सोमवार, 19 दिसंबर 2011

नैतिक मूल्यों के साथ-साथ बदलते पैमाने




डॉ. महेश परिमल


फिल्‍मी दुनिया में आने के बाद भी धर्मेद्र ने काफी संघर्ष किया। पहली फिल्म करने के बाद उन्हें मात्र 51 रुपए मिले। धीरे-धीरे हालात बदले। सितारा बनते ही उन्होंने जुहू में एक बंगला लिया और पूछे जाने पर कि कितना बड़ा बंगला है, उन्होंने कहा यही कोई चालीस-पचास मंजियां (खटियाएं) आ जाएंगी। ये था उनका ठेठ गँवईपन, जिसमें पंजाब की माटी का सौंधापन कूट-कूटकर भरा है। जीवन में इंसान अपने तरीके से मापदंड तय करता है। कई चीजें कुछ लोगों के लिए बड़ी सहज होती हैं। इसे वे उसी सहजता से बोल भी जाते हैं। हमारी प्रवृत्ति ही ऐसी है कि हम उसे पेचीदा बना देते हैं। उसे गुिफत करते रहते हैं। सहज और सरल को यथावत् रखा जाए, तो कई पेचीदे सवाल भी आसानी से सुलझ सकते हैं। अाी कुछ दिनों पहले ही छत्तीसगढ़ जाना हुआ। रास्ते में एक ग्रामीण से पूछा कि यहाँ से उदयपुर कितने किलोमीटर है। ग्रामीण ने बड़ी सहजता से उत्तर दिया- बस वाला 30 रुपए लेता है। एकदम आसान जवाब। उसने दूरी को न तो कोस से नापा, न ही किलोमीटर से। उसके पास न तो फर्लाग का पैमाना था, न ही गज का। ग्रामीण ने जो बताया, वह दोनों को समझ में आने वाला था। अब यह बात अलग है कि आप अपडेट नहीं हैं। यदि आप अपडेट हैं, तो आपको आसानी से पता चल जाना चाहिए कि बस वाले 30 रुपए में कितने किलोमीटर ले जाते हैं। दूरी को रुपए से नापने का यह तरीका अपने आप में अनोखा है।जिस तरह से प्यार को सीमाओं से नहीं बाँधा जाता, ठीक उसी तरह जब कोई कहे कि मैं उसे उतना ही प्यार करता हूँ, जितना हनुमान जी श्री राम से करते थे। यहाँ आकर सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। इससे अधिक तो कोई किसी से प्यार कर ही नहीं सकता। हमारी आदत है कि हम इस प्यार को पेचीदगियों के साथ समझना शुरू कर देते हैं। सागर की अनंत गहराई, जमीं से सितारों की दूरी, जीवन की अंतिम साँसों तक आदि। ये सब सीमाएँ हैं। जीवन बहुत ही सरल और सहज है। इतना अधिक की उसे नापने के लिए हमारे पास कोई पैमाना नहीं है। भोथरे हो गए हैं हमारे पैमाने। हम केवल प्यार ही नहीं, बल्कि संवेदनाएँ और अनुभवों को भी मापने लगे हैं। एक कोशिश केवल एक कोशिश इंसानियत को मापने के लिए करो, तो समझ में आ जाएगा कि इसे मापने के लिए हमारा हर पैमाना काफी छोटा साबित होगा।

डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

डाऊ प्रायोजित ओलंपिक में क्‍यों लें हिस्‍सा ?


दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख
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गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

शहीद की विधवा के जज्बे को सलाम!

डॉ. महेश परिमल
हमें गर्व होना चाहिए शहीद नानक चंद की विधवा गंगा देवी के जज्बे पर। जिसने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर कहा है कि अफजल गुरु को उन्हें सौंप दे। ताकि सरकार में यदि हिम्मत नहीं है, तो वह उसे फाँसी दे देगी। गंगा देवी पर हमें इसलिए भी गर्व करना चाहिए कि उसने पति के मरणोपरांत मिलने वाला कीर्ति चक्र भी लौटा दिया। उनका कहना था कि अफजल को फांसी दिए जाने तक वे कोई सम्मान ग्रहण नहीं करेंगी। एक शहीद की विधवा को और क्या चाहिए। लोग न्याय की गुहार करते रहते हैं, उन्हें न्याय नहीं मिलता। पर एक शहीद की विधवा यदि प्रधानमंत्री से न्याय की गुहार करे, तो क्या उसे भी इस देश में न्याय नहीं मिलेगा? वर्ग भेद की राजनीति में उलझी देश की गठबंधन सरकार से किसी प्रकार की उम्मीद करना ही बेकार है। शहीद की विधवाओं की गुहार संसद तक पहुँचते-पहुँचते अनसुनी रह जाती है। जहाँ वोट की राजनीति होती हो, वहाँ कुछ बेहतर हो भी नहीं सकता।शहीद की विधवा ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा है ‘मनमोहन सिंह जी अगर आपकी सरकार में अफजल गुरु को फांसी देने की हिम्मत नहीं है, यदि आपको जल्लाद नहीं मिल रहे तो आप यह काम मुझे सौंप दें। मैं शहीद की पत्नी हूं, देश के खिलाफ आँख उठाने वाले को क्या सजा दी जाए, मुझे और मेरे परिवार को मालूम है।’ ‘मैं संसद के 13 नंबर गेट पर जहां मेरे पति शहीद हुए थे वहीं अफजल को फांसी दूंगी।’ राठधाना गाँव में अपने घर पर शहीद पति की प्रतिमा के सामने बैठी गंगा देवी ने कहा कि हमले के दस साल बाद भी अफजल और उसके सभी साथी सुरक्षित हैं। देश के लिए इससे बड़ी शर्म की बात और क्या हो सकती है?’ देश के हर नागरिक को यह सोचना चाहिए कि आखिर देश के दुश्मनों को देश के भीतर ही कौन शह दे रहा हे? क्यों पनप रहा है आतंकवाद? हमारे ही आँगन में कौन बो रहा है आतंकवाद की फसल? देश के दुश्मनों से सीमा पर लड़ना आसान है, पर देश के भीतर ही छिपे दुश्मनों से लड़ना बहुत मुश्किल है। एक घोषित आतंकी हमारी ही सुरक्षा में कबाब खाता रहे, उस पर करोड़ों रुपए खर्च होते रहें, हम यह सब आखिर सहन कैसे कर लेते हैं। केवल वोट की राजनीति के कारण देश में ही आतंकवादी सुरक्षित रहें, सीमा पर हमारे जवान असुरक्षित होकर भी लड़ते रहें, आखिर ये कहाँ का न्याय है? गड़बड़ी आखिर कहाँ है? इसे समझना आज हर भारतीय का कर्तव्य है।भारत में पिछले 20 सालों में तीन दर्जन से अधिक आतंकी हमले और उनमें 1600 से अधिक लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार एक भी आतंकी को सजा नहीं मिली है। चाहे 1993 का मुंबई बम धमाका हो या फिर 2001 का संसद पर हमला, पाकिस्तान में बैठे साजिश रचने वालों तक भारतीय एजेंसियों के हाथ नहीं पहुंच सके। वहीं हमले के लिए जिम्मेदार जिन आतंकियों को गिरफ्तार भी किया गया, उनके खिलाफ अदालती कार्रवाई का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। सुरक्षा एजेंसी से जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आतंक के लिए जिम्मेदार लोगों को सजा दिए बिना इसके खिलाफ लड़ाई बेमानी है। 1993 में मुंबई बम धमाकों को 26/11 के बाद भारत में अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जाता है। 300 से अधिक लोगों की मौत और 700 से अधिक को घायल करने वाले एक के बाद एक 12 धमाकों ने देश की आर्थिक राजधानी को हिलाकर रख दिया था। लेकिन अभी तक इसके एक भी आरोपी को सजा नहीं हो पाई है। आतंकी हमले के 13 साल बाद 2006 में विशेष टाडा कोर्ट का फैसला आया भी, तो सजा पाने वाले दोषियों ने उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी, जहां अब तक सुनवाई चल रही है। वैसे हकीकत यह भी है कि हमले की जांच करने वाली सीबीआई अब तक मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम समेत 35 दूसरे आरोपियों को गिरफ्तार तक नहीं कर पाई है। वहीं 2001 में संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु की फाँसी की सजा पर 2005 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुहर लगने के छह साल बाद भी अमल नहीं हो पाया है। जबकि 2000 में दिल्ली के लालकिले में घुसकर सेना के तीन जवानों की हत्या और 11 को घायल करने वाले लश्कर-ए-तोयबा के आतंकी मोहम्मद आरिफ की फाँसी की सजा पर अब तक अदालती कार्रवाई जारी है। 2005 में छह अन्य आरोपियों समेत आरिफ को दोषी मानते हुए ट्रायल कोर्ट ने उसे फाँसी की सजा सुनाई। 2007 में हाईकोर्ट ने अन्य आरोपियों को बरी करते हुए आरिफ के खिलाफ फाँसी की सजा बरकरार रखी। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मामला विचाराधीन है। इसी तरह 2002 में गुजरात स्थित अक्षरधाम मंदिर पर हमला कर 31 लोगों को मौत का घाट उतारने वाले लश्कर आतंकियों को फाँसी देने का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। 2005 में दीवाली के ठीक पहले धनतेरस पर दिल्ली के बाजारों, 2006 में बनारस के संकटमोचन मंदिर और 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में बम विस्फोट करने वाले आतंकियों को सजा मिलने में अभी सालों लग सकते हैं। जबकि इन तीन आतंकी हमले में 300 से अधिक लोग मारे गए थे। खुफिया विभाग (आईबी) के पूर्व प्रमुख व विवेकानंद फाउंडेशन के निदेशक एके डोभाल का मानना है कि आतंकवाद से सबसे अधिक पीड़ित होने के बावजूद भारत आतंकियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाने में विफल रहा है।अजमल कसाब को जब फाँसी की सजा मुकर्रर हुई, उसके बाद संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु को फाँसी पर चढ़ाने के लिए दबाव बनने लगा। लेकिन इस बीच जो बयानबाजी हुई और फाइल इधर से उधर हुई, उससे यह स्पष्ट हो गया कि कई शक्तियाँ अफजल को बचाने में लगी हुई हैं। यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि अफजल को बचाने में कौन-कौन लगे हुए हैं? अब तो यह भी सिद्ध हो गया है कि जिन अफसरों ने अफजल की फाइल को अनदेखा किया, उन सभी को पदोन्नति मिली। इसका आशय यही है कि कई शक्तियाँ अफजल को बचाने में लगी हैं। एक फाइल चार साल तक 200 मीटर का फासला तय न कर पाए, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है? इसको समझते हुए उधर अफजल यह कहा रहा है कि मैं अकेलेपन से बुरी तरह टूट गया हूं। मुझे जल्द से जल्द फाँसी की सजा दो। निश्चित रूप से यह भी उसकी एक चाल हो। पर इतना तो तय है कि अफजल पर किसी भी तरह की कार्रवाई करने मंे केंद्र सरकार के पसीने छूट रहे हैं। देश के हमारे संविधान पर भी ऊँगली उठ रही है, सो अलग। आखिर क्यों हैं इतने लचर नियम कायदे और क्यों है इतनी लाचार हमारी राष्ट्रपति?कहने को तो हमारे राष्ट्रपति अथाह अधिकारों के स्वामी हैं। यहाँ पर स्वामिनी कहना अधिक उचित होगा। उनके पास यदि किसी की दया याचिका आती हे, तो वे स्वतंत्र रूप से कोई निर्णय नहीं ले सकते। पहले उस आवेदन को गृह मंत्रालय भेजा जाता है। वहाँ से टिप्पणी आने के बाद उस पर राष्ट्रपति की मुहर लगती है। अभी हमारे राष्ट्रपति के पास 20 दया याचिकाएँ पेंडिंग हैं। इनमें से 7 गृह मंत्रालय के पास हैं। ये सभी याचिकाएँ भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की तरफ से उन्हें विरासत में मिली हैं। अपने पूरे कार्यकाल के दौरान उन्होंने मात्र एक ही याचिका पर निर्णय लिया था। उन्होंने बलात्कारी धनंजय चटर्जी की दया याचिका को ठुकरा दिया था। जिसे बाद में फाँसी दी गई। इसके पूर्व के. आर. नारायण ने अपने कार्यकाल में एक भी दया याचिका पर निर्णय नहीं लिया था। अब इन सभी याचिकाओं पर निर्णय लेने की जवाबदारी प्रतिभा पाटिल पर आ पड़ी है। अब यदि हमारी राष्ट्रपति यह सोचें कि उनके पहले के राष्ट्रपतियों ने जब इस पर विचार नहीं किया, तो उनके अकेले करने से क्या होगा? वैसे भी दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति कोई स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकतीं। ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जब राष्ट्रपति थे, तब उन्होंने गृहमंत्रालय से प्राप्त एक दया याचिका को ठुकरा देने की सलाह देते हुए फाइल वापस भेज दी थी। वे चाहते थे कि इस अपराधी को फाँसी के बजाए उम्रकैद दी जाए। इसके बाद गृहमंत्रालय ने उस पर निर्णय लिया और उस पर राष्ट्रपति को अपनी मुहर लगानी पड़ी। इस तरह से देखा जाए, तो कई अधिकार प्राप्त हमारे राष्ट्रपति संविधान के मामले में स्वयं कुछ भी निर्णय लेने में अक्षम हैं।राष्ट्रपति की इसी अक्षमता का लाभ अफजल गुरु जैसे आतंकवादी उठा रहे हैं। अभी जो दया याचिकाएँ राष्ट्रपति के सामने हैं, उसमें से कई तो दो दशक पुरानी हैं। इन पर अभी तक फैसला नहीं हो पाया है। संविधान की इसी कमजोर नब्ज को पकड़ते हुए जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर फारुख ने कह दिया कि पहले उन 20 दया याचिकाओं पर फैसला करो, फिर अफजल गुरु की याचिका पर फैसला करना। इसका मतलब साफ है कि न तो उन 20 याचिकाओं पर फैसला होगा न ही अफजल गुरु फाँसी होगी। यही बात स्पष्ट करती है कि अफजल गुरु पर किसका वरदहस्त है? उमर फारुख की इस टिप्पणी पर हमारे संविधान के विशेषज्ञों का कहना है कि फाँसी की सजा कोई होटल में रुम बुकिंग जैसी प्रक्रिया नहीं है, जिसमें जो पहले आएगा, वह पहले पाएगा।इसके अलावा इस मामले में सबसे बड़ी बाधा सरकार की वह सोच है, जिसके अनुसार यदि अफजल गुरु को फाँसी दे दी गई, तो जम्मू-कश्मीर में हिंसा भड़क उठेगी। क्योंकि अफजल कश्मीरी मुसलमान है। अफजल के कश्मीरी मुसलमान होने का लाभ कई लोग उठा रहे हैं। कई लोगों के लिए वह हीरो है। इसके पूर्व घाटी में मकबूल बट्ट को 1984 में फाँसी पर लटका दिया गया था। वह 1960 से ही कश्मीर की मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहा था। उसे 1974 घाटी के एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या के आरोप में फाँसी की सजा सुनाई गई थी। अंतत: 11 फरवरी 1984 को उसे दिल्ली की तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी गई। उसके शव को उसके परिजनों को नहीं दिया गया और जेल में ही उसे दफना दिया गया। उसकी फाँसी के बाद कश्मीर में अलगाववाद का आंदोलन और तेज हो गया। कश्मीर की प्रजा आज भी मकबूल बट्ट को अपना हीरो मानती है। उसकी पहचान शहीदे आजम के रूप में होती है। हर साल 11 फरवरी को श्रीनगर बंद रहता है। उधर कश्मीर के अलगाववादी आज भी अफजल को अपना हीरो मानते हैं। इस स्थिति में यदि अफजल को फांसी दे दी जाती है, तो कश्मीर घाटी एक बार फिर हिंसा की चपेट में आ सकती है। यही कारण है कि सरकार अफजल की फाँसी के मामले को लगातार टाल रही है।अभी देश को सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसी सख्ती की आवश्यकता है, जो अपने बल पर ही कई कामों को अंजाम देने में सक्षम होते थे। वीर शिवाजी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, महाराजा रणजीत सिंह, महाराणा प्रताप, लोकमान्य तिलक, गोखले आदि ऐसे नाम हैं, जो अपनी दृढ़ता के कारण ही पहचाने जाते हैं। आज देश को ऐसी ही दृढ़ता की आवश्यकता है, जो देश को बचा सके। सुबूत इकट्ठा करना, उसे दुनिया को दिखाते रहना कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात तो वह है कि सुबूत इकट्ठा कर उसे किसी को न बताना और सीधे दुश्मन के घर में घुसकर उसे खत्म कर देना। जिस इच्छाशक्ति की देश को आज आवश्यकता है, उसे प्राप्त करने में काफी वक्त लगेगा। तब तक शायद हम सब्र के बॉंध ही बनाते रहेंगे।
डॉ महेश परिमल

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

इंटरनेट की सेंसरशिप आवश्‍यक पर असंभव




नवभारत रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

भोपाल का भूत लंदन में












दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज पेज 9 पर प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

ममता ने सरकार के पंख काटे









नवभारत रायपुर और बिलासपुर के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया..........

डॉ. महेश परिमल

क्या हो गया है हमारे ईश्वर को! लगता है उसे अच्छे इंसानों की याद सताने लगी है। अक्टूबर में हमने जगजीत सिंह को खो दिया, उसके बाद भूपेन हजारिका भी रुखसत हो गए और अब देव साहब। अरे भई अपनी फिल्म के बारे में लोगों की राय तो जान लेते। इसके पहले वे भी हमारा साथ छोड़ चले गए। देश की माटी से अटूट प्यार रखने वाले सदाबहार अभिनेता देव साहब आज हमारे बीच नहीं है, यह हम सोच भी नहीं सकते। पर इस पर हमें भरोसा करना ही होगा कि वे आज हमारे बीच नहीं हैँ। एक ऐसा अभिनेता, जिसे एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीसरी पीढ़ी भी दीवानी हो, ऐसा अभिनेतो भारतीय रजतपट पर अभी तक नहीं हुआ। यह खिताब आँख बंदकर देवानंद को दिया जा सकता है। हमेशा कुछ नया करने की चाहत ने ही उन्हें हमेशा सदाबहार बनाए रखा। एक उम्र के बाद इंसान नया सोचना तो क्या नया करना भी नहीं चाहता। उस स्थिति में देव साहब ने हमेशा कुछ नया ही करने का सोचा। उनकी कई फिल्में असफल रहीं, पर उन्होंने कभी मुड़कर नहीं देखा। इस बात का खयाल अवश्य रखा कि जो फिल्में विफल रहीं, वैसी गलती आने वाली फिल्मों में न हो। हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया, उन्हीें पर फिल्माए गाने को उन्होंने जिंदगी भर निभाया। कई बार तो उनके लिए समय ही ठहर गया, पर वे नहीं ठहरे। सादे जीवन से किस तरह से उच्च आदर्शों के साथ अच्छे से जीया जा सकता है, यह कोई उनसे सीखे। छह दशक से अधिक समय तक रुपहले पर्दे पर जमे रहना कोई मामूली बात नहीं है।कभी अपनी एक फिल्म में उन्होंने एक गीत गुनगुनाया था मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया। और शायद यही गीत उनके जीवन को सबसे अच्छी तरह परिभाषित भी करता है. आज देवानंद हमारे बीच नहीं है, पर हाल में आई उनकी फिल्म चार्टशीट में भी वे अपने पूरे जोश खरोश के साथ दिखाई दिए। देव आनंद को अपने अभिनय के लिए दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। देव आनंद को सबसे पहला फिल्म फेयर पुरस्कार वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म काला पानी के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में भी देव आनंद फिल्म गाइड के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। वर्ष 2001 में देव आनंद को भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में उनके द्वारा हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।गुरुदासपुर की वे गलियाँ आज रो रहीं होंगी। बेशक उन्हीं गलियों से चेतन आनंद और विजय आनंद भी गुज़रे, लेकिन इन्होंने अपने जीवन को वैसा ही जीया, जैसा उन्हें मिला। पर देव साहब की बात ही कुछ और है। उन्होंने अपने जीवन का एक सूत्रवाक्य बना लिया था 'चरैवति चरैवति वे चलते रहे, हमेशा चलते रहे। कविवर रवींद्र नाथ टैगोर ने कहीं लिखा है 'जोदि तोमार डाक सुने केऊ ना आसबे, तो एकला चालो एकला चालो रे। देव साहब ने इन्हीं शब्दों को जीया। जीवन में कई विफलताएँ आई, लोगों के ताने सहे, पर वे इन सबकी परवाह न करते हुए हमेशा उसी काम में लगे रहे, जो उन्हें भाता था। अब तो कोई ऐसा इंसान दिखाई भी नहीं देता, जो उनकी तरह ऊर्जावान होकर अपने काम में मस्त रहता हो। उनकी फिल्में हमें शायद कुछ सुझा सके। जीवन की निरंतरता सिखा सके। वे आज हमारे बीच भले ही न हों, पर पूरी तीन पीढिय़ों की यादों में वे हमेशा बसे रहेंगे, यह तय है।

डॉ महेश परिमल

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

भोपाल का भूत लंदन में








हरिभूमि के सभी संस्‍करणों में संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

रविवार, 4 दिसंबर 2011

मुल्‍ला पेरियार बांध पर तकरार, दो राज्‍यों के बीच खिंची तलवारें










दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 30 नवंबर 2011

अपनों के ही खून से रँगे हैं सेना और पुलिस के हाथ

डॉ. महेश परिमल
कश्‍मीर घाटी बरसों से खून की होली खेल रही है। इस होली में कई चेहरे रंग से पुते हुए हैं, जिन्हें कश्मीरी अपना मानते हैं। सरकार ने उन्हें कश्मीरियों की रक्षा के लिए नियुक्त किया है। जनता इन पर विश्वास करना चाहती है, पर सरकार ने ही इन्हें ऐसे विशेषाधिकार दे रखे हैं, जिसका लगातार दुरुपयोग हो रहा है। सेना के वे जवान और अधिकारी जिन पर हमें हमेशा नाज रहता है, आज वही अपने विशेषाधिकार के कारण चर्चा में हैं। कई बार कश्मीरी जनता को लगता है कि इससे तो बेहतर सीमा पार से आने वाले आतंकी हैं, जो कम से कम जो भी करते हैं, बोलकर करते हैं। हमारे ये अधिकारी तो जो भी करते हैं, अपने विशेषाधिकार के तहत करते हैं। इस पूरे मामले कंेद्र सरकार की लापरवाही बार-बार सामने आ रही है। जो अधिकारी या जवान जनता पर कहर बरपाते हैं, उन पर स्थानीय पुलिस कार्रवाई नहीं कर सकती। इसके लिए प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास पहुँचाया जाता है, पर केंद्र सरकार इसकी इजाजत ही नहीं देती। जिससे लोगों में आक्रोश बढ़ रहा है। कई युवाओं ने तो बंदूक भी उठा ली है। थोड़ी सी सजगता दिखाते हुए केंद्र सरकार दोषी अधिकारियों एवं जवानों को जो भी सजा दे, उसका ऐसा प्रचार करे, ताकि जनता को पता चल जाए कि उन पर जुल्म करने वाले का क्या हश्र हुआ। इससे भारतीय कानून पर उनका विश्वास दृढ़ होगा। लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है। सरकार कश्मीरी जनता पर अत्याचार करने वाले को संरक्षण दे रही है।कश्मीर में आतंकवाद के खात्मे के लिए आम्र्ड फोर्सिस स्पेशल पावर्स एक्ट के तहत सेना को जो विशेष अधिकार दिए गए हैं, उससे घाटी की जनता यह मानने लगी है कि इस कानून का उपयोग कम और दुरुपयोग अधिक हो रहा है। सेना के जवान और अधिकारी जनता पर अत्याचार करते हैं और उन पर कार्रवाई तक नहीं होती। ऐसे में विरोध स्वाभाविक है। यह सच है कि इसी कानून के तहत आज घाटी शांत है। इसी कानून के खौफ से कई आतंक संगठनों का सफाया हो चुका है। अब केवल कुछ ही आंतकवादी शेष हैं, जो सीमा पार से संचालित हैं। इसलिए इस कानून का दुरुपयोग ही हो रहा है, यह कहना उचित नहीं है। हाँ पर केंद्र सरकार की हीला-हवाली के कारण यह कानून अब बदनाम हो रहा है। अगर इस कानून का दुरुपयोग करने वाले सेना के अधिकारी और जवानों पर तत्काल कार्रवाई की जाती, तो संभव है कश्मीरी जनता का विश्वास न खोती। पर केंद्र सरकार अपनी आदतों से मजबूर है। जो मुस्तैदी कानून का दुरुपयोग करने वालों ने दिखाई, उससे दोगुनी मुस्तैदी सरकार को दिखानी थी। लेकिन अब देर हो चुकी है, चारों ओर इसके खिलाफ आवाजें उठने लगी हैं। यहाँ तक कि कश्मीर के मुख्यमंत्री भी इसमें शामिल हो गए हैं।देश की सीमाओं पर आने वाले कुछ राज्यों में सेना को विशेषाधिकार देने के लिए 1958 से आम्र्ड फोर्सिस स्पेशल पावर्स एक्ट नामक विशेष कानून अमल में लाया गया। इसका प्रयोग सबसे पहले असम और मणिपुर में किया गया। इस कानून में यह प्रावधान है कि सेना को कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति के घर में घुसकर तलाशी ले सकता है, उसके मालिक को बंदी बना सकता है। इस कानून का मूल उद्देश्य तो आतंकवाद पर काबू पाना था, पर कुछ वर्षो से इसके दुरुपयोग की खबरेंआने लगी हैं। घाटी के इस कानून के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं। अब अन्य राज्यों में इसके खिलाफ आवाज बुलंद होने लगी है। मणिपुर में तो बरसों से आंदोलन चल रहा है। पर सरकार इस दिशा में कुछ नहीं कर पा रही है। इससे सेना के अधिकारी बौखला गए हैं, उनका मानना है कि यदि इस कानून को वापस ले लिया गा, तो आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं हो पाएगा। आतंकवादी बेखौफ हो जाएँगे। निर्दोष मारे जाएँगे। सेना के उच्च अधिकारियों के इस तर्क के आगे सरकार दुविधा में है। बरसों से सरकार की इस दुविधा का लाभ सेना के अधिकारी और जवान बखूबी उठा रहे हैं।सरकार की दुविधा इस बात को लेकर है कि इससे नागरिकों के मूल अधिकारों की भावना आहत होती है। सेना पर आरोप है कि इस कानून का दुरुपयोग करते हुए अधिकारियों एवं जवानों ने कश्मीरी जनता फर्जी एनकांउटर किया है। कई युवतियों एवं महिलाओं पर बलात्कार किया है। ऐसे अपराध करने वालों पर राज्य सरकार सीधी कार्रवाई नहीं कर सकती। इसके लिए पहले उसे केंद्र सरकार के गृह विभाग और रक्षा विभाग से मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी लेनी पड़ती है। मंजूरी के बिना आरोपी पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। यही कारण है कि सेना के अधिकारी और जवान बेलगाम हो गए हैं। नागरिकों पर अत्याचार, युवतियों से बलात्कार आदि अपराध उनके लिए बाएँ हाथ का काम हो गए हैं। किसी के घर घुसकर उनकी धरपकड़ करना, हत्या करना उनके लिए बहुत ही आसान है। यदि वे किसी की हत्या भी कर देते हैं, तो कुछ दिनों बाद उसकी लाश आबादी से दूर कहीं लावारिस हालत में मिलती है। यदि किसी खूबसूरत कन्या पर उनकी निगाहें ठहर जाती हैं, तो पूछताछ के बहाने पुलिस छावनी में बुलाकर उससे बलात्कार किया जाता है। 2003 में राज्य सरकार ने ऐसे 35 मामलों में कार्रवाई के लिए केंद्र सरकार से अनुमति माँगी, पर एक मामले के लिए भी अनुमति नहीं मिली। इसे केंद्र सरकार की लापरवाही न कहें तो और क्या कहें?घाटी में सेना एवं अर्ध सैनिक बलों द्वारा कश्मीरी कन्याओं से बलात्कार की अनेक घटनाएँ सामने आई हैं। 1997 में अनंतनाग जिले में सेना के जवान ने एक गृहिणी के घर में घुसकर उस पर बलात्कार किया। इसकी एफआईआर पुलिस ने लिखी। पुलिस ने सेना के जवान पर कार्रवाई करने के लिए 2006 में कें्रद्र सरकार से अनुमति माँगी। पर केंद्र सरकार ने आज तक इसकी अनुमति नहीं दी। इसी लापरवाही के कारण सेना के जवानों का हौसला बढ़ता है। वे बेखौफ होकर इस तरह की करतूतें करते रहते हैं। इससे नागरिकों में असुरक्षा की भावना घर कर जाती है। 1999 में राफियाबाद जिले में सेना के एक मेजर ने भी एक घर में घुसकर गृहिणी से बलात्कार किया था,उसके खिलाफ भी कार्रवाई करने के लिए राज्य सरकार ने केंद्र से अनुमति माँगी थी, पर आज तक अनुमति नहीं मिली। जम्मू-कश्मीर में पुलिस और सेना मिलकर ज्वाइंट आपरेशन फर्जी एनकाउंटर करने के कई उदाहरण सामने आए हैं। इसमें यदि किसी पुलिस अधिकारी पर हत्या का आरोप लगता है, तो उसे सजा हो जाती है। पर यही आरोप सेना के अधिकारी पर लगाया जाए, तो उसे सजा नहीं होती। केंद्र सरकार से अनुमति न मिलने के कारण इन पर कार्रवाई नहीं हो पाती बेखौफ होकर आजाद घूमते रहते हैं। 2007 में फर्जी एनकाउंटर की अनेक घटनाएँ इस क्षेत्र में हुई हैं। इनमें से चार में से एक घटना तो ाीनगर के संबल में घटी थी। इस घटना में पुलिस और सेना के जवानों ने मिलकर एक ग्रामीण को उसके घर से उठाया। उसे जंगल ले जाया गया। वहाँ उसे मार डाला गया। दूसरे दिन पुलिस ने यह घोषणा कर दी कि विदेशी आतंकवादियों ने मुठभेड़ में वह मारा गया। 2006 में अब्दुल पदरु नामक मिस्त्री गुम हो गया। उसके परिजनों ने पुलिस में इसकी रिपोर्ट लिखवार्ठ। इस मिस्त्री के मोबाइल रिकॉर्ड से पता चला कि पुलिस ही उसे गाँव से बाहर ले गई थी। बाद में उसे मार डाला गया था। इस संबंध में जब जाँच हुई तो गिरफ्तार पुलिस अधिकारी ने बताया कि उसने इस तरह की 5 वारदात को अंजाम दिया है। इन सभी को पाकिस्तानी नागरिक बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार डाला गया। जब इनकी लाशे कब्र से निकाली गई और उसका डीएनए टेस्ट लिया गया, तो पता चला कि वे सभी भारतीय थे। इनमें से एक लाश तो श्रीनगर के इमाम की थी। जिन्हें पाकिस्तानी आतंकवादी बताकर मार डाला गया था। इस मामले में पुलिस के 12 कर्मचारियों की धरकपड़ भी की गई थी। पाथरीबाल में हुए पाँच फर्जी एनकाउंटर में सेना के अनेक अधिकारियोंे की मिलीभगत थी। इस कारण इसी जाँच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने सेना के 5 अधिकारियों पर अपहरण, हत्या, षडच्यंत्र रचने और सबूतों को नष्ट करने के आरोप में मामला चलाया। इस दौरान एक कर्नल को पदोन्नत कर ब्रिगेडियर बना दिया गया। शुरुआत में सेना ने ही इस अधिकारी के खिलाफ जाँच का आदेश दिया था, अब सीबीआई यह कह रही है कि सेना के अधिकारी उन्हें जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। यह मामला अभी सुप्रीमकोर्ट में है, और मामले से संबद्ध अधिकारियों की धरपकड़ नहीं हो पाई है।घाटी में हो रही इस तरह की वारदात के खिलाफ अनेक स्वयं सेवी संस्थाएँ आवाज उठा रही हैं। सेना के अधिकारी इन संस्थाओं के कार्यकत्र्ताओं को परेशान करने का कोई मौका नहीं चूकते। 1995 सेना के मेजर अवतार सिंह ने श्रीनगर के वकील जलील अंद्रबी की धरपकड़ की थी। 19 दिन बाद उस वकील की लाश मिली। इस मामले की जाँच हाईकोर्ट की विशेष टीम से करवाई। इस टीम ने जलील की मौत के लिए मेजर अवतार सिंह को दोषी माना। सेना के अधिकारियों ने बताया कि मेजर अवतार सिंह जब तक सेवा में थे, तब तक उन्होंने कोई अपराध नहीं किया। यह जाँच चल ही रही थी कि मेजर अवतार सिंह अमेरिका चले गए। बाद में पता चला कि इस तरह के फर्जी मुठभेड़ की 11 घटनाओं में मेजर अवतार सिंह का हाथ था। ऐसे में यह विश्वास कैसे किया जाए कि सेना जो कुछ करती है, वह सही होता है?यह सच है कि कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है। इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता। यदि घाटी के नागरिकों के सामने यह विकल्प रखा जाए कि वे चाहें तो पाकिस्तान में रहें या फिर भारत में, तो वहाँ की जनता भारत में ही रहना चाहेगी। इन हालात में सेना को जो विशेषाधिकार दिया गया है, उसका दुरुपयोग न हो, जनता पर अत्याचार न हो, नागरिकों का विश्वास सेना और पुलिस पर बना रहे, इसके लिए आवश्यक है कि यदि विशेषाधिकार का दुरुपयोग होता है, तो उस पर जल्द और सख्त कार्रवाई की जाए। यदि इस विशेषाधिकार को खत्म कर दिया जाता है, तो आतंकवादी इसका फायदा उठाने से नही चूकेंगे। यह आवश्यक है कि इस तरह के सख्त कानून हों, पर इसके दुरुपयोग पर दोषी जवान या अधिकारी को जो सजा मिले, उसकी सूचना घाटी के नागरिकों को मिले, ताकि उन्हें लगे कि उन पर अत्याचार करने वाले को आखिर सजा मिली। गंेद अब केंद्र सरकार के पाले में है, देखते हैं वह क्याकरती है। घाटी के नागरिकों की सुरक्षा के लिए वह जो भी कदम उठाएगी, वह निश्चित रूप से देशहित में होगा। यदि सरकार ऐसा नहीं कर पाती, तो सेना और पुलिस के अत्याचार के खिलाफ लोग और भी आक्रामक होने लगेंगे। युवा अपने हाथों में हथियार उठा लेंगे, तब जो भी होगा, बहुत बुरा होगा। ऐसी स्थिति तब और भयावह हो जाती है, जब कश्मीरी यह समझने लगे कि यह देश हमारा होते हुए भी पराया गन गया है। अपने ही देश में अपनों के साथ ही परायापन आखिर कब तक सहन होगा?
डॉ. महेश परिमल

रविवार, 20 नवंबर 2011

जागरण मैं प्रकाशित मेरे आलेख



























जागरण मैं प्रकाशित मेरे आलेख १२, १३ & १८ नव्म्बुर

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011
















शनिवार, 12 नवंबर 2011

सरकार की ठंड उड़ा देगा शीतकालीन सत्र



डॉ. महेश परिमल
ममता की धमकी, केरल हाईकोर्ट की नाराजगी, अन्ना की हुंकार, सहयोगी दलों के सांसदों की बेरुखी और मौके की ताक पर बैठे विपक्ष की बेकरारी यह संकेत करती है कि संसद का शीतकालीन सत्र सरकार की ठंड को उड़ा देगा। इस सत्र के दौरान अन्ना हजारे की भी अग्निपरीक्षा हो जाएगी। अभी तो सरकार चारों तरफ से घिरी हुई है। एक तरफ वह अपने ही साथियों की नाराजगी झेल रही है, दूसरी तरफ उसका पूरा प्रयास है कि अन्ना के साथियों में बिखराब आ जाए। सरकार जितना अधिक प्रयास करती है उलझनों से बाहर निकलने की, वह उसमें उतनी ही उलझती जा रही है। इसके बाद भी प्रणब मुखर्जी जैसे बड़े नेता यह कहने लगे कि महँगाई अभी और बढ़ेगी, तो आम आदमी का हौसला पस्त होने लगता है। यह अवश्य है कि उनके बयानों से व्यापारियों के पौ-बारह हो जाते हैं। वे जमाखोरी और कालाबाजारी में लिप्त हो जाते हैं।
इšार अन्ना हजारे की हुंकार के बाद उनके समर्थकों पर प्रहार तेज हो गए हैं। किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल ने धन वापस करके एक मिसाल तो पेश की ही है। फिर भी उन पर भ्रष्टाचार के आरोपों की झड़ी लगी ही है। पूरे देश की नजरें इस समय शीतकालीन सत्र पर है। इसमें यूपीए सरकार के अलावा टीम अन्ना की भी अग्निपरीक्षा होनी है। यह सच है कि कोई साल भर लगातार बोलता ही रहे, तो लोग उससे आजिज आ जाते हैं। पर लम्बी खामोशी के बाद यदि कुछ कहा जाता, तो उसका महत्व होता है। अन्ना हजारे ने 19 दिनों का मौन रखकर जब कुछ कहा, तो वह कांग्रेस के खिलाफ ही गया। इसका भी महत्व है। अब उन्होंने कहा है कि यदि जन लोकपाल बिल संसद के शीतकालीन सत्र में पारित नहीं किया गया, तो वे तीसरी बार अनशन करेंगे। उšार सरकार की पूरी कोशिश है कि सत्र के पहले अन्ना की टीम को किसी भी तरह से कमजोर कर दिया जाए। दिग्विजय सिंह की तीखी कटह्वार अभी भी चल ही रही है। अभी तक उस पर कोई अंकुश नहीं है। वे कांग्रेस प्रवक्ता से अधिक बोल रहे हैं। उन्होंने संघ परिवार पर हमला करते हुए यह भी कह दिया है कि संघ अपने तीसरे प्लान के अनुसार श्रीश्री रविशंकर को भी मैदान में उतारना चाहता है। अन्ना पर संघ परिवार का वरदहस्त है, इससे तो अन्ना के साथी भी इंकार नहीं कर रह हैं। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि हमें देश की कोई भी संस्था अपना समर्थन दे सकती है। इसमें गलत क्या है? दूसरी ओर अन्ना के साथी समय-समय पर संघ परिवार पर प्रहार करने से भी नहीं चूकते। अन्ना टीम और संघ परिवार के बीच कोई गुप्त समझौता हुआ है, इसका सबूत यही है कि भाजपाशासित उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी निशंक सरकार को पदभ्रष्ट करने के बाद खंडूरी सरकार अन्ना हजारे के मन मुताबिम लोकायुक्त बिल विधानसभा से पारित किया। मौनव्रत तोड़ने के बाद अन्ना ने उत्तराखंड सरकार की खूब प्रशंसा की और वहाँ जाने की भी इच्छा जताई। उत्तराखुड में जो लोकायुक्त बिल पारित किया गया, वह अन्ना हजारे के जन लोकपाल बिल के कार्बन कॉपी की तरह ही है। इस बिल में विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, सरकारी अधिकारी एवं न्यायाधीशों को भी दायरे में लाया गया है। उšार संसद में सरकार जो बिल लाने वाली है, वह अन्ना के मुताबिक न होने के कारण अन्ना ने अभी से ही अपनी भाषा को मुखर बना दिया है। सच तो यह है कि अब यदि अन्ना उसवास करते भी हैं, तो आमरण अनशन नहीं करेंगे, यह तय है। इस बार उन्होंने जो धमकी दी है, उसमें कहा गया है कि यदि शीतकालीन सत्र में जन लोकपाल बिल पास नहीं किया गया, तो वे पहले तीन दिनों तक प्रतीक उसवास रखेंगे, उसके बाद जिन पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहाँ जाकर वे कांग्रेस के खिलाफ चुनाव प्रचार करेंगे। यदि अन्ना अपनी पूरी ताकत से उक्त पांच राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ प्रचार करते हैं, तो यह रामलीला मैदान से भी अधिक हानिकारक साबित होगा। जिन पाँच राज्यों में चुनाव होने हैं, उसमें से चार तो ऐसे राज्य हैं, जहाँ कांग्रेस की सरकार ही नहीं है। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सरकार है, इस राज्य में दूसरे स्थान पर मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी है,भाजपा तीसरे और कांग्रेस चौथे स्थान पर है। कांग्रेस महामंत्री राहुल गांधी इस राज्य में अपनी स्थिति को मजबूत करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। यदि यहाँ के मतदाता अन्ना की सुनते हैं, तो कांग्रेस की रही सही आशाओं पर पानी फिर जाएगा, इसका पूरा फायदा भाजपा और मायावती को मिलेगा। इसके बाद बच जाते हैं, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर। इसमें से उत्तराखंड में तो भाजपा की सरकार है ही। पंजाब में अकाली दल के साथ भाजपा का समझौता है। उत्तराखंड में भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते वहाँ स्थिति डगमगा गई थी, पर समय रहते वहाँ मुख्यमंत्री बदलकर स्थिति को काफी हद तक अंकुश में लाया गया है। लोकायुक्त बिल पारित करके सरकार ने एक अच्छा कदम उठाया है, इसका पूरा लाभ चुनाव में मिलेगा, यह तय है। इन हालात में यदि अन्ना कांग्रेस प्रत्याशी के खिलाफ प्रचार करते हैं, तो इसका पूरा लाभ भाजपा को ही मिलेगा। गोवा में कांग्रेसी मोर्चे की सरकार है। यहाँ के मुख्यमंत्री दिगंबर कामथ भी भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं। उनके मंत्रिमंडल पर 25 जार करोड़ रुपए का खनिज घोटाला का आरोप है। गोवा के बाजू में ही स्थित कर्नाटक में जो खनिज घोटाला हुआ, उसमें मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा को अपने पद से हाथ धोना पड़ा, आज वे जेल की हवा खा रहे हैं। यहाँ अपनी छवि साफ करके भाजपा गोवा में कब्जा करना चाहती है। यहाँ भी यदि लोग अन्ना की सुनते हैं, तो इसका पूरा लाभ भाजपा को ही मिलेगा, इसमें कोई शक नहीं। ऐसे में यदि गोवा में भी भाजपा की सरकार आ जाए, तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है। अंत में बचता है पूर्वाेत्तर राज्य मणिपुर। यहां कांग्रेस की सरकार है, जो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुूई है। यहाँ की सरकार में सीपीआई और आरजेडी की भागीदारी है। हाल ही में आतंकवादियों द्वारा मणिपुर का हाईवे जाम कर देने से यह राज्य गंभीर आर्थिक स्थिति से जूझ रहा है। केंद्र सरकार बरसों से इस राज्य की उपेक्षा कर रही है। पर अब चुनाव करीब आते ही वह सक्रिय हो गई है। कांग्रेसी नेताओं ने मणिपुर की ¨चंता करनी शुरू कर दी है। यहाँ भाजपा सीमित है, इसलिए अन्ना की अपील का कोई असर होगा, कहा नहीं जा सकता।
भ्रष्टाचार के विरोध में टीम अन्ना की लड़ाई में जो पागलपन दिखाई दे रहा है,उसमें भी एक तथ्य है। इस तथ्य के अनुसार भाजपा और संघ परिवार का टीम अन्ना से क्या रिश्ता है, यह रहस्य के आवरण में है। टीम अन्ना के समर्थक यह मानते हैं कि अन्ना हजारे और उनके साथी संघ परिवार और भाजपा के नेटवर्क का चालाकीपूर्ण उपयोग करके अपना मिशन चला रहे हैं। दूसरी ओर संघ परिवार के समर्थक यह मानते हैं कि भाजपा और संघ परिवार ने टीम अन्ना का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है और वे संघ परिवार के एजेंडा के अनुसार ही चल रहे हैं। राजघाट में अन्ना हजारे ने अपने भाषण में कहा कि भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा यदि ग्रेजुएट है, तो कांग्रेस पीएचडी है। टीम अन्ना, कांग्रेस और भाजपा के बीच कितना प्यार और कितनी नफरत है, यह तो शीतकालीन सत्र में सामने आ ही जाएगा। बहरहाल देखना यह है कि कांग्रेस अन्ना के खिलाफ क्या कर सकती है? वैसे सरकार तो खुद ही उलझी हुई है। ममता का अड़ियलपन एक बार फिर सामने आ गया है। सहयोगी दल भी अपने तेवर दिखा रहा है। चुनाव आते ही समीकरण बदलने लगे हैं, सभी को जनता के सामने जवाब देने जाना है। कांग्रेस ने उन्हें कहीं का नहीं रखा। ममता ने तो अपनी ताकत दिखा दी, अन्य दल भी अपना पूरा जोर लगाएँगे ही। इन हालात में संसद का शीतकालीन सत्र देश को एक नए मोड़ पर ला देगा, इसकी पूरी संभावना है।
डॉ. महेश परिमल

शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

धार्मिक स्थलों में भगदड़ के पीछे है भक्तों की आतुरता
















नवभारत रायपुर बिलासपुर में आज प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 9 नवंबर 2011

कर्मभूमि से दूर होनी चाहिए जन्‍मभूमि


















आज भास्‍कर और हरिभूमि के संपादकीय पेज पर दो अलग अलग प्रवृत्तियों वाले आलेखों का प्रकाशन हुआ है।
लिंक



http://74.127.61.178/haribhumi/epapermain.aspx

रविवार, 6 नवंबर 2011

भूपेन दा को सुनते हुए............

















शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

अदालतें जब हो जाती हैं असहाय / 11/11/11 को लेकर इतनी आतुरता क्‍यों ?























जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण और हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख
लिंक
http://74.127.61.178/haribhumi/epapermain.aspx

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-11-04&pageno=9


गुरुवार, 3 नवंबर 2011

जनसंख्या विस्फोट से सांस्कृतिक संघर्ष की आशंका


डॉ. महेश परिमल

विश्व के सात अरबवें बच्चे का जन्म हो गया। इस अवसर पर खुशी मनाई जाए या दु:खी हुआ जाए। इस खबर से खुशी तो कम किंतु दु:ख अवश्य मनाया जा सकता है। आबादी अभी और बढ़नी ही है। लेकिन इसके साथ-साथ समाज में जो विषमताएँ आएँगी, वे बहुत ही भयावह होंगी। जनसंख्या विस्फोट से जिस सांस्कृतिक संघर्ष की शुरुआत होगी, वह त्रासदायी होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि देश में उत्तर और दक्षिण के बीच कटुता और वैमनस्यता में बढ़ोत्तरी होगी।
अब जब हम सात अरब हो चुके हैं, तो इसे भारतीय संदर्भ में देखें, तो स्पष्ट होगा कि देश के उत्तरी और दक्षिणी क्षेत्रों में वैमनस्यता बढ़ने के पूरे आसार हैं। दूसरी तरफ उत्तर से अकुशल कर्मचारियों का बहाव दक्षिण भारत की तरफ रहेगा। इससे सांस्कृतिक संर्घष बढ़ेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि विश्व की 17 प्रतिशत मानव आबादी में स्थान रखने वाला हमारा देश सदी के उत्तरार्ध के प्रारंभ में एक अरब 21 करोड़ से बढ़कर एक अरब 80 करोड़ की आबादी वाला देश बन जाएगा। इससे न केवल भौगोलिक विभाजन बल्कि सामाजिक, आर्थिक विभाजन की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इस प्रचंड जनसंख्या के साथ एक ओर भारत विश्व परिदृश्य में शहरीकरण की तरफ बढ़ेगा। शहरों की आबादी बेशुमार बढ़ेगी, इससे लोगों को हवा ओर पानी और पोषणयुक्त आहार के लिए भारी मशक्कत करनी होगी। यही वजह होगी, जब आर्थिक और सामाजिक स्तर पर लोग परस्पर झगड़ेंगे। तनाव बढ़ेंगे और अपराध को प्रश्रय मिलेगा।
बेंगलोर स्थित थिट टेंक इंस्टीटच्यूट फॉर सोशल एंड इकानॉमी चेंज (आईएसईसी) के जनसंख्या शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रोफेसर के.एस. जेम्स के अनुसार भारत के उत्तर क्षेत्र से अकुशल कर्मचारियों का प्रवाह दक्षिण की ओर होना शुरू हो गया है। अब शहरों में महिला कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ने लगी है। यह स्थिति कई विषमताओं को जन्म देगी। जैसे अपराध, सांस्कृतिक हमले, जातिगत तनाव आदि। पश्चिमी देशों का उल्लेख करते हुए प्रो. जेम्स कहते हैं कि वहाँ देर से शादी और बढ़ते तलाक के साथ-साथ बिना शादी के साथ-साथ रहने की जीवनशैली से पूरे समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं रहेगा। अंतरजातीय विवाह होने से परिवारों में विभिन्न जाति-धर्म के लोग परस्पर सांस्कृतिक विषमताएँ पैदा करेंगे। जिससे समाज में शांति का अभाव होगा।
आज जिस तरह से मायानगरी में उत्तर भारतीय या बिहारियों का विरोध हो रहा है, उससे कटुता बढ़ने के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं। उक्त राज्योंे में बेरोजगारी के कारण लोगों को हुजूम अन्य राज्यों के शहरों की ओर बढ़ रहा है। इससे वहाँ के मूल लोगों का अधिकार धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। वहाँ के लोग काम में कुशल होने के कारण अधिक मजदूरी की माँग करते हैं, जबकि वही काम कम कुशल व्यक्ति करता है, तो सामाजिक कटुता बढ़ना स्वाभाविक है। कम कुशल व्यक्ति कम मजदूरी में काम तो कर लेता है, पर उसका वह काम लंबे समय तक नहीं टिक पाता। इसे उपभोक्ता बाद में समझ पाता है। जब एक राज्य के लोग दूसरे राज्य में बढ़ने लगते हैं, तो उनमें एक राज्यीय होने की भावना को बल मिलता है। इससे एक नए समाज का निर्माण होता है। यह समाज जाति से परे होता है। इसमें राज्य का होना ही महत्वपूर्ण होता है। ये लोग एक होकर अपनी माँगे मनवाने के लिए मिलकर काम करते हैं। इससे अन्य राज्य के लोग भी प्रेरित होते है। फलस्वरूप मूल निवासियों में असुरक्षा की भावना बढ़ने लगती है। यही से शुरू होता है राज्यीय संघर्ष। आज मायानगरी में जो कुछ हो रहा है, वही अब बड़े स्तर पर जनसंख्या विस्फोट के बाद अन्य शहरों में भी होगा।
किसी घर में नए बच्चे का आगमन खुशी की बात होती है, लेकिन इसके साथ नई जिम्मेदारियां और चुनौतियां भी आती हैं। ज्ञात इतिहास में पहली बार सिर्फ 13 साल में आबादी एक अरब बढ़ गई है, तो इसका कारण अनेक क्षेत्रों में इंसान की कामयाबियां हैं। स्वास्थ्य की बेहतर देखभाल, बुनियादी चीजों की अधिक उपलब्धता एवं अप्राकृतिक मौतों में कमी के कारण आज मनुष्य का औसत जीवनकाल 68 साल है, जबकि 1950 में यह महज 48 साल था। इन्हीं वजहों से आबादी अभी और बढ़ेगी। अनुमान है कि 2080 के आसपास यह सवा नौ से लेकर दस अरब तक पहुंच सकती है। ज्यादा लोगों का मतलब खाद्यान्न, पानी और अन्य सुविधाओं की अधिक आवश्यकता के साथ-साथ धरती के तापमान में ज्यादा इजाफे का अंदेशा है, जिससे जलवायु परिवर्तन की चुनौती अधिक गंभीर हो सकती है। गौरतलब है कि दुनिया का हर छठा मनुष्य भारतवासी है। अगर दुनिया में अनाज या पानी की कमी गंभीर रूप लेती है तो उसकी सीधी मार भारत के जनजीवन एवं विकास की अपेक्षाओं पर पड़ेगी। इसलिए हमारे योजनाकारों को नई परिस्थितियों के लिए तैयार होना होगा। वैसे भी यह चुनौती अनंत नहीं है। परिवार नियोजन संबंधी आविष्कारों तथा मानव समाज में बढ़ती जागरूकता ने जनसंख्या वृद्धि की दर घटा दी है। आज विश्व जनसंख्या प्रतिवर्ष एक प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जबकि 1960 के दशक के आखिर तक यह दर दो फीसदी थी। 1970 में दुनिया में प्रति महिला 4.45 बच्चे का जन्म होता था, जो दर अब 2.45 तक गिर चुकी है। यह आशा वास्तविक है कि प्रति महिला 2.1 बच्चे की जन्म दर का लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाएगा, जिससे आबादी स्थिर हो जाएगी। यानी अगर निकट एवं मध्यकालीन भविष्य तक स्थितियों को संभाल लिया गया, तो फिर मानवता के सुखद भविष्य की उम्मीदों को साकार किया जा सकता है।
यह सच है कि जागरुकता बढ़ने लगी है। एक निरक्षर दम्पति भी दो से अधिक संतानों की चाहत नहीं रखते। यह एक सुखद संकेत है, लेकिन दुश्वारियों के बढ़ने से जीवन मूल्यों में आ रहे परिवर्तन से कोई भी अछूता नहीं है। सामाजिक चेतना के अभाव में राज्यों के बजट भी प्रभावित होने लगे हैं। आबादी सारी योजनाओं को धता बता देती है। ऐसे में जीवन के प्रति सकारात्मक नजरिये का दायरा बढ़े, तो कुछ बेहतर परिणामों की अपेक्षा की जा सकती है।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

बेलगाम जनसंख्‍या की चुनौती












दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
लिंक
http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2011-11-01&pageno=9#id=111725135231014738_49_2011-11-01

शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

फार्मूला वन का तमाशा






हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख

लिंक
http://74.127.61.178/haribhumi/epapermain.aspx

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

ईश्‍वर किसी गरीब को जेल न भेजे










दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में 26 अक्‍टूबर को प्रकाशित मेरा आलेख

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

नेक कोशिशों की एक दीपमालिका सजाऍं






दैनिक भास्‍कर के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2011

महकते पर्वों के दौर में रंग महँगाई का













लिंक

http://www.naidunia.com/epapermain.aspx

नई दुनिया रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

तो फिर शिवानी की हत्या किसने करवाई?



डॉ. महेश परिमल
दिल्ली हाईकोर्ट ने शिवानी की हत्या के आरोपी एव आईपीएस अधिकारी रविकांत शर्मा एवं अन्य तीनों आरोपियों को निर्दोष मानते हुए रिहा कर दिया है। तो प्रश्न यह उठता है कि जब रविकांत शर्मा निर्दोष है, तो फिर शिवानी की हत्या किसने करवाई। यदि इसमें भाजपा नेता प्रमोद महाजन का हाथ है, तो उन पर किसी तरह का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। उधर तीर्थ यात्रा करने की उम्र में रथयात्रा करने वाले लालकृष्ण आडवाणी लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ जाग्रत कर रहे हैं। ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि उन्होंने इस मामले में प्रमोद महाजन को संरक्षण नहीं दिया। उस समय के हालात तो यही कहते हैं किे उन्होंने प्रमोद महाजन को पूरा संरक्षण दिया। कर्नाटक के मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा को भी लंबे समय तक संरक्षण दिया गया। वहीं रेड्डी बंधुओं को सुषमा स्वराज ने संरक्षण दिया। इस तरह से भाजपा भी यदि भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देती रहेगी, तो फिर उससे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वह सत्ता पर आने के बाद भ्रष्टाचारियों को प्रोत्साहन नहीं देगी?
देश की राजधानी हाईप्रोफाइल लोगों और हाईप्रोफाइल हत्याओं की राजधानी बन गई है। जेसिका लाल, आरुषि तलवार और शिवानी भटनागर की रहस्यमय हत्याओं के कारण दिल्ली के धनाढच्य और विख्यात लोगों की जिंदगी में किस प्रकार के झंझावात आ रहे हैं और उन्हें किस तरह से संरक्षण देने की कोशिश की जा रही है, यह इससे ही पता चल जाता है। हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने शिवानी भटनागर की हत्या के मुख्य आरोपी 1976 बेच के आईपीएस अधिकारी रवि कांत शर्मा ने निर्दोष बरी कर दिया गया है। 1999 में हुई इस रहस्यमय हत्या के मामले में अब नया मोड़ आया है। इंडियन एक्सप्रेस की पत्रकार शिवानी का चरित्र भी शंका से परे नहेीं है। इस मामले में यह सामने आया है कि रविकांत शर्मा के अलावा तत्कालीन दूरसंचार मंत्री प्रमोद महाजन भी शिवानी से प्रेम करते थे। इस मामले में वीआईपी के शामिल होने के कारण आज की तारीख में यह तय नहीं हो पाया है कि आखिर शिवानी की हत्या किसने करवाई? इसके पूर्व जेसिका लाल की हत्या में तो यह भी कहा जा रहा है कि उनकी हत्या हुई भी है या नहीं? शिवानी के मामले में तो अभी बहुत कुछ सामने आना शेष है।
युवा और खूबसूरत शिवानी भटनागर खोजीे पत्रकार थी। पहले वह एशियन ऐज में काम करती थी। 1997 में इंडियन एक्सप्रेस के दिल्ली संस्करण में मुख्य संवाददाता के रूप में काम करना शुरू किया। उसे सीबीआई और इंटेलिजेंस बूयरो की बीट दी गई। अपनी जवाबदारी को पूरा करने के लिए वह प्रधानमंत्री के कार्यालय में होने वाली विभिन्न गतिविधियों पर नजर रखती थीं। इस दौरान उसकी पहचान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल के कार्यालय में कार्यरत ओएसडी यानी आफिसर ऑन स्पेशल डच्यूटी रविकांत शर्मा से हुई। शिवानी का पति राकेश भटनागर भी पत्रकार था, वह टाइम्स ऑफ इंडिया में बड़े पद पर था। दोनों दिल्ली के प्रतापगंज क्षेत्र में स्थित नवकुंज अपार्टमेंट में रहते थे। 22 जनवरी 1999 को जब शिवानी अपने घर में अकेली थी, तब उसकी हत्या की गई थी। उसके पहले दोपहर 3.30 बजे शिवानी ने अपने पति राकेश भटनागर को फोन पर बताया था कि चंडीगढ़ से प्रकाशित ट्रिब्यून से किसी व्यक्ति का शादी का कार्ड लेकर कोई आने वाला है। जब राकेश ने उक्त व्यक्ति से फोन पर बात की, तब उसने अपना नाम शर्मा बताया। उसी दिन जब शाम साढ़े पाँच बजे राकेश के जीजा बी.एस. भटनागर का फोन आया कि शिवानी घर का दरवाजा नहीं खोल रही है। तब राकेश ने दरवाजा बाहर से तोड़ देने की सलाह दी। उसके बाद राकेश के जीजाजी ने बताया कि शिवानी की किसी ने चाकू से घोंपकर हत्या कर दी है। खून से लथपथ उसकी लाश पड़ी है। जब राकेश घर आया, तब उसकी देखा कि शिवनी की लाश बेडरुम में पड़ी है और उसका गला कटा हुआ है। उसके गले पर किचन का एक चाकू और दूसरा चाकू उसके शरीर पर रखा हुआ है। इसके अलावा उसके शरीर के पास पीले रंग का एक वायर भी रखा हुआ था। इस घटना की जानकारी जब पुलिस को दी गई, तब 6.35 को पुलिस वहाँ पहुँची। शिवानी को पहले स्वामी दयानंद हास्पिटल और फिर बाद में अपोलो अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। पुलिस जाँच में यह सामने आया कि जो व्यक्ति शादी का कार्ड लेकर आने वाला था, उसी ने उसकी हत्या की है। यह व्यक्ति नवकुंज अपार्टमेंट में 2.40 बजे आया था और 3.10 बजे चला गया था। सोसायटी के रजिस्टर में उसने अपना नाम राजीव भटनागर और पता 311 ट्रिब्यून लिखा गया था। बाद में पता चला कि इस व्यक्ति का नाम प्रदीप शर्मा था और वह हरियाणा के एक भूतपूर्व पुलिस अधिकारी का संबंधी है। शिवानी के पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह पता चला कि उसकी हत्या गला दबाकर की गई थी, जब उसका गला काटा गया था, तब तक वह मर चुकी थी।
पुलिस जाँच में यह भी पता चला कि शिवानी के संबंध आईपीएस अधिकारी रविकांत शर्मा से भी थे। जब शिवानी की हत्या हुई, तब रविकांत मुम्बई एयर इंडिया के विजिलेंस अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। हत्या के तीन महीने पहले शिवानी जब लंदन गई थी, तब वह गर्भवती थी। वह मेटर्निटी लीव पर थी। इस दौरान रविकांत शर्मा ने उससे 90 बार फोन पर बात की थी। शिवानी ने भी उससे 196 बार फोन किया था। शिवानी की हत्या के ढाई वर्ष बाद तक पुलिस ने किसी की भी गिरफ्तारी नहीं की। 23 जुलाई 2002 को इस मामले में गुड़गाँव के होटल मालिक भगवान की धरपकड़ हुई। भगवान ने पुलिस को बताया कि शिवानी रविकांत शर्मा पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी, इसलिए उसने उसकी हत्या करवा दी। इसके करीब एक सप्ताह बाद 2 अगस्त को पुलिस ने भगवान के बयान के आधार पर प्रदीप शर्मा की गिरफ्तारी की। वास्तव में वह कंप्यूटर इंजीनियर है। उसने तीन लाख रुपए के लालच में शिवानी की हत्या कर दी। एडवांस के रूप में उसे केवल 50 हजार रुपए ही मिले थे। 17 अगस्त को पुलिस ने सत्यप्रकाश नाम तीसरे संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार किया। पुलिस ने रविकांत शर्मा को भगोड़ा साबित करते हुए उसके खिलाफ वारंट जारी किया। उसके बारे में जानकारी देने वाले को 50 हजार रुपए इनाम की भी घोषणा की गई। बाद में रविकांत शर्मा ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसके बाद उसे तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
रविकांत शर्मा जब भगोड़ा घोषित किए गए, तब उनकी पत्नी मधु ने एक पत्रकार वार्ता में यह चौंकाने वाला बयान दिया कि शिवानी की हत्या तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री प्रमोद महाजन ने करवाई थी। गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी उन्हें पूरा संरक्षण दे रहे थे। मधु ने यह भी जानकारी दी कि हत्या के दिन शिवानी और प्रमोद महाजन के बीच करीब 45 मिनट फोन पर बात हुई थी। मधु ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि शिवानी के पुत्र के वास्तविक पिता प्रमोद महाजन ही हैं। यदि बच्चे का डीएनए टेस्ट कराया जाए, तो यह बात सिद्ध हो सकती है। महाजन के मंत्री होने के कारण पुलिस ने यह तर्क दिया कि उसका इरादा किसी की निजी जिंदगी में दखल देना नहीं है। मधु ने यह भी माँग रखी कि प्रमोद महाजन का लाइ डिटेक्शन टेस्ट कराया जाए, पर पुलिस ने यह माँग भी ठुकरा दी। मधु का मानना था कि शिवानी की हत्या प्रमोद महाजन ने ही करवाई है, लेकिन उनके पति रविकांत शर्मा को बलि का बकरा बनाया गया है।
रविकांत शर्मा एवं अन्य तीन पर दिल्ली के सेशन कोर्ट में मुकदमा चला। प्रासिक्यूशन का मामला ऐसा था कि शिवानी भटनागर को रविकांत शर्मा ने सरकार के कई गुप्त दस्तावेज दिए थे। शिवानी शर्मा पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी, शर्मा इसके लिए तैयार नहीं थे। फिर शिवानी ब्लेकमेलिंग पर उतर आई। उसने शर्मा को धमकी दी कि यदि उसने शादी नहीं की, तो वह उन गुप्त दस्तावेज के आधार पर उसे बरबाद कर देगी। तब अपने रास्ते से हटाने के लिए रविकांत शर्मा ने शिवानी की हत्या करवा दी। 18 मार्च 2008 को ट्रायल कोर्ट ने रविकांत शर्मा एवं अन्य तीन को दोषी मानते हुए सजा सुनाई। रविकांत शर्मा शुरू से ही यह दलील दे रहे थे कि इस मामले में भूतपूर्व टेलीकॉम मंत्री प्रमोद महाजन की मिलीभगत है। मुझे नाहक ही फँसाया जा रहा है। अपनी इस दलील के साथ उसने ट्रायल कोर्ट के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया है कि रविकांत शर्मा ने शिवानी की हत्या का षडच्यंत्र रचा, इसका कोई सबूत नहीं मिला। हाईकोर्ट ने शिवानी की हत्या करने वाले प्रदीप शर्मा को छोड़कर अन्य तीनों आरोपियों को बरी कर दिया है। अब सवाल यह उठता है कि यदि रविकांत शर्मा सचमुच में निर्दोष हैं, तो शिवानी की हत्या किसने करवाई?
शिवानी भटनागर एक महत्वाकांक्षी पत्रकार थी। अन्य खोजी पत्रकारों की तरह वह भी पत्रकारिता के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती थी। इसके लिए उसने राजनीति और सरकारी नौकरी में उच्च पदों पर बैठे लोगों से मधुर संबंध बनाए। यही मधुर संबंध उसकी हत्या का कारण बने। दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का फैसला किया है। इससे स्पष्ट है कि यह मामला अभी और तूल पकड़ेगा। वैसे भी हमारे देश का इतिहास रहा है कि कभी किसी नेता या मंत्री को सजा नहीं हुई। उन्हें बेदाग बचाने की पूरी कोशिशें होती हैं। संभव है भविष्य में और कोई बलि का बकरा मिल जाए। जिससे इस मामले में फिर एक नया मोड़ आ जाए।
डॉ. महेश परिमल

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