शुक्रवार, 24 जुलाई 2009
लिखो पाती प्यार भरी
डॉ. महेश परिमल
प्रे्रेम पत्र! वही प्रेम पत्र जो शकुंतला ने कदम्ब के पत्तों पर नाखून से लिखकर दुष्यंत को दिया। वाटिका मेें कंगन में पड़ रही परछाई में सीता ने पढ़ा और एकांत में बाँसुरी की मीठी तान में राधा ने सुना। वही प्रेम पत्र या प्रेम संदेश, जो कैस ने रेगिस्तान की गर्म रेत पर ऊँगलियों की पोरों से लैला को लिखा। पानी की डूबती-उतराती लहरों के साथ सोहनी ने महिवाल को दिया। खेत की हरी-हरी लहलहाती फसलों को पार करते राँझा ने हीर तक पहुँचाया।
यह थी भावनाओं और संवेदनाओं की एक अनोखी दुनिया, जहाँ प्रेम और अपनापे की गुनगुनी धूप पत्तों से छनकर धरा तक पहुँचती थी। हृदय से हृदय के तार जुड़े होते थे। तब पत्र में अक्षरों के बीच लिखने वाले की छवि उभरती थी। पत्र पढ़ते हुए कभी आँखें भर आती थी, तो कभी मन खुशी से झूम उठता था। बिन पंखों के मन मयूर कल्पनाओं की ऊँची उड़ानें भर लिया करता था। अपने प्रेमी या प्रेमिका के हाथों लिखा वह पहला खत तो आप भी नहीं भूले होंगे। कितने ही बार उसके नाम को ऊँगलियों के पोरों से सहलाया होगा। अपने होठों से चूमा होगा। पढ़ा तो इतनी बार होगा कि लिखावट आँखों में नहीं, दिल में बस गई होगी। पत्र सिर्फ प्रेमी या प्रेमिका का ही नहीं होता, पत्र माता-पिता, भाई-बहन, स्नेहीजन, मित्रों सभी को एक डोर में बाँधे रखते हैं। माता-पिता के पत्रों में जहाँ संतान के लिए लाड़-दुलार और आशीर्वाद होता है, तो वहीं स्नेेहीजनों के पत्र कुछ संदेश देते हैं, अपनापन लिए हुए होते हैं। माँ की प्यार भरी पाती पढ़ते हुए भला हम अपने बचपन से दूर कैसे रह सकते हैं? पाती पढ़ते हुए, शब्दों की पगडंडियों पर पैर रखते हुए मन का हिरण कभी कुलाँचे भरता है, तो कभी आँखें अनायास ही बचपन की यादों में खो जाती हंै।
सच-सच बताएँगे आप, कितने दिन हो गए आपने अपने प्रियजनों को एक चिट्ठी तक नहीं लिखी? काफी दिन हो गए ना। अब तो याद भी नहीं कि आखिरी बार कब चि_ïी लिखी थी? अब तो सारी बातें फोन या मोबाइल पर हो ही जाती हैं। रही सही कसर एसएमएस और ई-मेल से पूरी हो जाती है। हाल-चाल मालूम चल जाता है। क्या जरूरत है चि_ïी लिखने की? सच कहा आपने, आप कतई गलत नहीं हैं। फोन पर कितना भी बतिया लें, पर जो प्यार स्नेेह भरे पत्रों में उमड़ता है, वह भला फोन की मीठी वाणी में कहाँ? इसे महसूस किया कभी आपने? हम कितने भी 'एडवांसÓ क्यों न हो जाएँ, पत्रों की पवित्रता को नकार नहीं सकते। पत्र हृदय का दर्पण होते हैं। उसकी लिखावट हमें एक आत्मिक संतोष देती है, उससे हम भलीभाँति परिचित होते हैं। लिखावट सामने आते ही डूब जाते हैं, अतीत की सुखद स्मृतियों में। आज भी हमारे पास ऐसे कई पत्र होंगे, जो अनमोल धन की तरह सुरक्षित होंगे ही। उसका एक-एक अक्षर हमें याद होगा। फिर भी हम उसे बार-बार पढऩा चाहेंगे, आखिर क्यों? याद करो, जब हमें अपनी प्रेयसी या प्रेमी का पहला प्यार भरा, खुशबू में सराबोर पत्र मिला था, तब मन में कितनी उमंगें थीं। आज भले ही वह पत्र ढूँढ़े न मिल रहा हो, पर उसकी खुशबू से आप अब भी महक जाते होंगे। पत्र पाते ही उसे चूमा तो होगा ही। सहलाया भी होगा। रात में तकिये के नीचे रखकर सुखद नींद भी ली होगी। खैर छोड़ो, कभी जीवन के क्षेत्र में विफलता भी प्राप्त की होगी, तब माँ-पिताजी, भैया या भाभी, दीदी या छोटी बहना या किसी प्यारे से दोस्त का सांत्वना भरा पत्र तो मिला ही होगा आपको? सच बताएँगे, सम्बल देने वाले उस पत्र को पढ़ते हुए क्या आपकी आँखें नहीं डबडबाई होंगी? कोई गरीब माँ अपने अमीर बेटे को पत्र लिखती होगी या लिखवाती होगी, तो पत्र पाते ही बेटा स्वयं को व्यस्त बताते हुए पत्नी के सामने खीझते हुए कुछ रुपए मनीऑर्डर करने के लिए कह देता होगा, पर रात को चुपचाप अकेले में माँ की अनगढ़ लिखावट को गीली आँखों से चूमते हुए उस बेटे को देखा है भला? उस समय पत्र की संवेदना सीधे माँ-बेटे के बीच होती है। उस वक्त माँ से दुलार पाता है बेटा। तब बेटे को लगता होगा कितना गरीब हूँ मैं, चाँदी के इन चंद सिक्कों के बीच और कितनी अमीर है, मेरी माँ, इन अनगढ़ अक्षरों के साथ। क्या आज ई-मेल, एसएमएस या चेटिंग के माध्यम से संवेदनाओं के तार इस तरह से जुड़ सकते हैं भला?
पत्र आत्मा की आवाज होते हैं, पत्र जीवन बदल देते हैं, पत्रों में केवल विचार ही नहीं होते, उसमें कोमल भावनाएँ भी होती हैं, जो संवेदनाओं के माध्यम से हमारे भीतर तक पहुँचती है। पत्र का एक-एक शब्द हमारे लिए मोती हो जाता है, जब वह किसी बेहद अपने का होता है। पत्र खोलते ही प्रेषक की जानी-पहचानी तस्वीर भी सामने आ जाती है। क्या एक जाने-अनजाने पत्र ने हमें तस्वीरों का चितेरा नहीं बना दिया? कई बार पत्र चुनौती देते से लगते हैं। उसका एक-एक शब्द हमें मुँह चिढ़ाता-सा लगता है। आवेश में हम उसे फाड़कर निकल भी पड़ते हैं, चुनौती को पूरा करने के लिए। शाम हताश हो कर लौटते हैं, देर रात चुपचाप पत्र के एक-एक टुकड़े को जोडऩे का प्रयास करते हैं, शब्दों की इबारत समझने की कोशिश करते हैं, पत्र में प्यार ढूँढ़ते हैं।
ऐसा केवल पत्रों में ही संभव है। पत्र में प्यार छुपा होता है, ममता की घनी छाँव होती है, माँ का दुलार होता है, पिता का आशीष, भैया का स्नेेह, दीदी का प्यार और छोटे भाई-बहनों की चंचलता भी छिपी होती है। रही बात प्रेयसी या प्रेमी के पत्रों की, तो उसमें छलकता है, प्यार-प्यार और केवल प्यार। क्या आप भी आना चाहेंगे पत्रों की इस प्यार भरी दुनिया में? तो आइए .. स्वागत है। तो उठाइए कलम और लिखें एक पाती प्यार भरी....
डॉ. महेश परिमल
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ललित निबंध
जीवन यात्रा जून 1957 से. भोपाल में रहने वाला, छत्तीसगढ़िया गुजराती. हिन्दी में एमए और भाषा विज्ञान में पीएच.डी. 1980 से पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ाव. अब तक देश भर के समाचार पत्रों में करीब 2000 समसामयिक आलेखों व ललित निबंधों का प्रकाशन. आकाशवाणी से 50 फ़ीचर का प्रसारण जिसमें कुछ पुरस्कृत भी. शालेय और विश्वविद्यालय स्तर पर लेखन और अध्यापन. धारावाहिक ‘चाचा चौधरी’ के लिए अंशकालीन पटकथा लेखन. हिन्दी गुजराती के अलावा छत्तीसगढ़ी, उड़िया, बँगला और पंजाबी भाषा का ज्ञान. संप्रति स्वतंत्र पत्रकार।
संपर्क:
डॉ. महेश परिमल, टी-3, 204 सागर लेक व्यू होम्स, वृंदावन नगर, अयोघ्या बायपास, भोपाल. 462022.
ईमेल -
parimalmahesh@gmail.com
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