बुधवार, 18 जून 2008

किताबें कुछ कहना चाहती हैं


सफदर हाशमी

किताबें करती हैं बातें
बीते जमानों की,
दुनिया की, इंसानों की,
आज की, कल की,
एक-एक पल की,
गमों की, फूलों की,
बमों की, गनों की,
जीत की, हार की,
प्यार की, मार की।
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें ?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं
किताबों में चिड़िया चहचहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं
परियों के किस्से सुनाते हैं
किताबों में रॉकेट का राज है
किताबों में साईंस की आवाज है
किताबों में ज्ञान की भरमार है
क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं..
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।

सफदर हाशमी

7 टिप्‍पणियां:

  1. Your blog is very creative, when people read this it widens our imaginations.

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  2. बहुत अच्छी पोस्ट, अगर मैं सहीं हूँ तो .यह कविता सफदर हाशमी की है, इस कविता से बहुत पहले से प्रभावित रही हूँ....और कोई भी हो सकता है
    जैसे कि आप,शुक्रिया

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  3. किताबो से तो रोज ही वासता रहता है पर आपने सफदर को भी याद करा दिया।
    किताबें कुछ कहना चाहती हैं
    तुम्हारे पास रहना चाहती हैं
    सुन्दर कविता है।

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  4. महा कूड़ा कविता है. पढ़ते ही अपने स्टोर रूम में पहुँचा और अपनी लगभग १०० किताबों की धूल झाड़ कर आ रही हूँ. एक दम थका दिया इस कविता ने.

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  5. सफदर हाशमी की यह कविता मुझे बहुत प्रिय है लेकिन में पूरी कविता भूल गया था। बहुत दिनों से इस कविता को तलाश कर रहा था। धन्यवाद।

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  6. क्या खूब कविता है सर... पढ़कर किताबों की दुनिया में खो सा गया... पहली बार आपके ब्लॉग में आया... अब बार-बार आऊंगा!!


    शुभ भाव

    रामकृष्ण गौतम

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