बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

देश में कई हैं छोटे-छोटे औरंगाबाद!


डॉ. महेश परिमल
भारत एक गरीब देश है, यह बात अब सच दिखाई नहीं देती। पर यह भी सच है कि भारत देश में गरीब लोग रहते हैं। हर देश की तरह हमारे देश में गरीबों की संख्या अमीरों से बहुत अधिक है। पर अमीर इस तरह से समाज में छा गए हैं कि उन्हें न तो गरीब दिखाई देते हैं और न ही गरीबी। इंडिया और भारत की विभाजन रेखा यहीं से शुरू होती है। हाल ही में यह पता चला कि औरंगाबाद में 151 मर्सीडीज कारों का ऑर्डर मिला है। यूं तो बेशकीमती गाड़ियों के शो रूम केवल मेट्रोपोलिटन सिटी में ही होते हैं। जैसे दिल्ली, मुम्बई, बेंगलोर आदि में, पर अब औरंगाबाद जैसे विकसित शहर में भी इस तरह के शो-रूम दिखाई देने लगे हैं। इस तरह से देश में कई और औरंगाबाद हो गए हैं। इन लक्जरी गाड़ियों के कारण छोटे-छोटे शहरों से भी बड़ी गाड़ियों की माँग बढ़ने लगी है।
देश में अमीरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। 24 करोड़ की सम्पत्ति के मालिकों की संख्या अगले दो साल के अंदर तीेगुनी होने वाली है। लक्जरी और ब्रांडेड चीजों का क्रेज लगातार बढ़ रहा है। अब मध्यमवर्गीय परिवार भी मारुति कार खरीदने की कूब्बत रखता है। देश में एक करोड़ मारुति कार है, इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश में अमीरों की संख्या कितनी तेजी से बढ़ रही है। देश में केवल मारुति ही नहीं, बल्कि अन्य कारों के मॉडलों की बिक्री लगातार बढ़ रही है। देश में फरारी, पोत्र्श, बीएमडब्ल्यू आदि कारों की बिक्री बेतहाशा बढ़ी है। उच्च मध्यमवर्ग और धनकुबेरों में लक्जरी कार खरीदने का क्रेज बढ़ा है। महँगाई की मार से भले ही आम आदमी कराहता हो, पर जिस तरह से लक्जरी चीजों का बाजार फैल रहा है, इससे लगता है कि इसी विरोधाभास के कारण समाज दो भागों में विभाजित हो गया है। इसमें से एक वर्ग ऐसा है, जो केवल सौ रुपए के बूट पहनता है, दूसरा वगअपने बूट के लिए दस हजार रुपए खर्च कर सकता है।
देश में समृद्धि बढ़ने के साथ-साथ लक्जरी चीजों की खरीदी में भी वृद्धि हुई है। इंटरनेशनल ब्रांडेड आइटमों को खरीदने में लोग अधिक रुचि लेने लगे हैं। ये केवल बड़े शहरों की ही बात नहीं है, छोटे शहरों में भी इस तरह की चीजों की माँग बढ़ने लगी है। इसमें विशेष रूप से यंग जनरेशन में इस तरह की चीजों के प्रति विशेष रूप से आकर्षित है। हाल का सर्वेक्षण बताता है कि भारत की औसतन आय 50 हजार रुपए है। एक तरफ देश में रिटेल क्षेत्र में एफडीआई पर संसद की मंजूरी नहीं मिली है। यह विवाद जारी है। दूसरी तरफ ब्रांडेड आइटम्स के लिए लोग मुँहमाँगा दाम देने को तैयार हैं। रिटेल क्षेत्र में एफडीआई को लेकर यह कहा जा रहा था कि इससे स्थानीय स्तर के छोटे व्यापारियों को नुकसान होगा, पर लक्जरी आइटम खरीदने के लिए और उसके सेंटर की स्थापना करने की स्पर्धा जारी है। जो नए-नए करोड़पति हुए हैं, उनमें ब्रांडेड चीजों के प्रति विशेष लगाव देखा जा रहा है। ऐसे बाजार को इन्हीं लोगों से प्रोत्साहन मिला है। एक अंदाज के अनुसार भारत में लक्जरी मार्केट हर साल 20 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। 2012 में इस मार्केट ने 8 अरब डॉलर को छू देगा, ऐसा विश्वास किया जा रहा है। देश में ब्रांडेड आइटम्स की चीजों का बाजार पिछले 5 वर्ष में अधिक बढ़ा है। युवाओं में ही इस तरह की चीजों का रुझान बढ़ा है। वे भी ब्रांडेड चीजों को खरीदने का आग्रह रखते हैं।
देश में लक्जरी चीजों की खूब बिक्री हो रही है। पिछले 5 महीनों में 20 फरारी, एक वर्ष में 300 पोत्र्श और 151 मर्सीडीज गाड़ियों की बिक्री हुई है। प्राइवेट लक्जरी प्लेन भी हमें आकाशीय मार्ग में देखने को मिल जाएँगे। केवल कानपुर जैसे शहर में ही दस पोत्र्श गाड़ियों की खरीदी हुई है। अब ब्रांडेड चीजों के शो रूम मुम्बई, दिल्ली और बेंगलोर ही हो, ऐसी बात नहीं है। अब तो छोटे शहर भी इसमें शामिल होने लगे हैं। औरंगाबाद में एक व्यापारी ने अपने मित्रों के साथ एक वर्ष पहले 151 मर्सीडीज बेंज का ऑर्डर दिया, तो सभी को आश्चर्य हुआ। आजकल लक्जरी चीजों के खरीदने वाले बड़े शहरों में ही नहीं होते। महँगी चीजें खरीदने वाले 50 प्रतिशत लोग छोटे शहरों में ही रहते हैं। देश में छोटे-छोटे औरंगाबाद बनने लगे हैं। ऐसे ही एक छोटे शहर के बड़े उद्योगपति के पास महँगी कारों का काफिला है। वे सोमवार से रविवार तब अलग-अलग गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं। उनके काफिले में पोत्र्श, मर्सीडीस, एस एंड सी क्लास, ओडी आदि का समावेश होता है। कार के ऐसे शौकीन अहमदाबाद और लुधियाना जैसे शहरों में भी रहते हैं।
यहाँ केवल लक्जरी कारों की ही बात नहीं की जा रही है। घड़ी से लेकर शूज तक और बाइक से लेकर आधुनिक सुविधाओं से युक्त चीजों का समावेश किया जा रहा है। ईश्वर की मूर्ति से लेर बूट-चप्पल तक की खरीदी के लिए लोग ऊँची रकम देने में नहीं हिचकते। एक बार चीज भा गई, फिर उसे खरीदने का जो जुनून आज दिखाई देता है, वह पहले दिखाई नहीं देता था। इसी जुनून के कारण लक्जरी आइटम का बाजार दिनों-दिन प्रगति कर रहा है। हमारे यहाँ एक बंगला बने न्यारा का सपना हर कोई देखता है, पर पुणो, बेंगलोर, हैदराबाद, दिल्ली जैसे शहरों में अब महल जैसे बंगले बन रहे हैं और उसे खरीदने के लिए लोगों की लाइन लगती है। यही स्थिति होटल उद्योग की है। इसी तरह घड़ी, वोल पेपर, टेबल लैम्प आदि चीजों के भी इंटरनेशनल ब्रांड हैं। इन चीजों का एक विशेष वर्ग है। इंटरनेशनल ब्रांड में बेलेंसीगा (चश्मा), लोजीनीस (वॉच), लाड्रो (हेप्पीनेसपीस), चेनली (व्हाइज नवाज कलेक्शन), क्रिश्चयन लोबुटीन (लेग्ज सेंडल), बरबेरी (बूट) आदि का समावेश होता है। एक अंदाज के मुताबिक देश में 25 करोड़ की सम्पत्ति के मालिकों की संख्या 2014 तक तीगुनी हो जाएगी। जो यह बताता है कि देश में लक्जरी मार्केट का बाजार बहुत ही तेजी से बढ़ेगा। इंटरनेशनल लक्जरी ब्रांड की एफडीआई 51 प्रतिशत होने के कारण इंटरनेशनल ब्रांड के लिए ग्राहक को देश से बाहर नहीं जाना पड़ता। एक तरपु बेल्ट, वोलेट, परफ्यूम, बेग्स, वॉच आदि की माँग है, तो ढाई लाख से साढ़े चार लाख रुपए की पेन की भी माँग है। इसके चलते यह कहा जा सकता है कि हमारा देश अब कतई गरीब नहीं रहा। लोगों के पास धन अथाह है, जो अपनी गति से आ रहा है। यह धन कब, कहाँ, कैसे, किस तरह से लोगों तक पहँुच रहा है, यह भले ही शोध का विषय हो, पर यह सच है कि हमारे देश में आज एक आफिस का चपरासी भी दस करोड़ और एक क्लर्क 40 करोड़ की सम्पत्ति का मालिक होता है।
 डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

नदी जोड़ो सुस्‍ती पर सुप्रीमकोर्ट की तल्‍खी

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

जिंदगी में सारा खेल विश्‍वास का है

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

आखिर किंगफिशर पर इतनी मेहरबानी क्यों?

डॉ. महेश परिमल
किंगफिशर एयरलाइंस लगातार बदनाम होती जा रही है। बिना बताए उसकी कई उड़ानें लगातार रद्द होती जा रही हैं। लोग परेशान हैं, यही नहीं उसके कई पायलट भी इस अव्यवस्था से परेशान होकर इस्तीफा दे चुके हैं। सभी जानते हैं कि यह एयरलाइंस कंपनी का दिवाला निकलने वाला है, फिर भी इसे अनजानी सहायता मिल ही रही है। इसमें भले ही सरकार प्रत्यक्ष रूप से न जुड़ी हो, नागरिक उड्डयन मंत्री अजित सिंह का बयान भी आ गया हो, पर जिस तरह से विजय माल्या व्यवहार कर रहे हैं, इससे लगता है कि किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं से सरकार का उन पर वरदहस्त है। आखिर कुछ तो बात होगी, जिसके कारण किंगफिशर के 464 करोड़ रुपए के शेयर 750 करोड़ रुपए में राष्ट्रीयकृत बंकों ने खरीदे। इससे एयर लाइंस को तो लाभ ही हुआ, पर निवेशकों को हानि उठानी पड़ी।
किंगफिशर की माली हालत दिनों-दिन खराब होती जा रही है, इसे सभी जानते हैं, इसके बाद भी उद्योगपति विजय माल्या की बिगड़ी हुई संतान की तरह यह कंपनी करदाताओं के धन से ऐश करती रही, यह बहुत कम लोगों का पता है। कोई भी यात्री जब किंगफिशर में यात्रा करता है, तो उससे टिकट के उपरांत भी सर्विस टैक्स के नाम पर कुछ और राशि वसूल की जाती है। इस सर्विस टैक्स को उन्हें सरकारी तिजोरी में डालना चाहिए, पर कंपनी ऐसा नहीं करती। इस राशि को अनाप-शनाप रूप से खर्च कर दिया जाता था। इस बात की जानकारी जब सर्विस टैक्स विभाग को मिली, तब उन्होंने किंगफिशर के बैंक के सारे खातों को सील कर दिया। इस कारण कंपनी अपने पायलटों को वेतन नहीं दे पाई। इसलिए कई पायलट नौकरी छोड़कर जाने लगे। इस कारण किंगफिशर की कई उड़ानें रद्द करनी पड़ी, यह सिलसिला लगातार अब भी जारी है। हालत यह है कि ¨कंगफिशर में हजारों यात्रियों ने पहले से ही धन जमा करके अपनी सीट बुक करवा ली है, वे अब परेशान हैं। पिछले साल नवम्बर से ही यह जानकारी मिलने लगी थी कि किेंगफिशर की देनदारियाँ लगातार बढ़ रहीं हैं। इसके बाद भी किंगफिशर के मालिक विजय माल्या ने किसी तरह से तिकड़म करके एयरलाइंस को चलाए रखा। लेकिन अब लगता है कि वे भी इससे आजिज आ चुके हैं। किंगफिशर अब अपनी अंतिम साँसें ले रहा है।
आज की स्थिति में किंगफिशर देश के विभिन्न शहरों में रोज करीब 240 फ्लाइट चला रहा है। रविवार को उसकी 80 फ्लाइट रद्द हो गई थी, उसके बाद करीब 40 फ्लाइट रोज ही रद्द हो रही है। केंद्र के नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने जब किंगफिशर को एयरलाइंस का लायसेंस दिया, तब यह शर्त रखी थी कि सरकार की अनुमति के बिना वह एक फ्लाइट भी रद्द नहीं कर सकती। अब उसकी फ्लाइट लगातार रद्द हो रही है, लेकिन इसकी जानकारी न तो सरकार को है और न ही यात्रियों को। उधर आइल कंपनियों ने किंगफिशर को फ्यूल देना बंद कर दिया, दूसरी ओर पायलट भी लगातार इस्तीफा देते जा रहे हैं। इसके बाद भी किंगफिशर पर सरकार ने अभी तक किसी तरह की कार्रवाई नहीं की है। इसकी जगह कोई दूसरी एयरलाइंस होती, तो उस पर कई बार कार्रवाई हो चुकी होती। इस समय किंगफिशर की देनदारी कुल 7 हजार करोड़ रुपए की है। इसमें से 1400 करोड़ रुपए माफ करने की खबर है। पिछले साल इसी तरह किंगफिशर ने 1027 करोड़ रुपए का नुकसान किया था। सन 2003 में जब इस एयरलाइंस की स्थापना की गई थी, तब से अब तक कंपनी ने कुल 5690 करोड़ रुपए का नुकसान किया है। इसके बजाए कोई दूसरी कंपनी होती, तो वह कब की बंद हो गई होती।
किंगफिशर ने आइल कंपनियों से 890 करोड़ रुपए का ईंधन खरीदा है। पर उसका भुगतान नहीं किया है। इस कारण बीपीसीएल और एचपीसीएल नामक कंपनियों ने किंगफिशर को ईंधन देना ही बंद कर दिया। अभी इंडियन आइल कंपनी किंगफिशर को धन प्राप्त करने के बाद ही ईंधन दे रही है। बीपीसीएल ने ईंधन की राशि चुकाने के लिए किंगफिशर के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है। किंगफिशर की अनियमितता केवल इस क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि एयरपोर्ट अथारिटी के क्षेत्र में भी देखी गई। नियम यह है कि किसी भी एयरपोर्ट पर कोई भी निजी विमान को उतारना हो, तो उसके लिए एयरपोर्ट अथारिटी को एक निश्चित राशि चुकानी होती है। इस राशि को चुकाने के मामले में भी किंगफिशर लगातार अनियमितताएँ कर रही है। हाल ही में किंगफिशर ने एयरपोर्ट अथारिटी को जो 151 करोड़ का चेक दिया था, वह बाउंस हो गया। आज की तारीख में एयरपोर्ट को किंगफिशर से कितनी रकम लेनी है, यह किसी को पता नहीं है। किंगफिशर के पास ऐसी कोई सम्पत्ति नहीं है, जिसे गिरवी रखकर वह अपनी पूँजी बना सके। उसके पास जितने भी विमान हैं, वे सभी किराए से लिए हुए हैं। आश्चर्य इस बात का है कि किंगफिशर इन विमानों का किराया भी नहीं चुका पा रही है। कुछ दिनों पहले ही कंपनी ने किराए के 5 विमान वापस करने पड़े। 2009 के बाद अब तक कुल 19 विमान कंपनी वापस कर चुकी है। सरकार को इतना जंगी नुकसान पहुँचाने वाली यह कंपनी अब तक कैसे चल रही है, यह समझ से परे है। संभव है कि इसमें भी 2 जी स्पेक्ट्रम जैसा कोई कांड छिपा हो।
सन् 2003 में जब किंगफिशर एयरलाइंस की स्थापना हुई, तब से यह केवल नुकसान में ही अपना काम कर रही है। सन 2005-2006 में काफी बदनाम रही एयर इंडिया ने भी लाभ कमाया, पर किंगफिशर कभी फायदे में नहीं रही। किंगफिशर के प्रेसीडेंट विजय माल्या बार-बार कहते रहे हैं कि वे करदाताओं के धन से एयरलाइंस नहीं चलाना चाहते। पर सच्चई यही है कंपनी को उबारने के लिए जिन राष्ट्र्रीयकृत बैंकों ने पैकेज के रूप में करोड़ों का कर्ज दिया है, उन बैंकों के करोड़ों रुपए डूब चुके हैं। इसके अलावा जिन पूँजी निवेशकों ने यूबी समूह के शेयरों में निवेश किया है, उनका धन डूबत खाते में चला गया है। सन् 2010 में सकरारी बैंकों ने किंगफिशर को दिए गए धन को वसूलने के लिए जब सख्ती की, तब विजय माल्या ने सभी बैंकों के मैनेजरों की बैठक बुलाई। उसके बाद किंगफिशर को उबारने के लिए पैकेज की घोषणा की गई। उस समय किंगफिशर की देनदारियाँ कुल 8414 करोड़ रुपए थी। इस देनदारी को चुकाने के लिए कंपनी के 23 प्रतिशत शेयर बैंकों को देकर देनदारियों को चुकता करने का वादा किया गया। इन शेयरों की बाजार कीमत उस समय 750 करोड़ रुपए आंकी गई थी। इस तरह से किंगफिशर का एक शेयर बैंकों को 64.48 रुपए में पड़ा। मजे की बात यह है कि उस समय किंगफिशर के शेयरों के भाव बाजार में 39.90 रुपए थी। इस तरह से बैंकों ने किंगफिशर के 464 करोड़ रुपए के शेयरों को 750 करोड़ रुपए में खरीदे। सीधे शब्दों में कहा जाए, तो बैंकों ने किंगफिशर को 284 करोड़ रुपए की भेंट दे दी। इस सौदे से विजय माल्या की मानो लाटरी ही लग गई। बैंकों द्वारा इस तरह से किंगफिशर को उपकृत करने के बारे में पूछा गया, तो बैंकों का कहना था कि यह सच है कि हमने किंगफिशर के कम कीमत के शेयरों को अधिक दाम में खरीदा, पर हमें आशा थी कि उनके शेयरों के दाम शीघ्र ही बढ़ेंगे। पर ऐसा हो नहीं पाया, आज किंगफिशर के शेयरों की कीमत 25 रुपए है। इस तरह से राष्ट्रीयकृत बैंकों को कुल 3000 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। यही नहीं बैंकों ने कंपनी को लाभ पहुँचाने के लिए कर्ज की ब्याज दर भी दो से ढाई प्रतिशत कम कर दी। इससे बैंकों को अब हर वर्ष 150 से 180 करोड़ रुपए का नुकसान होगा। इस महीने में किंगफिशर कई बैंकों के करीब 450 करोड़ रुपए की पूँजी हजम कर चुकी है।
किंगफिशर को कई बार उनकी अनियमितताओं को ध्यान न देते हुए उसे तरजीह दी गई है। कंपनी को उबारने के लिए बैंकों के माध्यम से उसे 1000 करोड़ रुपए का लोन भी दिया गया। इसके बाद भी कंपनी उबर नहीं पाई। कंपनी को अभी भी यह आशा है कि सरकार की तरफ से उसे निश्चित रूप से और सहायता मिलेगी और कंपनी उबर जाएगी। पर उड्डयन मंत्री अजित सिंह ने जिस तरह से बयान दिया है, उससे नहीं लगता कि कंपनी को अब और राहत दी जाएगी। श्री सिंह ने किंगफिशर को और अधिक पैकेज देने से इंकार किया है। एक निजी एयरलाइंस कंपनी लगातार सरकार का नुकसान करे, तो क्या सरकार का कोई कर्तव्य नहीं है कि उस पर किसी तरह की कार्रवाई करे? आखिर किंगफिशर ने जो भी नुकसान किया है, उसका खामियाजा वह स्वयं ही भुगते। पर इस मामले में ऐसा नहीं है, उसका खामियाजा कंपनी के शेयरधारक भुगत रहे हैं। आखिर किसके आदेश से बैंकों ने भी किंगफिशर को इतनी अधिक प्राथमिकता दी कि जब उसके शेयरों के बाजार भाव 39 रुपए चल रहे हों, तब 64 रुपए में खरीदने की क्या आवश्यकता थी? कहीं बैंकों के उच्च पदस्थ अधिकारी किसी कांड में तो लिप्त नहीं हैं? जिससे किंगफिशर को लगातार सहूलियतें मिलती रही और कंपनी इसका बेजा लाभ उठाती रही? आखिर कहीं कुछ तो है, जिससे न केवल सरकार बल्कि बैंकें भी विजय माल्या के आगे नतमस्तक हो गई।
डॉ. महेश परिमल

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2012

हरिभूमि और नवभारत में प्रकाशित मेरे आलेख

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

अधिकारों पर अंकुश लगाना होगा




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
लिंक http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-02-22&pageno=9#id=111733901832393290_49_2012-02-22

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

देश की नदियों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा!

डॉ. महेश परिमल
अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुए आतंकवादी हमले में जितने लोग मारे गए, उतने इंसान तो रोज गंदा पानी पीने से मर जाते हैं। हमारे देश में 20 करोड़ लोग ऐसे हैं, जो अशुद्ध पानी पीते हैं। पानी के लिए झगड़े, फसाद होते रहे हैं, पर अब जल्द ही युद्ध भी होने लगेंगे। इस क्षेत्र में दबे पाँव बहुराष्ट्रीय कंपनियों आ रही हैं, जिससे हालात और भी खराब होने वाले हैं। सरकार इस दिशा में इन्हीं विदेशी कंपनियों के अधीन होती जा रही है। इस कार्य में विश्व बैंक की अहम भूमिका है।
कुछ समय पहले ही जर्मनी की राजधानी बोन में पानी की समस्या को लेकर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में 130 देशों के करीब 3 हजार उपस्थित थे। इस समेलन में चौंकाने वाली जानकारी यह दी गई कि 21 वीं सदी में जिस तरह से टैंकर और पाइप लाइनों से क्रूड आयल का वितरण किया जा रहा है, ठीक उसी तरह पानी का भी वितरण किया जाएगा। बहुत ही जल्द पानी के लिए युद्ध होंगे। विश्व में 1.30 अरब लोग ऐसे हैं, जिन्हें पीने का साफ पानी नहीं मिल रहा है। अशुद्ध पानी से विश्व में रोज 6 हजार मौतें हो रहीं हैं। हालात ऐसे ही रहे, तो पूरे विश्व में पानी सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाएगा। हमारी पृथ्वी में जितना पानी है, उसका 97 प्रतिशत समुद्र के खारे पानी के रूप में है। केवल 3 प्रतिशत पानी ही मीठा और पीने लायक है। इसमें से 25 प्रतिशत हिमनदियों में बर्फ के रूप में जमा हुआ है। इस तरह से कुल5 प्रतिशत पानी ही हमारे लिए उपलब्ध है। इसमें से भी अधिकांश भाग अमेरिका और केनेडा की सीमाओं पर स्थित बड़े-बड़े तालाबों में है। शेष विश्व में बढ़ती जनसंया, शहरीकरण, औद्योगीकरण और प्रदूषण के कारण पानी के ज्ञात स्रोतों में लगातार कमी आ रही है। देश के कई राज्यों में पानी के लिए दंगे होना शुरू हो गए हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया में प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष 3 हजार घनफीट जितना पानी ही लोगों को मिल पाएगा। इसमें भी भारत की आवश्यकता औसतन 2,500 घनमीटर ही है।
उत्तर प्रदेश में यह परंपरा है कि कन्या द्वारा जब कुएँ की पूजा की जाती है, तभी लग्न विधि पूर्ण मानी जाती है। अब तो कुओं की संया लगातार घट रही है, इसलिए गाँवों में कुएँ के बदले टैंकर की ही पूजा करवाकर लग्नविधि पूर्ण कर ली जाती है। लोगों ने समय की जरुरत को समझा और ऐसा करना शुरू किया। पर पानी की बचत करनी चाहिए, इस तरह का संदेश देने के लिए कोई परंपरा अभी तक शुरू नहीं हो पाई है, यदि शुरू हो भी गई हो, तो उसे अमल में नहीं लाया गया है। जब तक हमें पानी सहजता से मिल रहा है, तब तक हम इसकी अहमियत नहीं समझ पाएँगे। हमारे देश में पानी की समस्या दिनों-दिन गंभीर रूप लेती जा रही है। देश में कुल 20 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिन्हें पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। पेयजल के जितने भी स्रोत हैं, उसमें से 80 प्रतिशत स्रोत उद्योगों द्वारा छोड़ा गया रसायनयुक्त गंदा पानी मिल जाने के कारण प्रदूषित हो गए हैं। इसके बावजूद किसानों को यह सलाह दी जाती है कि वे ऐसी फसलों का उत्पादन करें, जिसका दाम अधिक मिलता हो। किसानों को राजनैतिक दलों द्वारा वोट की खातिर मुत में बिजली दी जाती है, जिससे वे अपने बोरवेल में पंप लगाकर दिन-रात पानी निकालते रहते हैं। इससे भूगर्भ का जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। इससे हजारों कुएँ नाकारा हो जाते हैं। पानी की कमी के कारण भारत का कृषि उत्पादन भी लगातार घट रहा है। यही कारण है कि हम अब बनाज का आयात करने लगे हैं।
देश को जब आजादी मिली, तब एक-एक गाँवों में पीने के पानी का कम से कम एक स्रोत तो ऐसा था ही, जिससे पूरे गाँव की पेयजल समस्या दूर हो जाती थी। जहाँ पेयजल समस्या होती थी, सरकारी भाषा में इन गाँवों को ‘नो सोर्स विलेज’ कहा जाता है। सन् 1964 में ‘नो सोर्स विलेज’ की संया 750 थी, जो 1995 में बढ़कर 64 हजार से ऊपर पहुँच गई। इसका आशय यही हुआ कि आजादी के पहले जिन 64 हजार गाँवों के पास अपने पेयजल के स्रोत थे, वे सूख गए। या फिर औद्योगिकरण की भेंट चढ़ गए। बड़ी नदियों पर जब बाँध बनाए जाते हैं, तब नदी के किनारे रहने वालों के लिए मुश्किल हो जाती है, उन्हें पीने के लिए पानी नहीं मिल पाता। शहरों की नगर पालिकाएँ नदी के किनारे बहने वाले नालों में गटर का पानी डालने लगती है, इससे सैकड़ों गाँवों में पीने के पानी की समस्या उत्पन्न हो जाती है। उद्योग भी नदी के किनारे ही लगाए जाते हैं। इससे निकलने वाला प्रदूषणयुक्त पानी नदी के पानी को और भी प्रदूषित बनाता है। इस पानी को पीने वाले अनेक बीमारियों का शिकार होते हैं। पानी को इस तरह से प्रदूषित करने वाले उद्योगपतियों को आज तक किसी प्रकार की सजा नहीं हुई। नगर पालिकाएँ भी गटर के पानी को बिना शुद्ध किए नदियों में बहा देने के लिए आखिर क्यों छूट मिली हुई है। इस दिशा में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड खामोश है।
देश को जब आजादी मिली, तब देश की जल वितरण व्यवस्था पूरी तरह से प्रजा के हाथ में थी। हरेक गाँव की ग्राम पंचायत तालाबों एवं कुओं की देखभाल करती थी, ग्रामीण नदियों को प्रकृति का वरदान समझते थे, इसलिए उसे गंदा करने की सोचते भी नहीं थे। आजादी क्या मिली, सभी नदियों पर बाँध बनाने का काम शुरू हो गया। लोगों ने इसे विकास की दिशा में कदम माना, पर यह कदम अनियमितताओं के चलते तानाशाहीपूर्ण रवैए में बदल गया। नदियाँ प्रदूषित होती गई। अब इन नदियों को प्रदूषणमुक्त करने की योजना बनाई जा रही है। इसकी जवाबदारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दी जा रही है। देश की प्रजा का अरबों रुपए अब इन कंपनियों के पास चला जाएगा। कुछ सपन्न देशों में नदियों की देखभाल निजी कंपनियाँ कर रही हैं। विश्व की दस बड़ी कंपनियों में से चार कंपनियाँ तो पानी का ही व्यापार कर रही हैं। इन कंपनियों में जर्मनी की आरडब्ल्यूई, फ्रांस की विवाल्डो और स्वेज लियोन और अमेरिक की एनरॉन कापरेरेशन का समावेश होता है। एनरॉन तो अब दीवालिया हो चुकी है, पर इसके पहले उसने विभिन्न देशों में पानी का ही धंधा कर करीब 80 अरब डॉलर की कमाई कर चुकी है। माइक्रोसाप्ट कंपनी द्वारा जो वार्षिक बिक्री की जाती है, उससे चार गुना व्यापार एनरॉन कंपनी ही करती थी।
हमारे देश में पानी की तंगी होती है, लोग पानी के लिए तरसते हैं, उसमें भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वार्थ है। देश के दिल्ली और मुबई जैसे महानगरों में जल वितरण व्यवस्था की जिमेदारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को देने की पूरी तैयारी हो चुकी है। इन कंपनियों के एजेंट की भूमिका विश्व बैंक निभा रहा है। किसी भी शहर की युनिसिपलिटी अपनी जल योजना के लिए विश्व बैंक के पास कर्ज माँगने जाती है, तो विश्व बैंक की यही शर्त होती है कि इस योजना में जल वितरण व्यवस्था की जवाबदारी निजी कंपनियों को सौंपनी होगी। विश्व बैंक के अनुसार निजी कंपनी का आशय बहुराष्ट्रीय कंपनी ही होता है। इन्हीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारे पर ही हमारे देश की जल नीति तैयार की जाती है। इस नीति के तहत धीरे-धीरे सिंचाई के लिए तमाम बाँधों और नदियों को भी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंप दिया जाएगा। यह भी एक तरह की गुलामी ही होगी, क्योंकि एक बार यदि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनी को पेयजल वितरण व्यवस्था की जिमेदारी दे दी गई, तो फिर पानी की गुणवत्ता और आपूर्ति की नियमितता पर सरकार को कोई अंकुश नहीं रहता। पानी का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों को अरबों रुपए की रिश्वत देकर यह ठेका प्राप्त करती हैं। पानी का व्यापार करने वाली इन कंपनियों पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लग चुके हैं। महानगरों की जल वितरण व्यवस्था को भी इन कंपनियों ने भ्रष्टाचार के सहारे ही अपने हाथ में लिया है।
महाराष्ट्र सरकार ने 2003 में एक आदेश के तहत अपनी नई जल नीति की घोषणा की थी। इस नीति के अनुसार सभी जल परियोजनाएँ निजी कंपनियों को देने का निर्णय लिया गया है। विधानसभा में इस विधेयक को पारित भी कर दिया गया। इस विधेयक के अनुसार महाराष्ट्र स्टेट वॉटर रेग्युलेटरी अथारिटी की रचना की गई, इसका कार्य नदियों के बेचे जाने वाले पानी का भाव तय करना है। इस तरह से पिछले 5 वर्षो से सरकार राज्य की नदियाँ बेचने के मामले में कानूनी रूप से कार्यवाही कर रही है। देर से ही सही, प्रजा को सरकार की इस चालाकी की जानकारी हो गई है। फिर भी वह लाचार है। यह तो तय है कि महाराष्ट्र की नदियों का निजीकरण करने की योजनाओं के पीछे विश्व बैंक और पानी का अरबों डॉलर का व्यापार करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों का ही हाथ है। विश्व बैंक ने 5 साल पहले महाराष्ट्र सरकार को पानी के क्षेत्र में सुधार के लिए 32.5 करोड़ डॉलर का कर्ज दिया था। कर्ज के साथ यह शर्त भी जुड़ी थी कि महाराष्ट्र सरकार अपनी अपनी नदियों और जल परियोजनाओं का निजीकरण और व्यापारीकरण करेगी। इस शर्त के बंधन में बँधकर सरकार ने नई जल नीति तैयार की। इस नीति के तहत पुणो और मुम्बई में जल वितरण योजनाएँ विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपने की तैयारी है। दूसरी ओर नदियों को बेचने की योजनाएँ शुरू हो गई हैं। जल योजना के तहत अभी इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने गंगा और जमुना जैसी पवित्र नदियों पर अपना कब्जा जमा लिया है। हमारी सरकार निजीकरण के लालच में बदहवाश हो गई है। अब जल वितरण व्यवस्था के तहत ये कंपनियाँ अधिक कमाई चक्कर में पानी की कीमत इतना अधिक बढ़ा देंगी कि गरीबों की जीना ही मुश्किल हो जाएगा। वह फिर गंदा पानी पीने लगेगा और बीमारी से मरेगा। क्योंकि ये कंपनियाँ नागरिकों को शुद्ध पानी देने की कोई गारंटी नहीं देती।
डॉ. महेश परिमल

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

मायावी दुनिया से दूर रखना होगा

दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

बढ़ा है लक्‍जरी ब्रांडेड आइटम का क्रेज


नवभारत रायपुर- बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

स्‍मृतियों का वसंत / शेषन की याद दिलाती सख्‍ती

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आज जनसत्‍ता और हरिभूमि में मेरे आलेख प्रकाशित हुए हैं। दोनों का लिंक इस प्रकार

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सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

सौ साल में खत्‍म हो जाऍंगे, दो तिहाई जगल

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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

नदियों को भी बचाना होगा




दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख
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बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

2 जी घोटाला, घिरी सरकार, महँगी होगी सेवाऍं





हरिभूमि में प्रकाशित मेरा आलेख
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मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

अब होगी मोबाइल सेवा और महँगी




नवभारत रायपुर बिलासपुर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

एक रन पर धोनी ने कमाए ढाई लाख रुपए

डॉ. महेश परिमल
क्या आपको पता है कि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की वार्षिक आय कितनी है? शायद आप नहीं जानते, जानना भी नहीं चाहते। फिर भी आप जान ही लें, क्योंकि यही वे व्यक्ति हैं, जो एक तरफ अपना बल्ला घुमाते हैं, तो रन बटोरते हैं। दूसरी तरफ विज्ञापनों में काम करते हुए हर वर्ष 75 करोड़ रुपए कमाते हैं। पिछले साल यानी 2011 में उन्होंने जितने रन बनाए, उसका हिसाब किया जाए, तो प्रत्येक रन पर उन्हें 2.55 लाख रुपए मिले हैं। हमारे देश में ऐसे करोड़ों लोग हैं, जिनकी वार्षिक आय 2.55 लाख रुपए नहीं है। दूसरी ओर इतना धन तो धोनी एक रन बनाकर प्राप्त कर लेते हैं। यह राशि उन्हें क्रिकेट बोर्ड, आईपीएल और विज्ञापनों से प्राप्त होती है। टीवी पर जो विज्ञापन प्रसारित किए जाते हैं, उसे मध्यम वर्ग ही अधिक देखता है। इन विज्ञापनों के ामध्यम से अनावश्यक और कई बार स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने वाले प्रोडक्ट भी होते हैं। मध्यम वर्ग के खून-पसीने की कमाई से बड़ी-बड़ी कंपनियाँ जो कमाई कर रही हैं, उसका एक छोटा सा हिस्सा वे अपने ब्रांड एम्बेसेडर को देती हैं। इस तरह से हमारे क्रिकेटरों की जो बेशुमार कमाई होती है, उसका अधिकांश भाग मध्यम वर्ग के शोषण से ही प्राप्त होता है। मध्यम वर्ग अपने मनोरंजन के लिए क्रिकेट के मैच और टीवी धारावाहिक देखता है। इस दौरान अज्ञानतावश उसका ब्रेनवॉश हो जाता है, उसके हिस्से आती है अनावश्यक वस्तुएँ, जिसके बिना भी वह अपना जीवन गुजार सकता है।सच है कि अब क्रिकेट मैच एक खेल न होकर मार्केट का राक्षसी तंत्र बन गया है। मार्केटिंग करने वाली कंपनियाँ ग्राहकों को लुभाने के लिए येनकेनप्रकारेण अपना माल बेचना चाहती हैं। इसके लिए वह क्रिकेटरों का इस्तेमाल करती है। टीवी पर मैच का लाइव प्रसारण देखकर देश के करोड़ों मानव घंटों की बरबादी होती है, यही नहीं अरबों रुपए का उत्पादन प्रभावित होता है। यदि हमारे क्रिकेटरों पर विज्ञापनों में काम करने की पाबंदी लगा दी जाए, तो संभव है देश के क्रिकेट का उद्धार हो जाए।
ऑस्ट्रेलिया के ऐडिलेड शहर से ही भारत के लिए दो परस्पर विरोधी खबरें आयीं। Rिकेट में विश्व चैंपियन भारतीय टीम ने 4-0 से टेस्ट श्रंखला गंवाकर देश का सिर शर्म से झुका दिया तो ऑस्ट्रेलियाई ओपन टेनिस में लिएंडर पेस ने पुरुष डबल्स का खिताब जीत कर करियर ग्रैंड स्लैम पूरा कर अपने देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। हमारी टीम हार गई, इससे हम भले ही दु:खी हों, पर हमारे क्रिकेटरों को इस बात का जरा भी मलाल नहीं है। वे टीम जीते, इसलिए खेल ही नहीं रहे थे, इससे अधिक चिंता तो उन्हें विज्ञापनों के कांट्रेक्ट साइन करने, मीटिंग करने, एड फिल्मों की शूटिंग करने, कंपनियों के प्रमोशनल कार्यक्रमों में उपस्थिति दर्ज कराने, अपनी कमाई को सही स्थान पर इस्तेमाल करने आदि को लेकर होती है। अपनी शक्ति का अधिकांश भाग वे इसी में खर्च कर देते है, बची-खुची शक्ति आईपीएल में खप जाती है। इसके बाद कहाँ से रह जाता है हौसला? सच में देखा जाए, तो हमारे क्रिकेटर एड फिल्मों में काम करके देश का तो भला नहीं ही करते, उससे हमारा भी भला नहीं होता। भला होता है बहुराष्ट्रीय कंपनियों का और स्वयं उनका। ऐसे में क्यों न उन पर फिल्मों में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया जाए? विज्ञापन फिल्मों में काम करके हमारे क्रिकेटर प्रजा की सेवा तो नहीं कर रहे हैं। बात करते हैं हमारे क्रिकेट टीम के कप्तान की। इस समय वे सबसे अधिक कमाई करने वाले क्रिकेटर हैं। हर वर्ष 75 करोड़ रुपए कमाते हैं। 22 ब्रांडों के एम्बेसेडर हैं। इसमें पेप्सीको, रिबोक, एयरसेल, रिवाइटल और गोदरेज जैसी ब्रांडों का समावेश होता है। कुछ समय पहले धोनीे ने तीन स्पोर्ट्स कंपनियों के साथ कांट्रेक्ट किया है। इनका विज्ञापन करके वे तीन वर्ष में 200 करोड़ रुपए कमाएँगे। हमारे मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने सन् 2006 में आईकोनिक्स कंपनी के साथ जब अनुबंध किया था, तब उन्हें 180 करोड़ रुपए मिले थे। धोन जिस रिवाइटल नामक टॉनिक के लिए विज्ञापन करते हैं, उसका उद्देश्य दरअसल भारत में मांसाहार का प्रचार करने का है। अब जब भारतीय क्रिकेट टीम को जीताने में वे विफल सिद्ध हुए हैं, तो कंपनी ने उनके स्थान पर अब सलमान खान को ले लिया है।
सन् 2009 की फोब्र्स मैगजीन ने विश्व के दस सबसे अधिक कमाने वाले क्रिकेटरों की सूची प्रकाशित की, उसमें एक करोड़ डॉलर के साथ धोनी सबसे आगे थे। 80 लाख डॉलर के साथ सचिन तेंदुलकर दूसरे नम्बर पर थे। अब लगता है कि सचिन भारत को विजयश्री दिलाने नहीं, बल्कि अपना सौवां शतक लगाने के लिए मैदान में उतरते हैं। वे अपना सौंवा शतक पूरा करें या न करें, उन्हें तो 61.4 करोड़ रुपए मिलने ही हैं। वे कभ रिटायर नहीं होंगे। जब तक उन्हें जबर्दस्ती रिटायर न कर दिया जाए। सचिन ने पेप्सी, कोका कोला, बूस्ट, रिनॉल्ड, कोलगेट, फिलिप्स, विसा, केस्ट्रॉल, एयरटेल, केनन आदि के ब्रांड रह चुके हैं। इसके अलावा नेशनल एग कॉर्डिनेशन कमिटी के प्रवक्ता की भूमिका निभाते हुए उन्होंने रोज अंडे खाओ का भी विज्ञापन किया था। हाल ही में उन्होंने बांद्रा में 9 हजार वर्गफीट के स्थान पर 39 करोड़ का जो बंगला बनवाया है, उसका वार्षिक प्रीमियम ही 40 लाख रुपए है। सचिन की अधिकांश कमाई विज्ञापन फिल्मों से ही हुई है।
हमारे क्रिकेटर जब भी धन के लालच में विज्ञापन फिल्मों का कांट्रेक्ट करते हैं,तो देश या प्रजा के बारे में सोचते ही नहीं हैं। यह सभी जानते हैं कि हमारे देश में खुले आम शराब के विज्ञापनों पर प्रतिबंध है, उसके बाद भी शराब बनाने वाली कंपनियाँ उसी ब्रांड का सोडा बनाती हैं, जिसका विज्ञापन हमारे क्रिकेटर करते हैं। हाल ही में धोनी और हरभजन सिंह ने देश की प्रसिद्ध व्हिस्की के ब्रांड के लिए काम कर रहे हैं। शराब कंपनियाँ अपने उत्पाद के विज्ञापन के लिए सरोगेट एड का सहारा लेते हैं। इससे कानून का पालन भी हो जाता है और उत्पाद का विज्ञापन भी हो जाता है। विभिन्न कंपनियों की इस चाल को हमारे क्रिकेटर तो समझते हैं, पर देश की प्रजा अभी तक नहीं समझ पाई है। इन विज्ञापनों से युवा पीढ़ी गुमहरा हो रही है, पर क्रिकेटरों को इसकी चिंता कहाँ? भारतीय क्रिकेट बोर्ड द्वारा खिलाड़ियों को जो मोटी रकम दी जाती है, उस पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए। बोर्ड ने 9 खिलाड़ियों को ‘ए’ केटेगरी पर रखा गया है। इस केटेगरी के खिलाड़ियों को हर वर्ष एक करोड़ रुपए दिए जाते हैं, चाहे वे खेलें या न खेलें। इन नवरत्नों में महेंद्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड, वीवीएस लक्ष्मण, वीरेंद्र सहवाग, गौतम गंभीर, सुरेश रैना, हरभजन सिंह और जहीर खान का समावेश होता है। ‘बी’ केटेगरी में शामिल क्रिकेटरों को 50 लाख रुपए वार्षिक और ‘सी’ के खिलाड़ियों को 25 लाख रुपए वार्षिक आय होती है। इसके अलावा उनहें एक टेस्ट मैच पर सात लाख रुपए, वन डे इंटरनेशनल पर चार लाख और 20-20 पर दो लाख रुपए अतिरिक्त मिलते हैं। कोई खिलाड़ी टेस्ट की दोनों इनिंग में शून्य रन भी बनाता है, तो भी उसे सात लाख रुपए दिए जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया से हम भले ही बुरी तरह से हार गए हों, पर सभी खिलाड़ियों के खाते में 28 लाख रुपए तो जमा हो ही गए।
आईपीएल में मिलने वाली मोटी राशि के चलते कुछ खिलाड़ी जिस तरह टेस्ट और एक दिवसीय Rिकेट के लिए अपनी फिटनेस को दाँंव पर लगा रहे हैं, उसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। कुछ वरिष्ठ खिलाड़ियों की बढ़ती उम्र को लेकर मचाया जा रहा शोर अतार्किक है। आखिर 39 साल की उम्र में ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग ने इसी श्रंखला में एक दोहरे शतक समेत दो शतक लगाए हैं। टेनिस में Rिकेट से कई गुना जयादा ऊर्जा और फिटनेस की जरूरत होती है। फिर भी 38 साल की उम्र में भारत के ही लिएंडर पेस ने ऐडिलेड में ऑस्ट्रेलियाई ओपन पुरुष डबल्स के रूप में अपने करिअर का 13 वां ग्रंैड स्लैम जीतकर साबित कर दिया है कि सबसे जरूरी है खेल के प्रति प्रतिबद्धता, जीत की दृढ़ इच्छाशक्ति और फिर उसे पूरा करने के लिए जरूरी फिटनेस और कोशिश। कहना नहीं होगा कि भारतीय Rिकेटरों को पेस से सबकसीखना चाहिए, वरना बोर्ड को चाहिए कि वह भी टीम के वरिष्ठ खिलाडिय़ों को प्रदर्शन करो या जाओ का अल्टीमेटम दे दे, जैसा कि ऑस्ट्रेलियाई बोर्ड ने पोंटिंग को दिया था। क्या देश का धन पर केवल खिलाड़ियों और नेताओं का ही वर्चस्व रहेगा, या आम आदमी के लिए उसका उपयोग होगा? यह एक गंभीर प्रश्न है, जिसे हमारे क्रिकेटर, नेता, क्रिकेट बोर्ड, चयन समिति समझे या न समझे, पर अब हमारे देश की प्रजा समझ रही है। यही प्रजा जिसने विश्वकप जीतने पर दीवाली मनाई थी, संभव है हमारे क्रिकेटरों के देश आगमन पर होली भी मना ले।
डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

बनाए रखी राष्‍ट्रपिता की गरिमा


30 जनवरी को हरिभूमि के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख

शनिवार, 28 जनवरी 2012

संवेदनाओं की ऋतु में अनवरत पूस की रात







दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित मेरा आलेख

बुधवार, 25 जनवरी 2012

गिरती महँगाई दर, साजिश तो नहीं




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हरिभूमि में आज प्रकाशित मेरा आलेख

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

कहाँ गए जटायु के वंशज



रविवार, 22 जनवरी 2012

परिवारों में दिलचस्‍प जोर आजमाइश






हरिभूमि में आज पेज दो पर प्रकाशित पंजाब पर मेरा चुनावी विश्‍लेषण
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शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

चुनावों में काला धन असर दिखाएगा


डॉ. महेश परिमल
भ्रष्टाचार राजनीति का ईंधन है और काला धन इस वाहन के पहिए। यह इससे साबित होता है कि पांच राज्यों में चुनाव की मात्र घोषणा से ही काला धन बाहर आने लगा है। अब तक करोड़ों रुपए बरामद किए जा चुके हैं। सबसे ज्यादा खराब हालत उत्तर प्रदेश और पंजाब की है, जहाँ रोज ही करोड़ों रुपए बरामद किए जा रहे हैं। इन दो राज्यों में अब तक 30 करोड़ रुपए बरामद किए जा चुके हैं। उत्तर प्रदेश में अब तक दस करोड़ रुपए बरामद किए गए हैं। इसमें लखीमपुर से ही दो करोड़,गेट्रर नोएडा में 12 लाख, मथुरा से दस लाख और कानपुर से चार लाख रुपए पकड़े गए हैं। इसी तरह पंजाब में पिछले 15 दिनों में 17 करोड़ रुपए बरामद किए गए। पंजाब में रकम के अलावा भारी मात्रा में ड्रग्स और शराब बरामद की गई है। पुजाब पुलिस ने 6 किलो हीरोइन और दो टन चरस-गांजा भी बरामद कर चुकी है। अभी तो यह केवल शुरुआत है। दो राज्यों की तस्वीर अभी सामने आई है। चुनाव आयोग सख्त हुआ है, इसमें कोई शक नहीं। पर जिस तरह से उत्तर प्रदेश में मायावती और हाथियों की मूर्ति को ढँकने के आदेश चुनाव आयोग ने दिए हैं, उससे लगता है कि गंभीर और दूरगामी निर्णय लेने में चुनाव आयोग कमजोर है। जो सख्ती आयोग में होनी चाहिए, वह दिखाई नहीं दे रही है। बल्कि उसके निर्णय हास्यास्पद होने लगे हैं। अब चुनाव आयोग उत्तर प्रदेश में मायावती और हाथियों की मूर्तियों को ढँकने में एक करोड़ रुपए खर्च कर रही है। इसी से पता चल जाता है कि उसके निर्णय कितने दूरगामी हैं? चुनाव में काले धन के इस्तेमाल पर आयोग अभी से सख्ती दिखाना शुरू कर दे, तो संभव है, इसके दूरगामी परिणाम दिखाई दें। इस दिशा में सरकार की नीयत भी साफ नहीं लग रही है। पिछले दो दशक से चुनाव सुधार विधेयक लटका हुआ है। यदि सरकार की नीयत साफ होती, तो इस पर विचार हो सकता था। पर लोकपाल विशेयक की तरह ही इस विधेयक का लटकना यह दर्शाता है कि चुनाव में काले धन का इस्तेमाल सभी दल कर रहे हैं।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान भी स्वीकारते हैं कि चुनाव के भारी भरकम खर्च के कारण काले धन और भ्रष्टाचार की समस्या होती है। इससे राजनीतिक दल परेशान भी होते हैं। वे इसके शुद्धिकरण के लिए चुनाव में सरकार द्वारा धन उपलब्ध कराने के हिमायती भी हैं। चुनाव सुधार की बातें देश के लिए नई नहीं हैं, लेकिन व्यावहारिक पक्ष यह है कि सारा मामला बातों या बयानों तक ही सीमित रहता है। कोई भी बड़ा राजनीतिक दल इसके लिए वास्तविक या गंभीर प्रयास नहीं करता। आज नगर निगम पार्षद का चुनाव लड़ने में लाखों खर्च होते हैं। निजी चर्चाओं में तो दस-पंद्रह लाख का हिसाब भी प्रत्याशी बता जाते हैं, जिसका कोई हिसाब कभी सरकारी खातों में नहीं मिलता। इसके चलते वार्ड का चुनाव भी कोई आम आदमी लड़ने का साहस नहीं जुटा पाता, जबकि वार्ड इतनी छोटी इकाई है कि इसका चुनाव व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और गैर राजनीतिक आधार पर भी लड़ा जा सकता है। चुनाव के इस भारी-भरकम खर्च पर रोक कैसे लगे? यह लाख टके का सवाल है। इसका उत्तर दो सिरों पर तलाशा जाना चाहिए। एक तो राज्य निर्वाचन आयोग की नजर भी उतनी ही पैनी हो जाए, जितनी भारत निर्वाचन आयोग की रहती है। ताकि कुछ तो शुद्धिकरण हो। दूसरा सिरा है जनता या मतदाता जो भारी-भरकम खर्च पर अपने प्रत्याशियों से सवाल करे।
चुनाव आयोग के अधिकार क्या हैं, इसे आम मतदाता पहले वाकिफ नहीं था। जब टी एन शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त का पद सँभाला, फिर उन्होंने जो आदेश दिए, तब लगा कि चुनाव आयोग इतना अधिक शक्तिशाली भी है। इसके पहले तो मतदान के एक दिन पहले तक तो सड़कें बनती थीं, बोरवेल किए जाते थे। जनता को कम्बल-धोती आदि बाँटे जाते थे। शेषन के आदेश के बाद ही समझ में आया कि आचार संहिता लागू होने के बाद जनता के हित में कोई सरकारी घोषणा नहीं की जा सकती। मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनकी नियुक्ति से पूर्व तो चुनाव आयोग केन्द्र सरकार का ही एक विभाग बन कर रह गया था जो कुछ भी करने से पूर्व सरकार की ओर ही निहारता था। पर जैसे ही श्री शेषन ने मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्य सम्भाला चुनाव प्रRिया में तो जैसे Rान्ति ही आ गई। उनके लिए कोई नया कानून नहीं बना और न सरकार ने उन्हें कोई नया अधिकार ही दिया। पर जो भी कानून व अधिकार आयोग के पास थे, उसका ही ईमानदारी और कड़ाई से पालन कर उन्होंने दिखा दिया कि यदि व्यक्ति में ईमानदार इच्छाशक्ति हो तो वह कुछ भी कर सकता है। यह भी वह तब कर पाए जब उनकी कार्यशैली पर सरकार की भौहें चढ़ने लगी थी और सरकार उनके पर तक काटने की सोचने लगी। तभी एक सदस्यीय चुनाव आयोग को तीन सदस्यीय बना दिया गया। एक आयुक्त जो उस समय बनाए गए वह थे श्री एम.एस. गिल जिन्होंने तब श्री शेषन के रास्ते में रोडे अटकाने का बहुत बडा काम किया। बाद में गिल मुख्य चुनाव आयुक्त भी बने। यह अलग बात है कि जो लीक श्री शेषन बना गये उससे पीछे हटना उनके उत्तराधिकारियों के लिए भी सम्भव न हो सका।
पिछले लोक सभा चुनाव प्रचार के दौरान विदेशी बैंको में भारतीयों के काले धन को भारत लाने और दोषियों को सजा देने की बात उठी थी। तब भी सरकार ने इसे विपक्ष का चुनावी शोशा बतला कर इसे नजर अंदाज करने की कोशिश की थी। पिछले 25 महीनों में सरकार ने इस बारे किया कुछ नहीं। केवल कुछ कोरे वादे करने की हामी अवश्य भरी थी। इसी बीच विदेशी बैंकों में भारतीयों का काला धन कम नहीं हुआ, बल्कि बढ़ा ही है।
पिछले कुछ महीनों से इस बारे देश के उच्चतम न्यायालय ने भी कई बार सरकार को खरी खोटी युनाई। हैरानी की बात तो यह है कि यह सरकार उन महानुभावों के सम्मान और ‘स्वच्छ’ छवि की रक्षा करना चाहती है जिन्हें गैरकानूनी व आपराधिक ढंग से काला धन कमाने और उसे विदेशी बैंकों में जमा कर देश के साथ गददारी करने में शर्म नहीं आई। सरकार के पास अनेक नाम हैं जिन्होंने विदेशी बैकों में आपराधिक धन जमा करा रखा है पर ‘जनहित’ का ढकोसला लगा कर उनके नाम उजागर करने से डरती है। इसी बीच कांग्रेस सरकार व पार्टी की कई नामी हस्तियों के नाम चर्चा में हैं जिनके विदेशी बैंकों में खाते बताए जाते हैं। सरकार और सम्बन्धित व्यक्ति न इन आरोपों का खण्डन करते हैं और न ही इसे स्वीकारते हैं। सरकार यदि ईमानदार हो तो आज भी सरकार बहुत कुछ कर सकती है जिससे कि उन लोगों पर अंकुश लग सकता है जो काला धन अर्जित करने में लगे हुए हैं। केन्द्र में हमारे प्रधानमन्त्री व उनका मंत्रिमण्डल व प्रदेशों में हमारे मुख्यमंत्री व उनका मंत्रिमण्डल पहल करे और सभी एक शपथपत्र जारी करें कि उनका या उनके परिवार के व्यक्तियों का देश के बाहर किसी विदेशी बैंक में खाता नहीं है। यदि है तो इसका पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करें। इसी प्रकार हमारे सभी सांसद व विधायक भी ऐसा ही करें। सभी संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति तथा सरकारों द्वारा नियुक्त व्यक्ति व नौकरशाह भी ऐसा ही करें। हमारे यहां चुनावों में काले धन का उपयोग आम बात है। विधानसभा चुनाव में एक प्रत्याशी की खर्च-सीमा 16 लाख रुपए तक की गई है, लेकिन एक अनुमान के अनुसार प्रमुख दलों के ज्यादातर प्रभावशाली प्रत्याशी 25 करोड़ रुपए तक प्रचार में बहा देते हैं। निर्धारित सीमा से ज्यादा खर्च काले धन से ही होता है। कुछ समय से चुनाव आयोग ने इस काले धन पर शिकंजा कसना शुरू किया है। बिहार और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में करोड़ों रुपए का काला धन चुनाव आयोग के निर्देशों से ही पकड़ा गया था।
उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड के इस विधानसभा चुनाव में भी काले धन को बरामद करऩे के लिए चुनाव आयोग ने अभियान चला रखा है। दिक्कत यह है कि चुनाव आयोग के पास अपना कोई अमला नहीं है। वह सारे काम जिला और पुलिस प्रशासन से पूरे करवाता है। चुनाव आयोग ने निर्देश दिए हैं कि अगर कोई एक लाख रुपए से ज्यादा की नकदी ले जा रहा है, तो उसके कागजात होने जरूरी हैं, वर्ना वह काला धन मान कर जब्त कर लिया जाएगा। काला धन पकड़ने की जिम्मेदारी पुलिस और आयकर विभाग की है। पुलिस वाले सभी जिलों में गाड़ियों की जाँच कर रहे हैं। सामान की तलाशी ली जा रही है। अब तक कई करोड़ रुपए जब्त भी किए जा चुके हैं। लेकिन पुलिस ज्यादती की शिकायतें बहुत आ रही हैं। चिंता का विषय होना चाहिए।
तमाम सतर्कता के बावजूद पुलिस और आयकर विभाग के लिए हर वाहन और व्यक्ति की तलाशी लेना संभव नहीं। धन की इस बरामदगी से इसकी पुष्टि हो जाती है कि अब ऐसे प्रत्याशियों की संख्या बढ़ती जा रही है जो रातों-रात पैसा खर्च कर चुनाव जीतने में यकीन करते हैं। धनी प्रत्याशी केवल प्रचार में ही निर्धारित सीमा से ज्यादा पैसा खर्च नहीं करते, बल्कि वे उसे मतदाताओं में बांटकर वोट खरीदने का भी काम करते हैं। यह लगभग तय है कि चुनाव आयोग की तमाम सख्ती के बावजूद पैसे के बल पर वोट खरीदने की कोशिश पर विराम नहीं लग पा रहा है। अतीत में प्रत्याशियों की ओर से मतदान के एक-दो दिन पहले रातों रात पैसे बांटने के उदाहरण सामने आ चुके हैं।  इस धनबल के आगे लोकतंत्र की हार के अतिरिक्त और कुछ नहीं। राजनीतिक दलों से बेहतर और कोई यह नहीं जानता कि चुनावों में धन की भूमिका बढ़ती चली जा रही है और पैसे वाले प्रत्याशियों के लिए चुनाव जीतना आसान हो गया है, लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं कि चुनाव प्रRिया में पैसे की भूमिका कम हो। चुनावों के दौरान अनाप-शनाप खर्च होने वाला धन मूलत: काला धन होता है, लेकिन राजनीतिक दल उन स्रोतों को बंद करने के लिए तैयार नहीं जहां से काला धन उपजता है। क्या इससे बड़ी विडंबना और कोई हो सकती है कि समाज का नेतृत्व करने और उसे दिशा देने वाली राजनीति काले धन से संचालित हंै? क्या यह हास्यास्पद नहीं कि राजनीतिक दल एक ओर साफ-सुथरी राजनीति की बात करते हैं और दूसरी ओर उसे काले धन से संचालित करने में जुटे हुए हैं? स्पष्ट है कि राजनीतिक दलों की भी नीयत साफ नहीं है।
संभवत: यही कारण है कि चुनाव सुधार पिछले दो दशकों से अटके पड़े हैं। अब तो चुनाव आयोग ने यह कह दिया कि सरकार की ओर से चुनाव सुधारों की अनदेखी की जा रही है। राजनीतिक दल जितना उदासीन काले धन की राजनीति पर हैं उतना ही बाहुबल की राजनीति पर भी और इसका ताजा प्रमाण यह है कि कोई भी दल बाहुबली छवि वाले नेताओं को अपना उम्मीदवार बनाने में संकोच नहीं कर रहा है। यदि टीएन शेषन के समय में चुनाव आयोग अपने अधिकारों को लेकर सजग और सRिय नहीं होता तो शायद मतदान केंद्रों पर कब्जा करने और विरोधी दलों के समर्थक माने जाने वाले मतदाताओं को डराने-धमकाने का सिलसिला भी कायम बना रहता। यदि राजनीतिक दल लोकतंत्र के प्रति आम आदमी की आस्था बनाए रखना चाहते हैं तो यह अपरिहार्य है कि संसद के अगले सत्र में लंबित पड़े चुनाव सुधारों को आगे बढ़ाया जाए। इसके लिए सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्ष के राजनीतिक दलों को भी पहल करनी होगी, क्योंकि निर्वाचन प्रणाली की विकृतियों से पूरी राजनीति ही बदनाम हो रही है।
सच तो यह भी है कि मतदाता आज के नेताओं से इतने अधिक निराश हो चुके हैं कि अब वे उनसे कोई अपेक्षा नहीं रखते। समाज में भी ‘नेता’ शब्द किसी अपशब्द से कम नहीं लगता। नेता बनते ही उनकी सम्पत्ति दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती है। 5 वर्ष में वे इतना अधिक कमा लेते हैं कि अगला चुनाव आसानी से जीत जाते हैं। चुनाव भी बाहुबल बताने का एक जरिया बनकर रह गया है। एक ईमानदार शिक्षक चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं कर सकता। मतदाताओं के पास कोई विकल्प ही नहीं है। उनके सामने कौन नेता कितना कम भ्रष्ट है, यही जानना बाकी रहता है। वे कम भ्रष्ट नेता को अपना मत देते हैं, पर बाद में वही कम भ्रष्ट अधिक भ्रष्ट नेता बन जाता है। मतदाता कए बार फिर ठगे जाते हैं। ठगने का यह सिलसिला काफी वर्षो से चल रहा है। चुनाव आयोग भी कहीं न कहीं सरकार पर निर्भर है, इसलिए इससे कोई बड़ी अपेक्षा रखना भूल होगी।
  डॉ. महेश परिमल

मंगलवार, 17 जनवरी 2012

चुनाव सुधार की खोखली कवायद


 आज दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित मेरा आलेख
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http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=49&edition=2012-01-17&pageno=9

सोमवार, 16 जनवरी 2012

भारतीय चीन से तकनीक क्यों सीखना नहीं चाहते?

डॉ महेश परिमल
चीन में व्यापार करने जाने वाले भारतीय व्यापारियों पर पिछले दिनों जिस तरह से व्यवहार किया गया, उससे यही साबित होता है कि वहाँ भारतीय व्यापारी असुरक्षित हैं। आखिर क्या कारण है कि इतनी दूर जाकर भी माल लाने पर व्यापारियों को फायदा होता है? जिल्लत सहकर भी व्यापारी चीन से माल लाते हैं और भारी मुनाफा कमाते हैं। भारतीय व्यापारी यदि चीन जाकर वहाँ से माल के बजाए उनकी तकनीक सीखकर आएँ, तो फिर क्या आवश्यकता है, माल लाने की? आखिर वह कौन से कारण है कि चीन के व्यापारी को जो माल 9 लाख रुपए में पड़ता है,उसके लिए भारतीय व्यापारी को 60 लाख रुपए चुकाने होते हैं? इसकी वजह यही है कि वहाँ की सरकार लघु एवं गृह उद्योगों को खूब प्रोत्साहन देती है। यही कारण है कि वहाँ का माल भारत लाकर भी भारतीयों को सस्ता पड़ता है। यदि हमारे देश की सरकार भी चीन की तरह करे, तो चीन से माल लाने की कोई आवश्यकता ही नहीं है।दीपावली पर हमने जो इलेक्ट्रानिक तोरण का इस्तेमाल किया, वह चीन से आयात किया हुआ था। होली में बच्चे जिन पिचकारियों का इस्तेमाल किया, वह चीन से आयातित था। हमारे बच्चे जिन खिलौनों से खेलते हैं, वह चीन का होता है।पूरे देश में चीन से हर साल अरबों रुपए का माल आता है। दिल्ली-मुम्बई में चाइना मेड माल के कई होलसेल बाजार हैं। हाल ही भारतीय व्यापारियों से चीन के शेझियांग प्रांत के यिवु शहर में जिस तरह का व्यवहार किया गया है, उससे भारतीय व्यापारियों में ¨चता व्याप्त है। भारतीय व्यापारी यिवु से इसलिए माल लाते हैं, क्योंकि यहाँ की कंपनियाँ डिस्काउंट देने में विख्यात हैं। यहाँ पर दुनिया भर से व्यापारी माल लेने आते हैं। भारत से करीब सौ व्यापारी नियमित रूप से यिवु जाते हैं और वहाँ से खरीदी करते हैं। भारत के कई व्यापारी तो पश्चिम एशिया के अरब देशों के एजेंट के रूप मंे काम करते हैं। अरब देशों में अराजकता की स्थिति के कारण वहाँ से ग्राहकी कम हो गई है। कई कंपनियों का दीवाला ही निकल गया है। इस कारण चीन के व्यापारी भारत के एजेंटों से खफा हो गए हैं। आश्चर्य की बात यह है कि यिवु के व्यापारियों के रोष के आगे वहाँ का प्रशासन तंत्र भी लाचार हो जाता है। वह भी चीनी व्यापारियों का ही पक्ष लेता है। अदालतें भी असहाय नजर आती हैं। इसलिए भारतीय दूतावास से यह आदेश जारी हुआ है कि भारतीय व्यापारी यिवु के व्यापारियों से माल न खरीदें। यहाँ मुश्किल यह है कि भातर में चीन से जो माल आता है, उसका 75 प्रतिशत तो केवल यिवु से ही आता है। यदि भारतीय यिवु से माल खरीदना बंद कर दें, तो वहाँ के व्यापारियों और उद्योपगतियों के सामने भूखे रहने की स्थिति आ सकती है। चीन में भारतीय व्यापारियों को प्रताड़ित करने की यह पहली घटना नहीं है। मुंबई के एक व्यापारी को चीनी भाषा न आने के कारण उसने यिवु के एक दुभाषिये को एजेंट के रूप में नियुक्त किया। इस एजेंट भारतीय व्यापारी के नाम पर खरीदी की और माल लेकर भाग गया। उक्त भारतीय व्यापारी जब यिवु गया, तो उसके साथ मारपीट की गई। भाषा के कारण भारतीय व्यापारियों को वहाँ एजेंट रखना अनिवार्य होता है। इन एजेंटों को दोनों तरफ से कमिशन मिलता है। ये एजेंट यदि किसी प्रकार का घालमेल करें, तो उसकी सजा भारतीय व्यापारियों को भोगनी होती है।जब से चीन से सस्ता माल आने लगा है, तब से भारतीय उद्योग को काफी नुकसान होने लगा है। यहाँ के कारीगर बेकार होने लगे हैं। चीन के लघु उद्योग तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। भारतीय कारीगरों की बेकारी ने चीनी उद्योग को मालामाल कर दिया है। चीन में जिस माल की कीमत 9 लाख रुपए है, उसके लिए भारतीयों को 60 लाख रुपए चुकाने होते हैं। इसलिए भारत के साथ व्यापार करने में चीन को भारी मुनाफा होता है। भारत को जितनी गरज है, उससे अधिक गरज चीन की है। इस बात को अभी तक किसी ने समझने की कोशिश नहीं की है। यह भी सच है कि चीनी माल से अब भारतीयों का मोहभंग होने लगा है। एक तो उसकी गुणवत्ता निम्न दर्जे की होती है। उस पर इस्तेमाल किए गए रंगों से स्वास्थ्य को हानि होती है। दिल्ली के व्यापारियों ने एकजुट होकर कहा है कि यदि भारतीय व्यापारियों के साथ चीन में इस तरह से र्दुव्‍यवहार होता रहेगा, तो वे चीनी माल का बहिष्कार कर भारतीय माल ही बेचेंगे। वैसे दिल्ली के व्यापारियों का यह भी कहना है कि वे काफी बरसों से चीन के साथ व्यापार कर रहे हैं, उन्हें अब तक किसी प्रकार का खराब अनुभव नहीं हुआ है। उनका कहना है कि यिवु शहर में भारतीय व्यापारियों की काफी इज्जत की जाती है। पर जो व्यापारी उधारी करते हैं और समय पर नहीं चुकाते, तो उनका व्यवहार बदल जाता है। उसके बाद तो वे कानून हाथ में लेने से नहीं हिचकते। इन दिनों यिवु के व्यापारी भारतीय व्यापारियों से इसलिए नाराज चल रहे हैं, क्योंकि कई भारतीय माल लेकर गुम हो गए हैं। चीनी इस तरह की दगाबाजी सहन नहीं करते। इस दौरान यदि उन्हें कोई ईमानदार भारतीय व्यापारी भी मिल जाए, तो वे उसके साथ मारपीट करते हैं। भारतीय व्यापारी चीन से केवल माल लेकर आते हैं, वहाँ की तकनीक नहीं लाते। यदि वे वहाँ से तकनीक लाएँ और हमारे ही देश में सस्ता माल बनाएँ, तो भला चीनी माल क्यों खरीदा जाए? चीनी तकनीक के अलावा वहाँ की सरकार द्वारा लघु और गृह उद्योगों को प्रोत्साहन देने की नीति भी माल को सस्ता बनाती है। भारत ने वर्ल्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन के जिन दस्तावेज पर हस्ताखर किए थे, उसके आधार पर आयात से ड्यटी हटा दी गई थी। इसी कारण भारत के बाजारों में चीन के सस्ते और गुणवत्ता में हलके माल आने शुरू हो गए। देश का मध्यम वर्ग आज भी चीन के बने उत्पादों का इस्तेमाल करता है। किंतु उच्च वर्ग ने चीन के उत्पादों से मुँह फेर लिया है। यह सोचने वाली बात है कि चीन से उत्पाद भारत आता है, इसके परिवहन खर्च के बाद भी देश में इतना सस्ता मिल रहा है। तो फिर भारत में ही बने उत्पाद इतने सस्ते क्यों नहीं हो सकते? इस सवाल का जवाब भारतीय उद्योगपतियों, व्यापारियों, ग्राहकों और सरकार को देना चाहिए।
डॉ. महेश परिमल

रविवार, 15 जनवरी 2012

पतंग हमें परवाज का सबक सिखाती है




14 जनवरी को दैनिक भास्‍कर के संपादकीय पेज पर प्रकाशित मेरा आलेख
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शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

राग दरबारी और मैला आँचल ई बुक में


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http://www.naidunia.com/epapermain.aspx


मंगलवार, 10 जनवरी 2012

सेक्स टूरिज्म का स्वर्ग गोवा





डॉ महेश परिमल


गोवा में इन दिनों मस्ती की बहार है। देशी-विदेशी लोगों का जमघट लगा है। समुद्री किनारे लोगों की मस्ती देखते ही बनती है। रात भर तेज आवाजों के साथ ये सभी नाचते रहते हैं। इस दौरान बहुत कुछ हो जाता है। रात भर सेक्स का खुला खेल चलता रहता है। रेव पार्टी के नाम से यहाँ विदेशियों ने एक तरह से सेक्स रैकेट ही चला रखा है। ड्रग्स का खुलेआम क्रय-विक्रय हो रहा है। अब तक गोवा के समुद्र तट रेव पार्टियों और ड्रग्स के लिए जाने जाते थे, पर अब हत्या, बलात्कार जैसे अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। यहाँ आने वाले विदेशी अपनी संस्कृति के नाम पर सभी बुराइयों को फैेला रहे हैं। इन विदेशियों के रहने के लिए समुद्री तटों पर इनके आवास बनाए जा रहे हैं। सैकड़ों पॉश हॉटल खुल गए हैं। ये सभी गोवा की जमीन से मीठा पानी निकालकर बरबाद कर रहे हैं और प्रदूषण फैला रहे हैं। विदेशियों से डॉलर प्राप्त करने के मोह में गोवा सरकार राज्य की संस्कृति का नीलाम कर रही है। यदि सरकार और पुलिस तंत्र इसी तरह उदासीन रहा, तो गोवा एक बार फिर विदेशियों के चंगुल में फँस सकता है।पूरे गोवा के लिए यह कमाई का सीजन है। इसलिए पूरा मुबई इन दिनों बेरोजगार हो गया है। यहाँ काम करने वाली तमाम बार गर्ल इन दिनों गोवा में हैं। जो विदेशियों के बीच रहकर रोज 5 से 10 हजार रुपए कमा रही हैं। समुद्री तट पर आयोजित होने वाली रेव पार्टियों की एंट्री फीस ही करीब 500 डॉलर यानी 20 हजार रुपए है। इतनी मोटी रकम विदेशी ही आसानी से दे सकते हैं। इन रेव पार्टियों में रात भर तेज आवाजों के साथ ड्रग्स का नशा करके लोग नाचते रहते हैं। इसलिए यदि गोवा का सेक्स टूरिज्म का स्वर्ग कहा जाए, तो अतिशयोक्ति न होगी। जब से थाइलैंड और कबोडिया सरकार ने सेक्स का आनंद लेने के लिए आने वाले पर्यटकों पर प्रतिबंध लगाया है, तब से गोवा ऐसे लोगों का स्वर्ग बन गया है। यह भी सच है कि अब गोवावासी इस दिशा में प्रयासरत हैं कि ऐसी रेव पार्टियों पर प्रतिबंध लगाया जाए, इसलिए सरकार कभी-काी दिखावे के लिए कुछ कर लेती है। पर भ्रष्ट पुलिस तंत्र के संरक्षण में यहाँ अब भी बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जो कानून के खिलाफ है। यहाँ आने वाले विदेशी सैलानियों की नजर मासूम बच्चों पर होती है। जिन्हें ये हॉटल ले जाकर इनका आनंद लेते हैं। इसलिए अब यहाँ की कई हॉटलों में यह लिखा जा रहा है कि यहाँ बच्चों को लेकर आना मना है। यहाँ समुद्र किनारे खड़े किए गए तबुओं में युजिक सिस्टम लगाया जाता है, तेज शोर के बीच करीब दस हजार युवक-युवतियाँ डांस करती हैं। चाइल्ड सेक्स टूरिज्म के मामले में गोवा अब थाईलैंड, कबोडिया और वियेतनाम के साथ स्पर्धा में उतर गया है। गोवा एयरपोर्ट पर विदेशी पर्यटकों के चार्टर्ड विमान उतर रहे हैं। ये विदेशी गोवा में केवल ड्रग्स और सेक्स का आनंद लेने के लिए ही आते हैं। सेक्स टूरिज्म के नाम पर यहाँ की 5 स्टार होटलें करोड़ों की कमाई कर रही हैं। विदेशी पर्यटकों में कई पेडोफिल्स होते हैं, जो केवल मासूमों में ही दिलचस्पी लेते हैं। यहाँ इनकी भी आपूर्ति करने वाले लोग हैं, जो विभिन्न तरीके से पुरुषों की इस भूख को शांत करने का जतन करते हैं। समुद्री तट पर भीख माँगने वाले बच्चे भी इनके शिकार हो जाते हैं। विदेशी इन बच्चों को आसानी से उपहार आदि देकर अपने जाल में फँसा लेते हैं।गोवा में चलने वाले चाइल्ड सेक्स रेकेट का खुलासा बीबीसी के पत्रकार एलन पुरी ने किया है। कुछ समय पहले ही वे गोवा तट पर पहुँचे और सैलानियों की तरह घूमते रहे। इन पर वहाँ के एक दलाल की नजर पड़ी, तो युवतियों की आपूर्ति करने का वादा किया। जब पत्रकार ने कहा कि उसे तो 13 वर्ष की किशोरी चाहिए, तो दलाल ने उसकी भी व्यवस्था होने की जानकारी दी। उनके साथ ये सब मापुसा तट पर हुआ। इन दिनों यहाँ छोटी उम्र की लड़कियों की इतनी अधिक माँग है कि मुबई से रोज ही ऐसी कई किशोरियाँ भेजी जा रहीं हैं। कई बार विदेशी सैलानी बच्चे के साथ होटल के रुम में पकड़े भी गए, पर पुलिस ने मोटी रकम लेकर उन्हें छोड़ दिया। अब इसका दूसरा रूप भी सामने आने लगा है। मसाज पॉर्लर के रूप में। समुद्री तट पर सैकड़ों मसाज पार्लर हैं, जहाँ अर्धनग्न युवतियों पुरुषों का मसाज करती हैं। एक घंटे के मसाज का 2 से 5 हजार रुपए लिए जाते हैं। कालंगुृटा बीच के आसपास ऐसे अनेक मसाज पॉर्लर चल रहे हैं। एक बार गोवा के एक नागरिक ने फोन पर पुलिस को यह सूचना दी कि इन मसाज पॉर्लरों में दो आतंकवादी छिपे हुए हैं। तब पुलिस ने इन पॉर्लरों पर छापा मारा। इस दौरान अनेक युवतियों को पुरुषों के साथ अर्धनग्न अवस्था में बाहर कर तलाशी ली। पर पुलिस ने किसी पर कोई कार्रवाई नहीं की। देश के अनेक राज्यों से भागे हुए बच्चे भी यहीं मिल जाएँगे। यहाँ आकर वे मूँगफल्ली या चूड़ियाँ बेचते हुए पाए जाते हैं। ये आसानी से विदेशियों का शिकार बन जाते हैं। डॉलर और रुबल के लालच में गोवा सरकार अब विदेशियों के हाथों खेल रही है। इन दिनों समुद्रीतट पर रुसियों को विशेष सुविधाएँ दी जा रही हैं। यहाँ रुसी अपने लिए बंगले बनवा रहे हैं। इसके लिए वे रुस से ही कारीगरों को बुलवा रहे हैं। जो बंगला नहीं बनवा पा रहे हैं, वे किराए से ले रे हैं। वास्तव में इनके माध्यम से ड्रग्स का कारोबार चल रहा है। गोवा के समुद्रीतट पर तबू तानकर अनेक होटलें बन गई हैं, सरकार ने केवल 25 को ही लायसेंस दिया है, पर बिना लायसेंस के कई होटलें चल रहीं हैं। यहाँ आकर विदेशी भारतीय बच्चों को गोद लेने का नाटक करते हैं। उसके बाद उन बच्चों के साथ सेक्स करते हैं। कई तो झूठे दस्तावेज के आधार पर बच्चों को अपने साथ विदेश ले जाते हैं ओर वहाँ पर उनका शारीरिक शोषण करते हैं।पिछले दस वर्षो में गोवा में रशियन सैलानियों की संया में जिस तरह से इजाफा हुआ है, वह विचारणीय है। 1997 में गोवा में 400 रुसी सैलानी आए थे। पिछले वर्ष यह आँकड़ा 31 हजार 293 तक पहुँच गया है। इस वर्ष यह आँकड़ा 40 हजार पार कर जाने की पूरी संभावना है। गोवा एयरपोर्ट में रुसी भाषा में होर्डिग देखकर ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। यहाँ जितने चार्टर्ड प्लेन आते हैं, उनमें से 75 प्रतिशत रुस से ही आते हैं। कई तो अपने निजी जेट विमान से यहाँ आ रहे हैं। कइयों ने यहाँ की 5 स्टार होटलों में एक-एक साल के लिए रुम बुक करवा रखे हैं। इसके एडवांस की रकम भी चुका दी गई है। आखिर इतने अधिक रुसियों के आने का मतलब क्या है? वजह साफ है कि इनके माध्यम से यहाँ ड्रग्स और अवैध शस्त्र का व्यापार किया जा रहा है। गोवा के कई इलाके तो ऐसे हैं, जहाँ रुसियों की संया इतनी अधिक है कि लोग उस स्थान को मिनी रुस के नाम से जानते हैं। इन सारी गतिविधियों से राज्य सरकार अनभिज्ञ है, ऐसा हो नहीं सकता। यदि लगातार ऐसा चलता रहा, तो इसकी पूरी संभावना है कि गोवा एक बार फिर विदेशियों के हाथों में चला जाए।






डॉ महेश परिमल

सोमवार, 9 जनवरी 2012

ड्रग्‍स जैसा घातक मोबाइल का नशा









दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण के पेज9 पर प्रकाशित भारती परिमल का आलेख

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शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

चुनौतियों से भरा साल 2012



हरिभूमि के सभी संस्‍करणों के संपादकीय पेज पर आज प्रकाशित मेरा आलेख

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गुरुवार, 5 जनवरी 2012

ममता से मोहभंग के मायने





दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में आज प्रकाशित मेरा आलेख

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