सोमवार, 7 सितंबर 2015

बिहार चुनाव और भूमि अधिग्रहण बिल


डॉ. महेश परिमल
भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में सभी यह समझने लगे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे छोड़कर अपनी कायरता का परिचय दिया है। लेकिन लोग यह भूल रहे हैं कि प्रधानमंत्री जिस तबीयत के व्यक्ति हैं, उसमें यह बात शामिल है कि किसी एक बात पर चिपके रहना उनकी आदत में नहीं है। वे हमेशा कुछ नया करने की सोचते रहते हैं। इसके पीछे भले ही बिहार विधानसभा चुनाव एक कारक हो,पर भूमि अधिग्रहण विधेयक का सहारा लेकर विपक्ष ने जिस तरह से हावी होने की कोशिश की है, उससे लगता है कि वे अब विपक्ष को कोई भी ऐसा अवसर नहीं देना चाहते, जिससे वह मुखर हो। इसलिए िवधेयक वापस लेकर उन्होंने यह बता दिया कि विपक्ष अब यह सोच ले कि वह जो चाहता है, वह नहीं हो पाएगा। उनकी इस चाल में चाणक्य नीति के दर्शन होते हैं। जिस दिन बिहार में नीतिश-सोनिया-लालू की सभा हुई, उसी दिन प्रधानमंत्री ने भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस लेकर यह साबित कर दिया कि अभी उनके पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है, इसलिए इस तरह का कोई जोखिम लेना उचित नहीं है। कुछ वर्ष बाद ही जब राज्यसभा में उनकी पार्टी का बहुमत हो जाएगा, तब विधेयक लाकर पारित कराया जा सकता है।
एक तरफ बिहार में प्रतिष्ठा की जंग चल रही है। सोनिया-नीतिश-लालू की जोड़ी बिहार में भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहीे है। ऐसे में भाजपा ने बिहार में जीत का झंडा फहराने का संकल्प ले लिया है। बिहार में आज सबसे बड़ा मुद्दा किसानों की जमीन छीन लेने का है। भाजपा के पास इन आक्षेपों का कोई जवाब नहीं था। राज्यसभा में बहुमत के अभाव में सरकार की लाचारी दिखाई दे रही थी। इसे कांग्रेस भले ही अपनी विजय माने, पर सच तो यह है कि इस जीत को वह किसी भी तरह से बिहार में नहीं भुना पाएगी। प्रधानमंत्री ने जब से भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस लेने की घोषणा की है, तब से किसानों ने राहत का अनुभव किया है। उन्हें मिली मानसिक शांति से अब वे इस पर गंभीरता से सोचने लगे हैं। प्रधानमंत्री ने अपनी इस घोषणा के बाद इस मुद्दे को ही खत्म कर ठंडा करने की कोशिश की है। जो सफल साबित हुई। भूमि अधिग्रहण विधेयक को वापस लेने को लोग भले ही प्रधानमंत्री की कमजोरी मानें, पर देर-सबेर इसका लाभ भाजपा को ही मिलेगा, यह तय है। वैसे भी एक ही मुद्दे पर चिपके रहना राजनीति का स्वभाव नहीं है। यह प्रधानमंत्री का ‘मास्टर स्ट्रोक’ था, जिसके दूरगामी परिणाम दिखाई देंगे। एक तरह से जिस भूमि अधिग्रहण विधेयक को बिहार में मुद्दा बनाकर इसके आधार पर जो रणनीति बनाई जा रही थी, उस पर प्रधानमंत्री की घोषणा ने पानी फेर दिया। एक तरह से विपक्ष के हाथ से यह मुद्दा ही छीन लिया गया। अब विपक्ष इसे प्रधानमंत्री की कमजोरी साबित करना चाहेगा, तो भाजपा यह कह देगी कि हमने यह निर्णय किसानों के हित में लिया है। अब यदि विपक्ष किसानों का सचमुच हितैषी है, तो उसे सरकार का सहयोग करना चाहिए। एक मंच पर जब सोनिया-नीतिश-लालू बैठ सकते हैं, तो फिर राहुल गांधी क्यों नहीं बैठ सकते? अब राहुल कभी भी लालू के साथ बैठने से रहे।
बिहार में राजनीति के समीकरण उलझे हुए हैं। लालू-नीतिश के बीच मन-मुटाव है। आपस में उलझते भी रहते हैं। नीतिश-लालू-कांग्रेंस का महागठबंधन भविष्य में पूरी तरह से बिखर जाएगा, यह तय है। ये तीनों अहंकारी स्वभाव के हैं, अहंकार कभी न कभी तो बाहर आएगा ही। अभी नहीं तो चुनाव के बाद। बिहार को जंगलराज की तरफ ले जाने में इन तीनों का ही हाथ है। अब वहां रैलियों का सिलसिला शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री ने कल जो हुंकार भरी, उससे माहौल एक बार फिर गरमा गया है। एक के बाद एक सभाओं और रैलियों का आयोजन हो रहा है। सभाओं में भीड़ से लोग वोट को देख रहे हैं। पर वे यह भूल रहे हैं कि भीड़ में वोट का प्रतिबिम्ब न देखें। भीड़ भरमा भी सकती है। सभाओं में लालू अपनी वाचालता से लोगों को हंसाने का सामर्थ्य रखते हैं, पर ऐसा आखिर कब तक चलेगा। अभी वे नीतिश के पक्ष में बोल रहे हैं, पर वे कब उनके खिलाफ हो जाएं, कहा नहीं जा सकता। इसके विरोध में भाजपा नीतिश-लालू की नीतियों को गलत साबित करने में जुटी हुई है। भाजपा ने बिहार में अपने कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी कर दी है, जो जमीन से जुड्कर काम कर रही है। बिहार के लोग भी अब बदलाव चाहते हैं। जनता आजिज आ चुकी है, लालू-नीतिश की कार्यशैली से। इस सोच का फायदा उठाने में भाजपा कोई कसर बाकी रखना नहीं चाहती। वह किसी भी रूप में दिल्ली वाली गलती नहीं दोहराना चाहती।
इस चुनाव में नीतिश को अपनी नैया डूबती दिखाई दे रही है। इसलिए उन्होंने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का सहारा लिया था। उधर कांग्रेसाध्यक्ष सोनिया गांधी को भी अपने साथ कर लिया। बिहार के लोगों को आश्चर्य इस बात का है कि यह आदमी चुनाव जीतने के लिए अपने ही सिद्धांतों के खिलाफ जा रहा है। कांग्रेस की हमेशा बुराई करने वाला आज उनकी प्रशंसा कर रहा है। राहुल गांधी की नजरों में न तो नीतिश और न ही लालू किसी काम के हैं, इसलिए वे उनकी रैलियों से हमेशा दूर ही रहते हैं। बिहार के चुनाव को प्रतिष्ठापूर्ण बनाकर नीतिश कुमार ने एक तरह से भाजपा को चुनौती दी है। उसकी अग्निपरीक्षा ली है। भाजपा की एक-एक चाल का जवाब नीतिश कुमार दे रहे हैं। किंतु अभी चुनाव की घोषणा भी नहीं हुई है। भाजपा ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। अभी तो प्रत्याशियों का चयन भी नहीं हुआ है। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि भाजपा ने नीतिश-लालू के सामने घुटने टेक दिए हैं। भाजपा सधे कदमोंे से बिहार कूच की तैयारी कर रही है। वह अपनी गलतियों को दोहराना पसंद नहीं करती, इसलिए अभी से यह नहीं कहा जा सकता कि बिहार चुनाव का ऊंट किस करवट बैठेगा।
डॉ. महेश परिमल

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