सोमवार, 5 जुलाई 2010

जॉनी, हम राजकुमार थे और राजकुमार रहेंगे


हिन्दी सिनेमा जगत में यूं तो अपने दमदार अभिनय से कई सितारो ने दर्शकों के दिलो पर राज किया लेकिन एक ऐसा भी सितारा हुआ, जिसने न सिर्फ दर्शकों के दिल पर राज किया बल्कि फिल्म इंडस्ट्री ने भी उन्हें राजकुमार माना. वह थे संवाद अदायगी के बेताज बादशाह कुलभूषण पंडित उर्फ राजकुमार . राजकुमार का जन्म पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में ८ अक्टूबर १९२६ को एक मध्यमवर्गीय कश्मीरी ब्राrाण परिवार मे हुआ. स्नातक की पढाई पूरी करने के बाद वह मुंबई के माहिम पुलिस स्टेशन में सब इंस्पेक्टर के रूप में काम करने लगे. एक दिन रात्नि गश्त के दौरान एक सिपाही ने राजकुमार से कहा हजूर आप रंग. ढंग और कद काठी में किसी हीरो से कम नहीं है. फिल्मों में यदि आप हीरो बन जाएँ तो लाखों दिलो में राज कर सकते हैं राजकुमार को सिपाही की यह बात जँच गई. राजकुमार मुंबई के जिस थाने मंे कार्यरत थे. वहां अक्सर फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था. एक बार पुलिस स्टेशन में फिल्म निर्माता बलदेव दुबे कुछ जरूरी काम के लिए आए हुए थे. वह राजकुमार के बातचीत करने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने राजकुमार से अपनी फिल्म शाही बाजार में अभिनेता के रूप में काम करने की पेशकश की. राजकुमार सिपाही की बात सुनकर पहले ही अभिनेता बनने का मन बना चुके थे. इसलिए उन्होंने तुरंत ही अपनी सब इंस्पेक्टर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और निर्माता की पेशकश स्वीकार कर ली.
शाही बाजार को बनने में काफी समय लग गया और राजकुमार को अपना जीवन यापन करना भी मुश्किल हो गया. इसलिए उन्होंने वर्ष १९५२ मे प्रदíशत फिल्म रंगीली में एक छोटी सी भूमिका स्वीकार कर ली. यह फिल्म में कब लगी और कब चली गई. यह पता ही नहीं चला. इस बीच उनकी फिल्म शाही बाजार भी प्रदíशत हुई. जो बाक्स आफिस पर औंधे मुंह गिरी. शाही बाजार की असफलता के बाद राजकुमार के तमाम रिश्तेदार यह कहने लगे कि तुम्हारा चेहरा फिल्म के लिए उपयुक्त नहीं है. वहीं कुछ लोग कहने लगे कि तुम खलनायक बन सकते हो. वर्ष १९५२ से १९५७ तक राजकुमार फिल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे. रंगीली के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली. वह उसे स्वीकार करते चले गए. इस बीच उन्होंने अनमोल सहारा, अवसर, घमंड , नीलमणि और कृष्ण सुदामा जैसी कई फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन इनमें से कोई भी फिल्म बाक्स आफिस पर सफल नहीं हुई. महबूब खान की वर्ष १९५७ मे प्रदíशत फिल्म मदर इंडिया में राजकुमार गांव के एक किसान की छोटी सी भूमिका में दिखाई दिए. हालांकि यह फिल्म पूरी तरह अभिनेत्नी नíगस पर केन्द्रित थी. फिर भी वह अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे. इस फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति भी मिली और फिल्म की सफलता के बाद वह अभिनेता के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए.
वर्ष १९५९ मे प्रदíशत फिल्म पैगाम में उनके सामने हिन्दी फिल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे, लेकिन राज कुमार ने यहां भी अपनी सशक्त भूमिका के जरिए दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे. इसके बाद दिल अपना और प्रीत पराई, नजराना, गोदान, दिल एक मंदिर और दूज का चांद जैसी फिल्मों मे मिली कामयाबी के जरिए वह दर्शकों के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुंच गए जहां वह अपनी भूमिकाएं स्वयं चुन सकते थे.

वर्ष १९६५ में प्रदíशत फिल्म काजल की जबर्दस्त कामयाबी के बाद राजकुमार ने अभिनेता के रूप में अपनी अलग पहचान बना ली. बी.आर .चोपड़ा की १९६५ में प्रदíशत फिल्म वक्त. में अपने लाजवाब अभिनय से वह एक बार फिर से दर्शक का ध्यान अपनी ओर आकíषत करने में सफल रहे. फिल्म में राजकुमार का बोला गया एक संवाद चिनाय सेठ. जिनके घर शीशे के बने होते हंै वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते, या चिनाय सेठ. ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज नहीं. हाथ कट जाए तो खून निकल आता है दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुए. वक्त की कामयाबी से राजकुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुंचे. इसके बाद उन्होंने हमराज, नीलकमल, मेरे हुजूर, हीर रांझा और पाकीजा. में रूमानी भूमिकाए भी स्वीकार कीं. जो उनके फिल्मी चरित्न से मेल नहीं खाती थीं. इसके बावजूद राजकुमार दर्शकों का दिल जीतने मे सफल रहे. कमाल अमरोही की फिल्म ‘पाकीजा’ पूरी तरह से मीना कुमारी पर केन्द्रित फिल्म थी. इसके बावजूद राजकुमार अपने सशक्त अभिनय से दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे. पाकीजा में उनका बोला गया एक संवाद आपके पांव देखे बहुत हसीन हैं ् इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा मैले हो जाएँगे इस कदर लोकप्रिय हुआ कि लोग गाहे बगाहे उनकी आवाज की नकल करने लगे. वर्ष १९७८ में प्रदíशत फिल्म कर्मयोगी में राज कुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले. इस फिल्म मे उन्होंने दो अलग-अलग भूमिकाओं मंे अपने अभिनय की छाप छोड़ी. अभिनय में एकरपता से बचने और स्वयं को चरित्न अभिनेता के रूप मे भी स्थापित करने के लिए उन्होंने स्वयं को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया. इस क्रम में १९९८ में प्रदíशत फिल्म बुलंदी में वह चरित्न भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके. इस फिल्म में भी उन्होंने दर्शकों का मन मोहे रखा.
वर्ष १९९९ में प्रदíशत फिल्म सौदागर में राजकुमार के अभिनय के नए आयाम देखने को मिले . सुभाष घई की निíमत इस फिल्म में राज कुमार वर्ष १९५९ मे प्रदíशत फिल्म पैगाम के बाद दूसरी बार दिलीप कुमार के सामने थे और अभिनय की दुनिया के इन दोनों महारथियों का टकराव देखने लायक था. सौदागर मे राजकुमार का बोला एक संवाद दुनिया जानती है कि राजेश्वर ¨सह जब दोस्ती निभाता है तो अफसाने बन जाते है मगर दुश्मनी करता है तो इतिहास लिखे जाते हैं, आज भी सिने प्रेमियों के दिमाग मे गूँजता है. नब्बे के दशक मंे राजकुमार ने फिल्मों मे काम करना काफी कम कर दिया. इस दौरान उनकी तिरंगा १९९२ पुलिस और मुजरिम. इंसानियत के देवता १९९३ बेताज बादशाह १९९४ जवाब १९९५ गाड और गन जैसी फिल्में प्रदíशत हुईं. नितांत अकेले रहने वाले राजकुमार ने शायद यह महसूस कर लिया था कि मौत उनके काफी करीब है. इसीलिए अपने पुत्न पुरू राजकुमार को उन्होंने अपने पास बुला लिया और कहा देखो मौत और ¨जदगी इंसान का निजी मामला होता है. मेरी मौत के बारे में मेरे मित्न चेतन आनंद के अलावा और किसी को नही बताना. मेरा अंतिम संस्कार करने के बाद ही फिल्म उद्योग को सूचित करना. अपने संजीदा अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान अभिनेता राजकुमार ३ जुलाई १९९६ को इस दुनिया को अलविदा कह गए.
प्रेम कुमार

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