सोमवार, 7 अप्रैल 2008

समाज को प्रभावित करते जंतुनाशक


डॉ. महेश परिमल
जब हम आजकल के बच्चों की क्रियाशीलता देखते हैं, तब प्रसन्न हो जाते हैं, हमें गर्व होता है कि जो हमने नहीं किया, वह हमारी संतान कर रही है. पर कभी किसी ने यह सोचा कि पहले हम कहानियों में ही सुना करते थे कि जानवर भी बोला करते थे. बच्चों को आज भी बोलने वाले जानवरों की कहानी अच्छी लगती है. पर आज यही जानवर आखिर क्यों इतने आक्रामक होने लगे हैं? इस दिशा में किसी ने सोचा? समाज में अपराध बढ़ रहे हैं, इस बात पर हमारे मनोवैज्ञानिक कई आलेख तैयार कर लेंगे, कई कार्यशालाओं में अपना परचा पढ़ आएँगे. पर हमारे आसपास के पशु-पक्षी अपना स्वभाव क्यों बदल रहे हैं? वे अपनी जाति से क्यों दूर होने लगे हैं, उनकी संतानोत्पत्ति की क्षमता क्यों कम होने लगी है, क्यों शहरों से अपना बसेरा छोड़ रहे हैं. आश्चर्य इस बात का है कि समाज में होने वाली इतनी बड़ी घटना हमें थोड़ा सा भी विचलित नहीं करती. कैसे समाज में जी रहे हैं हम? ंजरा कल्पना तो करें कि पशु-पक्षी हमारे संसार से विदा ले लेंगे, तब हम क्या करेंगे?
किसी खाद विक्रेता के पास जाएँ, तो वह हमें सैकड़ों जंतुनाशक दवाओं के नाम बता देगा. कुछ जंतुनाशक खरीदकर हम यह सोचते हैं कि इससे हमारी फसल पर लगे जंतुओं का नाश हो जाएगा. पर शायद हम यह भूल जाते हैं कि एक जंतुनाशक दवा कई प्राणियों पर भारी पड़ रही है. इस तरह से कई जंतुनाशक पशु-पक्षी समाज को लीलने की तैयारी कर रहे हैं और हम हैं कि जंतुनाशकों का प्रयोग रोकने में कोई कोताही नहीं कर रहे हैं.
वन तो हमसे दूर हो गए, अब तो वे छोटे-छोटे रूप में गमले में हमारे आसपास छाने लगे हैं. जापान से चली बोंसाई पध्दति हमारे विचारों को भी बौना करने लगी है. इस सूक्ष्म में हम विराट के दर्शन करने लगे हैं. बोंसाई वटवृक्ष की परिक्रमा करके हम खुश हो जाते हैं. महिलाएँ अपने पति के दीर्घायु की कामना भी कर लेती हैं, इन बौने वृक्षों से. पहले पीपल का एक पेड़ पूरे गाँव को एक करके रखता था, अब घर-ऑंगन के कई पीपल घर के सदस्यों को एक करके नहीं रख पाते. कैसा जमाना आ गया है?
अब आइए बात करें उन जंतुनाशकों की, जो आज पक्षियों की पूरी कौम को नष्ट करने में लगे हैं. यह जानकर भी यदि हम खामोश रह गए और शेष खामोश वनों की गुहार नहीं सुनी, तो हमारा शारीरिक पतन निश्चित है. विचारों का पतन तो न जाने कब से शुरू हो गया है. यह तो हम सब बेहतर जानते हैं कि किसी भी प्राणी का शारीरिक विकास हार्मोन पर निर्भर करता है. आजकल जो प्रदूषण और मिलावट पर्यावरण और खाद्य पदार्थों में हो रही है, वह शरीर के हार्मोन में तेजी से बदलाव ला रही है. जानवर भी इससे अछूते नहीं रहे.
यदि हम आज के समुद्री जीवों पर नजर डालें, तो हम पाएँगे कि इनमें तेजी से बदलाव आ रहा है. इनमें दरियाई पक्षी सी गल मुख्य है. यह पक्षी आज अपना संतुलन खो रहा है. अब वह उड़ते-उड़ते डगमगाने लगा है. उसकी ऊँची उड़ान में अब वह बात नहीं रही, क्योंकि पर्यावरण में पिछले 15 हजार वर्षों से जो बदलाव नहीं आया वह केवल हाल के 75 वर्षों में आ गया है. तमाम नदियों से आने वाला प्रदूषित जल आज समुद्र में इस कदर घुल गया है कि समुद्री जीवों के लुप्त होने का खतरा बढ़ गया है. इस खतरे की मुख्य वजह नदी की वनस्पतियों और उसमें मिलने वाले खाद्य पदार्थों में ऐसे जंतुनाशक चिपके होते हैं, जो समुद्री जीवों की शारीरिक क्षमता को प्रभावित करते हैं.
शरीर के विकास और प्रकृति पर जबर्दस्त असर डालने में रसायन के रूप में सीसा महत्वपूर्ण है. इस भारी धातु से पॉलीक्लोरिनेटेड बाय फिनाइल आता है, जो प्राणियों के व्यवहार और प्रजनन क्षमता को प्रभावित कर रहा है. जीव विज्ञानी इस बात को जानते थे, इसके बचाव के लिए वे कुछ करते, इसके पहले ही स्थिति विकराल हो गई, क्योंकि जो परिणाम सामने आए, वे आशा के विपरीत थे. ये रसायन कम मात्रा में भी यदि शरीर में प्रवेश कर जाएँ, तो प्राणियों की सामाजिक और जातीय जीवन में समागम की समस्या पैदा करते हैं. फलस्वरूप इनकी संख्या में तेजी से कमी आ रही है.
शरीर में रसायन की अधिकता से नर मेें वीर्यस्राव में कमी आती है. जिसका असर उसकी संतानोत्पत्ति पर होता है. इसके अलावा उससे कहीं अधिक असरकारी शरीर में कम मात्रा में रसायन का प्रवेश होना है. जीव विज्ञानियों ने इस दिशा में कई शोध किए हैं, जिसके परिणाम चौंकाने वाले हें. उनके अनुसार आज पर्यावरण को होने वाली क्षति के कारण समूची मानवता को खतरा पैदा हो गया है.

हाल ही में सफेद बगुला, सी गल, इंद्रगोप, घोंघा, शम्बूक, बटेर, तीतर, बंदर की एक जाति माकाक्यूज, चूहा, मछली, बाज, मेंढक पर पानी के रसायनों से होने वाले दुष्परिणाम पर शोध हुआ है. इस शोध में यह बात सामने आई है कि इन प्राणियों और पक्षियों में समागम करने की प्रवृत्ति, बच्चों के पालन-पोषण की प्रवृत्ति, घोंसले बनाने की कला, शिकार की कला, कुछ सीखने की कला, मानसिक संतुलन और सक्रियता आदि पर कई तरह के प्रभाव देखने में आए हैं.
एक जानकारी यह भी मिली है कि पर्यावरण में सीसे का प्रदूषण कई तरह के विपरीत असर पैदा कर रहा है. यह वाहनों में प्रयुक्त पेट्रोल के द्वारा फैलता है. सी गल की अंतस्रावी ग्रंथ्यिों को तहस नहस करता है, जिससे यह पक्षी ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता, बार-बार गिर जाता है. मेंढकों पर भी सीसे का असर हो रहा है, उनमें सीखने की प्रवृत्ति अब कम होने लगी है. जो विविध अंत:स्रावी ग्रंथियाँ हैं, उनमें से एक है गोनाड. उसके स्राव से नर और मादा अपने यौवन को प्राप्त करते हैं. वानर जाति के माकाक्यू की इस अंत:स्रावी ग्रंथी पर 'टीसीडीडी' से ऐसी तो विकृति आती है, जिससेउसकी उच्छृंखलता इस कदर बढ़ जाती है कि वह आक्रामक होने लगा है.
इसी तरह यदि हम गोल्डफिश का उदाहरण लें, तो उस पर एट्राजाइन रसायन का असर होने से उसकी सक्रियता बढ़ जाती है, वह हाइपर एक्टिव हो जाती है. बाज पक्षियों के अंत:स्रावी ग्रंथियों पर डीडीटी और डीडीई जंतुनाशकों से होने वाले प्रदूषण का ऐसा असर होता है कि वह अपनी व्यावहारिक क्रियाएँ भी भूल जाता है.
चूहों की अंत:स्रावी ग्रंथियों पर कौमेस्टेरॉल रसायन का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि उसके सामने भय उत्पन्न हो तो वे अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त नहीं कर पाते. 'मॅलार्डर्डक ' नाम के जंगली बतख की अंत:स्रावी ग्रंथी पर 'मिथाइल मरक्यूरी' नाम के रसायन का असर हो रहा है. इसके प्रभाव से समागम के लिए उसे उत्तेजना कम ही होती है. मीठे पानी की मछलियों की ग्रंथियों पर भारी धातु के प्रदूषण का ऐसा विपरीत असर हो रहा है कि उनकी गतिविधि कम हो जाती है. सारिका नामक पक्षी के विषय में कहा जाता है कि यह समूह में बसने वाला छोटा पक्षी है. उसके नर पर 'डाईक्रोटोफोस' नाम के जंतुनाशक का इतना विपरीत प्रभाव पड़ता है कि उसकी गाने, उड़ने और चारा एकत्र करने की प्रवृतियों पर 50 प्रतिशत की कमी देखी गई है.
जमीन और पानी पर रहने वाले एक न्यूट नामक प्राणी पर 'एंडोसल्फान' नाम के जंतुनाशक के निम्न मात्रा का भी विपरीत प्रभाव पड़ता है. इसका असर यह हुआ कि उसकी घ्राण शक्ति क्षीण हो गई. अब वह संतानोत्पत्ति के लिए भी कम आकर्षित होता है. शोधकर्त्ताओं ने भी एक और व्यवहार का पता लगाया है. सामान्य रूप से नर और मादा परस्पर समागम के लिए प्रयत्नशील होते हैं.
उपरोक्त तथ्य यह बताते हैं कि अब समय आ गया है कि हम जंतुनाशकों का अधिक प्रयोग रोंके, अन्यथा हो सकता है कि ये जंतुनाशक जंतुओं को तो नहीं पर हम पर अवश्य असर डालेंगे. क्योंकि कई जंतुओं की जाति तो नष्ट हो गई, अब मनुष्य जाति ही बाकी है. ये सारी स्थितियाँ उसे चेतावनी दी है कि समय रहते वह नहीं चेता, तो हो सकता है हमारी संतान ही इतनी आक्रामक हो जाए कि वह हम पर ही हमला कर दे, उस वक्त हम कह नहीं पाएँगे कि देखो हमारा बच्चा कितना 'स्मार्ट' हो गया है.
डॉ. महेश परिमल

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