी की सुपर हिट फिल्म चुपके-चुपके के लिए अमिताभ सेकेंड लीड की पहली च्वाइस नहीं थे।

20- मिठाई में उन्हें गुलाब जामुन बहुत पसंद है।

21- सुपरस्टार की हैसियत पाने के बाद हृषिकेश मुखर्जी उन्हें महाराज कहकर बुलाते थे।

22- फिल्म शोले में जय का किरदार पहले शत्रुघ्न सिन्हा को ऑफर किया गया था।

23- व्यस्त शूटिंग के बाद भी वह एक वक्त का खाना घर में ही खाना पसंद करते हैं।

24- ईश्वर में आस्था रखने वाले अमिताभ श्रीमद्भागवत गीता का पाठ नियमित रूप से करते हैं।

25- उनके पास घडिय़ों और चश्मों का विश्व प्रसिद्ध ब्राड कलेक्शन है।

26- उनके लुक को सबसे ज्यादा तारीफ या आलोचना उनके दोनों बच्चों से मिलती हैं। बिग बी की मानें तो वह कई बार अपने कपड़ों का चयन अभिषेक या श्वेता के हिसाब से करते हैं।

27- 17 फिल्मों में उनका नाम विजय और 9 फिल्मों में अमित है।

28- मेहुल कुमार की कोहराम और अनिल शर्मा की अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों में उन्होंने सरदार की भूमिकाएं निभाई हैं।

29- निर्देशक एस. रामानाथन की फिल्म महान में उन्होंने तिहरी भूिमका अदा की है।

30- निर्देशक आर. बाल्की की फिल्म पा में उन्होंने अपने रियल लाइफ बेटे अभिषेक बच्चन के बेटे का किरदार निभाया है।

31- उन्होंने अपने कॅरियर की पहली भूमिका ख्वाजा अहमद अब्बास की सात हिंदुस्तानी में निभाई थी, लेकिन उनके काम को सुनील दत्त प्रोडक्शन की रेशमा और शेरा में नोटिस किया गया।

32- उनके भाई अजिताभ बच्चन उनके सबसे अच्छे दोस्त हैं।

33- मा तेजी बच्चन हमेशा उन्हें मुन्ना कहकर ही पुकारती थीं। उन्होंने कभी भी अमिताभ नाम से उन्हें नहीं पुकारा।

34- दिलीप कुमार, मोतीलाल और बलराज साहनी उनके आदर्श अभिनेता हैं।

35- बिग बी अपनी शार्प मेमोरी के लिए जाने जाते हैं। वह अपने करीबियों के जन्मदिन तक याद रखते हैं।

36- शोले की शूटिंग के दौरान ही उन्हें पता चला है कि वह अपने पहले बच्चे के पिता बन चुके हैं।

37- प्रोफेशनल सिंगर न होने के बावजूद उन्होंने अपनी कई फिल्मों में गाने गाए हैं, जिसमें से मेरे अंगने में', रंग बरसे' और होली खेले रघुबीरा' मशहूर हैं।

38- अस्सी के दशक के मध्य में अमिताभ बच्चन को आधार बनाकर एक सुपर हीरो कॉमिक बुक लिखी गई थी, जिसका आइडिया उनकी फिल्म तूफान से लिया गया था।

39- फिल्म इंडस्ट्री के अभिनेताओं की लेट-लतीफी के इतर अमिताभ हमेशा वक्त के पाबंद रहे हैं। आज भी वह किसी इवेंट में देर से नहीं पहुंचते हैं।

40- एक बार तो उन्होंने जुहू, नरीमन प्वाइंट और हीरानंदानी तीनों ही जगहों पर कुछ ही घटे के अंदर तीन इवेंट अटेंड किए थे और किसी भी जगह पर एक मिनट भी देर से नहीं पहुंचे थे।

41- प्रकाश मेहरा की जंजीर अमिताभ से पहले राज कुमार, धमर्ेंद्र और देव आनंद को ऑफर हुई थी, लेकिन गेंद आखिरकार अमिताभ बच्चन के पाले में गई और यहीं से उनके कॅरियर ने टर्न ले लिया।

42- 1996 में उनकी कंपनी एबीसीएल ने मिस व‌र्ल्ड प्रतियोगिता का आयोजन भारत में करवाया। आयोजन सफल रहा, लेकिन महिला संगठनों ने संस्कृति को आधार बनाकर उनकी आलोचना भी की।

43- एक बीबीसी ऑनलाइन सर्वे में उन्हें स्टार ऑफ द मिलेनियम का दर्जा दिया गया था। इस सर्वे में उन्होंने चार्ली चैप्लीन, मर्लिन ब्राडो और लॉरेंस ओलिवर की लोकप्रियता को भी धता बता दिया था।

44- हू वाट्स टू बी मिलेनियर के भारतीय संस्करण कौन बनेगा करोड़पति से न सिर्फ उनकी वापसी हुई, बल्कि टीवी की दुनिया में वे एक बेहतरीन एंकर के तौर पर भी उभर कर सामने आए।

45- 1984 में उन्होंने तत्कालीन दिग्गज नेता हेमवती नंदन बहुगुणा को हराकर राजनीतिक पारी की शुरुआत की थी। चार साल बाद ही उन्होंने उठापटक के बाद राजनीति से सन्यास ले लिया।

46- वह बीबीसी के चर्चित कार्यक्रम वैगन शो में भाग लेने वाले एक मात्र एशियाई हैं।

47- बहुचर्चित और प्रयोगधर्मी फिल्म अक्स के बनने से पहले ही वह अपनी म्यूजिक कंपनी बिग बी म्यूजिक के बैनर तले अपना पहला म्यूजिक अलबम ऐबी बेबी लेकर आए थे, जिसका एक वीडियो इर-बीर-फत्ते' काफी चर्चित हुआ।

48- राकेश मेहरा की पहली फिल्म अक्स में उन्होंने सह-अभिनेता मनोज बाजपेयी के साथ 58 की उम्र में 30 फीट ऊंचाई से कूदते हुए एक स्टंट सीन दिया था।

49- बिग बी ने किरोड़ीमल कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की है, जहा इनके हॉस्टल का रूम नंबर 65 था।

50- लंदन के मैडम तुसाद संग्रहालय में अमिताभ बच्चन की एक मोम की मूर्ति रखी है।

51- अपने थिएटर के दिनों के दोस्त अर्जुन संजनानी की फिल्म अग्नि वर्षा में अपना पहला पौराणिक किरदार इंद्र के रूप में निभाया था।

52- सफल कॅरियर और एंग्री यंगमैन की भूमिका निभाने के दौरान उन्होंने किसी भी उत्पाद का विज्ञापन करने से मना कर दिया था, लेकिन कॅरियर के दूसरे अवतार में वे ढेर सारे उत्पादों के विज्ञापन कर रहे हैं।

53- कुछ समय पहले फ्रेंच परफ्यूम कंपनी लोमानी ने उनके नाम का ही एक विशेष परफ्यूम लॉन्च किया था, जिसे बाजार में हाथों-हाथ लिया गया।

54- उनके जन्मदिन की 60वीं वर्षगाठ पर पत्नी जया ने उन्हें 400 पेज की कॉफी टेबल बुक भेंट की थी, जिसमें अभिषेक और श्वेता ने भी उनके बारे में कुछ चैप्टर लिखे थे।

55- पाइरेसी का पुरजोर विरोध करने वालों में बिग बी का नाम अग्रिम कतार में आता है। राजनीति के जमाने में ही इस सिलसिले में वे तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से मिले थे।

56- राजीव गाधी और अमिताभ की पहली मुलाकात इलाहाबाद के एडेल्फी होम कम हॉस्टल में हुई थी। अमिताभ उस समय चार साल के थे और राजीव गाधी दो साल के।

57- अमिताभ की प्रारंभिक शिक्षा को लेकर मा तेजी बच्चन और पिता हरिवंश राय बच्चन में काफी बहसें हुई थीं। हरिवंश अमिताभ को हिंदी स्कूल में पढ़ाना चाहते थे, लेकिन तेजी उन्हें अंग्रेजी स्कूल में भेजना चाहती थीं। अंतत तेजी की ही सुनी गई।

58- अमिताभ नामकरण के बाद सुमित्रानंदन पंत चार साल बाद अमिताभ से मिले और उसी समय बाएं हाथ से लिखने वाले अमिताभ को दाएं हाथ से लिखने की बात कही।

59- पिता की कलमदान से कलम निकालने पर अमिताभ को पहली बार पिता से बहुत डाट पड़ी थी। पिता ने इस काम को चोरी का दर्जा दिया था।

60- उनकी सबसे प्रयोगधर्मी फिल्म मैं आजाद हूं का शीर्षक पहले सच था।

61- सत्तर के दशक में अमिताभ शूटिंग से मिले ब्रेक में क्रिकेट खेलना पसंद करते थे।

62- इलाहाबाद के अमरूद का असर उनके ऊपर काफी सालों तक रहा। शहर छूटने के बाद वे इसे काफी समय तक मिस करते रहे। हालाकि, उन्हें पके अमरूद से चिढ़ थी। कई साक्षात्कारों में उन्होंने इस बात का जिक्र किया है।

63- मा तेजी बच्चन को बागवानी का बहुत शौक था। आठ साल की उम्र में अमिताभ ने एक बागवानी प्रतियोगिता में उनके साथ भाग लिया था।

64- पैसे की कीमत अमिताभ बच्चन को नौ साल की उम्र में पहली बार तब पता चली जब हरिवंश राय बच्चन को ब्रिटिश काउंसिल की तरफ से लंदन में रिसर्च करने के लिए आमंत्रित किया गया था, लेकिन उनके पास उस समय पाच हजार रुपए नहीं थे। हालाकि, बाद में वह इस यात्रा में अपने दोस्तों की मदद से निशुल्क गए थे।

66- बेहद खुशी के मौके पर पिता हरिवंश राय बच्चन अमिताभ को लेकर तुलसी कृत रामचरित मानस का पाठ करते थे।

67- उन्होंने अपने कॅरियर में तीन राष्ट्रीय पुरस्कार जीतें हैं। सात हिंदुस्तानी, अग्निपथ और पा की भूमिकाओं के लिए उन्हें यह पुरस्कार मिले।

68- अपने कॅरियर में सर्वाधिक फिल्में उन्होंने शशि कपूर के साथ की हैं।

69- उनकी पहली ऑडिशन तस्वीर उनके भाई अजिताभ ने खींची थी, जो फिल्म फेयर-माधुरी कॉन्टेस्ट के लिए भेजी गई थी।

70- उन्हें पहला एक्टिंग पुरस्कार शशि कपूर के ससुर जेफरी कैंडल के हाथों मिला।

71- 1990 से 1995 तक उन्होंने फिल्मों में काम नहीं किया।

72- 1978-1979 में लगभग एक साथ उन्होंने सिगरेट, शराब और मास से तौबा कर ली।

73- इस बार उनके जन्मदिन पर मुंबई में एक भव्य पार्टी का आयोजन किया जा रहा है, जहा 1000 के करीब विदेशी मेहमानों के आने की संभावना है।
दुर्गेश सिंह और झकार टीम
 (दैनिक जागरण से साभार)

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