शनिवार, 30 जुलाई 2011

‘न्यूज़ ऑफ द वर्ल्‍ड की मौत से क्या सबक लिया हमने?



डॉ. महेश परिमल
कम नहीं होती 168 वर्ष की जिंदगी। एक अखबार के लिए तो यह बहुत बड़ी जिंदगी है। उसकी लंबी उम्र हमें खुशी अवश्य दे सकती है, पर उसकी अकाल मौत हमें भीतर से दहला देती है। एक अखबार ऐसी मौत मर सकता है भला? उसकी मौत ने यह संदेश अवश्य दे दिया कि शालीनता की सीमाओं को तोड़ने का हश्र यही होता है। यह सच है कि लोग चटखारे वाली खबरें पढ़ना पसंद करते हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं होता कि इन खबरों को इकट्ठा करने के लिए आप किसी भी सीमा तक पहुँच जाएँ। लोगों को दूसरों के निजी जीवन के बारे में जानना हमेशा अच्छा लगता है। बस इस रुचि को ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ ने अपना आदर्श मान लिया। यहीं से उसका पतन शुरू हो गया। यह उसका पतन था, इसकी जानकारी उस समय तो नहीं मिली। क्योंकि हर परिवर्तन तनाव लाता है। इस अखबार ने जब लोगों के निजी जीवन के बारे में छापना शुरू किया, तब अखबार की बिक्री बढ़ गई। अखबार मालिक के लिए यह अप्रत्याशित था। उसने दोगुने जोश के साथ प्रभावशाली लोगों के निजी जीवन में झाँकना शुरू कर दिया। वास्तव में यहीं से उसका पतन प्रारंभ हो गया। इसकी जानकारी अखबार मालिक को काफी समय बाद पता चला।
इस अखबार की अकाल मौत ने यह साबित कर दिया कि सनसनी से अखबार बिक तो सकते हैं, पर लंबे समय तक चल नहीं सकते। जनता उसकी खबरें चटखारे लेकर पढ़ तो सकती है, पर उसे अपने ड्राइंग रुम में रख नहीं सकती। समाज कितना भी आगे बढ़ जाए, पर वह अपने जीवन मूल्यों को जीवित रखने की हमेशा कोशिश करता है। मूल्यहीनता उसे कभी स्वीकार नहीं होती। अश्लील साहित्य पढ़ने वाला पिता बेटे को कभी वैसा साहित्य पढ़ने की इजाजत नहीं देगा। इसलिए ऐसे अखबारों की खबरें वह सबके बीच चटखारे लेकर पढ़ सकता है, पर उस अखबार को घर पर लाकर नहीं पढ़ सकता। दूसरों के निजी जीवन के बारे में जानना अच्छा लगता होगा, पर जब उसी अखबार में स्वयं के निजी जीवन के बारे में कुछ छप जाए, तो वह विचलित हो जाता है। अखबार ने निजी जीवन की जानकारी निकालने के लिए काफी धन खर्च किया। विशेषकर पुलिस विभाग को मानो धन से तौल ही दिया। सामजिक नीतियों से हटकर अखबार ने असामाजिक होने का काम किया। जनता को जाग्रत करने के बजाए अखबर ने ऐसी बातें प्रचारित करनी शुरू कर दी, जिससे लोग सच से दूर हो गए। अखबार का काम पाठकों को सच के करीब ले जाना होता है, सच से दूर नहीं। ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ ने ऐसा किया और आज अतीत का हिस्सा बनकर रह गया।
मात्र एक छोटी सी घटना ने पत्रकारिता के इस किले पर सेंध लगा दी। एक मृत लड़की के फोन से वाइस मेल हैक करने से हुए खुलासे के बाद कई रहस्योद्घाटन हुए। सिलसिला शुरू हो गया। सिलसिला आज भी जारी है। भले ही अखबार बंद हो गया हो। अखबार ने जो कुछ किया, वह लोकप्रियता पाने के लिए किया। इससे वह लोकप्रिय तो हो गया, पर यही लोकप्रियता ही उसे ले डूबी। एक प्रतिभावान विद्यार्थी अपनी प्रतिभा को टिकाए रखने के लिए यदि नकल का सहारा लेता है, तो उसकी प्रतिभा कुछ समय बाद सामने आ ही जाती है। पर इस दौरान उसने कई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने नहीं दिया, उसका क्या? सच कहा है कि महत्वपूर्ण होना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण बने रहना महत्वपूर्ण है। ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ महत्वपूर्ण तो हो गया, पर महत्वपूर्ण बने रहने के लिए उसने जो कुछ किया, वह गलत था।
‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ को खरीदने के बाद ही रुपर्ट मडरेक को मीडिया मुगल कहा जाने लगा। इस अखबार ने उन्हें काफी ऊँचाई दी। उन्हें इस ऊँचाई तक पहुँचाने वाला अखबार था। अखबार के कर्मचारी नहीं। अखबार के असंवैधानिक कार्यो के लिए कर्मचारी कतई दोषी नहीं हैं, पर आज वे सड़क पर आ गए हैं। उनके सामने जीवन की समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हो गई है। अपने शुरुआती दौर में ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ ने श्रमिक वर्ग में नवचेतना का संचार करने का बीड़ा उठाया था। वह कम पढ़े-लिखे लोगों का प्रतिनिधित्व करता था। सनसनी फैलाने से वह कोसों दूर था। लोग उसे आदर की दृष्टि से देखते और पढ़ते थे। समकालीन अखबार ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ की नकल करते थे। बीसवीं सदी के छठे दशक में इस अखबार की 90 लाख प्रतियाँ प्रकाशित होती थीं। जो एक रिकॉर्ड था। इस अखबार में रुपर्ट मडरेक का आगमन 70 के दशक के अंतिम वर्षो में हुआ। तब अखबार ने अपना रंग-रूप बदलना शुरू किया। फिर सेक्स, अपराध अखबार के केंद्र बिंदु में आ गए। बस अखबार का पतन यही से शुरू हो गया। हम सभी यह मानते हैं कि छपे हुए शब्दों की विश्वसनीयता आज भी जिंदा है। इन शब्दों की अपनी जवाबदेही भी है। इन शब्दों की अपनी लक्ष्मण रेखा भी है। जिसने भी इसे पार किया, वह गया काम से। आज के अखबार अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। उन्हें यह सोचना चाहिए कि कहीं यह गलत तो नहीं हो रहा है। गिफ्ट कूपन छापकर अखबार बुजुर्गो को तो दूर तक दौड़ा सकते हैं, पर उनकी पीड़ा को समझ नहीं सकते। कूपन के कारण उन्हें कई बार अपने साथियों से भीख भी माँगनी पड़ती है। इससे अखबार लोकप्रिय भले हो जाए, पर एक बुजुर्ग को नाराज अवश्य कर देता है। अखबार मालिक को अपने अखबार की आत्मा को जिंदा रखने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। जब तक अखबार घर के सभी सदस्यों द्वारा पढ़ा जा रहा है, तब तक वह वास्तव में जिंदा है भी। जिस दिन घर के बुजुर्ग सुबह जल्दी उठकर अखबार को छिपाना शुरू कर दें, समझो अखबार की मौत करीब है। अखबार मालिकों का अखबार अपना रहे, समाज का रहे, तो ही अच्छा, यदि वह ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ बनने की कोशिश करेगा, तो उसका हश्र क्या होगा, यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

पुलिसिया चेहरे की वीभत्स सच्चाई


डॉ. महेश परिमल
कहीं पढ़ा था कि आपका स्वभाव ही आपका भविष्य है। इस सारगर्भित वाक्य में एक बहुत ही बड़ी सच्चई छिपी है। हमारे देश की पुलिस का स्वभाव कैसा है, इसे हम सभी जानते हैं। इसके बाद ग्वालियर के जीआरपी थाने में एक युवक सुनील तोमर की हत्या से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश मंे पुलिसिया चेहरा आज भी बदशक्ल है। पुलिस विभाग में उमराव सिंह उइके और रामनरेश जैसे लोग बहुत ही कम है, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं।
ग्वालियर के जीआरपी थाने में एक युवक की हत्या के बाद यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि पुलिस अपनी छवि सुधारने के लाख प्रयास करे, जब तक वह पुलिस वालो ंके भीतर से यह धारणा नहीं निकाल देती कि वे कानून से ऊपर हैं, तब तक कुछ भी होना संभव नहीं है। पुलिस आज भी स्वयं को कानून से ऊपर मानती है। उसने कभी भी अपने को आम आदमी का रक्षक नहीं माना। सदैव उसके शोषण ही किया। आज एक अपराधी से अधिक आम आदमी पुलिस से केवल इसलिए डरता है, क्योंकि उसे मालूम है कि पुलिस विभाग के एक अदने से सिपाही के पास भी असीमित अधिकार हैं। वह एक आम आदमी को तो आसानी से फँसा सकता है, पर किसी रसूखदार पर हाथ डालने पर वह उतना ही अधिक डरता है। यह बात अब पूरी तरह से स्पष्ट हो गई है कि वर्जिश से पुलिस अपनी चाल बदल सकती है, पर चेहरा नहीं बदल सकती।
ग्वालियार के जीआरपी थाने में एक युवक की बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला गया। चह चीखता रहा, चिल्लाता रहा, पर पुलिस वाले उसे तब तक मारते रहे, जब तक वह मर नहीं गया। फिर उसकी लाश को चंबल के घने जंगलों में फेंक दिया गया। यह पुलिस का एक ऐसा वीभत्स चेहरा है, जिसे हम सभी जानते-समझते हैं। सभ्य समाज के लिए यह चेहरा असामाजिक है। कोई भी अपने उत्सव में पुलिस की उपस्थिति को स्वीकार नहीं करता। क्योंकि पुलिस कानून की रक्षक के रूप में नहीं आती, वह तो रसूखदारों को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाली मानी जाती है। जिसे बचाना हो, उसे पुलिस आसानी से बचा भी लेती है, लेकिन जिसे फँसाना हो, उसे भी बहुत आसानी से फँसा देती है। पुलिस अत्याचार के किस्से हम सभी सुनते रहते हैं, पर बहुत कम ही ऐसे किस्से होते हैं, जिसमें पुलिस ने ईमानदारी का परिचय दिया हो। उमराव सिंह उइके और रामनरेश ने अपनी आँखों के सामने सुनील तोमर की हत्या देखी, वे चाहते तो खामोश रहकर अपनी बाकी जिंदगी बसर कर सकते थे। पर ईश्वर पर विश्वास रखने वालों की आत्मा जाग गई, उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी और उस हत्या के बारे में मीडिया को बता दिया।
हमारे कानून में अभी तक पुलिस की हद तय नहीं की गई है। यह सच है कि पुलिस को क्रूर बनना पड़ता है। आज जिस तेजी से अपराध बढ़ रहे हैं, उस तेजी से अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। पुलिस के पास आज भी अंग्रेजों के जमाने के हथियार हैं। जबकि अपराधी अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो गए हैं। पुलिस के हौसले भी बुलंद हैं, पर उन्हें खुलकर काम करने का अवसर मिला ही नहीं। पुलिस का सबसे अधिक दुरुपयोग राजनीतिज्ञ करते हैं। वे इसे अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करते हैं। पुलिस जनता के रक्षक हैं, जनता के प्रतिनिधि के नहीं। कई बार मन मसोसकर पुलिस वाले अपनी डच्यूटी निभाते हैं। कई बार न चाहते हुए भी उन्हें वह काम करना पड़ता है, जिसे वे नहीं करना चाहते। आज पुलिसिया चेहरे की वीभत्स सच्चई से तो हर कोई वाकिफ है, पर उसके पीछे एक निस्पृह, लाचार, विवशता भरा चेहरा किसी ने देखने की कोशिश नहीं की। वह भी एक आम आदमी है। उसका भी परिवार है। यदि वह ईमानदारी से जीना चाहे, अपनी डच्यूटी करना चाहे, तो भी उसे ऐसा नहीं करने दिया जाता। लगातार डच्यूटी से कई बार वह डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। कई बार अपने ही साथियों या फिर अधिकारियों पर हिंसक रूप से सवार होकर उनका खून कर देता है। कई बार मुफ्त में मिलने वाली शराब का सहारा लेकर पत्नी-बच्चों को पीटकर अपना तनाव बाहर निकालता है। पुलिस के इस चेहरे से कितने लोग वाकिफ हैं?
पुलिस के उच्च अधिकारी भी ये स्वीकारते हैं कि हमारे साथी रसूखदारों पर हाथ डालने से घबराते हैं। इसकी वजह आज की राजनीति है। आज पुलिस किसी भी असामाजिक तत्व को गिरफ्तार करती है, तो तुरंत ही स्थानीय नेताओं के फोन आने लगते हैँ। उन पर दबाव डाला जाता है, उसकी रिहाई के लिए। आखिर ये दबाव डालने वालों का उस असामाजिक व्यक्ति से क्या संबंध है, इसे जानने की आवश्यकता नहीं। इन हालात में पुलिसवाला वही करता है, जो उसके अधिकारी चाहते हैं। उनके अधिकारी भी आईपीएस की परीक्षा पास करके आते हैं। शायद इस परीक्षा में ही किसी प्रकार की खोट है, जो उन्हें देश के खिलाफ काम करने वालों को संरक्षण देना सिखाती है। पुलिस और अंडरवर्ल्ड के संबंध बहुत ही पुराने हैं। इनके साथियों को बचाने के लिए पुलिस विभाग के पास काफी धन आता है। राज्य या देश की सीमाओं से लगे थानों की नीलामी होती है। पुलिसवालों का उठना-बैठना भी बड़े लोगों के बीच होता है। इनसे पुलिस वालों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है। पुलिसवालों पर जब कभी मुसीबत आती है, तो यही राजनेता ही उनकी सहायता करते हैं। ऐसे में पुलिसवालों का भी यह कर्तव्य बन जाता है कि वे आम आदमी को छोड़कर रसूखदारों की सेवा करें। आम आदमी से उन्हें कुछ नहीं मिलता। आम आदमी उन्हें केवल अपना आशीर्वाद ही दे सकता है। जिसकी पुलिसवालों को आवश्यकता ही नहीं। उन्हें तो चाहिए वह वरदहस्त, जो उन्हें नेतिक बल दे।
देश में ऐसे बहुत ही कम उदाहरण मिलेंगे, जिसमें अत्याचारी पुलिसवाले को सजा मिली हो। जिन्हें भी सजा मिली है, उन्होंने अत्याचार की सीमाएँ पार की, इसलिए वे धरे गए। अभी भी ऐसा बहुत कुछ रोज ही होता है, जो कानून के दायरे में नहीं आता। पुलिस वालों को मानवीयता का पाठ पढ़ाने से पहले उनके अधिकारियों का ब्रेनवॉश आवश्यक है। सुधार की प्रक्रिया ऊपर से ही होनी चाहिए। अपराधियों को पकड़ने के लिए क्रूरता नहीं, समझबूझ की आवश्यकता होती है, जो हमारे पुलिसवालों में नहीं है। उन्हें अपराधी से अधिक चालाक और होशियार होना होगा। अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए आम आदमी का सहारा लेना ही होगा। तभी वह अपराधियों तक पहुँच सकती है। इसलिए यदि पुलिस की छबि सुधारनी है, तो आम आदमी से मानवीयता, रसूखदारों से कठोरता और अपराधियों से क्रूरता से पेश आना होगा। यही सबक वह याद कर ले, तो वह सचमुच पुलिस धर्म निभा सकते हैं।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

राजा से ज्‍यादा दोषी प्रधानमंत्री





दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख

लिंक

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-07-28&pageno=9

बुधवार, 27 जुलाई 2011

शर्म आती है इस बेशर्मी पर

डॉ. महेश परिमल
अभी-अभ्री अखबारों में एक चित्र देखा, थाईलैंड में बाढ़ आई, लोगों में भागम-भाग मच गई। पूरा घर पानी पर तैरता दिखाई दे रहा था, बाहर का दृश्य तो और भी भयानक था। लोग अपने बच्चों को विभिन्न संसाधनों से बचाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में उनके बीच देश के प्रधानमंत्री भी पहुँच गए। वे भी अपनी पेंट मोड़कर बचाव दल के साथ राहत कार्य में जुट गए। क्या हमारे देश के लिए ऐसा दृश्य संभव है? कदापि नहीं। हमारे देश के मंत्रियों को बाढ़ का दृश्य हेलीकाप्टर में बैठकर ही देखना अच्छा लगता है। वे दूर से ही तबाही का आकलन कर लेते हैं। दूसरी और सुदूर छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में मारे गए पुलिस के जवानों को एम्बुलेंस न मिल पाने के कारण उनके पार्थिव शरीर को नगर पालिका के कचरे ढोने वाले वाहन से पुलिस मुख्यालय पहुँचाया गया। शहीदों का ऐसा अपमान। वे जवान तो कोई अपने स्वार्थ के लिए नहीं लड़ रहे थे। उनका भी परिवार था, लेकिन वे उससे दूर होकर अपने कर्तव्य की राह पर चल रहे थे। ऐसे में वे यदि मारे गए, तो उनके पार्थिव शरीर के साथ ऐसा सलूक! ईश्वर न करे, क्या कभी किसी नेता या मंत्री का पार्थिव शरीर इस तरह से ले जाया जा सकता है? जहाँ शहीदों का सम्मान न होता हो, उस देश या राज्य को रसातल में जाने से कोई नहीं रोक सकता। जाँच का विषय यह भी हो सकता है कि क्या उन शहीदों के शव को तिरंगे में लपेटकर मुख्यालय लाया गया? यदि नहीं लाया गया है, तो यह शहीदों का अपमान है, यदि लाया गया है, तो तिरंगे का अपमान है। क्योंकि तिरंगे को कचरागाड़ी में नहीं रखा जा सकता?
कितने शर्म की बात है, जहाँ नेताओं की गाड़ियों के आगे-पीछे वाहनों का काफिला चलता हो, रास्ते जाम कर दिए जाते हों, नेताओं को सर-आँखों पर बिठाकर उन्हें हर तरह की सुविधाएँ दी जा रही हों, वहीं नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में मारे गए जवानों के पार्थिव शरीर को नगरपालिका की कचरा ढोने वाले वाहन से पुलिस मुख्यालय लाया जाए। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इसके पहले भी यही हालात सामने आए हैं। एक बात तो सच है कि जो देश या राज्य शहीदों की इज्जत नहीं करता, वह एक दिन रसातल में चला जाता है। जवान शहीदों के पार्थिव शरीर को कचरा गाड़ी में लाने की बात को छत्तीसगढ़ के कवि हृदय डीजीपी विश्वरंजन ने भी स्वीकार किया है। कोई यह बता सकता है कि देश के कितने नेताओं की संतान सेना में हैं?
यही राज्य है, जहाँ ढेर सारी कारों के साथ मुख्यमंत्री का काफिला चलता है। दो-तीन एकड़ की जमीन पर मुख्यमंत्री निवास होता है। 5 एकड़ की जमीन पर राजभवन होता है। दूसरी ओर टेंट में रहकर नक्सलियों का मुकाबला करने वाले जवानों को एक बोतल पानी के लिए 5 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। एक मंत्री बीमार पड़ जाए, तो तुरंत ही उसके लिए विशेष विमान की व्यवस्था हो जाती है। डॉक्टरों की फौज तैयार हो जाती है। पर नक्सलियों से जूझने के लिए हमारे जवानों को बिना किसी तैयारी के भेज दिया जाता है। जवान नाहक ही मारे जाते हैं। उसके बाद भी उनका सम्मान नहीं हो पाता। परिजन उनके मृत शरीर के अंतिम दर्शन के लिए तरसते रहते हैं और सरकारी लापरवाहियों के चलते मृत शरीर भी समय पर नहीं पहुँच पाते। किस बात पर आखिर हम गर्व करें कि हमारी सरकार संवेदनशील है। विमान से बाढ़ का दृश्य देखने वाले और कारों के काफिले के साथ चलने वाले देश के कथित वीआईपी आज हमारे लिए सबसे बड़े सरदर्द बन गए हैं।
इस देश को जितना अधिक वीआईपी ने नुकसान पहुँचाया है, उतना तो किसी ने नहीं। कितने वीआईपी ऐसे हैं, जिन्होंने बस्तर के जंगलों में जवानों के साथ रात बिताई है? उनकी जीवनचर्या को दिल से महसूस किया है? उनकी पीड़ाओं को समझने की छोटी-सी भी कोशिश की है? उनके साथ भोजन कर उनके सुख-दु:ख में शामिल होने का एक छोटा-सा प्रयास किया है। सरकारी अफसर जाते तो हैं, पर रेस्ट हाउस तक ही सीमित रहते हैं। थोड़ी-सी भी असुविधा उनके लिए बहुत बड़ी पीड़ा बन जाती है। कितने अफसर हैं, जो जमीन से जुड़े हैं, जिन्हें आदिवासियों की तमाम समस्याओं की जानकारी है। उनका निराकरण कैसे किया जाए, इसके लिए उनके पास क्या उत्तम विचार हैं? जवानों को नक्सलियों के सामने भेज देना ठीक वैसा ही है, जैसे शेर के सामने बकरी को भेजना। अत्याधुनिक हथियारों से लैस नक्सलियों के सामने जंग खाई हुई आदिकाल की बंदूकें भला कहाँ तक टिक पाएँगी?
कितना आपत्तिजनक होता है वीआईपी का सफर? जब इनका काफिला चलता है, तो सारे कानून कायदों से ऊपर होकर चलता है। पुलिस के कई जवान इनकी सुरक्षा में होते हैं। इन्हें किसी तरह की तकलीफ न हो, इसलिए पूरे साजो-सामान के साथ इनका काफिला आगे सरकता है। इस दौरान किसी को न तो सुरक्षा जवानों की हालत पर किसी को तरस आता है और न ही उनकी पीड़ाओं पर कोई मरहम लगाता है। अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए उनका एक दौरा कितने के लिए त्रासदायी होता है, यह अभी तक किसी वीआईपी ने जानने की कोशिश नहीं की। ये वीआईपी शायद नहीं जानते कि समस्याओं को जानने के लिए आम आदमी बनना पड़ता है। आम आदमी बनकर ही अपनों की समस्याओं से वाकिफ हुआ जा सकता है। अपराधी को पकड़ने के लिए चुपचाप जाना पड़ता है, न कि चीखती हुई लालबत्ती गाड़ी में। ऐसे में अपराधी तो क्या उसका सुराग तक नहीं मिलेगा।
देश में जब सुरक्षा बलों की भर्ती होती है, तब उनसे तमाम प्रमाणपत्र माँगे जाते हैं, उनके शरीर का नाप लिया जाता है। उनके परिवार के लोगों की जानकारी ली जाती है। प्रशिक्षण के पहले कई परीक्षाएँ देनी होती हैं। इसके बाद गहन प्रशिक्षण का सिलसिला शुरू होता है। तब कहीं जाकर एक जवान तैयार होता है। लेकिन नक्सली बनने के लिए केवल एक ही योग्यता चाहिए, आपके भीतर पुलिस के खिलाफ कितनी ज्वाला है? इसी ज्वाला को वे लावा बनाते हैं? ताकि वह पुलिस वालों पर जब भी टूटे, लावा बनकर ही टूटे। यदि हमें नक्सलियों के खिलाफ जवान तैयार करने हैं, तो नक्सलियों द्वारा पीड़ित परिवार के सदस्यों को तैयार करना होगा। इनके भीतर की आग को बराबर जलाए रखना होगा, इनकी पूरी देखभाल करनी होगी। इस देखभाल करने में जरा भी चूक हुई कि वह नक्सलियों की शरण में चला जाएगा, फिर वहाँ उसका ऐसा ब्रेनवॉश होगा, जिससे उसे लगेगा कि उनके परिजनों को मारकर नक्सलियों ने ठीक ही किया।
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि नक्सलियों के खिलाफ जिन्हें भी खड़ा करना है, पहले उसका विश्वास जीतें, फिर पूरे विश्वास के साथ उसे नक्सलियों के सामने भेजें, जवान को भी विश्वास होगा कि इस दौरान यदि मुझे कुछ हो जाता है, तो मेरे परिवार को समुचित सुविधा सरकार देगी। विश्वास की यह नन्हीं सी लौ जलती रहे, तो इसे विश्वास का सूरज बनते देर नहीं लगेगी।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

बुलंद हौसलो वाली बिलियर्ड चैम्पियन



डॉ. महेश परिमल
एक लेखक के लिए उसकी आँख जितनी महत्वपूर्ण है, उतने ही महत्वपूर्ण हैं एक खिलाड़ी के लिए उसके पाँव। पर जब पाँव से साथ छोड़ दे, तो एक खिलाड़ी क्या करे? कैसे रोके भीरत के खिलाड़ी को? कैसे समझाए अपने आप को? पाँव के साथ छोड़ देने के बाद भी वर्ल्ड चैम्पियन बनना कोई मामूली बात तो नहीं है। पर जिसकी हिम्मत होती है, तो दुर्भाग्य के हौसले परास्त हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ चित्रा मैगीमैराज के साथ। वह चैम्पियन तो थी हॉकी की, पर वर्ल्ड चैम्पियन बनी बिलियर्ड की। आज उसका नाम पूरे देश में गर्व के साथ लिया जाता है। ऐसे में चित्रा याद करती है, उस खिलाड़ी को, जिसने उसे पाँव में हॉकी की स्टिक से प्रहार किया था और उसके पाँव ने उसका साथ हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दिया। हॉकी न सही, उसने बिलियर्ड में लगातार परिश्रम के बाद नाम कमाया।
चित्रा जब छोटी थी, तब अपने भाई के साथ पेड़ की डाली से हॉकी खेला करती थी। उस दौरान वह पूरे आत्मविश्वास के साथ यह खेल खेलती। जब स्कूल पहुँची, तब भी वह हॉकी पर हाथ आजमा लेती। एक बार स्कूल के स्पोर्ट्स टीचर ने उसे खेलते हुए देख लिया। उसने उसकी प्रतिभा को पहचान लिया। कुछ ही समय के प्रशिक्षण के बाद उसे स्कूल की हॉकी टीम में ले लिया गया। सतत एकाग्रता और कड़े परिश्रम से चित्रा ने बहुत ही कम समय में टीम की दुलारी बन गई। आगे चलकर वह विजय की आधार स्तंभ बन गई। उसके बाद तो इंटरनल स्पर्धा, विविध स्पोर्ट्स क्लबों की स्पर्धा आदि में शामिल हेने लगे। कुछ समय बाद उसका नाम होनहार हॉकी खिलाड़ी के रूप में सबसे आगे होने लगा। मैसूर स्पोर्ट्स हॉस्टल टीम की वह कैप्टन भी बन गई। 1993 में उस पर मानो बिजली ही गिर गई। हुआ यूं कि एक राज्य स्तरीय हॉकी स्पर्धा में उसकी टीम फाइनल में पहँुच गई। प्रतिस्पर्धी टीम को लगा कि अब गए काम से। प्रतिस्पर्धी टीम की दो खिलाड़ियों ने खेल के दौरान आँखों ही आँखों में कुछ इशारा किया और मौका देखकर चित्रा के कॉफ बोन (पिंडली) पर जोरदार प्रहार किया। उस समय तो चित्रा गिर पड़ी, पर सब कुछ भूलकर उसने खेलना नहीं छोड़ा। दूसरे दिन वह अस्पताल गई। वहाँ एक नहीं, पर बीस-बीस डॉक्टरों ने जाँच की। पर कोई भी डॉक्टर उसके पाँव को बचा नहीं पाया। चित्रा का एक पैर हमेशा-हमेशा के लिए बेकार हो गया।
खेल कोई भी हो, उसे खेलने के लिए पाँव तो चाहिए ही। चाहे वह क्रिकेट हो, फुटबॉल हो, लॉन-टेनिस हो या फिर बेडमिंटन। चित्रा के लिए तो जीना ही मुश्किल हो गया। बिना खेल के वह अपने जीवन की कल्पना ही नहीं कर पा रही थी। मुंबई के प्रख्यात सर्जन ने उसे सलाह दी कि वह रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी करवा ले। उसने वह सर्जरी करवा ली। पर तेजी से इधर से उधर जाना या दौड़ना संभव नहीं हो पाया। उसके भीतर का खिलाड़ी आहत हो गया। वह चाहकर भी कोई खेल नहीं खेल पा रही थी। कई खेल खेले, पर मामला जम नहीं पाय। तभी उसकी नजर बिलियर्ड खेलते खिलाड़ियों पर पड़ी। उसने बिलियर्ड खेलना शुरू किया। सामान्य रूप से एक खिलाड़ी 28 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते थक जाता है। उसका कैरियर अस्ताचल की ओर जाने लगता है, पर चित्रा ने 28 वर्ष की उम्र में ही बिलियर्ड खेलना शुरू किया। अपनी मेहनत और लगन से धीरे-धीरे वह इस खेल में पारंगत होते गई। कर्नाटक के स्टेट बिलियर्ड एसोसिएशन के कार्यालय में एक बार चित्रा को खेलते हुए गीत सेठी ने देखा। वे चित्रा के खेल से प्रभावित हुए। तब उन्होंने चित्रा से कहा कि तुममें एक जन्मजात खिलाड़ी छिपा है। इस खेल के माध्यम से उसे बाहर निकालो। गीत सेठी के इस वाक्य को उसने अपनी प्रेरणा मान लिया। बस तब से वह दिन-रात बिलियर्ड के बारे में सोचती और बिलियर्ड ही खेलती। एक वर्ष की मेहनत रंग लाई, दूसरे ही वर्ष वह बिलियर्ड की स्टेट चैम्पियन बन गई। इस पर गीत सेठी ने उसका हौसला बढ़ाया। इसके बाद तो चित्रा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह खेलती गई, खेलती गई। 2005 और 2006 के बीच वह कई नेशनल लेबल के फाइनल तक पहुँच गई। फाइनल तक पहुँचना तो उसका लक्ष्य था ही नहीं, उसे तो शिखर पर पहुँचना था।
अंत में वह क्षण भी आ पहुँचा, जब वर्ल्ड स्नूकर चैम्पियनशिप में वह विजेता बनी। इस चैम्पियनशिप में महिलाओं का प्रवेश तो 2003 से ही हो गया था। पर कोई भी महिला सेमीफाइनल से आगे नहीं पहुँच पाई। अपने खेल से चित्रा ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। चित्रा ने विश्व विजेता का खिताब जीता। तब उसने उस खिलाड़ी को याद किया, जिसने उसके पाँव पर प्रहार किया था और उसे लाचार कर दिया था। आज वह खिलाड़ी न जाने कहाँ है, पर उसकी बदौलत चित्रा ने बिलियर्ड में विश्व विजेता बनकर देश का नाम रोशन किया। पूरे विश्व में चित्रा की पहचान वर्ल्ड चैम्पियन के रूप में है। अपनी उपलब्धियों के बारे में चित्रा कहती हैं कि उसका एक पाँव बेकार हो गया है, यह सोचकर वह बैठी होती, तो कुछ भी नहीं कर पाती। आज मेरी पहचान एक टूटे पैर की महिला के रूप में न होकर बिलियर्ड चैम्पियन के रूप में है, यही मेरी पहचान है।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 25 जुलाई 2011

येदियुरप्‍पा के जाने में ही भलाई



दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

लिंक
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-07-25&pageno=9

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

धनबल से प्राप्त बाहुबल का प्रतीक हैं रेड़डी बंधु

डॉ. महेश परिमल
कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया है। इस बार लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े ने पूरे सबूत के साथ अपनी रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि राज्य में हुए अवैध खनन एवं खनिजों की चोरी में 1827 करोड़ के घोटाले में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा पूरी तरह से संलिप्त हैं। उनके साथ उनके चार सहयोगी मंत्री एवं 600 अधिकारी भी शामिल हैं। हालांकि रिपोर्ट अभी सरकार को नहीं सौंपी गई है, पर उसके लीक होने के कारण यह खुलासा हुआ। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा पर यह आरोप है कि उन्होंने अपने परिवार को उपकृत करने के अलावा रेड्डी बंधुओं को अपनी मनमानी करने की पूरी छूट दी। इसलिए उनके खिलाफ जाँच कर उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। अब मुख्यमंत्री के पास इस्तीफा देने के सिवाय कोई चारा नहीं है। रेड़्डी बंधुओं ने बेल्लारी में जिस तरह से अपनी समानांतर सरकार चलाई है, उससे स्पष्ट है कि उन पर मुख्यमंत्री का वरदहस्त है।
जिस बेल्लारी में रेड्डी बंधु साइकिल में घूमा करते थे, आज उनका निजी हेलीकाप्टर है। कारों का लंबा काफिला है। राजमहल जैसा निवास स्थान है। सुरक्षा के लिए कमांडो की फौज है। इन्हें लेकर भाजपा में जबर्दस्त विरोधाभास है। कर्नाटक में भाजपा को जो सत्ता मिली है, उसमें रेड्डी बंधुओं की मनी और मसल पॉवर की अहम भूमिका है। भाजपा सत्ता छोड़ना नहीं चाहती। पार्टी में रेड्डी बंधुओं का विरोध है। यदि उन्हें पार्टी से निकालती है, तो पार्टी की छवि उज्‍जवल हो सकती है। इसके लिए सत्ता खोनी पड़ेगी, जो वह नहीं चाहती। पार्टी नेता सुषमा स्वराज की नजर 1914 में होने वाले लोकसभा चुनावों पर है। इस चुनाव में यदि भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा बनता है, तो प्रजा कांग्रेस से विमुख हो सकती है। इन संयोगों में भाजपा के पास विकल्प के रूप में सत्ता हासिल करने का उत्तम अवसर है। भाजपा को यदि बहुमत मिलता है, तो सुषमा स्वराज का प्रधानमंत्री बन सकती हैं। इसलिए अपनी छवि को स्वच्छ रखने के लिए उन्होंने रेड्डी बंधुओं से मुँह फेर लिया है। दूसरी ओर पार्टी तो रेड्डी बंधुओं के साथ है ही। अब देखना यही है कि इन विरोधाभासों के चलते भाजपा किस मुँह से प्रजा के सामने जाकर वोट माँगेगी?
रेड्डी बंधुओं के आर्थिक साम्राज्य के बारे में लोगों को जानकर आश्चर्य हुआ ही होगा। माना यह जा रहा है कि पिछले 10 वर्षो में गैरकानूनी रूप से खनन के कारोबार में रेड्डी बंधुओं ने करीब 4,000 करोड़ रुपए कमाए हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक में जब भाजपा की पहली स्वतंत्र सरकार बनी, तो इसमें रेड्डी बंधुओं का विशेष हाथ था। पूरे दक्षिण भारत में रेड्डी बंधुओं की छाप माइनिंग माफिया के रूप में है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में असंवैधानिक रूप से खनिजों का खनन कर रेड्डी बंधुओं ने अरबों रुपए इकट्ठे किए हैं। इसी संपत्ति के कारण उनका बाहुबल इतना बढ़ गया कि वे कर्नाटक की राजनीति को अपनी जेब में रखते हैं। इसलिए मुख्यमंत्री येदियुरप्पा भी उनसे पंगा लेना नहीं चाहते। भाजपा भले ही भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर पूरे देश में आंदोलन करती रहे, पर कर्नाटक में इस मामले में उसकी फजीहत ही होती है। सभी जानते हैं कि यहाँ पर भाजपा भ्रष्टाचार का पालन-पोषण ही कर रही है। इसलिए भाजपा की छवि पूरे देश में बिगड़ रही है। सुषमा स्वराज ने जब इन रेड्डी बंधुओं के खिलाफ बोलना शुरू किया, तो पार्टी में अंतर्कलह शुरू हो गया। श्रीमती स्वराज रेड्डी बंधुओं को मंत्री पद दिए जाने की विरोधी थी, पर येदियुरप्पा और अरुण जेटली के कहने पर वह मान गईं। वह मान तो गईं, पर अरुण जेटली के सामने वह और अधिक आक्रामक हो गईं।
अब तो सभी को पता चल ही गया है कि आंध्र प्रदेश में एक मध्यम वर्गीय पुलिस कांस्टेबल के परिवार में रेड्डी बंधुओं का जन्म हुआ। उसी बेल्लारी ने इन रेड्डी बंधुओं को साइकिल पर घूमते हुए देखा है। आज से 13 वर्ष पूर्व 1998 में रेड्डी बंधुओं ने कर्नाटक के बेल्लारी एक फाइनेंस कंपनी की स्थापना की। यह कंपनी धन के दोगुना करने का लालच देती थी। इससे उन्होंने करोड़ों की ठगी की। 2003 में रेड्डी बंधुओं ने आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी के नाम पर 50 लाख रुपए का निवेश कर खदान का धंधा शुरू किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. राजशेखर रेड्डी का उन पर वरदहस्त था। परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री के पुत्र राजशेखर रेड्डी उनके कारोबार में सहभागी थे। इसी समय चीन के बीजिंग में ओलम्पिक खेलों के लिए लोहे की आवश्यकता हुई, इसके लिए रेड्डी बंधु सामने आए और उन्होंने चीन को लोहे की भरपूर आपूर्ति की। इससे सन् 2003 से लेकर 2008 के बीच रेड्डी बंधुओं ने करीब 4000 करोड़ रुपए अर्जित किए। इन रेड्डी बंधुओं पर यह आरोप है कि इन्हें आंध्र प्रदेश में खनिज काम के लिए 450 हेक्टेयर जमीन दी गई थी, इसका लाभ उठाते हुए उन्होंने आंध्रप्रदेश के पड़ोस में स्थित कर्नाटक के बेल्लारी जिले के जंगल की हजारों फीट जमीन पर कब्जा जमा लिया। फिर वहाँ से खनिज निकालने का काम शुरू किया। बेल्लारी जिले की एक माइनिंग कंपनी एमएसपीएल ने सरकार को आगाह किया कि रेड्डी बंधुओं ने उनकी जमीन पर असंवैधानिक रूप से खनन काम कर रहे हैं। पर रेड्डी बंधुओं की राजनीतिक पहुँच के कारण कुछ नहीं हो पाया। जंगल विभाग भी किसी की नहीं सुनता।
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस सरकार का वरदहस्त रेड्डी बंधुओं पर था। सरकार की तरफ से उन्हें हड़प्पा जिले में 24 हजार करोड़ रुपए की लागत से स्टल प्लांट स्थापित करने के लिए 10 हजार एकड़ जमीन दी गई। यही नहीं इसके बाद फिर 4 जार एकड़ जमीन उन्हें एयरपोर्ट के लिए दी। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सीधे-सीधे आरोप लगाया है कि रेड्डी बंधुओं के कारोबार में जगनमोहन रेड्डी भी भागीदार हैं। रेड्डी बंधुओं को दी गई जमीन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी जनहित याचिका दायर की गई। इससे सुप्रीमकोर्ट ने माइनिंग की लीज के खिलाफ स्टे ऑर्डर दिया था, पर बाद में इसे रद्द कर दिया गया। रेड्डी बंधुओं पर यह भी आरोप है कि उन्होंने कर्नाटक राज्य की सीमा पर घुसपैठ कर वहाँ भी असंवैधानिक रूप से खनन कार्य किया है। इसके लिए उन्होंने दो राज्यों के बीच लगने वाले खंभों को भी उखाड़ दिया है। पहले रेड्डी बंधु कांग्रेस के समर्थक थे। पर 1999 जब सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज ने बेल्लारी से लोकसभा चुनाव लड़ा, तब से वे भाजपा केम्प में शामिल हो गए। इस चुनाव में सोनिया गांधी चुनाव जीत गई। पर अमेठी से भी जीतने के कारण उन्हें बेल्लारी की सीट छोड़नी पड़ी। इसका पूरा लाभ उठाते हुए रेड्डी बंधुओं की ताकत का इस्तेमाल करते हुए बेल्लारी लोकसभा सीट पर भाजपा ने अपना कब्जा जमा लिया।
रेड्डी बंधुओं ने अपनी आर्थिक ताकत का उपयोग राजकीय ताकत बढ़ाने के लिए किया। सन् 2000 में सोमशेखर रेड्डी बेल्लारी के नगर निगम चुनाव जीता। बेल्लारी की राजनीति में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने बी. श्रीरामुलु नामक दलित राजनेता की सहायता ली। इन्हें लोग चौथा रेड्डी बंधु के नाम से जानते हैं। सन् 2004 में करुणकर रेड्डी लोकसभा चुनाव बेल्लारी की सीट से जीता। उधर श्रीरामुलु विधानसभा की सीट से जीत गए। जनार्दन रेड्डी विधानपरिषद का चुनाव जीतकर एकएलसी बन गए। इस समय कर्नाटक में भाजपा-जेडी(यु)की गठबंधन सरकार थी। श्रीरामुलु उसकअध्यक्ष बन गए। इस समय जनार्दन रेड्डी ने कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी पर 150 करोड़ रुपए की रिश्वत माँगने का आरोप लगाकर बवाल मचा दिया। इसके चलते रेड्डी बंधु पूरे देश में पहचाने जाने लगे। 2008 में जब कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए, तब रेड्डी बंधुओं ने बेल्लारी जिले की 9 में से 8 सीटों पर भाजपा को जीत दिलाई। इसके बाद सरकार बनाने के लिए उन्होंने निर्दलीय विधायकों के लिए खजाना ही खोल दिया। इसका असर यह हुआ कि दक्षिण भारत में भाजपा ने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा। इस दौरान रेड्डी बंधुओं की ताकत इतनी बढ़ी कि उन्होंने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को ब्लेकमेल करने लगे। 2009 में रेड्डी बंधुओं ने येदियुरप्पा से नाराज होकर उनकी सरकार ही गिराने की कोशिश की। तब सुषमा स्वराज ने बीच में आकर येदियुरप्पा की सरकार को बचा लिया। रेड्डी बंधुओं की राजनैतिक ताकत के कारण ही कर्नाटक मंत्रिमंडल में उन्हें तीन पद मिले हैं। जनार्दन रेड्डी, करुणाकर रेड्डी और श्रीरामुलु अभी मंत्री हैं। चौथे सोमशेखर कर्नाटक मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन के अध्यक्ष हैं। 2008 में रेड्डी बंधुओं को पद दिए जाने का सुषमा स्वराज ने विरोध प्रकट किया था। इसके बाद भी येदियुरप्पा मंत्रिमंडल में रेड्डी बंधुओं का समावेश किया गया था। उस समय भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडु भी इसमें शामिल थे। हाल ही में वर्तमान भाजपाध्यक्ष नितीन गड़करी ने रेड्डी बंधुओं को मंत्रिमंडल में लिए जाने के येदियुरप्पा के प्रयासों का बचाव किया है।
इस तरह रेड्डी बंधुओं ने अपनी ताकत से कर्नाटक और आंध्रप्रदेश की राजनीति में अपना दबदबा कायम किया है। कोई भी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ कितने ही नारे बुलंद कर ले, पर इन रेड्डी बंधुओं के आगे उनके नारों में वह दम नहीं रहता। अगर भाजपा स्वच्छ छवि बनाना चाहती है, तो उसे रेड्डी बंधुओं का मोह छोड़ना होगा? ऐसे में ये कांग्रेस के साथ मिल जाएँ, इसमें भी कोई शक नहीं है। अपने धन-बल के कारण वे राजनीति में कुंडली मारकर बैठ गए हैं। किसी पार्टी में वह दमखम नहीं है, जो इन्हें ललकार सके।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 20 जुलाई 2011

एक था चूजा


भारती परिमल
एक था चूजा और एक थी चूजी। चूजा था बड़ा और चूजी थी छोटी। चूजा था दुबला और चूजी थी मोटी। चूजा था खरा और चूजी थी खोटी। दोनों मिलकर रहते थे। खाते थे, खेलते थे। नाचते थे, कूदते थे। हँसते थे, हँसाते थे। रोते थे, रुलाते थे। आपस में प्यार भी था और तकरार भी।
मुर्गी माँ जब घर से बाहर जाती, दोनों को समझाकर जाती -
आपस में दोनों हिलमिल कर रहना।
छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा न करना।।
माँ के सामने दोनों सिर हिलाते। एक-दूजे को देख मुस्कराते। पर माँ के जाते ही खेल शुरू हो जाता। एक-दूसरे को सताने में उन्हें खूब मजा आ जाता। कुट-कुट, कुट-कुट कुछ-कुछ खाते जाते और आपस में खट-पट, खट-पट कुछ-कुछ करते जाते। दिन पूरा धमा-चौकड़ी में ही बीत जाता। माँ के आते ही फिर प्यार का रिश्ता बन जाता। माँ सोचती- बच्चे मेरे कितने प्यारे, सारे जग से ये तो न्यारे। आपस में करते हैं कितना प्यार। इनसे है मेरा सुंदर घर-संसार।
एक बार की बात है। माँ के जाते ही घर में खूब शोर हुआ। कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा। चूजे के पैर में लगा। चूजी के पेट में लगा। एक-दूजे से मुँह फुलाकर चूजा एक कोने में बैठा। चूजी दूसरे कोने में बैठी। बैठे-बैठे चूजी की आँख लगी। पर चूजे को तो जोरों की भूख लगी। इधर-उधर ताका-झाँका, पर पछताया क्योंकि दोनों ने ही अन्न का कोई मोल न आँका। कुछ देर पहले ही था दोनों ने अनाज बिखराया। अब चूजे को भूख के मारे रोना आया। चूजी की बंद आँखों को देख वह पल भर को मुस्काया और धीरे से घर से बाहर निकल आया।
धीरे-धीरे चलता-चलता हो गया वो घर से दूर। आशा थी उसको भोजन मिलेगा भरपूर। मालूम नहीं था उसको किधर है जाना। बस पाना था उसको तो अनाज का दाना। खोजते-खोजते दाना-पानी, उसको दिख गया ढेर सा पानी। तालाब के पास था वह पहुँचा। उसके किनारे ही एक पेड़ था ऊँचा। पहले तो पेड़ के आसपास खूब चक्कर लगाए। अमरूद के दाने फिर उसकी पहचान में आए। स्वाद लिया जब दाने का, नाम लिया न कुछ और खाने का। कुटुर-कुटुर कुतरता जाता। दाने-दाने से पेट भरता जाता। चुगते-चुगते पहुँचा तालाब के बिलकुल पास। पानी देख लग आई प्यास। रहा न फिर किसी और में ध्यान, तेÊा कर दी अपनी चाल। पैर भीगे, पंख भीगे, हाल हुआ बेहाल। अब उसे फिर से रोना आया। क्यों मैं घर से अकेला आया? पानी में डूबते-उतराते उसकी जान पर बन आई। उफ़! ये कैसी सजा अकेले निकलने की मैंने पाई! अब तो बचना मुश्किल है। उसे चूजी और माँ की याद सताई।
ऊपर डाल पर बैठा बंदर देख रहा था खेल सारा। सोचा उसने मैं चाहूँ तो बदल दूँ ये नजारा सारा। ‘काम दया का करना है। दुख चूजे का हरना है।’ ऐसा ठान लिया जब बंदर ने। तब राह भी जल्द निकल आई। सूखी डाली पेड़ की उसे पास ही नजर आई। थाम के डाली को पहुँचा चूजे के पास। बंदर को आता देख चूजे की भी बंधी आस। पकड़ी डाली उसने झटपट, थाम लिया बंदर ने उसे पटपट। साथ अपने चूजे को सरपट लाया। तब बेचैन चूजे को चैन आया। लिपटा वो तो बंदर से। खुशी मिली उसे अंदर से।
इधर माँ जब घर को आई। चूजे को घर में न पाकर घबराई। चूजी की भी फूट निकली रूलाई। उसने माँ से कोई बात न छुपाई। माँ-बेटी दोनों घर से निकले चूजे की खोज में। फर्क आ गया था अब तो चूजी की भी सोच में। मन ही मन वो करती स्वीकार। मैंने ही की भाई से हमेशा झूठी तकरार। अब न कभी ऐसा करूँ गी। सदा भाई को प्यार करूँगी।
आधा रास्ता ही किया था पार कि खुशी मिली उन्हें अपार। सामने से आ रहा था चूजा और साथ में था बंदर दूजा। उछलते-कूदते, झूमते-गाते दोनों पहुँचे पास। देख चूजे को चूजी की सूरत खिली। माँ को भी खुशी मिली। चूजे के पंखों को सहलाते माँ ने किया खूब प्यार। बंदर ने भी समझाया अब न करना ऐसा वार। मिलजुल कर रहना, मानना माँ का कहना। चूजा-चूजी ने फिर पकड़े कान। अब न करेंगे ऐसा काम। आपस में हम मिलकर रहेंगे। माँ के प्यारे पूत बनेंगे।
झूमते-नाचते वे तीनों बोले- हरे कृष्णा हरे रामा।
साथ उनके झूम रहे थे प्यारे-प्यारे बंदर मामा।
भारती परिमल

सोमवार, 18 जुलाई 2011

अब भीगने लगी है सावन के झूलों की डोर



दैनिक भास्कर के सभी संस्करणों में एक साथ प्रकाशित आलेख
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दैनिक हरिभूमि के सभी संस्करणों में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

यहॉं आतंकी सुरक्षित हैं, अवाम नहीं



दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर प्रकाशित मेरा आलेख

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नवभारत रायपुर एवं बिलासपुर संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 13 जुलाई 2011

तेलंगाना पर तकरार




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर प्रकाशित मेरा आलेख
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सोमवार, 4 जुलाई 2011

धरती के नाम आकाश का खुला प्रेम पत्र



दैनिक भास्‍कर के सभी संस्‍करणों के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरो आलेख

शनिवार, 2 जुलाई 2011

ईश्‍वर हो या न हो, पर भ्रष्‍टाचार सर्वव्‍यापी




नईदुनिया रायपुर- बिलासपुर संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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बुधवार, 29 जून 2011

पास्‍को परियोजना का क्‍यों हो विरोध ?




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज पेज 9 पर प्रकाशित आलेख
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मंगलवार, 28 जून 2011

ईश्वर हो या न हो, पर भ्रष्टाचार सर्वव्यापी है



डॉ. महेश परिमल
भ्रष्टाचार के संबंध में एक बार इंदिरा गांधी ने कहा था कि भ्रष्टाचार केवल भारत की समस्या नहीं है, यह तो विश्वव्यापी है। उस समय लोगों ने उनका मजाक उड़ाया था, पर आज उनकी बात बिलकुल सच साबित हो रही है। आज भ्रष्टाचार एक शिष्टाचार बन गया है। अब भ्रष्ट लोगों का जेल जाना भी किसी उत्सव से कम नहीं है। उस भ्रष्ट से मिलने वाले भी अब वीआईपी होने लगे हैं। जापान का लाकहीड कांड, अमेरिका का वाटरगेट कांड, हमारे देश का नागरवाला कांड भी भ्रष्टाचार की उपज थे। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं, हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान की हालत इतनी खराब है कि अमेरिका और चीन यदि उसकी सहायता करना बंद कर दें, तो वह एक दिन भी न चल पाए। आज का मीडिया विभिन्न देशों में होने वाले भ्रष्टाचार की खबरों को सुर्खियाँ देने में लगा है। शायद ही कोई ऐसा देश हो, जहाँ भ्रष्टाचार न हो। वैसे देखा जाए, तो जहाँ राजनीति है, वहाँ भ्रष्टाचार है। मेरे पास एक मजेदार मेल आया, जिसमें लिखा था कि देश की कुल आबादी 110 करोड़ है। इसमें से 9 करोड़ लोग सेवानिवृत हैं। 25 करोड़ बच्चे और टीन एजर्स स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। सवा करोड़ लोग अस्पताल में अपना इलाज करवा रहे हैं। करीब 80 करोड़ लोग विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद हैं। 37 करोड़ लोग राज्य सरकार के और 20 करोड़ लोग केंद्र सरकार के कर्मचारी हैं, जो जनहित के कार्यो को छोड़कर बाकी सब काम करते हैं। एक करोड़ लोग आईटी के प्रोफेशन में हैं, जो मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए स्थानीय प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं। इसके बाद भी देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। चारों ओर भ्रष्टाचार की ही चर्चा है। इसे पूरी तरह से खत्म करने के लिए कोई उपवास कर रहा है, तो कोई जनांदोलन की धमकी दे रहा है। पर जिसे करना है, वह सरकार कुछ नहीं कर पा रही है।
पहले महँगाई की तुलना सुरसा के मुँह से की जाती थी, अब यह शब्द कमजोर पड़ने लगा है। इसी तरह भ्रष्टाचार के लिए अब लोग विशालकाय जानवर जैसी अर्नाकोंडा, शेषनाग आदि जैसे विशेषण का प्रयोग करने लगे हैं। विश्व में शायद ही कोई ऐसा देश हो, जहाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज न उठाई गई हो। हाल ही में आयशा सिद्दिकी की एक किताब आई है, जिसमें पाकिस्तान में सैन्य अधिकारियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का सिलसिलेवार जिक्र है। यह किताब खूब बिक रही है। मानव जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जिसमें पाकिस्तान की सेना ने भ्रष्टाचार न किया हो। बात केवल पाकिस्तानी सेना की ही नहीं, बल्कि पाकिस्तानी पुलिस, आईएसआई और प्रशासनिक ढाँचा पूरी तरह से भ्रष्ट है। सरकार जैसी कोई चीज वहाँ है ही नहीं। इस देश को चीन और अमेरिका यदि सहायता करना बंद कर दे, तो वह एक दिन भी न चल पाए। यही हाल साम्यवाद का ढिंढोरा पीटने वाले चीन का है। इस देश के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ ने कुछ समय पहले ही कहा है कि भ्रष्टाचार एक ऐसा वाइरस है, जो हमारे देश की राजनैतिक स्थिरता को खतरे में डाल रहा है। आपको शायद विश्वास न हो, पर यह सच है कि केवल चीन में ही 2002 से 2005 तक 30 हजार शासकीय अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में सख्त सजा दी गई है। 792 जजों के खिलाफ कार्रवाई चल रही है। सन् 2008 में 41 हजार 179 अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्ट आचरण को लेकर जाँच चल रही है। जिनके खिलाफ आरोप सिद्ध हो गए, उन्हें सख्त सजा दी गई। इसके बाद भी लोग यही कह रहे हैं कि हमें नहीं लगता कि हमारे देश में भ्रष्टाचार कम हुआ है।
इसके मद्देनजर हमें अपने ही देश पर नजर डालें, तो 1992 में 153 सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया था। इनमें से आधे लोगोंे के खिलाफ आरोप सिद्ध भी हुए, इसके बाद भी सभी अधिकारी अपने पद पर काबिज रहे। एक भी अधिकारी को ऐसी सजा नहीं हुई, जिससे अन्य अधिकारी सबक लेते। बहुत ही कम लोगों को याद होगा कि भूतपूर्व राष्ट्रपति और शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 1947 में कहा था कि जब तक हम उच्च स्तर पर कायम भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और कालेबाजार का समूल नाश नहीं करेंगे, तब तक हम प्रशासनिक स्तर पर न तो कार्यक्षमता बढ़ा सकते हैं और न ही उत्पादन बढ़ा सकते हैं। सोचो, यह बात उन्होंने तब कही थी, जब हमारा देश पैदा ही हुआ था। यदि उस समय इस बात की ओर ध्यान दिया जाता, तो शायद आज ये हालात न होते। हम कहाँ थे और कहाँ पहुँच गए। आसुरी शक्तियाँ लगातार बलशाली हो रही हैं। ईमानदारी को कोसों तक पता नहीं है। फिर भी देश के कथित नेता चिंतित होकर कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने के लिए हम कृतसंकल्प हैं।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 27 जून 2011

आम की अभिलाषा




25 जून को जनसत्‍ता के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

शनिवार, 25 जून 2011

अपराधियों के हौसले बुलंद करने वाला फैसला

डॉ. महेश परिमल
हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने एक फैसले में एनकाउंटर को बहुत बड़ा अपराध माना है। फैसले में यह कहा गया है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी इसका दोषी पाया जाता है, तो उसे फाँसी की सजा होनी चाहिए। सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से पुलिस विभाग में हड़कम्प है। पुलिस की स्थिति इधर कुआँ उधर खाई जैसी हो गई है। यदि सुप्रीमकोर्ट की ही मानें, तो अब कभी कोई पुलिस वाला शातिर अपराधी या आतंकवादी को मारेगा नहीं, बल्कि उसे जाने देगा, या फिर खुद ही भाग जाएगा। क्योंकि यदि कहीं से भी यह बात सामने आ जाए कि यह एनकाउंटर था, तो पुलिस वाला कभी बच नही ंपाएगा। दूसरी ओर यदि अपराधी या आतंकवादी पुलिस वाले को मार डालता है, तब तो किसी प्रकार की बात सामने नहीं आएगी। ऐसे में पुलिसवाला अपना बचाव का ही रास्ता अपनाएगा।
सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले की तीखी प्रतिक्रिया हुई है। इस संबंध में उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व डायरेक्टर जनरल प्रकाश सिंह कहते हैं कि इस प्रकार के फैसले का असर पुलिस के नैतिक बल पर पड़ेगा। पुलिस कानून से इतना अधिक डर जाएगी कि अब अपने हथियार चलाने के पहले सौ बार सोचेगी। उसे यह डर रहेगा कि यदि वह हथियार चलाते हैं, तो एनकाउंटर की बात सामने आएगी, यदि नहीं चलाते, तो अपनी जान मुश्किल में आ जाएगी। इसलिए वे एनकाउंटर करने के बजाए अपराधी को भाग जाने देंगे। कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि पुलिस वाले किसी भी रूप में राजनीति या पुलिस अधिकारियों के दबाव में न आएँ। व्यावहारिक दृष्टि से यह असंभव है। सामान्य रूप से पुलिस एनकाउंटर सरकार के दबाव में ही किए जाते हैं। यदि पुलिस ने बड़े अधिकारियों की बात न मानी, तो उसके परिणाम कितने भयानक होंगे, यह पुलिसवाला ही अच्छी तरह से जानता है। आंध्रप्रदेश पुलिस आफिसर्स एसोसिएशन के प्रेसीडेंट के.वी. चलपति राव का मानना है कि पुलिस पर चारों तरफ से अन्याय हो रहा है। वे कहते हैं कि जब किसी गेंगस्टर से मुठभेड़ हो रही हो, इस दौरान कोई पुलिसवाला मारा जाता है, तो कोई खोज-खबर लेने नहीं आएगा, पर यदि पुलिस के हाथों कोई मारा जाता है, तो उसे नकली एनकांउटर माना जाता है। हल्ला मच जाता है। उस पर जांच बिटा दी जाती है।
सामान्य रूप से सुप्रीमकोर्ट इस तरह का कोई फैसला देती है, तो मानव अधिकार के लिए लड़ने वाले सामने आ जाते हैं। पर आश्चर्य की बात यह है कि इस फैसले के आने के बाद कहीं कोई हलचल दिखाई नहीं दे रही है। मानव अधिकार के लिए लड़ने वाले एक आंदोलनकारी ने कहा कि वे इससे कतई खुश नहीं हैं। इस फैसले से सुप्रीमकोर्ट को भले ही लोकप्रियता मिल जाए, पर सच तो यह है कि कानूनी रूप से यह बिलकुल भी व्यावहारिक नहीं है। नकली एनकाउंटर के दोषी पुलिस अधिकारी को फाँसी पर चढ़ा दिया जाए, यह कोई समस्या का समाधान नहीं है। यदि नकली एनकाउंटर की समस्या से हमेशा के लिए निजात पाना है, तो इसके लिए दूसरे समाधान की तलाश की जाए। पुलिस अधिकारी को फाँसी पर चढ़ा देने से होगा ये कि भविष्य में कभी कोई एनकाउंटर नहीं होगा। सभी अपराधी या आतंकवादी भागने के पहले पुलिस अधिकारियों को मार डालेंगे या फिर पुलिस अधिकारी स्वयं ही अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़ा होगा। पुलिस का मनोबल तो टूटेगा ही, साथ ही फाँसी का डर सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक कमजोर बना देगा। यह एक सच्चई है।
नकली एनकाउंटर के मुद्दे पर सुप्रीमकोर्ट का बार-बार बदलते विरोधाभासी निर्णय भी एक चिंता का विषय है। इसे कभी पुलिस वालो की विवशता के रूप में भी देखा जाए। पुलिस की नीयत पर संदेह करने के पहले यदि नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (एनएचआरसी)की रिपोर्ट देख ली जाए, तो बेहतर होगा। पुलिस एनकाउंटर के जो आँकड़े उपलब्ध हैं, उसकी जाँच में यह पाया गया है कि 1993 से अब तक 2956 मामले सामने आए हैं। इसमें से 1366 मामले नकली एनकाउंटर के हैं। जब इन मामलों की गहराई से जाँच की गई, तब यह तथ्य सामने आया कि इनमें से केवल 27 मामले ही नकली एनकाउंटर के हैं। समाजसेवी मानते हैं कि नकली एनकांउटर के मामले में धारा 21 का स्पष्ट रूप से उल्लंघन होता है। इस धारा में कहा गया है कि कानूनी प्रक्रिया में मार्गदर्शन के अलावा किसी भी व्यक्ति का जीवन या उसकी आजादी ले लेना अपराध की श्रेणी में आता है। नकली एनकाउंटर के बढ़ते मामले को देखते हुए एनएचआरसी नवम्बर 1996 में एक मार्गदेर्शिका का प्रकाशन किया और 2003 में यह जोड़ा कि यह मार्गदर्शिका नकली एनकाउंटर के मामले में एफआईआर और पुलिस की प्रतिक्रिया के कारण होने वाली मौत की तमाम घटनाओं की जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच जैसे नियमों का समावेश किया गया है। इस मार्गदर्शिका का कोई मतलब ही नहीं है, क्योंकि संस्था के पास इतने अधिकार नहीं हैं कि वे कोई कार्रवाई कर सके। इससे पुलिस की कार्यशैली और नकली एनकाउंटर की प्रक्रिया पर किसी तरह का कोई असर नहीं होगा। न मार्गदर्शिका से न तो सरकार डरती है और न ही पुलिस।
अब समय आ गया है कि इस दिशा में हवाई किले बनाने से अच्छा है कि कुछ ऐसा किया जाए कि पुलिस का मनोबल न टूटे और दोषी पुलिस अधिकारियों को सजा भी हो। समाधान तो तलाशना ही होगा। देश की सुरक्षा को लेकर आज जितने भी मामले सामने आ रहे हैं उसमें पुलिस की भूमिका को हमेशा संदिध माना जाता है। पर पुलिस कितने दबाव में काम करती है, इसे भी जानने की आवश्यकता है। यदि दोषी पुलिस अधिकारियों को फाँसी की सजा दी जाने लगी, तो आतंकवादियों और शातिर अपराधियों के हौसले बुलंद हो जाएँगे। वे खुलकर अपना खेल खेलेंगे। उन्हें मालूम है कि हमें मारने वाला पुलिस अधिकारी भी बच नहीं पाएगा। संभव है वे ही उस पुलिस अधिकारी को ठिकाने लगा दें। दोनों ही मामलों में कानून की लंबी प्रक्रिया चलती है, इस दौरान अन्य पुलिसकर्मियों में यह भावना धर कर जाती है कि यदि वे मुस्तैदी से अपना काम करती है, तो उस पर आरोपों की बौछार शुरू हो जाती है। पुलिस वाला आतंकवादियों के हाथों मारा जाता है, तो कहीं कोई आंदोलन नहीं होता, पर यदि पुलिस वाले के हाथों कोई मारा जाता है, तो उसे नकली एनकाउंटर का मामला बना दिया जाता है। ऐसे में कोई क्यों हथियार उठाए? आतंकवादी को भाग देने या घटनास्थल से भाग जाने में ही पुलिस वाले की भलाई है, तो फिर क्यों हथियार उठाकर खतरा मोल लिया जाए?
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 24 जून 2011

क्‍या अब नहीं होंगे एनकाउंटर




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-06-24&pageno=9

गुरुवार, 23 जून 2011

मंद पड़ जाएगी स्रप्रीमकोर्ट की हुंकार




नवभारत रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

मंगलवार, 21 जून 2011

गरीब परिवारों के लिए वरदान है हिप्नोबर्थिग

डॉ. महेश परिमल
एक नारी के लिए सच्च सुख है मातृत्व प्राप्त करना। इसे प्राप्त करने के पहले उसे पीड़ा की एक नदी ही पार करनी होती है। जिसे प्रसव वेदना कहा जाता है। असीम पीड़ा, तीव्र पीड़ा और असह्य दर्द, ये सभी एक साथ सामने आते हैं, जब एक नारी इस वेदना से गुजर रही होती ेहै। इस वेदना को कम करने के लिए आज के चिकित्सक उसे इंजेक्शन दे देते हैं, जिससे कुछ देर के लिए यह दर्द काफूर हो जाता है। थोड़ी देर बाद फिर वही पीड़ा का दौर। बरसों पहले गाँव-गाँव में दाइयाँ हुआ करती थीं, जो अपने अनुभव से विवाहिता को इस पीड़ा से छुटकारा दिलाती थीं। इनके अनुभव काफी काम आते थे। सोचो, एक बड़े शहर में एक महिला को प्रसव वेदना हुई। वह तड़पने लगी। उसकी सास ने एम्बुलेंस को फोन किया। कुछ ही देर में एम्बुलेंस आ गई। थोड़ी देर बाद सास ने देखा कि बहू अब चीख नहीं रही है। उसे आश्चर्य हुआ। वह महामृत्युंजय का पाठ करने लगी। ईश्वर ये क्या हो गया। दिन पूरे हैं, इस वेदना हुई और अब वह किसी तरह की पीड़ा से छटपटा नहीं रही है। हमारे जमाने में तो पूरा आसमान ही सर पर उठा लिया जाता था। सास अमंगल विचारों से घिर गईं। एम्बुलेंस नर्सिंग होम पहुँची, वहाँ पूरी तैयारी थी। डेढ़ घंटे बाद बहू एक नवजात के साथ बाहर आई। सास को आश्चर्य हुआ! दोनों ही स्वस्थ थे। सास को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ऐसा भी हो सकता है। सास ने जब बहू से इसका राज पूछा, तो बहू ने मुस्कराकर कहा-माँ जी, यह तो हिप्नोबर्थिग का कमाल है। अब भला सास क्या जाने, ये हिप्नोबर्थिग क्या होती है? हम भी नहीं जानते कि ये आखिर है क्या?
आजकल डॉक्टर पहले से अधिक उतावले हो गए हैं। प्रसूता को धर्य नहीं है। वे प्रसव वेदना से गुजरना ही नहीं चाहतीं। इसका पूरा लाभ चिकित्सक उठा रहे हैं। वे जरा भी इंतजार नहीं करते और सिजेरियन की सलाह देते हुए तुरंत आपरेशन के लिए दबाव बनाते हैं। इस दौरान पालकों का भी विवेक काम नहीं करता, क्योंकि चिकित्सकों ने इसे काफी बढ़ा-चढ़ाकर बताया है। इसलिए वे भी उनकी हाँ में हाँ मिला देते हैं। जो काम थोड़े धर्य के साथ कुछ ही पलों में हो सकता था, वही काम अधिक खर्च के साथ अधिक पीड़ा वाला साबित होता है। लेकिन हिप्नोबर्थिग ने प्रसूताओं को इस भय से पूरी तरह से मुक्त कर दिया है। आओ, जानें कि आखिर यह हिप्नोबर्थिग है क्या? वैसे नाम से तो पता चल ही गया होगा कि यह स्वसम्मोहन प्रक्रिया है। अपने आप को सम्मोहित करना। जैसे हमें एक सूई में धागा पिरोना है। हम कितनी सावधानी से धागा पिरोने का काम करते हैं। पूरी तरह से एकाग्र होकर, सारी चिंताओं से दूर होकर पूरी तन्मयता के साथ ये कार्य सम्पन्न होता है। इसी तरह दूसरे कई काम हैं, जिसके लिए तन्मयता की आवश्यकता है। ठीक उसी तरह स्व-सम्मोहन भी एक ऐसी ही पद्धति है, जिसमें पीड़ित व्यक्ति स्वयं को सम्मोहित करता है। आजकल यूरोप-अमेरिका में यह अति लोकप्रिय टेकनिक है। हॉलीवुड की अभिनेत्री जेसिका अल्बा ने इस टेकनिक से प्रसूति करवाई थी। आज भी गाँवों में कई दाइयाँ ऐसी हैं, जो आज की गायनेकोलॉजिस्ट के अनुभव को चुनौती देने में सक्षम हैं। यह पद्धति इसलिए लोकप्रिय हुई है कि आज के लालची चिकित्सक द्वारा लगातार किए जा रहे सिजेरियन ऑपरेशन हैं। कुछ विशेष कारणों में सिजेरियन आवश्यक हो सकता है, पर हर मामले में सिजेरियन संभव ही नहीं है, लेकिन लालची चिकित्सक इसे संभव बनाने में लगे हुए हैं।
हिप्नोबर्थिग में गर्भवती महिला को स्व-सम्मोहन करना सिखाया जाता है। कई मामलों में गर्भवती महिलाएँ अपने घर में ही प्रसूति कराने के किस्से सामने आए हैं। पति, प्रशिक्षित नर्स और परिजनों की उपस्थिति में गर्भवती महिला अपने इष्टदेव का स्मरण कर स्व-सम्मोहन द्वारा अपनी पीड़ा को सह्य बनाती है। पीड़ा को भूलने के लिए हिप्नोटिज्म यानी सम्मोहन विद्या का सहारा लिया जाता है। आधुनिक विज्ञान कहता है कि स्व-सम्मोहन से जब मादक द्रव्यों का नशा छुड़ाया जा सकता है, तो फिर प्रसव वेदना को कम कैसे नहीं किया जा सकता? दिल्ली और बेंगलोर में हिप्नोबर्थिग के सफल प्रयोग हो चुके हैं। इस तकनीक से सिजेरियन ऑपरेशन को टाला जा सकता है। इससे प्राकृतिक रूप से बच्चे का जन्म लेना संभव हुआ है। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि हमारे देश में अभी भी अधिकांश लोग सफाई के प्रति उतने गंभीर नहीं हैं, जितना उन्हें होना चाहिए। यदि कोई मध्यमवर्गीय महिला ये चाहे कि वह अपने घर में ही बच्चे को जन्म दे, तो इसके लिए काफी तैयारी करनी पड़ेगी। ताकि जच्चे-बच्चे को किसी तरह का संक्रामक रोग न लग जाए। हिप्नोबर्थिग के समर्थक कहते हैं कि इस पद्धति से दिल्ली और चेन्नई में सिजेरियन से होने वाली डिलीवरी में कमी आई है।सन् 2007-8 में 38 प्रतिशत डिलीवरी सिजेरियन से हुई थी, जो सन् 2009-10 में घटकर 21 प्रतिशत हो गई थी।
इस पद्धति का इतिहास यह है कि सबसे पहले ब्रिटिश ओब्स्टेट्रीशियन ग्रेंटली डीक-रेड (1890-1959) ने इसकी सिफारिश की थी। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने एक किताब भी लिखी- ‘चाइल्ड बर्थ विदाउट फियर’, इस पर कई चिकित्सकों ने मिलकर इस विचार को आगे बढ़ाया। इस तकनीक के समर्थक कहते हैं कि हिप्नोबर्थिग से प्रसव का समय घटता है। पीड़ा का अनुभव नहीं के बराबर होता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इसमें प्रसूति प्राकृतिक रूप से होती है। इसमें सिजेरियन की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। अभी यूरोप और अमेरिका में मेरी मोंगन और केरी टुश्शोफ की हिप्नोबर्थिग टेकनीक काफी लोकप्रिय है। जो प्रसूता अस्पताल जाने के काल्पनिक भय से पीड़ित होती है, उसके लिए यह टेकनीक उपयोगी है। भारत में यह तकनीक अभी कुछ शहरों तक ही सीमित है। यदि इसका सुचारू रूप से प्रचार किया जाए, तो यह मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक वरदान साबित हो सकती है।

डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 20 जून 2011

बहुत काम आती हैं पिता की सीख



रमेश शर्मा
पत्थलगांव/छत्तीसगढ़/
अक्सर ऐसा होता है, जब लोग सामने होते हैं, तो उनकी कद्र नहीं होती, पर जब वे अपनी सुनहरी यादें छोड़कर चले जाते हैं, तब उनकी खूब याद आती है! तब उनकी याद का स्थायी रखने के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों को याद करते हैं! कई तो उनकी सीख को गाँठ बांधकर रख लेते हैं। अब रमेश मेहरा को ही देख लो, वे मानते हैं कि जब कभी धैर्य चुकने लगता है तो पिता का स्मरण कर उन्ही से मदद मांगता हूं। इसके बाद सभी मुश्किलें देखते ही देखते आसान हो जाती हैं। पांच साल की छोटी सी उम्र के दौरान स्कूल में दाखिला दिलाने के बाद भले ही पिता का साया साथ नहीं रह पाया हो पर पिता का सिखाया हुआ शिक्षा का मूलमंत्र जशपुर जिले के पत्थलगांव निवासी रमेश मेहरा को हमेशा काम आ रहा है।
यहंा होटल का व्यवसाय करने वाला शख्स रमेश मेहरा को पिछले चार दशकों से अपनी विधवा भाभी और चार छोटी बहनों के लिए पिता जैसी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहे हैं। मेहरा का कहना है कि वह अपने बड़े परिवार की परवरिश में कहीं भी पिता की कमी को याद नहीं आने देते। कई बार बेहद जटिल स्थिति निर्मित हो जाती हैं उस मुश्किल घड़ी में एकांत में बैठकर पिता का स्मरण करने के बाद उसे फिर से काम करने की ऊर्जा मिल जाती है। रमेश मेहरा ने बताया कि उसकी कम उम्र में ही पिता का देहांत हो गया था। अपने पिता से जीवन की बारीकिंया भले ही सीखने को नहीं मिल पाई थी। लेकिन पिता व्दारा स्कूल में दिलाया गया दाखिला को ही वह जीवन का मूलमंत्र मानता है। इस शख्स ने अपने परिवार के अन्य बच्चों को कठिन परिस्थितियों के बाद भी बेहतर शिक्षा दिला कर उनके जीवन की राह आसान कर दी हैं। मेहरा की बहन और भतीजों का बड़ा परिवार होने के बाद भी शिक्षा के मूलमंत्र के चलते उसे कहीं भी दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ रहा है। मेहरा के दो भतिजों को प्रारम्भ से ही अच्छी शिक्षा-दीक्षा मिल जाने से वे अब जर्मनी में रह कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। मेहरा का कहना है कि पिता का प्यार से भौतिक सुख सुविधा की बराबरी नहीं की जा सकती है। लेकिन पिता की बातों सुखद अहसास हमेषा काम आता है। उन्होने बताया कि पिता ने स्वयं जाकर स्कूल में दाखिला नहीं दिलाया होता तो वह शायद षिक्षा का महत्व नहीं समझ पाता। मेहरा का कहना है कि वह अपने परिवार के सभी बच्चों का स्कूल में जाकर दाखिला कराना नहीं भुलता है। पिता की इस याद को वह परम्परा बना चुका है। शिक्षा के बलबूते ही उसे जीवन के लम्बे सफर में अभाव और मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ा है।

रमेश शर्मा
पत्थलगांव/छत्तीसगढ़/

शुक्रवार, 17 जून 2011

मौन का साथ छोड़कर बाबा ने गलत किया

डॉ. महेश परिमल
एक डरी हुई सरकार से इससे बेहतर की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती थी। सरकार यही चाहती थी कि बाबा रामदेव की छवि उनके समर्थकों के सामने ही धूमिल हो जाए। एक तरफ वार्ता का ढकोसला दूसरी तरफ एक साजिश के तहत उन्हें बेइज्जत करना, क्या एक लोकतांत्रिक सरकार का यही कर्तव्य है? जिस बाबा रामदेव के लिए सरकार ने लाल जाजम बिछाया, उसे ही रात के अंधेरे में गिरफ्तार कर उनके आश्रम में भेज दिया। क्या यह सरकार को शोभा देता है? निश्चित रूप से सरकार अपने तमाम हथकंडों से बाबा का आंदोलन सफल होने देना नहीं चाहती थी। वह इसमें पूरी तरह से सफल रही। रही सही कसर उनके दिल्ली में घुसने पर प्रतिबंध लगाकर कर दी।
अब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से सबके सामने है कि आखिर बाबा का यह आंदोलन क्यों विफल हुआ? इतना तो तय है कि सरकार जो चाहती थी, वह तो उसने कर लिया। पर बाबा जो चाहते थे, वह नहीं हो पाया। अपनी गलती को सरकार तो छिपा ले गई। अब सारा दोष वह निश्चित रूप से किसी और पर डाल देगी। लेकिन बाबा ने जिस तरह से मीडिया का उपयोग करते हुए लगातार अपना प्रलाप जारी रखा, वही उनके आंदोलन की विफलता का एक महत्वपूर्ण कारण है। जो ध्यान करते हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि मौन में जो शक्ति है, उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। अपनी घोषणा के बाद या फिर मंत्रियों के मनाने के बाद यदि वे मौन की घोषणा करते, तो शायद हालात दूसरे होते। वे मीडिया के सामने यही कहते रहे कि मेरी माँगों पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। उसका रुख सकारात्मक है। वार्ता में कोई अवरोध नहीं है। सरकार पर बाबा का यह भरोसा ही उन्हें ले डूबा। सहमति पत्र पर हस्ताक्षर के बाद सरकार ने अपना पासा फेंका।
एक और बात यह है कि बाबा के पास एक अच्छी सोच तो है, पर उसका पोषण करने वाले कहीं न कहीं राजनीति से ही जुड़े लोग हैं। अण्णा साहब के पास गैर राजनीतिज्ञों की पूरी एक टीम थी। सभी अपने-अपने क्षेत्र की प्रसिद्ध हस्तियाँ हैं। सरकार उनके आंदोलन में किसी प्रकार का अडंगा डालती, तो ये बुद्धिजीवी उसका विकल्प बता देते। एक सूझबूझ वाली टीम के साथ जिस तरह से अण्णा जुड़ें हैं, उस तरह से बाबा नहीं जुड़े। बाबा के साथ जो 5 लोग हैं, उनके तार कहीं न कहीं राजनीति से जुड़े हैं। फिर चाहे वे गोविंदाचार्य हों, या फिर महेश जेठमलानी। बाबा ने अपने आंदोलन की रूपरेखा रूपरेखा उन्होंने काफी पहले तैयार कर ली थी। इसमें 5 लोगों ने अहम भूमिका निभाई । पर्दे के पीछे रह कर इस आंदोलन को हकीकत बनाने वाले 5 पांच चेहरे हैं- गोविंदाचार्य, अजित डोभाल, एस गुरुमूर्ति, महेश जेठमलानी और वेद प्रताप वैदिक। ये पांचों इस वक्त बाबा की उस कोर टीम के हिस्सा हैं जिनसे राय-विचार कर बाबा लगातार सरकार को चुनौती दे रहे थे। अण्णा हजारे की टीम में स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी, शांति भूषण जैसी हस्तियाँ हैं, जो समाज में महत्वपूर्ण सम्मान रखती हैं।
बाबा और अण्णा हजारे में यही एक बड़ा अंतर है कि बाबा के साथ उनके अनुयायी हैं, जो उनके योग के माध्यम से अपनी पीड़ाओं से मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं। इनकी अपनी कोई सोच नहीं है, अपने कोई विचार नहीं हैं। अगर इन्हें नशक्ति के रूप में स्वीकार किया जाए, तो इनका सही इस्तेमाल करना बाबा नहीं जान पाए। तमाम योग में सिद्धहस्त बाबा राजयोग को नहीं समझ पाए। बाबा के हठयोग पर राजयोग भारी पड़ गया। केवल मौन को दूर रखकर वे सबसे दूर हो गए। मौन उनके करीब होता, तो उनका आंदोलन भी सफल हो जाता। न बाबा बात करते, न सरकार कुछ कह पाती। इस बीच सरकार पर दबाव भी बन जाता।
बाबा की माँगें साधारण ही हैं। सोचिए कि बाबा रामदेव क्यों आमरण अनशन पर बैठे थे? वे चाहते हैं कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस लाने के लिए सरकार अध्यादेश जारी करे। उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर भ्रष्टाचारियों को फाँसी अथवा आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान करे। सरकारी पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए समर्थ और स्वायत्त लोकपाल गठित करे। मेडिकल, विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाएं हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में भी ली जाएँ, ताकि गांवों के नौजवानों को समान अवसर मिल सके। वे व्यवस्था परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, जिसमें खासकर लोकसेवक डिलीवरी एक्ट बनाने की मांग शामिल है ताकि आम आदमी का काम समय से हो सके और फाइल को दबाकर अफसर भ्रष्टाचार नहीं कर सकें। इनमें कौन सी मांग देशहित के खिलाफ है?
तमाम हालात को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि आने वाले दिन सरकार के लिए मुश्किल भरे हो सकते हैं। समझ लो इस दिशा में सरकार ने पहला कदम उठा भी दिया है। यह सरकार भ्रष्टाचार के दलदल से जितना निकलने की कोशिश कर रही है, वह उसमें उतनी ही धँसती जा रही है। राष्ट्रमंडल खेलों से भ्रष्टाचार को जो सिलसिला शुरू हुआ, वह स्पेक्ट्रम कांड, हसन अली कांड से शुरू होकर बाबा पर अमानुषिक रूप से किया जाने वाला अत्याचार पर भी जाकर खत्म नहीं हुआ है। हालात यही रहे, तो सरकार इस तरह की कार्रवाई जारी रखेगी। क्योंकि एक डरी हुई सरकार वह सब कुछ कर सकती है, जो उसे नहीं करना चाहिए। भ्रष्टाचार से खुद को मुक्त करने के लिए सरकार ने कुछ प्रयास अवश्य किए हैं, जिसके कारण सुरेश कलमाड़ी, ए. राजा, कनिमोझी, हसन अली आदि कई बदनाम चेहरे सलाखों के पीछे हैं। पर इतने से कुछ नहीं होता। सरकार को इससे आगे बढ़कर कुछ करना होगा। अब सरकार उलझ गई है। खुद को बचाने के लिए वह जितने हाथ-पैर मारेगी, निश्चित रूप से यह प्रयास उसके खिलाफ ही होंगे।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 16 जून 2011

ऑनर किलिंग पर राज्‍यों की खामोशी



दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर प्रकाशित

लिंक
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-06-16&pageno=9

शुक्रवार, 10 जून 2011

कभी सुना है एकांत का मदधम संगीत




दैनिक भास्‍कर के सभी संस्‍करणों में एक साथ प्रकाशित

लिंक
http://10.51.82.15/epapermain.aspx?edcode=120&eddate=6/10/2011%2012:00:00%20AM&querypage=10

बुधवार, 8 जून 2011

ई तो ‘एब्सर्ड’ रामलीला है........

भ्रष्टाचार की लंका ढाने
विदूषकों के झुंड लड़े
रावण बैठा मौज करे
ये कैसी रामलीला रे.......

कहीं ट्विटर का ‘सुंदर’ कांड
कहीं डंडे का ‘युद्ध’कांड
‘प्रश्न’ वहीं के वहीं खड़े
रावण बैठा मौज करे
ये कैसी रामलीला रे....

सीताहरण नहीं लक्ष्मीहरण
लक्ष्मण रेखा भी कैसी?
छोटा चोर जेल जाए
बड़े चोर को ए.सी.
रावण बैठा मौज करे
ये कैसी रामलीला रे.....

कभी दुबई-मॉरिशस में
कभी स्वीस बैंक में ढूँढते हैं
अरे! लंका खड़ी है दिल्ली में
जहाँ सभी कुंभकरण से सोते हैं
रावण बैठा मौज करे
ये कैसी रामलीला रे.......

युद्ध भी कितना भीषण
जहाँ मीडिया ढूँढे विभीषण
वार्ताकार भी चार मिले
चारों रावण के मुखौटे
नौटंकी ये गजब चली
हर भांड राम का रोल करे
अंजनिपुत्र पश्चाताप में
हमारे राम खोय किस वन में?
रावण क्यों न मौज करे
ई तो ‘एब्सर्ड’ रामलीला है........

मंगलवार, 7 जून 2011

डरी सहमी सरकार का गलत फैसला



हठयोग पर भारी पड़ा राजयोग

मौन का साथ छोड़कर बाबा ने गलत किया


डॉ. महेश परिमल
एक डरी हुई सरकार से इससे बेहतर की अपेक्षा ही नहीं की जा सकती थी। सरकार यही चाहती थी कि बाबा रामदेव की छवि उनके समर्थकों के सामने ही धूमिल हो जाए। एक तरफ वार्ता का ढकोसला दूसरी तरफ एक साजिश के तहत उन्हें बेइज्जत करना, क्या एक लोकतांत्रिक सरकार का यही कर्तव्य है? जिस बाबा रामदेव के लिए सरकार ने लाल जाजम बिछाया, उसे ही रात के अंधेरे में गिरफ्तार कर उनके आश्रम में भेज दिया। क्या यह सरकार को शोभा देता है? निश्चित रूप से सरकार अपने तमाम हथकंडों से बाबा का आंदोलन सफल होने देना नहीं चाहती थी। वह इसमें पूरी तरह से सफल रही। रही सही कसर उनके दिल्ली में घुसने पर प्रतिबंध लगाकर कर दी।
अब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से सबके सामने है कि आखिर बाबा का यह आंदोलन क्यों विफल हुआ? इतना तो तय है कि सरकार जो चाहती थी, वह तो उसने कर लिया। पर बाबा जो चाहते थे, वह नहीं हो पाया। अपनी गलती को सरकार तो छिपा ले गई। अब सारा दोष वह निश्चित रूप से किसी और पर डाल देगी। लेकिन बाबा ने जिस तरह से मीडिया का उपयोग करते हुए लगातार अपना प्रलाप जारी रखा, वही उनके आंदोलन की विफलता का एक महत्वपूर्ण कारण है। जो ध्यान करते हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि मौन में जो शक्ति है, उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। अपनी घोषणा के बाद या फिर मंत्रियों के मनाने के बाद यदि वे मौन की घोषणा करते, तो शायद हालात दूसरे होते। वे मीडिया के सामने यही कहते रहे कि मेरी माँगों पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। उसका रुख सकारात्मक है। वार्ता में कोई अवरोध नहीं है। सरकार पर बाबा का यह भरोसा ही उन्हें ले डूबा। सहमति पत्र पर हस्ताक्षर के बाद सरकार ने अपना पासा फेंका।
एक और बात यह है कि बाबा के पास एक अच्छी सोच तो है, पर उसका पोषण करने वाले कहीं न कहीं राजनीति से ही जुड़े लोग हैं। अण्णा साहब के पास गैर राजनीतिज्ञों की पूरी एक टीम थी। सभी अपने-अपने क्षेत्र की प्रसिद्ध हस्तियाँ हैं। सरकार उनके आंदोलन में किसी प्रकार का अडंगा डालती, तो ये बुद्धिजीवी उसका विकल्प बता देते। एक सूझबूझ वाली टीम के साथ जिस तरह से अण्णा जुड़ें हैं, उस तरह से बाबा नहीं जुड़े। बाबा के साथ जो 5 लोग हैं, उनके तार कहीं न कहीं राजनीति से जुड़े हैं। फिर चाहे वे गोविंदाचार्य हों, या फिर महेश जेठमलानी। बाबा ने अपने आंदोलन की रूपरेखा रूपरेखा उन्होंने काफी पहले तैयार कर ली थी। इसमें 5 लोगों ने अहम भूमिका निभाई । पर्दे के पीछे रह कर इस आंदोलन को हकीकत बनाने वाले 5 पांच चेहरे हैं- गोविंदाचार्य, अजित डोभाल, एस गुरुमूर्ति, महेश जेठमलानी और वेद प्रताप वैदिक। ये पांचों इस वक्त बाबा की उस कोर टीम के हिस्सा हैं जिनसे राय-विचार कर बाबा लगातार सरकार को चुनौती दे रहे थे। अण्णा हजारे की टीम में स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी, शांति भूषण जैसी हस्तियाँ हैं, जो समाज में महत्वपूर्ण सम्मान रखती हैं।
बाबा और अण्णा हजारे में यही एक बड़ा अंतर है कि बाबा के साथ उनके अनुयायी हैं, जो उनके योग के माध्यम से अपनी पीड़ाओं से मुक्ति प्राप्त कर चुके हैं। इनकी अपनी कोई सोच नहीं है, अपने कोई विचार नहीं हैं। अगर इन्हें नशक्ति के रूप में स्वीकार किया जाए, तो इनका सही इस्तेमाल करना बाबा नहीं जान पाए। तमाम योग में सिद्धहस्त बाबा राजयोग को नहीं समझ पाए। बाबा के हठयोग पर राजयोग भारी पड़ गया। केवल मौन को दूर रखकर वे सबसे दूर हो गए। मौन उनके करीब होता, तो उनका आंदोलन भी सफल हो जाता। न बाबा बात करते, न सरकार कुछ कह पाती। इस बीच सरकार पर दबाव भी बन जाता।
बाबा की माँगें साधारण ही हैं। सोचिए कि बाबा रामदेव क्यों आमरण अनशन पर बैठे थे? वे चाहते हैं कि विदेशी बैंकों में जमा काला धन वापस लाने के लिए सरकार अध्यादेश जारी करे। उसे राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर भ्रष्टाचारियों को फाँसी अथवा आजीवन कारावास की सजा का प्रावधान करे। सरकारी पदों पर बैठे लोगों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए समर्थ और स्वायत्त लोकपाल गठित करे। मेडिकल, विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाएं हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में भी ली जाएँ, ताकि गांवों के नौजवानों को समान अवसर मिल सके। वे व्यवस्था परिवर्तन की मांग कर रहे हैं, जिसमें खासकर लोकसेवक डिलीवरी एक्ट बनाने की मांग शामिल है ताकि आम आदमी का काम समय से हो सके और फाइल को दबाकर अफसर भ्रष्टाचार नहीं कर सकें। इनमें कौन सी मांग देशहित के खिलाफ है?
तमाम हालात को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि आने वाले दिन सरकार के लिए मुश्किल भरे हो सकते हैं। समझ लो इस दिशा में सरकार ने पहला कदम उठा भी दिया है। यह सरकार भ्रष्टाचार के दलदल से जितना निकलने की कोशिश कर रही है, वह उसमें उतनी ही धँसती जा रही है। राष्ट्रमंडल खेलों से भ्रष्टाचार को जो सिलसिला शुरू हुआ, वह स्पेक्ट्रम कांड, हसन अली कांड से शुरू होकर बाबा पर अमानुषिक रूप से किया जाने वाला अत्याचार पर भी जाकर खत्म नहीं हुआ है। हालात यही रहे, तो सरकार इस तरह की कार्रवाई जारी रखेगी। क्योंकि एक डरी हुई सरकार वह सब कुछ कर सकती है, जो उसे नहीं करना चाहिए। भ्रष्टाचार से खुद को मुक्त करने के लिए सरकार ने कुछ प्रयास अवश्य किए हैं, जिसके कारण सुरेश कलमाड़ी, ए. राजा, कनिमोझी, हसन अली आदि कई बदनाम चेहरे सलाखों के पीछे हैं। पर इतने से कुछ नहीं होता। सरकार को इससे आगे बढ़कर कुछ करना होगा। अब सरकार उलझ गई है। खुद को बचाने के लिए वह जितने हाथ-पैर मारेगी, निश्चित रूप से यह प्रयास उसके खिलाफ ही होंगे।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 6 जून 2011

खोटी नीयत सामने आ ही गई





रायपुर एवं बिलासपुर नवभारत के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित आलेख

लिंक

http://www.navabharat.org/raipur.asp







शुक्रवार, 3 जून 2011

बाबा रामदेव का उपवास सफल होना चाहिए?



डॉ. महेश परिमल
देश में फैले भ्रष्टाचार और काले धन के खिलाफ बाबा रामदेव ने आमरण अनशन का बिगुल फूँक दिया है। इससे केंद्र सरकार हिल गई है। निश्चित रूप से यह सोचने वाली बात है कि सरकार को जो कुछ करना चाहिए, उसे अण्णा हजारे और रामदेव बाबा जैसे लोग बता रहे हैं। बाबा के इरादे जो कुछ भी हों, पर सच तो यह है कि उन्होंने एक ज्वलंत मुद्दे को सामने लाने का प्रयास किया है। यदि सरकार इस दिशा पर पहले ही ध्यान देती और उसकी नीयत साफ होती, तो शायद ऐसा कुछ नहीं होता। पर सरकार की नीयत में खोट है, इसलिए कुछ लोगों को सामने आने का मौका मिल रहा है। वैसे बाबा ने प्रधानमंत्री की अपील ठुकराकर यह साबित कर दिया है कि उनकी कोई हैसियत नहीं है। वे चाहकर भी कुछ ऐसा नहीं कर सकते, जिससे क्रांति आ जाए।
केंद्र सरकार ने चार हस्तियों को बाबा को मनाने के लिए भेजा। इससे ऐसा लगता है कि बाबा भी अण्णा हजारे की तरह ही लोगों की भीड़ जुटा सकते हैं और अपनी माँगें मनवा सकते हैं। लेकिन बाबा को यह अच्छी तरह से मालूम है कि किस तरह से सरकार आश्वासन देकर बाद में अपने वादे से मुकर जाती है। इसलिए उन्होंने यह घोषणा कर दी है कि आमरण अनशन का फैसला वे किसी भी सूरत में वापस नहीं लेंगे। उनके इस दृढ़ संकल्प से सरकार हिल गई है। सरकार भी यह अच्छी तरह से जानती है कि जिन दो मुद्दों को लेकर बाबा आगे बढ़ रहे हैं, वे मुद्दे देश के लिए कोढ़ साबित हो रहे हैं। केंद्र सरकार में बहुत से भ्रष्ट राजनेता हैं, जिनके काले धन विदेशी बैंकों में जमा हैं। यही नहीं भ्रष्टाचार न करने वाला कोई नेता ऐसा नहीं है, जो दावे के साथ कह दे कि उसने कभी भ्रष्टाचार नहीं किया। सरकार यह जानती-समझती है, इसलिए वे डरी हुई है। जिस तरह से अण्णा हजारे को जनता का समर्थन मिला, ठीक उसी तरह बाबा रामदेव को मिला, तो देश एक नई राह पर जाने से कोई रोक नहीं सकता।
बरसों से यह बात सामने आती रही है कि किस मंत्री का कितना धन विदेशों में जमा है। इस दिशा में कभी कोई ऐसे प्रयास नहीं हुए, जिससे लगे कि सरकार इस दिशा में सचमुच गंभीर है। सरकार को इस दिशा में गंभीर किया अण्णा हजारे ने। सरकार के लिए केवल अण्णा हजारे कतई महत्वपूर्ण नहीं थे, महत्वपूर्ण था उन्हें मिलने वाला जन समर्थन। इसी जन समर्थन से सरकार बनाने वाले विजयी होते हैं, आज वही जन सैलाब इन्हीं मंत्रियों और नेताओं के लिए आँख के किरकिरी बन गए हैं। यदि बाबा के साथ जन सैलाब उमड़ पड़ा, तो क्या होगा? यही चिंता सरकार को सता रही है।
बाबा के शंखनाद से यह तो तय हो गया है कि अब जो लोग सरकार की किसी भी कार्यप्रणाली पर अपने विचार नहीं रखते थे, सब चलता है, की तर्ज पर वे सरकार की मनमानियों को सह लेते थे, वे भी अब खुलकर बोलने लगे हैं। आम आदमी का इस तरह से खुलकर बोलना किसी भी सरकार के लिए सरदर्द हो सकता है, उन परिस्थितियों में जब सरकार स्वयं ही भ्रष्टाचार में गले तक डूबी हुई हो। चार जून सरकार के लिए उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना बाबा के लिए। अब दोनों की कसौटी है। जनता का धर्य जवाब दे चुका है। बाबा ने इसे जानते समझते हुए यह कदम उठाया है। सरकार की परेशानी यह है कि उनके खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई भी नहीं कर सकती। क्योंकि उनके खिलाफ एक कदम भी प्रजा के गुस्से का कारण बन सकता है। भले ही बाबा असरकारी हैं, उनका किसी पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है, फिर भी उन पर हाथ डालना खतरे से खाली नहीं है। क्योंकि उनके साथ जन समर्थन है।
जिस तरह से अण्णा हजारे को सरकार ने आश्वासन दिया था कि लोकपाल विधेयक को लेकर उनकी माँगें मानी जाएँगी, बाद में चर्चा में उनकी कई माँगों को नजरअंदाज किया गया। इससे साबित हो गया कि सरकार की नीयत में खोट है। अब जब बाबा काले धन और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता को लेकर आमरण अनशन की घोषणा कर चुके हैं, यही नहीं प्रधानमंत्री और रह्वाजनैतिक हस्तियों की अपील और अनुनय-विनय को भी स्वीकार नहीं कर रहे हैं, तब सरकार के पास यही उसाय बचता है कि बाबा की माँगें मान ली जाएँ। बाबा की पूरी माँगें मानना सरकार के लिए संभव नहीं है। सरकार की अपनी कुछ विवशताएँ हैं। इसके चलते विवाद तो होने ही हैं। संभव है सरकार ही हिल जाए।
अब सबकी नजरें चार जून पर टिकी हैं,जब बाबा अपना आमरण-अनशन शुरू करेंगे। निश्चित रूप से इन्हें भी जन समर्थन मिलेगा। वैसे भी अपने योग से वे भीड़ जुटाने में सिद्धहस्त हो चुके हैं। अपने योग से वे अपनी क्षुधा को तो शांत कर लेंगे, पर उनके इस हठयोग को सरकार किस तरह से निपटेगी, यही देखना है।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 30 मई 2011

बदलते परिवेश में बदलती पत्रकारिता



आज पत्रकारिता दिवस


अतुल कुमार शर्मा

समाज को जागरुक रखने में प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका

प्रजातांत्रिक व्यवस्था में लोकतंत्र के विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका जहां संवैधानिक स्तंभ हैं, वहीं पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। बात अगर भारतीय परिवेश में भारतीय पत्रकारिता की करें तो यह सशक्त भूमिका अदा कर रही है। आज कोई क्षेत्र पत्रकारिता की परिधि से बाहर नहीं है। आजादी पूर्व की पत्रकारिता व वर्तमान पत्रकारिता दोनों के स्वरूपों, कार्य प्रणाली व लक्ष्यों में भले ही परिवर्तन आ गया हो, लेकिन भूमिका दोनों ही समय में महत्वपूर्ण रही है। परिवर्तन की बयार दोनों ही कालों में बही है। यह भारतीय पत्रकारिता के क्षेत्र की व्यापक्ता व विकास का सूचक ही है कि स्वतंत्रता पूर्व चुनिंदा समाचार पत्रों पत्रिकाओं की संख्या आज पचास हजार का आंकड़ा पार गई है। साथ ही हर्ष का विषय है कि इनमें से बीस हजार से ज्यादा हिंदी भाषा के हैं। हिंदी प्रेमियों व पाठकों हेतु यह संतोष का विषय है। दर्जनों चौबीसों घंटों सातों दिनों चलने वाले हिंदी भाषी चैनलों ने तो सूचना तंत्र को तथा जनसंचार को एक नई परिभाषा प्रदान की है। जहां तक पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी पत्रकारिता के उदय का सवाल है तो यह उद्भव लगभग 185 वर्ष पुराना है। उदन्तमार्तण्ड हिंदी भाषा का वह पहला समाचार पत्र था जिसका प्रकाशन 1826 में कलकत्ता के कोल्हू टीला नामक स्थान से हुआ। इस प्रथम हिंदी भाषी समाचार पत्र के संपादक, मुद्रक व प्रकाशन थे पंडित युगल किशोर शुक्ल। हिंदी बहुल क्षेत्र में प्रकाशित होने वाला प्रथम समाचार पत्र बनारस अखबार था जो सन् 1845 में प्रारंभ हुआ। इसके पश्चात हिंदी पत्रकारिता के अनेक युग आए जिनमें भारतेंदु युग व द्विवेदी युग प्रमुख रहे हैं। स्वतंत्रता से पूर्व जहां ‘द ट्रिब्यून’, ‘द हिंदू’, मराठा, स्वदेशमिनम् व बंगाली जैसे विविध भाषी समाचार पत्रों की तूती बोलती थी, वहीं अर्जुन, सैनिक, प्रताप, नवयुग, इंदौर समाचार, आर्यव्रत व नई दुनिया जैसे हिप्र जातांत्रिक व्यवस्था में लोकतंत्र के विधायिका, कार्यपालिका व न्यायपालिका जहां संवैधानिक स्तंभ हैं, वहीं पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। बात अगर भारतीय परिवेश में भारतीय पत्रकारिता की करें तो यह सशक्त भूमिका अदा कर रही है। आज कोई क्षेत्र पत्रकारिता की परिधि से बाहर नहीं है। आजादी पूर्व की पत्रकारिता व वर्तमान पत्रकारिता दोनों के स्वरूपों, कार्य प्रणाली व लक्ष्यों में भले ही परिवर्तन आ गया हो, लेकिन भूमिका दोनों ही समय में महत्वपूर्ण रही है। परिवर्तन की बयार दोनों ही कालों में बही है। यह भारतीय पत्रकारिता के क्षेत्र की व्यापक्ता व विकास का सूचक ही है कि स्वतंत्रता पूर्व चुनिंदा समाचार पत्रों पत्रिकाओं की संख्या आज पचास हजार का आंकड़ा पार गई है। साथ ही हर्ष का विषय है कि इनमें से बीस हजार से ज्यादा हिंदी भाषा के हैं। हिंदी प्रेमियों व पाठकों हेतु यह संतोष का विषय है। दर्जनों चौबीसों घंटों सातों दिनों चलने वाले हिंदी भाषी चैनलों ने तो सूचना तंत्र को तथा जनसंचार को एक नई परिभाषा प्रदान की है। जहां तक पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी पत्रकारिता के उदय का सवाल है तो यह उद्भव लगभग 185 वर्ष पुराना है। उदन्तमार्तण्ड हिंदी भाषा का वह पहला समाचार पत्र था जिसका प्रकाशन 1826 में कलकत्ता के कोल्हू टीला नामक स्थान से हुआ। इस प्रथम हिंदी भाषी समाचार पत्र के संपादक, मुद्रक व प्रकाशन थे पंडित युगल किशोर शुक्ल। हिंदी बहुल क्षेत्र में प्रकाशित होने वाला प्रथम समाचार पत्र बनारस अखबार था जो सन् 1845 में प्रारंभ हुआ। इसके पश्चात हिंदी पत्रकारिता के अनेक युग आए जिनमें भारतेंदु युग व द्विवेदी युग प्रमुख रहे हैं।
अतुल कुमार शर्मा

शुक्रवार, 27 मई 2011

पाकिस्‍तान के परमाणु शस्‍त्र भी असुरक्षित



दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर प्रकाशित

लिक
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-05-27&pageno=9

मंगलवार, 24 मई 2011

टाट के प्‍याऊ में पानी से भरे लाल !





दैनिक भास्‍कर के सभी संस्‍करणों में आज एक साथ प्रकाशित
लिंक-

http://10.51.82.15/epapermain.aspx?edcode=120&eddate=5/24/2011%2012:00:00%20AM&querypage=8

शनिवार, 21 मई 2011

बैकें खुले आम लूट रही हैं उपभोक्ताओं को



डॉ. महेश परिमल

आम आदमी का जो धन बैंकों में जमा है, उसे ही उद्योगपतियों को कम ब्याज में कर्ज के रूप में दिया जा रहा है। इस धन को उद्योगपति अपने मौज-शौक में इस्तेमाल करते हैं। इस कारण मुद्रास्फीति बढ़ती है। यही मुद्रास्फीति जब अधिक हो जाती है, तब रिजर्व बैंक ब्याज दर में .25 या 50 प्रतिशत की वृद्धि कर दी जाती है। आज हमारी बचत पर बैंक जितना ब्याज दे रही है, वह सरासर अन्याय है। अब तो उसकी नजर उस आम आदमी के बचत खाते पर है। अब बैंक लेन-देन शुल्क लेने पर विचार कर रही है। इस तरह से देखा जाए, तो बैंक आम आदमी को लूटने में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती।
हमारी सरकार यदि सचमुच आम आदमी की सरकार है, तो बचत खाते में 10 और फिक्स्ड डिपाजिट पर 15 से 20 प्रतिशत ब्याज मिलना चाहिए। हाल ही में रिजर्व बैंक ने बचत खाते में ब्याज दर में 0.05 प्रतिशत की वृद्धि की है। रिजर्व बैंक द्वारा जब भी रेपो रेट या रिवर्स रेपो रेट में कमी-बेशी की जाती है, तब आम आदमी को यह समझ में नहीं आता कि इससे उसे क्या फर्क पड़ेगा? हाल में रिजर्व बैंक ने रेपो रेट 0.5 प्रतिशत से बढ़कार 7.25 प्रतिशत किया, उसके कारण अर्थ तंत्र की विकास दर 9 प्रतिशत से घटकर 8 प्रतिशत हो जाएगी। रेपो रेट बढ़ने के कारण विकासदर में आखिर क्यों कमी आएगी? यह आम आदमी की समझ से परे है। इसे समझने के लिए जब गहराई में जाते हैं, तब कई बातें स्पष्ट होती हैं।
भारतीय बैंकों द्वारा आम आदमी से लगातार छलावा किया जा रहा है। पहले बात करें बचत खाते में जमा राशि पर दिए जाने वाले ब्याज की। देश का आम नागरिक अपनी जमा पूँजी बैंकों में बचत खाते में जमा करता है। हम जानते हैं कि देश की तमाम बैंके पिछले 8 वर्षो से बचत खाते में जमा राशि पर प्रति वर्ष 3.5 प्रतिशत ब्याज दिया जाता था। इसका आशय यह हुआ कि यदि हम अपने पसीने की कमाई एक लाख रुपए बैंक में जमा कराएँ, तो एक वर्ष बाद बैंक वर्ष के अंत में केवल 500 रुपए ब्याज के रूप में देती थी। हम सब जानते हैं कि भारत में मुद्रास्फीति की दर 9 से 10 प्रतिशत रहती है, अर्थात एक वर्ष पहले हम जिस चीज को एक लाख रुपए में खरीद सकते थे, एक वर्ष बाद उसी चीज को खरीदने के लिए एक लाख दस हजार रुपए खर्च करने पड़ेंगे। दूसरे शब्दों में एक वर्ष बाद बैंक में जमा हमारा एक लाख रुपया 90 हजार के बराबर हो जाता है। इसमें यदि हम ब्याज के 500 रुपए जोड़ें, तो यह कीमत 93 हजार 500 रुपए होती है। इस तरह से हमें बचत खाते में एक लाख रुपए जमा करने से हर वर्ष 500 रुपए का नुकसान उठाना पड़ता है। वास्तव में बचत खाते में न्यूनतम ब्याजदर देश के प्रवर्तमान मुद्रास्फीति की दर जितनी होनी चाहिए।
बचत खाते में ब्याजदर कम होती है, तो उसका फायदा और नुकसान किसे होता है, यह समझना अतिआवश्यक है। देश की सभा बैंकों में निवेशकों के करीब 50 लाख करोड़ रुपए जमा हैं। इसमें से करीब 20 प्रतिशत यानी दस लाख करोड़ रुपए बचत खाते में है। यह राशि समाज के गरीब और मध्यम वर्ग की है।3.4 प्रतिशत ब्याज दर के अनुसार आज की तारीख में बैंक बचत खाताधारकों को 35 हजार करोड़ रुपए ब्याज के रूप में देती है। अब इस ब्याज दर में 0.5 प्रतिशत की वृद्धि किए जाने से खाताधारकों को दी जाने वाली राशि 40 हजार करोड़ रुपए हो जाएगी। अर्थशास्त्र के नियम के अनुसार मुद्रास्फीति की दर की अपेक्षा ब्याज की दर अधिक होनी चाहिए। हमारी बैंकें इस नियम की खुलेआम धज्जियाँ उड़ा रही हैं। इस हिसाब से बचत खातों की ब्याज दर दस प्रतिशत होनी चाहिए।
हमने देखा कि बैंकों द्वारा बचत खाते के खाताधारकों को एक वर्ष में एक लाख करोड़ रुपए ब्याज के रूप में दिए जाने चाहिए। उसके बदले में बंकें केवल 35 हजार करोड़ रुपए ही देती है। इस तरह से आम आदमी को हर वर्ष 64 हजार करोड़ रुपए का नुकसान हो रहा है। आखिर इसका लाभ किसे मिल रहा है? यह लाभ देश के बड़े उद्योगपतियों एवं कुछ हद तक बैंकों को हो रहा है। बैंक बचत खाताधारकों को मात्र 3.5 प्रतिशत ब्याज देती है, इस कारण रसूखदारों को वह कार खरीदने और उद्योगपतियों को बहुत ही कम दर पर कर्ज देती है। जबकि उनसे दस प्रतिशत ब्याज भी लिया जाए, तो वे देने में सक्षम हैं। गरीबों और मध्यमवर्ग के पसीने की कमाई को कुछ बड़े लोगों को देकर बैंक खूब लाभ कमा रही हैं। गरीबों के धन से विकास हो रहा है और गरीबों का ही शोषण हो रहा है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने जब रेपो रेट में 0.5 प्रतिशत की वृद्धि की घोषणा की, तब यह भी कहा था कि ब्याज दर में वृद्धि के कारण भारत के अर्थतंत्र का विकास 9 प्रतिशत से घटकर 8 प्रतिशत हो जाएगा। रिजर्व बैंक द्वारा बैंकों को ब्याज की जिस दर पर कर्ज दिया जाता है, उसे रेपो रेट कहते हैं। आज की तारीख में यह रेपो रेट 6.75 प्रतिशत है। इसे बढ़ाकर 7.25 प्रतिशत किया गया है। बैंक द्वारा लोगों को जो कर्ज दिया जाता है, उसके रेपो रेट में अपना मुनाफा निकाल लेती है।
रिजर्व बैंक द्वारा जब भी रेपो रेट में वृद्धि की जाती है, तब बैंकों द्वारा दिए जाने वाले ऋण की दर में भी अनिवार्य रूप से वृद्धि होती है। रेपो रेट में 0.5 प्रतिशत की वृद्धि की जाती है, तब बैंकों द्वार दिए जाने वाले लोन की दर में 0.5 से 1 प्रतिशत जितनी वृद्धि होती है। ब्याज के दर में एक प्रतिशत की वृद्धि होने से क्या फर्क पड़ता है? यह सवाल भी कई लोगों को सताता होगा। हमने पहले ही बता दिया है कि बचत खातों में करीब 50 लाख करोड़ रुपए जमा हैं। इस राशि से यदि बैंक बड़े लोगों को दस प्रतिशत की दर से कर्ज दे, तो यह राशि प्रतिवर्ष 5 लाख करोड़ रुपए जितनी होती है। यदि ब्याज की दर में एक प्रतिशत की वृद्धि की जाए, तो उद्योगपतियों और रसूखदारों को उनके व्यापार व्यवसाय के विकास के लिए ब्याज पर कर्ज दिया जाता है, तो इस डिपाजिट पर दस प्रतिशत ब्याजदर वसूला जए, तो 5 लाख करोड़ रुपए अधिक प्राप्त हो सकते हैं। यदि उनके लिए ब्याज दर में एक प्रतिशत का भी इजाफा किया जाए, तो यह रकम उद्योगपतियों और रसूखदारों को हर साल 50 हजारा करोड़ रुपए अधिक चुकाने होंगे।
2010 के मार्च महीने में रेपो रेट 5 प्रतिशत ही था। उसमें पिछले 14 महीनों में 8 बार वृद्धि की गई। अभी रेपो रेट 7.25 प्रतिशत किया गया है। इससे बैंक से कर्ज लेने वालों पर करीब 2.25 लाख करोड़ रुपए की वृद्धि की गई। ब्याज दर बढ़ती है, तो उद्योगपति स्वाभाविक रूप से बैंक से लोन लेकर नए उद्योगों के विकास की गति धीमी कर देते हैं, इसलिए विकास दर में भी कमी आती है। रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में कमी-बेशी करने का असर आम आदमी और उद्योगपतियों पर किस तरह होता है, यह भी समझने लायक है। रेपो रेट में वृद्धि होती है, तब बैंको के फिक्स्ड उिपाजिट की दरों में उस अनुपात में वृद्धि करना अनिवार्य हो जाता है। आज से 14 महीने पहले जब रेपो रेट 5 प्रतिशत था, तब बैंकों के फिक्स्ड डिपाजिट के ब्याज की दर करीब 6 प्रतिशत के आसपास थी। अब रेपो रेट बढ़कर 7.25 प्रतिशत हो गई है, तो फिक्स्ड डिपाजिट की ब्याज दर बढ़कर 9 से 10 प्रतिशत हो गई है। इस तरह से रसूखदारों को मिलने वाला कर्ज महँगा हो जाता है और गरीब और मध्यम वर्ग को उनकी जमा पूँजी पर अधिक ब्याज मिल रहा है। बैंकों के फिक्स्ड डिपाजिट में धन जमा करने वाले अधिकांश नौकरीपेशा, पेंशनर और विधवाएँ होती हैं। इनका घर ब्याज की आवक से चलता है। इन लोगों द्वारा करीब 40 लाख करोड़ रुपए फिक्स्ड डिपाजिट के रूप में बैंकों में जमा किए गए हैं। बैंक इन्हें केवल 9 से 10 प्रतिशत ब्याज देती है। देश में जिस तरह से मुद्रास्फीति बढ़ रही है, उसे देखें, तो स्पष्ट होगा कि इन्हें मिलने वाला ब्याज शून्य हो जाता है।
बैंकों में लोगों द्वारा अपनी बचत फिक्स्ड डिपाजिट के रूप में जमा कराए जाते हैं, उसके अनुपात में रसूखदारों को कार खरीदने और उद्योगपतियों को नए कारखाने के लिए कम दर पर कर्ज दिया जाता है, इस कारण ऐसा कहा जाता है कि देश का विकास तेजी से हो रहा है। इस तरह से जो विकास होता है, उसमें आम आदमी को भारी नुकसान होता है और रसूखदारों-उद्योगपतियों को खूब मुनाफा होता है। इस कार्य में केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक दलाल की भूमिका निभाती है। इसे यदि सरल भाषा में कहें, तो केंद्र सरकार, रिजर्व बंक और देश की अन्य बैंकें रेपो रेट के नाम पर आम आदमी के पसीने की कमाई को सस्ते में लेकर रसूखदारों और उद्योगपतियों मुफ्त के भाव कर्ज के रूप में दे रही है। इस पूँजीनिवेश में से उद्योगपति जो कमाई करते हैं, उसे देश का विकास कहा जाता है। कम ब्याज दर में कर्ज लेने वाले रसूखदार जी खोलकर खर्च करने की छूट मिल जाती है, इस कारण मुद्रास्फीति बढ़ती है। इसका सबसे अधिक असर आम आदमी पर पड़ता है। जब मुद्रास्फीति काबू से बाहर होने लगती है, तब रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज की दर में .25 या .5 प्रतिशत की वृद्धि कर दी जाती है, इससे लोग खुश हो जाते हैं। वास्तव में इस तरह से तमाम बैंकें आम आदमी को लूटने में लगी हैं। इसमें केंद्र सरकार और रिजर्व बैंक की मिलीभगत भी है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 20 मई 2011

इस बढ़ोत्‍तरी का गुनाहगार कौन ?



दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर आज प्रकाशित आलेख

लिंक

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-05-20&pageno=9

बुधवार, 18 मई 2011

बहाव के खिलाफ तैरना अम्‍मा को बखूबी आता है





नवभारत रायपुर और बिलासपुर संस्‍करण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित आलेख

मंगलवार, 17 मई 2011

महँगे सोने ने बदली चेहरे की रंगत


अखबार के पहले पन्ने पर सोने का भाव देखती हुई।


दैनिक अखबार और मोबाइल फोन बने उपयोगी

रमेश शर्मा/ पत्थलगांव
वह गाँव बड़ा अजीब है? कोई टीवी देखते-देखते अचानक चिल्ला पड़ता है। कोई दूसरा जब उस टीवी को देखे, तो पता ही न चले कि आखिर माजरा क्या हे? कोई मोबाइल पर बात करते-करते खुशी से उछल पड़ता है। कभी-कभी तो यह हालत होती है कि अखबार पढ़ते ही या तो वह गम में डूब जाता है, या फिर खुशी से उछलने लगता है। गम और खुशी के बीच जीने वाले कई गाँव हें, जिन्हें ईब नदी ने अपने आँचल में समेटा है। गाँव में शिक्षा का प्रसार बहुत ही कम है, पर लोग बड़े जागरुक हैं। ईब नदी ने अपने साथ स्वर्ण कण भी लाती है, जिसे यहाँ के लोग बहुत ही परिश्रम से ढँए़ते हैं, एक-एक कण सोना उनके लिए बहुत ही मूल्यवान होता है। इसलिए साने के भाव जेसे ही बढ़ते हैं, इनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। भाव जैसे ही कम होता है, तो ये दु:खी हो जाते हैं। सोने का ताजा भाव जानने के लिए ये मोबाइल, टीवी और अखबार का सहारा लेते हैं। टीवी पर इनकी नजर धारावाहिकों पर कम पर नीचे की पट्टी पर अधिक होता है। ताकि सोने का भाव जाना जा सके। खुशी और गम के साथ-साथ जीने वाले ईब नदी के तट पर बसने वाले ये आदिवासी अब आधुनिकता के साथ इस तरह से जुड़ने लगे हैं।
सोने के भाव में इन दिनो निरतंर हो रही वृद्धि के चलते यहॉं पर गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले गरीब परिवार के लोगों का रहन सहन बदल गया है। जशपुर जिले के पत्थलगांव और फरसाबहार विकास खंड अन्तर्गत अनेक गांव के लोग ईब नदी के तट पर मिटटी और रेत में स्वर्ण कण तलाशने का काम करते हैं। यहां ईब नदी के तट पर मिटटी में कीमती स्वर्णकणों की तलाश का काम करने वाले इन ग्रामीणों को सोने के दाम में बेतहास वृध्दि हो जाने से अब अच्छी खासी आमदनी होने लगी है। मिटटी और रेत को पानी में धोने की कठिन प्रRिया पूरी करके इन ग्रामीणों के पास प्रति दिन 5 सौ से एक हजार रुपऐ कीमत के स्वर्ण कण इकटठे हो जाते हैं। सोने के भाव में प्रति दिन होने वाले उतार चढ़ाव के चलते इन ग्रामीणों ने मोबाइल फोन और दैनिक अखबार का सहारा लेना शुरू कर दिया है।
बागबहार की श्रीमती दशोबाई भुइहर एवं उर्वशी मोबाइल पर सोने के भाव की जानकारी लेती हुई।

ईब नदी के तट पर स्वर्ण कणों की तलाश करके अपना जीवन यापन करने वाले ज्यादातर ग्रामीणों के जीवन स्तर में इन दिनों अच्छा क्ष्ज्ञसा बदलाव दिखने लगा है। पत्थलगांव विकास खंड के बागबहार व कोतबा क्षेत्र तथा फरसाबहार विकास खंड के ग्राम सोनाजोरी धौरासांड़ पण्डरीपानी आदि गांवों के सैकड़ों गरीब मजदूर दिन निकलते ही इस काम में जुट जाते हैं। कीमती स्वर्ण कणों की तलाश करने वाले ग्रामीणों की इस काम में अच्छी आमदनी हो जाने से ज्यादातर लोगो ने दुपहिया वाहन तथा अपने घर में मनोरंजन के लिए टीवी लगा ली है। ग्राम तपकरा के जगन्नाथ राम ने बताया कि सोने की नई दर जानने के लिए ज्यादातर मजदूरों ने मोबाइल फोन खरीद रखे हैं । मोबाइल फोन का उपयोग करके आसपास में सोने चांदी का व्यवसाय करने वाले दुकानदारों से उन्हे सोने के भाव की ताजा स्थिति पता चल जाती है। इस ग्रामीण का कहना था कि दैनिक अखबार में सोने के भाव पढ़ कर यहां के खरीददारों की ठगी से बच जाते हैं। यदाकदा सोने का भाव कम रहने की स्थिति में वे स्वर्ण कण बेचने के लिए कुछ दिनों का इन्तजार भी कर लेते हैं। ग्राम बागबहार की श्रीमती दशोबाई की बेटी उर्वशी पढ़ी लिखी होने के कारण वह पड़ोस की दुकान में प्रति दिन अखबार देखने पहुंच जाती है। अखबार में सोने का भाव देख कर ही वह मिटटी से एकत्रित किए स्वर्ण कण बेचती है। इस परिवार के पास मोबाइल फोन भी उपलब्ध है। गांव गांव तक पहुंच चुकी संचार Rांति की बदौलत ऐसे सैकड़ो लोगो का रहन सहन बदल गया है।
एक एक रुपए का हिसाब
तपकरा के थाना प्रभारी ए.आर.छात्रे ने बताया कि आदिवासी बाहुल्य यहॉं के गांवों में दैनिक अखबार और संचार सुविधा के चलते यहॉं का माहौल बदल गया है। इस बदले हुऐ परिवेश में स्वर्ण कण बेचने वाले ग्रामीण भी अछूते नहीं हैं। श्री छात्रे ने बताया कि मिटटी और रेत में स्वर्णकणों की तलाश करने वालों के पास सचांर सुविधा उपलब्ध रहने से इनके ठगे जाने की शिकायत नहीं मिल रही हैं। उन्होने बताया कि पहले यहॉं स्वर्ण कण संग्राहकों से स्थानीय व्यापारी छोटे तराजू में बाट के स्थान पर धान से स्वर्णकणों को तौल कर खरीदी करते थे। लेकिन अब सोना बेचने वालों द्वारा कम्प्यूटराइज तराजू में तौल कर एक एक रुपए का हिसाब ले लिया जाता है।

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