सोमवार, 20 जुलाई 2009

मोटापे से परेशान हैं


अगर आप मोटापे से परेशान हैं, तो वजन घटाने के लिए वेट मैनेजमेंट में ट्रेंड फिजिशियन के पास ही जाएं, वरना इसके
घातक नतीजे भी हो सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने मोटापे को बीमारी करार दिया है। ऑॅस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में हुई दसवीं इंटरनैशनल कांग्रेस में इसे डायबेसिटी का नाम दिया गया, क्योंकि डायबीटीज की बीमारी मोटापे से ही होती है। दुनिया भर के डॉक्टर लोगों को वजन कम करने की सलाह दे रहे हैं। मोटापे से डायबीटीज ही नहीं, ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, कैंसर और नींद न आने की बीमारी होती है। अक्सर लोग वजन कम करने के लिए ब्यूटी क्लिनिक में जाते हैं। इस तरह के क्लिनिक चलाने वाले लोगों को वेट मैनेजमेंट का कोई अनुभव नहीं होता। अनाड़ियों की देखरेख में वजन कम करने की कोशिशें आपको नुकसान पहुंचा सकती हैं।
शरीर से अतिरिक्त वजन कम करने के लिए हमेशा चर्बी ही घटानी चाहिए। यह ध्यान रखना चाहिए कि लीन बॉडी मास (मसल्स और सॉफ्ट टिश्यूज) को कोई नुकसान न पहुंचे। शरीर से वजन धीरे-धीरे कम करना चाहिए। अगर आप एक ही बार में वजन घटाने की कोशिश करेंगे तो इससे कमजोरी आ सकती है।
क्लिनिक २००० में वेट मैनेजमेंट में ट्रेंड फिजिशयन, प्लास्टिक सर्जन, एनड्रॉकनॉलजिस्ट, न्यूट्रीशियन और ब्यूटी थेरेपिस्ट लोगों का ट्रीटमेंट करते हैं। यहां मेडिकल एक्सपटर्स खास ट्रीटमेंट से किसी व्यक्ति के शरीर से एक्सट्रा फैट कम करते हैं। यहां लोगों का वजन जल्दी और सुरक्षित तरीके से कम होता है। इसमें सेलोथर्म तकनीक का भी प्रयोग किया जाता है। यहां बॉडी कंपोजिशन एनालिसिस टेस्ट कंप्यूटराइज्ड तरीके से लिया जाता है। यह टेस्ट ट्रीटमेंट से पहले और बाद में किया जाता है। इलाज के बाद यह टेस्ट करने से लोगों को पता चल जाता है कि उन्हें अपने शरीर से वजन घटाने में कितनी सफलता मिली। Óसेलोथर्मÓ ट्रीटमेंट के कोर्स में १२ से ज्यादा सेशन होते हैं, जिसमें ट्रीटमेंट कराने वाले व्यक्ति का वेट १० से १२ किलो तक घट जाता है। इससे पूरे शरीर से भी वजन कम किया जा सकता है या बॉडी के जिस हिस्से में ज्यादा मांस हो, वहां से चर्बी घटाई जा सकती है। इस इलाज के बाद किसी भी व्यक्ति की फिगर और पर्सनैलिटी निखर कर सामने आती है। ट्रीटमेंट के बाद स्किन में भी कसावट आ जाती है। क्लिनिक २००० में इलाज करने के बाद न तो वजन कम करने वाले उपकरण की जरूरत पड़ती है और न ही किसी दूसरे ट्रीटमेंट की जरूरत रह जाती है। क्लिनिक २००० में वेट मैनेजमेंट के लिए केवल शरीर की चर्बी ही कम होती है। इसलिए यहां डायबीटीज, हाई ब्लडप्रेशर, दिल की बीमारियों और हाइपोथायराइड से पीड़ित लोग भी अपना वजन कम कर सकते हैं। बाईपास सर्जरी करा चुके पेशेंट भी वजन कम करने के लिए इस क्लिनिक का सहारा ले सकते हैं। यहां मरीजों को यह भी जानकारी दी जाती है कि कैसे इस वेट लॉस को लंबे समय तक मेंटेन रखा जा सके।

शनिवार, 18 जुलाई 2009

कश्मीर पर यह नासमझी क्यों


नीरज नैयर
अमेरिकी नेतृत्व की पाक पसंदगी का पैमाना इस कदर भर गया है कि उसके राजनेता-अधिकारी अब हमारे पड़ोसी मुल्क के नुमाइंदों की तरह ज्यादा पेश आने लगे हैं, हाल ही में अमेरिकी विदेश उप मंत्री विलियम बन्र्स के दिए बयान से तो यही प्रतीत होता है. बन्र्स ने अपनी भारत यात्रा के दौरानबहुत कुछ ऐसा कहा जिसकी उम्मीद नई दिल्ली ने भी नहीं की होगी. अमेरिकी मंत्री ने भारत को पाक के साथ बिना शर्त बातचीत की समझाइश तो दी ही साथ ही कश्मीर पर यह कहते हुए नया शिगूफा छोड़ दिया कि समस्या के समाधान के लिए कश्मीरियों की इच्छा का भी ध्यान रखा जाना चाहिए. कश्मीर भले ही भारत-पाक का आपसी मसला हो मगर उसमें अमेरिका की दखलंदाजी हमेशा से ही रही है, इसका एक कारणदोनों देशों का बार-बार अमेरिका पर निर्भरता जाहिर करना भी है. पाकिस्तान शुरू से अमेरिका के सहारे कश्मीर फतेह की नापाक कोशिशों को अंजाम देता रहा है और भारत महज जुबानजमाखर्ची के वाशिंगटन को अब तक कोई सख्त संदेश देने में नाकाम रहा है. बन्र्स के मौजूदा बयान पर भी भारतीय नेतृत्व ने कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं दी जिससे अमेरिका को भविष्य के लिए सबक मिल सके. बराक हुसैन ओबामा के सत्ता संभालने से पहले ही यह स्पष्ट हो गया था कि कश्मीर पर उनका रुख पाक के पक्ष में ही जाएगा, ओबामा ने चुनाव प्रचार के दौरान ही कश्मीर के समाधान के लिए एक विशेष दूत नियुक्त करने की बात कही थी और वो अब इसी दिशा में बढ़ते दिखाई दे रहे हैं.
कश्मीर को लेकर पाक की पैंतरेबाजी को ऐसे कथित बुद्धिजीवियों के कथनों से भी बल मिला है जो घाटी को आजाद रूप में देखने की हसरत रखते हैं. प्रख्यात लेखिका अरुन्धति राय भी ऐसे ही बुद्धिजीवियों की जमात में शामिल हैं. कुछ वक्त पूर्व जब कश्मीर में आजादी की मांग को लेकर प्रदर्शन चल रहे थे उस वक्त आउटलुक में उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें उन्होंने कश्मीर को स्वतंत्र करने पर बल दिया था. उनका मानना था कि घाटी में जो आक्रोश व्याप्त है वो केवल अलगाववादियों की ही देन नहीं बल्कि आम कश्मीरियों का वो गुस्सा है जो कई वर्षों से भारतीय प्रशासन के खिलाफ पनप रहा है. उनके मुताबिक कश्मीरियों में अब यह धारणा घर कर चुकी है कि उनका हित भारत से अलग होने में ही है. अरुन्धति राय ने महज बुजुर्गों-नौजवानों और महिलाओं की भीड़ से निकलकर आ रहे भारत विरोधी नारों से यह अंदाजा लगा लिया कि घाटी का आवाम 1947 की तरह ही स्वतंत्रता के लिए आंदोलित है. पर वो शायद भूल गईं कि भीड़ में शामिल होने वाले हर शख्स का उद्देश्य उसकी अगुवाई करने वाले से मेल खाए ऐसा जरूरी नहीं होता. राम मंदिर आंदोलन के वक्त सैंकड़ों लोग भीड़ का हिस्सा बने पर क्या सभी मस्जिद तोडऩा चाहते थे, अगर ऐसा होता तो शायद एक भी मस्जिद आज सुरक्षित नहीं बचती. राजनेताओं की रैलियों में हजारों लोग बढ़-चढ़कर सम्मलित होते हैं तो यह मान लिया जाए कि सब एक ही विचारधारा से हैं, अगर ऐसा होता तो भीड़ ही जीत का आधार मानी जाती. भीड़ का हिस्सा बनना महज क्षणिक भर का जोश मात्र भी हो सकता है, जिसका नशा पलभर में ही काफुर हो जाता है. लिहाजा प्रदर्शन करने वालों की तादाद देखकर यह समझ लेना कि पूरी की पूरी जमात ही इसमें शामिल है, सरासर ग़लत है. लालचौक से लेकर सोनमर्ग-गुलमर्ग तक पत्रकार और आम पर्यटक की तरह जब मैने लोगों के दिलों को टटोलने की कोशिश की तो मुझे कहीं से भी उनके भीतर दबे हुए उस गुस्से का अहसास नहीं हुआ जिसका जिक्र अरुन्धति राय ने किया था. जहां तक बात रही थोड़ी बहुत शिकन की तो वह मुल्क के हर नागरिक के चेहरे पर किसी न किसी बात को लेकर दिखाई पड़ ही जाती है. कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है, केंद्र में आने वाली हर सरकार के एजेंडे में कश्मीर सबसे ऊपर होता है. हर साल एक मोटी रकम घाटी के विकास के लिए स्वीकृत की जाती है. इतने सब के बाद भी अलग होने की भावना कैसे जागृत हो सकती है, दरअसल पाक की जुबान बोलने वाले हुर्रियत जैसे संगठन कश्मीरियों को लंबे वक्त से बरगलाने में लगे हैं, वह उन्हें सुनहरे सपने दिखाकर अपनी तरफ करने की कोशिश करते हैं, मगर आम कश्मीरियों को शायद इस बात का इल्म है कि अगर भारत से अलग हुए तो उनका हाल भी पाक अधिकृत कश्मीर में रहने वाले उनके भाई-बंधुओं की माफिक हो जाएगा. यही वजह है कि आजादी की मांग वाले प्रदर्शन यदा-कदा ही होते हैं, अगर ऐसा नहीं होता तो घाटी हर रोज शोर में डूबी रहती. इस लिहाज से देखा जाए तो न तो अमेरिका और न ही कथित बुद्धजीवियों के लिए यह तर्कसंगत है कि वो कश्मीर पर भारत के रुख को कमजोर करने की कोशिश करें, खासकर अमेरिका के लिए तो बिल्कुल नहीं. ओबामा खुद को बड़ा साबित करने की चाह में उसी स्टैंड पर कायम हैं जिसपर पूर्ववर्ती अमेरिकी शासक चलते रहे हैं. 1947-48 में भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू कश्मीर मुद्दे पर पहला युद्ध हुआ था जिसके बाद संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में युद्धविराम समझौता हुआ. इसके तहत एक युद्धविराम सीमा रेखा तय हुई, जिसके मुताबिक जम्मू कश्मीर का लगभग एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के पास रहा जिसे पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहते हैं. और लगभग दो तिहाई हिस्सा भारत के पास है जिसमें जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख शामिल हैं. 1972 के युद्ध के बाद हुए शिमला समझौते के तहत युद्धविराम रेखा को नियंत्रण रेखा का नाम दिया गया. हालाकि भारत पूरे जम्मू कश्मीर को अपना हिस्सा बताता है, लेकिन कुछ पर्यवेक्षक यह भी कहते हैं कि वह कुछ बदलावों के साथ नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा
के रूप में स्वीकार करने के पक्ष में है. अमेरिका और ब्रिटेन भी नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाने के हिमायती रहे. पर पाकिस्तान इसका विरोध करता है क्योंकि नियंत्रण रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा बनाने से मुस्लिम-बहुल कश्मीर घाटी भी भारत के ही पास रह जाएगी. अमेरिका ने कश्मीर में पूर्णरूप से 1950 के दौरान ही दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था, और 1990 तक आते-आते उसमें पाक की हिमायती का पक्ष साफ-साफ दिखाई देने लगा. अमेरिका कहीं न कहीं ये चाहता है कि कश्मीर को स्वतंत्र घोषित कर दिया जाए ताकि वो अफगानिस्तान और इराक की तरह अपनी सेना को वहां बैठाकर एशिया में मौजूदगी दर्ज करवा सके, शायद इसी लिए उसके दिल में कश्मीरियों के प्रति दर्द उमड़ रहा है. अमेरिका के इस तरह के हिमायत भरे कदम पाकिस्तान और कश्मीर में बैठे उसके खिदमतगारों के लिए पावर बूस्टर का काम करते हैं. इसलिए भारत सरकार को अमेरिकी दबाव में आकर नासमझ व्यवहार करने की बजाए बन्र्स के बयानों की गंभीरता को भांपते हुए माकूल जवाब देने की दिशा में कदम उठाना चाहिए.
नीरज नैयर

गुरुवार, 16 जुलाई 2009

मोबाइल का मानसून से मौत का रिश्ता


डॉ. महेश परिमल
चौंकाने वाले इस शीर्षक के साथ यह बताना आवश्यक हो गया है कि जिस तेजी से हमारे देश में मोबाइलधारकों की संख्या बढ़ रही है, उसी तेजी से उन पर मौत का खतरा भी मंडराने लगा है। वैसे बारिश का होना और मोबाइल पर बात करना इन दोनों का मतलब है मौत को दावत देना। अब यह बहुत ही छोटी-सी बात है, जो समझ में नहीं आएगी। मोबाइल पर अभी उतने शोध हमारे देश में नहीं हुए हैं, जितनी मौत इससे विदेशों में हो चुकी है। अभी तो हम मोबाइल से बतियाना ही सीख रहे हैं। यही हाल रहा तो मोबाइल पर बतियाते-बतियाते हम कब मौत से बतियाने लगेंगे, हमें पता ही नहीं चलेगा। इस मोबाइलधारी पर कब आकाश से मौत बरस सकती है, इसका अंदाजा न तो मोबाइल बेचने वाली कंपनियों को है, न सरकार को।
इन दिनों पूरे देश में मानसून सक्रिय हो गया है, खूब तेज बारिश हो रही है। बिजली के चमकने के साथ ही बादलों का गर्जन अच्छों-अच्छों की हालत खराब कर देता है। बारिश के दौरान मोबाइल पर बात करना भी अच्छा लगता है। ऐसे में इन्हें कौन समझाए कि बारिश के समय मोबाइल अपने पास रखना कितना खतरनाक है। इन दिनों महानगरों ही नहीं, बल्कि शहरों और कस्बों में एफएम का चलन है। लोग अपने मोबाइल से एफएम सुनते हुए वाहन चालन करने लगे हैं। इस तरह से इस मौसम में वे किस तरह से अपनी जान को जोखिम में डाल रहे हैं, यह उन्हें नहीं पता और न ही मोबाइल बेचने वाली कंपनियों को। बारिश के समय मोबाइल से बात करने वालों का अचानक बेहोश होना, बहरापन आना या फिर मृत्यु को प्राप्त होना, इस तरह की घटनाएँ सभी देशों में हो रही हैं। हमारे देश में भी हो रही होंगी, पर इसकी जानकारी अभी लोगों को नहीं है, विदेशों में इस तरह की घटनाएँ सामने आने लगी हैं, इसके पीछे मोबाइल भी एक कारण है, इसे अभी उन्होंने समझा है। हमने नहीं समझा है, हमें इसे समझने में अभी वक्त लगेगा। आइए जानें कि मोबाइल किस तरह आकाशीय बिजली को अपनी ओर आकर्षित करता है।
पिछले साल ही ब्रिटेन में एक किशोरी मोबाइल से बात कर रही थी, उस समय खूब तेज बारिश हो रही थी, बादल गरज रहे थे, बिजली चमक रही थी और हवा भी काफी तेज चल रही थी। उक्त किशोरी मोबाइल के आकाश से गिरने वाली बिजली के संबंध में कुछ भी नहीं जानती थी। अचानक ही आकाश में बिजली कौंधी और वह बेहोश हो गई। बाद में जाँच में पता चला कि किशोरी के कान और मस्तिष्क को काफी क्षति पहुँची है। ब्रिटिशमेडिकल जर्नल में प्रकाशित यह घटना मोबाइल के आकाशीय बिजली के रिश्ते का उजागर करती है। यदि बारिश हो रही हो साथ ही बिजली भी कौंध रही हो, तो उस समय मोबाइल से बात करना अपनी जान को जोखिम में डालना है। यहाँ तक कि स्वीच ऑफ किया हुआ मोबाइल भी बारिशके समय अपने पास रखना खतरनाक है। भारत में मोबाइल बेचने वाली कंपनियाँ अपने उपभोक्ताओं को कभी नहीं बताती कि बारिश होती हो और बिजली चमकती हो, तब मोबाइल का उपयोग न करें, किंतु ऑस्टे्रलिया सरकार ने मोबाइल उपभोक्ताओं के लिए एक मार्गदर्शिका बनाई है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि तेज हवा चल रही हो, बादल गरज रहे हों और बिजली की चमक दिखाई दे रही हो, तो मोबाइल अपने पास न रखें, यदि आप मोबाइल रखते हैं, तो आपकी जान को खतरा है।
मोबाइल में धातु के अलग-अलग भाग होते हैं। ये धातु बिजली को अपनी ओर आकर्शित करते हैं। मोबाइल की संवेदनशीलता के ही कारण उसे पेट्रोल पम्प में उपयोग करने नहीं दिया जाता। उसमें व्याप्त तमाम धातु बिजली को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम होते हैं। शहरों में बिजली गिरने की घटनाएँ इसलिए कम होती हैं, क्योंकि यहाँ आकाशीय बिजली को तुरंत जमीन में दाखिल कर देने की व्यवस्था होती है। शहरों में बिजली के सुचालक लगे होते हैं। लोगों ने अपने घरों में बिजली का मीटर लगाते समय देखा होगा कि मीटर से एक तार किस तरह से जमीन से जोड़ दिया जाता है, इस गङ्ढे में काफी नमक भी डाला जाता है। इसका आशय यही है कि आकाशीय बिजली सीधे उस माध्यम से जमीन पर चली जाती है। इसे लाइटनिंग अरेस्टर कहते हैं। आकाश में विचरण करने वाले परिंदों पर जब भी बिजली गिरती है, तो वह उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त होता है। अब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि उड़ते विमान में बिजली गिरे, तब क्या होगा। जिन्हें विमान की तकनीक के बारे में थोड़ी सी भी जानकारी है, वे जानते हैं कि सभी विमानों के ऊपर अलग-अलग भागों में ऐसे सेंसर लगे होते हैं, जो बिजली को एक सिरे से दूसरे सिरे तक धकेलकर बाहर की ओर भेज देते हैं। यूँ तो बारिश में लोहे की डंडी वाली छतरी लेकर बाहर निकलना भी खतरनाक है। इसमें भी बिजली का वही नियम लागू होता है, जिसमें वह अपने सुचालक को खोजती है और उसके माध्यम से वह जमीन में चली जाती है। यह माध्यम यदि किसी इंसान के हाथ में है, तो उसे भी बुरी तरह प्रभावित करने से नहीं चूकती। बिलकुल यही गणित मोबाइल के साथ भी है। बिजली के स्वभाव से हम सभी परिचित हैं, पर वह मोबाइल के माध्यम से हमें प्रभावित कर सकती है, यह हमें अभी नहीं मालूम।
विश्व में आकाश में हर सेकंड 1800 से 2000 बादलों की गर्जना होती है। आकाश से बिजली पृथ्वी पर 22,400 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गिरती है। इस संबंध में वैज्ञानिकों का मानना है कि आकाश में रोज 44,000 बार बिजली चमकती है, किंतु सभी बिजलियों की चमक धरती पर मनुष्यों को दिखाई नहीं देती। इसका कारण बिजली और हमारे बीच बादलों की मोटी परत का होना है। ऐसा माना जाता है कि बादलों में जो बिजली होती है, उसका दबाव करोड़ों वोल्ट तक हो सकता है। जब पृथ्वी और बादलों के बीच विद्युत क्षेत्र की तीव्रता 36000 हजार वोल्ट प्रति सेंटीमीटर पहुँच जाती है, तभी वायु में अणु आयनित हो जाते हैं और बादलों की उग्रता पृथ्वी में समा जाती है। हमारे देश में हर वर्शबिजली गिरने से 900 से 1000 लोगों की मौत होती है। दूसरी ओर अमेरिका में मात्र 150 लोग ही मौत का शिकार होते हैं। इसका कारण यही है कि वहाँ बिजली के सुचालक अधिक लगे हैं। यह तय है कि आकाशीय बिजली को जमीन में जाने के लिए किसी न किसी माध्यम की आवश्यकता होती है। फिर यह माध्यम कोई पेड़ भी हो सकता है और इंसान भी। गाँवों में जिस पेड़ पर बिजली गिरती है, वह एकदम ही काला हो जाता है। फिर उसमें संवेदना नाम की कोई चीज नहीं रहती। मानो उसे जला दिया गया हो। आकाशीय बिजली तत्क्षण ही किसी को भी जला देने में सक्षम होती है।
हमारे देश में जब सिगरेट के पैकेट और गुटखे के पाऊच पर यह सूचना अंकित होती है कि यह यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, तो फिर मोबाइल कंपनियों को भी अपने मोबाइल सेट पर आकाशीय बिजली से दूर रहने की सलाह देनी चाहिए। तभी मोबाइलधारक यह समझेंगे कि आकाशीय बिजली उनके लिए किस तरह उनकी जान भी ले सकती है।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 15 जुलाई 2009

ये हैं अंधेरे के राही

उद्यमिता की यात्रा दरअसल जोखिम एवं संकट के प्रबंधन का तरीका ढूंढने से जुड़ी है , लेकिन 40 वर्षीय दिनाज वेरवेटवाला के लिए यह आग के खतरे से जूझने वाली साबित हुई। 2005 में एक खतरनाक दुर्घटना में दिनाज करीब 80 फीसदी तक झुलस गईं और उनका फिटनेस कारोबार एक बार को तो ठप्प पड़ गया। वह कहती हैं , ' जिन लोगों को मैं फिटनेस का प्रशिक्षण दे रही थी , उन्होंने दोबारा सेंटर में दाखिला नहीं कराया। मेरी आय का एकमात्र स्त्रोत असफल साबित होने लगा था। '
इसके बाद दिनाज का परिवार अस्पताल के दस लाख रुपए चुकाने के लिए भी मुश्किल में पड़ गया। इससे उनके यहां काम करने वाले लोगों को वेतन देने पर भी संकट खड़ा हो गया। दिनाज कहती हैं , ' मैंने खुद से कहा कि इस तरह की चुनौतियां मेरा रास्ता नहीं रोक सकतीं। जब मैं बहुत गंभीर हालत में थी , तब भी मुझे भरोसा था कि मैं इस संकट से बाहर निकलने का रास्ता खोज निकालूंगी। ' करीब एक साल के बाद उनका कारोबार फिर से रास्ते पर आ गया।
मशहूर बिजनेस इतिहासकार प्रोफेसर द्विजेंद त्रिपाठी कहते हैं कि संकट के दौर से बाहर निकलने का जज्बा ही उद्यमियों की सफलता की दास्तां बनता है। वह बताते हैं, ' इससे निकलने के बारे में भी वे तब तक नहीं बता सकते जब तक कि वे संकट की स्थिति में नहीं पड़े हों। ' कुटोन्स रीटेल के प्रमोटर डीपीएस कोहली आज 793 करोड़ रुपए की कंपनी के स्वामी हैं। दिल्ली में 1984 के सिख विरोधी दंगों में कोहली का सब कुछ तबाह हो गया। 25 वर्ष के कोहली उस समय टेलीविजन बनाने की एक फैक्ट्री लगाने के लिए उड़ीसा से दिल्ली आए थे। उत्तर प्रदेश सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी अपट्रॉन के लिए कुछ दिनों तक टीवी सेट बनाने के बाद 19.82 में कोहली ने अपोलो नाम से अपना उत्पाद लॉन्च किया। दंगा शुरू होने के एक दिन बाद ही कोहली की फैक्ट्री और शोरूम को जमींदोज कर दिया गया। कोहली उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, ' हमारे पास कंपनी को बंद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। ' कोहली ने दंगों में कम से कम चार करोड़ रुपए का नुकसान उठाया। कर्ज चुकाने के क्रम में कोहली और उनके परिवार के लिए सब कुछ बदल चुका था। वे तीन हजार रुपए प्रति महीने से भी कम रकम पर गुजारा कर रहे थे। मेकैनिकल इंजीनियर होने की वजह से कोहली को एक बीमा कंपनी में मोटर इंश्योरेंस सर्वेयर की नौकरी मिल गई। इस नौकरी ने कोहली को अगले छह साल तक सहारा दिया। 1991 में कोहली ने अपने चचेरे भाई बी एस साहनी के साथ मिलकर दो कमरे वाले दफ्तर से युवाओं पर केंद्रित ब्रांड चार्ली जीन्स को लॉन्च किया। वह कहते हैं , ' पैसे जुटाने के लिए मैंने अपनी पत्नी के गहने गिरवी रख दिए। ' धीरे-धीरे जब ऑफिस जाने वाले युवाओं में फैशन का क्रेज बढ़ने लगा और उन्होंने डेनिम से चिनोज और खाकी का रुख करना शुरू कर दिया , तो दोनों ने मिलकर 1999 में कुटोन्स ब्रांड लॉन्च किया। आज देश भर में कुटोन्स के 465 जगहों पर कम से कम 1438 स्टोर हैं और यह ब्रांड एक जाना-माना नाम बन चुका है।
संकट से निपटने में क्या उम्र का कोई संबंध है ?
गिरीश मिनोचा कहते हैं , ' जब आप युवा होते हैं , तो आप तीस वर्ष से अधिक के बारे में सोचते भी नहीं हैं। ' दिल्ली कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से 24साल की उम्र में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल कर चुके मिनोचा ने हैवेल्स में मार्केटिंग इंजीनियर के रूप में ज्वाइन किया। मिनोचा इलेक्ट्रिकल स्विचगियर की इस कंपनी में सरकारी कंपनियों को उत्पाद की बिक्री करने से जुड़े थे। 1989 में जनवरी की एक सर्द सुबह देर से दफ्तर पहुंचने पर बॉस ने उनसे जवाब तलब किया। गरमागरम बहस के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ने का फैसला किया और वापस अपने घर शिमला पहुंच गए। वह बताते हैं , ' मेरे पिता इस फैसले से काफी खफा थे और उन्होंने कहा कि जो समझ में आए करो। ' मिनोचा ने इसके बाद अपना कारोबार शुरू करने का फैसला किया। कॉलेज के दिनों से लेकर नौकरी करने तक बचाए 40000 रुपए और दादाजी से 60000 रुपए उधार लेकर उन्होंने शिमला से तेरह किलोमीटर दूर शोगी में जमीन खरीदी। यहां उन्होंने वेल्डिंग इलेक्ट्रोड बनाने के लिए एक फैक्ट्री लगाई।
फैक्ट्री लगाने के दौरान ही भूस्खलन की वजह से फैक्ट्री की दीवार गिर गई। इसके बाद मिनोचा ने हिमाचल सरकार द्वारा फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री को दी जाने वाले राहत की खबर से इसी क्षेत्र में हाथ आजमाने की सोची। फ्लेवर्ड ड्रिंक्स,जैम,नेचुरल जूस, सीरप,सॉस और अचार बनाने के लिए मिनोचा ने फैक्ट्री लगाई। शुरुआत के तीन साल तक कारोबार में फायदा नहीं हुआ, लेकिन उसके बाद फ्रूट वाइन के कारोबार में उनकी गाड़ी चल निकली। पिछले वर्ष उनका कारोबार दो करोड़ रुपए को पार कर गया है।

मंगलवार, 14 जुलाई 2009

श्रेष्ठ कौन?

भारती परिमल
एक राजा था।उसके तीन बेटे थे। तीनों ही राजकुमार अपने आपको एक-दूसरे से बहादुर, होषियार और बुद्धिमान मानते थे।वे खेल-खेल में हमेषा एक-दूसरे को नीचा दिखाते हुए अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने में लगे रहते थे। एक दिन इसी बात को लेकर उनमें बहुत समय तक बहस होती रही। जब कोई नतीजा नहीं निकला, तो आपस में तय किया कि क्यों न रानी माँ के पास जाकर इस बात का निर्णय लिया जाए!
तीनों राजकुमार रानी माँ से मिले और अपनी बात उनके सामने रखते हुए प्रष्न पूछा- बताओ माँ हम तीनों में से श्रेष्ठ कौन है? यह सुनकर रानी माँ भी कुछ देर के लिए मौन हो गई, क्योंकि उनके तीनों ही बेटे एक-दूसरे से बढ़कर पराक्रमी और होषियार थे।वे स्वयं ही सोच में पड़ गई कि इन तीनों में से सर्वश्रेष्ठ कौन है?
रानी माँ ने तीनों ही पुत्रों को शांत करते हुए एवं प्यार से समझाते हुए कहा कि मेरे लिए तो तुम तीनों ही होषियार और श्रेष्ठ हो। तुम तीनों ही मेरे लिए बराबर हो। किंतु वे तीनों तो ठहरे राजकुँवर। भला वे इस बात से कैसे एक क्षण में ही सहमत हो जाते! वे तीनों तो जिद पर आ गए और हठ करते हुए बोले- नहीं, नहीं, आपको कहना ही होगा कि हम तीनों में से कौन सबसे अधिक श्रेष्ठ है।
अब तो रानी माँ सचमुच ही परेषानी में पड़ गई। थोड़ी देर सोचने के बाद वे बोली- ठीक है, बच्चों! एक काम करो, एक महीने में तुम तीनों में से जो भी सबसे अधिक उपयोगी चीज मेरे लिए ले आएगा, वही मेरी नजरों में श्रेष्ठ होगा।
तीनों राजकुमारों को रानी माँ की यह बात जँच गई। वे तीनों ही दूसरे दिन रानी में के लिए उपयोगी चीज लाने के लिए राज्य से बाहर परदेस के लिए निकल पड़े। पहला राजकुमार जिस देष में गया, वहाँ घूमते-घूमते उसे बाजार में जादुई चष्मा बिकते हुए देखा। इस चष्मे की विषेषता यह थी कि इसे पहनकर जिसे देखने की इच्छा हो, उसे देखा जा सकता था। राजकुमार को यह चीज बहुत अच्छी लगी और उसने उसे खरीद लिया।
दूसरा राजकुमार जिस देष में गया, वहाँ उसे बाजार में एक ऐसा जादुई कालीन दिखाई दिया, जिस पर बैठ कर जहाँ जाने की इच्छा हो, वहाँ जाया जा सकता था। उसने वह बेषकीमती जादुई कालीन खरीद लिया।
तीसरे राजकुमार को परदेस में एक जादुई फल मिला, जिसे सूँघने मात्र से ही मरणासन्न व्यक्ति भी बिस्तर से उठ खड़ा होता था। राजकुमार को यह फल सबसे अधिक उपयोगी लगा और स्वर्णमुद्राएँ देकर उसने वह फल खरीद लिया।
इस तरह से तीनों ही राजकुमार ने अपनी-अपनी बुद्धिमानी से श्रेष्ठ वस्तुओं का चयन कर उसे खरीद लिया। तीनों ने अलग होते समय एक-दूसरे से वादा किया था कि एक निष्चित दिन और समय पर वे आपस में मिलेंगे।वे लोग तय किए गए समय पर उस स्थान पर पहुँच गए। तीनों ने अपनी-अपनी चीजों की विषेषताओं के बारे में बताया। उसके बाद पहले राजकुमार ने चष्मा पहनकर रानी माँ को देखने की इच्छा प्रकट की। देखा तो पता चला कि रानी माँ बहुत अधिक बीमार है और मरणासन्न स्थिति में बिस्तर पर लेटी हैं। उसने दोनों भाइयों को ये बात बताई। दूसरा राजकुमार बोला- चिंता की कोई बात नहीं। हम तीनों इस जादुई कालीन पर बैठ कर अभी राजमहल पहुँच जाते हैं। वे तीनों ही कालीन पर बैठ गए और पल भर में ही रानी माँ के पास थे। वहाँ पहुँचकर तीसरे राजकुमार ने अपनी जेब से जादुई फल निकाला और रानी माँ को सूँघाया। फल सूँघते ही रानी माँ तो बिस्तर से उठ बैठी, जैसे कुछ हुआ ही न हो। सामने देखा तो तीनों राजकुमार खड़े मुस्करा रहे थे। रानी माँ और राजा तीनों बेटों को देखकर बहुत खुष हुए। रानी माँ ने तीनों बेटों को गले लगा लिया और खूब प्यार किया। तीनों राजकुमार ने फिर अपना पुराना प्रष्न उनके सामने रख दिया।
रानी माँ बोली- मुझे क्या मालूम कि तुम तीनों कौन-सी वस्तु लेकर आए हो? उसके बारे में जाने बिना मैं कोई निर्णय कैसे ले सकती हूँ? तब पहले राजकुमार ने अपने जादुई चष्मे के बारे में बताया कि किस प्रकार उसे पहनकर उसने रानी माँ के बीमार होने का पता लगाया और फिर हम तीनों यहाँ आ पहुँचे। दूसरा राजकुमार शीघ्र ही बोला- ना, ना, वो तो मेरे जादुई कालीन पर बैठ कर हम तीनों कुछ ही पलों में यहाँ पहुँचे हैं।
इतनी देर से चुप खड़ा तीसरा राजकुमार बोल पड़ा- ये तो सच है कि बड़े भाई और मँझले भाई के कारण आपकी बीमारी का पता चला और शीघ्र ही यहाँ आना संभव हो पाया, किंतु मेरे द्वारा लाए गए जादुई फल का ही प्रभाव था कि आप उसको सूँघते ही तुरंत बिस्तर से उठ खड़ी हुई। अत: इन तीनों में श्रेष्ठ तो मैं ही हुआ।
रानी माँ ने तीनों बेटों की तरफ मुस्कराते हुए देखा और बोली- मुझे ठीक करने में तुम तीनों का ही बराबर का हाथ है। यदि जादुई चष्मे से देखा न जाता, तो मेरे बीमार होने का पता ही न चलता। यदि जादुई कालीन न होता तो शीघ्र ही राजमहल पहुँचना संभव ही न था और यदि ये जादुई फल ही न होता तो आज मेरा जीवित बचना संभव ही न था, क्योंकि वैद्य तो उपचार करते हुए हार गए थे और निराष हो चुके थे। इसलिए मेरे जीवित होने में तुम तीनों के द्वारा लाई गई वस्तुओं की बराबर की हिस्सेदारी है। वैसे भी माँ के लिए तो बेटे ऑंखों के तारे के समान हैं। तुम तीनों ही मेरी ऑंखें हो। क्या किसी एक ऑंख को श्रेष्ठ कहा जा सकता है भला? फिर श्रेष्ठ तो वह होता है, जो दूसरों को श्रेष्ठ समझे। इस दृष्टि से तुम तीनों ही श्रेष्ठ हो। मेरे प्यारे बेटों, मेरी नजरों में तो तुम तीनों ही मेरे अनमोल रतन हो, ऐसा कहते हुए रानी माँ ने तीनों राजकुमारों को फिर से गले लगा लिया।
रानी माँ की बातें सुनकर तीनों राजकुमारों का अहंकार नष्ट हो गया और वे जीवन में सदैव स्वयं को श्रेष्ठ न मानकर दूसरे को श्रेष्ठ मानने लगे।
भारती परिमल

सोमवार, 13 जुलाई 2009

समस्त धाराओं को बौना साबित करते दलितों पर अत्याचार


डॉ. महेश परिमल
हमारे देश में दलित उद्धार की बातें बहुत सुनी जाती हैं। सरकारी घोषणाओं को सुनकर ऐसा लगता है कि अब दलितों पर अत्याचार होना बंद हो जाएगा। दलित उद्धार के जुमले नेताओं के लिए वाणी विलास बनकर रह गए हैं। देखने में तो यहाँ तक आ रहा है, जो नेता जितनी जोर से दलितों पर अत्याचार खत्म करने की दुहाई देता है, उसी के राज में दलितों पर अत्याचार होते हैं। देश के दो बड़े राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार में दलितों पर जिस तरह से अत्याचार बढ़ रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि अपराध की सारी धाराएँ वहाँ जाकर खामोश हो जाती हैं।
जिस देश में सत्तारुढ़ दल की नेता एक महिला हो, जिस देश की प्रथम नागरिक एक महिला हो, जिस देश में लोकसभा अध्यक्ष एक महिला हो, वह भी दलित, इसका लाभ सत्तारुढ़ दल से खूब उठाया, इसके बाद भी उस देश में महिलाओं पर होने वाले अत्याचार की सूची लंबी से लंबी होती हो, उस देश का क्या कहना? सबसे बड़ी बात तो यह है कि दलितों के उद्धार के नाम पर मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती के राज में ही महिलाओं पर होने वाले अत्याचार लगातार बढ़ रहे हों, तो उस देश को क्या कहा जाए। विदेश में संभ्रांत परिवारों के बच्चों पर होने वाले हमले को लेकर चिंताग्रस्त होने वाली सरकार अपने ही देश की महिलाओं पर होने वाले अत्याचार पर किस तरह से खामोश हो जाती है। समझ में नहीं आता कि चुनाव जीत जाने के बाद दलितों पर होने वाले अत्याचार क्यों दिखाई नहीं देते? या इस पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं होते?
अब आते हैं सच्चे आँकड़ों की दुनिया में। नेशल क्राइम ब्यूरो के अनुसार 2008 में दलितों पर सबसे अधिक अत्याचार उत्तर प्रदेश में हुए। यह शायद बहन जी मायावती को नहीं मालूम कि 2007 में उत्तर प्रदेश में दलितों पर अत्याचार की 6628 घटनाएँ हुई। 2008 में यह आँकड़ा बढ़कर 6942 हो गया। यदि प्रधानमंत्री बनने का मायावती का सपना पूरा हो जाता, तो देश दलितों के अत्याचार के मामले में कितना आगे बढ़ जाता। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमिशन यानी मानवाधिकार आयोग के अनुसार उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का 21 प्रतिशत भाग दलितों के हिस्से है। यहाँ अधिकांश झगड़े जमीन को लेकर होते हैं। वहाँ के सवर्ण लोग को यह अच्छा नहीं लगता कि एक दलित किसी तरह भी जमीन का मालिक बने। भले ही उसकी जमीन काफी छोटी हो या फिर बंजर ही क्यों न हो। दूसरी ओर यदि कोई दलित व्यक्ति सवर्ण के इलाके में सज-धजकर कहीं निकलता है, तो यह भी सवर्णों को गवारा नहीं। बात यहाँ तक होती, तो समझ में आ सकता है। इस प्रजातांत्रिक देश में ऐसा बहुत कुछ हो रहा है, जिस ओर ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि किसी दलित की शादी ाहे रही हो, तो उसकी बरात सवर्णों के इलाके से नहीं गुजर सकती। यही नहीं, उस इलाके में दलित डांस नहीं कर सकते। वहाँ पटाखे नहीं चला सकते। उस स्थान पर खुशियाँ नहीं मना सकते। इसके बाद भी सरकार की ओर से कभी कोई ऐसी कार्रवाई नहीं होती, जिससे लोगों को सबक मिले। हद तो तब हो गई, जब एक दलित विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षा में पूरे जिले में प्रथम आया। माता-पिता खुशी से झूम उठे। यह खुशी तब और दोगुनी हो गई, जब यह पता चला कि समीप के जिले में उनका बेटा कलेक्टर हो गया है। तब वे मिठाई लेकर लोगों का मुँह मीठा करने निकल पड़े। खुशी के मारे वे वहाँ के जमींदार के घर पहुँच गए। जिनके खेत में जिसने कभी मजदूरी की हो, वही मजदूर आज उनके सामने मिठाई का डिब्बा लेकर उनका मुँह मीठा करने के लिए आए हों, तो यह एक जमींदार के लिए शर्म की बात थी। बस फिर क्या था... हवेली में मिठाई देने की तेरी हिम्मत कैसे हुई? अपनी औकात तो देख लेते। इस जुमले के साथ मिठाई का डिब्बा तो फेंका ही, उसके बाद उन दलितों की जो धुनाई हुई, उससे किसी फिल्मी जमींदार के अत्याचार जीवंत हो उठे। ऐसे मिली उस दलित माता-पिता को खुशियाँ बाँटने की सजा!
ऐसा केवल उत्तर प्रदेश में ही होता है, ऐसी बात नहीं है। बिहार की स्थिति भी काफी भयावह है। वहाँ नीतिश कुमार के राज में भी अत्याचारों का सिलसिला थमा नहीं है। 2008 में वहाँ दलितों पर अत्याचार के 2786 हुए। उत्तर प्रदेश हो या फिर बिहार। इंडियन पेनल कोड की सभा धाराएँ यहाँ के अपराध के आगे खामोश हो जाती हैं। हत्या, बलात्कार, मारपीट, लूटपाट, झोपड़े जलाना, जल आपूर्ति रोक देना, इतने अधिक ब्याज पर कर्ज देना कि पीढिय़ों तक न चुका सके। इस संबंध में बिहार महादलित संघ के अध्यक्ष विश्वनाथ ऋषि कहते हैं कि सामान्य रूप से दलितों पर जो अत्याचार होते हैं, तब अत्याचार निवारण की धारा 1989 के तहत एफआईआर दर्ज होनी चाहिए, पर पुलिस के तटस्थ न रहने से वह इसमें फेरबदल कर देती है और मामला साधारण बन जाता है। यदि सब कुछ सही तरीके से हो, तो अत्याचारी को उस कानून के तहत अत्याचार सहन करने वाले को मुआवजा दिया जाना चाहिए। पर पुलिस ऐसा होने कहाँ देती है।
उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद यदि आंध्र प्रदेश चला जाए, तो वहाँ तो पूरा इतिहास ही काला है। सन 2007 में वहाँ दलितों पर होने वाले अत्याचारों का आँकड़ा 3383 था, इसमें 103 बलात्कार के और 46 हत्या के मामले थे। यहाँ याद रखने वाली बात यह है कि ये आँकड़े नेशनल क्राइम ब्यूरो के रिकॉर्ड के अनुसार हैं। पुलिस की डायरी में जो गुनाह दर्ज हैं, उसका जिक्र इसमें नहीं है। कई मामले तो पुलिस अपने तईं ही रफा-दफा कर देती है। इस मामले में पुलिस की भूमिका अहम है। अत्याचार के मामले में वह भी कम नहीं है। फिर बिहार की पुलिस का क्या कहना। दलितों के पास सहन करने के सिवाय और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। जिस दिन दलित अत्याचारों के सही आँकड़े संसद में रख दिए जाएँगे, तो एक प्रलयंकारी स्थिति पैदा हो जाएगी। खामोश हो जाएगा, नेताओं का वाणी विलास। मौन हो जाएगी, मानवता। विशाल से विशालतम हो जाएगी, दरिंदगी। इतना कुछ होने पर भी क्या हम गर्व से कह पाएँगे, मेरा भारत महान्!
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 11 जुलाई 2009

स्वीटी को मिली सीख


भारती परिमल
एक थी शरारती लड़की। नाम था स्वीटी। उसकी शरारतों से घर के सभी लोग परेशान थे। मम्मी तो सबसे ज्यादा परेशान थी। आखिर छह साल की नन्हीं लड़की सभी की नकल करे और सबका मजाक उड़ाए, तो यह तो वास्तव में परेशानी की ही बात थी। मम्मी ने उसे प्यार से कितनी ही बार समझाया- बेटा, ऐसा नहीं करते। किसी की नकल करना बुरी बात होती है। लेकिन शरारती स्वीटी अपनी मम्मी की बात एक कान से सुनती और दूसरे से निकाल देती। वह हमेशा पापा के पेपर पढऩे के तरीके, मम्मी की साड़ी पहनने का ढंग, दादाजी के बोलने, दादीजी के पूजा करने और चाचा के उठने-बैठने की नकल उतारती थी और बदले में सभी से डाँट भी खाती थी।
स्वीटी को एक दूसरा शौक था- टी.वी. देखना। पापा समझाते हुए कहते- स्वीटी, ज्यादा समय तक टी.वी. नहीं देखते, अधिक पास से टी.वी. नहीं देखते, यह अच्छी बात नहीं है। स्वीटी जवाब देती- लेकिन पापा, कार्टून नेटवर्क तो मेरा प्यारा शो है। मुझे तो इसे देखना बहुत अच्छा लगता है। आप भी देखिए, आपको भी खूब मजा आएगा। पापा को गुस्सा आ जाता, वे कहते- तो फिर पढ़ोगी कब? तुम्हें बाहर खेलने जाना चाहिए। खेलने से शरीर की कसरत होती है। शरीर में स्फूर्ति आती है। दिन भर टी.वी. के सामने बैठे रहने से आँखें और शरीर दोनों ही खराब हो सकते हैं।
स्वीटी पर न तो पापा की बातों का असर होता, न ही मम्मी के समझाने का। बहुत हुआ तो पापा के घर में रहते समय वह होमवर्क कर लेती और फिर जैसे ही पापा घर से बाहर गए कि स्वीटी बैठ जाती टी.वी. के सामने। स्वीटी को घूमना भी खूब अच्छा लगता था। वह हमेशा बाहर जाने की जिद करती। जब पड़ोस की कोई आंटी या अंकल उससे कहते कि चलो स्वीटी हमारे साथ घूमने चलना है? तो स्वीटी तुरंत तैयार हो जाती, पर यहाँ मम्मी उसकी एक न सुनती और उसे जिद करके घर में ही रहने को कहती। क्योंकि उसे मालूम था कि यदि एक बार स्वीटी को बाहर घूमने-फिरने की आदत लग गई, तो वह हमेशा घूमना ही पसंद करेगी। घर में रहते हुए तो उसे डाँट-डपट कर अपनी मर्जी से कुछ करवाया जा सकता है, लेकिन यदि उसे बाहर घूमने की आदत हो गई तो फिर तो उसे घर में रहना जरा भी अच्छा नहीं लगेगा। साथ ही घूमने-फिरने से चॉकलेट-टॉफी या अन्य चटपटा खाने की आदत भी पड़ जाएगी। फिर तो स्वीटी को संभालना बड़ा मुश्किल होगा। यह सोचकर स्वीटी की मम्मी उसकी बाहर घूमने जाने की जिद कभी पूरी नहीं करती थी।
एक बार स्वीटी स्कूल की छुट्टी होने पर स्कूल से बाहर निकल ही रही थी कि उसके सामने एक कार आकर खड़ी हो गई। कार के अंदर से एक आदमी बाहर आया और स्वीटी से बोला- चलो बेटे, तुम्हें घर तक छोड़ दूँ। एक अनजाने आदमी को इस तरह प्यार से बोलते देख स्वीटी को आश्चर्य हुआ, वह बोली- नहीं, मेरी वैन अभी आ जाएगी।
आदमी ने कहा- अरे तो क्या हुआ? उस वैन में दूसरे बच्चे चले जाएँगे। तुम्हें, तुम्हारे घर छोड़ते हुए मुझे बहुत खुशी होगी। हम आपस में रास्ते में बातचीत करेंगे, कुछ खाएँगे-पीएँगे और इतने में तुम्हारा घर आ जाएगा। तुम घर चली जाना। स्वीटी को लगा- वाह, नई-नई कार में बैठने में कितना मजा आएगा। वैन वाले अंकल तो हम सभी बच्चों को कितना ठूँस-ठूँस कर भरते हैं। कभी-कभी तो जगह ही नहीं मिलती, एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते, धक्का खाते हुए घर जाना पड़ता है। यहाँ तो कार में सिर्फ मैं ही बैठूँगी, पूरी सीट मेरी होगी। फिर अंकल भी तो बहुत प्यारे लग रहे हैं। रास्ते में चॉकलेट-टॉफी भी दिलाएँगें। वह तो झट से कार में बैठ गई। उसने पूछा- आपका नाम क्या है अंकल? मेरा नाम सुरेश है। तुम्हारा घर कहाँ है?
स्वीटी बोली- सुंदरनगर के लक्ष्मी कॉटेज में।
अंकल बोले- अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है। मुझे भी तो वहीं जाना है। ऐसा कहते हुए अंकल ने जेब से चॉकलेट निकालकर स्वीटी के हाथों में पकड़ाई। चॉकलेट खाने के थोड़ी देर बाद ही स्वीटी को लगा कि मुझे इतनी ज्यादा नींद कैसे आ रही है? मैं तो कभी दिन में सोती ही नहीं हूँ। मम्मी तो बोल-बोल कर परेशान हो जाती है और मैं तो टी.वी. के सामने बैठी रहती हूँ। सीधा रात को ही बिस्तर में जाती हूँ। आखिर मुझे इतनी नींद क्यों आ रही है? इसके आगे वह कुछ और सोचे कि नींद के कारण उसकी आँखें ही बंद हो गई।
सुरेश ने कार की स्पीड बढ़ा दी। थोड़ी देर बाद उसे लगा कि दूसरी कार उसका पीछा कर रही है। उसने अपनी कार को हाई-वे की तरफ मोड़ दिया। पीछे वाली कार भी हाई-वे की ओर चल पड़ी। अब तो उसे यकींन हो गया कि सचमुच उसका पीछा किया जा रहा है। वह अपनी कार की स्पीड बढ़ाता उसके पहले ही पीछे वाली कार तेज स्पीड के साथ उसके सामने आकर खड़ी हो गई। अब सुरेश को अपनी कार रोकनी पड़ी। उसे पता नहीं था कि कार में कौन है?
क्यों, क्या बात है? कार कोई रूकवाई? उसने गुस्से से पूछा। कार में से स्वीटी के पापा बाहर निकले और उन्होंने भी तेज आवाज में पूछा- यह आपकी कार में जो लड़की सो रही है, वह कौन है? सुरेश ने कहा- जो भी है, आपको इससे क्या मतलब? आप अपने रास्ते पर आगे जाइए।
स्वीटी के पापा ने सुरेश का कॉलर पकड़ लिया और उसे कार से बाहर निकलने पर विवश कर दिया। स्वीटी के पापा के साथ उसके छोटे भाई यानी स्वीटी के चाचा भी थे। दोनों ने मिलकर उस अकेले आदमी को खूब मारा और फिर मोबाइल की मदद से पुलिस को भी बुला लिया। सुरेश गिड़गिड़ाने लगा- मुझे छोड़ दो, परंतु उसकी एक न सुनी गई और पुलिस उसे पकड़ कर ले जाने लगी।
अब तक स्वीटी की नींद खुल गई थी। उसे कुछ भी समझ में नहीं आया। उसने पुलिस को देखा, पापा को देखा और उस अनजाने अंकल को पुलिस से घिरे देखा तो वह तो डर ही गई। बस, पापा को देखकर वह उनसे लिपटकर रो पड़ी। पापा बोले- तुझे कुछ पता भी है? यह आदमी तुम्हें उठाकर ले जा रहा था! यदि हमने तुम्हें स्कूल में उसकी कार में बैठेते समय न देखा होता, तो न जाने क्या होता?
अब स्वीटी को समझ में आया कि उसने एक अनजाने आदमी पर विश्वास कर कितनी बड़ी गलती की थी। उसे मम्मी की बात याद आई कि वह उसे कभी भी किसी के भी साथ जाने से क्यों मना करती थी। उसे पापा की हिदायतें भी सच्ची लगने लगी। मम्मी की समझाइश को भी वह एक-एक कर याद करने लगी। पापा और चाचा के साथ घर की ओर लौटते हुए उसने मन ही मन फैसला कर लिया था कि अब वह हमेशा मम्मी-पापा की बात मानेगी और कभी भी गलत बात के लिए जिद नहीं करेगी।
भारती परिमल

शुक्रवार, 10 जुलाई 2009

गांवों को रोशन करेगी सोलर लालटेन


एक ऐसे समय में जब ऊर्जा के लिए परमाणु के रास्ते को सबसे कारगर बताया जा रहा है और चारों ओर भारत - अमेरिका परमाणु सौदे के फायदे गिनाए जा रहे हैं, अक्षय ऊर्जा के स्त्रोतों पर चल रहा काम परवान चढ़ रहा है।
इसी क्रम में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने और रात्रि विद्यालयों को स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए अप्लाइड मैटेरियल्स और नेशनल एनर्जी फाउंडेशन( एनईएफ )ने ग्रामीण इलाकों में संयुक्त रूप से सोलर लालटेन बांटने का फैसला किया है। बिजली की कमी से जूझ रहे उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के ग्रामीण इलाकों में लोगों को सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से रूबरू कराने के लिए यह पहल की गई है।
दिलचस्प बात यह है कि तमिलनाडु के कांचीपुरम में 25 और आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में रात्रि विद्यालयों में पहले ही ये लालटेन दिए जा चुके हैं। अप्लाइड मैटेरियल्स बेंगलुरु की आईटी और बिजनेस प्रोसेस सल्यूशंस कंपनी है। अप्लाइड मैटेरियल्स के प्रेजिडेंट डॉ . मधुसूदन अत्रे ने अक्षय ऊर्जा के स्त्रोतों पर ध्यान देने की जरूरत पर बल दिया। उन्होंने कहा , ' तेल के अंतरराष्ट्रीय संकट को देखते हुए हमें ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोत का इस्तेमाल करने के प्रयास करने चाहिए। ' अभी सौर ऊर्जा के विकास में उच्च लागत और उपकरण के रखरखाव पर खर्च होने वाली भारी राशि बाधा बनी हुई है।
ऊर्जा एवं पर्यावरण संतुलन पर ध्यान केंद्रित करते हुए सेमीकंडक्टर निर्माता कंपनियां वैकल्पिक ऊर्जा के स्त्रोत से ऊर्जा पाने वाली तकनीक को आम आदमी की पहुंच में लाने के प्रयास कर रही हैं। अभी सोलर लालटेन बांटने का प्रोजेक्ट पिछली योजना का विस्तार है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष 40 लालटेन बांटे गए थे और उस योजना को भारी सफलता मिली थी।
अत्रे ने कहा,' हमने ये लालटेन बेंगलुरु की वैकल्पिक ऊर्जा कंपनी कोटक ऊर्जा से हासिल किए हैं। इस बार लिए गए लालटेन की कीमत 17-20 लाख रुपए के बीच आई है। हमने कर भुगतान पूर्व आय का एक फीसदी सामाजिक कार्यों के लिए खर्च करने का फैसला किया है।

एनईएफ के प्रेजिडेंट और आईआईटी मुंबई में प्रोफेसर चेतन सोलंकी कहते हैं, ' ग्रामीण इलाके में सोलर लालटेन बहुत उपयोगी हैं। दिन में बच्चे अपने माता - पिता के साथ काम में हाथ बंटाते हैं और ज्यादातर वे शाम को स्कूल जाते हैं। इसके इस्तेमाल से 2 फायदे हैं - एक तो वातावरण साफ रहता है और दूसरा, छात्रों एवं शिक्षकों के लिए यह आकर्षण का केंद्र होता है। '
वैकल्पिक ऊर्जा के स्त्रोत और उनके इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने भी कई कदम उठाए हैं। ताजा फैसले में सरकार ने मिट्टी के तेल पर दी जा रही सब्सिडी का कुछ हिस्सा सौर ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए बांटने का फैसला किया है। प्रोफेसर सोलंकी कहते हैं कि सरकार द्वारा इस दिशा में प्रयास शुरू करने में देर हुई और प्रयासों को लागू किए जाने में अब भी गंभीरता नहीं बरती जा रही है।
उन्होंने कहा' सरकारी प्रयास कभी जरूरतमंदों तक नहीं पहुंचते, जबकि इन्हें बनाने का उद्देश्य काफी मददगार साबित हो सकता है।'गौरतलब है कि देश में सौर, पवन और अन्य अक्षय ऊर्जा स्त्रोतों से पैदा हो रही बिजली कुल उत्पादन का 8 फीसदी है जबकि परमाणु ऊर्जा से अब तक महज 3 फीसदी ही उत्पादन हासिल किया जा सका है।

गुरुवार, 9 जुलाई 2009

फ्लॉप शो साबित हुआ आम बजट


नीरज नैयर
इस आम बजट को आमजन की अपेक्षाओं के अनुरूप तो नहीं कहा जा सकता लेकिन सरकार की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के इसमे सारे गुण मौजूद हैं. वित्तमंत्री प्रणव
मुखर्जी ने भविष्य में राजनीतिक लाभ से संबंधित योजनाओं को अत्याधिक प्रमुखता दी है. बजट में टैक्सों की हेराफेरी और थोड़ी बहुत छूट प्रदान करके लोकलुभावन बनाने की कोशिश की है लेकिन वो भी कारगर होती नजर नहीं आती. बजट में आयकर छूट सीमा जो पहले 1,50,000 तक थी उसे अब 1,60,000 कर दिया गया है, ऐसे ही महिलाओं के लिए इसे 1,80,000 से बढ़ाकर 1,90,000 किया गया है, हालांकि वरिष्ठ नागरिक इस मामले कुछ ज्यादा फायदे में रहे हैं उनके लिए छूट सीमा पहले के 2,25,000 से बढ़ाकर 2,40,000 कर दी गई है. यानी वरिष्ठ नागरिकों को छोड़कर अधिकतम रियायत दी गई महज 10,000. बजट में जीवन रक्षक दवाएं, बड़ी कारें, एलसीडी, मोबाइल फेान,
सीएफएल,वाटर प्यूरीफायर, खेल का सामान आदि सस्ता किया गया है. जबकि डॉक्टर-वकील की सलाह, सोना-चांदी, कपड़े आदि के लिए अब ज्यादा दाम चुकाने होंगे.
नफे -नुकसान के गुणा-भाग में उतरने से पहले बजट के बाकी हिस्सा पर भी प्रकाश डालाना बेहतर रहेगा, प्रणव मुखर्जी ने किसानों का खास ख्याल रखने की बात कही है, उन्हें अब सस्ते दर से कर्ज दिया जाएगा. खाद सब्सिडी अब उनके हाथ तक पहुंचाई जाएगी. 2014-15 तक गरीबी उन्नमूलन की दिशा में उल्लेखनीय काम करने का प्रावधान बजट में है, इसके अलावा अल्पसंख्यकों पर दरियादिली की बरसात की गई है, एससी-एसटी और ओबीसी में आने वाले बच्चों की शिक्षा पर अत्याधिक ध्यान केंद्रित किया गया है. अब बात शुरू करते हैं आयकर छूट से जिसको सरकार की तरफ से बहुत बड़ा कदम बताया जा रहा है, अगर दो हफ्ते पहले ये बजट आता और ये प्रावधान किया गया होता तो कुछ हद तक इसे बड़ा कदम करार दिया जा सकता था लेकिन मौजूदा वक्त में ऐसी कोई गुंजाइश नहीं. बजट से ठीक पहले सरकार पेट्रोल पर चार और डीजल पर दो रुपए बढ़ा
चुकी, उस लिहाज से इस छूट को ऊंट के मुंह में जीरा समान कहा जा सकता है. छूट की सच्चाई को विस्तार से समझने के लिए हम इसको ऐसे देख सकते हैं, अगर आपकी सालाना कमाई 500,000 से 9,90,000 के आसपास है तो आपकी सालाना बचत हुई करीब 1030, अगर 10,00,000 है तो 21530, 20,00,000 पर 51530, और 50,00,000 पर तकरीबन 1,41,530 के आसपास. पहले वाली श्रेणी यानी 500,000 से 9,90,000 को लेकर आगे चलते हैं, इतनी कमाई पर बचत का आंकड़ा सालाना हजार रुपए से थोड़ा सा ज्यादा है और महीने की बात की जाए तो यह पहुंचता है करीब 85.83 के इर्द-गिर्द. अब जरा सोचें की मेट्रो सीटी में रहने वाला एक व्यक्ति जो प्रति माह 100 लीटर के आस-पास पेट्रोल खर्च करता है, उसे तेल की कीमत में मौजूदा वृद्धि के बाद चार रुपए ज्यादा चुकाने होंगे यानी पहले अगर वो 42 रुपए देता था तो अब उसे 46 देने पड़ेंगे.
इस हिसाब से 100 गुणा चार मतलब कुल भार बढ़ा 400 और बचत हुई महज 85.83. यानी अगर सही मायनों में देखा जाए तो सरकार ने जितना दिया नहीं उससे
ज्यादा वसूल कर लिया. छूट के रूप में सरकार ने केवल एक झुनझुना पकड़ाया है जिसे देखकर बच्चा तो मुस्कुरा सकता है लेकिन पेशेवर व्यक्ति नहीं. अब यह तो केवल प्रणव
मुखर्जी और मनमोहन सिंह की आर्थिक विशेषज्ञों की टीम ही बता सकती है कि इस बजट में उदारता जैसे शब्द कहां हैं. बजट में राष्ट्रीय ग्रामीण जैसी योजनाओं पर पैसे की बरसात की गई है जबकि यह कई बार उजागर हो चुका है कि यह योजना भ्रष्टाचार की गिरफ्त में है. कहीं-कहीं तो काम करने के बाद भी मजदूरों को उनका मेहनताना नहीं
मिलता. ऐसे में ज्यादा जरूरत इस तरह की योजनाओं के व्यापक क्रियान्वयन की थी ताकि जिनके लिए योजनाएं बनाई गई हैं उन तक लाभ पहुंच सके. जहां तक बात
अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों को लुभाने की है तो ये पूरा वोट बैंक को रिझाने वाला स्टंट है. अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के बजट में 74 प्रतिशत का इजाफा किया गया है. इतना ही नहीं, अल्पसंख्यक बहुल जिलों में पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा, बैंक आदि की व्यवस्था पर भी सरकार ने नजरें इनायत की हैं. यह धनराशि खास तौर से नौ योजनाओं पर खर्च की जाएगी. ज्यादा ध्यान 20 प्रतिशत से अधिक अल्पसंख्यक आबादी वाले जिलों में मल्टी सेक्टोरल योजना के कार्यों पर दिया जाएगा. अल्पसंख्यक छात्रों की तालीम के मद्देनजर पूर्व मैट्रिक छात्रवृत्ति, मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति के साथ ही उच्च स्तर पर व्यावसायिक व तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले छात्रों के लिए योग्यता सह-युक्ति छात्रवृत्ति को भी प्राथमिकता में शामिल किया गया है. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल व केरल में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कैंपस खोले जाने के लिए 25-25 करोड़ की योजना अलग से है. बजट में अनुसूचित जाति के छात्रों को मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति के मद में ही करीब 750 करोड़ खर्च करने का एलान किया गया है, इसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति एवं पिछड़े वर्ग को विशेष केंद्रिय सहायता में 450 करोड़ अगल रखें गये हैं. पिछड़े वर्ग के छात्रों की मैट्रिकोत्तर छात्रवृत्ति योजना के लिए 135 करोड़ा का प्रावधान है, जबकि इस
समुदाय के मैट्रिक पूर्व छात्रवृत्ति के लिए 30 करोड़ और रखे गये हैं. सरकार का मानना है कि इससे करीब 11 लाख पिछड़े विधार्थियों का भला होगा. ठीक ही है, इतनी रकम से किसी का भी भला हो सकता है. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि सामान्य वर्ग की झोली में क्या डाला गया. क्या सामान्य जाति के बच्चों को छात्रवृत्ति की खास जरूरत नहीं
पड़ती, क्या गंदगी और अव्यवस्थाओं का आलम केवल अल्पसंख्यक बहुल जिलों में ही होता है. बजट में सामान्य वर्ग की जरूरतों पर कोई ध्यान केंद्रित नहीं किया गया. माना जा रहा था कि सरकार बजट में महंगाई से राहत दिलाने के लिए कुछ कदम उठा सकती है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. उल्टा तेल मूल्यों के लिए एक टास्क फोर्स यानी स्टडी ग्रुप बनाने की बात कही गई है. पिछले एक साल में देश में 65 फीसदी परिवारों का जीवन स्तर पहले के मुकाबले खराब हुआ है. इसकी वजह खाद्य और अन्य वस्तुओं की कीमतें बढऩा है. हालांकि यह बात अलग है कि मुद्रास्फीति की दर दिसंबर 2008 से ही 3 फीसदी से नीचे बनी हुई है. कुल मिलाकर कहा जाए तो यह आम बजट पूरी तरह फ्लॉप शो साबित हुआ है और इससे ये संकेत मिलते हैं कि आने वाले दिनों में आयकर में दी गई नाममात्र छूट के एवज में सरकार और कुछ और भार बढ़ा सकती है.
नीरज नैयर

बुधवार, 8 जुलाई 2009

बादल और झरना


एक था बादल। छोटा-सा बादल। एकदम सूखा और रूई के फाहे सा कोमल। उसे लगता - यदि मैं पानी से लबालब भर जाऊँए तो कितना मजा आए! फिर मैं धरती पर बरसूँगा, मेरे पानी से वृक्ष ऊगेंगे, पौधे हरे-भरे होंगे, सारी धरती पर हरियाली छा जाएगी... खेत अनाज की बालियों से लहलहाएँगे... ये सभी देखने में कितना अच्छा लगेगा! लेकिन इतना पानी मैं लाऊँगा कहाँ से?एक बार वो घूमते-घूमते पहाड़ पर पहुँचा। वहाँ उसे एक झरना बहता हुआ दिखाई दिया। उसे बहता झरना देखना बहुत अच्छा लगा। उसे लगा क्यों न मैं इस झरने से दोस्ती करूँ? हो सकता है वह मुझे थोड़ा-सा पानी दे दे। वह झरने के नजदीक आया।
- प्यारे झरने, क्या तुम मेरे दोस्त बनोगे?
- मैं तो सभी का दोस्त हूँ, झरना बोला।
- वो तो ठीक है, पर आज से हम दोनों पक्के दोस्त।
झरना भी खुश हो गया। बादल से हाथ मिलाते हुए बोला- ठीक है, पर मेरी एक शर्त है। तुम्हें मेरे साथ ही रहना होगा। मुझसे रोज बातें करनी होगी। कहीं छिप मत जाना। बोलो है मंजूर?
- हाँ, मुझे मंजूर है। मुझे तुम और तुम्हारी दोस्ती दोनों पसंद है।
फिर तो झरना और बादल दोनों पक्के दोस्त बन गए। झरना कूदते-फाँदते नीचे की ओर बहता, तो बादल भी उसके साथ दौड़ने की कोशिश करता। कभी-कभी वो झरने के साथ दौड़ लगाने में हाँफ जाता, तो झरना उसे हाथ पकड़कर खींच लेता। दोनों मिल कर देर तक खूब बातें करते। आसपास ऊगे फूल, पौधे, बेल, पेड़ सभी उनकी बातें सुनते। उनकी प्यार भरी बातें उन्हें बहुत अच्छी लगतीं।
एक दिन बादल ने कहा- प्यारे दोस्त, मुझे तुमसे कुछ चाहिए।
झरना बोला- कहो, क्या चाहिए? हम तो पक्के दोस्त हैं। तुम जो कहोगे, वो मैं तुम्हें दूँगा।
बादल ने कहा- मैं एकदम सूखा हूँ। मेरे भीतर का खालीपन मुझे उदास कर देता है। क्या तुम मुझे अपना पानी दे सकते हो?
झरना बोला- इसमें क्या है? ये तो तुम्हें दे सकता हूँ, पर कुछ दिन ठहर जाओ, इतने पानी से तुम्हारा कुछ न होगा, इसलिए मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें बहुत सारा पानी दिलवाऊँगा।


झरने की बात सुनकर बादल खुश हो गया, उसके पैरों में नई स्फूर्ति आ गई। झरना और बादल दोनों ही पर्वत से होकर गुजरने लगे। दौड़ते-दौड़ते जब वे काफी नीचे आ गए, तब उन्हें वहाँ नदी मिली। झरना तो धम्म् से नदी में जा गिरा, उधर बादल अपने पास झरने को न पाकर परेशान हो गया, वह उसे इधर-उधर देखने लगा।
इतने में नदी से आवाज आई- देखो बादल, मैं यहाँ हूँ, इस नदी के भीतर। यहाँ बहुत सारा पानी है। तुम्हें जितना चाहिए, उतना पानी ले लो।
बादल की ऑंखों में ऑंसू आ गए, क्योंकि झरना तो उसे दिखाई ही नहीं दे रहा था, केवल उसकी आवाज़ ही सुनाई दे रही थी, वह नदी के भीतर झरने को खोजने के लिए नदी के साथ-साथ दौड़ने लगा।
नदी बोली- तुम दु:खी क्यों होते हो बादल, झरना तो मुझमें समा गया। पर तुम्हें तो पानी चाहिए ना, चलो मेरे साथ, मैं तुम्हें बहुत सारा पानी दूँगी।,
बादल के पास अब कोई चारा न ािा, क्योंकि झरना तो नदी में खो गया था, इसलिए उसे तो नदी की बात माननी ही थी, वह चल पड़ा नदी के साथ। रास्ते में खेत, खलिहान, जंगल, शहर, गाँव, बाग-बगीचे सभी आते गए। इस तरह चलते-चलते एक दिन दूर से दिखाई दिया समुद्र। गरजता, उछलता, हिलोरें मारता, अपनी मस्ती में मस्त होता समुद्र। बड़ी-बड़ी लहरों के साथ अठखेलियाँ करते किनारों को देखकर नदी ने बादल से कहा- ले लो पानी, जितना चाहो उतना। ऐसा कहते हुए नदी भी समुद्र में समा गई।
बादल एक बार फिर परेशान हो गया, ये क्या हो रहा है? झरना नदी में खो गया, नदी समुद्र में खो गई! कोई बात नहीं, अब निराश होने से कुछ न होगा, चलो मैं भी अपने लिए पानी ले लूँ, ऐसा सोचते हुए बादल ने अपने भीतर खूब सारा पानी भर लिया।
समुद्र को धन्यवाद देते हुए वह उड़ चला। रास्ते में धरती पर जल बरसाता जाता, उसकी इस मीठी फुहार से जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, बाग-बगीचे, जंगल, खेत, खलिहान, बूढ़े, बच्चे, जवान सभी खुश हो गए।
उड़ते-उड़ते बादल फिर पहँचा, उसी पर्वत पर। नजर घुमाकर देखा, तो झरने को मुस्काता पाया। बादल को देखकर वह खिलखिलाकर हँसा और पूछने लगा- कहाँ थे तुम, मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ?
बादल ने कहा- लेकिन तुम तो खो गए थे।
नहीं, मैं तो यहीं हूँ, इसी पर्वत पर, तुम्हारे साथ, इस तरह से झरना और बादल फिर एक हो गए।
भारती परिमल

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

विश्वास की डोर न हो कभी कमजोर


कहते हैं कि उम्मीद पर ही दुनिया कायम है। किसान बादलों पर विश्वास करता है और हम सीमा पर खड़े अपने जवानों पर विश्वास करते हैं। नेता मतदाताओं पर विश्वास करता है और नियोक्ता अपने कर्मचारियों पर विश्वास करता है। यदि कोई काम टीम वर्क द्वारा किया जा रहा हो तो टीम के सभी सदस्यों को एक-दूसरे की क्षमता पर विश्वास होना चाहिए। मतभेद होने पर उनके बीच झगड़े की नौबत आएगी, जो टीम को एकजुट बनाए रखने में बाधक बन सकता है।
विश्वास की यह डोर टीम के सभी सदस्यों के नैतिक आचरण और बर्ताव से भी जुड़ी है। एक भी सदस्य अगर गलत काम करता है तो या तो उसका विरोध होगा या वह टीम से बाहर कर दिया जाएगा। लेकिन यदि टीम मैनेजमेंट अच्छा है तो इसकी नौबत ही नहीं आएगी क्योंकि टीम मैनेजमेंट से विश्वास बढ़ता है और इसी विश्वास से सहकर्मियों की आस भी बढ़ती है। इसलिए विश्वास की डोर कभी भी कमजोर न पड़ने दें।
बेहतर टीम बेहतर परिणाम : क्या आपने कभी आसमान में उड़ते पंछियों का झुंड देखा है? क्या कभी आपने सोचा है कि वे समूहों में क्यों उड़ते हैं? यह भी शायद कभी आपके दिमाग में नहीं आया होगा कि वे रात के घने अँधेरे में अपना रास्ता कैसे ढूँढ लेते हैं? मैनेजेमेंट के पहलू से सोचा जाए तो यह सब बेहतर टीम वर्क और टीम मैनेजमेंट से संभव है।
कहते हैं कि उम्मीद पर ही दुनिया कायम है। किसान बादलों पर विश्वास करता है और हम सीमा पर खड़े अपने जवानों पर विश्वास करते हैं। नेता मतदाताओं पर विश्वास करता है और नियोक्ता अपने कर्मचारियों पर विश्वास करता है।
अकेला चना नहीं फा़ेड सकता है भाड़ : किसी भी काम को करने के लिए एक अच्छी टीम का होना उतना ही जरूरी है जिस तरह से किसी रथ को खींचने के लिए समान कद-काठी के एक ही दिशा में चलने वाले घा़ेडों का होना आवश्यक है, उसी तरह एक अच्छी टीम बनाने के लिए सभी सदस्यों में कुछ गुणों की समानता बहुत जरूरी है।
यह फलसफा ठीक उसी तरह का है जैसे पाँच घा़ेडे रथ को एक ही दिशा में तभी खींच सकते हैं जब उसके सारथी को सभी घा़ेडों को हाँकने की कला आती हो। यह कला और कुछ नहीं टीम मैनेजमेंट या लीडरशिप ही तो है। रथ की लगाम उसी व्यक्ति के हाथहो सकती है, जिसमें टीम मैनेजमेंट का गुण हो।

प्रेरणा से होते हैं काम आसान : प्रेरणा वह हथियार है जो निर्जीव वस्तुओं में जान डाल सकता है। यह आलसी लोगों को काम के लिए प्रेरित करता है तथा टीम को एक बेहतर संरचना प्रदान करता है। टीम में प्रेरणा अपने आप नहीं आती उसके लिए टीम में एक उत्प्रेरक और एक परफेक्शनिस्ट होना बेहद जरूरी है, ताकि बाकी सदस्यों का उत्साह बना रहे।
उत्प्रेरक का काम लोगों को टीम के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने के लिए लगातार प्रेरित करते रहना और परफेक्शनिस्ट यानी आदर्श व संपूर्ण चरित्र वाले व्यक्ति को अपने कामकाज से मिसाल कायम करने की चुनौती होती है। अगर टीम मैनेजर में ये दोनों गुण हों और वह अपनी टीम को ठीक तरह से प्रेरित करने में कामयाब रहे तो सारे काम आसान हो जाते हैं। आपसी संवाद से बढ़ती है ताकत : आपसी समस्याओं और विचारों का आदान-प्रदान करना, अपनी राय रखना और इन विचारों को टीम लीडर तक पहुँचाना सभी टीम को एकजुट बनाने के लिए आवश्यक है। टीम मैनेजमेंट में मैनेजर को सहकर्मियों का सम्मान करना सिखाया जाता है क्योंकि मैनेजमेंट का एक फंडा यह भी है कि परस्पर सम्मान से अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। अगर टीम में आपसी भावना होगी तो सभी एक-दूसरे का सम्मान करेंगे। ऐसे में विरोध कम होगा तथा आमराय से फैसले होने से टीम की ताकत बढ़ेगी। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए टीम के सभी सदस्यों को आपस में संवाद बनाए रखना चाहिए। कभी न सोचें हार की बात : इन दिनो करियर निर्माण केवल जॉब प्लेसमेंट ही नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धा के दौर में एक जंग की शक्ल भी अख्तियार कर चुका है। इस जंग में कभी भी हार की बात नहीं सोचना चाहिए। टीम मैनेजर को चाहिए कि टीम मैनेजमेंट करने के लिए हमेशा अपने सामने जीत का लक्ष्य लेकर ही टीम मैनेजमेंट के लिए उतरना चाहिए। यदि बेहतर टीम मैनेजमेंट द्वारा योग्य सहकर्मियों की सशक्त टीम बना ली तो टीम की स्किल डेवलप कर सभी जंग जीती जा सकती है।

सोमवार, 6 जुलाई 2009

बड़े खतरे के रूप में उभर रहा चीन


नीरज नैयर
पेंटागन की रिपोर्ट पर अगर यकीन किया जाए तो चीन भारत के लिहाज से बहुत बड़े खतरे के रूप में उभर रहा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि उन्नत हथियारों में लगातार इजाफा करके चीन एशिया के सैन्य संतुलन बिगाड़ रहा है. वह परमाणु, अंतरिक्ष और साइबर युद्ध के लिए तकनीक विकसित कर रहा है, जिसके कारण क्षेत्रीय संतुलन गड़बड़ा रहा है. इससे एशिया-प्रशांत क्षेत्र से बाहर भी असर होगा. एक आशंका यह भी व्यक्त की गई है कि चीन के साथ पड़ोसी देश (भारत) का टकराव हो सकता है क्योंकि वह इस क्षेत्र में अपने को एकमात्र शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. ऐसे हालात में युद्ध की स्थिति से भी इंकार नहीं किया गया है. रिपोर्ट में पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के भी युद्ध में शामिल होने की सम्भावनाओं पर विचार किया गया है. चीन से पाकिस्तान की नजदीकी किसी से छिपी नहीं है, बांग्लादेश का झुकाव भी चीन के प्रति अधिक हुआ है और म्यांमार की सैन्य सरकार से ड्रैगन के अच्छे रिश्ते हैं. इस लिहाज से अगर भविष्य में युद्ध की स्थिति निर्मित होती है तो भारत को चौतरफा हमलों का सामना करना पड़ेगा. हालांकि यह मानना जरा मुश्किल है कि चीन भारत के साथ 1962 जैसा सुलूक दोहरा सकता है. समय बदल गया है और भारत मजबूत स्थिति में है. उसने न सिर्फ अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है बल्कि तकनीक में भी महारथ हासिल की है.
वो आज परमाणु शक्ति संपन्न देशों की जमात में खड़ा है. ऐसे में चीन को पुराना रुख अपनाने से पहले सौ बार सोचना होगा. मगर ड्रैगन की फितरत उस भेडि़ए की माफिक है जो रात के अंधेरे में चुपके से वार करता है. इसलिए वो कब क्या करेगा कोई जान सकता. अरुणाचल पर दावा ठोंकने के बीच अचानक 2007 में उसने एक स्थानीय प्रोफेसर को वीजा देकर सबको चौंका दिया था, उसके इस कदम को जानकारों ने सीमा विवाद सुलझाने के प्रति गंभीरता दिखाने के रूप में लिया था लेकिन ऐसा कुछ अब तक देखने को नहीं मिला. दरअसल चीन अरुणाचल को अपना बताता रहा है और कहता रहा है कि स्थानीय लोगों को वीजा की कोई जरूरत नहीं. उस परिपेक्ष्य में तो उसका वीजा जारी करने का फैसला लेना अप्रत्याशित घटना थी. यह तो महज एक उदाहरण मात्र है चीनसमय-समय पर अपनी कथनी और करनी में फर्क के नमूने पेश करता रहा है. उसकी शुरू से यही कोशिश रही है कि भारत पर दबाव बनाकर उसे नियंत्रण में रखा जाए. भारत की दोस्ती और भाईचारे की तमात कोशिशों को नजरअंदाज करते हुए चीन हमारे खिलाफ जो षणयंत्रकारी खेल खेलता रहा है उसे समझने के लिए इतिहास की किताब के कुछ पन्नें पलटने होंगे. दोनों देशों के बीच की कटुता को बहुत लंबा समय गुजर चुका है. हिंदी चीनी भाई-भाई वाला मैत्री का दौर तिब्बत को मुक्त कराने वाले चीनी अभियान के साथ 1950 में ही खत्म हो गया था. इन्हीं दिनों चीन ने कुछ ऐसे नक्शे छापे, जिनमें भारतीय भू-भाग पर चीनी दावा किया गया था. इसके बाद उपजा सीमा विवाद दोनों को रणभूमि तक ले आया. 1958 में लोंग जू और कोंगका दर्रा पर मुठभेड़ में 13 भारतीय सैनिकों के शहीद हो जाने के बाद रिश्तों में तल्खी और तेज हो गई. 1959 में जब दलाई लामा ने पलायन किया और भारत में शरण ली तो चीनी नेता आगबबूला हो गये, चीन के कब्जे से पहले तिब्बत स्वतंत्र था. 25 लाख वर्ग किलोमीटर वाला यह देश चीन तथा भारत के मध्य बसा एशिया के बीचों-बीच स्थित है.
तिब्बत और भारत संबंध बड़े धनिष्टï रहे थे. विशेषकर 7वीं शताब्दी से जब भारत से बौद्घ धर्म का तिब्बत में आगमन हुआ था. जब तिब्बत स्वतंत्र था तो तिब्बती सीमाओं पर भारत के केवल 1500 सैनिक रहते थे और अब अनुमान है कि भारत उन्हीं सीमाओं की सुरक्षा के लिए प्रतिदिन 55 से 65 करोड़ रुपए खर्च कर रहा है. 1950 के दौरान चीन ने तिब्बत के आंतरिक मामलों में दखल देना शुरू किया. चीन से लाखों की संख्या में चीनी तिब्बत में लाकर बसाए गये. जिससे तिब्बती अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाएं और आगे जाकर तिब्बत चीन का अभिन्न अंग बन जाए. 1959 में जब तिब्बती जनता ने चीनी शासन के विरुद्घ विद्रोह किया तो चीन ने उसे पूरी शक्ति से कुचल दिया. दलाईलामा को प्राणरक्षा के लिए भारत आना पड़ा. इसके बाद तिब्बत की सरकार भंग कर दी गई और वहां सीधे चीन का शासन लागू कर दिया गया. 1960 में चीनी नेता चाऊ एन लाई की भारत यात्रा के दौरान भी जब सीमा विवाद नहीं सुलझा तो युद्घ के आसार सामने आने लगे. इसके बाद रही सही कसर नेहरू जी के उस भाषण ने पूरी कर दी जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि उन्होंने चीनियों को भारतीय भूमि से खदेड़ निकालने का आदेश दिया था. चीनी जैसे इसी मौके के इंतजार में थे उन्होंने इसे अपनी शान के खिलाफ समझा और भारत को युद्घ की आग में झोंक दिया, इस युद्ध में भारत को हार का सामना करना पड़ा था. इतना लंबा समय गुजर जाने के बाद भी चीन की विस्तारवादी आदतों में कोई बदलाव नहीं आया है, वो नए-नए क्षेत्रों पर अपना अधिकार जताता रहा है. कुछ दिन पहले वायुसेना प्रमुख एयर चीफ
मार्शल फाली एच मेजर ने भी कहा था कि भारत को पाकिस्तान के मुकाबले चीन से कहीं अधिक खतरा है. चीन की सेना का आकार पाकिस्तानी सेना से करीब तीन गुणा बड़ा है, लेकिन चीन की सैन्य क्षमता के बारे में सटीक जानकारी का नहीं होना चिंता का विषय है. यह बात सही है कि चीन की सैन्य क्षमता के बारे में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कोई नहीं जानता कि उसकी ताकत किस हद तक है. चीन महज रक्षा समीकरण के लिहाज से ही नहीं बल्कि भौगोलिक दृष्टि में भी हमेशा कई गुना ज्यादा फायदे में है. वह तिब्बत से हम पर हमला कर सकता है, वैसी स्थिति में केवल 500 मीटर की दूरी होगी और बीजिंग दिल्ली के दरवाजे खटखटा रहा होगा. वह 1000 किमी. रेंज वाली अपनी मिसाइल से उत्तर भारत के किसी भी बड़े शहर को निशाना बना सकता है. जबकिभारत को ऐसा भौगोलिक लाभ ïनहीं मिल सकता. इसलिए भारत को पेंटागन की रिपोर्ट को गंभीरता से लेकर अपनी तैयारियां तेज कर देनी चाहिए.
नीरज नैयर

शनिवार, 4 जुलाई 2009

दंतपरी की सीख


भारती परिमल
नन्हे राजू का एक दाँत गिर गया। दूसरा हिलने लगा और तीसरी में दर्द होने लगा। फिर भी उसका टॉफी, चॉकलेट, आइस्क्रीम खाना चालू रहा। आज परेशानी कुछ ज्यादा बढ़ गई थी। रह-रह कर दाँतमें एक टीस सी उठती थी। दर्द के मारे वह तड़प उठता था। न कुछ खाते बनता न कुछ पीते। यहाँ तक कि बात करने की भी इच्छा नहीं हो रही थी। केवल दोनों गालों पर हाथ रखकर वह कराह रहा था।
माँ की थपकियों और लोरी से बड़ी मुश्किल से उसे नींद आई, पर नींद में भी जीभ दाँतों के बीच चली जाती थी। इधर जीभ नींद में दांतों को ढूँढ रही थी, कि तभी दंतपरी आई।
दंतपरी ने प्यार से पुकारा- राजू।
- कौन हो तुम? - राजू ने पूछा।
- मैं हूँ परी।
- कौन सी परी?
- दंतपरी।
- तो तुम्हीं हो, जो मेरे दाँत ले गई हो?
- नहीं, तुम्हारे दाँत मैंने नहीं लिए। तुम्हारे दाँत तो च्यूइंगम, चॉकलेट, टॉफी, मिठाई, आईस्क्रीम ने ले लिए हैं। मैं तो तुम्हें दाँत देने आई हूँ।
- क्या? राजू खुश हो गया! क्या तुम मुझे दाँत देने आई हो? मेरे सारे गिरे हुए दाँतों को तुम मुझे वापस दे दोगी?
- हाँ, दे दूँगी। पर मेरी एक शर्त है।
- कैसी शर्त?
- तुम सिर्फ मीठा खाना ही पसंद करते हो। यह अच्छी बात नहीं है। तुम्हें मीठे के अलावा नमकीन, खट्टा, तीखा, कड़वा सभी कुछ खाना होगा।
- कड़वा भी.....?
- हाँ, शरीर और दाँत को सभी तरह के स्वाद की आवश्यकता होती है। अलग-अलग स्वाद से अलग-अलग तत्व मिलते हैं। केवल मीठे का स्वाद जीभ को ही नहीं, शरीर को भी नुकसान पहुँचाता है। बहुत से बच्चों के दाँत इसीलिए खराब हो जाते हैं, क्योंकि उनके दाँतों को पूरे तत्व नहीं मिल पाते हैं।
राजू को दंतपरी की बातें अच्छी नहीं लगीं। उसने कहा- दाँत देने आई हो, तो दाँत देती जाओ, मुझे तुम्हारे उपदेशों की आवश्यकता नहीं है।

-ठीक है, तो तुम इनमें से अपने दाँत ले लो, ऐसा कहते हुए दंतपरी ने राजू के सामने बहुत सारे दाँत बिखेर दिए।
अपने सामने बहुत सारे दाँत देखकर राजू की खुशी का ठिकाना न रहा। वह एक दाँत पसंद करता कि तुरंत उसे दूसरा दाँत पसंद आ जाता। दूसरा उठाता कि तीसरा पसंद आ जाता। इस तरह से वह भ्रम की दुनिया में पहुँच गया। असमंजस की स्थिति में वह कुछ नहीं कर पाया।
-ये किसके दाँत हैं? राजू ने पूछा।
ये दाँत खरगोश, चूहे, बंदर, बिल्ली, कुत्ते, हाथी, भालू आदि के हैं। तुम्हें जो पसंद हो, ले लो।
-पर मुझे तो ये दाँत अच्छे नहीं लग रहे हैं।
-क्यों क्या हुआ, अभी तक तो बहुत अच्छे लग रहे थे यही दाँत?
-हाँ, तुम सही कह रही हो, दंतपरी। ये दाँत मुझे अच्छे तो लग रहे हैं, पर मेरे मुँह के अंदर ये दाँत जम नहीं रहे हैं। मुझे मुँह खोलने और बंद करने में परेशाानी हो रही है। मेरा चेहरा भी भद्दा लग रहा है। ऐसा कहते हुए उसने अपने आपको आइने में देखा।
-यही तो मैं तुम्हें समझाना चाहती थी राजू। दाँत तो अनेक प्रकार के होते हैं, खरगोश, चूहे, बंदर, बिल्ली, कुत्ते, हाथी, भालू आदि के अलावा प्रत्येक मनुष्य के दाँतो की बनावट अलग-अलग होती है। प्रकृति ने सभी के दाँतों की बनावट अलग-अलग की है, इसीलिए हमें किसी और के दाँत नहीं जमते।
राजू को लगा-परी ठीक कह रही है। परी ने उसे कई दाँत दिखाए, पर उसमें से कोई दाँत मुँह की खाली जगह पर जम नहीं पाया।
राजू ने परी को पुकारा- परी ओ परी! अब मैं क्या करुँ?
दंतपरी जाते-जाते कहती गई- राजू, जो हुआ, सो हुआ। अब नए दाँत आने दो, उन्हें सँभालकर रखना। केवल मीठा मत खाना।
नहीं खाऊँगा, नहीं खाऊँगा, अब मैं कभी मीठा नहीं खाऊँगा।
मम्मी ने प्यार से झिड़की देते हुए कहा- क्या बड़बड़ा रहे हो, राजू। उठो सुबह हो गई। चलो ब्रश करो। राजू तपाक से उठा और एक पल की देर किए बगैर ब्रश करने चला गया। माँ उसे आश्चर्य से देखती ही रह गई!
भारती परिमल

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

अपना घर


भारती परिमल
अपना घर होने का सपना भला किन आँखों में नहीं पलता। आँखे चाहे अमीर की हो, या गरीब की, वो यह सपना देखती है और इसके पूरा होते ही वह स्वयं को दुनिया का सबसे अमीर आदमी समझने लगता है। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि इस विशाल धरती पर ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा उसका अपना होता है। इसी टुकड़े पर बसती है अरमानों की दुनिया। बनता है सपनों का महल जिसे हम घर ‘‘अपना घर’’ नाम देते हैं।
ऐसा ही सपना था प्रकाश बाबू का। नाम के अनुरूप अपने स्वभाव से उजाला फैलाने वाले प्रकाश बाबू की ज़िन्दगी में उजालों ने कम मगर अंधेरों ने ज़्यादा दस्तक दी थी, बल्कि यँू कहें कि पड़ाव डाल दिया था। अंधेरों के फंदे बुनते चले गए और इनमें परेशानियाँ, दुःख-दर्द, तनाव, उलझनें उलझती चली गई। हर सुबह एक नई परेशानी के साथ जन्म लेती। तनाव मे दिन गुज़रता और आने वाले कल की फिक्र में दिन डूब जाता। चिंताओं की बनती-बिगड़ती रेखाओं के बीच रात का सफर तय होता और फिर एक नया दिन शुरू होता। जिससे जूझने के लिए प्रकाश बाबू स्वयं को तैयार करते।
यह तस्वीर हर उस मध्यम वर्गीय परिवार के मुखिया की मिल जाएगी जो अमीरी के ठाट-बाट अपना नहीं सकता, दिखावे की ज़िन्दगी जी नहीं सकता और समाज जिसे ग़रीबी की श्रेणी में रख नहीं सकता। ऐसे त्रिशंकु मुखिया की क्या हालत होती है यह वह खुद ही समझ सकता है। प्रकाश बाबू की हालत भी वैसी ही थी। उस पर मेहरबानी यह कि बड़ा परिवार जिसमें एक बूढ़ी माँ, तीन जवान होती बेटियाँ और जमाने की हवा के साथ रूख बदलते दो लड़के। हाँ गृहस्थी की चक्की में उनके साथ-साथ पिसने वाली जीवनसंगिनी भी थी। परिवार का मुखिया होने के नाते घर का पूरा दायित्व उन पर ही था। जिसे वे निभाने की पूरी कोशिश भी करते। एक मशीन की तरह जुटे हुए थे वे अपनी गृहस्थी में। दुनिया की तमाम रंगीनियों से दूर उनकी आँखों में एक ही सपना था- अपना घर बनाने का सपना। जिसके लिए वे पिछले कई वर्षो से मेहनत करते चले आ रहे थे। आर्थिक तंगी के बावजूद वे ओवर-टाईम करके, अपने हिस्से का चाय, सिगरेट और पान का खर्चा बचाकर उसे जोड़ते और बैंक में जमा करते। पत्नी कभी टोकती तो उसे समझााते हुए प्यार से कहते- एक ही तो सपना है मेरा। बस उसे पूरा हो जाने दो फिर तो आराम से रहँूगा। अपने आप पर खूब खर्च करूँगा। यह कहते हुए, पैबंद लगी पेंट पहने, घिसी हुई चप्पल को जबरदस्ती पैर में डाले, चश्मे की छड़ी को अपनी ही हाथों दुरस्त करते वे निकल पड़ते मिल की ओर। मिल के काम में उन्होंने कभी लापरवाही नहीं की। हमेशा जी-तोड़ मेहनत की। इसी मेहनत का नतीजा था कि बड़े बाबूओं की उस पर विशेष मेहरबानी थी। उनहें माह में 20-22 दिन का ओवर-टाईम मिल ही जाता था। इसीलिए उनका सपना बड़ा होता गया।
नन्हीं रितु जब तीन साल की थी, तब उन्होेंने यह सपना अपनी आँखों में बसाया था। आज रितु के साथ-साथ यह सपना भी जवान हो गया और उनकी आँखे बूढ़ी! मगर इतने वर्षो में भी वे इतने रुपए नहीं जोड़ पाए कि जिससे वे अपनी जमीन ले सके या बना-बनाया लेट खरीद सके।
प्रकाश बाबू मरने से पहले मरना नहीं चाहते थे। सपने टूटने से पहले टूटना नहीं चाहते थे। एक चिड़िया भी तिनका-तिनका जोड़कर अपना घोंसला बनाती है। सरदी, गरमी और बरसात से बचने के लिए, अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए जी-तोड़ मेहनत करती है। फिर वे तो एक इंसान थे। यदि वे हास स्वीकार कर लेते, तो उनकी अब तक की मेहनत बेकार चली जाती। इस उलझी हुई ज़िन्दगी में तमाम परेशानियों के बावजूद उन्होंने आशाओं के दामन की ओट में सपनों के दीप को जलाए रखा था। यह बूझ न जाए, सतत जलता रहे, इसके लिए उन्होंने एक बहुत बड़ा फैसला किया। एक ऐसा फैसला जो कोई भी कमज़ोर व्यक्ति नहीं कर सकता। ऐसा फैसला जोे उन्हें उनकी वर्षो की प्रतीक्षारत् मंज़िल के करीब पहुँचा दे। इस फैसले से उन्होंने घरवालों को भी शामिल नहीं किया और चल पडे़ अपने सपने को पूरा करने की आखिरी कोशिश में।
दो दिन पहले अख़बार में एक विज्ञापन छपा था- ‘‘किडनी चाहिए’’, ‘‘कृपया वे ही व्यक्ति संपर्क करें जिनका ब्लड गू्रप ‘बी-निगेटिव’ हो।’’ उनका ब्लड गू्र्रप ‘बी-निगेटिव’ ही था। वे विज्ञापन की कटिंग लेकर उसमें बताए गए हाॅस्पीटल की ओर चल पड़े। इसे उस बीमार व्यक्ति का सौभाग्य कहें या प्रकाश बाबू का कि डाक्टरों ने उनकी किड़नी निकालने का निर्णय लिया। करीब दो-तीन दिन की हाॅस्पीटल की भाग दौड़ के बाद अंत में उन्होंने अपने शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग खोकर नोटों की मोटी गड्डियाँ पा ली। उनकी हथेली पर गड्डियोें के रूप में ‘‘अपना घर’’ का सपना सच हो रहा था। अब उनके पास इस सपने को सच करने के लिए पर्याप्त रकम थी। फिर क्या था- शुरू हो गई उनकी भागमभाग। मंज़िल के करीब आने पर, थक कर चूर हो जाने पर भी इंसान के हौसले इतने बुलंद हो जाते हैं कि उन्हें थकान महसूस ही नहीं होती। यही हाल प्रकाश बाबू का था। उनकी आँखों में चमक थी। पैरों में वह गति थी, जो हवा को भी मात दे दे। आवाज़ में वह जोश कि सामने वाला उनकी बात मानने को सहज तैयार हो जाए। कई दलालों के चक्कर लगाने के बाद, कितने ही अपार्टमेंट देखने के बाद, कहीं पर बिजली पानी की सुविधा तो कहीं पर आसपास का वातावरण, तो कहीं पैसों की ऊँच-नीच। इन सबके बाद एक जगह सौदा तय हुआ मगर लाख कोेशिश करने के बाद भी उन्हें ग्राउंड लोर का मकान नहीं मिल पाया। इतने वर्षो की मेहनत से बचाए गए पैसे और किडनी बेच कर मिले पैसों से भी बढ़ती महँगाई में इतने पैसे जमा न हो सके कि वे नीचे का ्लेट खरीद पाते। आखिर ग्राउंड लोर की कीमतें ही इतनी अधिक थी कि उन्हें लेना प्रकाश बाबू के वश में न था। फिर भी एक रुपया भी कर्ज़ नहीं लेना चाहते थे।
यह जानते हुए भी कि एक किडनी के सहारे ज़िंदा रहने वाले मनुष्य के लिए सीढ़ियाँ चढ़ना उतरना ज़िन्दगी से खेलने के बराबर होता है, फिर भी उन्होंने चैथी मंज़िल का मकान खरीद ही लिया। सिर्फ इसलिए कि उनका ‘‘अपना घर’’ होने का वर्षो का पलता सपना पूरा हो।
आज इस स्वप्न के पूरा होने पर प्रकाश बाबू बेहद खुश हैं। गृह प्रवेश में उन्होंने अपने तमाम छोटे-बड़े परिचितों को न्यौता दिया है। वे इस तरह से खुश नज़र आ रहे हैं, जैसे तीन साल का छोटा बच्चा अपने जन्म दिवस पर खुश होता है। उनकी भाग-दौड़ उम्र को पीछे धकेल रही है और वे अपने काम में पूरी तरह डूबे हुए हैं। घर की देहरी पर तोरण बांधना, कलश रखना, पंडित के आने पर उन्हें पूजन सामग्री देना। हर आने वाले का सत्कार करना। इस तरह सारे काम का बोझ चे खुद अपने कंधे पर उठाए हुए हैं।
सावित्राी कह भी रही है कि आप इतनी भागदौड मत कीजिए। हम सभी तो हैं। लेकिन वे किसी की भी सुनने को तैयार नहीं। आखिर गृह प्रवेश की रस्म पूरी हुई। ज़िन्दगी में पहली बार ही सही, लोगों ने प्रकाश बाबू के यहाँ दावत ली और मज़े से ली। सभी खुशी-खुशी अपने घर लौटे और सभी को विदा कर जब वे सीढ़िया चढ़ रहे थे तो दिन भर की थकान उनके चेहरे पर नज़र आई। हाथ चेहरे पर गए तो हथेली पसीने से तरबतर थी और माथा तप रहा था। उन्हें डाक्टर की सलाह याद आई कि कुछ महीनेे तक आपको आराम करना पडेगा, भारी काम, दौड़भाग का काम या सीढ़ियाँ चढ़ने-उतरने का काम रोकना पड़ेगा। इसके विपरित पिछले एक महीने से वे यही तो करते चले आ रहे थे। सीढ़ियों पर एक-एक कदम रखना उनके लिए भारी हो रहा था। पसीने से पूरा शरीर भीग गया था। कमज़ोरी के कारण पैर काँप रहे थे। वे अपने पूरे शरीर का भार उठाए हुए पूरी ताक़त के साथ एक-एक पैर ऊपर रख रहे थे। उनकी यह हालत देखकर लग ही नहीं रहा था कि ये वही प्रकाश बाबू हैं, जिन्होंने आज सारा दिन भागदौड़ की है। खुशी और उमंग में डूबे हुए प्रकाश बाबू के चेहरे पर थकान, निराशा नज़र आ रही थी। बड़ी मुश्किल से अपने आपको संभाले हुए वे चैथी मंज़िल तक पहुँचे। अपने घर की देहरी के पास पहुँचकर उनकी हिम्मत जवाब दे गई। वे वहीं गिर पड़े। देहरी पर दाँयी तरफ रखा मिट्टी का कलश टूट गया और पानी बिखर गया। साथ ही प्रकाश बाबू भी ! ! ?
प्रकाश बाबू जो ज़िन्दगी भर अपने सपने को पूरा करने का प्रयास करते रहे, आज वो सपना पूरा भी हुआ तो उनकी आँखे पथरा गई और उनकी पथरीली आँखों में रह गया अपने घर का सपना - - । जो आज पूरा होकर भी अधूरा था।
भारती परिमल

बुधवार, 1 जुलाई 2009

पंडितजी ने पकड़ा पतंगा


भारती परिमल
एक थे पंडित जी। बस नाम के ही पंडित जी थे, क्योंकि पंडिताई से तो उनका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था। काला अक्षर उनके लिए भैंस बराबर था। निरक्षर होने के बाद भी पंडित कहलाने का ऐसा शौक कि एक दिन पहुँचे एक विद्वान के पास और उनके सामने अपना शौक रख दिया। विद्वान मित्र ने सलाह दी कि मैं तुम्हारे मोहल्ले के कुछ बच्चों से कह दूँगा कि वे तुम्हें पंडित जी कहकर चिढ़ाए, बदले में तुम उन पर गुस्सा जरूर होना, लेकिन उन्हें मारना नहीं।
बस, अब तो बात बन गई। पंडित जी जैसे ही दूसरे दिन घर से निकले, मोहल्ले के बच्चे उनके पीछे हो गए और पंडित जी... पंडित जी... कहकर चिढ़ाने लगे। वे बनावटी गुस्सा दिखाते, उन्हें मारने के लिए हाथ उठाते और उनसे दूर-दूर भागने का प्रयास करते। उनका यह रूप सभी ने देखा और लगे हँसने। एक दिन- दो दिन करते-करते यह बच्चों का रोज का क्रम बन गया। फिर क्या था, उनका सपना पूरा हो गया। वे बच्चों के बीच ही नहीं, बड़ों के बीच भी पंडित जी के रूप में पहचाने जाने लगे। जब कोई बड़ा उनसे मजाक में पंडित जी कहता तो पहले तो वे उसे घूरकर उसे देखते फिर हँसी में टाल देते। यहाँ तक कि वे उनके पुकारने का बुरा भी नहीं मानते। तो इस तरह एक निरक्षर, अनपढ़ आदमी लोगों के बीच पंडित जी के रूप में पहचाना जाने लगा।
एक दिन सुबह-सुबह पंडित जी बाग में टहलने के लिए गए। जब वे घूम-फिर कर थक गए, तो आराम करने के लिए एक बैंच पर बैठ गए। थोड़ी देर आराम करने के बाद उन्होंने चारों ओर नजर घुमाई, तो रंग-बिरंगे फूलों के बीच उड़तेे पतंगे नजर आए। कभी पतंगे फूलों पर बैठते, तो कभी उड़ जाते। इन पतंगों को देखकर पंडित जी को अपना बचपन याद आ गया कि कैसे वे बचपन में इन्हें पकड़ा करते थे और फिर धागे से बाँधकर हवा में उड़ाया करते थे। क्यों न आज बचपन का वही पुराना खेल खेला जाए! यह सोचते हुए पंडित जी ने पास ही के फूल पर बैठे पतंगे को पकडऩा चाहा। जैसे ही उन्होंने पतंगे का पकडऩे के लिए हाथ बढ़ाया, वह तो उड़ गया! अब उड़ते पतंगे को पकडऩा तो मुश्किल काम था, पर पंडित जी ने पतंगा पकडऩे का मन बना लिया था। इसलिए वे उसके पीछे-पीछे तेजी से चले।
फिर तो दृश्य देखने लायक था। पतंगा कभी इस फूल पर बैठता तो कभी उस फूल पर। कभी उड़कर दूर निकल जाता तो कभी आँख से ओझल हो जाता। लेकिन पंडित जी भी बराबर उस पर नजर रखे हुए थे। आँखों से ओझल होते ही तुरंत अपनी नजर यहाँ-वहाँ घुमाकर फिर से उसे ढूँढ़ ही लेते। आखिर परेशान होकर पतंगे ने भी एक जगह बैठने के बजाए उडऩा शुरू कर दिया। पंडित जी पतंगे के पीछे-पीछे हो लिए। पतंगे का पीछा करते हुए, दौड़ते हुए उनका ध्यान केवल पतंगे पर ही था। एक जगह बड़ा-सा पत्थर रखा था, पर पंडितजी पतंगे पर ध्यान देने के कारण उसे देख नहीं पाए और उससे टकराकर गिर पड़े।
पंडित जी ने आसपास देखा कि कोई उन्हें देख तो नहीं रहा! जब विश्वास हो गया कि उन्हें गिरते हुए किसी ने नहीं देखा है तो उठकर अपने कपड़े साफ किए और फिर से पतंगे को खोजने लगे। आखिर उनकी खोज पूरी हुई। पतंगा थोड़ी दूर पर ही एक फूल पर बैठा हुआ था। वे धीरे घीरे उसके पास गए और सावधानी के साथ उसे पकड़ लिया। पतंगा हाथ में आते ही वे मन ही मन बहुत खुश हुए- वाह! आखिर मैंने पतंगा पकड़ ही लिया।
दो ऊँगलियों के बीच पतंगे को पकड़े हुए पंडित जी वापस अपनी बैंच पर आकर बैठ गए। उस समय बैंच पर उन्हीं के मोहल्ले का लड़का राहुल बैठा हुआ था। वह भी बाग में खेलने के लिए आया हुआ था। जब राहुल ने पंडित जी के हाथ में पतंगा देखा तो उनके पास आकर बैठ गया और बोला- पंडित जी, आपने पतंगा पकड़ा ?
हाँ, क्यों ? क्या मैं पतंगा नहीं पकड़ सकता ?
क्यों नहीं, जरूर पकड़ सकते हैं। वैसे पतंगा पकडऩा बड़ा मुश्किल काम है ना? उसके पीछे बहुत दौडऩा पड़ता है।
पंडित जी ने मन ही मन कहा, सचमुच पतंगा पकडऩा काफी मुश्किल भरा काम है। इसके पीछे खूब दौडऩा पड़ा और ऊपर से पत्थर से टकराकर घुटना भी छिल गया, लेकिन वास्तव में वे कुछ न बोले।
राहुल बोला- वैसे पंडित जी, पतंगे को पकडऩा अच्छी बात नहीं है। मेरे शिक्षक कहते हैं कि हमें कीट-पतंगे, तितलियाँ आदि को पकड़कर उन्हें सताना नहीं चाहिए। ये सभी स्वतंत्र होकर उडऩे वाले जीव हैं। हमें किसी भी प्राणी को इस तरह पकड़कर उन्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए।
पंडित जी बोले- लेकिन मैंने इसे क्या नुकसान पहँुचाया है? मैंने तो केवन इसे पकड़ा ही है। थोड़ी देर बाद इसे छोड़ दूँगा। तब तक मैं इसे अपने पास रखकर थोड़ा प्यार तो कर लूँ।
राहुल बोला- किसी कीट-पतंगे को इस तरह पकड़कर प्यार नहीं किया जाता पंडित जी। इनसे प्यार करना हो, तो इन्हें फूलों पर बैठे हुए दूर से ही देखिए। एक फूल से दूसरे फूल पर मँडराते हुए, उनका रस पीते हुए देखना ही इन्हें प्यार करने के बराबर है, क्योंकि जो मजा इन्हें इस तरह देखने में है, वह इन्हें पकडऩे में नहीं।
पंडित जी का मुँह देखने लायक था!
राहुल आगे बोला- पंडित जी, अब यह पतंगा उडऩे लायक नहीं रहा।
क्यों ? यह उड़ क्यों नहीं पाएगा ?
क्योंकि आपकी ऊँगलियों के स्पर्श से इसके पंखों में लगा रंग उतर गया होगा, जो कि इसकी उडऩे में सहायता करता है। आप अपनी ऊँगलियाँ देख लें, तो आप पाएँगे कि आपकी ऊँगलियों में पतंगे के पंखों का रंग लगा होगा।
पंडित जी ने पतंगे को धीरे से बैंच पर रखा और अपनी उँगलियों को ध्यान से देखा, तो उन्हें उस पर रंग लगा दिखाई दिया। पतंगा भी निष्क्रिय होकर बैंच पर पड़ा हुआ था। पंडित जी ने उसे इतनी जोर से पकड़ रखा था कि अब वह उडऩा तो दूर की बात थी, हिल भी नहीं पा रहा था। अब पंडित जी को अपनी भूल समझ में आई।
वे राहुल से बोले - बेटा, बचपन में मैंने कभी इस बात की ओर ध्यान ही नहीं दिया कि पतंगे के पंखों को स्पर्श करने से उनकी उडऩे की शक्ति चली जाती है। तुम बहुत होशियार हो। इतनी छोटी उम्र में भी तुम्हें इस बात की जानकारी है और तुमसे उम्र में बड़ा होकर भी मुझे ऐसी कोई जानकारी नहीं है। मैं तो केवल नाम का ही पंडित हूँ। यदि मैंने भी बचपन में तुम्हारी तरह शिक्षा ली होती, तो मुझमें भी शायद पतंगों के प्रति दया भावना होती। आज तुमने छोटे होकर भी मुझे एक अच्छी बात सिखाई है। इसे मैं हमेशा याद रखूँगा और तुमसे वादा करता हूँ कि अब कभी भी इस तरह छोटे प्राणियों को परेशान नहीं करूँगा।
राहुल ने जब पंडित जी से यह सुना तो उसे बहुत खुशी हुई। उनके इस समझदारी पूर्ण निर्णय को सुनकर लगा कि पंडित जी अब सचमुच ही पंडित जी हो गए हैं।
भारती परिमल

मंगलवार, 30 जून 2009

शिक्षारूपी अंधेरी गुफाओं के साथी, आज के विद्यार्थी


डॉ. महेश परिमल
स्कूल-कॉलेज खुलने के दिन करीब आ गए। इसी के साथ शुरू हो गई बच्चों और पालकों की जद्दोजहद। यह बड़े ही दु:ख की बात है कि आज की शिक्षा किसी भी रूप में बच्चों को आत्मनिर्भर नहीं बनाती, फिर भी पालक अपने बच्चों को ऐसी शिक्षा देने के लिए विवश है। देश में शिक्षा माफिया इतना अधिक बलशाली है कि सत्ता किसी की भी हो, इनका काम कभी नहीं रुकता। यह तंत्र बेखौफ अपना काम कर रहा है और सरकार कुछ नहीं कर पा रही है। आज की शिक्षा के बोझ तले देश के मासूम कुचले जा रहे हैं, उनका भविष्य चौपट हो रहा है और सरकार तमाशा देख रही है। यह बताते हुए शर्म आती है कि सीबीएससी बोर्ड की परीक्षा में हर वर्ष 6 लाख विद्यार्थी शामिल होते हैं, इसमें से 4 हजार आत्महत्या कर लेते हैं। आत्महत्या की वजह वे स्वयं नहीं, बल्कि वे व्यवस्थाएँ हैं, जो हमारे देश को खोखला कर रही हैं। इसके अलावा जो बच्चे आत्महत्या नहीं कर पाते हैं, वे तनावग्रस्त होकर मानसिक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं।
मामला एक, स्थान-कोलकाता, यहाँ की एक छात्रा पिंकी ने एसएससी की परीक्षा में इतिहास के परचे में मात्र 11 अंक मिले। पिंकी के पालकों ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया, तो जवाब मिला कि जितने अंक दिए गए हैं, वे सही हैं। इस जवाब से पिंकी के पालक संतुष्ट नहीं हुए, क्योंकि पिंकी मेघावी छात्रा थी, उसके अंक इतने कम हो ही नहीं सकते। अब पालकों ने हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट के विद्वान न्यायाधीश बारिन घोष ने अपने सामने पिंकी के परचे की जाँच करवाई। उसमें पिंकी के अंक 70 हो गए।
मामला दो, स्थान कोलकाता, पिंकी के मामले से उत्साहित होकर कई पालकों ने हाईकोर्ट में आवेदन किया, इसमें फिरोज हुसैन के भूगोल में केवल 16अंक थे, जो बढ़कर 64 हो गए। एक विद्यार्थी को बंगला भाषा में केवल 0 अंक मिले थे, उसके अंक बढ़कर 47 हो गए।
मामला 3, स्थान महाराष्ट्र: यहाँ एचएससी बोर्ड की परीक्षा में निकुंज गांधी को जर्मन भाषा में 64 अंक मिले थे। उसने पुनर्मूल्यांकन करवाया, तो अंक बढ़कर 93 हो गए। केवल इसी अंक के आधार पर निकुंज विज्ञान शाखा में प्रावीण्य सूची में तीसरे स्थान पर पहुँच गया।
ये कुछ मामले हैं, जो आज की शिक्षा प्रणाली पर कई सवालिया निशान दागते हैं। कामचोर और आलसी परीक्षक, अल्पशिक्षित अध्यापक और अफसरशाही के बीच आज की शिक्षा एकदम पंगु हो गई है। इस दिशा में कई बार गंभीर प्रयास करने की घोषणा तो हुई, पर शिक्षा माफिया के दबाव में सरकार कुछ नहीं कर पाई। हमारे देश में मेकाले की शिक्षा पध्दति की शुरुआत नहीं हुई थी, तब लिखित परीक्षा का चलन नही था। विद्यार्थियों से जो परीक्षा ली जाती, उसका स्वरूप मौखिक होता। वह भी उसी शिक्षक द्वारा ली जाती, जिसने उसे पढ़ाया हो। इसके बाद भी यदि कोई बालक किसी विषय में कमजोर होता है, तो इसे बालक का दोष नहीं, बल्कि शिक्षक का दोष माना जाता। विद्यार्थी को हर विषय में होशियार बनाना शिक्षक की जिम्मेदारी होती। यही कारण है कि उस समय विद्यार्थियों को किसी प्रकार का भय नहीं रहता। वे हँसते-खेलते परीक्षा देते थे। हमारे देश में 19 सदी में होरेस मेन नाम ब्रिटिश अधिकारी ने लिखित परीक्षा की प्रणाली शुरू की थी,जो आज भी जारी है। हमारे यहाँ परीक्षा की जो पध्दति प्रचलित है, वह बिलकुल ही अवैज्ञानिक है। मान लो एक विद्यार्थी को गणित में 91 अंक मिले और दूसरे को 92, तो क्या इसका अर्थ यह निकाला जाए कि जिसने 91 अंक प्राप्त किए है, वह 92 अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी से कमतर है। बिलकुल नहीं। विद्यार्थियों की प्रतिभा ऑंकने की यह प्रणाली सही नहीं है। लेकिन यह प्रणाली हमारे देश में जारी है। आज कल परीक्षा की जो प्रणाली है, वह अधिक से अधिक अंक प्राप्त करने की कवायद भर है। इसी को आधार बनाकर तमाम गाइड तैयार होती है। अब बोर्ड परीक्षा में लिखित प्रश्नों की जो पध्दति होती है, उसमें विद्यार्थी के विश्लेषण करने, प्रयोग करने या समीक्षा करने की क्षमताओं की कोई कीमत नहीं होती। इसलिए विद्यार्थी केवल रट्टू तोता बनकर रह जाते हैं।
स्वतंत्रता मिलने के बाद डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया। 1948-49 में इसने जो रिपोर्ट दी, उसमें शैक्षणिक रूप से किए जाने वाले सुधारों विशेषकर परीक्षा पध्दति में सुधार पर जोर दिया। इसके बाद शिक्षा में सुधार के लिए कोठारी कमीशन ने भी परीक्षा पध्दति में सुधार पर जोर दिया। 1964-66में गठित की गई कोठीरी समिति के अध्यक्ष डॉ. डी.एस. कोठारी ने एक सेमिनार में अपनी राय प्रकट करते हुए कहा था कि विद्यार्थियों के ज्ञान का स्तर भी उसके अंक से ऊपर नहीं जा सकता। हमारी परीक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी खामी यही है कि यहाँ विद्यार्थी परीक्षार्थी की भूमिका में होता है और शिक्षक न्यायाधीश की भूमिका में। सच्चाई तो यह है कि शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें शिक्षक और विद्यार्थी की बराबर की भागीदारी होती है। कोई विद्यार्थी जब अनुत्तीर्ण होता है, तो विद्यार्थी नहीं, बल्कि उसे पढ़ाने वाला शिक्षक अनुत्तीर्ण होता है। परीक्षा का परिणाम घोषित होते ही शिक्षा की प्रक्रिया पूर्ण मानी जाती है। वास्तव में शिक्षा की यह प्रक्रिया तो परीक्षा के बाद ही शुरू होनी चाहिए। आज तो परीक्षा प्रणाली का उपयोग विद्यार्थियों के माथे पर पास-फेल की मुहर लगाने के लिए ही हो रहा है।
परीक्षा के इस चक्रव्यूह में पालक जहाँ स्कूल-कॉलेजों में धन दे-देकर परेशान हैं, वहीं विद्यार्थी पढ़ाई कर-कर परेशान हैं। दोनों के पास एक-दूसरे की समस्याओं को समझने का वक्त नहीं है। पालक बच्चे पर अधिक से अधिक अंक लाने का दबाव डालते हैं, उन्हें पता होता है कि यदि अच्छे अंक नहीं आए, तो उसका एडमिशन कॉलेज में नहीं हो पाएगा। फिर बिना कॉलेज के पढ़ाई कैसी? आज स्कूल-कॉलेज के नाम पर जो दुकानें सजी हैं, जरा एक नजर उन पर डालें, तो स्पष्ट हो जाएगा कि किसी ने भी विद्यार्थियों को शिक्षा देने के लिए स्कूल-कॉलेज नहीं खोला है। यहाँ तो केवल धन का ही बोलबाला है। जितना अधिक धन लगाओगे, उतनी ही बेहतर शिक्षा दी जाएगी। सरकारी स्कूलों का हाल किसी से छिपा नहीं है। शिक्षा माफिया सरकार पर इस कदर हावी है कि सरकार के सारी अच्छी नीतियाँ ताक पर रह जाती हैं। कहीं कोई आशा की किरण दिखाई नहीं देती। एक अंधेरा, स्याह अंधेरा, जिस रास्ते पर हमारी भावी पीढ़ी को जाना है। कहाँ से लाएं वह रोशनी, जो हमारे देश के नेताओं के मस्तिष्क के स्वार्थी अंधेरे को दूर कर सके। क्या हम अपने बच्चों को इस अंधेरे रास्ते से गुजरने देंगे भला!
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 29 जून 2009

बैसाखी

डा. महेश परिमल
‘‘ अच्छा तो डाक्टर साहब ! मैं चलती हूँ। शिप्रा ने उठते हुए कहा।
‘‘ठीक है, तुम उसे एक बार यहाँ ले आओ, मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि मैं उसे ठीक कर दूँगा डाक्टर मेहता ने कहा।
‘अच्छा नमस्ते।’ ‘नमस्ते।’ कहते हुए डाक्टर मेहता अन्य रोगियों को देखने लगे। हाॅस्पीटल से बाहर आकर शिप्रा ने घर की ओर कदम बढ़ाए। चेहरे पर आत्म संतोष की छाया स्पष्ट दिखाई दे रही थी। जो सोचा था, वहीं होने जा रहा है, वह खुश थी, बहुत खुश। खुशी के मारे यह भी पता नहीं चला कि कब घर आ गया।
‘‘दीदी आ गई, दीदी आ गई’’ कहते हुए रीतु और गुड्डू दोनों उससे लिपट गए। ‘‘दीदी हमारे लिए क्या लाई हो ?’’ कहते हुए दोनों उसके बैग को देखने लगे।‘‘ये लो टाफियाँ’’ शिप्रा ने दोनेां को टाॅफियाँ थमा दी। अंदर पहुँचकर उसने हाथ-मुँह धोए, इतने में माँ चाय का प्याला लेकर उसके कमरे में आती दिखाई दी।-
आज कुछ देर हो गई बेटी ? माँ ने स्नेह से पूछा।
हाँ, माँ, आज वेतन मिलने में समय कुछ ज़्यादा लग गया। फिर आजकल आॅफिस में काम भी कुछ ज़्यादा है।-
अच्छा ले चाय पी। थकान कुछ कम हो जाएगी। और हाँ, तेरे नाम एक लिफाफा आया है, ठहर लाती हूँ, कहकर माँ दूसरे कमरे में चली गई। शिप्रा ने चाय का प्याला उठाया और दूसरे कमरे में गई, माँ के आने की प्रतीक्षा करने लगी। चाय की चुस्कियों के बीच वह उतावली हो रही थी कि किसका लिफाफा आया है। कुछ देर बाद माँ ने उसके हाथ में एक लिफाफा थमाया और चाय का खाली प्याला लेकर भीतर चली गई।
शिप्रा ने लिफाफा खोला, देखा अमोल का खत है, लिखा था -प्रिय शिप्रा, हाॅस्पीटल की ज़िन्दगी कितनी उबाऊ और जानलेवा होती है, यह मैं पिछले चार महीनों से देख रहा हूँ। वहीं दवाइयाँ, वही इंजेक्शन - - और वही हिदायतें ! सुन-सुन कर तो मेरे दिमाग की ग्रंथियाँ ढीली पड़ने लगी हैं। मैं जानता हूँ शिप्रा, ज़िम्मेदारियों ने तुम्हें कितना खामोश कर दिया है। तुम्हारा प्यार ही तो है, जो मुझे इस हालत में भी अभी तक ज़िन्दा रखे हुए है। उस दिन मुझे पहली ज़िन्दगी मिली थी, जिस दिन तुमने मेरे प्यार को स्वीकारते हुए मेरे साथ जीवन जीने की शपथ ली थी। मैं इस दिन को साकार करने के लिए जी जान से जुट गया - - - पर शायद नियति को यह मंज़ूर न था। हमारे प्यार के फूलों, की महक शायद ईश्वर को अच्छी न लगी और मुझसे मेरे अंग छिन लिए- - - ।
उन क्षणों को याद करता हँू, शिप्रा, तो सच बताऊँ उस दिन मैंने जाना कि आज मेरी पहली मौत हुई है। सड़क में पीछे से आने वाले ट्रक ने मुझे जिस ढंग से रौंदा, उसे याद करते हुए सोचता हँू, पूरी तरह से रौंद दिया होता, तो कितना अच्छा होता ? इस तरह अपाहिज होकर जीने से तो वही अच्छा। सोचा था माता-पिता का बोझ कम करूँगा, तुम्हारी माँग का सिन्दूर बन जीवन-पथ पर तुम्हारे संग चलूँगा, पर हुआ इसके विपरीत। आज तुमसे - - तुमसे तो बहुत दूर - - नितांत अकेला हूँ।
उस समय पहली मौत के बाद मैं यहाँ पिछले चार महीनों से रोज़ ही ऐसी मौत मर रहा हूँ। ज़िन्दगी मुझसे काफी दूर है। हाँ, तुम्हारे संबल देने वाले ख़त अवश्य ही कभी-कभी मौत को दूर धकेेलकर ज़िन्दगी को करीब ला देते हैं। पर अब लगता है भूल-भूलैया से दूर जाना पड़ेगा। सच के धरातल पर पाँव रखना पड़ेगा। कुछ ही दिनों बाद मेरी इस हाॅस्पीटल से छुट्टी हो जाएगी और जाते वक़्त मुझे मिलेगा, बैसाखियों का उपहार। इसके पहले कि मैं मौत के गड्ढे में गिर पडूँ, तुम मेरी बैसाखी बन कर मुझे बचा लो शिप्रा- - -। तुम्हारा सहारा पाकर मैं जीवन पथ पर फिर आशा और उम्मीद के साथ चल पडूँगा। तुम्हारा संबल बहुत ज़रूरी है मेरे लिए, क्योंकि अब निराशा घेरने लगी है। तुम्हारे खतों का विलंब से आना मुझे भीतर से तोड़ने लगा है। इसके पहले कि मैं टूट कर बिखर जाऊँ - - - मुझे आकर बचा लो - शिप्रा।
ख़त पढ़कर शिप्रा कुछ देर तक शून्य में निहारती रही, सोचती रही, कितना महात्वाकांक्षी था अमोल। ‘ये करूँगा, वो करूँगा’ कहते-कहते उसका मुँह न थकता। कहता - शिप्रा, तुम्हारा प्यार मिलता रहे, तो देखना एक दिन मैं कहाँ से कहाँ पहुँच जाऊँगा। इतनी दूर - - इतनी दूर - - कि फिर जब भी तुम अपने भीतर झांकोगी तो मुझे पाओगी और शिप्रा मुस्कराकर रह जाती। - - - पर आज यह कैसी परिस्थिति है ? शिप्रा ने सोच रखा है कि जब तक छोटे भाई विकल की इंजीनियर की पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती, और वह कमाने लायक नहीं हो जाता तब तक मैं माता-पिता को अपना सहारा देती रहूँगी, और न ही तब तक अपने विवाह के बारे में सोचूँगी। अमोल ने भी तो इसे स्वीकारा था और अच्छी सर्विस मिलते ही उससे दूर दूसरे शहर चला गया था और जाते हुए विश्वासपूर्वक कहा था, शिप्रा मैं तुम्हारा इंतज़ार करूँगा । पर आज तो - - आज तो - - -।
सोच की तरंगे कुछ और दूर पहुँचती कि माँ ने पुकारा - ‘चल बेटी खाना खा ले। ‘जी, अच्छा माँ, तुम परोसो, मैं अभी आई। शिप्रा बाथरूम की ओर बढ़ गई। खाना खाते समय पिता ने पूछा - शिप्रा बेटी ! वह जो आॅफ़िस से प्राॅविडेंट फंड के पच्चीस हज़ार रूपये निकालने के लिए कहा था, उसका क्या हुआ ? ‘वह तो मैंने निकाल लिए और डाक्टर को दे दिए’ ‘डाक्टर को! डाक्टर को क्यों दिए ? पिता ने आश्चर्य से पूछा । ‘अमोल के इलाज के लिए ’
‘अमोल, अमोल, अमोल - - - ! मैंने कितनी बार कहा तुमसे कि उसे अब भूल जाओ। ‘कैसे भूल जाऊँ पिताजी, आपने ही तो हमारे प्यार को स्वीकारते हुए शादी का वचन दिया था’ कहते हुए शिप्रा हाथ धोकर सीधे अपने कमरे में चली गई। पलंग पर गिरकर तकिए में मुँह छिपाकर फफक कर रो पड़ी। कुछ देर बाद उसके सर पर किसी ने प्यार से हाथ फेरा, देखा - पिताजी थे ! जो अश्रुपूरित नेत्रों से उसे देख रहे थे।
-‘ बेटी, मैं तेरा दुःख समझ रहा हूँ, पर मैं अपनी फूल-सी बेटी को कैसे किसी के साथ बाँध दूँ। जो स्वयं अपना भार उठाने में असमर्थ है, वह कैसे तुम्हारा भार उठाएगा ? पिता ने रूँधे गले से कहा। नहीं, नहीं- - -, नहीं पिताजी। जब तक अमोल अच्छा था, तो आप भी उसे बेटे-बेटे कहते नहीं अघाते थे, साथ ही गर्व भी करते थे, अपनी इस बेटी पर कि कितना अच्छा वर चुना है इसने। याद है, जब उसने अपनी सर्विस की और दिल्ली आफ़िस ज्वाइन करने की ख़बर सुनाई थी, तो कितने खुश हुए थे आप? पर आज जब वह नियति के क्रूर हाथों से अपनी एक टाँग गँवा बैठे हैं, तो इसका अर्थ यह हुआ कि अब वह मेरे लायक नहीं रहे, मानो टाँग के साथ-साथ उनकी योग्यता, उनका आचरण, उनका स्वभाव और उनका चऱि़त्रा भी चला गया। शिप्रा ने सजल नेत्रों से पूछा - मान लीजिए, पिताजी यदि ये ही हादसा मेरी शादी के बाद होता, तो क्या तब भी आप ऐसा ही कहते ? नहीं, पिताजी मुझे पूरा विश्वास है, कि तब आप मुझे मेरा कर्तव्य याद दिलाते। क्या सिंदूरी रेखा अधिकार और कर्तव्य के मायने बदल देती है? तो पिताजी, मेरे प्यार की रेखा उस सिंदूरी रेखा से भी ज़्यादा गहरी है, जहाँ सिर्फ और सिर्फ अमोल हंै।
- - पर बेटी ! तुम्हीं सोचो कि - - - बस कीजिए पिताजी। मैं समझ गई, आप नहीं चाहते कि आपकी बेटी किसी अपाहिज की बैसाखी बने। आप नहीं चाहते कि मैं अमोल से ब्याह कर सुखी रहूँ। लेकिन आप ग़लती कर रहे हैं पिताजी, अगर भावनाओं में बह कर आप मेरी शादी किसी और कर देंगे, तो वह जीवन मेरे लिए नरक से भी गया-बीता हो जाएगा। शिप्रा ने कुछ रूक कर फिर कहा - मैंने अपने मन-मंदिर में अमोल को बसाया है और जीवन भर उसे ही पूजती रहँूगी।
कुछ समय बाद पिताजी भारी कदमों से अपने कमरे की ओर चले गए और वह पलंग पर ढेर हो गई। कमरे में उसकी धीमी-धीमी सिसकियाँ सुनाई पड़ रही थी। आवाज़ सुन कर माँ ने धीरे से शिप्रा के कमरे में प्रवेश किया और उसे अपनी छाती से लगाकर सांत्वना देती रही। जब उन्हें लगा कि शिप्रा सो रही है, तब धीरे से वह दूसरे कमरे में चली गई। जाते ही शिप्रा उठी और अमोल का खत फिर से पढ़ने लगी। उसे लगा, उसका अमोल टूट रहा है, निराशा के गहरे सागर में डूब रहा है। नहीं, वह उसे यूँ निराश होने नहीं देगी। वह उठी और टेबल लेम्प जला कर अमोल को ख़त लिखने लगी। ख़त में उसने इस बात का ज़िक्र कर दिया कि उसने यहाँ एक डाक्टर से बात कर ली है और उन्होंने उसे आश्वासन दिया है कि अमोल पूरी तरह से ठीक हो जाएगा। वे ऐसे कई केस में सफल आॅपरेशन कर चुके हैं, इसीलिए वह अपने प्रोव्हीडेंट फं़ड में से पच्चीस हज़ार रूपए भी उन्हें दे चुकी है। तुम आ जाओ। फिर तुम्हारा इलाज यहाँ शुरू हो जाएगा और तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे। मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ और सदैव रहूँगी। इस प्रेरणादायी ख़त को लिखने के बाद वह स्वयं को हल्का महसूस कर रही थी। सुबह आॅफ़िस जाते हुए सबसे पहले उसने अपना ख़त पोस्ट किया फिर आॅफिस की सीढ़ियों पर कदम रखा। दिन भर शिप्रा आॅफिस के कार्यो में व्यस्त रही। समय का पता ही न चला। छुट्टी होने के पंद्रह मिनट पहले उसका एक फोन आया। फोन रमेश का था। अमोल का दोस्त रमेश, जो अभी अमोल के पास ही हाॅस्पीटल में था। रमेश की बात सुन कर वह धक् से रह गई। उसके पैरों तले की ज़मीन ही खिसक गई। रमेश के कहे अनुसार अमोल ने ‘स्यूसाइड’ कर लिया था। उसका अमोल, यह दुनिया छोड़कर जा चुका था। उसका दिमाग सन्न हो गया। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। रिसीवर उसके हाथ से गिर पड़ा। वह निढाल हो कर कुर्सी पर बैठ गई। अचानक मानों उसे कहीं से शक्ति प्राप्त हो गई, वह संयत हो उठी। सब घर जाने लगे थे, उसने अपना बैग उठाया और निकल पड़ी। रास्ते में क्लिनिक के सामने से गुज़रते हुए डा. मेहता ने उसे देख लिया। ‘अरे बेटी, वो तुम्हारे पेशेंट का क्या हाल है ? उसे तुम मेरे पास नहीं लाई ? डाक्टर ने पूछा !
‘जी, वो नहीं आएँगे।’ ‘क्यों आखिर क्या बात है ?’
‘जी, अब वो उस डाक्टर के पास चले गए हैं, जो हर तरह के रोगों से मुक्ति दिलाते हैं।’
- ‘मैं समझा नहीं बेटी ?’
तब शिप्रा ने अमोल के ‘स्यूसाइड’ वाली बात डाॅ. मेहता को बता दी।
‘ओह’ कहते हुए डाक्टर मेहता चश्मा निकाल कर अपनी आँखों को मलने लगे।
‘एक मिनट ठहरो बेटी, यह कह कर डाॅॅ. मेहता अंदर गए और साथ में पच्चीस हज़ार रुपए की गड्डी लेते आए। ‘लोे बेटी, इसे रख लो, अब इसकी ज़रूरत नहीं।’ ‘इसे आप ही रख लीजिए डा. साहब - - -।’ ‘पर क्यों बेटी ? यह तो तुम्हारे ही रुपए हैं। जो तुमने अमोल के इलाज के लिए मुझे दिए थे।
‘इसे मैं अब नहीं लँूगी डाक्टर साहब ! इन रुपयों को उन मरीजों के लिए रख दीजिए, जो रुपयों के अभाव में अपना इलाज नहीं करवा पाते हैं। ताकि भविष्य में कोई मेरी तरह दुःखी न हो।’ यह कहते हुए शिप्रा ने अपने आँसू पोंछे और चलने लगी।
डाक्टर मेहता दूर तक शिप्रा को सजल नेत्रों से जाते हुए देखते रहे। नोट की गड्डियाँ अब भी उनके हाथोें में थी।
डा. महेश परिमल

शनिवार, 27 जून 2009

बादल, बिजली और बारिश


भारती परिमल
शीर्षक पढ़कर आप सोच रहे होंगे कि यह किसी फिल्म की कहानी तो नहीं है ना। नहीं, न तो यह किसी फिल्म की कहानी है और न ही किसी छबिगृहों के नाम हैं। मैं तो उस बादल, बिजली और बारिश की बात कह रही हूँ, जिनका सामना हमें इन दिनों करना ही पड़ रहा है। आओ इन तीनों भाई-बहनों के बारे में कुछ जानने का प्रयास करें।
रविवार का दिन, यानि मौज-मस्ती और छुट्टी का दिन! एकाएक आकाश में बादल घिर आए। सूरज बादलों में छिप गया। चारों ओर घना अंधकार छा गया। भरी दोपहर थी, उसके बावजूद ऐसा लग रहा था, मानों शाम हो गई हो। अंशुल घर के अहाते में ही था, कि माँ ने आवाज लगाई- अंशुल, अंदर आ जाओ। अभी बारिश शुरू हो जाएगी। देखो, कैसे काले बादल घिर आए हैं।
इतने में बौछारें शुरू हो गई। छोटी-छोटी बूँदों ने बड़ी बूँदों का रूप ले लिया। थोड़ी देर में ही मूसलधार बारिश शुरू हो गई। साथ ही आकाश में बादलों की गड़गड़ाहट भी होने लगी। ऐसी तेज आवाज मानों आकाश अभी फट पड़ेगा।
घड़ घड़ धड़ाम धम्म! धड़ाम धम्म!
आकाश में खुली ऑंखों से देखना मुश्किल हो गया। कुछ देर पहले जो खुला आकाश था, वही अब पानी का प्रपात बना हुआ था। बिजली का चमकना ऐसे लग रहा था मानों आकाश में हजारों वॉल्ट के अनेक बल्ब जल गए हों। साथ ही बादलों की तेज गड़गड़ाहट! मानों आकाश फट कर अभी धरती पर गिर पडेग़ा!
ये सब देखना अच्छा भी लग रहा था और भयभीत भी कर रहा था। पिताजी भी बदले मौसम का नजारा देखने के लिए खिड़की के पास आकर खड़े हो गए। खिड़की के बाहर हाथ निकालकर वे बारिश का मजा लेने लगे। उन्हें ऐसा करते देख मेरी भी हिम्मत बढ़ी, मैं भी उनके पास आकर खड़ा हो गया। बारिश की बूँदें हथेली पर सहेजने के लिए हाथ बाहर निकाला ही था कि जोर से बिजली कड़की और मैं भीतर तक काँप गया।

पिताजी ने हँसते हुए मेरे कँधे पर हाथ रखा। मैंने पापा से पूछा-पापा, आकाश में बिजली कैसे चमकती है? पिताजी बोले- अंशुल, तुम जरा अपनी दोनों हथेलियों को आपस में जोर से रगड़ो तो भला। अंशुल ने वैसा ही किया, उसकी दोनों हथेलियाँ गरम हो गई। पिताजी ने समझाया- हथेली घिसने से घर्षण हुआ और एक प्रकार की बिजली पैदा हुई। आकाश में बादल हैं, वे वैसे तो रूई की फाहे की तरह नरम हैं। ऊपर हवा भी है, ऐसे में हवा के साथ दौड़ते-भागते बादल एक-दूसरे से टकराते हैं, जिस तरह से तुम्हारी हथेली के घर्षण से गरमाहट के साथ बिजली उत्पन्न हुई, उसी तरह बादलों के टकराने से बिजली उत्पन्न होती है।
बिजली की बात होते ही घर की बिजली गुल हो गई। तब माँ ने माचिस ली और उसमें से दियासलाई निकालकर उसे माचिस से लगे फास्पोरस वाली जगह पर रगड़ा, जिससे दियासलाई जल उठी। माँ ने उससे मोमबत्ती जला ली। इस पर पिताजी ने अंशुल को बताया कि अभी तुमने देखा कि तुम्हारी माँ ने किस तरह माचिस की तीली को रगड़कर आग जलाई। ठीक इसी तरह जब बादल आपस में रगड़ खाते हैं, तब उसमें बिजली उत्पन्न होती है। तब अंशुल ने कहा- पिताजी क्या यह बिजली जमीन तक आ पाती है, क्या यह हमारे घर के भीतर भी आ सकती है? हाँ कई बार यह हमारे घर के अंदर तक आ सकती है- पिताजी ने कहा।

अब अंशुल तुम सुनो कि किस तरह से इस बिजली से बचा जाए। माँ-पिताजी ने अंशुल को मोमबत्ती की रोशनी में अपने पास बिठा लिया। पिताजी ने बताया- यह बिजली बहुत ही भयानक चीज है। यदि यह जमीन पर उतर जाए, तो वहाँ एक गहरा गङ्ढा हो जाता है। यदि यह किसी मकान या पेड़ पर गिरे, तो उसे जलाकर राख में बदल देती है। तो पिताजी इस भयानक बिजली से बचा कैसे जाए? हाँ मेरे बच्चे मैं तुम्हें यही बताने जा रहा हूँ, सुनो- यदि इस तरह का मौसम हो और हम कहीं बाहर हों, तो रास्ते से अलग हटकर पास के किसी मकान में चले जाना चाहिए। शहर के घर इसीलिए सुरक्षित हैं, क्योंकि इसमें लोहे की सामग्री इस्तेमाल में लाई जाती है। उन लोहों के माध्यम से बिजली जमीन में चली जाती है।
यदि तुम कहीं जा रहे हो और बिजली लगातार चमकने लगे, आसपास कोई घर दिखाई न दे, तो ऐसे में यदि तुम्हें कोई कार या जीप दिखाई दे जाए, तो तुम उसमें भी बैठ सकते हो। यह भी बिजली से बचाव का सुरक्षित स्थान है। यदि भारी तूफान आ रहा हो और बारिश के साथ बिजली भी चमक रही हो, तो इस स्थिति में नाव से नदी या तालाब पार नहीं करना चाहिए। यह खतरनाक हो सकता है। तैरकर नदी, नाला, या तालाब पार करना तो बहुत अधिक खतरनाक हो सकता है। किसी प्रकार की लोहे की जाली या रेलिंग के पास भी खड़े नहीं होना चाहिए, किसी पेड़ के नीचे या खेत में भी खड़े नहीं होना चाहिए।
तो, इसका मतलब यह हुआ कि जब बारिश हो रही हो, तो हमें घर पर ही रहना चाहिए, अंशुल ने कहा। हाँ बेटे, अब तो तुम इस बादल, बिजली और बारिश के बारे में बहुत-कुछ जान गए। ये सब जानकारियाँ तुम कल शाला में अपने दोस्तों को बता सकते हो।
भारती परिमल

Post Labels