बुधवार, 31 अगस्त 2011

दूसरी आजादी की पहली सुबह











हरिभूमि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

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सोमवार, 29 अगस्त 2011

लंबी लड़ाई का आगाज करती दूसरी आजादी की पहली सुबह
















नवभारत रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर पर प्रकाशित मेरा आलेख
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शनिवार, 27 अगस्त 2011

डॉ. महेश परिमल म.प्र. साहित्य अकादमी का प्रादेशिक दुष्यंत कुमार पुरस्कार से विभूषित




डॉ. महेश परिमल म.प्र. साहित्य अकादमी का प्रादेशिक दुष्यंत कुमार पुरस्कार से विभूषित
भोपाल। मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद द्वारा पत्रकार एवं साहित्यकार डॉ. महेश परमार परिमल को प्रादेशिक दुष्यंत कुमार पुरस्कार ने नवाजा गया। गत 25 अगस्त को आयोजित एक समारोह में प्रदेश के उच्च शिक्षा राज्य मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा, प्रख्यात साहित्यकार नरेंद्र कोहली, साहित्य अकादमी के निदेशक त्रिभुवननाथ शुक्ल एवं संस्कृति परिषद के संयुक्त सचिव श्रीराम तिवारी उपस्थित थे। डॉ. परिमल को पुरस्कार स्वरूप 31 हजार रुपए का चेक भी दिया गया। यह पुरस्कार उन्हें उनके ललित निबंधों के संग्रह ‘‘लिखो पाती प्यार भरी’’ के लिए दिया गया।
उल्लेखनीय है कि डॉ. परिमल 30 वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। मूलत: छत्तीसगढ़ निवासी डॉ. परिमल ने भाषविज्ञान में पी-एच. डी की है। देशभर के प्रमुख समाचारपत्रों में उनके सम-सामयिक आलेखों का प्रकाशन होता रहता है। सम्प्रति वे भास्कर समूह से सम्बद्ध हैं। अपने ब्लॉग संवेदनाओं के पंख और आज का सच के माध्यम से वे अपने साथियों के साथ सतत सम्पर्क में रहते हैं।








शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

हंसों के मामले पर काले कौवे देंगे फैसला














नवभारत रायपुर- बिलासपुर के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

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गुरुवार, 25 अगस्त 2011

बहुत कुछ हो सकता है सत्‍याग्रह से











हरिभूमि के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख


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मंगलवार, 23 अगस्त 2011

न्‍याय की प्रतिमूर्ति संतोष हेगडे










देनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

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सोमवार, 22 अगस्त 2011

राधा की पाती कान्हा के नाम











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नईदुनिया रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर आज जन्‍माष्‍टमी पर प्रकाशित मेरा आलेख


गुरुवार, 18 अगस्त 2011

गुस्‍साया लोकतंत्र और सहमी सरकार











दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में पेज 9 पर प्रकाशित मेरा आलेख

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बुधवार, 17 अगस्त 2011

गांधी की याद दिलाती अन्‍ना की ऑंधी












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गुरुवार, 11 अगस्त 2011

क्‍या अब नहीं होंगे एनकाउंटर ?












दैनिक हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख

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बुधवार, 10 अगस्त 2011

निर्णय करने वालों का निर्णय कौन करे?

डॉ. महेश परिमल
बहुत समय बाद सरकार ने अपनी सक्रियता का परिचय देते हुए यह निर्णय लिया कि अब मुकदमो के लंबित रहने का औसत समय तीन वर्ष होगा। अब तक यह समय 12 से 15 वर्ष था। सरकार का यह निर्णय तो सराहनीय है, पर निर्णय लेने वालों के स्थानों पर एक नजर डाल देती, तो समझ में आ जाता कि आखिर मामले इतने लंबित क्यों होते हैं। सरकार ही जजों के स्थानों की पूर्ति करने में देर करती है। पूरे देश में अभी भी न्यायाधीशों के सैकड़ों स्थान खाली हैं, ये स्थिति न जाने कब से है, पर सरकार ने इस ओर ध्यान दिया ही नहीं। जल्द न्याय प्रदान करने के लिए सरकार ने न्याय प्रदान एवं कानून सुधार राष्ट्रीय मिशन लागू करने को मंजूरी दे दी है। पर इससे होगा क्या? इस पर अमल कब होगा, यह भी अभी विचारणीय है। जब जज ही नहीं होंगे, तो मामले कैसे निबटाए जाएँगे, यह तो सरकार ने सोचा ही नहीं। लंबित मुकदमों को कम करने की दिशा में उठाया गया यह कदम निश्चित रूप से सराहनीय है। पर यह निर्णय लेने के पहले सरकार ने दूरदर्शिता का परिचय नहीं दिया। अभी हालत यह है कि देश के कई उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की बेहद कमी है। उनके स्थानों की पूर्ति न होने के कारण ही मुकदमे लंबित हो रहे हैं। इसकी वजह यही है कि कोई हाईकोर्ट जज बनना ही नहीं चाहता। क्योंकि एक न्यायाधीश के रूप में काम का बोझ, निश्चित वेतन और बहुत सारा सरकारी दबाव। एक जज की यही मानसिकता होती है कि इससे तो बेहतर है कि प्रेक्टिस की जाए, जिसमें कमाई ही कमाई है।
अब इलाहाबाद हाईकोर्ट की ही बात करें, यहाँ 150 जज होने चाहिए, क्योंकि केंद्र शासन के विधि विभाग ने इतने ही जजों के लिए स्थान तय किए हैं, पर यहाँ 45 प्रतिशत स्थान रिक्त हैं। इसका आशय यही हुआ कि जहाँ 150 जज होने चाहिए, वहाँ केवल 66 जज ही कार्यरत हैं। बाकी 94 अदालतें खाली हैं। आबादी की दृष्टि से सबसे बड़े राज्य की जब यह स्थिति है, तो फिर बाकी राज्यों का क्या हाल होगा, इसे बताने की आवश्यकता नहीं है। देश की कुल 21 हाईकोर्ट ऐसी हैं, जहाँ आमतौर पर 33 से45 प्रतिशत तक जज के स्थान खाली हैं। न्यायाधीश बन सकें, ऐसे विद्वान वकील अब देश में बहुत ही कम रह गए हैं। दूसरी तरफ सरकार की इस दिशा में नीयत ही साफ नहीं है। वह जी-हुजूरी करने वाले जज चाहती है, पर ऐसे जज मिल नहीं रहे हैं। यदि देश की तमाम हाईकोर्ट को एक साथ करें, तो कुल 895 जजों के लिए स्थान तय किए गए हैंे। इसके बाद भी कई हाईकोर्ट ऐसी हैं, जहाँ काफी लंबे समय से कोटे के अनुसार जजों की नियुक्ति नहीं की गई है। एक तरफ रोज ही सैंकड़ों के हिसाब से मामले बढ़ रहे हैं, दूसरी तरफ जजों के स्थान खाली हैं। ऐसे में तुरंत न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
वैसे हमारे देश की तुलना अन्य देशों से की जाए, तो आबादी के अनुसार वहाँ जजों की संख्या कम ही है। अमेरिका-इंग्लैंड जैसे देशों में दर एक लाख नागरिकों के लिए एक जज है। यही नहीं कई देशों में तो दस लाख लोगों के लिए एकमात्र जज है। अदालतों में जजों की कमी कोई आज की बात नहीं है। वास्तव में देखा जाए, तो यह एक सोची-समझी साजिश ही है, जिसमें यह शामिल है कि हाईकोर्ट में सभी जजों के स्थानों की पूर्ति कभी न की जाए। इसके पीछे यही कारण है कि हाईकोर्ट ने कई बार लोकहित में ऐसे निर्णय सुनाए हैं, जिससे देश के नेताओं की फजीहत हुई है। इसलिए नेतोओं ने ही मिलकर यह साजिश रची की, रिटायर हुए जजों के स्थान पर नए जजों की नियुक्ति ही न की जाए, या फिर इस काम में घनघोर विलंब किया जाए। जज के पास अधिक मामले होंगे, तो वह उसी में व्यस्त हो जाएँगे। लोकहित में निर्णय देने में उनकी रुचि ही नहीं होगी। आज कुल 21 हाईकोर्ट में 291 जजों के स्थान रिक्त हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के बाद राजस्थान, गुजरात और पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में कई स्थान रिक्त हैं।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में 35 प्रतिशत, पटना हाईकोर्ट में 27 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 26 प्रतिशत, मुम्बई हाईकोर्ट में 25 प्रतिशत और कर्नाटक में 20 प्रतिशत जजों के स्थान रिक्त हैं। इसी तरह मध्यप्रदेश और मद्रास में 9-9 जज कम हैं। झारखंड और नई दिल्ली में 8-8 जज कम हैं। केरल में 7 और छत्तीसगढ़ में 6 जज कम हैं। आश्चर्यजनक रूप से जजों की इतनी सीटें खाली हैं, पर विद्वान वकील इस पद के लिए स्वयं को सुशोभित नहीं करना चाहते। उन्हें यह अच्छी तरह से मालूम है कि जज बनने के बाद एक निश्चित रकम वेतन के रूप में मिलेगी, इसके अलावा काम का अत्यधिक बोझ, सही नहीं, सरकारी दबाव के बीच लगातार काम करते रहना भी एक बहुत बड़ी समस्या है। इससे तो अच्छा है कि अपनी प्रेक्टिस की जाए। सबसे निचली कोर्ट की बात की जाए, तो सबसे खराब स्थिति बिहार और गुजरात की है। जहाँ क्रमश: 389 और 361 स्थान लंबे समय से खाली पड़े हैं। उत्तर प्रदेश में 294, राजस्थान में 223 स्थान रिक्त हैं। इसके बाद जब हम अखबारों में यह पढ़ते हैं कि लाखों केस लंबित पड़े हैं, तो इसके लिए हमें सरकार को कोसना चाहिए। आखिर इन स्थानों की पूर्ति तो सरकार को ही तो करनी है। फिर सरकार अपना काम ईमानदारी से क्यों नहीं करती?
सरकार की नीयत यदि साफ होती, तो यह स्थिति ही नही आती। करीब ढाई करोड़ मामले हैं, जो न्याय की गुहार कर रहे हैं। अभी तो इतने ही मामले को सुलझाने में एक लंबा वक्त गुजर जाएगा, फिर रोज सैकड़ों नए मामले भी तो आ रहे हैं, उन्हें कौन सुलझाएगा? कुछ मामले तो ऐसे होते हैं, जिनका तुरंत निबटारा आवश्यक है। यदि जज इसी में उलझ जाएँगे, तो छोटी-छोटी बात पर होने वाले मामले भी तो बढ़ते जाएँगे। बात दरअसल यह है कि सरकार अदालतों की तीखी टिप्पणियों से बचना चाहती है, इसलिए वह हमेशा ऐसे जजों की नियुक्ति करती है, जो चाटुकारिता में विश्वास रखते हों। ऐसे जज मुश्किल से मिलते हैं, इसलिए इनकी नियुक्ति में इतना अधिक विलंब होता है।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

भारी पड़ सकता है वीभत्स एसएमएस भेजना







डॉ. महेश परिमल

आजकल मोबाइल के माध्यम से वीभत्स क्लिपिंग और एसएमएस-एमएमएस भेजना आसान हो गया है। थोडे समय की मस्ती के लिए ये भले ही मजाक हो, पर यह मजाब भारी पड़ सकता है। इसके लिए कानूनी रूप से सजा का भी प्रावधान है। पर अभी हमारे देश में जागरुकता की कमी के कारण ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है। वीभत्स क्लिपिंग और एसएमएस की शिकार अधिकांश छात्राएँ या महिलाएँ ही होती हैं, जो लोकलाज के भय से सामने नहीं आतीं। इसलिए कई मामले दब जाते हैं। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। पुलिस इस दिशा में गंभीर हो गई है। इस मामले में दोषी पाए जाने पर पहली बार में 5 साल की जेल और एक लाख का जुर्माना और दूसरी बार में 10 साल की जेल और दो लाख का जुर्माना होगा। इसलिए अब आज के युवाओं को इस दिशा में सतर्क हो जाना चाहिए।
आज के युवा ‘सेक्सेटिंग’ से शायद वाकिफ न हो, पर यह सच है कि युवा इसके जाल में उलझते जा रहे हैं। ‘सेक्सेटिंग’ यानी सेक्स के ओवरटोन वाले एसएमएस-एमएमएस और ई मेल पिछले कुछ सालों से हमारे देश में काफी प्रचलित हो गए हैं। अमेरिका में जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब इसमें दोषी पाए जाने वालों को कड़ी सजा होती थी। इसके बाद भी यह प्रदूषण वहाँ फैलता ही जा रहा है। इस पर अमेरिकन एकेडमी आफ पिडीयाट्रिक्स को अधिकृत रूप से ‘सेक्सेटिंग’ की व्याख्या करनी पड़ी। इस व्याख्या के अनुसार ‘सेक्सेटिंग’ यानी सेक्स से भरे संदेश सेलफोन, कंप्यूटर या फिर अन्य किसी डिजीटल माध्यम से भेजना, प्राप्त करना या फारवर्ड करना। कुछ समय पहले एक अमेरिका के एक कांग्रेसी एंथोनी वेनर ने ऑनलाइन माध्यम का इस्तेमाल करते हुए कुछ उत्तेजक चित्र 6 महिलाओं को भेजा। यह मामला इतना अधिक तूल पकड़ा कि आखिर में उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। यह समस्या लगातार बढ़ रही है, आखिर क्या है इसका कारण?
इस पर एक मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि वास्तव में जब मस्तिष्क में सेक्स के विचार अपना कब्जा पूरी तरह से जमा लेते हैं, तब व्यक्ति सेक्स जैसी हरकतें करना शुरू कर देता है। जिस व्यक्ति के दिमाग में हमेशा सेक्स रहता है, उसके बाद इसके अलावा कोई विकल्प होता ही नहीं। तब वे सेक्सेटिंग जैसी प्रवृत्ति के लिए आकर्षित होता है। दूसरी तरफ अश्लील संदेश भेजते समय वह एक तरह की खुशी या पॉवर का अनुभव करता है। जो लोग उसके संदेश पढ़कर दु:खी होते हैं, तो उसे और दु:खी करके वह खुशी प्राप्त करता है। यह एक विकट स्थिति है। अपनी कुंठित भावनाओं को इस तरह से व्यक्त करने वाला और दूसरों की पीड़ा से खुशी प्राप्त करने वाला व्यक्ति समाज के लिए भी घातक हो सकता है। सेक्सटिंग की इस समस्या पर शोध करने वाली एक संस्था के प्रमुख का मानना है कि मोबाइल फोन के आने से यह समस्या अब विकराल रूप धारण करने लगी है। वीभत्स संदेश पढ़-पढ़कर और बार-बार फारवर्ड करने युवाओं का नैतिक पतन हो रहा है। कई युवा जब ऐसी हरकतें करते हुए पकड़े जाते हैं, तो उन्हें शर्म नहीं आती। उन्हें पता होता है कि वे इस तरह का अपराध कर रहे हैं। इसके समाधान के लिए युवाओं का मानसिक इलाज करवाना चाहिए। घर के बुजुर्गो को इस बात का खयाल रखना होगा कि घर का युवा सदस्य कहीं वीभत्स संदेश के आदान-प्रदानके जाल में तो नहीं उलझ गया है?
सेक्सटिंग अपराध के बारे में बात करते हुए मुंबई हाईकोर्ट में प्रेक्टिस करने वाले एक वकील का कहना है कि भारत देश का समावेश ऐसे देशों में होता है जहाँ सेक्सटिंग करने वाले के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है। फोन या इंटरनेट के माध्यम से अश्लील संदेश भेजने वाले व्यक्ति को लंबे समय तक जेल की सजा हो सकती है। भारतीय दंड संहिता में महिलाओं की सुरक्षा के लिए भी अनेक प्रावधान हैं। इसके तहत सेक्सटिंग के माध्यम से यदि कोई महिला इसका शिकार होती है, तो उसे खुलकर पुलिस की सहायता लेनी चाहिए। ताकि अन्य महिलाएँ भी इससे प्रेरणा ले सके। इसका दूसरा पहलू यह है कि सेक्सटिंग के मामले में अभी तक कानून ही बन पाया है, इसका सख्ती से पालन नहीं हो पा रहा है। सरकार चाहे तो इस दिशा में सक्रियता दिखाते हुए कानून को सख्त बनाए और इसे अमल में लाने के तमाम उपाय करे। इसके लिए एक ईमानदार प्रयास आवश्यक है, ताकि देश में महिलाओं की सुरक्षा हो सके। देश की महिला सांसद भी इस दिशा में रुचि लें, तो कानून के अमल में तेजी आ सकती है।
सेक्सेटिंग की रोकथाम के लिए कानून
आईटी एक्ट के तहत कानून 67 धारा के अनुसार जो व्यक्ति अश्लील या वीभत्स जानकारी प्रकाशित करता है या किसी को भेजता है, तो आरोप सिद्ध होने पर उसे 5 वर्ष की जेल और एक लाख रुपए जुर्माना हो सकता है। यदि यह अपराध वह दोबारा करता है, तो उसे दस वर्ष की जेल और दो लाख रुपए जुर्माना हो सकता है। इसके अलावा पुलिस मामले को देखते हुए धारा 509 के तहत आरोपी की धरपकड़ करती है, तो उसे दो से 7 साल तक की कैद की सजा का प्रावधान कर सकती है। इसके दायरे में सामान्य व्यक्ति से लेकर सेलिब्रिटी भी आते हैं। कई बार ऐसा होता है कि सामान्य व्यक्ति के अलावा सेलिब्रिटी भी सेक्सटिंग इसका शिकार हो सकते हैं। मार्च 2008 में दिल्ली के एक बी.कॉम के छात्र ने अभिनेत्री सुष्मिता सेन को वल्गर एसएमएस भेजने के खिलाफ प्रकरण दर्ज किया था। इसके पहले फरवरी 2007 में फीलांस मीडिया पर्सन को नवोदित अभिनेत्रियों को डांसरों के वीभत्स मेसेज भेजन के आरोप में पकड़ा था। 2007 में ही अभिनेत्री नगमा ने बांद्रा पुलिस स्टेशन में एफआईआर में कहा था कि काई अनजाना व्यक्ति उसे धमकी भरे और अश्लील एसएमएस भेज रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि अभी तक इन मामलों का निबटारा नहीं हुआ है। सभी प्रकरण ट्रायल कोर्ट में हैं।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 8 अगस्त 2011

ठंडे बस्ते में जा सकता है ‘केश फॉर नोट’ का मामला

डॉ. महेश परिमल
‘केश फॉर नोट’ मामले में जिस तरह से अमरसिंह से पूछताछ हुई है, उससे स्पष्ट है कि यह मामला भी बहुत जल्द ठंडे बस्ते में चला जाएगा। इसका सबसे बड़ा सबूत यही है कि इस मामले के एक आरोपी सुहैल हिंदुस्तानी की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली पुलिस ने उसके हवाले से यह बताया कि इस कांड में न तो कांग्रेस का और न ही समाजवादी पार्टी के किसी नेता की मिलीभगत है। अभी तो इस मामले में पूरी जाँच ही नहीं हुई है, उस स्थिति में पुलिस का यह कहना यही दर्शाता है कि केंद्र सरकार का इरादा आखिर क्या है? अमरसिंह से जो पूछताछ हुई है, वह एक नाटक लगती है। क्योंकि अमरसिंह के जवाब ही इतने लचर हैं कि कोई मामला बनता दिखाई नहीं दे रहा है। इस मामले में किसी गुनाहगार को सजा होगी, इसकी संभावना बहुत ही कम है। इसके पीछे यही बात है कि इसके पहले भी झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में नरसिंह राव और बूटा सिंह के खिलाफ पर्याप्त सबूत होने के बाद भी वे अदालत से निर्दोष छूट गए थे। अगर अमरसिंह का मामला अधिक उछलता है, तो यह मामला भी सामने आएगा ही। इसकी नजीर पेश की जाएगी, इसलिए कांग्रेस ही इस मामले को दबाना चाहती है।
भारतीय संसद के 58 वर्ष के इतिहास में 22 जुलाई 2008 का दिन सबसे अधिक शर्मनाक दिन के रूप में अंकित हो गया, जब सांसद प्रधानमंत्री के वक्तव्य को सुनने को आतुर थे, तब भाजपा के तीन सांसद खड़े होकर जिस तरह से हॉल के बीचों-बीच आकर टेबल पर नोटों की थप्पी उछालने लगे, तब लोकसभा के स्पीकर भी कुछ समझ नहीं पाए, सांसद भी कुछ समझ नहीं पाए, यहाँ तक कि टीवी पर इसका लाइव देखने वाले करोड़ों दर्शक भी हतप्रभ रह गए। इस मामले में भाजपा के जिन सांसदों को यदि वास्तव में रिश्वत दी गई, तो इसकी रिपोर्ट वे पुलिस थाने में कर सकते थे या फिर स्पीकर के केबिन में जाकर चुपचाप मिल सकते थे। आखिर टीवी चैनल के सामने आकर इस तरह का रहस्योद्घाटन करने का मतलब क्या था? आखिर इस नाटक को करने की क्या आवश्यकता था? इसके पहले संसद में विश्वासमत प्राप्त करने के लिए साम्यवादी दल के नेता ए.बी. वर्धन ने यह आरोप लगाया था कि एक सांसद का भाव 25 करोड़ रुपए चल रहा है। मतदान की पूर्व संध्या खबर मिली थी कि एनडीए के दस सांसदों को सरकार के खिलाफ मतदान करने अथवा सदन से अनुपस्थित रहने के लिए मना लिया गया है। जब मतदान हुआ, तब भाजपा के सात सांसदों ने क्रास वोटिंग की। क्रास वोटिंग करने वाले या अनुपस्थित रहने वाले तमाम सांसदों की सीबीआई द्वारा गहन जाँच की जाती, उनकी ब्रेन टेपिंग की जाती, तो सच्चई सामने आ जाती। पर यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही है कि स्वयं ही इस मामले को सुलझाने में दिलचस्पी नहीं ले रही है, तो फिर सच्चई सामने कैसे आएगी? इस मामले में सुप्रीमकोर्ट से ही कुछ आशा है कि वह कोई चमत्कार कर दिखाए। इसकी भी संभावना कम ही है, क्योंकि चमत्कार की उम्मीद जिन जजों से की जा सकती है, उनसे से एक सेवानिवृत्त हो गए, शेष धाकड़ जज अक्टूबर तक सेवानिवृत्त हो जाएँगे, ऐसे मे कोई यह नहीं चाहेगा कि सेवानिवृत्ति के अंतिम कुछ महीनों में कुछ ऐसा न किया जाए, जिससे उनकी फजीहत हो।
भाजपा के तीन सांसदों द्वारा रिश्वत का जो आरोप लगाया गया था, वह एक संगीन मामला है। इसके सबूत भी थे। एक न्यूज चैनल ने तो इस कांड की पूरी सीडी ही बनाकर स्पीकर को दी थी। इसमें सबसे अहम सबूत एक हजार की वे करंसी नोट थीं, ये नोट किस बैंक से निकाली गई थीं, वह आसानी से जाना जा सकता था। इसके अलावा नोटों पर फिंगर प्रिंट से भी कुछ नकुछ पता लगाया जा सकता था। दिल्ली पुलिस ने इस दिशा में कोई मेहनत की, इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। ‘केश फॉर नोट’ कांड की तुलना झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड से की जा सकती है। इस मामले की तह में जाएँ, तो सन् 1993 में जब संसद में प्रधानमंत्री नरसिंह राव सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। तब झारखंड के चार सांसदों को 50-50 लाख रुपए की रिश्वत दी गई थी। रिश्वत लेने वालों में शिबू सोरेन भी थे। इन्होंने रिश्वत की इस राशि को बैंक में जमा भी किया था। जाँच एजेंसी के सामने उन्होंने यहूल भी किया था कि नरसिंह राव की तरफ से उन्हें रिश्वत दी गई है। देश की विभिनन अदालतों में यह मामला दस वर्षो तक चला, इसके बाद भी सबूत न मिलने के कारण नरसिंह राव पूरी तरह से निर्दोष साबित हुए थे।
देश की नीति को समझना हो, तो झारखंड मुक्ति मोर्चा के रिश्वत कांड के इतिहास को जानना होगा। इस कांड की जाँच सीबीआई को 1995 में सौंपी गई थी। 1997 की जनवरी तक तीन चार्जशीट फाइल की गई। इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव और गृह मंत्री बूटा सिंह को भी आरोपी बनाया गया था। इस पर नरसिंह राव एवं बूटा सिंह ने सुप्रीमकोर्ट में विशेष रूप से स्पेशल लीव पिटीशन की थी कि यह कार्यवाही संसद को प्रभावित कर सकती है, इसलिए हमें धारा 105 के तहत संरक्षण दिया जाए। सुप्रीमकोर्ट ने इस पर अपना फैसला दिया कि इस धारा का लाभ रिश्वत लेने वाले को मिल सकता है, रिश्वत देने वाले को नहीं, क्योंकि रिश्वत संसद के बाहर दी गई है। नरसिंह राव की तरह अन्य राजनेताओं ने भी इस फैसले के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट में रिव्यू आवेदन किया था, पर सुप्रीमकोर्ट ने आवेदन लेने से इंकार कर दिया था। आखिर 29 सितम्बर 2000 को ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में नरसिंह राव और बूटा सिंह को दोषी ठहराया था। इस फैसले के खिलाफ दोनों ने दिल्ली हाईकोर्ट में अपील की। दिल्ली हाईकोर्ट ने मार्च 2002 में नरसिंह राव और बूटा सिंह तकनीकी कारणों से निर्दोष बताया। इस प्रकार से झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में पर्याप्त सबूत होने के बाद भी रिश्वत देने वाले पूरी तरह से बच गए। बाद में शिबू सोरेन को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया गया।
पुलिस यदि चाहे तो ‘केश फॉर नोट’ मामले में भी आधुनिक संसाधनों का इस्तेमाल कर आरोपियों से सच उगलवा सकती है। अब्दुल करीम तेलगी जैसे लोगों से इसी तरह के अत्याधुनिक संसाधनों से ही चौंकाने वाली जानकारी मिली थी। यदि उक्त नेताओं पर भी इसी तरह के संसाधनों का इस्तेमाल किया जाए, तो सच्चई बाहर आने में देर नहीं होगी। पर इस दिशा में केंद्र सरकार ही गंभीर दिखाई नहीं दे रही है। उसकी नीयत भी साफ न होने के कारण इस मामले को दबाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। मुम्बई के एक वकील ने अमेरिका के साथ परमाणु सौदे से देश की स्वतंत्रता खतरे में आ सकती है, इस पर अदालत से हस्तक्षेप करने की गुहार लगाई थी। पर मुम्बई हाईकोर्ट ने इस मामले में कुछ करने से हाथ खड़े कर लिए थे। इसी तरह से जब सरकार के किसी निर्णय से देश की स्वतंत्रता और सार्वभौमिकता को खतरा होने लगे, तो भी हमारी अदालतें ऐसा तमाशा देखती रहेंगी, पर कर कुछ नहीं पाएँगी। ऐसा इसलिए हो गया है कि हमारे संविधान में ही ऐसा प्रावधान है। ‘केश फॉर नोट’ मामले में पिछले तीन वर्षो से परदा पड़ा हुआ था। वह तो भला हो, भूतपूर्व चुनाव आयुक्त लिंगदोह की, जिन्होंने एक जनहित याचिका में दिल्ली पुलिस की इस काहिली पर प्रश्नचिह्न उठाया। तब पुलिस हरकत में आई और ताबड़तोड़ दो आरोपियों की धरपकड़ की गई। इनमें से एक संजीव सक्सेना के बयान के अनुसार समाजवादी पार्टी के भूतपूर्व महामंत्री अमरसिंह की गिरफ्तारी की पूरी संभावना थी, पर उनकी गिरफ्तारी से कितने ही राजनेता लपेटे में आ जाते, इसलिए दिल्ली पुलिस ने अमरसिंह से पूछताछ का केवल नाटक ही किया। अब यह कहा जा रहा है कि अमरसिंह से दोबारा पूछताछ की जाएगी, पर इस पूछताछ में क्या बातें सामने आएँगी, यह देश की जनता शायद ही कभी जान पाए। जब देश में पर्याप्त सबूत के बाद भी दो बड़े लोग बच सकते हैं, तो फिर उसकी तुलना में छोटा मामला है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि ‘केश फॉर नोट’ मामले में भी दोषी आसानी से छूट जाएँगे। हम भले ही लोकतांत्रिक देश का ढिंढोरा पीटने से न थकते हों, पर सच तो यह है कि कानून आज भी बलशाली हाथों का खिलौना है। ऐसे में देश की न्यायप्रियता, निष्ठा और ईमानदारी पर सवालिया निशान लग ही जाता है।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 6 अगस्त 2011

समस्याओं से मुँह चुराते सांसद







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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

हरिभूमि और नवभारत में प्रकाशित आलेख



यह आलेख लवभारत में आज संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ




यह आलेख हरिभूमि में आज संपादकीय पेज पर प्रकाशित हुआ

बुधवार, 3 अगस्त 2011

वे मौत के वाहक नहीं रोजी-रोटी का साधन हैं




रमेश शर्मा

पत्थलगांव। राह चलते अगर कहीं हमारा पांव किसी मुलायम चीज पर पड़ जाए, तो हमें सांप होने का आभास होता है और हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो जाती है। सांप का नाम लेते ही रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। हमारे लिए तो ये मौत के वाहक हैं, पर उन मासूमों के लिए तो ये ही खतरनाक और विषैले सांप रोजी-रोटी का साधन बन गए हैं। स्कूल जाने की चाहत तो रखते हैं, पर माता-पिता का जीवन यायावर की तरह होने के कारण ये भी उनके साथ खानाबदोश जिंदगी जीते हैं। कभी यहां तो कभी वहां! सबव के इस पावन महीने में इन सांपों को दिखाकर ये मासूम अच्छी कमाई कर लेते हैं।
नागलोक के नाम से चर्चित जशपुर जिले में ग्रामीणों की मौत का कारण बनने वाले नाग यहंा पर कुछ लोगों की रोजी रोटी का सहारा भी बने हुऐ हैं। इस अचंल में बहुतायत में मिलने वाले नाग और करैत जैसे जहरीले सांपों के भय से यहंा के लोग भले ही डर कर सहम जाते हैं पर इन्ही सांपों को कुछ बच्चों ने अपने जीवन यापन का सहारा बना लिया है। नागलोक के नाम से चर्चित इस अचंल में काले नाग भले ही ग्रामवासियों के लिये मौत का पैगाम लेकर पहुंचते हैं पर सन्तोष और पारस जैसे बच्चों के लिये यही जानलेवा कहलाने वाले काले नाग रोजी रोटी का सहारा बने हुए हैं। ये बच्चे जगह जगह इन भयावह दिखने वाले काले नाग को गले में लटका कर तथा फन निकाले हुए गुस्सा वाली मुद्रा का प्रदर्शन कर दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में लगे रहते हैं।



इसी रविवार को पत्थलगांव के बस स्टैण्ड पर काला नाग लेकर कुछ बच्चे भीख मांगते हुऐ दिखाई पड़े। सावन का पावन महीना होने के कारण कई श्रद्धालु इन बच्चों के हाथों में काले नाग के दर्शन कर नतमस्तक हो रहे थे। ऐसे लोगों से नाग दर्शन के एवज में दो चार रुपए.मांगकर ये बच्चे अपनी रोजी रोटी का जुगाड़ में जुटे हुऐ थे।
पारस और सन्तोष नामक इन बच्चों ने बताया कि वे महासमुन्द जिले के निवासी हैं। यहंा पर वे अपने परिजनों के साथ सांप दिखाकर जीवन यापन का काम में जुटे हुए हैं। पारस ने बताया कि बचपन से इन सांपों के साथ रहने से उन्हे इनसे किसी तरह का डर नहीं लगता है। इस बच्चे ने बताया कि उसकी स्कूल जाकर पढ़ने लिखने की इच्छा होती है पर उनके माता पिता घुमन्तू जीवन व्यतीत करने के कारण उनकी पढ़ाई की इच्छा पूरी नहीं हो पाती है। अब तो सांपों के करतब दिखाने में ही पूरा समय गुजर जाता है।
सन्तोष नामक बच्चे का कहना था कि उन्हे अक्षर ज्ञान भले नहीं है पर काले नाग को कैसे वश में किया जाता है इसका बखूबी ज्ञान है। सन्तोष ने बताया कि बेहद जहरीले काले नाग को विषविहीन करने के बाद उनके माता पिता इन सांपों को उन्हे सौंप देते हैं। यदाकदा गुस्से में आकर सांप उनके शरीर पर अपने नुकीले दांत गड़ा देता है। इसके लिये वे जड़ी बूटियों का सहारा ले लेते हैं। इन बच्चों ने बताया कि जहरीले सांपों का विष निकालकर इसके खरीददारों के पास बेच दिया जाता हैं। पारस का कहना था कि सांपों का प्रदर्शन करके वे अपनी रोटी के साथ सांप के लिये ूुघ की व्यवस्था करते हैं।इन बच्चों के माता पिता भी टोकरों में सांपों को लेकर उनका प्रदर्शन के बाद जड़ी-बूटी बेचते हैं। एक गांव से दूसरे गांव की खाक छानने के बाद इन सांपों से उनकी रोटी का जुगाड़ हो जाता है। इन बच्चों का कहना था कि यहंा के लोग सुरक्षा के उपाय करें तो निश्चित ही सर्पदंश की घटनाओं में कमी आ सकती है। पारस का कहना था कि बहुत से लोग सांप को फन उठाए हुई मुद्रा में देखना पसंद करते हैं जिसके एवज में उनकी अच्छी आमदनी हो जाती है।

रमेश शर्मा पत्‍थलगॉंव

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

क्या मीडिया ने कभी कोई खूबसूरत महिला नहीं देखी



डॉ. महेश परिमल
पाकिस्तान से आई हिना रब्बानी स्वदेश लौटकर भारतीय मीडिया से खफा है। भारतीय मीडिया ने उसे एक खूबसूरत आइटम की तरह पेश किया। जिसके तमाम लटके-झटके सुर्खियाँ बन गए। सचमुच भारतीय मीडिया तो उस पर इस कदर फिदा था मानो उसने कभी कोई खूबसूरत महिला ही नहीं देखी। विशेषकर उन चैनलों पर तो कटाक्ष किया ही जा सकता है, जिससे गंभीर खबरों की उम्मीद की जाती है। हिना आई और गई, भारत में उसकी खूबसूरती की चर्चा है। लेकिन वे किसलिए यहाँ आईं थीं, भारतीय विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा से क्या बातचीत हुई? हुर्रियत के नजरबंद नेता सैयद अली शाह गिलानी दिल्ली आकर हिना से किस आधार पर मिले? इस मीटिंग की व्यवस्था भारतीय अधिकारियों ने क्यों की? इसके बाद पाकिस्तान की विदेश नीतियों पर क्या बदलाव आएगा? इस तरह के सभी प्रश्न आज हवा हो गए। मीडिया रब्बानी की खूबसूरती ही नहीं, उसके पर्स, अँगूठी, कपड़े और लटके-झटके आदि में ही उलझ गया। पूरा मीडिया ही मूल मुद्दे से भटक गया। इस पर मीडिया की एक ही दलील हो सकती है कि जो दिखता है वही बिकता है। लोग तो बहुत कुछ देखना चाहते हैं, पर क्या मीडिया उसे खुले आम उसी तरह से दिखाएगा भला? वास्तव में आज मीडिया जो कुछ दिखा रहा है, तो वह दर्शकों की नहीं, बल्कि अपनी ही भूख को दर्शा रहा है।
मीडिया के साथ-साथ भारत सरकार यह भूल गई कि हिना रब्बानी खार पाकिस्तान सरकार की पसंदगी नहीं है। वह तो पाकिस्तान आर्मी द्वारा दिए गए एजेंडे को लेकर यहाँ आई थीं। अपने रूप और सौंदर्य के बल पर उसने वही किया, जो विश्वामित्र के लिए मेनका ने किया था। हमारे विदेश मंत्री भी उसके सामने घिघियाते हुए नजर आए, मानो वह हमारे बलवान मित्र राष्ट्र की प्रतिनिधि हो। उन्होंने जिस तरह से उनसे हाथ मिलाया, इसे जिस तरह से मीडिया ने दिखाया, उससे तो ऐसा लग रहा था, मानों वे उनका हाथ छोड़ना ही नहीं चाहते। हाथ मिलाने का फुटेज को ऐसे दिखाया गया, जैसे वह एक उत्सव हो। ऐसे दृश्यों को मीडिया दिन-भर में दसियों बार दिखाता है, जिससे देखकर घृणा होने लगती है। दूसरी ओर एक विदेश मंत्री में जो सख्ती और दृढ़ता होनी चहिए, वह हमारे विदेश मंत्री में कहीं भी दिखाई नहीं देती। वे भी यह भूल गए कि सामने जो खूबसूरत बला है, वह हमारे दुश्मन नंबर एक की प्रतिनिधि के रूप में है। जो पिछले 63 साल से हमें परेशान कर रहा है। कश्मीर उसका स्थायी राग है, जिसे वह समय-समय पर बजाता रहता है। दूसरी ओर, कश्मीर को भारत से अलग करने की माँग करने वाले अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी की मुलाकात में हमारा देश ही सहयोगी बन रहा है। हमारे देश के उम्रदराज नेताओं के आगे एक 34 वर्षीय पाकिस्तानी विदेश मंत्री को सामने पाना मानो एक अनोखी घटना हो गई। अब यह किस-किस को समझाएँ कि हिना की छोटी उम्र को उसकी कमजोरी न माना जाए, उससे प्रभावित होना जानलेवा हो सकता है।
हिना रब्बानी खार के सौंदर्य को अलग रखकर यह सोचा जाए कि क्या उसने पूर्व के विदेश मंत्रियों की तरह प्रभाव छोड़ा? हुर्रियत नेता से मिलने पर भाजपा ने काफी विरोध किया, पर यह विरोध केवल विरोध तक ही सीमित रहा। भारतीय मीडिया ने बहुत कुछ दिखाया। देखने वालों ने यहाँ तक देखा कि पत्रकार वार्ता में हिना पूरे आत्मविश्वास के साथ बिना लाग-लपेट के अपनी बात कहती दिखाई दी। जबकि हमारे विदेश मंत्री के हाथ में एक पर्ची थी। इसका आशय यह निकल सकता है कि हिना को जो कुछ कहना था, वह पूरे आत्मविश्वास के साथ बोल गई, पर हमारे विदेश मंत्री को क्या कहना है, इसे किसी और ने तय किया था। जिसके लिए उन्हें पर्ची देखनी पड़ती थी। इसे क्या कहा जाए? हिना को देखकर लगा ही नहीं कि वह एक कर्ज से लदे गरीब देश का प्रतिनिधित्व कर रही है। ऐसा गरीब देश जो एक तरह से अमेरिका के हाथों गिरवी है। उस देश की प्रतिनिधि को हमारा मीडिया एक फैशनेबल महिला के रूप में पेश कर फैशन परेड आयोजित कर रहा है। क्या अब भारत का कोई प्रतिनिधि पाकिस्तान जाए, वहाँ जाकर वह यह माँग करे कि उसकी मुलाकात दाऊद इब्राहीम से कराओ, तो क्या पाकिस्तान सरकार इसका इंतजाम करेगी?
तीन दिन केवल तीन दिन भारत में रही, पर हम उससे यह नहीं समझ पाए कि पाकिस्तान की कूटनीति क्या है? लोगों ने यहाँ तक कटाक्ष किया है कि जब इतनी सुंदर महिला राजनीति में हो, तो फिर हमें फिल्मी अभिनेत्रियों की आवश्यकता ही नहीं है। केवल कसाब ही नहीं, दाऊद इब्राहिम, होटल ताज पर हमला, मुम्बई बम कांड, गुजरात में सिलसिलेवार बम घमाके, कश्मीर आदि अनेक मुद्दे हैं, जो पाकिस्तान के साथ अभी भी अनसुलझे हैं, इन मामलों पर कोई बात हुई हो, ऐसा लगता नहीं। अब वे स्वदेश लौट चुकी हैं, पर मीडिया के लिए अखलाक सागरी की पंक्तियाँ छोड़ गई हैं:-
एक मुद्दत हुई जब यहाँ से, कोई गुजरा था जुल्फें उड़ाए
हम आज तक उन्हीं खुशबुओं से नहाए हुए हैं..

सोमवार, 1 अगस्त 2011

जाना येद्दियुरप्पा का.. पर अब कौन?




डॉ. महेश परिमल
येद्दियुरप्पा तो गए, पर भाजपा का टेंशन अभी कम नहीं हुआ है। ये तो शुरुआत है। क्योंकि कर्नाटक को संभालना बहुत ही मुश्किल है। चहाँ रेड्डी बंधुओं का राज चलता है। ऐसे में येदि के स्थान वर किसी ऐसे व्यक्ति को कर्नाटक की कमान देना, जिसकी छवि साफ हो। पर वो कोन होगा, यही प्रश्न भाजपा को मथ रहा है। वैसे जब बिहार में भ्रष्टाचार के आरोप में लालू प्रसाद घिर गए, तब उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री उमा भारती ने जब इस्तीफा दिया, तो उन्होंने अपने चहेते बाबूलाल गोर को सत्ता सौंप दी। पर येद्दियुरप्पा ने ऐसी कोई पेशकश नहीं की है कि उनके स्थान पर किसे रखा जाए। कुछ नाम अवश्य हैं, जिन पर विचार किया जा सकता है। कर्नाटक भाजपाध्यक्ष के.एस. ईश्वरप्पा, राज्यसभा सदस्य प्रभाकर कोरे, पूर्व भाजपाध्यक्ष सदानंद गोवडा आदि पर लोगों की निगाहें हैं। इनमें से ईश्वरप्पा कुरुबा जाति के अगुवा हैं, इसके साथ ही येद्दियुरप्पा के कट्टर विरोधी भी। मंत्रिमंडल को येद्दियुरप्पा के मोहपाश से मुक्त करना है, तो यही नाम सबसे ऊपर है। उसके बाद राज्यसभा सदस्य प्रभाकर कोरे का नाम आता है। वे एक सुलझे हुए शिक्षाशास्त्री हैं। दूसरी ओर येद्दियुरप्पा स्वयं सदानंद गोवडा को पसंद करते हैं। इन्हें मुख्यमंत्री बनाकर लिंगायत जाति को खुश किया जा सकता है। फिर जगदीश शेट्टार को उपमुख्यमंत्री बनाकर मंत्रिमंडल को संतुलित किया जा सकता है।
कर्नाटक में नए मुख्यमंत्री और वहाँ के हालात को परखने के लिए भाजपा कार्यसमिति ने अरुण जेटली और राजनाथ सिंह को जबावदारी सौंपी है। कार्यसमिति के सामने अनंतकुमार भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जा सकते हैं। पर उनके साथ यह मानइस पाइंट है कि वे येद्दियुरप्पा की तरह लिंगायत न होकर ब्राrाण हैं। इसके अलावा नीरा राडिया के साथ भी उनका नाम जुड़ा हुआ है। जगदीश शेट्टार अच्छे प्रत्याशी हो सकते हैं, पर वे रेड्डी बंधुओं के अधिक निकट होने के कारण उनका पत्ता भी कट सकता है। इसके अलावा विधि मंत्री सुरेश कुमार भी योग्य प्रत्याशी हो सकते हैं।
येद्दियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाने का सबसे बड़ा कारण यह था कि जब पार्टी कार्यकर्ता स्वयं को पार्टी से ऊपर मानने लगता है, तो उसे बेइज्जत होकर जाना ही पड़ता पद न छोड़ने के लिए येद्दियुरप्पा ने पार्टी आलाकमान को कई तरह की धमकियाँ दी। उनके बिना कर्नाटक में भाजपा रसातल में चली जाएगी। रेड्ड्ी बंधुओं पर वे ही लगाम कस सकते हैं। एक तरह से उनका यह भयादोहन था। लेकिन आलाकमान ने तय कर रखा था कि इन्हें हटाना ही है। काफी ना-नुकुर के बाद अंतत: उन्होंने इस्तीफा दे ही दिया। भाजपा को यह काम काफी पहले ही कर देना था, इससे उसकी छवि और भी निखर गई होती। भ्रष्टाचार से लड़ने में इस उदाहरण को एक नजीर बनाकर पेश किया जा सकता था। पर देर कर दी, लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद।
वैसे भी लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद येद्दियुरप्पा का जाना तय था। क्योंकि सरकार को करोड़ों का चूना लगाने वाले और अपने खानदान को उपकृत करने के लिए उन्होंने जो पाप किए, उसे तो भुगतना ही था। दूसरी ओर पार्टी को भी लग गया कि इन्हें काफी संरक्षण दे दिया गया है, अब इन्हें सहन नहीं किया जा सकता। पार्टी चाहती,तो येद्दियुरप्पा के खिलाफ अभी सबूत नहीं मिले हैं, कहकर पल्ला झाड़ सकती थी, लेकिन उसे अपनी छवि साफ रखने के लिए येदि को दरवाजा दिखाना ही था। वैसे येदि ने अपनी तरफ से पूरा जोर लगा दिया, लोकायुक्त की रिपोर्ट के आधार पर वे दोषी नहीं ठहराए जा सकते। ऐसा माना जा सकता था। इसके पहले भी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ऐसा कर चुकी हैं। लेकिन भाजपा आलाकमान को व्यक्ति से अधिक पार्टी का अनुशासन प्रिय था, इसलिए उन्होंने येदि का इस्तीफा लेने में देर नहीं की।
वैसे पार्टी की ढीली नीति के कारण ही येदि को मनमानी की पूरी छूट मिल गई। इसका नुकसान पार्टी को उठाना पड़ा। उन्हें पता था कि येदि जितने समय तक मुख्यमंत्री रहेंगे, तब तक पार्टी की छवि उज्‍जवल नहीं हो सकती। भाजपा ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का नैतिक अधिकार ही खो दिया था। इसलिए एक आदर्श स्थापित करने के लिए येदि की बलि लेनी ही थी। इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का रास्ता साफ हो गया। उधर मीडिया भी भाजपा को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा को बार-बार घेर रहा था। इसलिए येदि को हकालना उसकी मजबूरी भी कहा जा कसकता है। इस निर्णय से भाजपा ने दूसरा अच्छा काम यह किया कि येदि को आईना दिखा दिया। अब तक येदि स्वयं को पार्टी से ऊपर समझने लगे थे। वे ये भूल गए थे कि वे भाजपा के कारण मुख्यमंत्री हैं, न कि अपने बल पर या फिर रेड्डी बंधुओं के बल पर। वे अतिआत्मविश्वास के शिकार हो गए थे। रेड्ी बंधुओं द्वारा किए जा रहे असंवैधानिक कामों के प्रति उन्होंने अपनी आँखें ही बंद कर रखी थी। इस तरह से आसमान पर उड़ने वाले येदि को जमीन दिखानी थी, इसलिए दिखा दी। इससे दूसरे अन्य लोगों तक यह संदेश चला गया कि पार्टी व्यक्ति से बड़ी है। इसके अलावा भ्रष्टाचार को पोषित करना भी भ्रष्टाचार से कम अपराध नहीं है।
खैर, भाजपा के सामने कई प्रश्नचिह्न् हैं, जिसका सामना उसे करना है। इसे वह कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई का एक पड़ाव मान सकती है। क्योंकि येद्दियुरप्पा से इस्तीफा लेकर उसने एक नषीर तो पेश की ही है। इससे कांग्रेस की बोलती बंद हो गई है। अब भाजपा पूरे दम खम के साथ कांग्रेस का जवाब दे सकती है कि उसने एक भ्रष्टाचारी मुख्यमंत्री को लोकायुक्त की रिपोर्ट आते ही हटा दिया। कांग्रेस ऐसा नहीं कर पाई। केग की रिपोर्ट में कई मं˜त्रियों का पर्दाफाश हो गया था, फिर भी उन्हें पूरा संरक्षण दिया गया। कनोटक यदि अब भाजपा से छूट भी जाए, तो उसके लिए दिल्ली दूर नहीं है।
डॉ. महेश प

शनिवार, 30 जुलाई 2011

‘न्यूज़ ऑफ द वर्ल्‍ड की मौत से क्या सबक लिया हमने?



डॉ. महेश परिमल
कम नहीं होती 168 वर्ष की जिंदगी। एक अखबार के लिए तो यह बहुत बड़ी जिंदगी है। उसकी लंबी उम्र हमें खुशी अवश्य दे सकती है, पर उसकी अकाल मौत हमें भीतर से दहला देती है। एक अखबार ऐसी मौत मर सकता है भला? उसकी मौत ने यह संदेश अवश्य दे दिया कि शालीनता की सीमाओं को तोड़ने का हश्र यही होता है। यह सच है कि लोग चटखारे वाली खबरें पढ़ना पसंद करते हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं होता कि इन खबरों को इकट्ठा करने के लिए आप किसी भी सीमा तक पहुँच जाएँ। लोगों को दूसरों के निजी जीवन के बारे में जानना हमेशा अच्छा लगता है। बस इस रुचि को ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ ने अपना आदर्श मान लिया। यहीं से उसका पतन शुरू हो गया। यह उसका पतन था, इसकी जानकारी उस समय तो नहीं मिली। क्योंकि हर परिवर्तन तनाव लाता है। इस अखबार ने जब लोगों के निजी जीवन के बारे में छापना शुरू किया, तब अखबार की बिक्री बढ़ गई। अखबार मालिक के लिए यह अप्रत्याशित था। उसने दोगुने जोश के साथ प्रभावशाली लोगों के निजी जीवन में झाँकना शुरू कर दिया। वास्तव में यहीं से उसका पतन प्रारंभ हो गया। इसकी जानकारी अखबार मालिक को काफी समय बाद पता चला।
इस अखबार की अकाल मौत ने यह साबित कर दिया कि सनसनी से अखबार बिक तो सकते हैं, पर लंबे समय तक चल नहीं सकते। जनता उसकी खबरें चटखारे लेकर पढ़ तो सकती है, पर उसे अपने ड्राइंग रुम में रख नहीं सकती। समाज कितना भी आगे बढ़ जाए, पर वह अपने जीवन मूल्यों को जीवित रखने की हमेशा कोशिश करता है। मूल्यहीनता उसे कभी स्वीकार नहीं होती। अश्लील साहित्य पढ़ने वाला पिता बेटे को कभी वैसा साहित्य पढ़ने की इजाजत नहीं देगा। इसलिए ऐसे अखबारों की खबरें वह सबके बीच चटखारे लेकर पढ़ सकता है, पर उस अखबार को घर पर लाकर नहीं पढ़ सकता। दूसरों के निजी जीवन के बारे में जानना अच्छा लगता होगा, पर जब उसी अखबार में स्वयं के निजी जीवन के बारे में कुछ छप जाए, तो वह विचलित हो जाता है। अखबार ने निजी जीवन की जानकारी निकालने के लिए काफी धन खर्च किया। विशेषकर पुलिस विभाग को मानो धन से तौल ही दिया। सामजिक नीतियों से हटकर अखबार ने असामाजिक होने का काम किया। जनता को जाग्रत करने के बजाए अखबर ने ऐसी बातें प्रचारित करनी शुरू कर दी, जिससे लोग सच से दूर हो गए। अखबार का काम पाठकों को सच के करीब ले जाना होता है, सच से दूर नहीं। ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ ने ऐसा किया और आज अतीत का हिस्सा बनकर रह गया।
मात्र एक छोटी सी घटना ने पत्रकारिता के इस किले पर सेंध लगा दी। एक मृत लड़की के फोन से वाइस मेल हैक करने से हुए खुलासे के बाद कई रहस्योद्घाटन हुए। सिलसिला शुरू हो गया। सिलसिला आज भी जारी है। भले ही अखबार बंद हो गया हो। अखबार ने जो कुछ किया, वह लोकप्रियता पाने के लिए किया। इससे वह लोकप्रिय तो हो गया, पर यही लोकप्रियता ही उसे ले डूबी। एक प्रतिभावान विद्यार्थी अपनी प्रतिभा को टिकाए रखने के लिए यदि नकल का सहारा लेता है, तो उसकी प्रतिभा कुछ समय बाद सामने आ ही जाती है। पर इस दौरान उसने कई प्रतिभाओं को आगे बढ़ने नहीं दिया, उसका क्या? सच कहा है कि महत्वपूर्ण होना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण बने रहना महत्वपूर्ण है। ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ महत्वपूर्ण तो हो गया, पर महत्वपूर्ण बने रहने के लिए उसने जो कुछ किया, वह गलत था।
‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ को खरीदने के बाद ही रुपर्ट मडरेक को मीडिया मुगल कहा जाने लगा। इस अखबार ने उन्हें काफी ऊँचाई दी। उन्हें इस ऊँचाई तक पहुँचाने वाला अखबार था। अखबार के कर्मचारी नहीं। अखबार के असंवैधानिक कार्यो के लिए कर्मचारी कतई दोषी नहीं हैं, पर आज वे सड़क पर आ गए हैं। उनके सामने जीवन की समस्याएँ मुँह बाए खड़ी हो गई है। अपने शुरुआती दौर में ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ ने श्रमिक वर्ग में नवचेतना का संचार करने का बीड़ा उठाया था। वह कम पढ़े-लिखे लोगों का प्रतिनिधित्व करता था। सनसनी फैलाने से वह कोसों दूर था। लोग उसे आदर की दृष्टि से देखते और पढ़ते थे। समकालीन अखबार ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ की नकल करते थे। बीसवीं सदी के छठे दशक में इस अखबार की 90 लाख प्रतियाँ प्रकाशित होती थीं। जो एक रिकॉर्ड था। इस अखबार में रुपर्ट मडरेक का आगमन 70 के दशक के अंतिम वर्षो में हुआ। तब अखबार ने अपना रंग-रूप बदलना शुरू किया। फिर सेक्स, अपराध अखबार के केंद्र बिंदु में आ गए। बस अखबार का पतन यही से शुरू हो गया। हम सभी यह मानते हैं कि छपे हुए शब्दों की विश्वसनीयता आज भी जिंदा है। इन शब्दों की अपनी जवाबदेही भी है। इन शब्दों की अपनी लक्ष्मण रेखा भी है। जिसने भी इसे पार किया, वह गया काम से। आज के अखबार अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। उन्हें यह सोचना चाहिए कि कहीं यह गलत तो नहीं हो रहा है। गिफ्ट कूपन छापकर अखबार बुजुर्गो को तो दूर तक दौड़ा सकते हैं, पर उनकी पीड़ा को समझ नहीं सकते। कूपन के कारण उन्हें कई बार अपने साथियों से भीख भी माँगनी पड़ती है। इससे अखबार लोकप्रिय भले हो जाए, पर एक बुजुर्ग को नाराज अवश्य कर देता है। अखबार मालिक को अपने अखबार की आत्मा को जिंदा रखने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। जब तक अखबार घर के सभी सदस्यों द्वारा पढ़ा जा रहा है, तब तक वह वास्तव में जिंदा है भी। जिस दिन घर के बुजुर्ग सुबह जल्दी उठकर अखबार को छिपाना शुरू कर दें, समझो अखबार की मौत करीब है। अखबार मालिकों का अखबार अपना रहे, समाज का रहे, तो ही अच्छा, यदि वह ‘न्यूज़ ऑफ द वल्र्ड’ बनने की कोशिश करेगा, तो उसका हश्र क्या होगा, यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

पुलिसिया चेहरे की वीभत्स सच्चाई


डॉ. महेश परिमल
कहीं पढ़ा था कि आपका स्वभाव ही आपका भविष्य है। इस सारगर्भित वाक्य में एक बहुत ही बड़ी सच्चई छिपी है। हमारे देश की पुलिस का स्वभाव कैसा है, इसे हम सभी जानते हैं। इसके बाद ग्वालियर के जीआरपी थाने में एक युवक सुनील तोमर की हत्या से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश मंे पुलिसिया चेहरा आज भी बदशक्ल है। पुलिस विभाग में उमराव सिंह उइके और रामनरेश जैसे लोग बहुत ही कम है, जो अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं।
ग्वालियर के जीआरपी थाने में एक युवक की हत्या के बाद यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि पुलिस अपनी छवि सुधारने के लाख प्रयास करे, जब तक वह पुलिस वालो ंके भीतर से यह धारणा नहीं निकाल देती कि वे कानून से ऊपर हैं, तब तक कुछ भी होना संभव नहीं है। पुलिस आज भी स्वयं को कानून से ऊपर मानती है। उसने कभी भी अपने को आम आदमी का रक्षक नहीं माना। सदैव उसके शोषण ही किया। आज एक अपराधी से अधिक आम आदमी पुलिस से केवल इसलिए डरता है, क्योंकि उसे मालूम है कि पुलिस विभाग के एक अदने से सिपाही के पास भी असीमित अधिकार हैं। वह एक आम आदमी को तो आसानी से फँसा सकता है, पर किसी रसूखदार पर हाथ डालने पर वह उतना ही अधिक डरता है। यह बात अब पूरी तरह से स्पष्ट हो गई है कि वर्जिश से पुलिस अपनी चाल बदल सकती है, पर चेहरा नहीं बदल सकती।
ग्वालियार के जीआरपी थाने में एक युवक की बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला गया। चह चीखता रहा, चिल्लाता रहा, पर पुलिस वाले उसे तब तक मारते रहे, जब तक वह मर नहीं गया। फिर उसकी लाश को चंबल के घने जंगलों में फेंक दिया गया। यह पुलिस का एक ऐसा वीभत्स चेहरा है, जिसे हम सभी जानते-समझते हैं। सभ्य समाज के लिए यह चेहरा असामाजिक है। कोई भी अपने उत्सव में पुलिस की उपस्थिति को स्वीकार नहीं करता। क्योंकि पुलिस कानून की रक्षक के रूप में नहीं आती, वह तो रसूखदारों को बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने वाली मानी जाती है। जिसे बचाना हो, उसे पुलिस आसानी से बचा भी लेती है, लेकिन जिसे फँसाना हो, उसे भी बहुत आसानी से फँसा देती है। पुलिस अत्याचार के किस्से हम सभी सुनते रहते हैं, पर बहुत कम ही ऐसे किस्से होते हैं, जिसमें पुलिस ने ईमानदारी का परिचय दिया हो। उमराव सिंह उइके और रामनरेश ने अपनी आँखों के सामने सुनील तोमर की हत्या देखी, वे चाहते तो खामोश रहकर अपनी बाकी जिंदगी बसर कर सकते थे। पर ईश्वर पर विश्वास रखने वालों की आत्मा जाग गई, उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी और उस हत्या के बारे में मीडिया को बता दिया।
हमारे कानून में अभी तक पुलिस की हद तय नहीं की गई है। यह सच है कि पुलिस को क्रूर बनना पड़ता है। आज जिस तेजी से अपराध बढ़ रहे हैं, उस तेजी से अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। पुलिस के पास आज भी अंग्रेजों के जमाने के हथियार हैं। जबकि अपराधी अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो गए हैं। पुलिस के हौसले भी बुलंद हैं, पर उन्हें खुलकर काम करने का अवसर मिला ही नहीं। पुलिस का सबसे अधिक दुरुपयोग राजनीतिज्ञ करते हैं। वे इसे अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करते हैं। पुलिस जनता के रक्षक हैं, जनता के प्रतिनिधि के नहीं। कई बार मन मसोसकर पुलिस वाले अपनी डच्यूटी निभाते हैं। कई बार न चाहते हुए भी उन्हें वह काम करना पड़ता है, जिसे वे नहीं करना चाहते। आज पुलिसिया चेहरे की वीभत्स सच्चई से तो हर कोई वाकिफ है, पर उसके पीछे एक निस्पृह, लाचार, विवशता भरा चेहरा किसी ने देखने की कोशिश नहीं की। वह भी एक आम आदमी है। उसका भी परिवार है। यदि वह ईमानदारी से जीना चाहे, अपनी डच्यूटी करना चाहे, तो भी उसे ऐसा नहीं करने दिया जाता। लगातार डच्यूटी से कई बार वह डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। कई बार अपने ही साथियों या फिर अधिकारियों पर हिंसक रूप से सवार होकर उनका खून कर देता है। कई बार मुफ्त में मिलने वाली शराब का सहारा लेकर पत्नी-बच्चों को पीटकर अपना तनाव बाहर निकालता है। पुलिस के इस चेहरे से कितने लोग वाकिफ हैं?
पुलिस के उच्च अधिकारी भी ये स्वीकारते हैं कि हमारे साथी रसूखदारों पर हाथ डालने से घबराते हैं। इसकी वजह आज की राजनीति है। आज पुलिस किसी भी असामाजिक तत्व को गिरफ्तार करती है, तो तुरंत ही स्थानीय नेताओं के फोन आने लगते हैँ। उन पर दबाव डाला जाता है, उसकी रिहाई के लिए। आखिर ये दबाव डालने वालों का उस असामाजिक व्यक्ति से क्या संबंध है, इसे जानने की आवश्यकता नहीं। इन हालात में पुलिसवाला वही करता है, जो उसके अधिकारी चाहते हैं। उनके अधिकारी भी आईपीएस की परीक्षा पास करके आते हैं। शायद इस परीक्षा में ही किसी प्रकार की खोट है, जो उन्हें देश के खिलाफ काम करने वालों को संरक्षण देना सिखाती है। पुलिस और अंडरवर्ल्ड के संबंध बहुत ही पुराने हैं। इनके साथियों को बचाने के लिए पुलिस विभाग के पास काफी धन आता है। राज्य या देश की सीमाओं से लगे थानों की नीलामी होती है। पुलिसवालों का उठना-बैठना भी बड़े लोगों के बीच होता है। इनसे पुलिस वालों को राजनीतिक संरक्षण मिलता है। पुलिसवालों पर जब कभी मुसीबत आती है, तो यही राजनेता ही उनकी सहायता करते हैं। ऐसे में पुलिसवालों का भी यह कर्तव्य बन जाता है कि वे आम आदमी को छोड़कर रसूखदारों की सेवा करें। आम आदमी से उन्हें कुछ नहीं मिलता। आम आदमी उन्हें केवल अपना आशीर्वाद ही दे सकता है। जिसकी पुलिसवालों को आवश्यकता ही नहीं। उन्हें तो चाहिए वह वरदहस्त, जो उन्हें नेतिक बल दे।
देश में ऐसे बहुत ही कम उदाहरण मिलेंगे, जिसमें अत्याचारी पुलिसवाले को सजा मिली हो। जिन्हें भी सजा मिली है, उन्होंने अत्याचार की सीमाएँ पार की, इसलिए वे धरे गए। अभी भी ऐसा बहुत कुछ रोज ही होता है, जो कानून के दायरे में नहीं आता। पुलिस वालों को मानवीयता का पाठ पढ़ाने से पहले उनके अधिकारियों का ब्रेनवॉश आवश्यक है। सुधार की प्रक्रिया ऊपर से ही होनी चाहिए। अपराधियों को पकड़ने के लिए क्रूरता नहीं, समझबूझ की आवश्यकता होती है, जो हमारे पुलिसवालों में नहीं है। उन्हें अपराधी से अधिक चालाक और होशियार होना होगा। अपराधियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए आम आदमी का सहारा लेना ही होगा। तभी वह अपराधियों तक पहुँच सकती है। इसलिए यदि पुलिस की छबि सुधारनी है, तो आम आदमी से मानवीयता, रसूखदारों से कठोरता और अपराधियों से क्रूरता से पेश आना होगा। यही सबक वह याद कर ले, तो वह सचमुच पुलिस धर्म निभा सकते हैं।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

राजा से ज्‍यादा दोषी प्रधानमंत्री





दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख

लिंक

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-07-28&pageno=9

बुधवार, 27 जुलाई 2011

शर्म आती है इस बेशर्मी पर

डॉ. महेश परिमल
अभी-अभ्री अखबारों में एक चित्र देखा, थाईलैंड में बाढ़ आई, लोगों में भागम-भाग मच गई। पूरा घर पानी पर तैरता दिखाई दे रहा था, बाहर का दृश्य तो और भी भयानक था। लोग अपने बच्चों को विभिन्न संसाधनों से बचाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में उनके बीच देश के प्रधानमंत्री भी पहुँच गए। वे भी अपनी पेंट मोड़कर बचाव दल के साथ राहत कार्य में जुट गए। क्या हमारे देश के लिए ऐसा दृश्य संभव है? कदापि नहीं। हमारे देश के मंत्रियों को बाढ़ का दृश्य हेलीकाप्टर में बैठकर ही देखना अच्छा लगता है। वे दूर से ही तबाही का आकलन कर लेते हैं। दूसरी और सुदूर छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में मारे गए पुलिस के जवानों को एम्बुलेंस न मिल पाने के कारण उनके पार्थिव शरीर को नगर पालिका के कचरे ढोने वाले वाहन से पुलिस मुख्यालय पहुँचाया गया। शहीदों का ऐसा अपमान। वे जवान तो कोई अपने स्वार्थ के लिए नहीं लड़ रहे थे। उनका भी परिवार था, लेकिन वे उससे दूर होकर अपने कर्तव्य की राह पर चल रहे थे। ऐसे में वे यदि मारे गए, तो उनके पार्थिव शरीर के साथ ऐसा सलूक! ईश्वर न करे, क्या कभी किसी नेता या मंत्री का पार्थिव शरीर इस तरह से ले जाया जा सकता है? जहाँ शहीदों का सम्मान न होता हो, उस देश या राज्य को रसातल में जाने से कोई नहीं रोक सकता। जाँच का विषय यह भी हो सकता है कि क्या उन शहीदों के शव को तिरंगे में लपेटकर मुख्यालय लाया गया? यदि नहीं लाया गया है, तो यह शहीदों का अपमान है, यदि लाया गया है, तो तिरंगे का अपमान है। क्योंकि तिरंगे को कचरागाड़ी में नहीं रखा जा सकता?
कितने शर्म की बात है, जहाँ नेताओं की गाड़ियों के आगे-पीछे वाहनों का काफिला चलता हो, रास्ते जाम कर दिए जाते हों, नेताओं को सर-आँखों पर बिठाकर उन्हें हर तरह की सुविधाएँ दी जा रही हों, वहीं नक्सलियों के साथ हुई मुठभेड़ में मारे गए जवानों के पार्थिव शरीर को नगरपालिका की कचरा ढोने वाले वाहन से पुलिस मुख्यालय लाया जाए। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, इसके पहले भी यही हालात सामने आए हैं। एक बात तो सच है कि जो देश या राज्य शहीदों की इज्जत नहीं करता, वह एक दिन रसातल में चला जाता है। जवान शहीदों के पार्थिव शरीर को कचरा गाड़ी में लाने की बात को छत्तीसगढ़ के कवि हृदय डीजीपी विश्वरंजन ने भी स्वीकार किया है। कोई यह बता सकता है कि देश के कितने नेताओं की संतान सेना में हैं?
यही राज्य है, जहाँ ढेर सारी कारों के साथ मुख्यमंत्री का काफिला चलता है। दो-तीन एकड़ की जमीन पर मुख्यमंत्री निवास होता है। 5 एकड़ की जमीन पर राजभवन होता है। दूसरी ओर टेंट में रहकर नक्सलियों का मुकाबला करने वाले जवानों को एक बोतल पानी के लिए 5 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। एक मंत्री बीमार पड़ जाए, तो तुरंत ही उसके लिए विशेष विमान की व्यवस्था हो जाती है। डॉक्टरों की फौज तैयार हो जाती है। पर नक्सलियों से जूझने के लिए हमारे जवानों को बिना किसी तैयारी के भेज दिया जाता है। जवान नाहक ही मारे जाते हैं। उसके बाद भी उनका सम्मान नहीं हो पाता। परिजन उनके मृत शरीर के अंतिम दर्शन के लिए तरसते रहते हैं और सरकारी लापरवाहियों के चलते मृत शरीर भी समय पर नहीं पहुँच पाते। किस बात पर आखिर हम गर्व करें कि हमारी सरकार संवेदनशील है। विमान से बाढ़ का दृश्य देखने वाले और कारों के काफिले के साथ चलने वाले देश के कथित वीआईपी आज हमारे लिए सबसे बड़े सरदर्द बन गए हैं।
इस देश को जितना अधिक वीआईपी ने नुकसान पहुँचाया है, उतना तो किसी ने नहीं। कितने वीआईपी ऐसे हैं, जिन्होंने बस्तर के जंगलों में जवानों के साथ रात बिताई है? उनकी जीवनचर्या को दिल से महसूस किया है? उनकी पीड़ाओं को समझने की छोटी-सी भी कोशिश की है? उनके साथ भोजन कर उनके सुख-दु:ख में शामिल होने का एक छोटा-सा प्रयास किया है। सरकारी अफसर जाते तो हैं, पर रेस्ट हाउस तक ही सीमित रहते हैं। थोड़ी-सी भी असुविधा उनके लिए बहुत बड़ी पीड़ा बन जाती है। कितने अफसर हैं, जो जमीन से जुड़े हैं, जिन्हें आदिवासियों की तमाम समस्याओं की जानकारी है। उनका निराकरण कैसे किया जाए, इसके लिए उनके पास क्या उत्तम विचार हैं? जवानों को नक्सलियों के सामने भेज देना ठीक वैसा ही है, जैसे शेर के सामने बकरी को भेजना। अत्याधुनिक हथियारों से लैस नक्सलियों के सामने जंग खाई हुई आदिकाल की बंदूकें भला कहाँ तक टिक पाएँगी?
कितना आपत्तिजनक होता है वीआईपी का सफर? जब इनका काफिला चलता है, तो सारे कानून कायदों से ऊपर होकर चलता है। पुलिस के कई जवान इनकी सुरक्षा में होते हैं। इन्हें किसी तरह की तकलीफ न हो, इसलिए पूरे साजो-सामान के साथ इनका काफिला आगे सरकता है। इस दौरान किसी को न तो सुरक्षा जवानों की हालत पर किसी को तरस आता है और न ही उनकी पीड़ाओं पर कोई मरहम लगाता है। अपनी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए उनका एक दौरा कितने के लिए त्रासदायी होता है, यह अभी तक किसी वीआईपी ने जानने की कोशिश नहीं की। ये वीआईपी शायद नहीं जानते कि समस्याओं को जानने के लिए आम आदमी बनना पड़ता है। आम आदमी बनकर ही अपनों की समस्याओं से वाकिफ हुआ जा सकता है। अपराधी को पकड़ने के लिए चुपचाप जाना पड़ता है, न कि चीखती हुई लालबत्ती गाड़ी में। ऐसे में अपराधी तो क्या उसका सुराग तक नहीं मिलेगा।
देश में जब सुरक्षा बलों की भर्ती होती है, तब उनसे तमाम प्रमाणपत्र माँगे जाते हैं, उनके शरीर का नाप लिया जाता है। उनके परिवार के लोगों की जानकारी ली जाती है। प्रशिक्षण के पहले कई परीक्षाएँ देनी होती हैं। इसके बाद गहन प्रशिक्षण का सिलसिला शुरू होता है। तब कहीं जाकर एक जवान तैयार होता है। लेकिन नक्सली बनने के लिए केवल एक ही योग्यता चाहिए, आपके भीतर पुलिस के खिलाफ कितनी ज्वाला है? इसी ज्वाला को वे लावा बनाते हैं? ताकि वह पुलिस वालों पर जब भी टूटे, लावा बनकर ही टूटे। यदि हमें नक्सलियों के खिलाफ जवान तैयार करने हैं, तो नक्सलियों द्वारा पीड़ित परिवार के सदस्यों को तैयार करना होगा। इनके भीतर की आग को बराबर जलाए रखना होगा, इनकी पूरी देखभाल करनी होगी। इस देखभाल करने में जरा भी चूक हुई कि वह नक्सलियों की शरण में चला जाएगा, फिर वहाँ उसका ऐसा ब्रेनवॉश होगा, जिससे उसे लगेगा कि उनके परिजनों को मारकर नक्सलियों ने ठीक ही किया।
कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि नक्सलियों के खिलाफ जिन्हें भी खड़ा करना है, पहले उसका विश्वास जीतें, फिर पूरे विश्वास के साथ उसे नक्सलियों के सामने भेजें, जवान को भी विश्वास होगा कि इस दौरान यदि मुझे कुछ हो जाता है, तो मेरे परिवार को समुचित सुविधा सरकार देगी। विश्वास की यह नन्हीं सी लौ जलती रहे, तो इसे विश्वास का सूरज बनते देर नहीं लगेगी।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

बुलंद हौसलो वाली बिलियर्ड चैम्पियन



डॉ. महेश परिमल
एक लेखक के लिए उसकी आँख जितनी महत्वपूर्ण है, उतने ही महत्वपूर्ण हैं एक खिलाड़ी के लिए उसके पाँव। पर जब पाँव से साथ छोड़ दे, तो एक खिलाड़ी क्या करे? कैसे रोके भीरत के खिलाड़ी को? कैसे समझाए अपने आप को? पाँव के साथ छोड़ देने के बाद भी वर्ल्ड चैम्पियन बनना कोई मामूली बात तो नहीं है। पर जिसकी हिम्मत होती है, तो दुर्भाग्य के हौसले परास्त हो जाते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ चित्रा मैगीमैराज के साथ। वह चैम्पियन तो थी हॉकी की, पर वर्ल्ड चैम्पियन बनी बिलियर्ड की। आज उसका नाम पूरे देश में गर्व के साथ लिया जाता है। ऐसे में चित्रा याद करती है, उस खिलाड़ी को, जिसने उसे पाँव में हॉकी की स्टिक से प्रहार किया था और उसके पाँव ने उसका साथ हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ दिया। हॉकी न सही, उसने बिलियर्ड में लगातार परिश्रम के बाद नाम कमाया।
चित्रा जब छोटी थी, तब अपने भाई के साथ पेड़ की डाली से हॉकी खेला करती थी। उस दौरान वह पूरे आत्मविश्वास के साथ यह खेल खेलती। जब स्कूल पहुँची, तब भी वह हॉकी पर हाथ आजमा लेती। एक बार स्कूल के स्पोर्ट्स टीचर ने उसे खेलते हुए देख लिया। उसने उसकी प्रतिभा को पहचान लिया। कुछ ही समय के प्रशिक्षण के बाद उसे स्कूल की हॉकी टीम में ले लिया गया। सतत एकाग्रता और कड़े परिश्रम से चित्रा ने बहुत ही कम समय में टीम की दुलारी बन गई। आगे चलकर वह विजय की आधार स्तंभ बन गई। उसके बाद तो इंटरनल स्पर्धा, विविध स्पोर्ट्स क्लबों की स्पर्धा आदि में शामिल हेने लगे। कुछ समय बाद उसका नाम होनहार हॉकी खिलाड़ी के रूप में सबसे आगे होने लगा। मैसूर स्पोर्ट्स हॉस्टल टीम की वह कैप्टन भी बन गई। 1993 में उस पर मानो बिजली ही गिर गई। हुआ यूं कि एक राज्य स्तरीय हॉकी स्पर्धा में उसकी टीम फाइनल में पहँुच गई। प्रतिस्पर्धी टीम को लगा कि अब गए काम से। प्रतिस्पर्धी टीम की दो खिलाड़ियों ने खेल के दौरान आँखों ही आँखों में कुछ इशारा किया और मौका देखकर चित्रा के कॉफ बोन (पिंडली) पर जोरदार प्रहार किया। उस समय तो चित्रा गिर पड़ी, पर सब कुछ भूलकर उसने खेलना नहीं छोड़ा। दूसरे दिन वह अस्पताल गई। वहाँ एक नहीं, पर बीस-बीस डॉक्टरों ने जाँच की। पर कोई भी डॉक्टर उसके पाँव को बचा नहीं पाया। चित्रा का एक पैर हमेशा-हमेशा के लिए बेकार हो गया।
खेल कोई भी हो, उसे खेलने के लिए पाँव तो चाहिए ही। चाहे वह क्रिकेट हो, फुटबॉल हो, लॉन-टेनिस हो या फिर बेडमिंटन। चित्रा के लिए तो जीना ही मुश्किल हो गया। बिना खेल के वह अपने जीवन की कल्पना ही नहीं कर पा रही थी। मुंबई के प्रख्यात सर्जन ने उसे सलाह दी कि वह रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी करवा ले। उसने वह सर्जरी करवा ली। पर तेजी से इधर से उधर जाना या दौड़ना संभव नहीं हो पाया। उसके भीतर का खिलाड़ी आहत हो गया। वह चाहकर भी कोई खेल नहीं खेल पा रही थी। कई खेल खेले, पर मामला जम नहीं पाय। तभी उसकी नजर बिलियर्ड खेलते खिलाड़ियों पर पड़ी। उसने बिलियर्ड खेलना शुरू किया। सामान्य रूप से एक खिलाड़ी 28 वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते थक जाता है। उसका कैरियर अस्ताचल की ओर जाने लगता है, पर चित्रा ने 28 वर्ष की उम्र में ही बिलियर्ड खेलना शुरू किया। अपनी मेहनत और लगन से धीरे-धीरे वह इस खेल में पारंगत होते गई। कर्नाटक के स्टेट बिलियर्ड एसोसिएशन के कार्यालय में एक बार चित्रा को खेलते हुए गीत सेठी ने देखा। वे चित्रा के खेल से प्रभावित हुए। तब उन्होंने चित्रा से कहा कि तुममें एक जन्मजात खिलाड़ी छिपा है। इस खेल के माध्यम से उसे बाहर निकालो। गीत सेठी के इस वाक्य को उसने अपनी प्रेरणा मान लिया। बस तब से वह दिन-रात बिलियर्ड के बारे में सोचती और बिलियर्ड ही खेलती। एक वर्ष की मेहनत रंग लाई, दूसरे ही वर्ष वह बिलियर्ड की स्टेट चैम्पियन बन गई। इस पर गीत सेठी ने उसका हौसला बढ़ाया। इसके बाद तो चित्रा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वह खेलती गई, खेलती गई। 2005 और 2006 के बीच वह कई नेशनल लेबल के फाइनल तक पहुँच गई। फाइनल तक पहुँचना तो उसका लक्ष्य था ही नहीं, उसे तो शिखर पर पहुँचना था।
अंत में वह क्षण भी आ पहुँचा, जब वर्ल्ड स्नूकर चैम्पियनशिप में वह विजेता बनी। इस चैम्पियनशिप में महिलाओं का प्रवेश तो 2003 से ही हो गया था। पर कोई भी महिला सेमीफाइनल से आगे नहीं पहुँच पाई। अपने खेल से चित्रा ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा। चित्रा ने विश्व विजेता का खिताब जीता। तब उसने उस खिलाड़ी को याद किया, जिसने उसके पाँव पर प्रहार किया था और उसे लाचार कर दिया था। आज वह खिलाड़ी न जाने कहाँ है, पर उसकी बदौलत चित्रा ने बिलियर्ड में विश्व विजेता बनकर देश का नाम रोशन किया। पूरे विश्व में चित्रा की पहचान वर्ल्ड चैम्पियन के रूप में है। अपनी उपलब्धियों के बारे में चित्रा कहती हैं कि उसका एक पाँव बेकार हो गया है, यह सोचकर वह बैठी होती, तो कुछ भी नहीं कर पाती। आज मेरी पहचान एक टूटे पैर की महिला के रूप में न होकर बिलियर्ड चैम्पियन के रूप में है, यही मेरी पहचान है।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 25 जुलाई 2011

येदियुरप्‍पा के जाने में ही भलाई



दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

लिंक
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-07-25&pageno=9

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

धनबल से प्राप्त बाहुबल का प्रतीक हैं रेड़डी बंधु

डॉ. महेश परिमल
कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर उबाल आ गया है। इस बार लोकायुक्त जस्टिस संतोष हेगड़े ने पूरे सबूत के साथ अपनी रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें स्पष्ट तौर पर बताया गया है कि राज्य में हुए अवैध खनन एवं खनिजों की चोरी में 1827 करोड़ के घोटाले में मुख्यमंत्री येदियुरप्पा पूरी तरह से संलिप्त हैं। उनके साथ उनके चार सहयोगी मंत्री एवं 600 अधिकारी भी शामिल हैं। हालांकि रिपोर्ट अभी सरकार को नहीं सौंपी गई है, पर उसके लीक होने के कारण यह खुलासा हुआ। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा पर यह आरोप है कि उन्होंने अपने परिवार को उपकृत करने के अलावा रेड्डी बंधुओं को अपनी मनमानी करने की पूरी छूट दी। इसलिए उनके खिलाफ जाँच कर उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। अब मुख्यमंत्री के पास इस्तीफा देने के सिवाय कोई चारा नहीं है। रेड़्डी बंधुओं ने बेल्लारी में जिस तरह से अपनी समानांतर सरकार चलाई है, उससे स्पष्ट है कि उन पर मुख्यमंत्री का वरदहस्त है।
जिस बेल्लारी में रेड्डी बंधु साइकिल में घूमा करते थे, आज उनका निजी हेलीकाप्टर है। कारों का लंबा काफिला है। राजमहल जैसा निवास स्थान है। सुरक्षा के लिए कमांडो की फौज है। इन्हें लेकर भाजपा में जबर्दस्त विरोधाभास है। कर्नाटक में भाजपा को जो सत्ता मिली है, उसमें रेड्डी बंधुओं की मनी और मसल पॉवर की अहम भूमिका है। भाजपा सत्ता छोड़ना नहीं चाहती। पार्टी में रेड्डी बंधुओं का विरोध है। यदि उन्हें पार्टी से निकालती है, तो पार्टी की छवि उज्‍जवल हो सकती है। इसके लिए सत्ता खोनी पड़ेगी, जो वह नहीं चाहती। पार्टी नेता सुषमा स्वराज की नजर 1914 में होने वाले लोकसभा चुनावों पर है। इस चुनाव में यदि भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दा बनता है, तो प्रजा कांग्रेस से विमुख हो सकती है। इन संयोगों में भाजपा के पास विकल्प के रूप में सत्ता हासिल करने का उत्तम अवसर है। भाजपा को यदि बहुमत मिलता है, तो सुषमा स्वराज का प्रधानमंत्री बन सकती हैं। इसलिए अपनी छवि को स्वच्छ रखने के लिए उन्होंने रेड्डी बंधुओं से मुँह फेर लिया है। दूसरी ओर पार्टी तो रेड्डी बंधुओं के साथ है ही। अब देखना यही है कि इन विरोधाभासों के चलते भाजपा किस मुँह से प्रजा के सामने जाकर वोट माँगेगी?
रेड्डी बंधुओं के आर्थिक साम्राज्य के बारे में लोगों को जानकर आश्चर्य हुआ ही होगा। माना यह जा रहा है कि पिछले 10 वर्षो में गैरकानूनी रूप से खनन के कारोबार में रेड्डी बंधुओं ने करीब 4,000 करोड़ रुपए कमाए हैं। दक्षिण भारत में कर्नाटक में जब भाजपा की पहली स्वतंत्र सरकार बनी, तो इसमें रेड्डी बंधुओं का विशेष हाथ था। पूरे दक्षिण भारत में रेड्डी बंधुओं की छाप माइनिंग माफिया के रूप में है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में असंवैधानिक रूप से खनिजों का खनन कर रेड्डी बंधुओं ने अरबों रुपए इकट्ठे किए हैं। इसी संपत्ति के कारण उनका बाहुबल इतना बढ़ गया कि वे कर्नाटक की राजनीति को अपनी जेब में रखते हैं। इसलिए मुख्यमंत्री येदियुरप्पा भी उनसे पंगा लेना नहीं चाहते। भाजपा भले ही भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर पूरे देश में आंदोलन करती रहे, पर कर्नाटक में इस मामले में उसकी फजीहत ही होती है। सभी जानते हैं कि यहाँ पर भाजपा भ्रष्टाचार का पालन-पोषण ही कर रही है। इसलिए भाजपा की छवि पूरे देश में बिगड़ रही है। सुषमा स्वराज ने जब इन रेड्डी बंधुओं के खिलाफ बोलना शुरू किया, तो पार्टी में अंतर्कलह शुरू हो गया। श्रीमती स्वराज रेड्डी बंधुओं को मंत्री पद दिए जाने की विरोधी थी, पर येदियुरप्पा और अरुण जेटली के कहने पर वह मान गईं। वह मान तो गईं, पर अरुण जेटली के सामने वह और अधिक आक्रामक हो गईं।
अब तो सभी को पता चल ही गया है कि आंध्र प्रदेश में एक मध्यम वर्गीय पुलिस कांस्टेबल के परिवार में रेड्डी बंधुओं का जन्म हुआ। उसी बेल्लारी ने इन रेड्डी बंधुओं को साइकिल पर घूमते हुए देखा है। आज से 13 वर्ष पूर्व 1998 में रेड्डी बंधुओं ने कर्नाटक के बेल्लारी एक फाइनेंस कंपनी की स्थापना की। यह कंपनी धन के दोगुना करने का लालच देती थी। इससे उन्होंने करोड़ों की ठगी की। 2003 में रेड्डी बंधुओं ने आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में ओबुलापुरम माइनिंग कंपनी के नाम पर 50 लाख रुपए का निवेश कर खदान का धंधा शुरू किया। तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. राजशेखर रेड्डी का उन पर वरदहस्त था। परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री के पुत्र राजशेखर रेड्डी उनके कारोबार में सहभागी थे। इसी समय चीन के बीजिंग में ओलम्पिक खेलों के लिए लोहे की आवश्यकता हुई, इसके लिए रेड्डी बंधु सामने आए और उन्होंने चीन को लोहे की भरपूर आपूर्ति की। इससे सन् 2003 से लेकर 2008 के बीच रेड्डी बंधुओं ने करीब 4000 करोड़ रुपए अर्जित किए। इन रेड्डी बंधुओं पर यह आरोप है कि इन्हें आंध्र प्रदेश में खनिज काम के लिए 450 हेक्टेयर जमीन दी गई थी, इसका लाभ उठाते हुए उन्होंने आंध्रप्रदेश के पड़ोस में स्थित कर्नाटक के बेल्लारी जिले के जंगल की हजारों फीट जमीन पर कब्जा जमा लिया। फिर वहाँ से खनिज निकालने का काम शुरू किया। बेल्लारी जिले की एक माइनिंग कंपनी एमएसपीएल ने सरकार को आगाह किया कि रेड्डी बंधुओं ने उनकी जमीन पर असंवैधानिक रूप से खनन काम कर रहे हैं। पर रेड्डी बंधुओं की राजनीतिक पहुँच के कारण कुछ नहीं हो पाया। जंगल विभाग भी किसी की नहीं सुनता।
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस सरकार का वरदहस्त रेड्डी बंधुओं पर था। सरकार की तरफ से उन्हें हड़प्पा जिले में 24 हजार करोड़ रुपए की लागत से स्टल प्लांट स्थापित करने के लिए 10 हजार एकड़ जमीन दी गई। यही नहीं इसके बाद फिर 4 जार एकड़ जमीन उन्हें एयरपोर्ट के लिए दी। आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने सीधे-सीधे आरोप लगाया है कि रेड्डी बंधुओं के कारोबार में जगनमोहन रेड्डी भी भागीदार हैं। रेड्डी बंधुओं को दी गई जमीन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में भी जनहित याचिका दायर की गई। इससे सुप्रीमकोर्ट ने माइनिंग की लीज के खिलाफ स्टे ऑर्डर दिया था, पर बाद में इसे रद्द कर दिया गया। रेड्डी बंधुओं पर यह भी आरोप है कि उन्होंने कर्नाटक राज्य की सीमा पर घुसपैठ कर वहाँ भी असंवैधानिक रूप से खनन कार्य किया है। इसके लिए उन्होंने दो राज्यों के बीच लगने वाले खंभों को भी उखाड़ दिया है। पहले रेड्डी बंधु कांग्रेस के समर्थक थे। पर 1999 जब सोनिया गांधी और सुषमा स्वराज ने बेल्लारी से लोकसभा चुनाव लड़ा, तब से वे भाजपा केम्प में शामिल हो गए। इस चुनाव में सोनिया गांधी चुनाव जीत गई। पर अमेठी से भी जीतने के कारण उन्हें बेल्लारी की सीट छोड़नी पड़ी। इसका पूरा लाभ उठाते हुए रेड्डी बंधुओं की ताकत का इस्तेमाल करते हुए बेल्लारी लोकसभा सीट पर भाजपा ने अपना कब्जा जमा लिया।
रेड्डी बंधुओं ने अपनी आर्थिक ताकत का उपयोग राजकीय ताकत बढ़ाने के लिए किया। सन् 2000 में सोमशेखर रेड्डी बेल्लारी के नगर निगम चुनाव जीता। बेल्लारी की राजनीति में आगे बढ़ने के लिए उन्होंने बी. श्रीरामुलु नामक दलित राजनेता की सहायता ली। इन्हें लोग चौथा रेड्डी बंधु के नाम से जानते हैं। सन् 2004 में करुणकर रेड्डी लोकसभा चुनाव बेल्लारी की सीट से जीता। उधर श्रीरामुलु विधानसभा की सीट से जीत गए। जनार्दन रेड्डी विधानपरिषद का चुनाव जीतकर एकएलसी बन गए। इस समय कर्नाटक में भाजपा-जेडी(यु)की गठबंधन सरकार थी। श्रीरामुलु उसकअध्यक्ष बन गए। इस समय जनार्दन रेड्डी ने कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी पर 150 करोड़ रुपए की रिश्वत माँगने का आरोप लगाकर बवाल मचा दिया। इसके चलते रेड्डी बंधु पूरे देश में पहचाने जाने लगे। 2008 में जब कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए, तब रेड्डी बंधुओं ने बेल्लारी जिले की 9 में से 8 सीटों पर भाजपा को जीत दिलाई। इसके बाद सरकार बनाने के लिए उन्होंने निर्दलीय विधायकों के लिए खजाना ही खोल दिया। इसका असर यह हुआ कि दक्षिण भारत में भाजपा ने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा। इस दौरान रेड्डी बंधुओं की ताकत इतनी बढ़ी कि उन्होंने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को ब्लेकमेल करने लगे। 2009 में रेड्डी बंधुओं ने येदियुरप्पा से नाराज होकर उनकी सरकार ही गिराने की कोशिश की। तब सुषमा स्वराज ने बीच में आकर येदियुरप्पा की सरकार को बचा लिया। रेड्डी बंधुओं की राजनैतिक ताकत के कारण ही कर्नाटक मंत्रिमंडल में उन्हें तीन पद मिले हैं। जनार्दन रेड्डी, करुणाकर रेड्डी और श्रीरामुलु अभी मंत्री हैं। चौथे सोमशेखर कर्नाटक मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन के अध्यक्ष हैं। 2008 में रेड्डी बंधुओं को पद दिए जाने का सुषमा स्वराज ने विरोध प्रकट किया था। इसके बाद भी येदियुरप्पा मंत्रिमंडल में रेड्डी बंधुओं का समावेश किया गया था। उस समय भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडु भी इसमें शामिल थे। हाल ही में वर्तमान भाजपाध्यक्ष नितीन गड़करी ने रेड्डी बंधुओं को मंत्रिमंडल में लिए जाने के येदियुरप्पा के प्रयासों का बचाव किया है।
इस तरह रेड्डी बंधुओं ने अपनी ताकत से कर्नाटक और आंध्रप्रदेश की राजनीति में अपना दबदबा कायम किया है। कोई भी पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ कितने ही नारे बुलंद कर ले, पर इन रेड्डी बंधुओं के आगे उनके नारों में वह दम नहीं रहता। अगर भाजपा स्वच्छ छवि बनाना चाहती है, तो उसे रेड्डी बंधुओं का मोह छोड़ना होगा? ऐसे में ये कांग्रेस के साथ मिल जाएँ, इसमें भी कोई शक नहीं है। अपने धन-बल के कारण वे राजनीति में कुंडली मारकर बैठ गए हैं। किसी पार्टी में वह दमखम नहीं है, जो इन्हें ललकार सके।
डॉ. महेश परिमल

बुधवार, 20 जुलाई 2011

एक था चूजा


भारती परिमल
एक था चूजा और एक थी चूजी। चूजा था बड़ा और चूजी थी छोटी। चूजा था दुबला और चूजी थी मोटी। चूजा था खरा और चूजी थी खोटी। दोनों मिलकर रहते थे। खाते थे, खेलते थे। नाचते थे, कूदते थे। हँसते थे, हँसाते थे। रोते थे, रुलाते थे। आपस में प्यार भी था और तकरार भी।
मुर्गी माँ जब घर से बाहर जाती, दोनों को समझाकर जाती -
आपस में दोनों हिलमिल कर रहना।
छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा न करना।।
माँ के सामने दोनों सिर हिलाते। एक-दूजे को देख मुस्कराते। पर माँ के जाते ही खेल शुरू हो जाता। एक-दूसरे को सताने में उन्हें खूब मजा आ जाता। कुट-कुट, कुट-कुट कुछ-कुछ खाते जाते और आपस में खट-पट, खट-पट कुछ-कुछ करते जाते। दिन पूरा धमा-चौकड़ी में ही बीत जाता। माँ के आते ही फिर प्यार का रिश्ता बन जाता। माँ सोचती- बच्चे मेरे कितने प्यारे, सारे जग से ये तो न्यारे। आपस में करते हैं कितना प्यार। इनसे है मेरा सुंदर घर-संसार।
एक बार की बात है। माँ के जाते ही घर में खूब शोर हुआ। कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा। चूजे के पैर में लगा। चूजी के पेट में लगा। एक-दूजे से मुँह फुलाकर चूजा एक कोने में बैठा। चूजी दूसरे कोने में बैठी। बैठे-बैठे चूजी की आँख लगी। पर चूजे को तो जोरों की भूख लगी। इधर-उधर ताका-झाँका, पर पछताया क्योंकि दोनों ने ही अन्न का कोई मोल न आँका। कुछ देर पहले ही था दोनों ने अनाज बिखराया। अब चूजे को भूख के मारे रोना आया। चूजी की बंद आँखों को देख वह पल भर को मुस्काया और धीरे से घर से बाहर निकल आया।
धीरे-धीरे चलता-चलता हो गया वो घर से दूर। आशा थी उसको भोजन मिलेगा भरपूर। मालूम नहीं था उसको किधर है जाना। बस पाना था उसको तो अनाज का दाना। खोजते-खोजते दाना-पानी, उसको दिख गया ढेर सा पानी। तालाब के पास था वह पहुँचा। उसके किनारे ही एक पेड़ था ऊँचा। पहले तो पेड़ के आसपास खूब चक्कर लगाए। अमरूद के दाने फिर उसकी पहचान में आए। स्वाद लिया जब दाने का, नाम लिया न कुछ और खाने का। कुटुर-कुटुर कुतरता जाता। दाने-दाने से पेट भरता जाता। चुगते-चुगते पहुँचा तालाब के बिलकुल पास। पानी देख लग आई प्यास। रहा न फिर किसी और में ध्यान, तेÊा कर दी अपनी चाल। पैर भीगे, पंख भीगे, हाल हुआ बेहाल। अब उसे फिर से रोना आया। क्यों मैं घर से अकेला आया? पानी में डूबते-उतराते उसकी जान पर बन आई। उफ़! ये कैसी सजा अकेले निकलने की मैंने पाई! अब तो बचना मुश्किल है। उसे चूजी और माँ की याद सताई।
ऊपर डाल पर बैठा बंदर देख रहा था खेल सारा। सोचा उसने मैं चाहूँ तो बदल दूँ ये नजारा सारा। ‘काम दया का करना है। दुख चूजे का हरना है।’ ऐसा ठान लिया जब बंदर ने। तब राह भी जल्द निकल आई। सूखी डाली पेड़ की उसे पास ही नजर आई। थाम के डाली को पहुँचा चूजे के पास। बंदर को आता देख चूजे की भी बंधी आस। पकड़ी डाली उसने झटपट, थाम लिया बंदर ने उसे पटपट। साथ अपने चूजे को सरपट लाया। तब बेचैन चूजे को चैन आया। लिपटा वो तो बंदर से। खुशी मिली उसे अंदर से।
इधर माँ जब घर को आई। चूजे को घर में न पाकर घबराई। चूजी की भी फूट निकली रूलाई। उसने माँ से कोई बात न छुपाई। माँ-बेटी दोनों घर से निकले चूजे की खोज में। फर्क आ गया था अब तो चूजी की भी सोच में। मन ही मन वो करती स्वीकार। मैंने ही की भाई से हमेशा झूठी तकरार। अब न कभी ऐसा करूँ गी। सदा भाई को प्यार करूँगी।
आधा रास्ता ही किया था पार कि खुशी मिली उन्हें अपार। सामने से आ रहा था चूजा और साथ में था बंदर दूजा। उछलते-कूदते, झूमते-गाते दोनों पहुँचे पास। देख चूजे को चूजी की सूरत खिली। माँ को भी खुशी मिली। चूजे के पंखों को सहलाते माँ ने किया खूब प्यार। बंदर ने भी समझाया अब न करना ऐसा वार। मिलजुल कर रहना, मानना माँ का कहना। चूजा-चूजी ने फिर पकड़े कान। अब न करेंगे ऐसा काम। आपस में हम मिलकर रहेंगे। माँ के प्यारे पूत बनेंगे।
झूमते-नाचते वे तीनों बोले- हरे कृष्णा हरे रामा।
साथ उनके झूम रहे थे प्यारे-प्यारे बंदर मामा।
भारती परिमल

सोमवार, 18 जुलाई 2011

अब भीगने लगी है सावन के झूलों की डोर



दैनिक भास्कर के सभी संस्करणों में एक साथ प्रकाशित आलेख
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दैनिक हरिभूमि के सभी संस्करणों में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

यहॉं आतंकी सुरक्षित हैं, अवाम नहीं



दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर प्रकाशित मेरा आलेख

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नवभारत रायपुर एवं बिलासपुर संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 13 जुलाई 2011

तेलंगाना पर तकरार




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज 9 पर प्रकाशित मेरा आलेख
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सोमवार, 4 जुलाई 2011

धरती के नाम आकाश का खुला प्रेम पत्र



दैनिक भास्‍कर के सभी संस्‍करणों के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरो आलेख

शनिवार, 2 जुलाई 2011

ईश्‍वर हो या न हो, पर भ्रष्‍टाचार सर्वव्‍यापी




नईदुनिया रायपुर- बिलासपुर संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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बुधवार, 29 जून 2011

पास्‍को परियोजना का क्‍यों हो विरोध ?




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज पेज 9 पर प्रकाशित आलेख
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मंगलवार, 28 जून 2011

ईश्वर हो या न हो, पर भ्रष्टाचार सर्वव्यापी है



डॉ. महेश परिमल
भ्रष्टाचार के संबंध में एक बार इंदिरा गांधी ने कहा था कि भ्रष्टाचार केवल भारत की समस्या नहीं है, यह तो विश्वव्यापी है। उस समय लोगों ने उनका मजाक उड़ाया था, पर आज उनकी बात बिलकुल सच साबित हो रही है। आज भ्रष्टाचार एक शिष्टाचार बन गया है। अब भ्रष्ट लोगों का जेल जाना भी किसी उत्सव से कम नहीं है। उस भ्रष्ट से मिलने वाले भी अब वीआईपी होने लगे हैं। जापान का लाकहीड कांड, अमेरिका का वाटरगेट कांड, हमारे देश का नागरवाला कांड भी भ्रष्टाचार की उपज थे। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं, हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान की हालत इतनी खराब है कि अमेरिका और चीन यदि उसकी सहायता करना बंद कर दें, तो वह एक दिन भी न चल पाए। आज का मीडिया विभिन्न देशों में होने वाले भ्रष्टाचार की खबरों को सुर्खियाँ देने में लगा है। शायद ही कोई ऐसा देश हो, जहाँ भ्रष्टाचार न हो। वैसे देखा जाए, तो जहाँ राजनीति है, वहाँ भ्रष्टाचार है। मेरे पास एक मजेदार मेल आया, जिसमें लिखा था कि देश की कुल आबादी 110 करोड़ है। इसमें से 9 करोड़ लोग सेवानिवृत हैं। 25 करोड़ बच्चे और टीन एजर्स स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे हैं। सवा करोड़ लोग अस्पताल में अपना इलाज करवा रहे हैं। करीब 80 करोड़ लोग विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में बंद हैं। 37 करोड़ लोग राज्य सरकार के और 20 करोड़ लोग केंद्र सरकार के कर्मचारी हैं, जो जनहित के कार्यो को छोड़कर बाकी सब काम करते हैं। एक करोड़ लोग आईटी के प्रोफेशन में हैं, जो मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए स्थानीय प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं। इसके बाद भी देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। चारों ओर भ्रष्टाचार की ही चर्चा है। इसे पूरी तरह से खत्म करने के लिए कोई उपवास कर रहा है, तो कोई जनांदोलन की धमकी दे रहा है। पर जिसे करना है, वह सरकार कुछ नहीं कर पा रही है।
पहले महँगाई की तुलना सुरसा के मुँह से की जाती थी, अब यह शब्द कमजोर पड़ने लगा है। इसी तरह भ्रष्टाचार के लिए अब लोग विशालकाय जानवर जैसी अर्नाकोंडा, शेषनाग आदि जैसे विशेषण का प्रयोग करने लगे हैं। विश्व में शायद ही कोई ऐसा देश हो, जहाँ भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज न उठाई गई हो। हाल ही में आयशा सिद्दिकी की एक किताब आई है, जिसमें पाकिस्तान में सैन्य अधिकारियों द्वारा किए गए भ्रष्टाचार का सिलसिलेवार जिक्र है। यह किताब खूब बिक रही है। मानव जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो, जिसमें पाकिस्तान की सेना ने भ्रष्टाचार न किया हो। बात केवल पाकिस्तानी सेना की ही नहीं, बल्कि पाकिस्तानी पुलिस, आईएसआई और प्रशासनिक ढाँचा पूरी तरह से भ्रष्ट है। सरकार जैसी कोई चीज वहाँ है ही नहीं। इस देश को चीन और अमेरिका यदि सहायता करना बंद कर दे, तो वह एक दिन भी न चल पाए। यही हाल साम्यवाद का ढिंढोरा पीटने वाले चीन का है। इस देश के राष्ट्रपति हू जिन्ताओ ने कुछ समय पहले ही कहा है कि भ्रष्टाचार एक ऐसा वाइरस है, जो हमारे देश की राजनैतिक स्थिरता को खतरे में डाल रहा है। आपको शायद विश्वास न हो, पर यह सच है कि केवल चीन में ही 2002 से 2005 तक 30 हजार शासकीय अधिकारियों को भ्रष्टाचार के आरोप में सख्त सजा दी गई है। 792 जजों के खिलाफ कार्रवाई चल रही है। सन् 2008 में 41 हजार 179 अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्ट आचरण को लेकर जाँच चल रही है। जिनके खिलाफ आरोप सिद्ध हो गए, उन्हें सख्त सजा दी गई। इसके बाद भी लोग यही कह रहे हैं कि हमें नहीं लगता कि हमारे देश में भ्रष्टाचार कम हुआ है।
इसके मद्देनजर हमें अपने ही देश पर नजर डालें, तो 1992 में 153 सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया था। इनमें से आधे लोगोंे के खिलाफ आरोप सिद्ध भी हुए, इसके बाद भी सभी अधिकारी अपने पद पर काबिज रहे। एक भी अधिकारी को ऐसी सजा नहीं हुई, जिससे अन्य अधिकारी सबक लेते। बहुत ही कम लोगों को याद होगा कि भूतपूर्व राष्ट्रपति और शिक्षाविद् डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने 1947 में कहा था कि जब तक हम उच्च स्तर पर कायम भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और कालेबाजार का समूल नाश नहीं करेंगे, तब तक हम प्रशासनिक स्तर पर न तो कार्यक्षमता बढ़ा सकते हैं और न ही उत्पादन बढ़ा सकते हैं। सोचो, यह बात उन्होंने तब कही थी, जब हमारा देश पैदा ही हुआ था। यदि उस समय इस बात की ओर ध्यान दिया जाता, तो शायद आज ये हालात न होते। हम कहाँ थे और कहाँ पहुँच गए। आसुरी शक्तियाँ लगातार बलशाली हो रही हैं। ईमानदारी को कोसों तक पता नहीं है। फिर भी देश के कथित नेता चिंतित होकर कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने के लिए हम कृतसंकल्प हैं।
डॉ. महेश परिमल

सोमवार, 27 जून 2011

आम की अभिलाषा




25 जून को जनसत्‍ता के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

शनिवार, 25 जून 2011

अपराधियों के हौसले बुलंद करने वाला फैसला

डॉ. महेश परिमल
हाल ही में सुप्रीमकोर्ट ने एक फैसले में एनकाउंटर को बहुत बड़ा अपराध माना है। फैसले में यह कहा गया है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी इसका दोषी पाया जाता है, तो उसे फाँसी की सजा होनी चाहिए। सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से पुलिस विभाग में हड़कम्प है। पुलिस की स्थिति इधर कुआँ उधर खाई जैसी हो गई है। यदि सुप्रीमकोर्ट की ही मानें, तो अब कभी कोई पुलिस वाला शातिर अपराधी या आतंकवादी को मारेगा नहीं, बल्कि उसे जाने देगा, या फिर खुद ही भाग जाएगा। क्योंकि यदि कहीं से भी यह बात सामने आ जाए कि यह एनकाउंटर था, तो पुलिस वाला कभी बच नही ंपाएगा। दूसरी ओर यदि अपराधी या आतंकवादी पुलिस वाले को मार डालता है, तब तो किसी प्रकार की बात सामने नहीं आएगी। ऐसे में पुलिसवाला अपना बचाव का ही रास्ता अपनाएगा।
सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले की तीखी प्रतिक्रिया हुई है। इस संबंध में उत्तर प्रदेश के भूतपूर्व डायरेक्टर जनरल प्रकाश सिंह कहते हैं कि इस प्रकार के फैसले का असर पुलिस के नैतिक बल पर पड़ेगा। पुलिस कानून से इतना अधिक डर जाएगी कि अब अपने हथियार चलाने के पहले सौ बार सोचेगी। उसे यह डर रहेगा कि यदि वह हथियार चलाते हैं, तो एनकाउंटर की बात सामने आएगी, यदि नहीं चलाते, तो अपनी जान मुश्किल में आ जाएगी। इसलिए वे एनकाउंटर करने के बजाए अपराधी को भाग जाने देंगे। कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि पुलिस वाले किसी भी रूप में राजनीति या पुलिस अधिकारियों के दबाव में न आएँ। व्यावहारिक दृष्टि से यह असंभव है। सामान्य रूप से पुलिस एनकाउंटर सरकार के दबाव में ही किए जाते हैं। यदि पुलिस ने बड़े अधिकारियों की बात न मानी, तो उसके परिणाम कितने भयानक होंगे, यह पुलिसवाला ही अच्छी तरह से जानता है। आंध्रप्रदेश पुलिस आफिसर्स एसोसिएशन के प्रेसीडेंट के.वी. चलपति राव का मानना है कि पुलिस पर चारों तरफ से अन्याय हो रहा है। वे कहते हैं कि जब किसी गेंगस्टर से मुठभेड़ हो रही हो, इस दौरान कोई पुलिसवाला मारा जाता है, तो कोई खोज-खबर लेने नहीं आएगा, पर यदि पुलिस के हाथों कोई मारा जाता है, तो उसे नकली एनकांउटर माना जाता है। हल्ला मच जाता है। उस पर जांच बिटा दी जाती है।
सामान्य रूप से सुप्रीमकोर्ट इस तरह का कोई फैसला देती है, तो मानव अधिकार के लिए लड़ने वाले सामने आ जाते हैं। पर आश्चर्य की बात यह है कि इस फैसले के आने के बाद कहीं कोई हलचल दिखाई नहीं दे रही है। मानव अधिकार के लिए लड़ने वाले एक आंदोलनकारी ने कहा कि वे इससे कतई खुश नहीं हैं। इस फैसले से सुप्रीमकोर्ट को भले ही लोकप्रियता मिल जाए, पर सच तो यह है कि कानूनी रूप से यह बिलकुल भी व्यावहारिक नहीं है। नकली एनकाउंटर के दोषी पुलिस अधिकारी को फाँसी पर चढ़ा दिया जाए, यह कोई समस्या का समाधान नहीं है। यदि नकली एनकाउंटर की समस्या से हमेशा के लिए निजात पाना है, तो इसके लिए दूसरे समाधान की तलाश की जाए। पुलिस अधिकारी को फाँसी पर चढ़ा देने से होगा ये कि भविष्य में कभी कोई एनकाउंटर नहीं होगा। सभी अपराधी या आतंकवादी भागने के पहले पुलिस अधिकारियों को मार डालेंगे या फिर पुलिस अधिकारी स्वयं ही अपनी जान बचाने के लिए भाग खड़ा होगा। पुलिस का मनोबल तो टूटेगा ही, साथ ही फाँसी का डर सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक कमजोर बना देगा। यह एक सच्चई है।
नकली एनकाउंटर के मुद्दे पर सुप्रीमकोर्ट का बार-बार बदलते विरोधाभासी निर्णय भी एक चिंता का विषय है। इसे कभी पुलिस वालो की विवशता के रूप में भी देखा जाए। पुलिस की नीयत पर संदेह करने के पहले यदि नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (एनएचआरसी)की रिपोर्ट देख ली जाए, तो बेहतर होगा। पुलिस एनकाउंटर के जो आँकड़े उपलब्ध हैं, उसकी जाँच में यह पाया गया है कि 1993 से अब तक 2956 मामले सामने आए हैं। इसमें से 1366 मामले नकली एनकाउंटर के हैं। जब इन मामलों की गहराई से जाँच की गई, तब यह तथ्य सामने आया कि इनमें से केवल 27 मामले ही नकली एनकाउंटर के हैं। समाजसेवी मानते हैं कि नकली एनकांउटर के मामले में धारा 21 का स्पष्ट रूप से उल्लंघन होता है। इस धारा में कहा गया है कि कानूनी प्रक्रिया में मार्गदर्शन के अलावा किसी भी व्यक्ति का जीवन या उसकी आजादी ले लेना अपराध की श्रेणी में आता है। नकली एनकाउंटर के बढ़ते मामले को देखते हुए एनएचआरसी नवम्बर 1996 में एक मार्गदेर्शिका का प्रकाशन किया और 2003 में यह जोड़ा कि यह मार्गदर्शिका नकली एनकाउंटर के मामले में एफआईआर और पुलिस की प्रतिक्रिया के कारण होने वाली मौत की तमाम घटनाओं की जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जाँच जैसे नियमों का समावेश किया गया है। इस मार्गदर्शिका का कोई मतलब ही नहीं है, क्योंकि संस्था के पास इतने अधिकार नहीं हैं कि वे कोई कार्रवाई कर सके। इससे पुलिस की कार्यशैली और नकली एनकाउंटर की प्रक्रिया पर किसी तरह का कोई असर नहीं होगा। न मार्गदर्शिका से न तो सरकार डरती है और न ही पुलिस।
अब समय आ गया है कि इस दिशा में हवाई किले बनाने से अच्छा है कि कुछ ऐसा किया जाए कि पुलिस का मनोबल न टूटे और दोषी पुलिस अधिकारियों को सजा भी हो। समाधान तो तलाशना ही होगा। देश की सुरक्षा को लेकर आज जितने भी मामले सामने आ रहे हैं उसमें पुलिस की भूमिका को हमेशा संदिध माना जाता है। पर पुलिस कितने दबाव में काम करती है, इसे भी जानने की आवश्यकता है। यदि दोषी पुलिस अधिकारियों को फाँसी की सजा दी जाने लगी, तो आतंकवादियों और शातिर अपराधियों के हौसले बुलंद हो जाएँगे। वे खुलकर अपना खेल खेलेंगे। उन्हें मालूम है कि हमें मारने वाला पुलिस अधिकारी भी बच नहीं पाएगा। संभव है वे ही उस पुलिस अधिकारी को ठिकाने लगा दें। दोनों ही मामलों में कानून की लंबी प्रक्रिया चलती है, इस दौरान अन्य पुलिसकर्मियों में यह भावना धर कर जाती है कि यदि वे मुस्तैदी से अपना काम करती है, तो उस पर आरोपों की बौछार शुरू हो जाती है। पुलिस वाला आतंकवादियों के हाथों मारा जाता है, तो कहीं कोई आंदोलन नहीं होता, पर यदि पुलिस वाले के हाथों कोई मारा जाता है, तो उसे नकली एनकाउंटर का मामला बना दिया जाता है। ऐसे में कोई क्यों हथियार उठाए? आतंकवादी को भाग देने या घटनास्थल से भाग जाने में ही पुलिस वाले की भलाई है, तो फिर क्यों हथियार उठाकर खतरा मोल लिया जाए?
डॉ. महेश परिमल

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