सोमवार, 19 मार्च 2012

आखिर नरेंद्र कुमार की गलती क्या थी?

डॉ. महेश परिमल
हमारे बीच बहुत से ऐसे लोग थे, जो ईमानदार होने के बाद भी बेईमानी की मौत मर गए। बेईमानी का आशय यह है कि वे ईमानदार लोग बेईमानों के चक्रव्यूह में फँस गए। यही बेईमान लोग आज नेता के रूप में बड़े-बड़े पदों पर काबिज हैं। अवकाश के दिन एक जांबाज अफसर अपनी ड्यूटी निभाते हुए अपनी जान दे रहा है, तो दूसरी तरफ प्रदेश के नेता अपने बयानों से सियासत का खेल खेल रहे हो, तो फिर कैसे सहज बनेगी, प्रदेश की तस्वीर? इस पर यदि कांग्रेस नेता ये आरोप लगाएँ कि मध्यप्रदेश सरकार को माफिया चला रहे हैं, तो गलत क्या है? आज पूरा प्रदेश ही माफिया की चपेट में है। इन पर कार्रवाई सिर्फ इसलिए नहीं हो पाती,क्योंकि ये चुनाव के समय पार्टी को चंदे के रूप में मोटी रकम देते हैं। मानो चंदा देकर इन्होंने प्रदेश के नेताओं को भी अपना गुलाम बना लिया हो। वैसे सच्चई यही है कि कहीं भी कुछ गलत होता है, तो हमारे ये नेता तुरंत पहुँचकर उसी सही कर देते हैं। प्रदेश में फैले माफियाराज की जो तस्वीर अभी सामने आई है, वह बहुत ही भयानक है। यह तस्वीर यही बताती है कि अपना काम पूरी ईमानदारी से कभी मत करो। इन माफिया के हौसले इतने बुलंद है कि किसी की जान लेना इनके बाएँ हाथ का खेल है। सबसे बड़ी बात यह है कि इनके खिलाफ कोई ऐसा सख्त कानून ही नहीं है, जिससे ये खौफ खाएँ। आसान सा जुर्माना और आसान सी सजा। जो इनके लिए बहुत ही सामान्य है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसकी न्यायिक जाँच के आदेश दे दिए हैं। इसके पहले भी प्रदेश में कई घटनाओं की जाँच के लिए आदेश किए जा चुके हैं। यह तो मुख्यमंत्री को भी नहीं मालूम होगा कि कितने मामलों की जाँच हो चुकी है, रिपोर्ट भी आ चुकी है, पर किसी पर भी अमल नहीं किया गया। प्रदेश में एक के बाद एक कई घटनाएँ हो चुकी हैं, जिसमें माफिया का हाथ है, पर अभी तक कोई ऐसा शख्स पकड़ा नहीं गया, जिसे सजा हुई हो। प्रदेश में न्याय व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। हत्या की यह घटना मध्यप्रदेश सरकार के माथे का कलंक है। प्रदेश में लगातार ऐसा हो रहा है कि कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार अफसरों को प्रताड़ित और हतोत्साहित किया जा रहा है। होना तो यह था कि उन्हें संरक्षण दिया जाता, ताकि वे अपना काम और भी अधिक निष्ठा के साथ निभाते। पर ऐसा हुआ नहीं। सरकार अभी तक यह समझने को तैयार ही नहीं है कि ईमानदार अधिकारियों को कर्तव्यनिष्ठा में कितनी परेशानियाँ आती हैं। अवैध खनन में राज्य सरकार को करोड़ों का घाटा हो रहा है। पर इस दिशा में सरकार तो स्वयं आँखें बंद करके बैठी है, पर जो अफसर इस दिशा में सक्रिय होकर कुछ करना चाहते हैं, उन्हें सरेआम मार डाला जाता है। सरकार केवल जाँच का आदेश देकर खामोश हो जाती है। ईमानदार अफसरों को अपनी कर्तव्य परायणता का मोल चुकाना पड़ रहा है। कई अधिकारी इस मोल को चुका चुके हैं, पर सरकार ने इस दिशा में ऐसा कोई भी कड़ा कदम नहीं उठाया, जिससे माफिया के चेहरे पर शिकन भी आई हो।
माफिया प्रदेश में इसलिए बेखौफ है, क्योंकि उन्हें राजनैतिक संरक्षण प्राप्त है। कैसी विडम्बना है, जिन्हें संरक्षण मिलना चाहिए, वे मैदानों में पदस्थ हैं, अपनी जान की परवाह न कर वे कर्तव्यनिष्ठ रहकर देश के विकास में अपना योगदान देना चाहते हैं, पर सरकार उन्हें ऐसा नहीं करने देती। इससे उनका मनोबल ही टूट जाता है। बिना मनोबल के कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। माफिया के हाथ कानून से भी लंबे हैं। इसे साबित करती है, यह घटना। ऐसा नहीं है कि इसके पहले इस तरह की कोई घटना प्रदेश में नहीं हुई। हाल ही में इस तरह की कई घटनाएँ प्रदेश में हुई हैं। जिसकी केवल जाँच ही जारी है। मामला यदि फास्ट ट्रेक कोर्ट में जाए, तभी इस दिशा में कुछ ठोस कार्रवाई संभव हो पाएगी। अभी जो भी मामले हैं, वे सभी अदालत में हैं। कई मामलों में आरोपी जमानत पर रिहा भी हो चुके हैं। ऐसे में यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि सरकार इस दिशा में कोई ठोस कार्रवाई करेगी?
क्यों खौफ नहीं?
अवैध उत्खनन में सिर्फ प्रति वाहन जुर्माने का प्रावधान। सजा नहीं होती। इसलिए कार्रवाई के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ता। सिद्ध करना मुश्किल, क्योंकि ठेकेदार फर्जी रसीदें पेश कर देता है।  खनन में ठेकेदार किराए के ट्रैक्टर-ट्राली लगाते हैं। मामला बढऩे पर सारा आरोप ड्राइवर पर मढ़ देते हैं या ट्रैक्टर मालिक पर। खनिज अफसरों से सांठगांठ के कारण बड़ी कार्रवाई नहीं होती।  अधिकांश खनन ठेकेदार सीधे पार्टियों व नेताओं को चंदा देते हैं इसलिए भी उन पर कार्रवाई नहीं होती। एक दशक पहले तक सामान्य व्यक्ति भी खदानें ले लेते थे, पर अब दबंग लोग इस धंधे में आ गए हैं।  रॉयल्टी एक जगह की भरते हैं और उसकी आड़ में अन्य स्थानों का खनिज का अवैध परिवहन करते हैं। सरपंचों की दादागिरी इसमें सहायक है। किसी विभाग की कार्रवाई करने पर वे दबाव बनाते हैं। ठेकेदार को सरपंच और ग्राम पंचायतों द्वारा क्षेत्र विशेष में खुदाई के लिए कह देते हैं और जब राजस्व या खनिज विभाग कार्रवाई करता है तो उस पर दबाव बनाते हैं।
खनन माफियाओं का गणित
2007 में बानमोर के बटेश्वरा क्षेत्र में तत्कालीन कलेक्टर व एसपी पर फायरिंग की थी। 2010 में रिठौरा क्षेत्र में पत्थर माफिया ने वन विभाग के कर्मचारियों व अफसरों पर फायरिंग की थी। तब चार लोग घायल हुए थे। 2011 दिसंबर में सेलटैक्स बैरियर के पास शिवनगर में टास्कफोर्स पर फायरिंग की थी। 2012 जनवरी में भाजपा नेता ने अफसर से अवैध पत्थर से भरे दो ट्रैक्टर लूट लिए थे।
.तो अधिकारी चढ़ जाता अवैध उत्खनन की भेंट
फर्शी पत्थर की खदानों से लबरेज मालथौन तहसील के गांव अटा में खनिज माफियाओं का वर्चस्व है। माफिया सागर, ललितपुर, झांसी नेशनल हाइवे को भी क्षति पहुंचाने लगे। तत्कालीन मालथौन थाना प्रभारी (वर्तमान में मुलताई में पदस्थ) मदन मोहन को सितंबर 2010 में एक ट्रक से अवैध पत्थर के परिवहन की सूचना मिली। वे ट्रक का पीछा करते हुए उप्र जिले के नाराहट सीमा में प्रवेश कर गए। बकौल मदन मोहन कई बार ट्रक चालक ने उन्हें कुचलने का प्रयास किया। यदि ओवरटेक करते तो जान भी जा सकती थी। अंतत: चालक भागने में सफल हो गया।
सच्चई यह है.
-खदान माफिया पालते हैं डकैतों को  ग्वालियर-चंबल संभाग में खदान माफिया ही डकैतों के रहने-खाने का इंतजाम करते हैं।
- खदान माफिया पुलिस और वन विभाग को अवैध कारोबार से दूर रखने के लिए करता है व्यवस्था।
- डकैत वैध खदान वालों से रंगदारी टैक्स वसूलते हैं, जबकि खदान माफिया खुद ही रसद पहुंचाते हैं।
 - जंगल में मिलने वाले संसाधनों की वजह से डकैत पनपते हैं।
 - राजेंद्र करई वाला और कल्ली गुर्जर गैंग भी अवैध खदानों से पैसा वसूल रहे हैं।
 - प्रमुख डकैत गिरोहों के खत्म होने के बाद ही सामने आई अवैध खनन की घटनाएं।
हत्या पर सियासत
  आईपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हो पाई है कि उनकी हत्या को लेकर मध्य प्रदेश में सियासत शुरू हो गई है। सत्ताधारी दल भाजपा उनकी हत्या को महज एक हादसा करार देने में जुटी है तो वहीं विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार को घेरने की तैयारी कर ली है, जबकि दूसरी ओर उनके हत्यारे अभी भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। हत्या में भाजपा विधायक पर शक:-नरेंद्र के घरवालों का आरोप है कि उनकी हत्या एक साजिश के तहत की गई है। उनके पिता केशव ने इसके पीछे एक भाजपा विधायक पर शक जताया है। उन्होंने कहा कि कुछ समय पहले उस विधायक के दबाव में ही उनकी बहु का तबादला किया गया था। 32 वर्षीय नरेंद्र कुमार 2009 बैच के आईपीएस अधिकारी थे, उनकी पत्नी आईएएस अधिकारी हैं।  पूर्व भाजपा विधायक समेत 8 पर मामला दर्ज:-पुलिस पार्टी ने जब अवैध रुप से बेची जा रही शराब की बिRी को रोकने का प्रयास किया तो वहां मौजूद शराब माफिया ने उन पर पत्थरों एवं लाठियों से हमला कर दिया। पुलिस पार्टी को वहां से बेरंग वापस लौटना पड़ा। पुलिस ने पूर्व भाजपा विधायक नरेन्द्र सिंह सहित उनके आठ समर्थकों के खिलाफ नामजद एवं लगभग डेढ़ दर्जन अज्ञात आरोपियों के खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा पहुंचाने का मामला दर्ज कर लिया है लेकिन अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
इन हालात में यह सोचा जा सकता है कि सरकार कितनी विवश है इन माफियाओं के सामने। एक तरह से सरकार नतमस्तक है। सरकार में इच्छा शक्ति का पूरी तरह से अभाव है। सरकार की इसी कमजोरी के कारण ही माफिया सर उठा रहे है। पुलिस बल पर हमला करना अब प्रदेश में आम बात है। पुलिस भी अब अपनी ड्यृटी छोड़कर कुछ ऐसे काम करने लगी है, जिससे उनकी आवक हो और उन्हें संरक्षण भी प्राप्त हो। कर्तव्यनिष्ठ साथियों का हश्र वह अपनी आँखों से देख रही है। ऐसे में कानून-व्यवस्था का लचर होना स्वाभाविक है।
              डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

बजट पर मुश्किल में हताश सरकार





हरिभूमि के संपादकीय पेज पर आज पेश होने वाले बजट पर मेरा आलेख
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बुधवार, 14 मार्च 2012

दैनिक जागरण और नवभारत में प्रकाशित आलेख

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण मे प्रकाशित मेरा आलेख
 http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-03-14&pageno=9







नवभारत रायपुर बिलासपुर में प्रकाशित मेरा आलेख 

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मंगलवार, 13 मार्च 2012

रेलवे बजट: सरकार पसोपेश में

हरिभूमि के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित  मेरा आलेख
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सोमवार, 12 मार्च 2012

गांधी जी की दांडी यात्रा

हमारी आजादी के इतिहास का सबसे उज्जवल प्रकरण मेें 'दांडीयात्राÓ को लिया जा सकता है। पूर्ण स्वराज्य के संकल्प को साकार बनाने गांधीजी ने नमक कानून भंग करने के लिए 241 मील पदयात्रा का विचार किया और इस संबंध में जो भी आयोजन किया गया, वह किसी भी आंदोलन के लिए एक मील का पत्थर है। इसीलिए हर वर्ष इस घटना की याद को ताजा करने के लिए लोग दांडीयात्रा का आयोजन करते हैं।
गुजरात के मंच पर इस ऐतिहासिक घटना ने आकार लिया। जिससे हमारी अनेक पीढिय़ाँ गर्व से इसका स्मरण करेंगी। सरदार वल्लभभाई पटेल जब इस यात्रा की पूर्व तैयारी के साथ भरुच में युद्ध का शंखनाद करते हैं, तो कहते हैं कि ''संसार ने कभी नहीं देखा होगा, ऐसा युद्ध अब होने वाला है.... गुजराती यानी व्यापार कर जीने वाले.... इन्होंने कभी अपने हाथों में हथियार नहीं उठाए, युद्धक्षेत्र देखा नहीं....यदि मृत्यु की चिंता हो, तो उसका जीवन बेकार है। इस शुभ क्षणों में जन्म हुआ है..... अवसर मिला है, तो उसका स्वागत करो, अब तो दीये में जिस तरह पतंगे गिरते हैंं, उसी तरह लड़ाई में कूद जाना है। तभी तो लोग जानेंगे कि महात्मा गांधी ने 15 साल यूँ ही नहीं बिताए हैं..... साबरमती के संत को किसी ने जाना हो, तो यह सभी बातें बिलकुल आसान हैं ... इसे अपना धर्म समझ लेना। देश से लोग जितनी अपेक्षा रखेंगे, उससे कहीं अधिक अपेक्षा लोग गुजरात से रखेंगे।इसके पहले वाइसरॉय लॉर्ड इरविन को गांधीजी ने लिखा ही था कि ''मैं जानता हूँ कि अहिंसा की लड़ाई लडऩे में मैं मूर्खतापूर्ण खतरा उठा रहा हँ! पर गंभीर खतरों के बिना सत्य की विजय संभव ही नहीं है।ÓÓ
1922 में गांधीजी को राजद्रोह के आरोप में 6 वर्ष की सजा हुई तब ब्रिटिश संसद में लॉर्ड बर्कनहेड ने शेखी बघारते हुए कहा था कि ''गांधीजी की गिरफ्तारी से भारत में कहीं भी विरोध का स्वर सुनाई नहीं दिया और हमारा काफिला सुखपूर्वक आगे ही बढ़ रहा है। वल्लभभाई पटेल की इच्छा थी कि 1930 में हुई गांधीजी की गिरफ्तारी के विरोध में जनता उसका मुँहतोड़ जवाब दे। सत्याग्रहियों से जेल भर जाए। टैक्स के भुगतान के बिना शासन की कार्यप्रणाली ठप्प हो जाए। इस संबंध में जब उन्होंने खेड़ा जिले के रास ग्राम में लोगों के आग्रह पर भाषण करना शुरू किया, तो पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। 9 मार्च 1930 को रविवार का अवकाश होने के बाद भी मजिस्ट्रेट ने अदालत खुली रखकर सरदार पटेल को 3 माह की सजा सुनाई। साबरमती जेल जाते हुए गांधीजी के दर्शन कर उनका आशीर्वाद लिया।
9 मार्च 1930 को गांधीजी ने लिखा कि ''इसमें संदेह नहीं कि यदि गुजरात पहल करता है, तो पूरा भारत जाग उठेगा।ÓÓ इसलिए दस मार्च को अहमदाबाद में 75 हजार शहरियों ने मिलकर सरदार पटेल को हुई सजा के विरोध में लडऩे की प्रतिज्ञा की। 11 मार्च को गांधीजी ने अपना वसीयतनामा कर अपनी इच्छा जताई कि आंदोलन लगातार चलता रहे, इसके लिए सत्याग्रह की अखंड धारा बहती रहनी चाहिए, कानून भले ही भंग हो, पर शांति रहे। लोग स्वयं ही नेता की जवाबदारी निभाएँ।
11 मार्च की शाम की प्रार्थना नदी किनारे रेत पर हुई, उस समय गांधीजी के मुख से यह उद्गार निकले ''मेरा जन्म ब्रिटिश साम्राज्य का नाश करने के लिए ही हुआ है। मैं कौवे की मौत मरुँ या कुत्ते की मौत, पर स्वराज्य लिए बिना आश्रम में पैर नहीं रखूँगा।
दांडी यात्रा की तैयारी देखने के लिए देश-विदेश के पत्रकार, फोटोग्राफर अहमदाबाद आए थे। आजादी के आंदोलन की यह महत्वपूर्ण घटना ''वाइज ऑफ अमेरिका के माध्यम से इस तरह प्रस्तुत की गई कि आज भी उस समय के दृश्य, उसकी गंभीरता और जोश का प्रभाव देखा जा सकता है।
अहमदाबाद में एकजुट हुए लोगों में यह भय व्याप्त था कि 11-12 की दरम्यानी रात में गांधीजी को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। गांधीजी की जय और वंदे मातरम् के जयघोष के साथ लोगों के बीच गांधीजी ने रात बिताई और सुबह चार बजे उठकर सामान्य दिन की भाँति दिनचर्या पूर्ण कर प्रार्थना के लिए चल पड़े।
भारी भीड़ के बीच पंडित खरे जी ने अपने कोमल कंठ से यह गीत गाया :-
''शूर संग्राम को देख भागे नहीं,
देख भागे सोई शूर नाहीं
प्रार्थना पूरी करने के बाद जब सभी लोग यात्रा की तैयारी कर रहे थे, इस बीच अपने कमरे में जाकर गांधीजी ने थोड़ी देर के लिए एक झपकी भी ले ली। लोगों का सैलाब आश्रम की ओर आ रहा था। तब सभी को शांत और एकचित्त करने के लिए खरे जी ने ''रघुपति राघव राजारामÓÓ की धुन गवाई। साथ ही उन्होंने भक्त कवि प्रीतम का गीत बुलंद आवाज में गाया:-
ईश्वर का मार्ग है वीरों का
नहीं कायर का कोई काम
पहले-पहल मस्तक देकर
लेना उनका नाम
किनारे खड़े होकर तमाशा देखे
उसके हाथ कुछ न आए
महा पद पाया वह जाँबाज
छोड़ा जिसने मन का मैल।
अहमदाबाद के क्षितिज में मंगलप्रभात हुआ, भारत की गुलामी की जंजीरें तोडऩे के लिए भागीरथ प्रयत्न शुरू हुए। 12 मार्च को सुबह 6.20 पर वयोवृद्ध 61 वर्षीय महात्मा गांधी के नेतृत्व में 78 सत्याग्रहियों ने जब यात्रा शुरू की, तब किसी को बुद्ध के वैराग्य की, तो किसी को गोकुल छोड़कर जाते हुए कृष्ण की, तो किसी को मक्का से मदीना जाते हुए पैगम्बर की याद आई। गांधीजी के तेेजस्वी और स्फूतर््िामय व्यक्तित्व के दर्शन मात्र से स्वतंत्रता के स्वर्ग की अनुभूति करते लाखों लोगों की कतारों के बीच दृढ़ और तेज गति से कदम बढ़ाते गांधीजी और 78 सत्याग्रहियों का दल अन्याय, शोषण और कुशासन को दूर करने, मानवजाति को एक नया शस्त्र, एक अलग ही तरह की ऊर्जा और अमिट आशा दे रहा था।
गांधीजी ने यात्रा के लिए और जेल जाने के लिए अलग-अलग दो थैले तैयार किए थे, जो उनकी यात्रा की तस्वीरों में देखे जा सकते हैं, क्योंकि समग्र यात्रा के दौरान कब जेल जाना पड़ जाए, यह तय नहीं था। 16 मार्च को गांधीजी ने नवजीवन में लिखा  ''ब्रिटिश शासन ने सयानापन दिखाया, एक भी सिपाही मुझे देखने को नहीं मिला। जहाँ लोग उत्सव मनाने आए हों, वहाँ सिपाही का क्या काम? सिपाही क्या करे? पूर्ण स्वराज्य यदि हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, तो हमें यह अधिकार प्राप्त करने में कितना समय लगना चाहिए? 30 कोटि मनुष्य जब स्वतंत्रता प्राप्ति का संकल्प करंे, तो वह उसे मिलती ही है।  12 मार्च की सुबह का वह दृश्य उसी संकल्प का एक सुहाना रूप था। नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा कि ''महात्मा जी के त्याग और देशप्रेम को हम सभी जानते ही हैं, पर इस यात्रा के द्वारा हम उन्हें एक योग्य और सफल रणनीतिकार के रूप में पहचानेंगे। गजब का आत्मविश्वास, लोकजागृति, अद्भुत धैर्य, सहनशीलता, शांत प्रतिकार के प्रतीक समान यह दांडी यात्रा 77 वर्ष बाद भी कौतुहल और प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। मानवजाति के इतिहास का यह एक अनोखा स्वर्ण पर्व गुजरात की यश गाथा का मोर पंख है।

(पी के लहरी की किताब स्‍वराज्‍य ना गांधी से साभार)

शनिवार, 10 मार्च 2012

दैनिक जागरण और हरिभूमि पर प्रकाशित मेरे दो आलेख

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख       


लिंक http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-03-10&pageno=7#id=111735159132863076_49_2012-03-10
http://74.127.61.178/haribhumi/epapermain.aspx


शुक्रवार, 9 मार्च 2012

मेट्रोपोलिटन परिवार का एक अनोखा सदस्य: सुब्रमण्यम स्वामी


डॉ. महेश परिमल
देश का अब तक का सबसे बड़ा 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला हमारे सामने न आया होता, यदि इसके पीछे सुब्रमण्यम स्वामी न पड़े होते। यही स्वामी हैं, जिन्होंने वाजपेयी सरकार गिराई थी, आज वही मनमोहन सरकार को गिराने में लगे हैं।  गृह मंत्री पी. चिदंबरम के खिलाफ वे सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। निचली अदालत ने 2जी मामले में चिदंबरम को क्लीन चिट दे दी थी। स्वामी ने इसी को चुनौती दी है। स्वामी ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि 2जी घोटाले में चिदंबरम की भूमिका को देखते हुए उन्हें भी आरोपी बनाया जाए। उन्होंने कहा है कि तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा के बराबर ही चिदंबरम भी गुनहगार हैं। चिदंबरम उस समय वित्तमंत्री थे। स्वामी के अनुसार स्पेक्ट्रम की कीमतें तय करने में तत्कालीन वित्त मंत्री ने अहम भूमिका निभाई थी। दूरसंचार कंपनियों को अपनी हिस्सेदारी विदेशी फमोर्ं के हवाले करने की इजाजत देने में भी उनकी भूमिका थी। उन्होंने कहा कि चिदंबरम को आरोपी बनाए जाने के लिए निचली अदालत को कुछ सबूत सौंपे गए थे। वे अपने आप में पर्याप्त थे। तत्कालीन वित्तमंत्री चिदंबरम ने भ्रष्टाचाररोधी कानून और अन्य कानूनों के तहत अपराध किया है। स्वामी की याचिका इस साल चार फरवरी को विशेष सीबीआई अदालत ने खारिज कर दी थी।
आज जनता के सामने सुब्रमण्यम स्वामी प्रजा के सामने हीरो हों। भ्रष्टाचार को लेकर उनके द्वारा चलाए गए अभियान पर वे शहर-दर-शहर प्रवचन के लिए जा रहे हैं। गृह मंत्री चिदम्बरम के बाद अब उनके निशाने पर गांधी परिवार के दामाद राबर्ट बढेरा भी आ गए हैं। इसके पहले वे राहुल गांधी को बुद्धू भी कह चुके हैं। पर बहुत कम लोग जानते हैं कि जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी एक मेट्रोपोलिटन परिवार के सदस्य हैं। उनका  साला यहूदी, दामाद मुस्लिम, जीजा ईसाई और उनकी पत्नी पारसी है। उनकी माँ पद्मावती सुब्रमण्यम और पिता सीताराम सुब्रमण्यम दोनों ही आरएसएस के विचारों से प्रभावित हैं। जो कांग्रेसी स्वामी का पक्ष लेते हैं, उन्हें कांग्रेस विरोधी कहा जाता है। भाजपा में उनका नाम गर्व से लिया जाता है। आज सभी राजनैतिक दल उनसे दूर भाग रहे हैं। लेकिन जब उनका लाभ लेना होता है, तो सभी दल उनके करीब भी आ जाते हैं। उनका स्वभाव बड़ा गुम्फित है। उनके साथ यह कहावत प्रचलित है कि जिसके साथ वे बैठते हैं, धोखा उसे ही देते हैं। मजे की बात यह है कि जनसंघ की तरफ से ये राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ सुब्रमण्यम स्वामी ने जिस तरह से अभियान चलाया है, उससे ऐसा लगता है कि हर राज्य में एक सुब्रमण्यम स्वामी होना ही चाहिए। पर वह आज के सुब्रमण्यम स्वामी की तरह कदापि नहीं होना चाहिए। क्योंकि इन्हीं पर आरोप है कि इन्होंने दो बार केंद्रीय सरकार को गिराया है। तीन बार लोकसभा चुनाव जीतने वाले 72 वर्षीय  श्री स्वामी अभी भी ऊर्जावान हैं। चिदम्बरम के खिलाफ वे सुप्रीमकोर्ट का दरवाजा खटखटाएँगे। हाल ही में हुए फ्रांस की डेसल्ट कंपनी को मिले 11 अरब डॉलर के फाइटर विमान के सौदे में भी स्वामी इटेलियन कनेक्शन देख रहे हैं। स्वामी की इन्हीं आदतों के कारण कोई भी उनसे अपना मेल-जोल नहीं बढ़ाना चाहता। वैसे देखा जाए, तो सुब्रमण्यम स्वामी देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गांधी से भी अधिक लोकप्रिय हैं। इसकी वजह यही है कि उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अलख जगाई, उसी को अन्ना हजारे ने आगे बढ़ाया।
2 जी स्पेक्ट्रम कांड के पीछे जिस तरह से सुब्रमण्यम स्वामी पड़े,उससे यूपीए सरकार की नींद ही हराम हो गई। स्वामी की कोशिशें रंग लाई और देश का सबसे बड़ा घोटाला सामने आया। स्वामी के कारण केंद्र सरकार के दो विकेट गिर गए। एक विकेट बमुश्किल से बच पाया। उन दो विकेटों में एक तो ए राजा और दूसरा कनिमोई का समावेश होता है। बमुश्किल बचे चिदम्बरम के लिए स्वामी आज भी आँख की किरकिरी बने हुए हैं। जिस तरह से आज अन्ना हजारे के प्रशंसकों से अधिक उनके दुश्मनों की संख्या अधिक है। ठीक इसी तरह स्वामी के प्रशंसकों से अधिक उनके दुश्मन हैं। राजनीति में उन्होंने कई लोगों को पटखनी दी है। स्वामी और जयललिता की दोस्ती बरसों पुरानी है। इतिहास बताता है कि एक बार उन्होंने जयललिता की मुलाकात सोनिया गांधी से करवाई थी। इस मुलाकात के बाद वाजपेयी की 13 माह पुरानी सरकार औंधे मुँह गिर गई थी। आज सुब्रमण्यम स्वामी भाजपा के साथ खड़े दिखाई देते हैँ। भाजपा उनका सम्मान कर रही हो। पर इन्हीं स्वामी ने अटल बिहारी वाजपेयी के कुँवारेपन पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए उन्हें पियक्कड़ कहा था। कर्नाटक की राजनीति से रामकृष्ण हेगड़े का नामोनिशान खत्म करने में इन्हीं स्वामी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यही स्वमी चंद्रास्वामी के करीबी लोगों में से थे। नरसिम्हा राव के केबिनेट में स्वामी का समावेश चंद्रास्वामी के कहने पर ही हुआ था। युवातुर्कऔर जनता पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर ने स्वामी को 1970 में उन्हें पाटी्र से निकाल दिया था, पर बाद में स्वामी ने उन्हें मना भी लिया।
स्वामी का स्वीाव ही ऐसा है कि वे अपनी विशेष चुटीली टिप्पणियों से लोगों का मजाक उड़ाते रहते हैं। कई बार वे अतिशयोक्ति भी कर जाते हैं। उन्होंने ने ही 1999 में कहा था कि एक बार सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का ऑफर दिया था। पर उन्होंने इंकार कर दिया। बोलने में आक्रामक और स्वभाव से हँसमुख स्वामी अपने भाषण में छोटी-छोटी फुलझड़ियों से लोगों को गुदगुदाते हैं। हाल ही में उन्होंने अपने एक लेक्चर में कहा था कि तिहाड़ जेल के रसोइयों की यह शिकायत कर रहे हैं कि स्वामी केवल दक्षिण भारतीय को ही हमारे यहाँ भेजते हैं, इसलिए हमें केवल इडली-साँभर ही बनाने का ऑर्डर मिलता है। मैंने उन्हें कह दिया है कि वे अब इटेलियन फूड बनाना सीख लें, बहुत ही जल्द उन्हें इसके भी ऑर्डर मिलने लगेंगे। स्वामी भले ही वन मेन शो हों, पर इससे कोई इंकार नहीं कर सकता है कि उनकी चाहत केवल प्रधानमंत्री पद पाने की ही है। देखना यह है कि इसमें वे कहाँ तक सफल हो पाते हैं?
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 8 मार्च 2012

डीजल चलित वाहनों पर पेनाल्‍टी टैक्‍स लगेगा









नवभारत रायपुर बिलासपुर में प्रकाशित मेरा आलेख
लिंक

http://www.navabharat.org/Pagehtml/080312p4.html

शनिवार, 3 मार्च 2012

ई कचरे के खतरे





आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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शुक्रवार, 2 मार्च 2012

पानी पर सुप्रीमकोर्ट का फैसला

आज हरिभूमि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख   




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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

देश में कई हैं छोटे-छोटे औरंगाबाद!


डॉ. महेश परिमल
भारत एक गरीब देश है, यह बात अब सच दिखाई नहीं देती। पर यह भी सच है कि भारत देश में गरीब लोग रहते हैं। हर देश की तरह हमारे देश में गरीबों की संख्या अमीरों से बहुत अधिक है। पर अमीर इस तरह से समाज में छा गए हैं कि उन्हें न तो गरीब दिखाई देते हैं और न ही गरीबी। इंडिया और भारत की विभाजन रेखा यहीं से शुरू होती है। हाल ही में यह पता चला कि औरंगाबाद में 151 मर्सीडीज कारों का ऑर्डर मिला है। यूं तो बेशकीमती गाड़ियों के शो रूम केवल मेट्रोपोलिटन सिटी में ही होते हैं। जैसे दिल्ली, मुम्बई, बेंगलोर आदि में, पर अब औरंगाबाद जैसे विकसित शहर में भी इस तरह के शो-रूम दिखाई देने लगे हैं। इस तरह से देश में कई और औरंगाबाद हो गए हैं। इन लक्जरी गाड़ियों के कारण छोटे-छोटे शहरों से भी बड़ी गाड़ियों की माँग बढ़ने लगी है।
देश में अमीरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 24 करोड़ की सम्पत्ति के मालिकों की संख्या अगले दो साल के अंदर तीेगुनी होने वाली है। लक्जरी और ब्रांडेड चीजों का क्रेज लगातार बढ़ रहा है। अब मध्यमवर्गीय परिवार भी मारुति कार खरीदने की कूब्बत रखता है। देश में एक करोड़ मारुति कार है, इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में अमीरों की संख्या कितनी तेजी से बढ़ रही है। देश में केवल मारुति ही नहीं, बल्कि अन्य कारों के मॉडलों की बिक्री लगातार बढ़ रही है। देश में फरारी, पोत्र्श, बीएमडब्ल्यू आदि कारों की बिक्री बेतहाशा बढ़ी है। उच्च मध्यमवर्ग और धनकुबेरों में लक्जरी कार खरीदने का क्रेज बढ़ा है। महँगाई की मार से भले ही आम आदमी कराहता हो, पर जिस तरह से लक्जरी चीजों का बाजार फैल रहा है, इससे लगता है कि इसी विरोधाभास के कारण समाज दो भागों में विभाजित हो गया है। इसमें से एक वर्ग ऐसा है, जो केवल सौ रुपए के बूट पहनता है, दूसरा वगअपने बूट के लिए दस हजार रुपए खर्च कर सकता है।
देश में समृद्धि बढ़ने के साथ-साथ लक्जरी चीजों की खरीदी में भी वृद्धि हुई है। इंटरनेशनल ब्रांडेड आइटमों को खरीदने में लोग अधिक रुचि लेने लगे हैं। ये केवल बड़े शहरों की ही बात नहीं है, छोटे शहरों में भी इस तरह की चीजों की माँग बढ़ने लगी है। इसमें विशेष रूप से यंग जनरेशन में इस तरह की चीजों के प्रति विशेष रूप से आकर्षित है। हाल का सर्वेक्षण बताता है कि भारत की औसतन आय 50 हजार रुपए है। एक तरफ देश में रिटेल क्षेत्र में एफडीआई पर संसद की मंजूरी नहीं मिली है। यह विवाद जारी है। दूसरी तरफ ब्रांडेड आइटम्स के लिए लोग मुँहमाँगा दाम देने को तैयार हैं। रिटेल क्षेत्र में एफडीआई को लेकर यह कहा जा रहा था कि इससे स्थानीय स्तर के छोटे व्यापारियों को नुकसान होगा, पर लक्जरी आइटम खरीदने के लिए और उसके सेंटर की स्थापना करने की स्पर्धा जारी है। जो नए-नए करोड़पति हुए हैं, उनमें ब्रांडेड चीजों के प्रति विशेष लगाव देखा जा रहा है। ऐसे बाजार को इन्हीं लोगों से प्रोत्साहन मिला है। एक अंदाज के अनुसार भारत में लक्जरी मार्केट हर साल 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। 2012 में इस मार्केट ने 8 अरब डॉलर को छू देगा, ऐसा विश्वास किया जा रहा है। देश में ब्रांडेड आइटम्स की चीजों का बाजार पिछले 5 वर्ष में अधिक बढ़ा है। युवाओं में ही इस तरह की चीजों का रुझान बढ़ा है। वे भी ब्रांडेड चीजों को खरीदने का आग्रह रखते हैं।
देश में लक्जरी चीजों की खूब बिक्री हो रही है। पिछले 5 महीनों में 20 फरारी, एक वर्ष में 300 पोत्र्श और 151 मर्सीडीज गाड़ियों की बिक्री हुई है। प्राइवेट लक्जरी प्लेन भी हमें आकाशीय मार्ग में देखने को मिल जाएँगे। केवल कानपुर जैसे शहर में ही दस पोत्र्श गाड़ियों की खरीदी हुई है। अब ब्रांडेड चीजों के शो रूम मुम्बई, दिल्ली और बेंगलोर ही हो, ऐसी बात नहीं है। अब तो छोटे शहर भी इसमें शामिल होने लगे हैं। औरंगाबाद में एक व्यापारी ने अपने मित्रों के साथ एक वर्ष पहले 151 मर्सीडीज बेंज का ऑर्डर दिया, तो सभी को आश्चर्य हुआ। आजकल लक्जरी चीजों के खरीदने वाले बड़े शहरों में ही नहीं होते। महँगी चीजें खरीदने वाले 50 प्रतिशत लोग छोटे शहरों में ही रहते हैं। देश में छोटे-छोटे औरंगाबाद बनने लगे हैं। ऐसे ही एक छोटे शहर के बड़े उद्योगपति के पास महँगी कारों का काफिला है। वे सोमवार से रविवार तब अलग-अलग गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं। उनके काफिले में पोत्र्श, मर्सीडीस, एस एंड सी क्लास, ओडी आदि का समावेश होता है। कार के ऐसे शौकीन अहमदाबाद और लुधियाना जैसे शहरों में भी रहते हैं।
यहाँ केवल लक्जरी कारों की ही बात नहीं की जा रही है। घड़ी से लेकर शूज तक और बाइक से लेकर आधुनिक सुविधाओं से युक्त चीजों का समावेश किया जा रहा है। ईश्वर की मूर्ति से लेर बूट-चप्पल तक की खरीदी के लिए लोग ऊँची रकम देने में नहीं हिचकते। एक बार चीज भा गई, फिर उसे खरीदने का जो जुनून आज दिखाई देता है, वह पहले दिखाई नहीं देता था। इसी जुनून के कारण लक्जरी आइटम का बाजार दिनों-दिन प्रगति कर रहा है। हमारे यहाँ एक बंगला बने न्यारा का सपना हर कोई देखता है, पर पुणो, बेंगलोर, हैदराबाद, दिल्ली जैसे शहरों में अब महल जैसे बंगले बन रहे हैं और उसे खरीदने के लिए लोगों की लाइन लगती है। यही स्थिति होटल उद्योग की है। इसी तरह घड़ी, वोल पेपर, टेबल लैम्प आदि चीजों के भी इंटरनेशनल ब्रांड हैं। इन चीजों का एक विशेष वर्ग है। इंटरनेशनल ब्रांड में बेलेंसीगा (चश्मा), लोजीनीस (वॉच), लाड्रो (हेप्पीनेसपीस), चेनली (व्हाइज नवाज कलेक्शन), क्रिश्चयन लोबुटीन (लेग्ज सेंडल), बरबेरी (बूट) आदि का समावेश होता है। एक अंदाज के मुताबिक देश में 25 करोड़ की सम्पत्ति के मालिकों की संख्या 2014 तक तीगुनी हो जाएगी। जो यह बताता है कि देश में लक्जरी मार्केट का बाजार बहुत ही तेजी से बढ़ेगा। इंटरनेशनल लक्जरी ब्रांड की एफडीआई 51 प्रतिशत होने के कारण इंटरनेशनल ब्रांड के लिए ग्राहक को देश से बाहर नहीं जाना पड़ता। एक तरपु बेल्ट, वोलेट, परफ्यूम, बेग्स, वॉच आदि की माँग है, तो ढाई लाख से साढ़े चार लाख रुपए की पेन की भी माँग है। इसके चलते यह कहा जा सकता है कि हमारा देश अब कतई गरीब नहीं रहा। लोगों के पास धन अथाह है, जो अपनी गति से आ रहा है। यह धन कब, कहाँ, कैसे, किस तरह से लोगों तक पहँुच रहा है, यह भले ही शोध का विषय हो, पर यह सच है कि हमारे देश में आज एक आफिस का चपरासी भी दस करोड़ और एक क्लर्क 40 करोड़ की सम्पत्ति का मालिक होता है।
 डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

नदी जोड़ो सुस्‍ती पर सुप्रीमकोर्ट की तल्‍खी

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

जिंदगी में सारा खेल विश्‍वास का है

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

आखिर किंगफिशर पर इतनी मेहरबानी क्यों?

डॉ. महेश परिमल
किंगफिशर एयरलाइंस लगातार बदनाम होती जा रही है। बिना बताए उसकी कई उड़ानें लगातार रद्द होती जा रही हैं। लोग परेशान हैं, यही नहीं उसके कई पायलट भी इस अव्यवस्था से परेशान होकर इस्तीफा दे चुके हैं। सभी जानते हैं कि यह एयरलाइंस कंपनी का दिवाला निकलने वाला है, फिर भी इसे अनजानी सहायता मिल ही रही है। इसमें भले ही सरकार प्रत्यक्ष रूप से न जुड़ी हो, नागरिक उड्डयन मंत्री अजित सिंह का बयान भी आ गया हो, पर जिस तरह से विजय माल्या व्यवहार कर रहे हैं, इससे लगता है कि किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं से सरकार का उन पर वरदहस्त है। आखिर कुछ तो बात होगी, जिसके कारण किंगफिशर के 464 करोड़ रुपए के शेयर 750 करोड़ रुपए में राष्ट्रीयकृत बंकों ने खरीदे। इससे एयर लाइंस को तो लाभ ही हुआ, पर निवेशकों को हानि उठानी पड़ी।
किंगफिशर की माली हालत दिनों-दिन खराब होती जा रही है, इसे सभी जानते हैं, इसके बाद भी उद्योगपति विजय माल्या की बिगड़ी हुई संतान की तरह यह कंपनी करदाताओं के धन से ऐश करती रही, यह बहुत कम लोगों का पता है। कोई भी यात्री जब किंगफिशर में यात्रा करता है, तो उससे टिकट के उपरांत भी सर्विस टैक्स के नाम पर कुछ और राशि वसूल की जाती है। इस सर्विस टैक्स को उन्हें सरकारी तिजोरी में डालना चाहिए, पर कंपनी ऐसा नहीं करती। इस राशि को अनाप-शनाप रूप से खर्च कर दिया जाता था। इस बात की जानकारी जब सर्विस टैक्स विभाग को मिली, तब उन्होंने किंगफिशर के बैंक के सारे खातों को सील कर दिया। इस कारण कंपनी अपने पायलटों को वेतन नहीं दे पाई। इसलिए कई पायलट नौकरी छोड़कर जाने लगे। इस कारण किंगफिशर की कई उड़ानें रद्द करनी पड़ी, यह सिलसिला लगातार अब भी जारी है। हालत यह है कि ¨कंगफिशर में हजारों यात्रियों ने पहले से ही धन जमा करके अपनी सीट बुक करवा ली है, वे अब परेशान हैं। पिछले साल नवम्बर से ही यह जानकारी मिलने लगी थी कि किेंगफिशर की देनदारियाँ लगातार बढ़ रहीं हैं। इसके बाद भी किंगफिशर के मालिक विजय माल्या ने किसी तरह से तिकड़म करके एयरलाइंस को चलाए रखा। लेकिन अब लगता है कि वे भी इससे आजिज आ चुके हैं। किंगफिशर अब अपनी अंतिम साँसें ले रहा है।
आज की स्थिति में किंगफिशर देश के विभिन्न शहरों में रोज करीब 240 फ्लाइट चला रहा है। रविवार को उसकी 80 फ्लाइट रद्द हो गई थी, उसके बाद करीब 40 फ्लाइट रोज ही रद्द हो रही है। केंद्र के नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने जब किंगफिशर को एयरलाइंस का लायसेंस दिया, तब यह शर्त रखी थी कि सरकार की अनुमति के बिना वह एक फ्लाइट भी रद्द नहीं कर सकती। अब उसकी फ्लाइट लगातार रद्द हो रही है, लेकिन इसकी जानकारी न तो सरकार को है और न ही यात्रियों को। उधर आइल कंपनियों ने किंगफिशर को फ्यूल देना बंद कर दिया, दूसरी ओर पायलट भी लगातार इस्तीफा देते जा रहे हैं। इसके बाद भी किंगफिशर पर सरकार ने अभी तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं की है। इसकी जगह कोई दूसरी एयरलाइंस होती, तो उस पर कई बार कार्रवाई हो चुकी होती। इस समय किंगफिशर की देनदारी कुल 7 हजार करोड़ रुपए की है। इसमें से 1400 करोड़ रुपए माफ करने की खबर है। पिछले साल इसी तरह किंगफिशर ने 1027 करोड़ रुपए का नुकसान किया था। सन 2003 में जब इस एयरलाइंस की स्थापना की गई थी, तब से अब तक कंपनी ने कुल 5690 करोड़ रुपए का नुकसान किया है। इसके बजाए कोई दूसरी कंपनी होती, तो वह कब की बंद हो गई होती।
किंगफिशर ने आइल कंपनियों से 890 करोड़ रुपए का ईंधन खरीदा है। पर उसका भुगतान नहीं किया है। इस कारण बीपीसीएल और एचपीसीएल नामक कंपनियों ने किंगफिशर को ईंधन देना ही बंद कर दिया। अभी इंडियन आइल कंपनी किंगफिशर को धन प्राप्त करने के बाद ही ईंधन दे रही है। बीपीसीएल ने ईंधन की राशि चुकाने के लिए किंगफिशर के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है। किंगफिशर की अनियमितता केवल इस क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि एयरपोर्ट अथारिटी के क्षेत्र में भी देखी गई। नियम यह है कि किसी भी एयरपोर्ट पर कोई भी निजी विमान को उतारना हो, तो उसके लिए एयरपोर्ट अथारिटी को एक निश्चित राशि चुकानी होती है। इस राशि को चुकाने के मामले में भी किंगफिशर लगातार अनियमितताएँ कर रही है। हाल ही में किंगफिशर ने एयरपोर्ट अथारिटी को जो 151 करोड़ का चेक दिया था, वह बाउंस हो गया। आज की तारीख में एयरपोर्ट को किंगफिशर से कितनी रकम लेनी है, यह किसी को पता नहीं है। किंगफिशर के पास ऐसी कोई सम्पत्ति नहीं है, जिसे गिरवी रखकर वह अपनी पूँजी बना सके। उसके पास जितने भी विमान हैं, वे सभी किराए से लिए हुए हैं। आश्चर्य इस बात का है कि किंगफिशर इन विमानों का किराया भी नहीं चुका पा रही है। कुछ दिनों पहले ही कंपनी ने किराए के 5 विमान वापस करने पड़े। 2009 के बाद अब तक कुल 19 विमान कंपनी वापस कर चुकी है। सरकार को इतना जंगी नुकसान पहुँचाने वाली यह कंपनी अब तक कैसे चल रही है, यह समझ से परे है। संभव है कि इसमें भी 2 जी स्पेक्ट्रम जैसा कोई कांड छिपा हो।
सन् 2003 में जब किंगफिशर एयरलाइंस की स्थापना हुई, तब से यह केवल नुकसान में ही अपना काम कर रही है। सन 2005-2006 में काफी बदनाम रही एयर इंडिया ने भी लाभ कमाया, पर किंगफिशर कभी फायदे में नहीं रही। किंगफिशर के प्रेसीडेंट विजय माल्या बार-बार कहते रहे हैं कि वे करदाताओं के धन से एयरलाइंस नहीं चलाना चाहते। पर सच्चई यही है कंपनी को उबारने के लिए जिन राष्ट्र्रीयकृत बैंकों ने पैकेज के रूप में करोड़ों का कर्ज दिया है, उन बैंकों के करोड़ों रुपए डूब चुके हैं। इसके अलावा जिन पूँजी निवेशकों ने यूबी समूह के शेयरों में निवेश किया है, उनका धन डूबत खाते में चला गया है। सन् 2010 में सकरारी बैंकों ने किंगफिशर को दिए गए धन को वसूलने के लिए जब सख्ती की, तब विजय माल्या ने सभी बैंकों के मैनेजरों की बैठक बुलाई। उसके बाद किंगफिशर को उबारने के लिए पैकेज की घोषणा की गई। उस समय किंगफिशर की देनदारियाँ कुल 8414 करोड़ रुपए थी। इस देनदारी को चुकाने के लिए कंपनी के 23 प्रतिशत शेयर बैंकों को देकर देनदारियों को चुकता करने का वादा किया गया। इन शेयरों की बाजार कीमत उस समय 750 करोड़ रुपए आंकी गई थी। इस तरह से किंगफिशर का एक शेयर बैंकों को 64.48 रुपए में पड़ा। मजे की बात यह है कि उस समय किंगफिशर के शेयरों के भाव बाजार में 39.90 रुपए थी। इस तरह से बैंकों ने किंगफिशर के 464 करोड़ रुपए के शेयरों को 750 करोड़ रुपए में खरीदे। सीधे शब्दों में कहा जाए, तो बैंकों ने किंगफिशर को 284 करोड़ रुपए की भेंट दे दी। इस सौदे से विजय माल्या की मानो लाटरी ही लग गई। बैंकों द्वारा इस तरह से किंगफिशर को उपकृत करने के बारे में पूछा गया, तो बैंकों का कहना था कि यह सच है कि हमने किंगफिशर के कम कीमत के शेयरों को अधिक दाम में खरीदा, पर हमें आशा थी कि उनके शेयरों के दाम शीघ्र ही बढ़ेंगे। पर ऐसा हो नहीं पाया, आज किंगफिशर के शेयरों की कीमत 25 रुपए है। इस तरह से राष्ट्रीयकृत बैंकों को कुल 3000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यही नहीं बैंकों ने कंपनी को लाभ पहुँचाने के लिए कर्ज की ब्याज दर भी दो से ढाई प्रतिशत कम कर दी। इससे बैंकों को अब हर वर्ष 150 से 180 करोड़ रुपए का नुकसान होगा। इस महीने में किंगफिशर कई बैंकों के करीब 450 करोड़ रुपए की पूँजी हजम कर चुकी है।
किंगफिशर को कई बार उनकी अनियमितताओं को ध्यान न देते हुए उसे तरजीह दी गई है। कंपनी को उबारने के लिए बैंकों के माध्यम से उसे 1000 करोड़ रुपए का लोन भी दिया गया। इसके बाद भी कंपनी उबर नहीं पाई। कंपनी को अभी भी यह आशा है कि सरकार की तरफ से उसे निश्चित रूप से और सहायता मिलेगी और कंपनी उबर जाएगी। पर उड्डयन मंत्री अजित सिंह ने जिस तरह से बयान दिया है, उससे नहीं लगता कि कंपनी को अब और राहत दी जाएगी। श्री सिंह ने किंगफिशर को और अधिक पैकेज देने से इंकार किया है। एक निजी एयरलाइंस कंपनी लगातार सरकार का नुकसान करे, तो क्या सरकार का कोई कर्तव्य नहीं है कि उस पर किसी तरह की कार्रवाई करे? आखिर किंगफिशर ने जो भी नुकसान किया है, उसका खामियाजा वह स्वयं ही भुगते। पर इस मामले में ऐसा नहीं है, उसका खामियाजा कंपनी के शेयरधारक भुगत रहे हैं। आखिर किसके आदेश से बैंकों ने भी किंगफिशर को इतनी अधिक प्राथमिकता दी कि जब उसके शेयरों के बाजार भाव 39 रुपए चल रहे हों, तब 64 रुपए में खरीदने की क्या आवश्यकता थी? कहीं बैंकों के उच्च पदस्थ अधिकारी किसी कांड में तो लिप्त नहीं हैं? जिससे किंगफिशर को लगातार सहूलियतें मिलती रही और कंपनी इसका बेजा लाभ उठाती रही? आखिर कहीं कुछ तो है, जिससे न केवल सरकार बल्कि बैंकें भी विजय माल्या के आगे नतमस्तक हो गई।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

हरिभूमि और नवभारत में प्रकाशित मेरे आलेख

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

अधिकारों पर अंकुश लगाना होगा




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
लिंक http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-02-22&pageno=9#id=111733901832393290_49_2012-02-22

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

देश की नदियों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा!

डॉ. महेश परिमल
अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुए आतंकवादी हमले में जितने लोग मारे गए, उतने इंसान तो रोज गंदा पानी पीने से मर जाते हैं। हमारे देश में 20 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो अशुद्ध पानी पीते हैं। पानी के लिए झगड़े, फसाद होते रहे हैं, पर अब जल्द ही युद्ध भी होने लगेंगे। इस क्षेत्र में दबे पाँव बहुराष्ट्रीय कंपनियों आ रही हैं, जिससे हालात और भी खराब होने वाले हैं। सरकार इस दिशा में इन्हीं विदेशी कंपनियों के अधीन होती जा रही है। इस कार्य में विश्व बैंक की अहम भूमिका है।
कुछ समय पहले ही जर्मनी की राजधानी बोन में पानी की समस्या को लेकर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में 130 देशों के करीब 3 हजार उपस्थित थे। इस समेलन में चौंकाने वाली जानकारी यह दी गई कि 21 वीं सदी में जिस तरह से टैंकर और पाइप लाइनों से क्रूड आयल का वितरण किया जा रहा है, ठीक उसी तरह पानी का भी वितरण किया जाएगा। बहुत ही जल्द पानी के लिए युद्ध होंगे। विश्व में 1.30 अरब लोग ऐसे हैं, जिन्हें पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है। अशुद्ध पानी से विश्व में रोज 6 हजार मौतें हो रहीं हैं। हालात ऐसे ही रहे, तो पूरे विश्व में पानी सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाएगा। हमारी पृथ्वी में जितना पानी है, उसका 97 प्रतिशत समुद्र के खारे पानी के रूप में है। केवल 3 प्रतिशत पानी ही मीठा और पीने लायक है। इसमें से 25 प्रतिशत हिमनदियों में बर्फ के रूप में जमा हुआ है। इस तरह से कुल5 प्रतिशत पानी ही हमारे लिए उपलब्ध है। इसमें से भी अधिकांश भाग अमेरिका और केनेडा की सीमाओं पर स्थित बड़े-बड़े तालाबों में है। शेष विश्व में बढ़ती जनसंया, शहरीकरण, औद्योगीकरण और प्रदूषण के कारण पानी के ज्ञात स्रोतों में लगातार कमी आ रही है। देश के कई राज्यों में पानी के लिए दंगे होना शुरू हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया में प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष 3 हजार घनफीट जितना पानी ही लोगों को मिल पाएगा। इसमें भी भारत की आवश्यकता औसतन 2,500 घनमीटर ही है।
उत्तर प्रदेश में यह परंपरा है कि कन्या द्वारा जब कुएँ की पूजा की जाती है, तभी लग्न विधि पूर्ण मानी जाती है। अब तो कुओं की संया लगातार घट रही है, इसलिए गाँवों में कुएँ के बदले टैंकर की ही पूजा करवाकर लग्नविधि पूर्ण कर ली जाती है। लोगों ने समय की जरुरत को समझा और ऐसा करना शुरू किया। पर पानी की बचत करनी चाहिए, इस तरह का संदेश देने के लिए कोई परंपरा अभी तक शुरू नहीं हो पाई है, यदि शुरू हो भी गई हो, तो उसे अमल में नहीं लाया गया है। जब तक हमें पानी सहजता से मिल रहा है, तब तक हम इसकी अहमियत नहीं समझ पाएँगे। हमारे देश में पानी की समस्या दिनों-दिन गंभीर रूप लेती जा रही है। देश में कुल 20 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। पेयजल के जितने भी स्रोत हैं, उसमें से 80 प्रतिशत स्रोत उद्योगों द्वारा छोड़ा गया रसायनयुक्त गंदा पानी मिल जाने के कारण प्रदूषित हो गए हैं। इसके बावजूद किसानों को यह सलाह दी जाती है कि वे ऐसी फसलों का उत्पादन करें, जिसका दाम अधिक मिलता हो। किसानों को राजनैतिक दलों द्वारा वोट की खातिर मुत में बिजली दी जाती है, जिससे वे अपने बोरवेल में पंप लगाकर दिन-रात पानी निकालते रहते हैं। इससे भूगर्भ का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। इससे हजारों कुएँ नाकारा हो जाते हैं। पानी की कमी के कारण भारत का कृषि उत्पादन भी लगातार घट रहा है। यही कारण है कि हम अब बनाज का आयात करने लगे हैं।
देश को जब आजादी मिली, तब एक-एक गाँवों में पीने के पानी का कम से कम एक स्रोत तो ऐसा था ही, जिससे पूरे गाँव की पेयजल समस्या दूर हो जाती थी। जहाँ पेयजल समस्या होती थी, सरकारी भाषा में इन गाँवों को ‘नो सोर्स विलेज’ कहा जाता है। सन् 1964 में ‘नो सोर्स विलेज’ की संया 750 थी, जो 1995 में बढ़कर 64 हजार से ऊपर पहुँच गई। इसका आशय यही हुआ कि आजादी के पहले जिन 64 हजार गाँवों के पास अपने पेयजल के स्रोत थे, वे सूख गए। या फिर औद्योगिकरण की भेंट चढ़ गए। बड़ी नदियों पर जब बाँध बनाए जाते हैं, तब नदी के किनारे रहने वालों के लिए मुश्किल हो जाती है, उन्हें पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता। शहरों की नगर पालिकाएँ नदी के किनारे बहने वाले नालों में गटर का पानी डालने लगती है, इससे सैकड़ों गाँवों में पीने के पानी की समस्या उत्पन्न हो जाती है। उद्योग भी नदी के किनारे ही लगाए जाते हैं। इससे निकलने वाला प्रदूषणयुक्त पानी नदी के पानी को और भी प्रदूषित बनाता है। इस पानी को पीने वाले अनेक बीमारियों का शिकार होते हैं। पानी को इस तरह से प्रदूषित करने वाले उद्योगपतियों को आज तक किसी प्रकार की सजा नहीं हुई। नगर पालिकाएँ भी गटर के पानी को बिना शुद्ध किए नदियों में बहा देने के लिए आखिर क्यों छूट मिली हुई है। इस दिशा में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड खामोश है।
देश को जब आजादी मिली, तब देश की जल वितरण व्यवस्था पूरी तरह से प्रजा के हाथ में थी। हरेक गाँव की ग्राम पंचायत तालाबों एवं कुओं की देखभाल करती थी, ग्रामीण नदियों को प्रकृति का वरदान समझते थे, इसलिए उसे गंदा करने की सोचते भी नहीं थे। आजादी क्या मिली, सभी नदियों पर बाँध बनाने का काम शुरू हो गया। लोगों ने इसे विकास की दिशा में कदम माना, पर यह कदम अनियमितताओं के चलते तानाशाहीपूर्ण रवैए में बदल गया। नदियाँ प्रदूषित होती गई। अब इन नदियों को प्रदूषणमुक्त करने की योजना बनाई जा रही है। इसकी जवाबदारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी जा रही है। देश की प्रजा का अरबों रुपए अब इन कंपनियों के पास चला जाएगा। कुछ सपन्न देशों में नदियों की देखभाल निजी कंपनियाँ कर रही हैं। विश्व की दस बड़ी कंपनियों में से चार कंपनियाँ तो पानी का ही व्यापार कर रही हैं। इन कंपनियों में जर्मनी की आरडब्ल्यूई, फ्रांस की विवाल्डो और स्वेज लियोन और अमेरिक की एनरॉन कापरेरेशन का समावेश होता है। एनरॉन तो अब दीवालिया हो चुकी है, पर इसके पहले उसने विभिन्न देशों में पानी का ही धंधा कर करीब 80 अरब डॉलर की कमाई कर चुकी है। माइक्रोसाप्ट कंपनी द्वारा जो वार्षिक बिक्री की जाती है, उससे चार गुना व्यापार एनरॉन कंपनी ही करती थी।
हमारे देश में पानी की तंगी होती है, लोग पानी के लिए तरसते हैं, उसमें भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वार्थ है। देश के दिल्ली और मुबई जैसे महानगरों में जल वितरण व्यवस्था की जिमेदारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देने की पूरी तैयारी हो चुकी है। इन कंपनियों के एजेंट की भूमिका विश्व बैंक निभा रहा है। किसी भी शहर की युनिसिपलिटी अपनी जल योजना के लिए विश्व बैंक के पास कर्ज माँगने जाती है, तो विश्व बैंक की यही शर्त होती है कि इस योजना में जल वितरण व्यवस्था की जवाबदारी निजी कंपनियों को सौंपनी होगी। विश्व बैंक के अनुसार निजी कंपनी का आशय बहुराष्ट्रीय कंपनी ही होता है। इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारे पर ही हमारे देश की जल नीति तैयार की जाती है। इस नीति के तहत धीरे-धीरे सिंचाई के लिए तमाम बाँधों और नदियों को भी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया जाएगा। यह भी एक तरह की गुलामी ही होगी, क्योंकि एक बार यदि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनी को पेयजल वितरण व्यवस्था की जिमेदारी दे दी गई, तो फिर पानी की गुणवत्ता और आपूर्ति की नियमितता पर सरकार को कोई अंकुश नहीं रहता। पानी का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों को अरबों रुपए की रिश्वत देकर यह ठेका प्राप्त करती हैं। पानी का व्यापार करने वाली इन कंपनियों पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लग चुके हैं। महानगरों की जल वितरण व्यवस्था को भी इन कंपनियों ने भ्रष्टाचार के सहारे ही अपने हाथ में लिया है।
महाराष्ट्र सरकार ने 2003 में एक आदेश के तहत अपनी नई जल नीति की घोषणा की थी। इस नीति के अनुसार सभी जल परियोजनाएँ निजी कंपनियों को देने का निर्णय लिया गया है। विधानसभा में इस विधेयक को पारित भी कर दिया गया। इस विधेयक के अनुसार महाराष्ट्र स्टेट वॉटर रेग्युलेटरी अथारिटी की रचना की गई, इसका कार्य नदियों के बेचे जाने वाले पानी का भाव तय करना है। इस तरह से पिछले 5 वर्षो से सरकार राज्य की नदियाँ बेचने के मामले में कानूनी रूप से कार्यवाही कर रही है। देर से ही सही, प्रजा को सरकार की इस चालाकी की जानकारी हो गई है। फिर भी वह लाचार है। यह तो तय है कि महाराष्ट्र की नदियों का निजीकरण करने की योजनाओं के पीछे विश्व बैंक और पानी का अरबों डॉलर का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का ही हाथ है। विश्व बैंक ने 5 साल पहले महाराष्ट्र सरकार को पानी के क्षेत्र में सुधार के लिए 32.5 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया था। कर्ज के साथ यह शर्त भी जुड़ी थी कि महाराष्ट्र सरकार अपनी अपनी नदियों और जल परियोजनाओं का निजीकरण और व्यापारीकरण करेगी। इस शर्त के बंधन में बँधकर सरकार ने नई जल नीति तैयार की। इस नीति के तहत पुणो और मुम्बई में जल वितरण योजनाएँ विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने की तैयारी है। दूसरी ओर नदियों को बेचने की योजनाएँ शुरू हो गई हैं। जल योजना के तहत अभी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गंगा और जमुना जैसी पवित्र नदियों पर अपना कब्जा जमा लिया है। हमारी सरकार निजीकरण के लालच में बदहवाश हो गई है। अब जल वितरण व्यवस्था के तहत ये कंपनियाँ अधिक कमाई चक्कर में पानी की कीमत इतना अधिक बढ़ा देंगी कि गरीबों की जीना ही मुश्किल हो जाएगा। वह फिर गंदा पानी पीने लगेगा और बीमारी से मरेगा। क्योंकि ये कंपनियाँ नागरिकों को शुद्ध पानी देने की कोई गारंटी नहीं देती।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

मायावी दुनिया से दूर रखना होगा

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
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http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-02-18&pageno=9#id=111733570232201786_49_2012-02-18



शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

बढ़ा है लक्‍जरी ब्रांडेड आइटम का क्रेज


नवभारत रायपुर- बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

स्‍मृतियों का वसंत / शेषन की याद दिलाती सख्‍ती

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आज जनसत्‍ता और हरिभूमि में मेरे आलेख प्रकाशित हुए हैं। दोनों का लिंक इस प्रकार

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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

सौ साल में खत्‍म हो जाऍंगे, दो तिहाई जगल

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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

नदियों को भी बचाना होगा




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
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बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

2 जी घोटाला, घिरी सरकार, महँगी होगी सेवाऍं





हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख
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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

अब होगी मोबाइल सेवा और महँगी




नवभारत रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

एक रन पर धोनी ने कमाए ढाई लाख रुपए

डॉ. महेश परिमल
क्या आपको पता है कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की वार्षिक आय कितनी है? शायद आप नहीं जानते, जानना भी नहीं चाहते। फिर भी आप जान ही लें, क्योंकि यही वे व्यक्ति हैं, जो एक तरफ अपना बल्ला घुमाते हैं, तो रन बटोरते हैं। दूसरी तरफ विज्ञापनों में काम करते हुए हर वर्ष 75 करोड़ रुपए कमाते हैं। पिछले साल यानी 2011 में उन्होंने जितने रन बनाए, उसका हिसाब किया जाए, तो प्रत्येक रन पर उन्हें 2.55 लाख रुपए मिले हैं। हमारे देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिनकी वार्षिक आय 2.55 लाख रुपए नहीं है। दूसरी ओर इतना धन तो धोनी एक रन बनाकर प्राप्त कर लेते हैं। यह राशि उन्हें क्रिकेट बोर्ड, आईपीएल और विज्ञापनों से प्राप्त होती है। टीवी पर जो विज्ञापन प्रसारित किए जाते हैं, उसे मध्यम वर्ग ही अधिक देखता है। इन विज्ञापनों के ामध्यम से अनावश्यक और कई बार स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाले प्रोडक्ट भी होते हैं। मध्यम वर्ग के खून-पसीने की कमाई से बड़ी-बड़ी कंपनियाँ जो कमाई कर रही हैं, उसका एक छोटा सा हिस्सा वे अपने ब्रांड एम्बेसेडर को देती हैं। इस तरह से हमारे क्रिकेटरों की जो बेशुमार कमाई होती है, उसका अधिकांश भाग मध्यम वर्ग के शोषण से ही प्राप्त होता है। मध्यम वर्ग अपने मनोरंजन के लिए क्रिकेट के मैच और टीवी धारावाहिक देखता है। इस दौरान अज्ञानतावश उसका ब्रेनवॉश हो जाता है, उसके हिस्से आती है अनावश्यक वस्तुएँ, जिसके बिना भी वह अपना जीवन गुजार सकता है।सच है कि अब क्रिकेट मैच एक खेल न होकर मार्केट का राक्षसी तंत्र बन गया है। मार्केटिंग करने वाली कंपनियाँ ग्राहकों को लुभाने के लिए येनकेनप्रकारेण अपना माल बेचना चाहती हैं। इसके लिए वह क्रिकेटरों का इस्तेमाल करती है। टीवी पर मैच का लाइव प्रसारण देखकर देश के करोड़ों मानव घंटों की बरबादी होती है, यही नहीं अरबों रुपए का उत्पादन प्रभावित होता है। यदि हमारे क्रिकेटरों पर विज्ञापनों में काम करने की पाबंदी लगा दी जाए, तो संभव है देश के क्रिकेट का उद्धार हो जाए।
ऑस्ट्रेलिया के ऐडिलेड शहर से ही भारत के लिए दो परस्पर विरोधी खबरें आयीं। Rिकेट में विश्व चैंपियन भारतीय टीम ने 4-0 से टेस्ट श्रंखला गंवाकर देश का सिर शर्म से झुका दिया तो ऑस्ट्रेलियाई ओपन टेनिस में लिएंडर पेस ने पुरुष डबल्स का खिताब जीत कर करियर ग्रैंड स्लैम पूरा कर अपने देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। हमारी टीम हार गई, इससे हम भले ही दु:खी हों, पर हमारे क्रिकेटरों को इस बात का जरा भी मलाल नहीं है। वे टीम जीते, इसलिए खेल ही नहीं रहे थे, इससे अधिक चिंता तो उन्हें विज्ञापनों के कांट्रेक्ट साइन करने, मीटिंग करने, एड फिल्मों की शूटिंग करने, कंपनियों के प्रमोशनल कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज कराने, अपनी कमाई को सही स्थान पर इस्तेमाल करने आदि को लेकर होती है। अपनी शक्ति का अधिकांश भाग वे इसी में खर्च कर देते है, बची-खुची शक्ति आईपीएल में खप जाती है। इसके बाद कहाँ से रह जाता है हौसला? सच में देखा जाए, तो हमारे क्रिकेटर एड फिल्मों में काम करके देश का तो भला नहीं ही करते, उससे हमारा भी भला नहीं होता। भला होता है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का और स्वयं उनका। ऐसे में क्यों न उन पर फिल्मों में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए? विज्ञापन फिल्मों में काम करके हमारे क्रिकेटर प्रजा की सेवा तो नहीं कर रहे हैं। बात करते हैं हमारे क्रिकेट टीम के कप्तान की। इस समय वे सबसे अधिक कमाई करने वाले क्रिकेटर हैं। हर वर्ष 75 करोड़ रुपए कमाते हैं। 22 ब्रांडों के एम्बेसेडर हैं। इसमें पेप्सीको, रिबोक, एयरसेल, रिवाइटल और गोदरेज जैसी ब्रांडों का समावेश होता है। कुछ समय पहले धोनीे ने तीन स्पोर्ट्स कंपनियों के साथ कांट्रेक्ट किया है। इनका विज्ञापन करके वे तीन वर्ष में 200 करोड़ रुपए कमाएँगे। हमारे मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने सन् 2006 में आईकोनिक्स कंपनी के साथ जब अनुबंध किया था, तब उन्हें 180 करोड़ रुपए मिले थे। धोन जिस रिवाइटल नामक टॉनिक के लिए विज्ञापन करते हैं, उसका उद्देश्य दरअसल भारत में मांसाहार का प्रचार करने का है। अब जब भारतीय क्रिकेट टीम को जीताने में वे विफल सिद्ध हुए हैं, तो कंपनी ने उनके स्थान पर अब सलमान खान को ले लिया है।
सन् 2009 की फोब्र्स मैगजीन ने विश्व के दस सबसे अधिक कमाने वाले क्रिकेटरों की सूची प्रकाशित की, उसमें एक करोड़ डॉलर के साथ धोनी सबसे आगे थे। 80 लाख डॉलर के साथ सचिन तेंदुलकर दूसरे नम्बर पर थे। अब लगता है कि सचिन भारत को विजयश्री दिलाने नहीं, बल्कि अपना सौवां शतक लगाने के लिए मैदान में उतरते हैं। वे अपना सौंवा शतक पूरा करें या न करें, उन्हें तो 61.4 करोड़ रुपए मिलने ही हैं। वे कभ रिटायर नहीं होंगे। जब तक उन्हें जबर्दस्ती रिटायर न कर दिया जाए। सचिन ने पेप्सी, कोका कोला, बूस्ट, रिनॉल्ड, कोलगेट, फिलिप्स, विसा, केस्ट्रॉल, एयरटेल, केनन आदि के ब्रांड रह चुके हैं। इसके अलावा नेशनल एग कॉर्डिनेशन कमिटी के प्रवक्ता की भूमिका निभाते हुए उन्होंने रोज अंडे खाओ का भी विज्ञापन किया था। हाल ही में उन्होंने बांद्रा में 9 हजार वर्गफीट के स्थान पर 39 करोड़ का जो बंगला बनवाया है, उसका वार्षिक प्रीमियम ही 40 लाख रुपए है। सचिन की अधिकांश कमाई विज्ञापन फिल्मों से ही हुई है।
हमारे क्रिकेटर जब भी धन के लालच में विज्ञापन फिल्मों का कांट्रेक्ट करते हैं,तो देश या प्रजा के बारे में सोचते ही नहीं हैं। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश में खुले आम शराब के विज्ञापनों पर प्रतिबंध है, उसके बाद भी शराब बनाने वाली कंपनियाँ उसी ब्रांड का सोडा बनाती हैं, जिसका विज्ञापन हमारे क्रिकेटर करते हैं। हाल ही में धोनी और हरभजन सिंह ने देश की प्रसिद्ध व्हिस्की के ब्रांड के लिए काम कर रहे हैं। शराब कंपनियाँ अपने उत्पाद के विज्ञापन के लिए सरोगेट एड का सहारा लेते हैं। इससे कानून का पालन भी हो जाता है और उत्पाद का विज्ञापन भी हो जाता है। विभिन्न कंपनियों की इस चाल को हमारे क्रिकेटर तो समझते हैं, पर देश की प्रजा अभी तक नहीं समझ पाई है। इन विज्ञापनों से युवा पीढ़ी गुमहरा हो रही है, पर क्रिकेटरों को इसकी चिंता कहाँ? भारतीय क्रिकेट बोर्ड द्वारा खिलाड़ियों को जो मोटी रकम दी जाती है, उस पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए। बोर्ड ने 9 खिलाड़ियों को ‘ए’ केटेगरी पर रखा गया है। इस केटेगरी के खिलाड़ियों को हर वर्ष एक करोड़ रुपए दिए जाते हैं, चाहे वे खेलें या न खेलें। इन नवरत्नों में महेंद्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड, वीवीएस लक्ष्मण, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, सुरेश रैना, हरभजन सिंह और जहीर खान का समावेश होता है। ‘बी’ केटेगरी में शामिल क्रिकेटरों को 50 लाख रुपए वार्षिक और ‘सी’ के खिलाड़ियों को 25 लाख रुपए वार्षिक आय होती है। इसके अलावा उनहें एक टेस्ट मैच पर सात लाख रुपए, वन डे इंटरनेशनल पर चार लाख और 20-20 पर दो लाख रुपए अतिरिक्त मिलते हैं। कोई खिलाड़ी टेस्ट की दोनों इनिंग में शून्य रन भी बनाता है, तो भी उसे सात लाख रुपए दिए जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया से हम भले ही बुरी तरह से हार गए हों, पर सभी खिलाड़ियों के खाते में 28 लाख रुपए तो जमा हो ही गए।
आईपीएल में मिलने वाली मोटी राशि के चलते कुछ खिलाड़ी जिस तरह टेस्ट और एक दिवसीय Rिकेट के लिए अपनी फिटनेस को दाँंव पर लगा रहे हैं, उसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों की बढ़ती उम्र को लेकर मचाया जा रहा शोर अतार्किक है। आखिर 39 साल की उम्र में ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग ने इसी श्रंखला में एक दोहरे शतक समेत दो शतक लगाए हैं। टेनिस में Rिकेट से कई गुना जयादा ऊर्जा और फिटनेस की जरूरत होती है। फिर भी 38 साल की उम्र में भारत के ही लिएंडर पेस ने ऐडिलेड में ऑस्ट्रेलियाई ओपन पुरुष डबल्स के रूप में अपने करिअर का 13 वां ग्रंैड स्लैम जीतकर साबित कर दिया है कि सबसे जरूरी है खेल के प्रति प्रतिबद्धता, जीत की दृढ़ इच्छाशक्ति और फिर उसे पूरा करने के लिए जरूरी फिटनेस और कोशिश। कहना नहीं होगा कि भारतीय Rिकेटरों को पेस से सबकसीखना चाहिए, वरना बोर्ड को चाहिए कि वह भी टीम के वरिष्ठ खिलाडिय़ों को प्रदर्शन करो या जाओ का अल्टीमेटम दे दे, जैसा कि ऑस्ट्रेलियाई बोर्ड ने पोंटिंग को दिया था। क्या देश का धन पर केवल खिलाड़ियों और नेताओं का ही वर्चस्व रहेगा, या आम आदमी के लिए उसका उपयोग होगा? यह एक गंभीर प्रश्न है, जिसे हमारे क्रिकेटर, नेता, क्रिकेट बोर्ड, चयन समिति समझे या न समझे, पर अब हमारे देश की प्रजा समझ रही है। यही प्रजा जिसने विश्वकप जीतने पर दीवाली मनाई थी, संभव है हमारे क्रिकेटरों के देश आगमन पर होली भी मना ले।
डॉ. महेश परिमल

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