सोमवार, 26 मार्च 2012

कला-तकनीक में कला तत्व की विजय

डॉ. महेश परिमल

भारत में भरत मुनि से नाट्य शास्त्र की रचना की थी। इसके अनुसार विश्व में रंगभूमि का स्थापना हुई। विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ-साथ नाटच्य कलाओं में भी निखार आने लगा। इसके विभिन्न आयाम सामने आने लगे। इनमें से एक था फिल्मों का रूप। फिल्मों में भी जो कला दर्शाई जाती है, उसमंे भी मूलभूत रूप से नाटच्य शास्त्र के तत्वों को ही शामिल किया जाता है। अंतर केवल आधुनिक तकनीक का ही है। इस टेकनीक ने फिल्मों की दशा और दिशा ही बदल दी है। पहले श्वेत-श्याम और मूक फिल्मों का जमाना था। फिर इस्टमेन कलर का जमाना आया। अब थ्री डी और 4 डी का जमाना आ गया है। इसके बाद भी फिल्मों में मूल नाटक का ही तत्व आज भी शामिल है। इसे देखते हुए पुराने जमाने की टेक्नालॉजी भी मैदान मार सकती हे, यह ‘द आर्टिस्ट’ को मिले 5 ऑस्कर अवार्ड मिलने से साबित हो जाता है।
सन् 1929 में ऑस्कर अवार्ड की स्थापना हुई। तब पहले विश्व युद्ध की एक मूक फिल्म ‘विंग्स’ को पहला ऑस्क अवार्ड मिला था। इसके बाद पूरे 83 वर्ष बाद फिर एक मूक फिल्म को ऑस्कर अवार्ड मिलना एक उपलब्घि है। इस फिल्म के हीरो ज्यां दजार्दिन को बेस्ट एक्टर और दिग्दर्शक माइकल हेजाविसियस को बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड दिया गया। ‘द आर्टिस्ट’ फिल्म में दो कलाकारों की प्रेमकहानी को बेहुत ही काव्यात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया है। सन् 2012 में ‘द आर्टिस्ट’ की तरह ‘ह्यूगो’ को भी 5 ऑस्कर अर्वा मिले हैं। यह फिलम तकनीकी दृष्टि से अत्याधुनिक 3 डी फिल्म है। इस तरह से कला और तकनीक के बीच हुई स्पर्धा में कला तत्व की विजय हुई। ऐसा कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। एक समय ऐसा भी था, जब फिल्मों में कथावस्तु ही मुख्य कारक रहा करती थी। तकनीक का उपयोग से कथा और भी अधिक धारदार होकर सामने आने लगी। अब कथा गौण हो गई है और उस पर तकनीक हावी हो गई है। ऐसी फिल्मों के निर्माताओं को ‘द आर्टिस्ट’ के निर्माता ने यह संदेश दिया है कि यदि आप 2012 में भी श्वेत-श्याम फिल्म दमदार कथा के साथ बनाते हैं, तो वह फिल्म भी सफल हो सकती है। इक्कीसवीं सदी में बीसवीं सदी की तकनीक का उपयोग कर फिल्म बनाना एक जोखिमभरा निर्णय है। इस खतरे को उठाकर भी दिग्दर्शक माइकल हेजानेविसिसय ने एक ऐसी फिल्म बनाई है, जो शुरू से अंत तक दर्शकों को जकड़े रखती है। फिल्म का एक भी पल उबाऊ या बिना रोमांच का नहीं है। श्वेत-श्याम की तकनीक का फिल्म में बहुत ही सूझबूझ से उपयोग किया गया है। मूक फिल्मों के कलाकार जिस तरह से बिना संवाद बोले अपने हाव-भाव से दर्शकों को अभिभूत कर देते थे, इस अभिनय को सीखने के लिए फिल्म के हीरो जार्ज दुजार्डी ने बारीकी से एक-एक चीज को पकड़ा और उसका उपयोग किया।
5 ऑस्कर जीतने वाली ‘द ह्यूगो’ भी 3 डी तकनीक के साथ दर्शकों को जकड़े रखती है। अपनी नाटच्यात्मक कथावस्तु के कारण ही यह फिल्म मैदान मारने में सफल रही। यह फिल्म ब्रायन सेल्जनिक के उपन्यास ‘द इन्वेशन ऑफ ह्यूगा केबरे’ पर आधारित है। इस फिल्म में पेरिस के रेल्वे स्टेशन पर रहने वाले एक लड़के और खिलौने की दुकान के मालिक की अफलातून कथा है। ‘द ह्यूगो’ को जो 5 ऑस्कर मिले हैं, वे उसे उसकी तकनीक के कारण ही मिले हैं। इस पाँच में आर्ट डायरेक्शन, सिनेमेटोग्राफी, साउंड एडिटिंग, साउंड मिक्सिंग और विजुअल इफेक्ट्स का भी समावेश होता है। हॉलीवुड में रियल लाइफ की स्टोरी पर फिल्म बनाने की परंपरा बहुत ही पुरानी है। इस परंपरा में बनी ‘द आयरन लेडी’ फिल्म ब्रिटेन की भूतपूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थ्रेचर के जीवन पर आधारित है। इस फिल्म में मार्गरेट थ्रेचर की भूमिका निभाने वाली अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप को श्रेष्ठ अभिनेत्री का ऑस्कर अवार्ड दिया गया है। आक्टोविया स्पेंसर को ‘द हेल्प’ फिल्म के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का पुरस्कार दिया गया। श्रेष्ठ वेशभूषा के लिए पुरस्कार भी ‘द आर्टिस्ट’ को ही दिया गया है। ‘द आयरन लेडी’ के लिए श्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतने वाली अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप को आज से 29 वर्ष पहले ‘सोफिस च्वाइस’ फिलम के लिए श्रेष्ठ अभिनेत्री का अवार्ड मिला था। इसके बाद 13 बार उनका नामीनेशन ऑस्कर के लिए हुआ था, पर उन्हें सफलता नहीं मिली। इस बार 14 वीं बार उनका नामीनेशन हुआ और अवार्ड मिल गया। उन्हें धर्य के मीठे फल का स्वाद चखने को मिला। इसके पहले 1979 ों स्ट्रीप को ऐनी केमर वर्सेस केमर नामक फिल्म के लिए सहायक अभिनेत्री का ऑस्कर अवार्ड मिला था। आज तक कुल 5 कलाकारों को ही तीन बार ऑस्कर मिला है। केथेरिन हेपबर्न नामक अभिनेत्री ने चार बार ऑस्कर जीता है। हॉलीवुड की फिल्मों में अभिनेत्रियों का कैरियर केवल अभिनय पर ही निर्भर होता है। उसके सौंदर्य की अपेक्षा उसके अभिनय की कीमत आँकी जाती है। यह बात 50 वर्ष से ऊपर पहुंची ऑस्कर जीतने वाली मेरिल स्ट्रीप ने साबित कर दिखाया।
किसी कलाकार को 82 वर्ष की उम्र में ऑस्कर अवार्ड मिले, ऐसा पहली बार हुआ है। क्रिस्टोफर प्लमेर नामक कलाकार ने ‘बीगीनर्स’ फिल्म में सजातीय संबंध रखने वाले एक वृद्ध विधुर की भूमिका निभाई है। इस भूमिका के लिए उन्हें श्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला है। सन् 1929 में जब ऑस्कर की स्थापना हुई, तब प्लमेर केवल दो वर्ष के थे। ऑस्कर के लिए उन्हें पूरे 82 वर्ष तक इंतजार करना पड़ा। ऑस्कर को गले लगाते हुए प्लेमेर सहसा कह उठे, तुम मेरे से उम्र में केवल दो वर्ष ही बड़े हो। मेरे पूरे जीवन में तुम कभी नहीं मिले। हमारी भेंट कैसे नहीं हुई? तुम्हारे लिए मैंने कितने साल प्रतीक्षा की। अब जाकर तुम मेरे इतने करीब आए हो कि तुम्हें छू सकूँ। इसके पहले ऑस्कर जीतने वाली सबसे वृद्ध कलाकार अभिनेत्री जेसिका टेंडी थी, उसे 80 वर्ष की उम्र में श्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब मिला था। हमारे बालीवुड में दादी की भूमिका निभाने वाली किसी अभिनेत्री को श्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब मिले, ऐसी कल्पना भी की जा सकती है भला?
डॉ. महेश परिमल

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