मंगलवार, 3 जून 2008

आज की शिक्षा: कहाँ से कहाँ तक


डॉ. महेश परिमल
आज विश्व में शिक्षा के स्वरूप में जिस तरह का क्रांतिकारी परिवर्तन आया है, उससे ऐसा लगता है कि कुछ ही वर्षों में देश में सभी शिक्षित हो जाएँगे और सबको काम मिल जाएगा। शिक्षा का विशुध्द रूप से व्यवसायीकरण्ा होना इस बात का परिचायक है कि अब निर्धनों को बेहतर शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार ही नहीं होगा। उच्च शिक्षा केवल उच्च वर्ग को ही प्राप्त होगी। ऊँचे ओहदों पर उच्च वर्ग का ही दबदबा रहेगा। ऐसे में पुराणों में पढ़ी हुई गुरुकुल शिक्षा पध्दति का स्मरण हो जाता है, जहाँ सभी सम्प्रदाय के बच्चे एक जैसी सुविधाओं के बीच एक ही तरह की शिक्षा प्राप्त करते थे। जहाँ कोई भेदभाव नहीं होता था। राजा का पुत्र और किसी निर्धन के पुत्र को शिक्षा देने में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता था। शिक्षा में समानता का यह स्वरूप आज की शिक्षा के लिए एक आदर्श हो सकता है। इस तरह की शिक्षा पध्दति आज भी हॉस्टल के रूप में पुनर्जीवित हो गई है। लेकिन इसमें भी धन की ही माया है। आज शिक्षा के पूर्णत: व्यवसायीकरण से व्यक्तिगत लाभ लेने और देने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, वह एक भयंकर रोग की तरह पूरे समाज को लील रहा है। जो पहुँच वाले हैं, उनके लिए शिक्षा का द्वारा हमेशा खुला रहता है और जो संस्कारवान हैं, वे प्रतिभावान होते हुए भी सफलता से कोसों दूर हैं।

गुरुकुल शिक्षा पध्दति की चर्चा करते हुए एक बात याद आ गई, वह यह कि गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करते समय न तो पुस्तकें होती थी और न ही नोट्स बुक। सब कुछ कंठस्थ करना पड़ता था। यही नहीं, जिसे कंठस्थ किया, उसे जीवन में अमल में भी लाना आवश्यक था। वहाँ न तो राजकुमार को विशेश सुविधाएँ दी जाती और न ही निर्धन परिवार के किसी बच्चे को अधिक काम दिया जाता था। उन्हें सजा भी एक तरह की ही दी जाती। एक बार एक गुरुकुल में राजकुमार और निर्धन छात्र ने एक ही तरह का अपराध किया। इसलिए दोनों की सजा भी एक जैसी होनी चाहिए। संयोग से उन्हीं दिनों वहाँ के राजा का गुरुकुल आने का कार्यक्रम बन गया। जिस दिन दोनों शिश्यों को सजा सुनाई जानी थी, उसी दिन राजा भी वहाँ आ पहुँचे। राजा के सामने ही गुरु ने दोनों को सजा सुनाई। पर यह क्या, राजकुमार को कडत्री सजा दी गई और निर्धन पुत्र को सजा में थोड़ी राहत दी गई। दोनों के अपराध एक होने के बाद भी सजा में अंतर आ गया। इससे राजा थोड़े से कुपित हुए। सभी विद्यार्थियों के सामने राजा ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, पर एकांत में गुरु के सामने यह प्रश्न किया। गुरु ने कहा- मैं तो इसे पहले ही समझ गया था राजन, आप क्या पूछने वाले हैं, नि:संकोच पूछें? तब राजा ने अपनी जिज्ञासा गुरु के सामने रखी। तब गुरु ने कहा- राजन आपके पुत्र को कड़ा दंड मिलना ही चाहिए, क्योंकि आगे चलकर उसे आपका स्थान ग्रहण करना है। राज्य की प्रजा सुख-शांति से रहे, यह उसका पहला कर्तव्य होगा। उसकी जरा सी भी भूल पूरी प्रजा के लिए कष्टदायी होगी। यदि उसे अभी से ही उसकी भावी जवाबदारियों से अवगत हो जाना चाहिए। इसीलिए उसे कड़ा दंड दिया गया। गुरुदेव की बातों से राजा बहुत ही प्रभावित हुआ। उस समय राजशाही थी, फिर भी गुरुओं को किसी प्रकार का भय नहीं था। वे बिना किसी भेदभाव के शिष्यॊं को दंड दिया करते। जबकि कई मामलों में उनके गुरुकुल को राज्य से आर्थिक सहायता भी मिलती। स्वतंत्रता के 60 साल बाद भी आज लोकशाही में जब शिक्षा के क्षेत्र में फैली चापलूसी और चमचागिरी का जो प्रदूशण देखने में आ रहा है, वह किसी से छिपा नहीं है।
उड़ीसा के भुवनेश्वर में शिक्षा से जुड़ी एक रोचक घटना पिछले दिनोें प्रकाश में आई। विजय शंकर दास नाम के एक छात्र को एस.एस.सी. का परीक्षाफल सामने आया, तो सभी विद्यार्थी हतप्रभ रह गए। जिस छात्र ने साल भर न तो क्लॉस अटेंड की, न कभी उसे पढ़ाई के प्रति गंभीर देखा गया, केवल मौज-मस्ती के लिए ही कॉलेज आने वाले छात्र को यदि सभी विषयों में अच्छे नम्बर मिलें, तो आश्चर्य तो होगा ही। जानते हैं उस छात्र को कितने नम्बर मिले? मातृभाषा उड़िया में 100 में से 89, ऍंगरेजी में 80, भूगोल में 65, विज्ञान में 60। इस तरह से कुल 750 अंकों में से विजय को 602 अंक मिले याने 80 प्रतिशत। जब यह जानकारी मीडिया में आई, तब उसके रसूखदार पिता ने अपने सुपुत्र की उत्तरपुस्तिकाओं की फिर से जाँच करवाई, तब पोल खुली। वास्तव में उसे उड़िया में मात्र 39 ऍंगरेजी में 50, भूगोल में 45, और विज्ञान में 40 अंक ही मिले थे। इस तरह से उसे कुल 750 में से 478 अंक ही मिले थे। सवाल यह उठता है कि उसे अधिक अंक किसने और क्यों दिए? हुआ यूँ कि जब उत्तरपुस्तिकाओं के जाँचने का काम शुरू हुआ, तब परीक्षक के कान में यह बात पहँचाई गई कि विजय दास राज्य के शिक्षा मंत्री का पुत्र है, इसलिए उन पर विशेष कृपा की जाए।
यह जानकारी मिलते ही मीडिया तो सक्रिय हो गया। उसे तो मानो खबरों का मसाला ही मिल गया। खूब हल्ला-गुल्ला हुआ। आखिरकार मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने राज्य के मुख्य सचिव को इस मामले की जाँच का आदोश् दिया और रिपोर्ट अतिशीघ्र उन्हें सौंपने की ताकीद की। तब शिक्षामंत्री विष्णुचरण दास ने इस मामले में लीपापोती करते हुए कहा कि वह तो कंप्यूटर की भूल से ऐसा हो गया। एक मूर्ख आदमी भी समझता है कि कंप्यूटर वही करता है, जो उसे कहा जाता है। कंप्यूटर अपने मन से किसी के अंक नहीं बढ़ा सकता। शिक्षामंत्री का कहना था कि जब मैंने मातृभाषा में 89 अंक देखे, तभी मुझे लग गया था कि कुछ गड़बड़ है। मैंने उसी समय उत्तरपुस्तिका का पुन:परीक्षण्ा करने की ठान ली थी। मीडिया ने इस मामले को तिल का ताड़ बना दिया। उनकी इस स्वीकारोक्ति में भी कितना छल और कपट है, इसे सभी जानते हैं।
इस घटना के बाद सैकड़ों विद्यार्थियों ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया। आश्चर्य की बात यह है कि अभी तक उनके आवेदनों पर विचार ही चल रहा है, उनकी उत्तरपुस्तिकाओं की जाँच का काम अभी सोचा भी नहीं जा सकता, लेकिन मंत्रीपुत्र विजय की संशोधित अंकसूची तैयार होकर उनके हाथ में पहुँच चुकी है। तो यह है हमारी शिक्षा का एक स्वरूप्, जहाँ धन और बल पर कुछ भी किया जा सकता है। आज भी 100 प्रतिशत परिणाम देने वाली शालाओं की स्थिति पर गौर किया जाए, तो स्पष्ट हो जाएगा कि वहाँ शत-प्रतिशत परिणाम कैसे और क्यों आता है। पहले हमें शिक्षा का व्यवसाय और व्यवसाय की शिक्षा का महत्व समझना होगा, तभी इस बजबजाती व्यवस्था को सही तरीके से देख पाएँगे।
डॉ. महेश परिमल

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