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11:45 am

डॉ. महेश परिमल
कितनी श्रध्दा रखते हैं, हम सब अपनी गंगा मैया पर। फिर चाहे वह इलाहाबाद का तट हो या हरिद्वार का, लखनऊ हो या आगरा, हर जगह हम रोज सुबह देखते हैं कि लोग अपनी श्रध्दा को किस तरह से प्रदर्शित करते हैं। इनकी श्रध्दा ही इनका विश्वास है। अगर इन्हें यह कहा जाए कि गंगा अब हमारे देश में कुछ ही वर्षों की मेहमान है, तो इन्हें विश्वास नहीं होगा। पर इस कटु सत्य को हमें अब स्वीकार ही लेना चाहिए, क्योंकि गंगा अब अपना अस्तित्व खोते जा रही है। गंगा तट लगातार सिमटते जा रहे हैं, इसका प्रदूषण भी बढ़ रहा है। गंगा को शुध्द करने के सारे प्रयास नाकाम होते जा रहे हैं। गंगा अब मैली ही नहीं, बल्कि गटर के गंदे पानी वाली गंगा बन गई है। अब इसके पानी में वह बात नहीं रही। अब तो बोतल में बंद पानी अधिक दिनों तक सुरक्षित भी नहीं रह पाता। गंगा नदी अब अपनी आयु पूरी कर रही है। आज की युवा पीढ़ी जब तक अपनी जीवन संधया में पहुँचेंगे, तब तक गंगा नदी केवल पाठय पुस्तकों और पुरानी हिंदी फिल्मो तक ही सीमित रह जाएगी, यह तय है।
गंगा नदी में रोज ही हजारों टन फूल, लाखों गैलन सीवेज का पानी और हजारों गैलन प्रदूषणयुक्त रसायन विभिन्न माध्यम से पहुँच रहे हैं। हाल ही में महानगर दिल्ली में लोकशिक्षण के एक भाग के रूप में गंगा नदी पर केंद्रित एक डाक्यूमेंट्री फिल्म का प्रदर्शन किया। इस फिल्म का नाम है 'गंगा: रेस्क्यूइंग द रिवर इन डिस्ट्रेस'। इस फिल्म को बनाया एक विदेशी गंगा प्रेमी सुसान जी. जोन्स ने, इसमें सहयोग दिया पानी मोर्चा गंगा महासभा नामक एनजीओ ने। इस फिल्म में उन्होंने बताया है कि किस तरह से गंगा पर्वतराज हिमालय की गोद से निकलकर उत्तर के मैदानी इलाकों में प्रवेश कर अपना रौद्र रूप दिखाती है। उसके तट पर होने वाले अंतिम संस्कार, गंगा पूजा-आरती, गंगा में छोड़े जाने वाले दीये, फूल-हार, स्थानीय लोगों द्वारा मल-विसर्जन और स्नान और इसके अलावा बरतन-कपड़े की धुलाई को स्पष्ट रूप से दिखाने की कोशिश की है। दूसरी ओर जगह-जगह पर मिलने वाले रसायनों के कारण किस तरह से गंगा लगातार प्रदूषित होती जा रही है, फिल्म में इसे बखूबी दिखाया गया है।
पिछले एक दशक से पर्यावरण प्रेमी और वकील महेश मेहता गंगा नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए काम कर रहे हैं, गंगा में जहरीले रसायनों और गंदा पानी बहाने वाले तमाम निगमों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ना मामूली बात नहीं है। अफसोस के साथ वे बताते हैं कि मानव ने यदि प्र.ति के साथ छेड़छाड़ करना बंद नहीं किया, तो समूची जीवनसृष्टि ही खतरे में पड़ जाएगी। हाल ही में यूएनओ से जारी किए गए रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि गंगा को पानी की आपूर्ति करने वाले हिमालय के हिमखंड सन् 2030 तक पूरी तरह से पिघल जाएँगे। इन हिमखंडों से गंगा को 70 प्रतिशत पानी मिलता है। खासकर चैत और वैशाख में मैदानी इलाकों में जब गंगा बिलकुल सूख जाती है, तब गंगोत्री ही एकमात्र सहारा के रूप में उसकी मदद करती है। यही गंगोत्री अब 50 गज के हिसाब से सिकुड़ती जा रही है। आज से 20 वर्ष पहले गंगोत्री इतनी तेजी से नहीं पिघल रही थी, लेकिन अब उसका पिघलना तेजी से जारी है।
पानी मोर्चा गंगा महासभा के साथ सम्बध्दा निवृत्त कमांडेंट सुरेश्वर सिन्हा कहते हैं कि 2008 के मार्च में यूएनओ ने लुप्तप्राय होने वाले विश्व की दस नदियों की सूची जारी की है, जिसमें गंगा का नाम भी शामिल है। यह जानकर हर भारतीय दु:खी हो सकता है, पर किया क्या जा सकता है? प्र.ति से लगातार छेड़छाड़ के कारण गंगा ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व के पर्यावरण पर संकट आ पड़ा है। हजारों वर्ष की पुराण प्रसिध्दा और एक से अधिक संस्कृति की साक्षी गंगा आज लुप्तप्राय नदियों की श्रेणी में आ गई है। यह खबर भारतीय को कँपकँपा सकती है। गंगा केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया खंड में पेयजल की विशाल स्रोत के रूप में जानी जाती है। गंगा लुप्त न हो, इसके लिए एक-एक समझदार भारतीय नागरिक की नैतिक जिम्मेदारी है।
कमांडेंट सिन्हा के अनुसार गंगा 50 करोड़ लोगों के लिए पेयजल और खेती के लिए पानी की पूर्ति करती है। किंतु अब उसकी यह आपूर्ति जल्द ही खतम हो जाती है। उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर रायों के लोग कम पढ़े-लिखे होने के कारण परिस्थितियों की भयावहता को ये समझ नहीं पा रहे हैं। दूसरी ओर हर पाँच साल में हाथ जोड़कर गरीबों के सामने गरीब बनकर वोटों की भीख माँगने वाले नेता इस स्थिति को समझना ही नहीं चाहते।
विशेषज्ञ कहते हैं कि वह समय दूर नहीं, जब गंगा एक मौसमी नदी बनकर रह जाएगी। यदि बारिश अच्छी हुई तो गंगा के किनारे छलकते हुए मिलेंगे, परंतु गर्मी में गंगा नदी पूरी तरह से सूख जाएगी। 1568 मील लम्बी नदी के किनारे 100 से अधिक छोटे-बड़े शहर बसे हुए हैं। इनमें से बहुत ही थोड़े शहरों की अपनी सीवेज लाइन है, बाकी शहरों का गंदा पानी गंगा में ही बहाया जा रहा है। इसमें उद्योग कारखानों की गंदगी तो और भी बुरी हालत में है। यह सारे काम बेरोकटोक जारी हैं। गंगा में मिलने वाले इन प्रदूषणों को कम करने की दिशा में सरकार के सारे प्रसास नाकाफी साबित हो रहे हैं। हमारे सामने ही गंगा का पलायन हो रहा है। इसे हम जानते हुए भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। गंगा मैली नहीं थी, हमने ही उसे मैली कर दिया है। गंगा तो पवित्र नदी थी, जो अब पाठय पुस्तकों और पुरानी फिल्मों में ही देखने और जानने को मिलेगी। यह हमारा दुर्भाग्य ही है। गंगा हमारे पाप तो धो सकती थी, पर हमारा दुर्भाग्य नहीं बदल सकती। हर-हर गंगे.
डॉ. महेश परिमल
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