
मनोज कुमार
भारतीय संस्कृति में स्त्री की तुलना आदिकाल से देवीस्वरूपा के रूप् में की जाती रही है किन्तु सुप्रीमकोर्ट की फटकार के बाद केन्द्र सरकार का एक नया चेहरा सामने आया है जिसमें उनका रवैया स्त्री के प्रति नकरात्मक ही नहीं, अपमानजनक है। यहां मैं उन शब्दों का उपयोग करने से परहेज करता हूं जो श्रेणी स्त्री के लिये केन्द्र सरकार ने तय की है। यह इसलिये नहीं कि
इससे किसी का बचाव होता है बल्कि मैं यह मानकर चलता हूं कि बार बार इन स्तरहीन शब्दों के उपयोग से स्त्री की प्रतिष्ठा पर आघात पहुंचाने में मैं भी कहीं न कहीं शामिल हो जाऊंगा और मैं इस पाप से स्वयं को मुक्त रखना चाहता हूं। केन्द्र सरकार के इस रवैये से केवल स्त्री जाति की ही नहीं बल्कि समूचे भारतीय समाज का अपमान हुआ है।
एक स्त्री मां होती है, बहन होती है, भाभी होती है, मांसी होती है और उसके रिश्ते नाना प्रकार के होते हैं जिसमें वह गंुथकर एक परिवार को आकार देती है। स्त्री गृहणी है तो उसका दायित्व और बढ़ जाता है। उसे पूरे परिवार को सम्हाल कर रखने की जवाबदारी होती है। कहना न होगा कि हर स्त्री यह जवाबदारी दबाव में नहीं बल्कि स्वयं के मन से लेती हैं। स्त्री को
परिवार की प्रथम पाठशाला कहा गया है। आप और हम जब कल बच्चे थे तो मां रूपी स्त्री ने हमारे भीतर संस्कार डाले, जीवन का पाठ पढ़ाया, नैतिक और अनैतिक की समझ पैदा की और आज उसी स्त्री को हम ऐसे शब्द दे रहे हैं। मां रूपी इसी स्त्री ने हमें धन कमाने के गुण दिये, साहस दिया और वह समझ जिसमें किसी का नुकसान न हो और वही स्त्री आज हमारे लिये दया की पात्र बन गयी है, यह बात शायद किसी के समझ में न आये।
एक स्त्री जो रिश्ते में हमारी बहन होती है और हम भाई होने के नाते उसकी अस्मत की रक्षा की जवाबदारी लेते हैं। हर रक्षाबंधन पर वह हमारी कलाई पर राखी बांध कर हमारे उत्तरदायित्व का बोध कराती है, आज उसी स्त्री के लिये हमारे मन में यह कलुषित विचार कैसे आ सकते हैं। जिसकी जवाबदारी हमने ले रखी है, उससे हम कैसे फिर सकते हैं। मुझे लगता है िकइस बार रक्षाबंधन में हर बहन की आंखों में सवाल होगा कि क्या अब भी तुम मेरी रक्षा का वचन देते हो? हर भाई कहेगा हां लेकिन उसका मन आत्मग्लानि से भरा होगा। एक स्त्री जिसे हम भाभी का संबोधन देते हैं, मां की अनुपस्थिति में वह मां की भूमिका में रहती है। क्या इन्हें हम ऐसा कुछ कहेंगे जिससे उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचे? क्या उस स्त्री को हम ऐसा कुछ कह पाएंगे जिसे हम मांसी कहते हैं अर्थात मां जैसी को? क्या हम उन सारे रिश्तों को कभी ऐसा कहने की सोच भी सकते हैं जिनके कहने पर हम हमारी नजरों में छोटा हो जाते हैं।
आखिर में। क्या हम उस स्त्री को कुछ ऐसा अप्रतिष्ठाजनक कह पाएंगे जिसे हमारी संस्कृति, हमारे वेद अर्धाग्नि कहते हैं। अर्धाग्नि का अर्थ पुरूष का आधा हिस्सा। सात फेरों में हम समाज के सामने वचन देते हैं कि एक-दूसरे के सुख और दुख में सहभागी होंगे, क्या उन्हें हम ऐसे हिकारत भरे शब्दों से नवाज सकते हैं? नहीं, कभी नहीं। सुप्रीमकोर्ट ने फटकार लगाकर स्त्री
के आत्मसम्मान और उसकी अस्मिता को सम्मान देते हुए जो भूमिका अदा की है, उससे अदालत के प्रति समाज के मन में सम्मान का भाव बढ़ा है। हम उम्मीद करते हैं कि भविष्य में भी कोर्ट इसी तरह चिंता कर गलत कामों को निरूत्साहित करता रहेगा। फिलहाल, जो स्थितियां हैं, उसमें मैं और हम जननी से उनकी प्रतिष्ठा पर आयी आंच के लिये माफी मांगते हैं।
मनोज कुमार
bahut khoob guruji..abhivyaktiprad rachna hai..kaabile taarif
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