बुधवार, 2 जून 2010

आखिर कौन है अफजल गुरु को बचाने वाले!


डॉ. महेश परिमल
अजमल कसाब को जब फाँसी की सजा मुकर्रर हुई, उसके बाद संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फाँसी पर चढ़ाने के लिए दबाव बनने लगा। लेकिन इस बीच जो बयानबाजी हुई और फाइल इधर से उधर हुई, उससे यह स्पष्ट हो गया कि कई शक्तियाँ अफजल को बचाने में लगी हुई हैं। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि अफजल को बचाने में कौन-कौन लगे हुए हैं। अब तो यह भी सिद्ध हो गया है कि जिन अफसरों ने अफजल की फाइल को अनदखा किया, उन सभी को पदोन्नति मिली। इसका आशय यही है कि कई शकिक्तयाँ अफजल को बचाने में लगी हैं। एक फाइल चार साल तक 200 मीटर का फासला तय न कर पाए, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? इसको समझते हुए उधर अफजल यह कहा रहा है कि मैं अकेलेपन से बुरी तरह टूट गया हूं। मुझे जल्द से जल्द फाँसी की सजा दो। निश्चित रूप से यह भी उसकी एक चाल हो। पर इतना तो तय है कि अफजल पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने मंे केंद्र सरकार के पसीने छूट रहे हैं। देश के हमारे संविधान पर भी ऊँगली उठ रही है, सो अलग। आखिर क्यों हैं इतने लचर नियम कायदे और क्यों है इतने लाचार हमारी राष्ट्रपति?
पहले बात करते हैं देश के सर्वोच्च पद पर विराजमान राष्ट्रपति के अधिकारों की। कहने को तो हमारे राष्ट्रपति अथाह अधिकारों के स्वामी हें। यहाँ पर स्वामिनी कहना अधिक उचित होगा। उनके पास यदि किसी की दया याचिका आती हे, तो वे स्वतंत्र रूप से कोई निर्णय नहीं ले सकते। पहले उस आवेदन को गृह मंत्रालय भेजा जाता है। वहाँ से टिप्पणी आने के बाद उस पर राष्ट्रपति की मुहर लगती है। अभी हमारे राष्ट्रपति के पास 28 दया याचिकाएँ पेंडिंग हैं। इनमें से 7 गृह मंत्रालय के पास हैं। ये सभी याचिकाएँ भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की तरफ से उन्हें विरासत में मिली हैं। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने मात्र एक ही याचिका पर निर्णय लिया था। उन्होंने बलात्कारी धनंजय चटर्जी की दया याचिका को ठुकरा दिया था। जिसे बाद में फाँसी दी गई। इसके पूर्व के. आर. नारायण ने अपने कार्यकाल में एक भी दया याचिका पर निर्णय नहीं लिया था। अब इन सभी याचिकाओं पर निर्णय लेने की जवाबदारी प्रतिभा पाटिल पर आ पड़ी है। अब यदि हमारी राष्ट्रपति यह सोचें कि उनके पहले के राष्ट्रपतियों ने जब इस पर विचार नहीं किया, तो उनके अकेले करने से क्या होगा? वैसे भी दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकतीं। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जब राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने गृहमंत्रालय से प्राप्त एक दया याचिका को ठुकरा देने की सलाह देते हुए फाइल वापस भेज दी थी। वे चाहते थे कि इस अपराधी को फाँसी के बजाए उम्रकैद दिया जाए। इसके बाद गृहमंत्रालय ने उस पर निर्णय लिया और उस पर राष्ट्रपति को अपनी मुहर लगानी पड़ी। इस तरह से देखा जाए, तो कई अधिकार प्राप्त हमारे राष्ट्रपति संविधान के मामले में स्वयं कुछ भी निर्णय लेने में अक्षम हैं।
राष्ट्रपति की इसी अक्षमता का लाभ अफजल गुरु जैसे आतंकवादी उठा रहे हैं। अभी जो दया याचिकाएँ राष्ट्रपति के सामने हैं, उसमें से कई तो दो दशक पुरानी हैं। इन पर अभी तक फैसला नहीं हो पाया है। संविधान की इसी कमजोर नब्ज को पकड़ते हुए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर फारुख ने कह दिया कि पहले उन 28 दया याचिकाओं पर फैसला करो, फिर अफजल गुरु की याचिका पर फैसला करना। इसका मतलब साफ है कि न तो उन 28 याचिकाओं पर फैसला होगा न ही अफजल गुरु फाँसी होगी। यही बात स्पष्ट करती है कि अफजल गुरु पर किसका वरदहस्त है? उमर फारुख की इस टिप्पणी पर हमारे संविधान के विशेषज्ञों का कहना है कि फाँसी की सजा कोई होटल में रुम बुकिंग जैसी प्रक्रिया नहीं है, जिसमें जो पहले आएगा, वह पहले पाएगा।
इसके अलावा इस मामले में सबसे बड़ी बाधा सरकार की वह सोच है, जिसके अनुसार यदि अफजल गुरु को फाँसी दे दी गई, तो जम्मू-कश्मीर में हिंसा भड़क उठेगी। क्योंकि अफजल कश्मीरी मुसलमान है। अजमल कसाब को फाँसी हो, यह सभी चाहते हैं, क्योंकि वह पाकिस्तानी है। पर अफजल के मामले में कई लोग ऐसा नहीं सोचते। अफजल के कश्मीरी मुसलमान होने का लाभ कई लोग उठा रहे हैं। कई लोगों के लिए वह हीरो है। इसके पूर्व घाटी में मकबूल बट्ट को 1984 में फाँसी पर लटका दिया गया था। वह 1960 से ही कश्मीर की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था। उसे 1974 घाटी के एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या के आरोप में फाँसी की सजा सुनाई गई थी। अंतत: 11 फरवरी 1984 को उसे दिल्ली की तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी गई। उसके शव को उसके परिजनों को नहीं दिया गया और जेल में ही उसे दफना दिया गया। उसकी फाँसी के बाद कश्मीर में अलगाववाद का आंदोलन और तेज हो गया। कश्मीर की प्रजा आज भी मकबूल बट्ट को अपना हीरो मानती है। उसकी पहचान शहीदे आजम के रूप में होती है। हर साल 11 फरवरी को श्रीनगर बंद रहता है। उधर कश्मीर के अलगाववादी आज भी अफजल को अपना हीरो मानते हैं। इस स्थिति में यदि अफजल को फांसी दे दी जाती है, तो कश्मीर घाटी एक बार फिर हिंसा की चपेट में आ सकती है। यही कारण है कि सरकार अफजल की फाँसी के मामले को लगातार टाल रही है।
अजमल कसाब को फाँसी की सजा की घोषणा के बाद सरकार पर अफजल के मामले पर जल्द निर्णय लेने का दबाव बनने लगा है। अब समय आ गया है कि अफजल की फाँसी पर निर्णय ले ही लिया जाए। देर होने से अफजल की शख्सियत बढ़ती ही जाएगी। यदि केंद्र सरकार इस दिशा में ठोस कार्रवाई नहीं करती है, तो उसे राजनीतिक लाभ से कम और नुकसान अधिक उठाना होगा। वरना फाइलें तो इधर से उधर होती ही रहेंगी। इन्हीं फाइलों में से कोई फाइल कब कहाँ पहुँच जाए, कहा नहीं जा सकता।
डॉ. महेश परिमल

5 टिप्‍पणियां:

  1. सब वोट की राजनीति है.....यदि किसी की फाँसी से वोटो पर असर ना पड़ता हो तो फाँसी देने मे सरकार जरा देर नही करती...ऐसा सभी जानते हैं...

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  2. वो सभी इसके दोषी हैं जिनको सत्य और सत्य आधारित न्याय को भ्रमित करने पर फायदा हो सकता है | उम्दा विवेचना करती पोस्ट |

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  3. यह सब इसलिये किया जा रहा है ताकि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बदलकर उसे आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया जाये।

    सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता के एक मामले में पहले भी एक निर्णय में कहा है कि यदि फ़ाँसी देने में अधिक देर होती है तो यह मुजरिम को मानसिक संत्रास देने जैसा है इसलिये उसे उम्रकैद दे दी जाये… यही चाल अफ़ज़ल गुरु के मामले में खेली जा रही है…।

    कांग्रेस जैसी नीच और घटिया पार्टी से और उम्मीद भी नहीं की जा सकती। अफ़ज़ल गुरु ने संसद पर हमला किया था, न कि किसी "गाँधी" नामधारी पर, वरना उसे कब की फ़ाँसी हो चुकी होती।

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  4. वोट की राजनीती के सिवा यह कुछ नही... कब तक काग्रेस ऎसे वोटो पर राज करेगी????

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