शनिवार, 11 जुलाई 2009

स्वीटी को मिली सीख


भारती परिमल
एक थी शरारती लड़की। नाम था स्वीटी। उसकी शरारतों से घर के सभी लोग परेशान थे। मम्मी तो सबसे ज्यादा परेशान थी। आखिर छह साल की नन्हीं लड़की सभी की नकल करे और सबका मजाक उड़ाए, तो यह तो वास्तव में परेशानी की ही बात थी। मम्मी ने उसे प्यार से कितनी ही बार समझाया- बेटा, ऐसा नहीं करते। किसी की नकल करना बुरी बात होती है। लेकिन शरारती स्वीटी अपनी मम्मी की बात एक कान से सुनती और दूसरे से निकाल देती। वह हमेशा पापा के पेपर पढऩे के तरीके, मम्मी की साड़ी पहनने का ढंग, दादाजी के बोलने, दादीजी के पूजा करने और चाचा के उठने-बैठने की नकल उतारती थी और बदले में सभी से डाँट भी खाती थी।
स्वीटी को एक दूसरा शौक था- टी.वी. देखना। पापा समझाते हुए कहते- स्वीटी, ज्यादा समय तक टी.वी. नहीं देखते, अधिक पास से टी.वी. नहीं देखते, यह अच्छी बात नहीं है। स्वीटी जवाब देती- लेकिन पापा, कार्टून नेटवर्क तो मेरा प्यारा शो है। मुझे तो इसे देखना बहुत अच्छा लगता है। आप भी देखिए, आपको भी खूब मजा आएगा। पापा को गुस्सा आ जाता, वे कहते- तो फिर पढ़ोगी कब? तुम्हें बाहर खेलने जाना चाहिए। खेलने से शरीर की कसरत होती है। शरीर में स्फूर्ति आती है। दिन भर टी.वी. के सामने बैठे रहने से आँखें और शरीर दोनों ही खराब हो सकते हैं।
स्वीटी पर न तो पापा की बातों का असर होता, न ही मम्मी के समझाने का। बहुत हुआ तो पापा के घर में रहते समय वह होमवर्क कर लेती और फिर जैसे ही पापा घर से बाहर गए कि स्वीटी बैठ जाती टी.वी. के सामने। स्वीटी को घूमना भी खूब अच्छा लगता था। वह हमेशा बाहर जाने की जिद करती। जब पड़ोस की कोई आंटी या अंकल उससे कहते कि चलो स्वीटी हमारे साथ घूमने चलना है? तो स्वीटी तुरंत तैयार हो जाती, पर यहाँ मम्मी उसकी एक न सुनती और उसे जिद करके घर में ही रहने को कहती। क्योंकि उसे मालूम था कि यदि एक बार स्वीटी को बाहर घूमने-फिरने की आदत लग गई, तो वह हमेशा घूमना ही पसंद करेगी। घर में रहते हुए तो उसे डाँट-डपट कर अपनी मर्जी से कुछ करवाया जा सकता है, लेकिन यदि उसे बाहर घूमने की आदत हो गई तो फिर तो उसे घर में रहना जरा भी अच्छा नहीं लगेगा। साथ ही घूमने-फिरने से चॉकलेट-टॉफी या अन्य चटपटा खाने की आदत भी पड़ जाएगी। फिर तो स्वीटी को संभालना बड़ा मुश्किल होगा। यह सोचकर स्वीटी की मम्मी उसकी बाहर घूमने जाने की जिद कभी पूरी नहीं करती थी।
एक बार स्वीटी स्कूल की छुट्टी होने पर स्कूल से बाहर निकल ही रही थी कि उसके सामने एक कार आकर खड़ी हो गई। कार के अंदर से एक आदमी बाहर आया और स्वीटी से बोला- चलो बेटे, तुम्हें घर तक छोड़ दूँ। एक अनजाने आदमी को इस तरह प्यार से बोलते देख स्वीटी को आश्चर्य हुआ, वह बोली- नहीं, मेरी वैन अभी आ जाएगी।
आदमी ने कहा- अरे तो क्या हुआ? उस वैन में दूसरे बच्चे चले जाएँगे। तुम्हें, तुम्हारे घर छोड़ते हुए मुझे बहुत खुशी होगी। हम आपस में रास्ते में बातचीत करेंगे, कुछ खाएँगे-पीएँगे और इतने में तुम्हारा घर आ जाएगा। तुम घर चली जाना। स्वीटी को लगा- वाह, नई-नई कार में बैठने में कितना मजा आएगा। वैन वाले अंकल तो हम सभी बच्चों को कितना ठूँस-ठूँस कर भरते हैं। कभी-कभी तो जगह ही नहीं मिलती, एक-दूसरे पर गिरते-पड़ते, धक्का खाते हुए घर जाना पड़ता है। यहाँ तो कार में सिर्फ मैं ही बैठूँगी, पूरी सीट मेरी होगी। फिर अंकल भी तो बहुत प्यारे लग रहे हैं। रास्ते में चॉकलेट-टॉफी भी दिलाएँगें। वह तो झट से कार में बैठ गई। उसने पूछा- आपका नाम क्या है अंकल? मेरा नाम सुरेश है। तुम्हारा घर कहाँ है?
स्वीटी बोली- सुंदरनगर के लक्ष्मी कॉटेज में।
अंकल बोले- अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी बात है। मुझे भी तो वहीं जाना है। ऐसा कहते हुए अंकल ने जेब से चॉकलेट निकालकर स्वीटी के हाथों में पकड़ाई। चॉकलेट खाने के थोड़ी देर बाद ही स्वीटी को लगा कि मुझे इतनी ज्यादा नींद कैसे आ रही है? मैं तो कभी दिन में सोती ही नहीं हूँ। मम्मी तो बोल-बोल कर परेशान हो जाती है और मैं तो टी.वी. के सामने बैठी रहती हूँ। सीधा रात को ही बिस्तर में जाती हूँ। आखिर मुझे इतनी नींद क्यों आ रही है? इसके आगे वह कुछ और सोचे कि नींद के कारण उसकी आँखें ही बंद हो गई।
सुरेश ने कार की स्पीड बढ़ा दी। थोड़ी देर बाद उसे लगा कि दूसरी कार उसका पीछा कर रही है। उसने अपनी कार को हाई-वे की तरफ मोड़ दिया। पीछे वाली कार भी हाई-वे की ओर चल पड़ी। अब तो उसे यकींन हो गया कि सचमुच उसका पीछा किया जा रहा है। वह अपनी कार की स्पीड बढ़ाता उसके पहले ही पीछे वाली कार तेज स्पीड के साथ उसके सामने आकर खड़ी हो गई। अब सुरेश को अपनी कार रोकनी पड़ी। उसे पता नहीं था कि कार में कौन है?
क्यों, क्या बात है? कार कोई रूकवाई? उसने गुस्से से पूछा। कार में से स्वीटी के पापा बाहर निकले और उन्होंने भी तेज आवाज में पूछा- यह आपकी कार में जो लड़की सो रही है, वह कौन है? सुरेश ने कहा- जो भी है, आपको इससे क्या मतलब? आप अपने रास्ते पर आगे जाइए।
स्वीटी के पापा ने सुरेश का कॉलर पकड़ लिया और उसे कार से बाहर निकलने पर विवश कर दिया। स्वीटी के पापा के साथ उसके छोटे भाई यानी स्वीटी के चाचा भी थे। दोनों ने मिलकर उस अकेले आदमी को खूब मारा और फिर मोबाइल की मदद से पुलिस को भी बुला लिया। सुरेश गिड़गिड़ाने लगा- मुझे छोड़ दो, परंतु उसकी एक न सुनी गई और पुलिस उसे पकड़ कर ले जाने लगी।
अब तक स्वीटी की नींद खुल गई थी। उसे कुछ भी समझ में नहीं आया। उसने पुलिस को देखा, पापा को देखा और उस अनजाने अंकल को पुलिस से घिरे देखा तो वह तो डर ही गई। बस, पापा को देखकर वह उनसे लिपटकर रो पड़ी। पापा बोले- तुझे कुछ पता भी है? यह आदमी तुम्हें उठाकर ले जा रहा था! यदि हमने तुम्हें स्कूल में उसकी कार में बैठेते समय न देखा होता, तो न जाने क्या होता?
अब स्वीटी को समझ में आया कि उसने एक अनजाने आदमी पर विश्वास कर कितनी बड़ी गलती की थी। उसे मम्मी की बात याद आई कि वह उसे कभी भी किसी के भी साथ जाने से क्यों मना करती थी। उसे पापा की हिदायतें भी सच्ची लगने लगी। मम्मी की समझाइश को भी वह एक-एक कर याद करने लगी। पापा और चाचा के साथ घर की ओर लौटते हुए उसने मन ही मन फैसला कर लिया था कि अब वह हमेशा मम्मी-पापा की बात मानेगी और कभी भी गलत बात के लिए जिद नहीं करेगी।
भारती परिमल

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