गुरुवार, 17 जुलाई 2008

से यस टू प्लास्टिक


नीरज नैयर
ऐसे वक्त में जब प्लास्टिक के दुष्प्रभाव को लेकर बहस छिड़ी हुई है यह कहना से यस टू प्लास्टिक किसी के गले नहीं उतरने वाला. और वैसे गले उतरने वाली बात भी नहीं है, प्लास्टिक के खतरों से हम सब अच्छी तरह वाखिफ हैं. आज प्लास्टिक की प्रलय से दुनिया का कोई भी कोना अछूता नहीं है. एक वर्ग किलोमीटर समुद्र में प्लास्टिक के औसतन 46000 टुकड़े तैरते रहते हैं. हिमालय की बर्फ से ढकीं चोटियां भी पर्वतरोहियों द्वारा छोड़े गये मलबों से पट रही हैं. लंदन की टेम्स नदी ही जब भारतीयों द्वारा आस्था के नाम पर फेंके जा रहे प्लास्टिक बैग्स से त्रस्त है तो फिर देश की नदियों के बारे में क्या कहना. यमुना ने तो दमतोड़ ही दिया और बाकि कुछ-एक दम तोड़ने के कगार पर हैं. बावजूद इसके ठीक उसी तरह जिस तरह एक सिक्के के दो पहलू होते हैं प्लास्टिक का दूसरा रूप भी है. पर्यावरणविद भले ही लंबे समय से प्लास्टिक को खतरा मानकर प्रयोग न करने के लिए जागरुकता अभियान चल रहे हाें मगर सही मायनाें में देखा जाए तो इसके बिना सुविधाजनक जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती. प्लास्टिक किसी भी अन्य विकल्प जैसे धातु, कांच या कागज आदि की तुलना में कहीं ज्यादा मुफीद है. आज साबुन, तेल,दूध आदि वस्तुओं की प्लास्टिक पैकिंग की बदौलत ही इन्हें लाना-ले-जाना इतना आसान हो पाया है. प्लास्टिक पैकिंग कार्बन डाई आक्साइड और ऑक्सीजन के अनुपात को संतुलित रखती है जिसकी वजह से लंबा सफर तय करने के बाद भी खाने-पीने की वस्तुएं ताजी और पौष्टिक बनी रहती हैं. किसी अन्य पैकिंग के साथ ऐसा मुमकिन नहीं हो सकता. इसके साथ ही वाहन उद्योग, हवाई जहाज, नौका, खेल, सिंचाई, खेती और चिकित्सा के उपकरण आदि जीवन के हर क्षेत्र में प्लास्टिक का ही बोलबाला है. भवन निर्माण से लेकर साज-साा तक प्लास्टिक का कोई सामी नहीं है.
प्लास्टिक को लेकर उठे विवाद के बीच इंडियन पेट्रोकेमिकल इंडस्ट्री के एक शोध ने इसकी मुखालफत करने वालों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. बिजली की बचत में प्लास्टिक की भूमिका को दर्शाने के लिए किए गये इस शोध में कांच की बोतलों के स्थान पर प्लास्टिक की बोतल के प्रयोग से 4 हजार मेगावाट बिजली की बचत हुई. जैसा की पर्यावरणवादी दलीलें देते रहे हैं, अगर प्लास्टिक पर पूर्णरूप प्रतिबंध लगा दिया जाए तो इसका सबसे विपरीत प्रभाव पर्यावरण पर ही पड़ेगा. पैकेजिंग उद्योग में लगभग 52 फीसदी इस्तेमाल प्लास्टिक का ही होता है. ऐसे में प्लास्टिक के बजाए अगर कागज का प्रयोग किया जाने लगे तो दस साल में बढ़े हुए तकरीबन 2 करोड़ पेड़ों को काटना होगा. वृक्षों की हमारे जीवन में क्या अहमियत है यह बताने की शायद जरूरत नहीं. वृक्ष न सिर्फ तापमान को नियंत्रित रखते हैं बल्कि वातावरण को स्वच्छ बनाने में भी अहम् किरदार निभाते हैं. पेड़ों द्वारा अधिक मात्रा में कार्बनडाई आक्साइड के अवशोषण और नमी बढ़ाने से वातावरण में शीतलता आती है. अब ऐसे में वृक्षों को काटने का परिणाम कितना भयानक होगा इसका अंदाजा खुद-ब-खुद लगाया जा सकता है. साथ ही कागज की पैकिंग प्लास्टिक के मुकाबले कई गुना महंगी साबित होगी और इसमें खाद्य पदार्थों के सड़ने आदि का खतरा भी बढ़ जाएगा. ऐसे ही लोगों तक पेयजल मुहैया कराने में प्लास्टिक का महत्वूर्ण योगदान है, जरा सोचें कि अगर पीवीसी पाइप ही न हो तो पानी कहां से आएगा. जूट की जगह प्लास्टिक के बोरों के उपयोग से 12000 करोड रुपए की बचत होती है. अब इतना जब जानने-समझने के बाद भी प्लास्टिक की उपयोगिता को नजर अंदाज करके यह कहना कि इससे जीवन दुश्वार हो गया है, कोई समझदारी की बात नहीं. सवाल प्लास्टिक या इसके इस्तेमाल को खत्म करने का नहीं बल्कि इसके वाजिब प्रयोग का है. यह बात सही है कि प्लास्टिक के बढ़ते उपयोग से इसके कचरे में वृद्धि हुई है. और इसे जलाकर ही नष्ट किया जला सकता है पर अगर ऐसा किया जाता है तो यह पर्यावरण के लिए घातक साबित होगा. ऐसे में इस समस्या का केवल एक ही समाधन है, रिसाईकिलिंग. कुछ समय पूर्व पर्यावरण मंत्रालय ने प्लास्टिक के कचरे को ठिकाने लगाने के उपाए सुझाने के लिए एक समिति घटित की थी जिसने अपने रिपोर्ट में इस बात पर बल दिया था कि प्लास्टिक की मोटाई 20 की जगह 100 माइक्रोन तय की जानी चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा प्लास्टिक को रिसाईकिलिंग किया जा सके. वैसे भी भारत में सालाना प्रति व्यक्ति प्लास्टिक उपयोग 0.3 किलो है, जो विश्व औसत 19 किलो से खासा कम है. इसलिए ज्यादा चिंता की बात नहीं. वैसे सही मायने में देखा जाए तो इस समस्या के विस्तार का सबसे प्रमुख और अहम् कारण हमारी सरकार का ढुलमुल रवैया है पर्यावरणवादी भी मानते हैं कि सरकार को विदेशों से सबक लेना चाहिए, जहां निर्माता को ही उसके उत्पाद के तमाम पहलुओं के लिए जिम्मेदार माना जाता है. इसे निर्माता की जिम्मेदारी नाम दिया गया है. उत्पाद के कचरे को वापस लेकर रिसाईकिलिंग करने तक की पूरी जिम्मेदारी निर्माता की ही होती है. एक रिपोर्ट के मुताबिक कुल उत्पादित प्लास्टिक में से 45 फीसदी कचरा बन जाती है और महज 45 फीसदी ही रिसाईकिल हो पाती है. मतलब साफ है, हमारे देश में रिसाईकिलिंग का ग्राफ काफी नीचे है. प्लास्टिक को अगर अधिक से अधिक रिसाईकिलिंग योग्य बनाया जाए तो कचरे की समस्या अपने आप ही समाप्त हो जाएगी. इसके साथ-साथ प्लास्टिक के बेजा उपयोग को लेकर नियम और कायदों को भी सख्त बनाने की जरूरत है. हमारे देश में पर्यटन स्थलों पर आने वाले सैलानी अपनी मनमर्जी के मुताबिक प्लास्टिक बैग्स को यहां-वहां फैंक जाते हैं. इससे न केवल उस क्षेत्र की खूबसूरती खराब होती है बल्कि उसका खामियाजा पर्यावरण को उठाना पड़ता है. वर्ष 2003 में हिमाचल सरकार ने भारत के पहले राज्य के रूप में इस दिशा में अनूठी पहल की थी. राज्य सरकार ने ऐसा कानून बनाया था जिसके तहत पॉलिथिन बैग का प्रयोग करते पाए जाने पर सात साल की कैद या एक लाख रुपए जुर्माने का प्रावधान था. ठीक ऐसे ही दक्षिण अफ्रीकी सरकार ने पर्यटन क्षेत्रों में प्लास्टिक बैगों के उपयोग पर दस साल की सजा और आयरलैंड सरकार ने प्लास्टिक बैगों पर टैक्स लगाकर इसके प्रयोग को काबू में किया था. प्लास्टिक में भले ही कितनी खामियां क्यों न हो मगर इसकी उपयोगिता से आंखे नहीं मूंदी जा सकती. लिहाजा सरकार को इस पर प्रतिबंध की बात सोचने के बजाए मौजूद अन्य विकल्पों पर ध्यान देने की ज्यादा जरूरत है.
नीरज नैयर

मंगलवार, 15 जुलाई 2008

कहाँ गए सावन के झूले


डॉ. महेश परिमल
अपनी पूरी मस्ती और शोख अदाओं के साथ सावन कब हमारे सिरहाने आकर चुपचाप खड़े हो गया, हमें पता ही नहीं चला. हमारी आँखों का सावन तो कब का सूख चुका. हाँ बिटिया कॉलेज जाने की तैयारी करते हुए कुछ गुनगुनाती है, तब लगता है, उसका सावन आ रहा है. कई आँखें हैं, जिनमें हरियाला सावन देखता हूँ, पर उससे भी अधिक सैकड़ों आँखें हैं, जिनमें सावन ने आज तक दस्तक ही नहीं दी है. उन्हें पता ही नहीं, क्या होता है और कैसा होता है सावन?
सावन कई रूपों में हमारे सामने आता है. किसान के सामने लहलहाती फसल के रूप में, व्यापारी के सामने भरे हुए अनाज के गोदामों के रूप में, अधिकारी के सामने नोटों से भरे बैग के रूप में और नेता के सामने चुनाव के पहले मतदाता के रूप में और चुनाव के बाद स्वार्थ में लिपटे धन के रूप में. सबसे अलग सावन होता है युवाओं का. प्रेयसी या प्रिय का दिख जाना ही उनके लिए सावन के दर्शन से कम नहीं होता. इनके सावन की मस्ती का मज़ा तो न पूछो, तो ही अच्छा!
इस सावन को अपनी मस्ती में सराबोर देखना हो, तो किसी भी गाँव में चले जाएँ, जहां पेड़ों पर झूला डाले किशोरियाँ, नवयुवतियाँ या फिर महिलाएँ अनायास ही दिख जाएँगी. सावन के ये झूले मस्ती और अठखेलियों का प्रतीक होते हैं. यही झूला हम सबको मिला है माँ की बाँहों के झूले के रूप में. कभी पिता, कभी दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, भैया-भाभी या फिर दीदी की बाँहों का झूला. भला कौन भूल पाया है?
बचपन का सावन याद है आपको? मुझे याद है, मेरे सामने जातियों में बँटी देश की सामाजिक व्यवस्था के सावन का चित्र है. पूरे गाँव में आम, नीम, इमली के पेड़ों पर कई जगह झूले बाँधे जाते थे, हम सब उस पर झूलते थे. ऐसा नहीं था कि केवल किशोरियाँ या स्त्रियाँ ही झूलती हों. किशोर, अधेड़, बच्चे सभी झूलते थे. विशेष बात यह थी कि सभी जाति के लोग झूलते थे. जिस झूले पर ब्राह्मण का छोरा झूलता, उसी पर पहले या बाद में हरिजन की छोरी या छोरा भी झूलता था. एक बात अवश्य थी, सब साथ-साथ नहीं झूलते थे. जातिगत दूरी बनी ही रहती थी. यह दूरी झूले, रस्सी, पेड़ और स्थान को लेकर नहीं थी, व्यक्ति को लेकर थी. कुछ लोग हमें अपने समय पर झूलने का आनंद नहीं लेने देते थे. हम साथियों के साथ उन्हें झूलता देखते रहते. दिन में तो हमें झूलने का अवसर कम ही मिलता. पर रात को, उस वक्त तो मैदान साफ मिलता. हम कुछ लोग रात में ही झूलते. खूब झूलते.

मुझे याद है, कुछ हरिजन छोरे भी मेरे दोस्त थे. दिन में तो झूले जातियों में बँट जाते थे. पर रात में यह दायरा हम तोड़ देते थे. उस वक्त सारे भेदभाव अंधेरे में डूब जाते. हम दो-दो या तीन-तीन दोस्त साथ-साथ झूलते. झूलने का मज़ा तब तक नहीं आता, जब तक कोई लोकगीत न हो. हम बच्चे थे, लोकगीत तो याद नहीं थे, सो पाठ्यपुस्तक की कोई कविता, कोई फिल्मी गीत या फिर कबीर, रसखान, सूर-तुलसी के पद, मीरा के दोहे या फिर झाँसी की रानी के गीत ही गाने लगते. बड़ा अच्छा लगता. रात गहराती, बिजली चमकती, बादल गरजते, तो हम चुपचाप माँ के पास आकर दुबक जाते. ऐसा होता था हमारा सावन.
आज सावन बदल गया है. आने के पहले खूब तपिश देता है, अपने आगमन का विज्ञापन करता है. छतरी, बरसाती, रेनकोट, तालपत्री के रूप में. पर जब कभी यह रात में आ धमकता है, तो सारे विज्ञापन धराशायी हो जाते हैं. न तालपत्री काम आती है, न पन्नियाँ, और न ही रेनकोट. गृहस्थी की पूरी झाँकी तैरती रहती है, ढहने की तैयारी करती झोपड़ी में. सावन वहाँ भी आता है, पर रात में ही कुछ मज़दूर लग जाते हैं, बंगले का पानी उलीचने में. नाली खोद दी जाती है, पानी झोपड़पट्‌टी की तरफ जाने के लिए. रात में बिजली धोखा न दे जाए, इसलिए नया इन्वर्टर खरीदा जाता है. बच्चों के झूलने के लिए एक सीट वाला आधुनिक झूला हॉल में लगा दिया जाता है, पर इसमें वह मज़ा कहाँ? जो उस झोपड़पट्‌टी के सामने एक पेड़ पर साइकिल के खराब टायरों से बना है. बच्चे उस पर झूलते हैं, मस्तियाते-बतियाते हैं और फिर गिरने पर रो-रोकर घर चले जाते हैं.
सावन.... कभी पनीली आँखों का सावन, सूखी आँखों का रेगिस्तानी सावन, खाली बैठे शहरी मज़दूर का सावन, लोकगीतों के साथ खेतों में बुवाई करती महिलाओं का सावन, बीज के लिए कर्ज़ देते व्यापारी का सावन, बाइक पर सरपट भागते युवाओं का सावन, घर में कैद होकर खेलते बच्चों का सावन... कितने रूप हैं तेरे सावन....? तुम्हारे रंग की भी कोई सीमा नहीं. सावनी रंग जिस चेहरे पर है, समझो उसके पौ-बारह. यूँ ही हर किसी के चेहरे पर नहीं खिलता सावनी रंग.
रंगों की रंगत में सावनी झूलों की डोर अब भीगने लगी है. टूटते लोगों का सहारा भी बनता है सावन और तिनका-तिनका लोगों को तोड़ भी देता है सावन. हम तुम्हें सर-आँखों पर बिठा सकते हैं, पर तबाही का मंजर लेकर मेरे देश के किसी शहर में मत आना सावन. नहीं तो न बाँहों के झूले होंगे, न मस्ती, न अठखेलियाँ. खुशियों को लेकर आओ, तो स्वागत है तुम्हारा मेरे देश के हरियाले-मस्त सावन........
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 14 जुलाई 2008

लवशाला


दो शब्द
आपने शालाएँ तो बहुत देखी होंगी, पर 'लवशाला' पहली बार देखिए। इसे मैंने तब लिखा था, जब मुझे लोग 'दादा जी' नहीं कहा करते थे। वे भी क्या दिन थे! अब तो रातें ही रातें हैं! और वह भी जगराते वाली।
पाठकों से आग्रह है कि वे इस 'दांपत्य-मंजूषा' को 'हनुमान चालीसा' के समान पढ़ा करें। उनके सारे संकट दूर हो जाएँगे।
रमेश चंद्र महरोत्रा
लवशाला
कविता के ऑंचल से लेकर
आसव मृदु वाणी वाला।
भीने भावों के फूलों से
गूँथ रहा हूँ यह माला।
प्यार हृदय का जीवन-धन है,
इसका रंग दिखाने को,
यौवन की फुलवारी-जैसी
खोल रहा हूँ लवशाला।

मद में भीगी रसभरियों से
भरा हुआ है यह प्याला।
गंगा-सी बहती है इसमें
मीठे सपनों की हाला।
दो छोरों का जुड़ना इसमें,
गठबंधन दो कृतियों का,
हर लड़की है राधा इसमें,
हर लड़का मुरलीवाला।

इस मंदिर में प्रिय-प्रियतम के
इठला रही प्रणय-वाला।
अर्पण है हृदयों का इसमें
और दर्द भोला-भाला।
उलटी-सीधी साँसें हैं कुछ,
प्यार-भरी कुछ बातें हैं,
और प्रेमियों के मन का,
इसमें कुछ है हालाचाला।

पुरखों ने भी प्यार किया था
छिप-छिप कर ढीला-ढाला।
पोते-परपोते भी आगे
प्यार करेंगे मतवाला।
हर पीढ़ी में बिकते आए,
मोल बिला ही दिलवाले,
इसमें हैं लखपति वे, जिनके
दिल का निकला दीवाला।

मन के सारे दर्द भुलाना
खूब सिखाती है हाला।
और निराशाओं से पीछा
खूब छुड़ाता है प्याला।
लेकिन सारे दर्द और
सब खोते हुए निराशाएँ,
जीवन भर का साथ निभाना
सिर्फ सिखाती लवशाला।

नर हो, सुर हो या दानव हो,
गोरा हो अथवा काला।
संसारी हो या हो वैरागी,
बहनोई अथवा हो साला।
प्यार सभी के मन का मोती,
धन निर्धन-धनवानों का,
उसके बिना अधूरे सब हैं,
लल्ला, लैला या लाला।

हीरे, मोती, पन्ने, नीलम,
या धन-वैभव की माला।
लेन-देन इनका प्रेमी के
लिए व्यर्थ का घोटाला।
झूठी है हर वस्तु यहाँ की,
अटल सत्य बस एक यही-
चाहे जल-थल-नभ मिट जाएँ,
पर न मिटेगी लवशाला।

प्रेमी एक समाज-सुधारक,
सचमुच कुछ करने वाला।
ऊँच-नीच का, जाति-पाँति का
उसने भेद मिटा डाला।
प्रेम किसी से भी हो, सब ही
उसके लिए बराबर हैं,
नलवाली हो या फलवाली,
या महलोंवाली बाला।

यही निबटना है हम सबको,
हाथ मसलना, यदि टाला।
इस जीवन के बाद वहाँ क्या?
केवल है गड़बड़झाला।
जो कुछ भी मिलना है हमको,
यहीं मिलेगा, यह तय है,
फिर न मिलेंगे ऐसे अवसर,
फिर न मिलेगी लवशाला।

पहले रह कर दूर-दूर ही
दिखता अति भोला-भाला।
फिर धीरे से पास पहुँच कर
करता गड़बड़-घोटाला।
लवशाला के नायक का यह
'प्रोग्राम' निश्चित रहता,
आखिर में वह जीत जाता
तब बन जाता है घरवाला।

स्वर्ग, सुनो क्या है मतवालो?
'प्रिय की बाँहों की माला'।
अपने गले लिपटने पर जो
देती सुख सुरपुर वाला।
आलिंगन की गंध नरक के
द्वार बंद कर के रखती,
सब पापों की एक दवा है-
पापहारिणी लवशाला।

प्यार हृदय की भूख-प्यास है,
अमर सुधा का यह प्याला।
प्रेमी अपनी प्यास बुझाता
पी कर नयनों की हाला।
उसकी शब्दावली जरा-सी,
आठ शब्द जिसमें केवल,
'प्रेम, प्रेमिका, मैं, मेरी वह,
मैं उसका होने वाला' ।

लवशाला के दर्शन करके
झूम उठा हर मतवाला।
दो जवान, दोनों दिलवाले
चंचल युवक, मधुर बाला।
एक इधर से, एक उधर से,
आकर दोनों एक हुए,
खोकर सत्ता हृदयों की
फूल रही है लवशाला।

जप-तप, पूजा-पाठ, साधना,
भस्म, मूर्ति, घंटा, माला।
व्यर्थ तीर्थ, धन, यश, पद,
गरिमा, वैभव, मदिरा का प्याला।
स्वाति-बूँद बस बूँद और
सब बूँदें हैं पानी खाली,
अपनी बाला ही बाला बस
बाकी हर बाला ख़ाला।

दो चीजें हैं जिनमें खुद ही
आकर्षण होने वाला।
दोनों चुंबक, दोनों लोहा,
क्यों न मचे हालाचाला।
प्यार अवश्यंभावी जग में,
क्योंकि जवानी आती है,
चूँकि जवानी आती है,
फिर क्यों न जवाँ हो लवशाला।

प्यार न हो, तो विश्व-प्रगति की
फिर न गुँथे आगे माला।
कलियाँ और फूल फिर जग में
जन्म न लें चाहों-वाला।
संतति है वरदान प्यार का,
प्रेम-बेल का वह फल है,
प्यार न हो, तो वंश-वृध्दि पर
रोक लगा दे लवशाला।

प्रियतम यदि अपने हाथों से
पहना दे डोरा काला।
उसकी कींमत के आगे फिर
क्या है हीरों की माला।
प्रिय की है हर चीज अनोखी,
उसका प्यार शराबी है,
उसकी बातों में होता है,
काला जादू मतवाला।

मंदिर-मस्जिद सब भूलोगे,
आकर देखो लवशाला।
साँसों में दिन-रात जपोगे
प्रिय के यादों की माला।
अरमानों के फूल चुनोगे
पूजा करने को प्रिय की,
और कहोगे- ''अहा, अहाहा!
मैंने सब कुछ खो डाला''।

प्यार बिछा है भू-तल पर यों-
जल है युवक, भूमि बाला।
इन दोनों का मिलना-जुलना
जीवन भर चलनेवाला।
हम भी अपनी घड़ियों में कुछ
मिल-जुल लें, कुछ कर-धर लें,
दिन थोड़े हैं, प्रेम बड़ा है,
शरण-भूमि है बस लवशाला।

काम बिना ही रातों में भी
जो न कभी सोने-वाला।
भूख-प्यास को जिसने अपनी
मतलब बिना उड़ा डाला।
निश्चय ही समझो उसको है
'प्रेम' नामका सुंदर वर,
बहुत खुशी से उस ओर बढ़ाता,
जिसने यह बुखार पाला।

प्यार घाव पर मरहम जैसा,
चैन मधुर देने वाला।
भरा हुआ सुख ही सुख जिसमें
ऐसा वह अजीब छाला।
तकलीफों को छील-छील कर
मीठा दर्द बना देता,
बेचैनों के लिए दवा-सी
खुली हुई है लवशाला।

पहले किसी कली पर जिसने
बुना इशारों का जाला।
फिर सारा का सारा मानस
अपना उसको दे डाला।
निष्ठा के अप्रतिम सिंचन से
खिल जाती वह गंधमयी,
बन जाती उसके ऑंगन की
पुष्पवाटिका वह बाला।

घोंचू, मूर्ख, गँवार, गधा हो
या बिलकुल भोला-भाला।
बुद्धू, नीच, अनाड़ी हो या
हो तन या मन का काला।
कलुषित लोहे-सा भी हो यदि,
उसका स्वर्ण बनाने को,
बन जाता पारस का पत्थर
प्यार निराला मतवाला।

नशा प्यार का सबसे गहरा
गिन कर सौ बोतल-वाला।
चढ़ कर फिर यह तभी उतरता,
जब मिलती मन की बाला।
प्रेमी तब हो जाता मोहन,
राधामोहन, मनमोहन,
और प्रेमिका स्वागत करती,
लेकर ओठों का प्याला।

तरुण फूल, तरुणी कलिका को
गूँथ मिला दे, वह 'माला'।
दो प्राणों को एक साथ जो
एक नशा दे, वह 'हाला'।
एक दूसरे के हृदयों में,
कस कर चुभने वालों को,
'प्यार' नाम की डोरी से जो
कस बाँधे, वह 'लवशाला'।

गंगा की पावन धारा हो
या कोई गंदा नाला।
भाव एक सब में मिलने का
बह खुद को खोने वाला।
चाह सभी में अपने प्रिय में
निज अस्तित्व गँवाने की,
सबका है बस लक्ष्य एक ही-
वैतरणी सी लवशाला।

''नकली प्रेमी कौन ?''
उठाती प्रश्न सलोनी लवशाला।
उत्तर मिलता 'जिसने खुद को
जीते जी मृत कर डाला'।
'असली प्रेमी कौन ?' कि जो
खुद मरने पर भी जीता हो,
'प्यार प्रथम, भगवान बाद में'
इसका जप करने-वाला।

चाहे असफलता की बरछी
हो, चाहे दुख का भाला।
वह समाज की घुड़की से भी
है न कभी डरने-वाला।
साहस की हड्डियाँ, धैर्य का
मांस उसे निर्मित करते,
प्रेमी को भगवती शुभा ने
काफी फुरसत में ढाला।

रजनी की अलकों को छूकर
छलकाया मन का प्याला।
तारों के झिलमिल सिंगार ने
यौवन-धन बिखरा डाला।
ऑंखें आगे बढ़ी चूमने
सरस साँवली आभा को,
वे सारे चुँबन बटोरने
चली लजीली लवशाला।

दीवाली है आज, खिले हैं
दीप, सजी है लवशाला।
धूम मचाती है नस-नस में
प्रियतम की छवि की हाला।
नजरों पर नजरें जब होंगी,
वक्त ठहर कर बोलेगा-
प्रेमी की ऑंखों का प्याला
है न कभी भरने-वाला।

सींच-सींच कर भाव-नीर से
प्रेमोद्यान अगर पाला।
चाह-भरे अरमानों का यदि
फिर उस पर पहरा डाला।
खूब खिलेंगे फूल मिलन के
और तृप्ति के फल मीठे,
ब्रह्मानंद ग्रहण कर लेंगे
सजन तरुण, सजनी बाला।

खाना, हँसना, मौज उड़ाना
यह सिद्धांत बना डाला।
आज हुआ जो, बीत गया वह,
फिर न कभी आने-वाला।
चार दिनों के बाद यहाँ से
अपना टिकट कटाना है,
इस कारण अपने प्रियतम की
जल्दी जपनी है माला।

प्रेमी जपता रहे निरंतर
प्रिय के नामों की माला।
जीवन की अंतिम घड़ियों तक
वह न कभी थकने वाला।
बात न हो यदि प्रिय से, तो भी
उसकी आशा धैर्य रखे,
अमर प्रतीक्षा का वह पुतला,
उसे न छोड़े लवशाला।

खोया देख उषा की लाली,
बना उसीका मतवाला।
चाहा गले लगा लूँ अपने
बना उसे अविचल माला।
बिखरा रूप दिशाओं भर का
सिमट समाए इस मन में,
और बहारों से बजवा दे
शहनाई यह लवशाला।

पहले मैंने 'प्यार' नाम के
साँचे में खुद को ढाला।
फिर अपना हर क्षण अपने उन
मनभावन पर खो डाला।
उसके बाद चढ़ाया उन पर
जब अपना अपनापन भी
फौरन अपना लिया उन्होंने
मुझको पाकर दिलवाला।

प्रेमी वह, जो अपनी उनसे
प्यार बहुत करनेवाला।
और प्रेमिका वह, जिसने मन
अपना उनको दे डाला।
प्यार एक चुभता काँटा है,
फूलों-सा वह कोमल है,
और किसी के दिल के टाँके
सी दे जो, वह 'लवशाला'

खेल-खेल में भी रूठा हो
यदि मन में बसनेवाला।
तो सारा दिन लगता अंधा,
सूरज भी लगता काला।
प्यार बड़ा ही जादूगर है,
उसके एक इशारे पर,
जल-थल अंगारे-सा लगता,
चाहे हो ठंडा पाला।

उन बालों का, उन गालों का,
उन ऑंखों का मतवाला।
ध्यान करे जब उन बातों का
भर कर ऑंखों का प्याला।
अपनेपन को भूल-भाल जब
वह प्रियतम में खो जाए,
तब उसको बाँहों में लेकर
शाबाशी दे लवशाला।

प्यार नाम की मदिरा से हो
भरा हुआ मन का प्याला।
और गुलाबी नशा चढ़ा हो,
धुत हो अति पीने-वाला।
फिर उसको कुछ काम न जग से,
योगी सब उसके नीचे,
एक उसे वैराग कि पा लूँ
अपनी जोगन मधुबाला।

चाहे ऑंखों के आगे हो
शुष्क निराशा का भाला।
या गरदन में हो असफलता
के कटु घावों की माला।
गहन विरह की ऑंधी हो या
हो तूफान अड़चनों का,
पर प्रेमी इन पतझड़ियों में
धैर्य न है खोने-वाला।

संसारी को ऐश चाहिए,
वैरागी को जप-माला।
साधु-संत को भ्रम का धंधा,
बनिए को धन का नाला।
पर प्रेमी की चाह और कुछ,
उसकी प्यास निगाहों की,
उसको बस चाहिए प्रेमिका
की मुस्कानों का प्याला।

प्यार न जिसने किया कभी,
वह मन की परतों से काला।
पर प्रेमी का हृदय प्यार ने
निर्मल जल-सा कर डाला।
पापी, नीच, कुकर्मी भी यदि
प्यार करे दिलवाली से,
उसके पुरखों तक का जीवन
बन जाए सद्गति-वाला।

सब विद्याओं से बढ़ कर है
ठाई अक्षर की माला।
पंडित, ज्ञानी, प्रेम-धुरंधर
बन जाता जपने-वाला।
गहराई सागर की उथली
प्रेमी के गहरे दिल से,
उसकी नैया पार कि जिसका
पूजाघर हो लवशाला।

हृदय-रूप पिंजरे में जिसने
प्रेम-रूप तोता पाला।
प्रेम-वारि को जिसने अपने
मन की प्यास बना डाला।
धर्म, अर्थ, मोक्ष से बढ़ कर
पाया सब-कुछ उस नर ने,
प्रेम-महल में घुस कर जिसने
अंदर से डाला ताला।

प्रेमी की बातों का जिसने
स्वाद चखा हो मतवाला।
उसको शक्कर फीकी लगती,
लगता कड़वा हर प्याला।
सारे रिश्ते खट्टे लगते
हलुआ लगता मिर्चो-सा,
सब-कुछ ऐसा-वैसा लगता,
विषमय लगती मधुशाला।

देख घटा श्यामल मेघों की
मचली भावों की हाला।
सावन का मैं मोर बन गया,
मन ने मुझे नचा डाला।
नर-मादा चिड़ियों की नजरें
उड़ने लगी तले ऊपर,
चहक-चहक कर जो कहती हैं-
'लवशाला-चूँ-लवशाला'।

संध्या के सारे रंगों की
पहन निर्वसन वरमाला।
परियों का मेहमान बना मैं
खुद को इंद्र बना डाला।
घूमा नभ के हर कोने में,
दिखा मुझे हर और यही-
तारक-दल नर, किरणें नारी,
और प्रकृति है लवशाला।

वह घर है वीरान कि जिसमें
प्रियतम ने न कदम डाला।
वह घर है श्मशान कि जिसमें
बहे न प्राणों की हाला।
वह घर नरक समान कि जिसमें
प्रेमी जन्म न लेते हों,
वह घर स्वर्ग समान कि जिसमें
हर प्राणी हो दिलवाला।

मैंने सोचा, मैं प्रोफेसर,
विद्या को घर में पाला।
सब कहते मैं ज्ञानी-ध्यानी,
ऊँची तर्क-बुद्धि-वाला।
लेकिन एक अपढ़-सी लड़की
बोली- 'बिलकुल अनपढ़ हो,
सीखो पहला पाठ यहाँ तुम',
और दिखा दी लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ डॉक्टर,
हर इलाज करने-वाला।
बीमारी को मैंने घर से
कोसों दूर भगा डाला।
लेकिन एक नशीली लाा
दिखते ही बीमार पड़ा,
वही सिर्फ डॉक्टर मेरी,
अस्पताल है लवशाला।

मैंने सोचा, मैं वकील हूँ,
खूब बहस करने-वाला।
मैंने बहुत जजों को अपने
तर्को से बहका डाला।
लेकिन एक चपल बाला की
बातों से मैं हार गया,
उसने समझाया- 'सबसे है
बड़ी कचहरी लवशाला'।

मैंने सोचा, मैं हूँ साहब,
बहुत-बहुत इात-वाला।
सब झुकते हैं मेरे आगे,
पैसा, बाबू या लाला।
लेकिन एक सुभग रमणी ने
घुटने मेरे टिका दिए,
अपनी इात से भी प्यारी
लगती मुझको वह बाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ नेता,
चक्कर में पड़ने वाला।
जनहित का षडयंत्र चलाकर
जग भर को चकरा डाला।
लेकिन एक बड़ा चक्कर
जब से ऑंखों में समा गया,
तब से चारों ओर दीखती
लवशाला ही लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ राजा,
सब पर रौब जमा डाला।
दास-दासियों का जीवन मैं
मुट्ठी में रखने-वाला।
लेकिन एक अजब-सी दासी
मुझको दास बना बैठी,
अब उसकी मुट्ठी में मेरे
प्राणों का डगमग प्याला।

मैंने सोचा, मैं हूँ क्षत्रिय,
तीर-धनुष रखने-वाला।
कितनों ही को मार गिराया
कितनों को चित कर डाला।
लेकिन एक नजर से छूटा
तीर लगा आकर जब से,
तब से अपना जौहर भूला
बनी शिवाला लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ बनिया,
अनुपम धन-दौलत-वाला।
कभी न बेचा कुछ घाटे में,
सारी ही घर भर डाला।
लेकिन एक सरल गुड़िया ने
यों ही मुझे खरीद लिया,
अब न पता है, कहाँ तिजोरी,
और तिजोरी का ताला।

मैंने सोचा, मैं सन्यासी,
जग भर से बचने-वाला।
सत् की ओर बढ़ा अपने पग
खुद को संत बना डाला।
लेकिन एक सदाचारिन पर
जब से मेरी दृष्टि पड़ी,
तब से मेरे पग बढ़ने का
मार्ग एक बस- लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ फक्कड़,
बिलकुल सूखे दिल-वाला।
घूमे बाग बहुत, पर मुझ पर
फूलों ने न असर डाला।
लेकिन एक लता-सी उसने
भारी मन को हिला दिया,
पत्थर के भीतर भी लहरें
खूब उठाती लवशाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ पागल,
अस्थिर बुद्धि-वचन-वाला।
मेरे अंदर मचता रहता
अनसुलझा गड़बड़झाला।
लेकिन एक चतुर पगली ने
सब पागलपन दूर किया,
मेरे जीवन का संचालन
करती है अब वह बाला।

मैंने सोचा, मैं जादूगर,
चकित सभी को कर डाला।
मेरे करतब देख-देख कर
जग बन जाए मतवाला।
लेकिन एक इशारो-वाली
जादू मुझ पर चला गई,
'प्यार' शिकारी फंदा उसका,
और मंत्र है 'लवशाला'।

मैंने सोचा, मैं अति सुंदर,
मेरे दम पर लवशाला।
रति-जैसी छवि को भी चाहूँ
तो अपनी हो वह बाला।
लेकिन एक सुघड़ जोगन ने
चूर घमंड किया मेरा,
फिरता मैं अब उसके पीछे
हाथों में ले जयमाला।

मैंने सोचा, मैं हूँ गायक
गीत मधुर गाने-वाला।
मैंने अपनी सुर-लहरी से
सबका हृदय रिझा डाला।
लेकिन एक मधुरवदना की
जैसे ही आवाज सुनी,
बस मैं भूला राग, ताल, सुर,
कंठ बसी अब लवशाला।

मैंने सोचा, मैं प्रतिनिधि कवि,
श्रृंगारी भावों-वाला।
दसियों रूपसियों को मैंने
सब की प्रिया बना डाला।
लेकिन उस कविता जैसी का
जब मुझको श्रृंगार दिखा,
हुई तुरंत बेहोश लेखनी,
बंद हुई यह लवशाला।
डॉक्टर रमेश चंद्र महरोत्रा

शनिवार, 12 जुलाई 2008

अब शुद्ध वायु भी बिकने लगी


इस देश में सब कुछ बिकता है, बोलो खरीदोगे? आपने न जाने क्या-क्या खरीदा होगा, पर शायद शुद्ध हवा कभी नहीं खरीदी होगी, पर अब आप हवा भी खरीदेंगे,यह तय है,क्योंकि इसे बेचने का धंधा फलने-फूलने लगा है। वैसे आपने जब भी अपने वाहन में हवा भराई होगी, निश्चित ही उसके दाम तो दिए ही होंगे, यह उस हवा के बिकने का छोटा रूप है। लेकिन अब शुद्ध वायु आप खरीदने के लिए विवश होंगे, यह एक ऐसा सच है, जिसे अभी तो नहीं, पर कुछ समय बाद आप स्वीकार करेंगे ही।
प्रदूषण के जाल में फँसी हुई शहरी हवा अब साँस लेने लायक नहीं रह गई है। शहरों में एक तरफ कारखानों से निकलता धुऑं और दूसरी तरफ वाहनों से निकलता धुऑं हवाओं में कार्बन डाइऑक्साईड, कार्बन मोनोऑक्साईड, सल्फर डाइऑक्साईड, हाइड्रोजन सल्फाइड, नाइट्रिक ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों का अनुपात बढ़ा रहा है। सिगरेट पीने के कारण फेफड़ों को जितना नुकसान होता है, उससे कहीं अधिक नुकसान राह चलते वाहन से निकलने वाले धुएँ से होता है। निरंतर इस जहरीले वातावरण में साँस लेने के कारण ये जानलेवा गैस हमारे शरीर में प्रवेश करती है। यही कारण है कि आज शहर में बसने वाले करोड़ाें लोग अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, सर्दी-खाँसी, जुकाम आदि श्वसनतंत्र से जुड़े रोगों से पीड़ित हैं। इस प्रदूषित हवा से बचने के लिए लोग शहर से दूर कुछ समय के लिए जाते तो हैं, लेकिन वहाँ भी इनसे छुटकारा मिलना नामुमकिन ही है। यही कारण है कि आज शहर का संपन्न वर्ग प्रदूषित हवा के जहरीले वातावरण से बचने के लिए ऑक्सीजन पार्लर में जाना पसंद करता है।
हमारे यहाँ के महानगर दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु में ऑक्सीजन पार्लर खुल गए हैं। इस पार्लर में एयर कंडिशनर वातावरण में शुद्ध प्राणवायु लेने की सुविधा दी जाती है। पार्लर के संचालक ऐसा दावा करते हैं कि शुद्ध ऑक्सीजन शरीर में जाने के कारण थकान और तनाव से मुक्ति मिलती है और शरीर के उत्तकों को नवजीवन प्राप्त होता है। इन पार्लरों में 30 मिनट शुद्ध हवा साँसों में भरने के लिए 200 से 300 रुपए की फीस निर्धारित की गई है। स्पष्ट है कि इसका लाभ धनिक वर्ग ही ले सकता है। इस संबंध में वैज्ञानिकों का कहना है कि 100 प्रतिशत ऑक्सीजन श्वास में लेने से स्वास्थ्य लाभ मिलता है, ऐसा साबित नहीं हो पाया है। वास्तव में इस शुद्ध वायु के कारण स्वास्थ्य को नुकसान भी पहुँच सकता है।

डॉ. महेश परिमल
ऑक्सीजन बार का यह उद्योग अरबों डॉलर का है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में हाल ही में 'ब्लू कॉम ब्लू' नाम से ऑक्सीजन बार खोला गया है। इस बार में ऑक्सीजन वायु को विविध प्रकार के सुगंधयुक्त तेलों से होकर परिष्कृत किया जाता है। इस बार का मालिक लोरेन्ट फ्रांस में एक साइकिल की प्रतिस्पर्धा देखने गया था, उसने देखा कि साइक्लिंग करने से थके हुए प्रतियोगी ऑक्सीजन बोतल का उपयोग कर फिर से तरोताजा हो जाते थे और दुगुने जोश से फिर स्पर्धा में भाग लेते थे। लोरेन्ट को लगा कि इस प्रकार ऑक्सीजन वायु का उपयोग करने से शरीर के स्नायुओं को ताकत मिलती है और उसने ऑक्सीजन बार खोलने का विचार किया। इस पार्लर में हवा को फिल्टर करने का मशीन लगाया गया है, जिसमें से 95 प्रतिशत शुद्ध ऑक्सीजन मिल सकती है।
फ्रांस का यह ऑक्सीजन बार एक ब्यूटीपार्लर के अंदर शुरू किया गया है। ग्राहक जब मेनीक्योर या पेडीक्योर की ट्रीटमेन्ट करवाते हैं, उस वक्त 15 मिनट के लिए ऑक्सीजन की नली नाक में लगाए रखते हैं। इस पार्लर में 6 प्रकार के सुगंधित तेलों में से ऑक्सीजन को निकाला जाता है। ये सारे तेल ऑर्गेनिक पध्दति से बनाए जाते है। इसके माध्यम से विविध रोगों के उपचार का दावा किया गया है। इस बार में ऑक्सीजन लेने के लिए 10 यूरो अर्थात लगभग 600 रुपए देने होते हैं। तो यहाँ से शुरू हुआ ऑक्सीजन बार का यह महँगा खेल धीरे-धीरे हमारे भारत में भी अपने पैर पसारने लगा है।
मुंबई के दादर में सन 2000 में 'ओ-टू' नाम से ऑक्सीजन बार खोला गया था। इस बार में 20 मिनट ताजी हवा लेने की कीमत 200 रुपए है। यहाँ भी फ्रांस जैसी ही सुगंधित तेलयुक्त ऑक्सीजन वायु की सुविधा ग्राहकोें को प्राप्त होती है। मुंबई की हवा में मात्र 18 प्रतिशत ऑक्सीजन होने का प्रमाण मिलने के बाद स्वास्थ्य के प्रति सचेत धनिक वर्ग इस बार में जाकर ऑक्सीजन वायु का उपयोग करते हुए देखे जा सकते हैं।
चिकित्सकीय दृष्टि से देखा जाए तो हमारे शरीर की कोशिकाएँ ऑक्सीजन के लिए शर्करा का दहन करके उर्जा प्राप्त करती हैं। कोशिकाओं का विभाजन और वृध्दि होने की प्रक्रिया में भी ऑक्सीजन की मुख्य भूमिका होती है, किंतु ऑक्सीजन के साथ अन्य गैस भी उसमें मिली हुई होनी चाहिए। जिस व्यक्ति का ऑपरेशन करना होता है, उसे अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार जो लोग साइक्लिंग जैसी शारीरिक श्रम की स्पर्धा में भाग लेते हैं, उन्हें भी अधिक मात्रा में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। आशय यह है कि स्वस्थ व्यक्ति को 100 प्रतिशत शुद्ध ऑक्सीजन देने की बिलकुल भी आवश्यकता नहीं है, ऐसा चिकित्सा विद्वानों का कहना है।
जो लोग ऑक्सीजन बार से होकर आए हैं, ऐसे लोगों से जब उनके स्वास्थ्य के संबंध में बातचीत की गई तो उल्टी प्रतिक्रिया ही सामने आई। मल्टी नेशनल कंपनी के एकीक्यूटिव अपने अनुभव बताते हुए कहते हैं कि ऑक्सीजन लेने के कारण मुझे बैचेनी होने लगी। कितने लोगों ने 20 मिनट तक ऑक्सीजन लेने के कारण नाक और पेट में दर्द होने की शिकायत की। कितने लोगाें ने दर्द की शिकायत तो नहीं कि पर कोई फायदा महसूस न होने की बात कही। हकीकत में ऑक्सीजन बार के वातानुकूलित, सुगंधित और हल्के संगीत से बना वातावरण दिल और दिमाग को उस समय तक सुकून देता है। 20 मिनट तक इस वातावरण में रहने के कारण वैसे भी व्यक्ति का तनाव दूर हो जाता है और उसे ताजगी का अनुभव होता है।
चिकित्सक की मानें तो जिन्हें फेफड़ों की तकलीफ है या जिनके फेफड़ें कमजोर हैं, यदि वे लोग 100 प्रतिशत शुद्ध ऑक्सीजन लेते हैं तो उस स्थिति में उनके फेफड़ों को नुकसान पहुँच सकता है। अत: वे लोग स्वास्थ्य की दृष्टि से 100 प्रतिशत शुद्ध ऑक्सीजन लेने की सलाह बिलकुल नहीं देते हैं।
भारत में जितने भी ऑक्सीजन बार महानगरों में खोले गए हैं, उसे सरकार की तरफ से सहमति या लाइसेंस नहीं दिया गया है। भारत में नर्सिग होम या हॉस्पीटल खोलना हो, तो इसके लिए स्वास्थ्य विभाग की सहमति लेना और नीति-नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। ऑक्सीजन बार के मामले में ऐसा कोई नियम नहीं बनाया गया है। यही कारण है कि चिकित्सकीय ज्ञान न रखने वाला आम व्यक्ति भी इस प्रकार के बार खोल कर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर सकता है। रोजगार के नए अवसरों में ऑक्सीजन बार एक लाभकारी अवसर के रूप में अपने पैर जमा रहा है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 11 जुलाई 2008

नामधारी सड़कें और उनके कर्त्तव्य


डॉ. महेश परिमल
देश के किसी भी शहर में चलें जाएँ, वहाँ राष्ट्रीय एकता को दर्शाने वाला महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री, आंजाद मार्ग, भगतंसिंह मार्ग, गुरुनानक चौक या फिर उस क्षेत्र के किसी नामधारी शहीद, दिवंगत नेता के नाम से कुछ न कुछ मिल ही जाएगा. दूसरी ओर साहित्यिक विभूतियों के नाम से भी कुछ न कुछ संस्थान, मार्ग या चौक का नामकरण होगा ही. यह बहुत अच्छी बात है, इससे वे सभी गाहे-बगाहे हमें याद आते रहते हैं. हमारी भूलने की आदत पर लगाम कसते हैं.
आजकल सड़कों के नाम स्थानीय दिवंगत नेताओं, सामाजिक कार्र्यकत्ताओं या धन्ना सेठों के नामों से होने लगे हैं. जिस दिन सड़क का नामकरण होता है, उस दिन तो सड़क खूब साफ-सुथरी नई नवेली दुल्हन-सी होती है. इस अवसर पर बहुत से नामचीन लोग इकट्ठे होते हैं, दिवंगत को याद किया जाता है. उन्हें महापुरुष घोषित किया जाता है, उनके आदर्शों पर चलने की दुहाई दी जाती है. घंटे दो घंटे रास्ता जाम रहता है. फिर सब कुछ ठंडा पड़ जाता है.

मुश्किल तब होती है, जब रखरखाव के अभाव में वही सड़क बदहाल हो जाती है.तब उसकी पूछपरख करने वाला कोई नहीं होता. यहाँ तक कि नामकरण के भव्य आयोजन मेें जिन्हें महामानव, महापुरुष बताया गया, उनके सगे-संबंधी, नाते-रिश्तेदार भी उस सड़क की बदहाली की तरफ ध्यान नहीं देते. ये कैसी भक्ति, कैसी आस्था? कथित महापुरुष के नाम से पहचानी जाने वाली सड़क पर बड़े-बड़े गङ्ढे जगह-जगह उखड़ती गिट्टी बदरंग रास्ता. ऐसे में रात-बेरात वहाँ गङ्ढे के कारण कोई दुर्घटना हो गई, कोई अपंग हो गया या फिर मृत्यु को ही प्राप्त हो गया, तब क्या मृतक के परिजन उस नामधारी व्यक्ति का नाम लेकर बार-बार खुद को नहीं कोसेंगे? क्या गुजरती होगी, उस मृतात्मा पर? कभी सोचा है उस महापुरुष के पुत्र-पौत्रों ने. इस तरह से देखा जाए, तो वह नामकरण समारोह एक ओपचारिकता बनकर रह जाता है. बिलकुल सरकारी वन महोत्सव की तरह. इधर मंत्री ने पौधा लगाया, उधर बकरी ने खाया.
अक्सर इस तरह की नामधारी सड़कों के साथ ऐसा ही होता है. वैसे तो सड़कों की मरम्मत का काम लोक निर्माण विभाग या नगर पालिका, नगर निगम का होता है. पर इनसे सड़कों की मरम्मत की आशा करना बेकार है. इन विभागों में यह आम धारणा है कि जब उस नामधारी व्यक्ति से जुड़े लोग ही उस सड़क का ध्यान नहीं रख रहे हैं, तो हम क्यों चिंता करें? उधर वे लोग सोचते हैं कि समारोह के बाद तो सड़क नगर निगम की सम्पत्ति हो गई, वही उसका खयाल रखे. अहम के इस द्वंद्द में बेचारा राहगीर बार-बार लहूलुहान होता है. कभी अपने को कोसता है, कभी उस नामधारी व्यक्ति को.
सवाल यह उठता है कि क्या एक सड़क के नामकरण मात्र से उस व्यक्ति का नाम अमर हो जाता है? अव्यवस्थित सड़क के नाम को लोग कालांतर में भुला देते हैं. वैसे भी व्यक्ति विशेष के नाम से होने वाले इस नामकरण को लोग मुखसुख के कारण छोटे से छोटा कर लेते हैं. एम.जी. रोड, जे.एल.एन. मार्ग आदि बहुत ही प्रचलित हो गए हैं. लेकिन महाराणा प्रताप नगर को एम.पी. नगर और मौलाना आंजाद नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ टेक्नालॉजी को एमएसीटी कहना और गुरु तेग बहादुर काम्पलेक्स को जीटीबी काम्पलेक्स, महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज को एमएलबी कॉलेज कहना कहाँ तक उचित है?

इस तरह से लोग मूल नाम से बहुत दूर निकल जाते हैं. यह तय है कि कुछ वर्षों बाद तो कोई नामलेवा भी नहीं रह जाता, फिर नामकरण समारोह का क्या औचित्य? अच्छा होता उस सड़क के किनारे कुछ पौधे रोप दिए जाते और कुछ समय तक उसकी देखभाल की जाती, तो संभव है कि यह पर्यावरण सुधार की दिशा में एक सार्थक कदम होता. पेड़ से जो लाभ होता, वह सड़क के गङ्ढों से कहीं ज्यादा है. नगर निगम को भी यह आदेश निकालना चाहिए कि जिस नामचीन व्यक्ति के नाम से उक्त सड़क है, निश्चित ही वो धन्ना सेठ है, तो उसका रखरखाव भी वही करे. इस तरह से वे अपने बुजुर्ग सरमायादार की याद को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाएँगे. दूसरी ओर किसी के भी नाम से सड़कों के नामकरण से लोग बाज आएँगे. हर किसी की किस्मत दगड़ू सेठ की तरह नहीं होती कि उनके नाम से गणेश की प्रतिमा को पहचाना जाए. पुणे में आज भी लोग गणेश की एक प्राचीन प्रतिमा को दगड़ू सेठ के नाम से जाना जाता है.
आजकल व्यक्ति के जीते-जी जो नहीं हो पाता, वह उसके मरने के बाद हो रहा है. ंगरीबी और अभाव में तिल-तिलकर मौत के करीब जाने वाले अमीर पुत्र के बेबस पिता जब मृत्यु को प्राप्त होते हैं, तो उनके श्राध्द का बहुत बड़ा आयोजन होता है. उनके नाम से संस्था भी खुल जाती है, क्या यही है सच्ची श्रद्धांजलि!
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 10 जुलाई 2008

जब जागा स्वाभिमान


डॉ. महेश परिमल
अखबार में प्रकाशित एक छोटी सी खबर ने चौंका दिया. मध्यप्रदेश के खरगोन जिले से मात्र तेरह किलोमीटर दूर पीपरखेड़ा गाँव के लोगों ने मिलकर अपने बिजली कनेक्शन काट दिए. वे सभी गाँव में अपर्याप्त बिजली आपूर्ति से त्रस्त थे. एक तो अपर्याप्त बिजली, उस पर बिजली बिल के रूप में मोटी राशि. लोगों को लगा कि इससे अच्छा तो यही है कि अब अंधेरे से ही समझौता कर लिया जाए. इसके सिवाय उनके पास कोई विकल्प नहीं था. अब वहाँ की आटा चक्कियाँ भी डीजल से चलने लगी हैं. लोग शाम से पहले ही अपने भोजन का काम कर लेते हैं और रात को चौपाल पर बैठकर अपने दु:ख-सुख की बातें कर लेते हैं. ऐसे में टीवी की कल्पना ही बेकार है.
गाँव वालों की यह हिम्मत एक पैगाम है, उन सब के लिए, जो लगातार परावलंबी होते जा रहे हैं. आत्मनिर्भरता की बात तो दूर वे आजकल अपना भी कोई काम अकेले नहीं कर पा रहे हैं. ग्रामीणों ने इस तरह का कदम उठाकर सरकार ही नहीं, बल्कि उन अफसरों के गाल पर एक करारा तमाचा मारा है, जो अफसरशाही के अपने ही जाल में उलझे हुए हैं. ग्रामीणों ने सभी को अपने सत्कार्यों से सभी को स्वावलंबन का सबक दिया है. आत्मगौरव, आत्मप्रतिष्ठा भाव, आत्मसम्मान, आत्माभिमान, खुद्दारी, गैरत, पानी और मान ये सभी स्वाभिमान के रूप हैं. यह मनुष्य के भीतर संस्कार के रूप में होता है. कोई मासूम अपने पिता को दिनभर हाड़तोड मेहनत करते देखता है, तो उसके मन में विचार आता है कि वह भी इसी तरह मेहनत करेगा. पर जब वह यह भी देखता है कि इतनी मेहनत के बाद भी घर में हमें ठीक से भोजन तक नहीं मिलता, तो मासूम दु:खी हो जाता है. पर यदि उस परिवार को कोई अनजानी सहायता मिल जाती है, तो पिता उसे लेने से इंकार कर देते हैं, तब मासूम तड़प कर रह जाता है. अगर आज पिताजी उस सहायता को स्वीकार कर लेते, तो हमें एक समय का भोजन तो ठीक से मिल जाता. उस वक्त पिताजी का व्यवहार उसे भले ही अनुचित लगता हो, पर आज वह सोचता है कि अनजाने में पिताजी ने उसे स्वाभिमान का पाठ पढ़ा दिया. स्कूल में तो टीचर ने कितनी तरह से समझाना चाहा, पर समझ में नहीं आया. पर पिता के व्यवहार ने उसे स्वाभिमान का पाठ कितनी अच्छी तरह से समझा दिया.
स्वाभिमान का सुर जिसे एक बार लग जाए, वह जीवन भर दु:खी तो रहता है, पर भीतर से कहीं सुकून की जिंदगी भी जीता है. इसे भले ही कोई न समझे, पर जीवन के पड़ाव पर अक्सर साँस लेते हुए इसका अहसास होता है कि हमसे सुखी कोई नहीं.
बचपन में पढ़ी वह कहानी याद आ रही है, जिसमें खेत में घोंसला बनाकर रहने वाली चिड़िया अपने बच्चों को समझाती है कि जब तक यह किसान अपनी फसल को काटने के लिए दूसरों का मुँह ताकता रहेगा, तब तक हमें यहाँ से कोई नहीं हटा सकता. पर जिस दिन इसने फैसला कर लिया कि अब उसे ही यह काम करना है, तो निश्चित ही हमें दूसरी जगह जाकर अपना घोंसला बनाना होगा. हुआ भी यही. एक दिन उस किसान के भीतर उसका स्वाभिमान जागा और उसने तय कर लिया कि अब दूसरों के भरोसे नहीं रहना है. अब वह स्वयं ही फसल काटेगा, तब चिड़िया ने अपने बच्चों से कहा कि अब हमें यहाँ से जाना ही पड़ेगा, क्योंकि किसान का स्वाभिमान जाग उठा है.

स्वाभिमान का बिगुल जब भी बजता है, तो उसकी आवाज में जिंदगी नई करवट लेने लगती है और संघर्ष के पड़ाव पर स्व-मान और आत्मसम्मान के गारे से एक ऐसी मूरत बनाने का प्रयास किया जाता है, जिसकी स्वयं की एक अलग पहचान हो. यदि व्यक्ति यह कर जाता है, तो इस सफलता के पीछे उसके स्वाभिमान की एक बहुत बड़ी भूमिका होती है.स्वाभिमान का एक और आशय है भीतरी तांकत. यह ऐसी शक्ति है, जिसका भान हमें नहीं होता. इसे तो कोई दूसरा हमें बताए, तभी पता चलता है कि हममें उस काम को अंजाम देने की शक्ति है. कई बार व्यक्ति स्वयं नहीं जानता कि वह क्या कर सकता है. लेकिन जब अवसर आता है, तो वह उस कार्य का संपादन इतने सुलझे हुए तरीके से करता है कि कोई कह नहीं सकता कि वह इस कार्य में अनुभवी नहीं है. ऐसा कई लोगों के साथ हुआ है.
हमने बात शुरू की थी, गाँव में जागे स्वाभिमान से. उस गाँव का यह विचार कई लोगों के सामने सवालिया निशान लगा गया. पहले तो लोगों ने इसे शिगूफेबाजी समझा. पर सचमुच जब गाँव वाले बिना बिजली के रहने लगे, तब दूसरों लोगों को समझ में आया कि निर्भरता कभी भी दगा दे सकती है. आज शहरी जीवन निर्भरता से शुरू होता है और निर्भरता पर ही समाप्त होता है. निर्भरता से कभी साक्षात्कार करना हो, तो शहर के एक ऐसे संयुक्त परिवार की एक ऐसी सुबह देख ली जाए, जहाँ अभी-अभी यह सूचना मिली हो, कि उनके घर आज कामवाली नहीं आ रही है. फिर देखो वहाँ का नजारा. सभी एक झटके में परेशान होना शुरू हो जाएँगे. किसी का कोई काम नहीं हो पाएगा. अधिकारी भी समय पर दफ्तर नहीं पहुँच पाएँगे. ऐसा होता है दूसरों पर निर्भर होने का हश्र.
ऐसा केवल बडे लोगों के साथ होता है, ऐसा नहीं है. ऐसा हर उस इंसान के साथ हो सकता है, जो छोटे-छोटे कामों के लिए भी दूसरों पर निर्भर होता है. ऐसे लोगों की सोच होेती है कि यदि हम अपना काम खुद कर लेंगे, तो इन छोटे लोगों का रोजगार कैसे चलेगा? उनका यह सोचना ंगलत है, क्योकि जहाँ स्वावलंबन है, वहाँ की तस्वीर ही कुछ और होती है. हर कोई सुकून के साथ जीता है, कोई मारा-मारी नहीं होती. लोग परस्पर सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. अनजाने में सभी को जीने का अधिकार मिल जाता है. इस खुशहाली में हर किसी को अपना काम कुछ नए ढंग से करने की प्रेरणा मिलेगी.
जब स्वाभिमान जागता है, तब मनुष्य का आंतरिक विकास प्रारंभ होता है. तब एक सूत्रीय कार्यक्रम यही होता है कि हमें अपने काम के लिए दूसरों का मुँह नहीं ताकना है, बस यही एक ऐसा जज्बा है, जिसमें बहकर इंसान कुछ नया कर गुजरता है. इसकी शुरुआत में ही कई बाधाएँ आती हैं. मगर हमें कुछ भी समझ में नहीं आता. पर यही होती है परीक्षा की घड़ी. यही क्षण सँभलने का होता है. यही हमें सँभलना है, बाद में तो कई राहें खुल जाएँगी. शहरों में आज कई ऐसी संस्थाएँ हैं, जो घर का सारा काम कर देने का आतुर है. पर क्या इससे हमें काम करने के बाद का आत्मसंतोष मिल पाएगा. हम कितने भी रईस हो जाएँ, माँ के पाँव को दबाने वाली कई मशीनें ला दें, पर सच बताएँ माँ के लिए तो सबसे बड़ा सुख होता है जब बेटा अपनी बातें करते हुए माैं का पैर दबाए. यही होता है आत्मसंतोष का क्षण. इस क्षण को माँ के जाने के बाद बेटा उम्र भर नहीं भूलता. याने स्वाभिमान से जागी संवेदना हमें भावना के उस पड़ाव पर ले जाती है, जहाँ अपनापा होता है, स्वाभिमान का सम्मान होता है. आज भले ही हम इसे कोई महत्व न दें, पर यही स्वाभिमान हमें गुलामी की जंजीरों से मुक्त करा चुका है, हमें यह नहीं भूलना चाहिए.
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 9 जुलाई 2008

ऐसे न सताओ निरीह को



नीरज नैयर
गाहे-बगाहे यह आवाज उठती रहती है कि आवारा कुत्तों को सिपुर्र्द-ए-खाक कर देना चाहिए, ठीक उसी तरह से जैसे मुर्गियों को बर्ड-फ्लू के डर से किया गया. कुत्ते रैबीज फैलाते हैं, नींद में खलल डालते हैं इसलिए उन्हें जीने का कोई हक नहीं. दलीलें तो यहां तक दी जाती हैं कि गली-मोहल्लों में घूमते आवारा कुत्तों से डर लगता है. अत: उन्हें सजा-ए-मौत दी जानी चाहिए. पर ऐसी सजा की दरयाफ्त करने वालों ने कभी चश्मा उतारकर एक-एक निवाले को तरसते कुत्तों को गौर से देखा है. भुखमरी के शिकार बेचारे किसी कोने में चुपचाप पड़े रहते हैं. पास आओ तो भाग खड़े होते हैं. वो खुद इतने डरे होते हैं कि कभी-कभी तो अपने अक्स से भी घबरा जाते हैं. फिर भला ये निरीह किसी को क्या डराएंगे. जो खुद डरा हुआ हो वो किसी को डरा भी कैसे सकता है.
कुत्ते सदियों से ही वफादारी की परंपरा को निभाते आए हैं. वो बात अलग है कि मनुष्य जानकर भी अंजान बना रहता है. बेचारे लात खाते हैं, गाली खाते हैं मगर सोते उसी चौखट पर हैं जहां उन्हें कभी आसरा मिला था. मनुष्य भले ही विलासिता के समुंदर में मानवता की गठरी बहाकर क्रूर और निर्दयी बन बैठा हो मगर ये बेजुबान आज भी प्यार का अथाह सागर अपने छोटे से दिल में समाए बैठे हैं. प्यार के बदले प्यार कैसे किया जाता है, यह इनसे बेहतर भला कौन समझा सकता है. मनुष्य हमेशा से ही अपनी जरूरतों के मुताबिक रिश्तों की उधेड़बुन करता रहा है. जिन उंगलियों के सहारे वह चलना सीखता है वक्त निकल जाने के बाद उन्हें झटकने में एक पल की भी देर नहीं करता. जिन कंधों पर बैठकर वह दुनिया देखता है उन कंधों को कंधा देना भी अपना धर्म नहीं समझता. मनुष्य सिर्फ ढोंग करता है. बचपन में सच्चा बनने का और जवानी में अच्छा बनने का, लेकिन बेजुबान, वे बेचारे न तो ढोंग का मतलब जानते हैं और न ही छल-कपट उन्हें आता है. उन्हें आता है तो बस प्यार करना. लाख मारो, लाख सताओ फिर भी एक पुचकार पर उसी स्नेहभाव और आदर के साथ आपका सम्मान करेंगे जैसा हमेशा करते रहे हैं.
रंग बदलने की प्रवृत्ति न तो उनमें कभी थी और न ही कभी होगी. यह काम तो मनुष्य का है. कुत्तों को इंसान का दोस्त समझा जाता है मगर चकाचौंध और ऐशोआराम से भरी मनुष्य की जिंदगी में इस बेजुबान दोस्त के लिए कोई जगह नहीं. गली-मोहल्लों में किसी तरह अपना गुजर-बसर करने वाले आवारा कुत्ते भी अब उसकी आंखों में खटकने लगे हैं. अभी कुछ वक्त पहले बेंगलुरु और उसके बाद जम्मू-कश्मीर में जिस निर्दयता से आवारा कुत्तों को मौत के घाट उतारा गया, ऐसा काम तो सिर्फ इंसान ही कर सकता है. गले में रस्सी बांधकर बड़ी निर्ममता के साथ उन्हें घसीटकर ऐसे गाड़ी में फेंका गया, जैसे वो कोई कूड़े की गठरी हों. बेचारे चीखते रहे, चिल्लाते रहे, अपनी जिंदगी की भीख मांगते रहे, मगर किसी को दया नहीं आई. इन बेजुबानों का कसूर सिर्फ इतना था कि वो शहर के सौंदर्यीकरण में फिट नहीं बैठ रहे थे.
मनुष्य शक्तिशाली है, उसे किसी भी बेजुबान को मारने का हक है, पर उसे ये हक किसने दिया? शायद भगवान ने तो नहीं. सृष्टि की रचना के वक्त ईश्वर ने अन्न बांटने से पूर्व सबसे पहले कुत्तों को बुलाकर कहा, पृथ्वी का सारा अन्न मैं तुम्हें देता हूं, पर कुत्तों ने निवेदन किया कि इतने अन्न का हम क्या करेंगे? अन्न आप मनुष्य को दे दीजिए. वो खाने के बाद जो कुछ भी बचाएगा हम उससे गुजारा कर लेंगे. बद्किस्मती से मनुष्य खाता तो खूब है मगर कुत्तों के लिए बचाता बिल्कुल नहीं. खाने की हर दुकान के सामने बेचारे टकटकी लगाए इस उम्मीद में बैठे रहते हैं कि शायद मनुष्य को उनके हाल पर दया आ जाए, पर अमूमन ऐसा होता नहीं. टिन के पिचके हुए डब्बे की माफिक पतला-सा पेट, आंखों में डर और खामोशी लिए बेचारे एक-एक दाने के लिए यहां-वहां भटकते रहते हैं. कुछ रुखा-सूखा मिल गया तो ठीक वरना भूखे ही सो जाते हैं, पर वफादारी और प्यार के जज्बे पर कभी भूख को हावी नहीं होने देते. ऐसे निरीह को बेतुकी दलीलों और शहर के सौंदर्यीकरण की खातिर मौत की नींद सुला देना क्या हम इंसानों को शोभा देता है?
नीरज नैयर

मंगलवार, 8 जुलाई 2008

अस्तित्व की लड़ाई लड़ती पारसी कौम


डॉ. महेश परिमल
पारसी कौम यह वास्तविक अल्पसंख्यक वर्ग आज अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड रहा है. वास्तव में यही है अल्पसंख्यक वर्ग. जहाँ आज एक वर्ग विशेष की आबादी में तेजी से इजाफा हो रहा है, वहीं इस वर्ग पर आज घटती आबादी का संकट छाया हुआ है.
पारसी याने फारस से आए लोग. ये लोग कहाँ के हैं, भारत कैसे आए, इनकी संस्कृति क्या है, इनके संस्कार क्या हैं, ये सब बातें बाद में. पहले यह जान लें कि आज हमारे देश में यह पारसी कौम दूध में शक्कर की तरह मिल गई है. अगर पारसियों के नाम गिनाए जाएँ, तो यह फेहरिश्त काफी लम्बी हो जाएगी. फिर भी यदि हम दादा भाई नवरोजी, जमशेद जी टाटा, जनरल मानेक शॉ, रुसी मोदी, जनरल ए.एन. सेठना, फिरोह शाह मेहता, पीलू मोदी, सोहराब मोदी, होमी जहाँगीर भाभा, फिरोज गाँधी, मैडम कामा, प्रोफेसर दावर, गोदरेज, वाडिया, फ्रेडी मरक्यूरी, जुबिन मेहता, रोहिन्टन मिस्त्री आदि ऐसे सफल व्यक्तित्व हैं, जिसे भारत की जनता जानती समझती है. आज इनके लिए यक्ष प्रश्न यह है कि यह कौम अपनी लुप्त होती जाति को कैसे बचाए? आज स्थिति यह है कि जब दो पारसी पैदा होते हैं, तब तक 85 पारसी मौत के मुँह में समा चुके होते हैं.
इसमें कोई दो मत नहीं कि पारसी कौम सबसे अधिक सुसंस्कृत, धनाढय और प्रगतिशील मानी जाती है. भारत के विकास में इस कौम के बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता. आज इस कौम की जन्मदर में लगातार गिरावट आती जा रही है. अपने धर्म के प्रति कट्टर रवैया अपनाने वाले इन पारसियों की आबादी में डेढ़ सौ साल पहले से कमी आना शुरू हो गई. 1941 की जनगणना में इनकी आबादी एक लाख 14 हजार 533 थी, 1971 में यह घटकर 91 हजार 678 हो गई. 2001 में यह जनसंख्या 69 हजार 601 दर्ज की गई. 17 साल बाद यह कम होते-होते मात्र 58 हजार रह जाएँगे. घटने की यह दर यदि इसी तरह रही, तो 2101 में यह कौम पूरी तरह से विलुप्त हो जाएगी.
पारसियों की जन्मदर में लगातार आ रही गिरावट के पीछे वे स्वयं हैं. अपने धर्म के प्रति सख्त रवैया अपनाने के कारण ये लोग किसी दूसरे सम्प्रदाय में वैवाहिक संबंध नहीं बनाते. ऐसा माना जाता है कि इस कौम की किसी ने यदि किसी दूसरी कौम के युवक से शादी कर ली, तो ये लोग उसे कन्या को समाज से बहिष्कृत कर देते हैं. यदि युवती का पति पारसी धर्म अपनाना चाहे, तो ये उसे भी अपने धर्म में शामिल नहीं करते. इसके विपरीत यदि किसी पारसी युवक ने दूसरी कौम की कन्या से विवाह कर लिया, तो यह उनकी संतान को तो अपने धर्म में शामिल कर लेंगे, पर उस युवती को अपने धर्म में किसी भी हालत में शामिल नहीं करते. अपने धर्म के प्रति रुढ़िवादिता के कारण ही यह कौम आज विलुप्ति के कगार पर है. इस के खिलाफ पारसी युवतियों ने कुछ समय पूर्व अपने धर्मगुरुओं के सामने अपनी बात रखी थी और यह दलील पेश की थी कि पारसी युवक यदि अन्य कौम की युवती से विवाह करते हैं, तो उनकी संतानों को 'नवजोत' की अनुमति न दी जाए. अब तक यही होता आ रहा था कि पारसी युवक यदि दूसरे कौम की युवती से विवाह करते, तो उनकी संतानों को 'नवजोत' की अनुमति मिल जाती थी. लेकिन पुत्रवधू को पारसी सम्प्रदाय में शामिल नहीं किया जाता. युवतियों का विरोध इस बात पर था कि पारसी समुदाय की युवतियाँ यदि दूसरे कौम के युवक से विवाह करती हैं, तो उनकी संतानों को भी 'नवजोत' की अनुमति दी जाए. युवतियों की इस दलील को स्वीकार्य नही किया गया. अंत में इस बात का विरोध होने पर इसे अस्वीकार कर दिया गया.

ऐसी बात नहीं है कि पारसियों ने अपनी आबादी बढ़ाने का कोई उपाय नहीं किया. दस वर्ष पूर्व इस दिशा में उन्हीं के द्वारा एक गंभीर प्रयास किया गया था. जिसमें तीसरी संतान पैदा करने पर पारसी परिवार को प्रतिमाह एक हजार रुपए की सहायता देने का निर्णय लिया गया था. किंतु इस दस वर्षों में इस योजना का लाभ केवल 110 दम्पतियों ने ही लिया है. आज प्रति 9 पारसी परिवारों में से मात्र एक परिवार में ही छह वर्ष से छोटा बालक देखने को मिलेगा. 12 प्रतिशत पारसी दम्पति नि:संतान हैं. पारसी धर्म में दत्तक पुत्र लेने की परंपरा नहीं है. पहले ऐसा होता था कि कोई पारसी यदि किसी संस्था में कार्य करता, तो उसकी पूरी कोशिश होती कि अन्य पारसी युवक-युवती भी इस संस्था से जुड़ जाएँ. पर टाटा और गोदरेज कंपनियाँ पारसियों की होने के बाद भी अब वे केवल योग्यता के अनुसार लोगों की नियुक्ति बिना पक्षपात के करती हैं. अत: इस संबंध में पारसियों को मिलनसार और मददगार कहने के साथ-साथ निष्पक्ष भी कहा जा सकता है.
मुम्बई में किए गए एक सर्वे के अनुसार 66 प्रतिशत पारसियों की आय दस से बीस हजार रुपए प्रतिमाह है. 97 प्रतिशत पारसी शिक्षित हैं. जहाँ एक ओर प्रतिवर्ष 900 से एक हजार पारसी मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतिवर्ष केवल 300 से 350 पारसी बच्चों का जन्म होता है. इस कौम में बुजुर्गों की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है.
पारसी जाति अत्यंत उदार है, लेकिन धर्म के मामले में उसकी कट्टरता को लेकर आज की पीढ़ी के पारसी युवा इससे आहत हैं. उनका मानना है कि यदि हमारे धर्मगुरु थोड़ा-सा नरम रवैया अख्तियार करें, तो इस धर्म से प्रभावित होकर हजारों लोग इसमें शामिल होना चाहते हैं. इस कौम के करीब 36 प्रतिशत युवा दूसरे सम्प्रदाय में विवाह करते हैं.
हर क्षेत्र में पारसियों ने अपनी महत्ता सिध्द की है. चाहे वह व्यापार जगत हो, या फिर फिल्म जगत, विज्ञान का क्षेत्र हो या चिकित्सा और कानून का क्षेत्र. हर जगह इन्होंने अपनी एक अमिट पहचान बनाई है. जोश से भरे और धुन के पक्के पारसियों ने ही हॉटल ताज को खड़ा किया. भारत में सेंट्रल बैंक की स्थापना भी इन्होंने ही की. शेयर बाजार उन्हीं की देन है. भारत ही नहीं विदेशों में भी उन्होंने अपना परचम फहराया. भीख को अनैतिक मानने वाले पारसी मेहनत से कभी जी नहीं चुराते, जो भी कमाते हैं, उसमें से कुछ राशि समाज कल्याण के क्षेत्र में अवश्य लगाते हैं. अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, धर्मशाला खोलकर सरकार को दान देने की इनकी पुरानी आदत है.

पारसियों का भारत आगमन
पारसी मूल रूप से ईरान के फारस जिले के थे. वहाँ आतताइयों से त्रस्त होकर उन्होंने भारत आने का निर्णय लिया. लगभग 11 सौ वर्ष पूर्व ईरान से निकले कुछ अनजाने परदेशी गुजरात के वलसाड़ में संजाण बंदरगाह पर उतरे. यही थे पारसी. जिन्होंने अपने धर्म को सुरक्षित रखने के लिए भारत की शरण ली. इनके साथ थी स्वयं पर हुए अत्याचार की दास्तां और धर्म की साक्षी पवित्र अग्नि. किंवदंती है कि जब उन्होंने भारत की सरजमीं पर अपने कदम रखे, तब वहाँ के राजा से वहाँ रहने की अनुमति माँगी, तब राजा ने दूध से भरा कटोरा उनके सामने पेश करते हुए कहा कि यहाँ तो सभी धर्मों के लोग बसे हुए हैं, आप इसमें अपनी जगह कैसे बना पाओगे? तब पारसियों में से एक बुजुर्ग ने दूध से भरे कटोर में शक्कर मिलाते हुए कहा था कि हम इस तरह इसमें मिल जाएँगे. और हुआ भी यही. पारसी कौम आज भारत में दूध में शक्कर की तरह घुल गई है.
इस प्रगतिशील जाति ने भारत को क्या नहीं दिया. आज मुम्बई का जो स्वरूप है, वह पारसियों की ही देन है. इन्हें जहाँ पहली शरण मिली, वहाँ की भूमि को अपनी मातृभूमि माना और वहाँ की भाषा को मातृभाषा. इसलिए पारसी हमें गुजराती बोलते हुए ही मिलेंगे. गुजराती साहित्यकारों ने भले ही इनकी उपेक्षा की हो, किंतु गुजराती साहित्य के प्रति इनके समर्पण को अस्वीकार नहीं किया जा सकता. एक समय ऐसा भी था, जब पारसी थिएटर का बोलबाला था. भारत में नाटकों की शुरुआत पारसियों ने की, इसे कोई झुठला नहीं सकता. पारसियों का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता.
आज यही कौम विलुप्ति के कगार पर है. अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे पारसी समुदाय यदि अपने रुख में थोड़ी सी नरमी दिखाएँ, तो संभव हे इनकी वंशबेल फिर से हरी हो सकती है. नहीं तो संभव है आने वाले सौ सालों में इस जाति के पूरी तरह से विलुप्त होने से इंकार नहीं किया जा सकता. समझ में नहीं आता कि यदि पक्षियों की कोई जाति विलुप्त होने लगती है, तो विश्व भर के चिंतक के माथे पर पेशानी झलकती है, पर एक मानव जाति आज यदि अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़े, तो उनके साथ कोई नहीं है. किसी के चेहरे पर कोई पेशानी नहीें है. कैसे मानव हैं हम?

एक तथ्य
भारत में सबसे अधिक शांत, मिलनसार और शिक्षित मानी जाने वाली पारसी कौम की विश्व में कुल आबादी मात्र एक लाख है. इसमें से 65 हजार केवल भारत में हैं. केवल मुम्बई में ही 55 हजार से अधिक पारसी बसते हैं. शेष दस हजार भारत के अन्य राज्यों में अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं.
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 7 जुलाई 2008

ऐसे क्रिकेटर किस काम के


नीरज नैयर
अभी हाल ही में एक खबरिया चैनल के टॉक शो में इस बात पर बहस चल रही थी कि क्या सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न से नवाजा जाना चाहिए. जाहिर है क्रिकेट को धर्म और क्रिकेटरों को देवता समझने वालों के मुंह से न कैसे निकल सकता है. सो अधिकतर लोगों के हाथ हां में ही खड़े हुए. खेल जगत में अगर सचिन की उपलब्धियों को सहेज कर देखा जाए तो उनके कद के आगे हर पुरस्कार छोटा है. अपने चौकों-छक्कों से क्रिकेट की किताब में भारत की जो तस्वीर उन्होंने उकेरी है वह अतुल्य है. खेल की दुनिया के बड़े से बड़े सम्मान पर बेशक सिर्फ और सिर्फ उनका ही नाम हो सकता है लेकिन जहां तक भारत रत्न का सवाल है कोई क्रिकेटर इसका हकदार नहीं दिखाई देता. भारत रत्न किसी ऐसे व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जिसने हर पहलू में देश के लिए अनुकरणीय योगदान दिया हो. सचिन ने खेल दुनिया में बहुत कुछ किया पर समाज के लिए उनके या किसी भी अन्य क्रिकेटर ने कभी कुछ किया हो ऐसा याद नहीं आता. क्रिकेट अन्य देशों के लिए भले ही एक खेल से ज्यादा कुछ न हो मगर भारत में यह किसी धर्म से कम नहीं. क्रिकेट के प्रति समर्पण और उन्माद का जो नजारा भारत में देखने को मिलता है वह कहीं और नहीं मिल सकता. क्रिकेट अगर यहां धर्म है तो क्रिकेटर भी किसी अवतार से कम नहीं. उन्हें यहां भगवान की तरह पूजा जाता है, उनकी मंगलकामना के लिए व्रत रखे जाते हैं, हवन किए जाते हैं. हां, उनके खिलाफ कभी-कभार नाराजगी जरूर झलक पड़ती है मगर वो भी क्षणिक भर से ज्यादा नहीं. ठीक वैसे ही जैसे कोई भक्त मनोकामना पूरी न होने पर थोड़ी देर के लिए तो मुंह फुला सकता है मगर हमेशा के लिए अपने भगवान से रूठे नहीं रह सकता. विश्वकप जैसे अहम् मुकाबलों में हारने के बाद भले ही उनके घरों पर पत्थर फेंके जाते हों मगर बांग्लादेश जैसी दोयम दर्जे की टीम को हराने के बाद कंधें पर भी उन्हें ही बिठाया जाता है. सही मायनों में कहें तो क्रिकेट शहर से लेकर गांव तक बच्चों से लेकर बूढ़ों तक देश को धर्म की भांति एक सूत्र में पिरोने का काम करता है. क्रिकेट और क्रिकेटरों का देश में एकक्षत्र राज है उनके आगे किसी दूसरे को तवाो दी गई हो ऐसा शायद ही कभी देखने-सुनने में आया हो. भले ही इस उपमहाद्वीप पर क्रिकेट में आए पैसे की बात सबसे अधिक होती है लेकिन सही मायने में देखा जाए तो केवल भारत ही कुबेर है. पिछली भारत-पाक सीरीज के वक्त पाकिस्तानी खिलाडी यह गुजारिश करते फिर रहे थे कि किसी भारतीय कंपनी के साथ करार करवा दो. उनकी कमाई का अंदाजा तो इससे ही लगाया जा सकता है कि साक्षात्कार चाहने वाले पत्रकारों से वह 100-200 डॉलर मांगने में भी गुरेज नहीं करते. पिछले दस सालों के दौरान क्रिकेट में इतना पैसा आया है कि इससे जुड़े लोगों से संभाले नहीं संभलरहा है. सिर्फ सचिन, सौरव और गांगुली ही नहीं धोनी-युवराज जैसे खिलाड़ियों की युवा ब्रिगेड भी करोड़ों में खेल रही है. कॉरपोरेट जगत के तकरीबन 60 फीसदी विज्ञापनों पर क्रिकेटरों का कब्जा है, इसके अलावा बोर्ड द्वारा दी जाने वाली रिटेनरशिप फीस से लाखों के वारे-न्यारे अलग हो जाते हैं.
धोनी एक फीता काटने के 20 लाख लेते हैं तो युवराज रैंप पर चलने को 40. क्रिकेट ने इन लोगों को इतना दिया है कि दोनों हाथों से लुटाने पर भी जेब खाली नहीं होने वाली. पर अफसोस कि दोनों हाथ से लुटाना तो दूर इनकी जेब से एक धेला तक नहीं निकलता. दुनिया के हर धर्म में परोपकार और सामाजिक दायित्व का तत्व विद्यमान होता है मगर जब बात हमारे क्रिकेटरों और क्रिकेट की आती है तो इसका साया तक उन पर नहीं दिखाई देता. देश की जनता से क्रिकेटरों को जो शानो-शौकत मिली है उसके बदले में वह कभी कुछ लौटाते नजर नहीं आते. पड़ोस में पाकिस्तान की ही अगर बात करें तो इमरान खान ने अपने सेलेब्रिटी स्टेटस की बदौलत ही कैंसर का एक बड़ा सा अस्पताल खड़ा कर डाला. आस्ट्रेलिया के स्टीव वॉ वर्षो से बच्चों के कल्याण के लिए कुछ न कुछ करते रहे हैं. ऐसे ही न्यूजीलैंड के क्रिस कैंस से लेकर टेनिस स्टार रोजर फेडरर तक हर कोई समाज के प्रति अपनी भूमिका पर खरा उतरा है. मगर लगता है हमारे क्रिकेटरों को इस बात से कोई सरोकार नहीं, उन्हें सरोकार है तो बस इस बात से कि कैसे कम से कम वक्त में ज्यादा से ज्यादा पैसे बटोरे जाएं. हमारे देश में सचिन तेंदुलकर भले ही एक-आध बार कैंसर पीड़ित बच्चों में खुशियां बांटते नजर आए हों पर बाकि खिलाड़ियों के पास तो शायद इतना भी वक्त नहीं. कहने का मतलब यह हरजिग नहीं है कि क्रिकेटर सबकुछ छोड़कर समाज सेवक बन जाएं, किसी सेलिब्रिटी के समाज कल्याण के कार्यो से जुड़ना उसके उद्देश्यों की प्राप्ति में प्रेरक होता है. बड़े नामों के साथ आने से न केवल मुद्दे सुर्खियों में रहते हैं बल्कि उन्हें आर्थिक सहायता का सहारा भी मिल जाता है. बॉलीवुड का ही अगर उदाहरण लें तो उसने समाजिक दायित्व का निर्वाहन करने में हमेशा मिसाले पेश की हैं. सुनील दत्त और नर्गिस का युद्ध के दिनों में सैनिकों का हौसला बढाना भला कौन भूल सकता है. सूनामी जैसी आपदाओं के वक्त भी क्रिकेटरों के हाथ भले ही न खुले हाें मगर बॉलीवुड कलाकार दिल खोलकर मदद के लिए तैयार रहे हैं. हालांकि यह बात अलग है कि उनकी कोशिशों पर रह-रहकर सवाल भी उठते रहे हैं. कोई इसे पब्लिसिटी स्ंटट कहता हैं तो कोई कुछ और. पर हमारे क्रिकेटर तो कभी भी कुछ ऐसा करने की जहमत नहीं उठाते जिससे वे इन सवालों में घिरें.
यह सिर्फ अकेले खिलाड़ियों की ही बात नहीं है, घर का बड़ा ही अगर नालायक हो तो फिर बच्चों के क्या कहने. दुनिया के सबसे अमीर बोर्ड का दर्जा पाने वाले बीसीसीआई का भी सामाजिक दायित्व से दूर का नाता नहीं है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का सालाना कारोबार करोड़ों रुपए का है, वर्ल्ड कप के दौरान महज टीवी करार से ही उसने 1200 करोड़ से अधिक की कमाई की थी. मगर आज तक शायद ही कभी कोई ऐसी खबर सुनने में आई हो जब बोर्ड ने खुद आगे बढ़कर समाज के लिए कुछ किया हो. सिवाए बरसो-बरस आयोजित होने वाले एक-दो चैरिटी मैचों के. अक्सर सुनने में आता है कि फंला खिलाड़ी ने आर्थिक तंगी के चलते मौत को गले लगा लिया, इसका सबसे ताजा उदाहरण उत्तर प्रदेश का है, जहां आर्थिक बदहाली ने एक होनहार रणजी खिलाड़ी को जान देने पर मजबूर कर दिया. क्या बीसीसीआई का ऐसे खिलाड़ियों के प्रति कोई दायित्व नहीं . बोर्ड कतई चैरिटी न करे मगर इतना तो कर सकता है कि क्रिकेट मैच के टिकट ब्रिकी से होने वाली आय में से एक रुपया ऐसे खिलाड़ियों के कल्याण में लगा दे. देश के लिए कुछ करना तो बहुत दूर की बात है अपनी खिलाड़ी बिरादरी के लिए तो बोर्ड कुछ कर ही सकता है. क्या इतना बड़ा कारोबार और क्रिकेटरों की चमक-धमक महज मनोरंजन तक ही सीमित है. क्या बोर्ड और खिलाड़ियों का जेब भरने के अलावा कोई सामजिक दायित्व नहीं है, और अगर नहीं है तो फिर ऐसा क्रिकेट और क्रिकेटर किस काम के.
नीरज नैयर
09893121591

शनिवार, 5 जुलाई 2008

आज की जरूरत बनता दिखावा


डॉ. महेश परिमल
कहा जाता है कि बड़े लोगों की बड़ी बातें, पर क्या आप जानते हैं कि बड़े लोगों की छोटी-छोटी बातें भी होती हैं? बड़े लोगों की बड़ी बातों को लोग जल्द ही अपने जीवन में अमल में लाते हैं, पर उनकी छोटी बातों को नजर अंदाज किया जाता है। वास्तव में यही छोटी बातें ही होती हैं, जिसे अमल में लाया जाना चाहिए। कहा गया है कि सादा जीवन उच्च विचार को अपने जीवन में उतारोगे, तो कभी दु:खी नहीं होगे। आज यह सूत्र वाक्य जाने कहाँ चला गया है। दिखावा और बस दिखावा, यही एक ऐसा मूल मंत्र बन गया है कि लोग अपना चेहरा ही नहीं, बल्कि चरित्र और व्यक्तित्व का भी दिखावा करते हैं।
अब सुनें बड़े लोगों की छोटी बातें:- भारत के अरबपति धनाढयों में पहले दस में आने वाले और फोर्ब्स मैगजीन के धनाढयों में 60 वें नम्बर में आने वाले 12.7 बिलियन डॉलर वाले विप्रो कंपनी के मालिक अजीम प्रेमजी हमेशा टोयोटा कोरोला कार का उपयोग करते हैं और बड़े शहरों में जाते वक्त वहाँ फाइव स्टॉर होटल या किसी क्लब में ठहरने के बजाए कंपनी के गेस्ट हाउस में ही रहते हैं। उन्होंने अपने बेटे की शादी के रिसेप्शन में मेहमानों को कागज की प्लेट में भोजन दिया था, चाँदी, स्टील या मैलेमाइन की डिश में कदापि नहीं। इसे उनकी सदाशयता ही कहा जा सकता है कि असाधारण होते हुए भी वे कहीं बहुत ही साधारण हैं। दुनिया में सबसे अधिक अमीर वॉरेन बुफे 62 बिलियन डॉलर के मालिक हैं। 50 साल पहले केवल 31 हजार 500 डॉलर में जो घर खरीदा था, वे अभी भी उसी में निवास कर रहे हैं। इसी तरह 2.3 बिलियन डॉलर के मालिक जॉन कोडवेल अपने बाल स्वयं काटते हैं। उन्हें नाई के यहाँ जाना गँवारा नहीं, वे आज भी सेल से कपड़े खरीदते हैं। अमीरों की सूची में 26 वें क्रम में आने वाले वेलटेन 19.2 बिलियन डॉलर के मालिक होने के बाद भी अपनी 15 वर्ष पुरानी डोजडाकोटा कार का इस्तेमाल करते हैं। इनकी इन आदतों से हम कह सकते हैं कि ये कंजूस हैं, पर इसे इनकी मितव्ययिता माना जाए। इन्हें यह अच्छी तरह से मालूम है कि दिखावे से कुछ नहीं मिलता, बल्कि जो सुकून सादे जीवन में है, वह उच्चवर्गीय जीवन में कदापि नहीं।
पुराने जमाने में राजा लोग अपने राय की असलियत जानने के लिए आम आदमी के वेश में रात को घूमते थे। इससे उन्हें अपनी प्रजा के सुख-दु:ख की जानकारी हो जाती थी। आज भी बड़ी कंपनियों के जासूस एक आम आदमी बनकर ही कंपनी के खिलाफ चलने वाले षडयंत्रों की जानकारी प्राप्त करते हैं। लेकिन अब आम आदमी की भूमिका लगभग खत्म होती जा रही है। अब तो हर जगह धन और दिखावे का बोलबाला है। जितना अधिक दिखावा, उतना अधिक सम्मान और उतनी प्रसिद्धि। यह आज के कथित अमीर लोगों का सूत्रवाक्य बन गया है।
आज तो एक अधिकारी भी थोड़ी सी सुविधा पाकर अपने को विशिष्ट समझने लगता है। एक गरीब वर्ग की शादी में भी अधिक से अधिक शान-ए-शौकत का दिखावा होता है। कोई सामान्य बनना ही नहीं चाहता। अपने आपको विशिष्ट बताने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते? सादा जीवन तो आज एक सपना बनकर रह गया है। आज के साधु-संत भी ऐश्वर्यशाली जीवन जीने के आदी हो गए हैं। कभी किसी ने किसी संत की सम्पत्ति जानने की कोशिश की है। केवल आश्रम ही नहीं, बल्कि हजारों एकड़ जमीन के वे स्वामी होते हैं। कथा करने वाले संत भी अपने पूरे तामझाम के साथ चलते हैं। पूरा एक उद्योग समूह उनके साथ-साथ होता है। अपने प्रवचन में वे भले ही सादा जीवन जीने की वकालत करते हों, पर वास्तव में उनका जीवन ही सादा नहीं होता। कई लोगों का सादा जीवन भी दिखावे का होता है। एक बार नेहरु जी ने महात्मा गांधी से कहा था कि बापू हमें आपकी गरीबी को बरकरार रखने के लिए अमीर आदमी से अधिक खर्च करना पड़ता है। यह सभी जानते हैं कि बापू भले ही सादा जीवन जीते हों, पर उन्हें जनता ने ही विशिष्ट बना दिया था, इसलिए वे जहाँ भी जाते, झोपड़ी में रहते। अब हर जगह उन्हें झोपड़ी नसीब नहीं होती, इसलिए उनके लिए अलग से झोपड़ी बनाई जाती। यह एक अलग ही खर्च था। इसके अलावा उनके लिए सादे जीवन की सारी चीों वहाँ मुहैया कराई जाती। जिसका खर्च कुछ अधिक ही आता, इसीलिए नेहरूजी को बापू से ऐसा कहना पड़ा।

आजकल हमारे समाज में दिखावा कुछ इस कदर हावी है कि सामान्य कुछ भी नहीं है। छोटी सी पार्टी भी क्यों न हो, वहाँ भी चारों ओर दिखावे का ही प्रदर्शन होता है। कोई अपने को छोटा बताना ही नहीं चाहता। दरअसल हमारी व्यवस्था में ही दिखावा अनजाने में ही शामिल हो गया है। अब आम आदमी का प्रतिनिधित्व करने वाला अचानक चुनाव जीतकर विशिष्ट हो जाता है। ढेर सारी सरकारी सुविधाएँ पाने के बाद उसे वही छोटे लोग अच्छे नहीं लगते। रक्षाबंधन के अवसर पर विशिष्ट महिलाएँ ोल जाकर कैदियों को राखी बांँधती अवश्य है, पर इसकी सूचना प ्रेस या टीवी वालों को पहले से देना कभी नहीं भूलती। इसे दिखावा न कहा जाए तो फिर क्या कहा जाए? दिखावे का स्तर यहाँ तक गिर गया है कि लोग समाज में उच्च स्थान प्राप्त करने के लिए आयकर अधिकारियों से मिन्नतें करते हैं कि हमारे यहाँ एक बार छापा मारें। ताकि समाज में उनका नाम बेशुमार अचल सम्पत्ति के मालिक के रूप में शामिल हो जाए।
कहा जाता है कि जिस पेड़ पर फल जितने अधिक होंगे, वह उतना ही झुका हुआ होगा। पर आज ऐसा नहीं है, जो जितना अधिक दिखावा करता है, समाज में उसकी इात उतनी अधिक होती है। आज के नेताओं को ही देख लो। एक मंत्री के काफिले के आगे पीछे इतनी अधिक गाड़ियों का आखिर क्या मतलब है? वही दिखावा। यदि यही लोग चुपचाप बिना तामझाम के आने-जाने लगें, तो फिर उनकी क्या इात रह जाएगी? आखिर मंत्री पद नहीं रहने पर वे बिना तामझाम का जीवन जीते हैं, तो फिर पद पाकर इतना तामझाम आखिर क्यों स्वीकार कर लेते हैं? आजकल पुलिस की गाड़ी भी निकलती है, तो साइरन बजाते हुए निकलती हैं, अनजाने में यह लोगों को चेतावनी है कि रास्ते से हट जाएँ। चोर तो खैर सचेत हो ही जाते हैं। अपने उत्पाद की सही स्थिति की जानकारी के लिए कंपनियाँ बाजार सर्वेक्षण कराती हैं। क्या इससे सही स्थिति की जानकारी सचमुच हो पाती है? बड़ी साधारण सी बात है कि अपनी कंपनी या उत्पाद के बारे में यदि सच्चाई जाननी है, तो किसी आम आदमी से पूछ लो, पता चल जाएगा। इसके लिए तामझाम की कतई जरूरत नहीं। पर ऐसा नहीं हो पाता। आज जमाना अपनी माकर्ेंटिंग का है, जो जितना अधिक अपने आपको पदर्शित करेगा, वह उतना ही अधिक सफल माना जाएगा। ऐसे में अमीरों की सूची में उच्च स्थान प्राप्त करने वाले यदि मितव्ययिता से जीयें, तो लोग उन्हें बेवकूफ ही मानेंगे। पर वे यह भूल जाते हैं कि यही है सच्चा जीवन, जो लोगों को उनसे जोड़कर रखता है। विशिष्ट वह होता है, जो लोगों से अधिक से अधिक जुड़ा होता है। सुरक्षा बलों से घिरा हुआ व्यक्ति विशिष्ट हो सकता है, पर कुछ लोगों के लिए ही, आम आदमी से उसकी पहुँच बहुत ही दूर होगी।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 4 जुलाई 2008

छोटे परदे पर बड़ों का कब्जा


डॉ. महेश परिमल
आजकल मायानगरी के सितारे छोटे परदे पर कब्जा जमाने में लगे हैं। अब उन्हें पता चल गया है कि यह बुद्धू बक्सा बड़े काम का है। यही वह माध्यम है, जिससे गाँव-गाँव तक पहुँचा जा सकता है। टीवी आज सुदूर गाँव तक अपनी पहुँच गया है, इसे हम सभी जानते हैं। आज बॉलीवुड के कई अभिनेता टीवी पर आने की कोशिश कर रहे हैं, कुछ तो इसमें सफल भी हो गए हैं। टीवी की अहमियत को अब हर कोई समझने लगा है, इसलिए हालात लगातार बदल रहे हैं। अब टीवी का एक बहुत ही बड़ा वर्ग उन दर्शकों का है,जो महानगरों में नहीं रहता, बल्कि सुदूर गाँवों में रहता है और अपने मनपसंद नायक-नायिका को अपने ड्राइंग रुम में पाता है।
टीवी कार्यक्रम में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में होता है 'टेम' याने टेलीविजन ओडियंस मेजरमेंट, यही 'टेम' है,जो दर्शकों के साथ-साथ धारावाहिकों के निर्माताओं को आकर्षित करता है। यह एक प्रकार की रेटिंग है, अखबारों में पाठकों की संख्या महत्व की होती है, उसी तरह टीवी चैनलों पर प्रसारित कार्यक्रमों का 'टेम' महत्वपूर्ण है। टीवी की आवक विज्ञापनों से होती है। इन दिनों टीवी पर करीब 300 चैनल दिखाए जा रहे हैं। इस वर्ष के अंत तक 200 और नए चैनल आ जाएँगे। तब स्पर्धा और बढ़ेगी, दर्शकों को अपनी ओर खींचने के लिए ये चैनल नित नए प्रयोग करेंगे, इस स्पर्धा में अपने को टिकाए रखने के लिए कुछ चैनल अश्लीलता को भी परोसेंगे, इसमें शक नहीं। निश्चित रूप से इस तरह के चैनलों का अपना दर्शक वर्ग होगा। लोग इसमें रुचि लेने लगेंगे। इसलिए जो कुछ होगा, वह दर्शकों की पसंद का ही होगा, यह तय है।
पहले बॉलीवुड स्टार्स टीवी को हिकारत की नजर से देखते थे, टीवी पर काम करने वाले उनकी नजर में कुछ भी नहीं थे। आज भले ही वे टीवी पर चिपककर अपने कार्यक्रम बेच रहें हों, पर सच यही है कि ये स्टार्स भी चाहते हैं कि लोग उसकी प्रतिभा को पहचाने, यही टीवी धारावाहिकों या कार्यक्रमों को बनाने वाले चाहते हैं कि स्टार्स की लोकप्रियता को भुनाया जाए।

टीवी पर सबसे पहले लोगों ने बिग बी को देखा, तो कई लोगों का माथा ठनका। 'कौन बनेगा करोड़पति' के माध्यम से जब अमिताभ बच्चन ने अपनी आवाज और अपने अभिनय से लोगों को रिझाया, तब सभी ने यही सोचा कि यह तो कमाल हो गया। इसके बाद तो अनुपम खेर, गोविंदा, मनीषा कोइराला ने टीवी पर आकर अपना भाग्य आजमाया, पर वे सभी विफल रहे। इसके बाद तो आज 'क्या आप पाँचवी पास से तेज हैं' में शाहरुख खान, 'इस का दम' में सलमान खान, 'वार-परिवार' में उर्मिला मांतोडकर तो टीवी पर दिखाई दे ही रहे हैं, अब कुछ समय बाद ऍंगरेजी शो 'फीयर फेक्टर' का देशी शो में अक्षय कुमार भी दिखाई देने लगेंगे। तब लोग अपने चहेते स्टार्स को अपने और करीब पाएँगे।
टीवी के अपने शुरुआती दौर पर 'हम लोग' धारावाहिक ने घर-घर में अपनी जगह जमाई, उस समय केवल दूरदर्शन ही दिखाई देता था, इसलिए लोग इसे अच्छी तरह से देखने के लिए अपने एंटीना को इधर-उधर घुमाते देखे जाते थे। इसके बाद तबस्सुम द्वारा पेश किया जाने वाले कार्यक्रम 'फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन' कई फिल्मी कलाकार टीवी के छोटे परदे पर देखने को मिले। इसके बाद तो 'रामायण' धारावाहिक ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। रविवार को सुबह 9 बजे से दस बजे तक पूरा देश थम जाता था, यही इस धारावाहिक की लोकप्रियता का सबसे बड़ा पैमाना है।
आज समय बदल गया है, स्टार्स की लोकप्रियता का लाभ हर कोई उठाना चाहता है। यही कारण है कि स्टार्स को भी यह छोटा परदा लुभाने लगा है, इसके लिए भी उन्हें फिल्मों की तरह करोड़ों रुपए मिलते हैं। आज उर्मिला मांतोडकर के पास एक भी फिल्म नहीं है, फिर भी वह व्यस्त है। कहीं-कहीं तो ये बॉलीवुड स्टार्स स्वयं ही कार्यक्रम का संचालन करते हैं, इससे दर्शक वर्ग उन्हें अपने ही करीब पाता है। इसमें कोई दो मत नहीं कि आज टीवी का जो दर्शक है, उन्हें टीवी के और करीब खींच लाने में अमिताभ बच्चन का बहुत बड़ा हाथ है। एक अलग पहचान दी है, उन्होंने अपने कार्यक्रम के माध्यम से। इसके पहले टीवी केवल मनोरंजन का ही साधन था, कौन बनेगा करोड़पति के बाद लोग इस बुद्धू बक्से को ज्ञान के पिटारे के रूप में भी देखने लगे।

जिनकी फिल्में देखने की इच्छा हो, वही कलाकार जब टीवी पर रोज ही दिखाई दे, तो कौन होगा, जो अपने चहेते स्टार को करीब से न देखे, इसमें यह आवश्यक नहीं होता कि वह कौन सा कार्यक्रम पेश कर रहा है, बल्कि यह आवश्यक होता है कि कार्यक्रम कौन पेश कर रहा है। टीवी कार्यक्रमों के निर्माताओं के लिए ये स्टार्स आज उपयोगी साबित हो रहे हैं, वे उनका भरपूर दोहन कर रहे हैं, बदले में ये स्टार भी करोड़ों में खेल रहे हैं। आज स्थिति यह है कि टीवी चैनलों के स्टार आज गुम हो गए हैं और बॉलीवुड के स्टार छा गए हैं ।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 3 जुलाई 2008

एनिमेशन फिल्में: व्यक्ति के बचपन को लाने की कोशिश


डॉ. महेश परिमल
फिल्मी दुनिया चकाचौंध में डूबी मायावी दुनिया होने के साथ-साथ एक अच्छी प्रयोगशाला भी है। यहाँ फिल्मों से जुड़े नित नवीन प्रयोग होते ही रहते हैं। एक समय यहाँ पारिवारिक फिल्मों का दौर चला। फिर आया ब्लेक एंड व्हाइट फिल्मों का दौर। कॉमेडी फिल्मों का दौर अभी भी जारी है और अब आ रहा है एनिमेशन फिल्मों का दौर। आज तक यही माना जाता था कि एनिमेशन फिल्में अर्थात कार्टून फिल्में केवल बच्चे ही देखते हैं, बड़ी उम्र के लोगों की इसमें कोई रुचि नहीं होती, क्योंकि कल्पनाओं का संसार उन्हें रास नहीं आता। किंतु आज इस विचारधारा में बदलाव आ रहा है। कार्टून फिल्में अब बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी लुभा रही है। शुध्द भारतीय एनिमेशन फिल्म 'हनुमान' बच्चों में ही नहीं बड़ों में भी काफी लोकपि्रय रही। इसी सफलता ने निर्माता को 'रिटर्न ऑफ हनुमान' बनाने पर विवश किया। इन दोनों फिल्मों की सफलता ने हिन्दी फिल्म जगत के क्षेत्र में एनिमेशन फिल्मों का मार्ग खोल दिया है। इसी का परिणाम है कि आज लगभग 200 करोड़ के बजट की आठ से भी अधिक भारतीय एनिमेशन फिल्में तैयार की जा रही हैं।
हॉलीवुड में तो वैसे भी वर्षों से एनिमेशन फिल्में बनती चली आ रही हैं और सफलता की सीमाओं को छू रही हैं। भारतीय फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी अब एनिमेशन का सहारा लिया जाने लगा है और प्रतिस्पर्धा की दिशा में पाँव पसारे जा रहे हैं। एनिमेशन फिल्मों के लिए बड़े बजट की आवश्यकता होती है। एक लाइव एक्शन फिल्म को मात्र 6 से 8 महीने में भी पूरा किया जा सकता है, किंतु वर्ल्ड क्लास एनिमेशन फिल्म बनाने के लिए कम से कम 18 महीने का समय तो लगता ही है। एक एनिमेशन आर्टिस्ट पूरे दिन कम्प्यूटर पर काम करता है तब कहीं जाकर केवल 2 सेकन्ड की फिल्म तैयार हो पाती है। एनिमेशन फिल्मों के लिए जो राशि लगाई जाती है, उसे वसूल करने के लिए यह जरूरी हो जाता है कि इसकी कहानी केवल बच्चों को ही नहीं, बल्कि बड़ों को भी प्रभावित करे। तमाम दर्शकों को ध्यान में रखकर इसकी पूर्व तैयारी करने के बाद ही इसे मूर्त रूप दिया जाता है।
एनिमेशन तकनीक का प्रयोग आमिर खान की 'तारें ामीं पर' फिल्म के टाइटल गीत में किया गया है। इस गीत के चित्रों के लिए कम्प्यूटर का प्रयोग न कर कागज पर ही मिट्टी के रंगों से चित्र बनाकर उसका एनिमेशन तैयार किया गया था। मिट्टी के रंगों के कारण ही यह गीत हमें प्रकृति के करीब ले गया और बच्चों के साथ-साथ बड़े भी अपने बचपन की यादों में डृूब गए।
भारतीय सिने जगत के कुशल निर्माता करण जौहर से लेकर नवोदित निर्मात्री सौंदर्या रजनीकांत भी एनिमेशन फिल्मों की तैयारी कर रहे हैं। दूसरी ओर सुपर स्टार रजनीकांत से लेकर एक्शन हीरो अजय देवगन और अभिनेत्रियों में काजोल से लेकर आयशा टाकिया भी बिग बजट वाली इन एनिमेशन फिल्मों में काम कर रही हैं। रजनीकांत की बेटी सौंदर्या, जो कि फिल्म निर्माण के कार्य से बिलकुल अनजान है और केवल अपने पिता को बचपन से फिल्मों में काम करते हुए देखा है, वे भी निर्माण के क्षेत्र में उतर रही हैं। अपने अनुभव और आत्मविश्वास के दम पर वे 40 करोड़ के बजट की 'सुलतान, द वारियर' नाम की 3-डी एनिमेशन फिल्म बनाने जा रही हैं। इस प्रोजेक्ट के सह निर्माता रिलायंस-एडलैब्स हैं। इसमें रजनीकांत ब्रांड की एक्शन फिल्मों का सारा मसाला भरा गया है। पिछले एक वर्ष से एनिमेशन स्टूडियों में तैयार हो रही इस फिल्म की इस वर्ष के अंत तक प्रदर्शित होने की संभावना है।
कला फिल्मों के सफल निर्माता गोविंद निहलानी ने भी एनिमेशन फिल्मों के निर्माण में अपनी रुचि दिखाई है। 'हनुमान' बनने के करीब 6 वषर्र् पूर्व से ही वे एनिमेशन फिल्म बनाने के बारे में सोच रहे थे, किंतु कोई फाइनेंशियर न मिलने के कारण उनकी योजना दिमाग के डिब्बे में ही बंद रही। अब फाइनेंशियर मिल जाने के कारण वे 'कमलू' नाम की हल्की-फुल्की 3-डी एनिमेशन फिल्म बना रहे हैं। इस फिल्म में मुख्य पात्र ऊँट का एक बच्चा है। राजस्थान के रेगिस्तान में 'कमलू' के कारनामों पर बनी यह फिल्म 2009 के अप्रेल में प्र्रदर्शित होने की संभावना है। गोविंद निहलानी को विश्वास है कि उनकी यह फिल्म मात्र बच्चों में ही नहीं बड़ों में भी लोकपि्रय होगी।


हाल में अजय देवगन और काजोल की एनिमेशन फिल्म 'टुनपुर का सुपर हीरो' की चर्चा जोरों पर है। लगभग 40 करोड़ के बजट की इस फिल्म के लिए 120 एनिमेशन विशेषज्ञ स्टूडियो में काम कर रहे हैं। इस फिल्म में रियल लाइफ फिल्म और एनिमेशन का मिश्रण किया गया है। अजय और काजोल इसमें रियल लाइफ पति-पत्नी की भूमिका में हैं। यह रियल लाइफ हीरो कार्टून के पात्रों की दुनिया में पहुंँच जाता है और फिर बनने वाले रोमांचक प्रसंगों को इसमें दिखाया गया है। इस फिल्म का दिग्दर्शन किरीट खुराना कर रहे हैं, जो कि वर्षों पहले सोनी टीवी के लिए वर्ल्डकप के दौरान टाईगर का कार्टून केरेक्टर बनाकर अपनी एनिमेशन कला का परिचय दे चुके हैं।
'कुछ कुछ होता है' फिल्म के सफल निर्माता इसी सुपरहिट फिल्म पर एनिमेशन फिल्म बना रहे हैं। जुगल हंसराज भी 'रोड साइड रोमियो' नामक एनिमेशन फिल्म बना रहे हैं। यू टीवी कंपनी 'अलीबाबा एन्ड द फोर्टी वन थीव्स' नामक एनिमेशन फिल्म बना रही है। इस फिल्म में आज के मुंबई शहर के चिंकू नामक किशोर की कहानी है, जो अरेबियन नाईट्स की दुनिया में पहुँच जाता है। इन सारी फिल्मों में हमारी हिंदी फिल्मों की तरह ही मसाले के रूप में गीत और नृत्य भी होंगे जो दर्शकों को अधिक आकर्षित करेंगे।
अभिनेत्री आयशा टाकिया के पिता निशीथ टाकिया 'अब दिल्ली दूर नहीं' नामक एनिमेशन फिल्म बना रहे हैं। इस फिल्म की कहानी में जंगली जानवरों की समस्या को उभारा गया है। जंगल पर लगातार मानव का अधिकार होता चला जा रहा है, जिससे परेशान होकर जंगल सारे जानवर देश के नेता के सामने फरियाद करने के लिए दिल्ली जाते हैं। इस कहानी के माध्यम से जानवरों के प्रति बच्चों का स्नेह और पर्यावरण व राजनीतिक मुद्दों को दर्शाया गया है। प्राणियों की आवाज की डबिंग के लिए अक्षय खन्ना, गोविंदा, बमन ईरानी, आयशा टाकिया और उर्मिजा मातोंडकर जैसे कलाकारों की आवाज का उपयोग किया गया है।
एनिमेशन फिल्मों के पीछे जो पानी की तरह पैसा बहाया जाता है, उसे वसूल करने के लिए भी विभिन्न उपाय अपनाए जाते हैं, जैसे कि 'हनुमान' फिल्म के प्रदर्शन के साथ ही बाजार में उसके खिलौनों की बिक्री शुरू हो गई। एनिमेशन फिल्मों के निर्माता उसके पात्रों की लोकपि्रयता के लिए उसके खिलौने बाजार में रखकर उससे लाभ कमा लेते हैं। अब तो मोबाइल मार्केटिंग भी बढ़ रहा है। निर्माता मोबाइल गेम्स के माध्यम से भी फिल्म को लोकपि्रय बनाने का प्र्रयास करते हैं। अब यदि यह कहा जाए कि अगला वर्ष एनिमेशन फिल्मों का होगा, तो इसे अतिशयोक्ति न माना जाए।
एनिमेशन फिल्मों का यह अभिनव प्रयोग दर्शकों को कितना आकर्षित करता है, इसका पता तो फिल्म के प्रदर्शन के बाद ही लगेगा। फिलहाल तो निर्माता अपनी कोशिश में लगे हुए हैं। इसके पीछे यकीनन एक मनोवैज्ञानिक सत्य यह भी है कि प्रत्येक वयस्क व्यक्ति में भी एक बालक छुपा होता है। ये निर्माता इसी बालक को बाहर निकालने की कोशिश में करोडा रुपये खर्च कर रहे हैं। यह तो तय है कि करोड़ों की इस कोशिश में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में एक क्रांति अवश्य आएगी।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 2 जुलाई 2008

वेदना से संवेदना तक....


भारती परिमल
एक बगीचा था. उसमें रंगबिरंगे सुंदर-सुंदर फूल खिले हुए थे. गुलाब, चंपा, चमेली, सूरजमुखी, पारिजात, मोगरा, जूही, रजनीगंधा, हरसिंगार, गुड़हल आदि अनेक फूलों के छोटे-बड़े पौधे थे, जो अपने सौंदर्य से बगीचे की सुंदरता बढ़ा रहे थे. माली बारह महीने उनकी देखभाल करता. जाड़ो में पौधों के आसपास जमा हुए सूखे पत्तों को निकाल कर गमलों को साफ करता. गरमी में तेज धूप से उन्हें बचाने के लिए भरसक प्रयास करता और बारिश में वर्षा की बूंदों से नहाती डालियों को और पंखुड़ी पर ठहरी पानी की बूंद को देख कर खुश होता. किंतु अनेक फूलों और हरियाली से आच्छादित उस बाग में एक भी लता नहीं थी. बस एक कोने पर एक मधुमालती की बेल उग रही थी. पता नहीं माली के मन में क्या था कि वह जब भी बाग में इन पौधों के सिवाय कुछ और उगा हुआ देखता कि उसे काट देता. उसमें भी मधुमालती की बेल तो उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं थी. जैसे ही उसने एक किनारे मधुमालती की बेल को अंकुरित होते देखा, तो वह उसे काटने लगा. वह उसे बढ़ने ही नहीं देता था.
मालिन ने उसे ऐसा करते हुए कई बार देखा था. वह कितनी ही बार उसे समझा चुकी थी कि क्यों इस सुंदर बेल को बढ़ने नहीं देते हो? यह भी अन्य पौधों की तरह इस बाग की शोभा बढ़ाएगी, लेकिन माली ने अपनी जिद नहीं छोड़ी. माली के इस व्यवहार से बाग के सभी पेड़-पौधे दु:खी थे, किंतु वे विराध नहीं कर पा रहे थे. मधुमालती के प्रति माली का रुखा व्यवहार दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा था. वह न तो उस प्यासी लता को पानी ही देता न उसके छाँव के लिए कोई प्रबंध करता. उसके आसपास का कचरा भी वह साफ न करता. उसे तो केवल एक ही बात का ध्यान रहता कि बेल बढ़ती हुई देखता कि उसे काट देता.
माली के इस उपेक्षापूर्ण व्यवहार से मधुमालती बहुत आहत थी. वह बढ़ना चाहती थी, खिलकर फैलना चाहती थी, अपनी सुगंध से चारों दिशाओं को सुवासित करना चाहती थी, पर वह विवश थी. माली जब-जब उसे काटता था, वह खून के ऑंसू रोती थी, पर उसकी सिसकी कोई नहीं सुन पाता था.
बाग में आने वाले लोग भी बाग के फूलों की खूब तारीफ करते पर साथ ही यह कहने से भी नहीं चूकते थे कि इस बाग में अनेक फूल हैं, बस कमी है तो केवल बेल की. यहाँ एक भी बेल नहीं है. तब मधुमालती चीख-चीख कर उनसे कहना चाहती थी कि मैं हूँ, मैं हँ ना, लेकिन उसकी चीख उसके बौने शरीर की ही तरह मिट्टी में दब कर रह जाती थी. वह जाते हुए लोगों से यह भी कहना चाहती थी कि मैं बढ़ना चाहती हूँ, लेकिन माली मुझे हर बार काट लेता है, कोई उसे रोको और मुझे कटने से बचालो. तब फिर मैं भी दूसरे फूलों की तरह खिलूँगी और अपनी सुगंध से इस बाग को और भी महका दूँगी. किंतु उसकी इस घुटी हुई चीख और पीड़ा को समझने वाला कोई न था.

मधुमालती की बेल के पास ही पारिजात का एक हरा-भरा पेड़ था. थोड़ी सी दूरी पर चंपा और चमेली भी खिले हुए थे. ये सभी माली की इस हरकत से और मधुमालती के दु:ख से दु:खी थे. उन्हें उसकी सिसकियाँ सुनाई पड़ती थी. उसकी चीख उन्हें भी भीतर तक हिला देती थी, किंतु वे यह नहीं समझ पाते थे कि वे उसे सांत्वना किस तरह दें?
मधुमालती देखती कि पारिजात का पेड़ अनेक फूलों से आच्छादित हो गया है, उसके फूलों की सुगंध चारों ओर फैल रही है सभी उसे प्यार भरी नजरों से देखते हैं, उसके फूलों को तोड़कर ले जाते हैं और उसकी सुंदरता की प्रशंसा भी करते हैं. आखिर उससे न रहा गया और एक दिन दबे स्वर में उसने पारिजात से अपने मन की बात कह ही दी- मुझे भी लगता है कि मैं भी तुम्हारी तरह, चंपा, चमेली और जूही की तरह खिलकर मुस्कराऊँ. किंतु माली मुझे बढ़ने ही नहीं देता है. मुझे बहुत निराशा होती है, मैं क्या करूँ?
पारिजात तो खुद उसकी मदद करना चाहता था, पर वह विवश था. मधुमालती ने पूछा तो वह कह उठा- खिलकर मुस्कराना तो हमारा स्वभाव है. वो गुलाब को देखो, वह तो काँटों में भी खिल कर सदा मुस्कराता रहता है. मेरा पूरा शरीर रोज फूलों से भर जाता है, और सूरज की रोशनी से कुछ पल में ही मुरझा भी जाता है किंतु मैं फिर भी रोज खिलता हँ और इस बाग की शोभा बढ़ाता हँ. खिलना और मुरझाना यह तो हमारा स्वभाव ही है.
मैं भी अपने इस स्वभाव को जीवित रखना चाहती हूँ लेकिन माली मुझे बढ़ने ही नहीं देता. अब वो फिर मुझे बढ़ा हुआ देखेगा और काट डालेगा. जब-जब मैंने बढ़ना चाहा,उसने मुझे रोक लिया. मधुमालती निराशा से बोली.
पारिजात बोला - तुम अपने बढ़ने का कोई दूसरा मार्ग क्यों नहीं खोज लेती हो? ऐसा मार्ग जहाँ माली की नजर ही न पड़े.
मधुमालती को पारिजात की यह बात जँच गई. अब उसने ठान लिया कि उसे बढ़ना ही है. चाहे कोई भी कठिनाई आए, वह हारेगी नहीं और बढ़कर रहेगी. उसने सोचा कि अगर वो इसी दिशा में आगे बढ़ती रही तो माली की निगाह उस पर पड़ जाएगी और वह एक बार फिर उसे काट डालेगा. इसलिए उसने माली की नजरों से बचने के लिए दूसरी दिशा में बढ़ना शुरू किया. उसने देखा कि बगीचे की दिवाल की नीचे के तरफ की एक ईंट उखड़ी हुई है और वहाँ से पानी बाहर जाने की सुविधा है, बस वह उसी दिशा में आगे बढ़ गई और दिवाल के बाहर निकल गई. बाहर आकर उसने खुली हवा में सांस ली. बाहर कुछ गंदगी थी, आक का पौधा और अन्य पौधे भी थे, किंतु उनसे अलग वह तो अपने में मगन बढ़ती जा रही थी.
खुली हवा, सूर्य का प्रकाश और बहते पानी से अब मधुमालती बेरोकटोक बढ़ने लगी. टूटी ईंट का सहारा लेकर वह दीवार पर चढ़ गई, उसकी बेल पर कलियाँ खिलीं और फूलों के गुच्छे लगे. सफेद हल्के गुलाबी गुच्छों के बीच मधुमालती झूमने लगी. बगीचे के बाहर आते-जो लोग मधुमालती की सुंदरता को देखकर घड़ी भर के लिए ठिठक जाते, उन्हें आश्चर्य होता कि बाग के अंदर तो ऐसी कोई ेबेल नजर नहीं आती,पर बाहर यह बेल कैसी? कोई उसके झरते फूलों को समेट लेता, तो कोई फूलों के गुच्छे ही तोड़ लेता. मधुमालती मन ही मन इतराती कि भले ही लोग मेरे फूलों को तोड़ रहें हैं, कल फिर मुझमें नए फूल आएँगे. लोगों ने उसके आसपास की जमीन को साफ कर दिया. अब वे वहाँ बैठने भी लगे. लगातार बढ़ती मधुमालती अब दीवार पार कर गई थी और झाँककर उसने बेगीचे के अंदर देखा, वहाँ उसके मित्र पारिजात, चंपा, चमेली, गुलाब सभी उसे देखकर मुस्करा रहे थे. वह भी उन्हें देख मुस्करा उठी. मन ही मन उसने पारिजात का आभार माना, उसी के द्वारा बताए गए मार्ग से वह आज फूलों से लदी थी.
बहुत दिनों से माली ने मधुमालती की सुध नहीं ली थी. वह तो उसे भूल ही गया था, वेसे भी उसे वह कहाँ पसंद थी? एक बार अचानक बाहर से झाँकती मधुमालती को उसने देख लिया. झूमती-नाचती बेल को देखकर उसे आश्चर्य हुआ, उसकी सुंदरता ने उसे मोह लिया. वह सोचने लगा- इस बेल को बाग में ही बढ़ने दिया होता, तो मेरे बगीचे की सुंदरता बढ़ जाती. पर अब तो यह दीवार के उस तरफ है. एक दिन माली ने मुस्कराकर कहा- मधुमालती, इस तरफ चली आओ, बगीचा तुम्हारा ही है. तुम्हारी जड़ें तो अंदर ही हे ना.


हाँ मधुमालती की जडें तो बगीचे के अंदर ही हैं. यह बात उसे अच्छी तरह से मालूम थी. लेकिन वह इस बात को भी नहीं भूली थी कि यही माली उसे बगीचे के अंदर बढ़ने नहीं देता था. उस समय की उसकी वेदना, उसकी छटपटाहट, उसकी सिसकारी अभी भी उसकी खिलख्लिाहट के पीछे दबी दुई थी. आज माली का बदला हुआ रूप उसे हतप्रभ कर रहा था. आज वह कहता है कि बाग उसका है. पर उस समय क्या वह बाग मेरा नहीं था?
मधुमालती क्या करे, दीवार के बाहर ही फैलते रहना है या फिर बाग के अंदर जाकर उसे अपना विस्तार करना है. वह तय नहीं कर पा रही थी. उसने पारिजात के सामने प्रश्नवाचक चिह्न की तरह देखा, वह मुस्करा उठा, ऑंखों ही ऑंखों ने उसने मधुमालती से कहा= आ जाओ मधुमालत, इस बगीचे में तुम्हारा स्वागत है. इस मनुहार से मधुमालती बगीचे के अंदर आ गई. अब वह दोनों तरफ झूमने लगी. बगीचे के बाहर भी और बगीचे के अंदर भी.
भारती परिमल

मंगलवार, 1 जुलाई 2008

छलकते अन्नभंडारों के बीच तड़पते मासूम


डॉ. महेश परिमल
कुपोषण और भुखमरी यह दोनों ही देश की एक गंभीर समस्या है. बिहार, उड़िसा जैसे अल्प विकसित राज्यों में यह समस्या होना कोई विशेष बात नहीं है, किंतु महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य में भी अब यह समस्या एक गंभीर स्थिति के रूप में दिखाई पड़ने लगी है. अर्थशास्त्र के नोबल पुरस्कार विजेता डॉ. अमर्त्य सेन ने भी भारत में फैली इस जटिल समस्या के विषय में अपनी चिंता जाहिर की है.संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 1990 के दशक के बाद विश्व के 17 देशों में भूखमरी का प्रमाण बढ़ा है.
हमारे देश का दुर्भाग्य यह है कि अनाज के संदर्भ में हम विपुलता के बीच कमी की समस्या से जूझ रहे हैं. अनाज के भंडार छलक रहे हैं, सरकारी एवं किराए के अनाज गृहों में अनाज रखने की जगह नहीं है. फलस्वरूप किसान हजारों टन अनाज खुले आकाश के नीचे रखने को विवश है. इससे यह अनाज बारिश में सड़कर बेकार हो रहा है. अनाज में फफूंद पड़ जाने की वजह से उसे फेंकना पड़ रहा है. हजारों टन अनाज इस तरह बेकार हो जाने पर फेंक दिया जाता है. दूसरी ओर अनाज के एक-एक दाने के लिए देश के सेंकड़ो लोग तड़प रहे हैं. भखमीऔर कुपोषण से मौत के मुँह में जाने वाले इन मासूमों के प्रति हमारी सरकार का रूखा व्यवहार एक प्रश् चिन्ह तो अवश्य लगाता है, पर इसे पूर्ण विराम में नहीं बदलता.
1950-51 में भारत का अनाज उत्पादन 550 लाख टन था. जो 2003-04 में बढ़कर 2108 लाख टन हुआ है. 2003-04 में चावल का उत्पादन 864 लाख टन, गेहूँ का उत्पादन 727 लाख टन, मोटे अनाजों का उत्पादन 368 लाख टन और चना, मटर, राजमा, सेम के बीज आदि सूखे खाद्य पदार्थों का उत्पादन 149 लाख टन हुआ. इस तरह अनाज के उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई, इसमें कोई शक नहीं. उसे उपयोग में भी लाया जा रहा है. इससे तय है कि भुखमरी के लिए देश में अनाज का कम उत्पादन कतई जिम्मेदार नहीं है. इसके लिए जवाबदार है तो वह है लोगों की कम क्रय शक्ति. यदि किसी गरीब के पास कुछ पैसा होता है तो वह सबसे पहले उसका उपयोग अनाज खरीदने में ही करता है. पर जब लोगों के पास पैसे ही नहीें है, तो वह अनाज कैसे खरीदेंगे? इसके लिए यदि कोई दोषी है तो वह है देश की गरीबी और बेकारी.
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन फाओ के द्वारा जारी विवरण के अनुसार 1990 क बाद भारत मेें भुखमरी, कुपोषण के मामले में बढाेत्तरी हुई है. इसका आशय यह हुआ कि 1991 के बाद उदारीकरण और निजीकरण की बाजार आधारित नीतियों के अमल के कारण सरकार की सक्रियता में कमी आई है. सरकार की सामाजिक कल्याण की नीतियाँ विफल हुई हैं. अनाज की सबसिडी में लगातार कमी आई है. दूसरी तरफ रोजगारी और आय उत्पादन के अवसर भी कम हुए हैं. इससे भुखमरी और कुपोषण के मामले और बढ़े हैं.
विदेशी निवेशक ओर अनाज के भंडार छलक रहे हैं, इसके बाद भी महाराष्ट्र जैसे विकसित राज्य में अप्रैल-मई 2004 के दौरान 1049 बच्चे कुपोषण का शिकार हुए. भुखमरी और कुपोषण से देश में बड़े पैमाने पर मानवीय, आर्थिक, सामाजिक, मानसिक, शारीरिक नुकसान हो रहे हैं. एक सर्वेक्षण के अनुसार कुपोषण से देश को हर वर्ष दस अरब डॉलर का नुकसान होता है.
विश्व से 2015 तक भुखमरी और कुपोषण को खत्म करने का संकल्प लिया गया है. किंतु भारत में कुपोषण और भुखमरी में हो रही चिंताजनक वृद्धि के कारण दस वर्ष में भारत को इससे मुक्ति मिलना बहुत ही मुश्किल है. खाद्यान्न का उत्पादन तो बढ़ा है, लेकिन उसका प्रभावशाली वितरण एवं संचालन नहीं हो रहा है. जो किसान अनाज उत्पादन में मुख्य भूमिका निभाते हैं, उसी के भाग्य में पूरा अनाज नहीं है. अभिजात्य किसान वर्ग इस अनाज पर अपना एकाधिकार रखते हैं. अनेक गरीबों के लिए मुट्ठी भर अनाज भी नहीं बच पाता. कुछ वर्ष पहले ही इंडियन मेडिकल रिसर्च काउंसिल ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि देश में 40 प्रतिशत लोग कुपोषण के शिकार हैं. सच्चाई इससे अलग है, क्योंकि सच तो यह है कि देश में कुल 50 प्रतिशत लोग कुपोषण के शिकार हैं.
कुपोषण एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या है. इस समस्या के औचित्य और व्यापाक विनाशक परिणामों को ध्यान में रखते हुए इस समस्या का शीघ्रातिशीघ्र निराकरण किया जाना चाहिए. देश में आर्थिक, सामाजिक, अपराध, मारधाड़, आतंकवाद आदि के पीछे यह भुखमरी ही जवाबदार है. क्योंकि जब इंसान को एक वक्त की रोटी नहीं मिलेगी, तब उसके पांव खुद ब खुद गलत दिशा में आगे बढ़ेंगे.
इस महासमस्या के निराकरण की दिशा में यदि कुछ सोचा जाए, तो सबसे पहले राजनेताओं को अपनी धन-सम्पत्ति और सत्ता की भूख को भुलाकर ंगरीबों के पेट की भूख को मिटाने की तीव्रतम राजकीय इच्छा जाग्रत करनी होगी. मात्र झूठे आश्वासन, कागजी योजनाओं और खोखले कार्यक्रमों के माध्यम से यह क्रांति नहीं लाई जा सकती. इसके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पारदर्शी, स्वच्छ, प्रभावशाली बनाना होगा. ग्रामीण रोजगार योजना के तहत मजदूरों को 50 प्रतिशत मजदूरी अनाज के रूप में वितरित की जानी चाहिए. सार्वजनिक वितरण प्रणाली में इतना सुधार होना चाहिए कि कालाबाजार करने वाले व्यापारियों को सख्त से सख्त सजा मिले. अभी तक इस तरह के कई मामले सामने आ चुके हैं, किंतु किसी व्यापारी को सजा हुई, यह सुनने को नहीं मिला.
कुपोषण और भुखमरी के खिलाफ चलाई गई तमाम सरकारी योजनाएँ पूरी तरह से दम तोड़ चुकी हैं. शालाओं में मध्यान्ह भोजन में लापरवाही के किस्से रोज ही सुनने को मिल रहे हैं. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के हाल बुरे हैं. सरकार का चेहरा कहीं भी साफ दिखाई नहीं दे रहा है. दरअसल इसके पीछे उसकी मंशा ही स्पष्ट नहीं है. यही वजह है कि दृढ़ इच्छा शक्ति के अभाव में तमाम सरकारी घोषणाएँ गरीबों को लाभ नहीं पहुँचा पाई हैं, फलस्वरूप गरीब और गरीब हुए हेै और अमीर और अधिक अमीर. शायद यही सोचते हुए नीरज ने लिखा है-
तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है
बाग के बाग को बीमार बना देती है
भूखे पेट को ओ देश भक्ति सिखाने वालो
भूख इंसान को गद्दार बना देती है.
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 30 जून 2008

दगाबाज हुआ ईश्वर का प्रतिरूप


डॉ. महेश परिमल
ईश्वर दु:ख से मुक्ति दिलाते हैं, तो डॉक्टर दर्द से। इसीलिए डॉक्टर को ईश्वर का दूसरा रूप कहा जाता है। पीड़ा से कराहता व्यक्ति डॉक्टर में ईश्वर के दर्शन करता है। उसे पूरा विश्वास होता है कि अब मैं डॉक्टर के पास आ गया हूँ, अब तो निश्चित ही दर्द से छुटकारा मिल जाएगा। डॉक्टर और मरीज का संबंध वर्षों से है और रहेगा। मरीज का विश्वास ही डॉक्टर को आत्मबल प्रदान करता है। इसी आत्मबल के कारण वह हमेशा मरीजों की सेवा के लिए तत्पर रहता है। लेकिन अब इस पवित्र संबंध पर दवा कंपनियों की नजर लग गई है, अब डॉक्टर अपने धर्म को भूलकर मरीजों को ऐसी गैरजरूरी दवाएँ लेने की हिदायत दे रहे हैं, जिसकी उसे दरकार ही नहीं है। इन दवाओं से मरीज की जेब तो हल्की होती ही है, साथ ही उसके स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ होता है। दूसरी ओर इन्हीं दवाओं से डॉक्टर का घर भरता है और वह उन दवा कंपनियों से महँगे उपहार लेता है, विदेश यात्राएँ करता है, फाइव स्टार होटलों में पार्टी का मजा लेता है, यहाँ तक कि अपने बच्चों की बर्थ डे पार्टी या फिर शादी के बाद हनीमून का खर्च भी इन्हीं दवा कंपनियों से लेता है। ऐसे में उस डॉक्टर को कैसे कहा जाए कि यह ईश्वर का दूसरा रूप है? 'फोरम फॉर मेडिकल एथिक्स' नामक एक एनजीओ ने इस संबंध में कुछ चौंकाने वाले तथ्य पेश किए हैं, जिसमें डॉक्टरों और फार्मास्यूटिकल्स कंपनी के बीच होने वाले लेन-देन की जानकारी दी गई है।
मुम्बई के एक डॉक्टर ने अपने चिरंजीव की शादी की, हनीमून के लिए उसे स्वीटजरलैंड भेजा, लेकिन इसका खर्च उठाया, एक दवा कंपनी ने। इसी तरह एक डॉक्टर के बेटे के जन्मदिन की पार्टी का पूरा खर्च उठाया, एक दवा कंपनी ने। आखिर दवा कंपनी उन डॉक्टरों पर इतनी मेहरबान क्यों थी, कारण स्पष्ट है, ये वे डॉक्टर हैं, जो मरीजों को उन्हीं कंपनियों की दवाएँ लेने की हिदायत देते हैं, साथ ही मरीज को जिन दवाओं की आवश्यकता ही नहीं है, वे दवाएँ भी मरीज के परचे पर लिख देते हैं। अमेरिका की दवा कंपनियाँ डॉक्टरों को रिश्वत के रूप में करीब दस अरब डॉलर का बजट रखती हैं। इतनी बड़ी रकम आखिर आएगी कैसे? उसी के लिए ही तो ये मरीज बनाए गए हैं और उन्हें दवाएँ सुझाने वाले डॉक्टर। आखिर मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्ह डॉक्टर से मिलने क्यों आते हैं? बस यही कि डॉक्टर को अपनी गिरफ्त में लेने के लिए। वरना यदि डॉक्टर को किसी दवा के बारे में जानना हो, तो इंटरनेट से सस्ता आखिर कौन सा माध्यम हो सकता है। ये दोनों मिलते ही हैं सौदेबाजी के लिए। डॉक्टर मरीज के परचे पर अधिक से अधिक दवाएँ लिखें, इसके लिए डॉक्टर को रिझाने के लिए कई तरह की रिश्वत दी जाती है। यह रिश्वत कई रूपों में हो सकती है। कभी डॉक्टर अपनी प्रेयसी या फिर परिवार के साथ विदेश यात्रा पर निकल जाता है, तब उसकी टिकट और होटलों की बुकिंग का सारा जिम्मा यही दवा कंपनियाँ लेती हैं। कई बार तो पूरा टूर ही कंपनी वहन करती है। इस तरह से उपकृत होने वाले डॉक्टर निश्चित रूप से उस दवा कंपनी को याद रखते हैं और उनकी दवाएँ मरीज के परचे पर लिख देते हैं। इस तरह के टूर के बाद डॉक्टर द्वारा प्रिस्काइब की जाने वाले दवाएँ बिकने की संभावना 4.5 से 10 गुना बढ़ जाती है। यही हाल दीपावली के समय होता है, जिस डॉक्टर के पास जितने अधिक गिफ्ट आते हैं, समझ लो वह डॉक्टर उतने ही अधिक फर्जी दवाएँ मरीजों को लेने का सुझाव देता है।

ये दवा कंपनियाँ बहुत ही दूरंदेशी होती हैं, इनकी नजर तमाम मेडिकल कॉलेजों में शुरू से ही रहती है। भावी डॉक्टर जब मेडिकल कॉलेजों में पढ़ते रहते हैं, तब ये दवा कंपनियाँ उनके पीछे पड़ जाती हैं। इन कंपनियों के प्रतिनिधि इनसे महीने में चार बार मिलते हैं, इस दौरान वे अपनी नई दवाओं के बारे में पूरी जानकारी डॉक्टरों को दे देते हैं। वास्तव में प्रतिनिधि इन दवाओं की बिक्री के बाद डॉक्टर के कमीशन की बात करते हैं। इसीलिए प्रतिनिधि डॉक्टरों से बार-बार मुलाकात कर डॉक्टर को अपने वश में करने की कोशिश करते हैं। आखिर बार-बार मिलने का कुछ तो असर होगा ही। दवा कंपनियों और डॉक्टर के बीच होने वाली यह मुलाकात कहीं भ्रष्टाचार की जड़ों को ही पुख्ता करती हैं। यदि सरकार डॉक्टरों और दवा प्रतिनिधियों की मुलाकात पर ही प्रतिबंध लगा दे, तो इस पर थोड़ा सा अंकुश तो रखा ही जा सकता है। इन दवा कंपनियों की नीयत यदि सचमुच साफ है, तो डॉक्टरों तक अपनी दवाओं की जानकारी इंटरनेट के माध्यम से भी दे सकते हैं। आखिर मुलाकात की क्या आवश्यकता है? यही मुलाकात ही तो है, जो डॉक्टरों की रिश्वत तय करती है।
फार्मास्यूटिकल कंपनियाँ अक्सर डॉक्टरों के लिए फाइव स्टार होटलों में काकटेल पार्टियों का आयोजन करती हैं। दिन भर चलने वाली इस पार्टी में सभी सुविधाएँ डॉक्टरों को मुहैया कराई जाती हैं। डॉक्टर इन पार्टियों का भरपूर उपभोग करते हैं। पूरे परिवार का मनोरंजन होता है। तबीयत तर हो जाती है। पार्टी के बाद दवा कंपनियों की तरफ से डॉक्टरों को महँगे उपहार दिए जाते हैं। हाल ही में मुम्बई के एक डॉक्टर के बारे में पता चला है कि वे रोज एक लेडिस बार में जाकर शराब पीया करते थे, उनका बिल एक दवा कंपनी अदा करती थी। बाद में पता चला कि वे डॉक्टर अपने उस बिल से 50 प्रतिशत अधिक धन दवा कंपनी को उनकी दवाओं के एवज में अदा कर देते थे, जो वे अपने मरीजों के प्रिस्क्रिप्शन पर लिख देते थे। भले ही उन दवाओं की दरकार मरीजों को न भी हो, पर ये डॉक्टर अपना यह काम पूरी ईमानदारी से कंपनी के लिए करते थे।
अब तो कुछ डॉक्टर दवा कंपनियों के एजेंट के रूप में काम करने लगे हैं। वे एक निश्चित केमिस्ट के यहाँ जितने परचे भेजते हैं, उसे एक अलग डायरी में नोट कर लेते हैं, महीने के अंत में डॉक्टर को अपने परचों के अनुसार केमिस्ट और दवा कंपनियाँ अपना कमीशन दे देती हैं। मरीज के लिए परचे पर दवा लिखकर डॉक्टर उससे कहते हैं कि दवा खरीदने के बाद दवाएँ उसे दिखा दें। डॉक्टर के क्लिनिक के पास ही जो मेडिकल स्टोर होता है, मरीज वहीं से दवा खरीदता है। दवा खरीदने के बाद मरीज उन दवाओं को दिखाने के लिए फिर डॉक्टर के पास जाता है, दवाएँ देखकर एक अलग डायरी में कुछ नोट कर लेता है। यह सब मरीज की ऑंखों के सामने होता है, पर दवा के बारे में उसका ज्ञान शून्य होता है, इसलिए वह कुछ कर नहीं पाता और डॉक्टर-दवा कंपनियों के बीच कठपुतली बनकर रह जाता है। डॉक्टरों के कमीशन के कारण ही दो रुपए में मिलने वाली दवा मरीज को दस रुपए में मिलती है। कई छोटी कंपनियाँ भी हैं, जो उच्च कोटि की दवा बनाती हैं, पर अपना प्रचार नहीं करती, उन कंपनियों की दवाएँ यदि गलती से मरीज खरीद ले, तो डॉक्टर उसे वापस करवा देते हैं, क्योंकि उस कंपनी से उसे किसी तरह की सुविधा या कमीशन नहीं मिलता। मरीज को जिन दवाओं की आवश्यकता ही नहीं है, उन दवाओं को खरीदकर मरीज अपनी जेब हल्की करता ही है, साथ ही अपने स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ करता है।
इस तरह से दवा कंपनियों की कठपुतली बने डॉक्टर मरीजों के साथ विश्वासघात कर आखिर किस तरह से समाज की सेवा कर रहे हैं? मरीजों और ग्राहकों के अधिकार के लिए लड़ने वाली तमाम सामाजिक संस्थाओं को इस गोरखधंधे के प्रति सजग होकर सरकार को नींद से जगाना होगा। ताकि डॉक्टरों को दवा कंपनियों से मिलने वाली तमाम भेंट सौगातों पर अंकुश लग सके। ऐसे डॉक्टरों पर कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए। ऐसे डॉक्टरों का समाज से बहिष्कार हो, तब तो बात ही कुछ और होगी। क्या आज का सोया हुआ समाज इस तरह की कार्रवाई करने के लिए आगे आ सकता है? आखिर यह हमारे स्वास्थ्य और धन का सवाल है।
डॉ. महेश परिमल

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