मंगलवार, 5 अक्तूबर 2010

गांधी का पर्याय खादी की देश में दुर्दशा



डॉ. महेश परिमल

अभी-अभी हमारी आँखों के सामने से गांधी जयंती गुजरी। कई संकल्प याद आए होंगे। कई संकल्पों को पूरा होते देखा भी होगा। नारेबाजी के बीच सत्य और अहिंसा का पाठ भी पढ़ाया गया होगा। मीडिया में तो इसे एक उत्सव के रूप में लिया गया। चारों ओर गांधी के सत्य और अहिंसा की ही चर्चा थी। दूसरीे ओर हमारे ही देश में गांधी का पर्याय बनी खादी इन चर्चाओं से दूर हो गई। खादी जो पहले एक मिशन था, आज कमीशन बनकर रह गई है। गांधी के ही देश में खादी की दुर्दशा के लिए वही लोग दोषी हैं, जो गांधी के वचनों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेते हैं। आखिर वह कौन-सी शक्तियाँ हैं, जो खादी को खत्म कर रही हैं?
खादी पर सबसे पहला हमला तो तब हुआ, जब खादी की खरीदी में दिया जाने वाला डिस्काउंट बंद कर दिया गया। पूरे देश में आज भी 7 हजार खादी भंडारों से 10 हजार परिवारों का भरण-पोषण हो रहा है, वह भी इस यांत्रिक युग में। भारत में खादी और ग्रामोद्योग की वार्षिक बिक्री करीब 22 करोड़ रुपए की है। इसके बाद भी आज हमारे देश में सूती कपड़े पहनने का फैशन ही चल पड़ा है। लेकिन युवाओं को खादी की तरफ आकर्षित करने के तमाम सरकारी प्रयास निष्फल साबित हुए हैं। खादी को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज बोर्ड की स्थापना की गई है। इन दिनों चल रहे कामनवेल्थ गेम के लिए बनाए गए खेल गाँव में खादी की एक दुकान लगाई गई है। जहाँ से विदेशी खादी खरीद रहे हैं। पर हमारे देश में खादी का प्रचार पूरी ईमानदारी के साथ नहीं किया गया। इसके लिए सबसे बड़ा दोषी यही खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज बोर्ड रहा है।
सभी जानते हैं कि स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए खादी से बेहतर कोई कपड़ा नहीं है। यही नहीं, खादी से आज भी कई घरों के चूल्हे जल रहे हैं। इससे गाँव के गरीब लोगों को रोजगार मिल रहा है। मिलों में कपड़े बनाने के लिए जिस यंत्र का इस्तेमाल किया जाता है, उससे ग्लोबल वार्मिग का खतरा उत्पन्न हो रहा है। खादी के लिए इस्तेमाल में लाया जाने वाला कपास भी हमारे ही देश में उत्पन्न होता है। इसके लिए अनाज उत्पादन के लिए जितनी जमीन की आवश्यकता होती है, उतनी जमीन भी नहीं लगती। इसके बाद भी खादी की मार्केटिंग नहीं होने के कारण खादी की बिक्री लगातार कम होती जा रही है।

जिस किसी ने भी अहमदाबाद में साबरमती आश्रम का दौरा किया है, वह गांधी के विचारों एवं खादी से विशेष रूप से प्रभावित हुआ है। गांधी जी कक्ष में रखे चरखे को देखकर सचमुच एक झुरझुरी सी होती है। यही है गांधीजी का अस्त्र, जिससे उन्होंेने अँगरेजों से लोहा लिया। एक स्पंदन होता है, जो आश्रम के बाहर आते ही समाप्त हो जाता है। करीब 150 वर्ष पूर्व जब हमारे देश में कपड़ों की मिलें नहीं थीं, तब यही खादी ही हमारा वस्त्र थी। इसके कारण लाखों लोगों को रोजगार मिल जाता था। जब यूरोप में यांत्रिक युग शुरू हुआ, तब हालात बदल गए। अँगरेजों ने अपने देश के कपड़ों को पहनना भारतीयों के लिए अनिवार्य कर दिया। इससे खादी का प्रचलन कम होने लगा। हमारे देश से ही कपास विदेश भेजा जाता और वहाँ से सूती कपड़े हम पर थोपे जाते। गांधीजी ने इस बात को समझा और खादी को एक आंदोलन का रूप दिया। उन्होंने यह नारा दिया कि यदि भारतीय विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करें, तो अंगरेजों को हमारे देश से भगाना आसान हो जाएगा। लेकिन उस समय भारतीय मिल मालिकों ने भारतीय कपड़ों की कालाबाजारी कर मुनाफा कमाना शुरू कर दिया। गांधीजी ने इस बात को समझा और 1920 में अपने अभियान के दौरान गुजरात के विजापुर में देशी चरखा ढ़ॅँूढ़ निकाला। इसके बाद तो उन्होंने स्वयं ही खादी पहनना शुरू कर दिया। इस तरह से खादी को लेकर एक अभियान ही शुरू हो गया। इस के बाद 1947 में जवाहर लाल नेहरू के प्रयासों से खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमिशन की स्थापना की गई।
इसकी स्थापना तो खादी के विकास के लिए की गई थी, पर उसी समय एक भूल के कारण खादी एक अभियान न बन पाई। इस कमिशन की यह विशेषता थी कि इसके अध्यक्ष कोई उद्योगपति या कोई राजनेता ही होता। इनका स्वार्थ मिल-मालिकों से बँधा होता, इसलिए वे खादी के बजाए देश में बने सूती कपड़ों का प्रचार करते। वे खादी को मिलों के कपड़ों की अपेक्षा महँगा बेचने की सिफारिश करते। यही परंपरा आज भी कायम है। फलस्वरूप खादी गरीबों से दूर होती गई। गुजरात के मूर्धन्य कवि उमाशंकर जोशी की पुत्री नंदिनी जोशी जब अमेरिका में अर्थशास्त्र की प्राध्यापक बनी, तब उन्होंने खादी के प्रचार के लिए विशेष रूप से अभियान चलाया। उन्होंने यह माँग रखी कि खादी अन्य कपड़ों के एवज में सस्ती होनी चाहिए। विनोबा भावे को अपने अंतिम समय में खादी के प्रति सरकार की नकारात्मक भूमिका की जानकारी हो गई थी। इसके मद्देनजर उन्होंने नारा दिया ‘खादी को कमिशन नहीं, मिशन बनाया जाए।’ स्व. विनोबा भावे के इस नारे के बाद सरकार ने देश के अनेक हिस्सों में खादी भंडारों की स्थापना की।
खादी भंडारों को विशेष रूप से कर्ज देने एवं कई तरह की रियायतें दी जाने लगीं। पर यह अधिक समय तक नहीं चल पाया। आज खादी भंडारों की हालत बहुत ही खराब है। खादी भंडार के संचालकों को आज भी सरकारी सहायता प्राप्त करने के लिए रिश्वत देने पड़ती है। इसलिए गांधी जी के इन अनुयायियों को यह समझ में आ गया कि यह तो गांधीजी के उसूलों के खिलाफ है। इसलिए उन्होंने रिश्वत देकर सहायता प्राप्त करना बंद कर दिया। उनकी इस सदाशता का लाभ अब वे संस्थाएँ उठा रहीं हैं, जो रिश्वत देकर खादी को और भी अधिक महँगा कर रही हैं। खादी के नाम पर उनका उद्देश्य गरीबों की सेवा न होकर सरकार सहायता प्राप्त करना हो गया है। ये संस्थाएँ अब खादी में कई कपड़ों की मिलावट करने लगी हैं। खादी अपना मूल स्वरूप खोती जा रही है।
ऐसा नहीं है कि खादी के नाम पर और कुछ अच्छा नहीं हुआ। खादी ने आधुनिक ड्रेस डिजाइनरों को भी आकर्षित किया है। 1989 में खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज कमिशन ने पहली बार मुंबई में एक फैशन शो का आयोजन किया। इस शो के लिए विख्यात ड्रेस डिजाइनर देविका भोजवानी ने खादी के 84 कॉस्टच्यूम तैयार किए। 1990 में अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त ड्रेस डिजाइनर रितु कुमार ने भारत की खादी पर ‘ट्री ऑफ लाइफ’ नामक विडियो विजुअल शो का आयोजन किया। इसे दुनियाभर में प्रशंसा मिली। 1997 में इस शो का आयोजन लंदन में किया गया। इससे विदेशियों का रुझान खादी के प्रति बढ़ा। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। सरकार ही इस दिशा में ध्यान नहीं दे पा रही है। सरकार की नीयत तो साफ है, पर तंत्र में फैले भ्रष्टाचार के कारण खादी एक अभियान के रूप में नहीं चल पाई। सरकार यदि ईमानदारी से इस दिशा में कड़े कदम उठाए, तो कोई दो मत नहीं कि एक बार फिर खादी अपना रँग जमा सकती है। खादी यदि सस्ती हो जाए, तो यह गरीबों का ही नहीं, बल्कि मध्यम वर्ग का वस्त्र बन सकती है। आवश्यकता है एक ईमानदारान कोशिश की।
डॉ. महेश परिमल

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