बुधवार, 10 नवंबर 2010

हिंदी भाषा और बंगाले का जादू

स्टीमर चल दिया था। हुगली के पानी को चीरते हुए, छोटे-बड़े जहाजों के पास से गुजरते हुए हम लोग बोटेनिकल गार्डन की ओर जा रहे थे। कमल जोशी, बरुआ शर्मा, त्रिपाठी-पूरा एक दल उस दिन पिकनिक मनाने निकला था। हम लोग ब्वायलर के नजदीक खड़े थे और आँच लगने से पसीना आ रहा था। मैं अलग जाकर रेलिंग के सहारे अकेला खड़ा हो गया। जाने कितनी बातें मन में घूम रही थीं। विशेषतया शरत बाबू के ‘पाथेर दावी’ के पात्र, उस के जहाजी, उस के खानाबदोश क्रांतिकारी उस पार की जूट मिलों के धुएँ में दिखाई पड़ते थे और छिप जाते थे। सहसा मेरी नजर स्टीमर में सामने लगी एक तख्ती पर पड़ी। उस पर नागरी अक्षरों में लिखा था- ‘फांस की लास।’ ‘फांस की लास’ क्या है? इस में ‘की’ तो मैं समझता था, हिंदी की एक विभक्ति है। लेकिन ‘फांस’ कौन सी चीज है? उस की ‘लास’ क्या हो सकती है? शरत, पथेर दावी, सब्यसांची, अपूर्व सभी भूल गए और उस तख्ती पर मेरा ध्यान अटक गया। मैंने हिंदी की सभी उपभाषाओं के शब्दों का स्मरण किया था। आप सच मानिए, मैं कितनी कम हिंन्दी जानता हूं इस का ज्ञान मुझे उसी दिन हुआ। अब मन में बड़ी झिझक कि किसी से पूछूँ तो क्या कहेगा? आखिरकार मैंने किसी तरह हिम्मत बाँधी और श्री शिवनारायण शर्मा से पूछा: ‘यह क्या लिखा है?’
‘‘यह? तुम नहीं समझे? यह है ‘फस्र्ट क्लास!’ स्टीमर का फस्र्ट क्लास।’’
‘फस्र्ट क्लास!’ मैं तो आसमान से गिर पड़ा। मैंने सोच, मैं अभी दौड़कर सुनीति बाबू के बंगले पर जाऊंँ और उनके दरवाजे पर सत्याग्रह कर दूं कि ‘देवता! अपनी भाषा विज्ञान की पुस्तकों में आप ने कहीं उस नियम का उल्लेख नहीं किया, जिसके अनुसार फस्र्ट क्लास का रूपांतर ‘फांस की लास’ हो जाता है।’
लेकिन मेरे कलकत्तेवासी मित्रों ने बताया कि ऐसी हिंदी कलकत्ते वालों के लिए कोई नई बात नहीं। बंगाल ने भारतीय संस्कृति को जो अमूल्य देनें दी हैं, उनमें से एक यह भी है। उन्होंने अपनी भाषा में तो जो किया उस की बात जाने दीजिए, वे अगर चाहें तो ऐसी हिंदी लिख दें कि बड़े-बड़े हिंदी वाले गच्च खा जाएँ और उस का कोई तात्पर्य न निकले। इसी को हमारे पूर्वज बंगाल का जादू कहते हैं। छूमंतर किया कि भाषा बदल गई। आप के सामने कुछ नमूने पेश करता हूं।
मैं उम्मीद करता हूं कि आप जूते पहनते ही होंगे। अपने तो खैर पहनते ही होंगे। भूले-भटके दूसरों के जूतों में भी कभी-कभी पाँव चला जाता होगा। आप जूते के तल्ले, जूते की पॉलिश, जूते की ठोकर, जूते की एड़ी वगैरह से भी परिचित होंगे। लेकिन क्या आप बता सकते हैं ‘जूते का मेरा मात’ कौन चीज होती है? सोचिए। मैं शर्त लगा सकता हूं कि आप हिंदी के बड़े से बड़े शब्द उलट डालिए, बाटा की हर एजेंसी में पूछ आइए, मुहल्ले के बूढ़े से बूढ़े मोची से हाथ जोड़ कर यह भेद माँगिए, पर आप को ‘जूते का मेरा मात’ का पता नहीं चलेगा। लेकिन कलकत्ते जाइए, वहां आपको बंगालियों की जूते की दुकानों पर अक्सर लिखा हुआ मिलेगा- ‘इआहां जूता का मेरा मात हाए।’ इसको यदि आप खड़ी बोली में अनूदित करें तो इस का अर्थ होगा- ‘यहां जूते की मरम्मत होती है।’
अगर आप बहुत संर्कीणमना हैं, आपमें प्रांतीयता की भावना है तो आप बंगालियों की निंदा करने लगेंगे कि ये लोग हिंदी का रूप बिगाड़ते हैं। लेकिन यह आपका अन्याय है। वास्तव में ये लोग उसे अपने सुसंस्कृत ढंग से लिखते हैं और उन्होंने हिंदी भाषा को जैसे नए-नए शब्द रूप और व्याकरण-तत्व दिए हैं, उस के लिए आप का सिर अहसान के बोझ से झुका होना चाहिए, उस के बजाए आप उन की निंदा करेंगे? अगर इसे कृतघ्नता नहीं कहेंगे तो और किसे कहेंगे?
एक हुए हैं ग्रियर्सन। सर जॉर्ज ग्रियर्सन। उन्होंने 20 मोटे-मोटे ग्रंथों में देश भर की भाषाओं का और हिंदी की तमाम उपभाषाओं का उल्लेख किया है, परिचय दिया है, नमूना दिया है, लेकिन हिंदी के इस बंगाली रूप को वे बिल्कुल छोड़ गए। इस को सिवा पक्षपात के और क्या कहा जाए।
बंगाली लोग हिंदी के शब्दों को कैसे सुधार कर सुंदर बना देते हैं, इस का दूसरा नमूना लीजिए। हिंदी में ‘फायदा’ बहुत प्रचलित है। लंबा-चौड़ा, बेडौल, बेतुका। बंगालियों ने उसे सुधार दिया है। कलकत्ते के सुंदर होमियो हॉल की नोटिस में कोई जी प्रसाद के खत का उल्लेख है जो कहते हैं- ‘आप के यहां का दवा व्यवहार कर के मुझे बहुत फैदा हुआ।’
देखिए- जरा से परिवर्तन से शब्द कितना सुंदर हो गया। आप मान लीजिए आप कोई कविता लिख रहे हैं। पंक्ति के अंत में ‘शैदा’ आता है। आप तुक ढूंढते-ढूंढते परेशान हैं। ‘मैदा’ या ‘पैदा’ के अलावा कोई तुक ही नहीं मिलती। अब आप चाहें ठाट से ‘फैदा’ रखकर चार पंक्तियों का पत्र पूरा कर लें। शैदा, मैेदा, पैदा, फैदा, अगर सुंदर होमियो हाल के बंगाली नोटिस लेखक ने फायदा शब्द का यह नया रूप आपके सामने न रखा होता, तो आप कितना सिर पटकते, आप की कविता कभी पूरी न होती और आप कवि बनने से वंचित रह गए होते।
खैर, यह तो एक-आध शब्द या एक-आध वाक्य का नमूना है। लेकिन, यदि एक पूरा गद्यांश इस भाषा में लिखा जाए, तब तो सौंदर्य का जादू भाषा पर छा जाता है। मैं तो उस अभूतपूर्व सौंदर्य से पूर्णतया वंचित रह जाता, अगर उस दिन मेरे प्रिय मित्र श्री नेमिचंद्र जैन ने मेरा ध्यान एक नोटिस की ओर नहीं दिलाया होता। यह नोटिस 13 खारापट्टी स्ट्रीट, कलकत्ता के कविराज श्री अमूल्य धनपाल की एक विशेष दवा की नोटिस थी, जो पता नहीं नेमि जी को कहां से प्राप्त हो गई थी और अमूल्य धनपाल की उस नोटिस को अमूल्य धन की तरह सहेजे रखे हुए थे।
उस नोटिस में सबसे ऊपर अंग्रेजी, बीच में बंगाली और सबसे नीचे हिंदी में विज्ञापन था जिस की अविकल प्रतिलिपि इस प्रकार है:
कलिकत्ता सरकारी मेडिकल कॉलेज से मोलाहाजा हो कर तारिफ हुआ सोने का मेडल मिला और सारकर में रेजेष्टारी हुआ।

बैंगल शटी फुड
लड़का भाले का बीमारी आदमी का सिरिफ एही हाल को श्री पोष्टाई खाना है, बांगला गभर्णमंेट का इनस्पेक्टर जनार अब सिभिल हस्पिटाल समूह हिन्दुस्तान का फुड पड्राक्ट का प्रदर्शनी, बड़े-बड़े डॉक्टर कविराज लोगों ने इस फुड की सिपरास किया है। खाने का तरकिब- इस फुड का एक भाग बौ 16 भाग इया पानी अच्छी तरह मिला कर माटी, इनामेल इया एलमिनियम का बर्तन में 10 मिनिट तक पोकाय के पारा चिनि इया मिश्रि मिला कर तब। 15 मिनिट बाद उतारने होगा। ठांडा होने से खाना।
श्री अमुल्य धनपाल।
आफिस- 13 खारापट्टी स्ट्रीट
कलिकत्ता
जेनारेल मारचेंट अरडार सापलवर एंड केमिसन एजण्ट
अब चाहें हिंदी के आलोचक मानें या न मानें, लेकिन कविराज अमूल्य धनपाल ने हिंदी गद्य के बड़े-बड़े शैलीकारों का घमंड तोड़ दिया है। यह है बंगाले का जादू। आप लाख साफ-सुथरी हिंदी लिखंे, लेकिन यह रवानीं, सह असर आप की भाषा में नहीं आ सकता। पहली बार यह भाषा पढ़ कर मुझ पर क्या असर हुआ, अगर मैं उसी शैली में असफल रूप से कहने का प्रयास करूं तो इस प्रकार होगा।
‘नेमि बाबू की दुकान में नोटिस पढ़ा इया देखना भर से दिमाग ठंडा होनपा। बेहोसी होता होता बचा। भागा तब।’
मैं तो साहब सोच रहा हूं कि अगर अपनी शैली में वही जोर लाना है तो कम से कम बंगल शटी फुड ‘पोकाय’ के खाना तो शुरू ही कर दूं। मैं हिंदी के अन्य गद्य लेखकों से भी इसी का ‘सिप्रास’ करता हूँ।
(ठेले पर हिमालय से साभार)
धर्मवीर भारती

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